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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 85

देव्या दूतसंवाद

अध्याय 84अध्याय-सूचीअध्याय 86

श्लोक 1 (markandeya.85.1)

ऋषिरुवाच पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः । त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ॥ 85.1 ॥

ṛṣiruvāca purā śumbhaniśumbhābhyāmasurābhyāṁ śacīpateḥ trailokyaṁ yajñabhāgāśca hṛtā madabalāśrayāt

ऋषि ने कहा — प्राचीन काल में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो असुरों ने अपने बल के मद के आश्रय से शचीपति (इन्द्र) के तीनों लोक तथा यज्ञ-भाग छीन लिए।

श्लोक 2 (markandeya.85.2)

तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैन्दवम् । कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च ॥ 85.2 ॥

tāveva sūryatāṁ tadvadadhikāraṁ tathaindavam kauberamatha yāmyaṁ ca cakrāte varuṇasya ca

उन दोनों ने ही सूर्य का, चन्द्रमा का, कुबेर का, यम का, तथा वरुण का अधिकार भी अपने वश में कर लिया।

श्लोक 3 (markandeya.85.3)

तावेव पवनर्धि च चक्रतुर्वह्निकर्म च । अन्येषाञ्चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठति । ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ॥ 85.3 ॥

tāveva pavanardhi ca cakraturvahnikarma ca anyeṣāñcādhikārān sa svayamevādhitiṣṭhati tato devā vinirdhūtā bhraṣṭarājyāḥ parājitāḥ

उन्हीं दोनों ने वायु का अधिकार तथा अग्नि का कार्य भी अपना लिया, और शुम्भ स्वयं ही अन्य देवताओं के अधिकारों पर भी अधिष्ठित हो गया। तब सब देवता निकाल दिए गए, राज्यभ्रष्ट और पराजित होकर,

श्लोक 4 (markandeya.85.4)

हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः । महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजिताम् ॥ 85.4 ॥

hṛtādhikārāstridaśāstābhyāṁ sarve nirākṛtāḥ mahāsurābhyāṁ tāṁ devīṁ saṁsmarantyaparājitām

अपने अधिकार छिन जाने पर उन दोनों महासