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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 86

धूम्रलोचन-वध

अध्याय 85अध्याय-सूचीअध्याय 87

श्लोक 1 (markandeya.86.1)

ऋषिरुवाच इत्याकर्ण्य वचो देव्याः स दूतोऽमर्षपूरितः । समाचष्ट समागम्य दैत्यराजाय विस्तरात् ॥ 86.1 ॥

ṛṣiruvāca ityākarṇya vaco devyāḥ sa dūto 'marṣapūritaḥ samācaṣṭa samāgamya daityarājāya vistarāt

ऋषि ने कहा — देवी के इन वचनों को सुनकर वह दूत क्रोध से भर गया, और लौटकर उसने दैत्यराज को सब कुछ विस्तारपूर्वक कह सुनाया।

श्लोक 2 (markandeya.86.2)

तस्य दूतस्य तद्वाक्यमाकर्ण्यासुरराट् ततः । सक्रोधः प्राह दैत्यानामधिपं धूम्रलोचनम् ॥ 86.2 ॥

tasya dūtasya tadvākyamākarṇyāsurarāṭ tataḥ sakrodhaḥ prāha daityānāmadhipaṁ dhūmralocanam

उस दूत के वचन सुनकर असुरों का राजा शुम्भ क्रोध से भर गया और दैत्यों के सेनापति धूम्रलोचन से बोला।

श्लोक 3 (markandeya.86.3)

हे धूम्रलोचनाशु त्वं स्वसैन्यपरिवारितः । तामानय बलाद् दुष्टां केशाकर्षणविह्वलाम् ॥ 86.3 ॥

he dhūmralocanāśu tvaṁ svasainyaparivāritaḥ tāmānaya balād duṣṭāṁ keśākarṣaṇavihvalām

हे धूम्रलोचन! तुम अपनी सेना सहित शीघ्र जाओ और उस दुष्टा को बलपूर्वक केश पकड़कर, घसीटते हुए ले आओ।

श्लोक 4 (markandeya.86.4)

तत्परित्राणदः कश्चिद्यदि वोत्तिष्ठतेऽपरः । स हन्तव्योऽमरो वापि यक्षो गन्धर्व एव वा ॥ 86.4 ॥

tatparitrāṇadaḥ kaścidyadi vottiṣṭhate 'paraḥ sa hantavyo 'maro vāpi yakṣo gandharva eva vā

यदि उसकी रक्षा के लिए कोई और खड़ा हो, चाहे वह देवता हो, यक्ष हो अथवा गन्धर्व ही क्यों न हो, वह भी मार डाला जाए।

श्लोक 5 (markandeya.86.5)

तेनाज्ञप्तस्ततः शीघ्रं स दैत्यो धूम्रलोचनः । वृतः षष्ट्या सहस्राणामसुराणां द्रुतं ययौ ॥ 86.5 ॥

tenājñaptastataḥ śīghraṁ sa daityo dhūmralocanaḥ vṛtaḥ ṣaṣṭyā sahasrāṇāmasurāṇāṁ drutaṁ yayau

ऋषि ने कहा — उसकी आज्ञा पाकर वह दैत्य धूम्रलोचन शीघ्र ही साठ हजार असुरों से घिरा हुआ वहाँ से चल पड़ा।

श्लोक 6 (markandeya.86.6)

स दृष्ट्वा तां ततो देवीं तुहिनाचलसंस्थिताम् । जगादोच्चैः प्रयाहीति मूलं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 86.6 ॥

sa dṛṣṭvā tāṁ tato devīṁ tuhinācalasaṁsthitām jagādoccaiḥ prayāhīti mūlaṁ śumbhaniśumbhayoḥ

हिमालय पर्वत पर विराजमान उस देवी को देखकर उसने ऊँचे स्वर में कहा — 'चलो, शुम्भ और निशुम्भ के पास चलो।'

श्लोक 7 (markandeya.86.7)

न चेत्प्रीत्याद्य भवती मद्भर्तारमुपैष्यति । ततो बलान्नयाम्येष केशाकर्षणविह्वलाम् ॥ 86.7 ॥

na cetprītyādya bhavatī madbhartāramupaiṣyati tato balānnayāmyeṣa keśākarṣaṇavihvalām

'यदि तुम आज प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामी के पास नहीं जाओगी, तो मैं तुम्हें बलपूर्वक केश पकड़कर, विह्वल करते हुए ले जाऊँगा।'

श्लोक 8 (markandeya.86.8)

श्रीदेव्युवाच दैत्येश्वरेण प्रहितो बलवान् बलसंवृतः । बलान्नयसि मामेवं ततः किं ते करोम्यहम् ॥ 86.8 ॥

śrīdevyuvāca daityeśvareṇa prahito balavān balasaṁvṛtaḥ balānnayasi māmevaṁ tataḥ kiṁ te karomyaham

श्री देवी ने कहा — 'दैत्येश्वर के भेजे हुए, स्वयं बलवान् और सेना से घिरे हुए तुम मुझे बलपूर्वक ले जाना चाहते हो, तो फिर मैं तुम्हारा क्या करूँ?'

श्लोक 9 (markandeya.86.9)

ऋषिरुवाच इत्युक्तः सोऽभ्यधावत्तामसुरो धूम्रलोचनः । हुङ्कारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः ॥ 86.9 ॥

ṛṣiruvāca ityuktaḥ so 'bhyadhāvattāmasuro dhūmralocanaḥ huṅkāreṇaiva taṁ bhasma sā cakārāmbikā tataḥ

ऋषि ने कहा — यह सुनकर वह असुर धूम्रलोचन देवी की ओर दौड़ा; तभी अम्बिका ने केवल 'हुंकार' मात्र से उसे भस्म कर दिया।

श्लोक 10 (markandeya.86.10)

अथ क्रुद्धं महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । ववर्ष सायकैस्तीक्ष्णैस्तथा शक्तिपरश्वधैः ॥ 86.10 ॥

atha kruddhaṁ mahāsainyamasurāṇāṁ tathāmbikā vavarṣa sāyakaistīkṣṇaistathā śaktiparaśvadhaiḥ

तत्पश्चात् अम्बिका ने क्रुद्ध हुई असुरों की उस विशाल सेना पर तीक्ष्ण बाणों, शक्तियों और परशुओं की वर्षा कर दी।

श्लोक 11 (markandeya.86.11)

ततो धुतसटः कोपात् कृत्वा नादं सुभैरवम् । पपातासुरसेनायां सिंहो देव्याः स्ववाहनः ॥ 86.11 ॥

tato dhutasaṭaḥ kopāt kṛtvā nādaṁ subhairavam papātāsurasenāyāṁ siṁho devyāḥ svavāhanaḥ

तब क्रोध से अयाल फैलाकर, अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए, देवी का अपना वाहन सिंह असुर-सेना पर टूट पड़ा।

श्लोक 12 (markandeya.86.12)

कांश्चित् करप्रहारेण दैत्यानास्येन चापरान् । आक्रम्य चाधरेणान्यान् स जघान महासुरान् ॥ 86.12 ॥

kāṁścit karaprahāreṇa daityānāsyena cāparān ākramya cādhareṇānyān sa jaghāna mahāsurān

उसने पंजे के प्रहार से कुछ दैत्यों को, मुख से कुछ को, और जबड़े से दबाकर कुछ और महाअसुरों का वध किया।

श्लोक 13 (markandeya.86.13)

केषाञ्चित् पाटयामास नखैः कोष्ठानि केसरी । तथा तलप्रिहारेण शिरांसि कृतवान् पृथक् ॥ 86.13 ॥

keṣāñcit pāṭayāmāsa nakhaiḥ koṣṭhāni kesarī tathā talaprihāreṇa śirāṁsi kṛtavān pṛthak

उस सिंह ने नखों से कुछ के पेट फाड़ डाले और पंजे के प्रहार से कुछ के सिर अलग-अलग कर दिए।

श्लोक 14 (markandeya.86.14)

विच्छिन्नबाहुशिरसः सृतास्तेन तथापरे । पपौ च रुधिरं कोष्ठादन्येषां धुतकेसरः ॥ 86.14 ॥

vicchinnabāhuśirasaḥ sṛtāstena tathāpare papau ca rudhiraṁ koṣṭhādanyeṣāṁ dhutakesaraḥ

जिनकी भुजाएँ और सिर कट चुके थे, वे उसके द्वारा वैसे ही बिखर गए; और अयाल फैलाए हुए वह सिंह अन्य असुरों के पेट से बहते रक्त को पीने लगा।

श्लोक 15 (markandeya.86.15)

क्षणेन तद्बलं सर्वं क्षयं नीतं महात्मना । तेन केसरिणा देव्या वाहनेनातिकोपिना ॥ 86.15 ॥

kṣaṇena tadbalaṁ sarvaṁ kṣayaṁ nītaṁ mahātmanā tena kesariṇā devyā vāhanenātikopinā

उस महाबली और अत्यन्त क्रोधित सिंह द्वारा, जो देवी का वाहन था, वह सारी सेना एक ही क्षण में नष्ट कर दी गई।

श्लोक 16 (markandeya.86.16)

श्रुत्वा तमसुरं देव्या निहतं धूम्रलोचनम् । बलं च क्षयितं कृत्स्त्रं देवीकेसरिणा ततः ॥ 86.16 ॥

śrutvā tamasuraṁ devyā nihataṁ dhūmralocanam balaṁ ca kṣayitaṁ kṛtstraṁ devīkesariṇā tataḥ

जब शुम्भ ने सुना कि असुर धूम्रलोचन देवी के हाथों मारा गया है और उसकी सम्पूर्ण सेना देवी के सिंह द्वारा नष्ट कर दी गई है...

श्लोक 17 (markandeya.86.17)

चुकोप दैत्याधिपतिः शुम्भः प्रस्फुरिताधरः । आज्ञापयामास च तौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥ 86.17 ॥

cukopa daityādhipatiḥ śumbhaḥ prasphuritādharaḥ ājñāpayāmāsa ca tau caṇḍamuṇḍau mahāsurau

...तो दैत्याधिपति शुम्भ के होंठ क्रोध से फड़कने लगे, और उसने महाअसुर चण्ड और मुण्ड दोनों को आज्ञा दी।

श्लोक 18 (markandeya.86.18)

हे चण्ड हे मुण्ड बलैर्बहुभिः परिवारितौ । तत्र गच्छत गत्वा च सा समानीयतां लघु ॥ 86.18 ॥

he caṇḍa he muṇḍa balairbahubhiḥ parivāritau tatra gacchata gatvā ca sā samānīyatāṁ laghu

'हे चण्ड, हे मुण्ड! बहुत बड़ी सेना के साथ वहाँ जाओ, और जाकर उसे शीघ्र ही यहाँ ले आओ।'

श्लोक 19 (markandeya.86.19)

केशेष्वाकृष्य बद्ध्वा वा यदि वः संशयो युधि । तदाशेषायुधैः सर्वैरसुरैर्विनिहन्यताम् ॥ 86.19 ॥

keśeṣvākṛṣya baddhvā vā yadi vaḥ saṁśayo yudhi tadāśeṣāyudhaiḥ sarvairasurairvinihanyatām

'उसे केश पकड़कर घसीटो अथवा बाँध लो; और यदि युद्ध में तुम्हें कोई संशय हो, तो सम्पूर्ण अस्त्रों-शस्त्रों सहित सभी असुरों द्वारा उसका वध कर दिया जाए।'

श्लोक 20 (markandeya.86.20)

तस्यां हतायां दुष्टायां सिंहे च विनिपातिते । शीघ्रमागम्यतां बद्ध्वा गृहीत्वा तामथाम्बिकाम् ॥ 86.20 ॥

tasyāṁ hatāyāṁ duṣṭāyāṁ siṁhe ca vinipātite śīghramāgamyatāṁ baddhvā gṛhītvā tāmathāmbikām

'उस दुष्टा के मारे जाने और सिंह के गिर जाने पर, शीघ्र ही अम्बिका को बाँधकर, पकड़कर लौट आओ।'

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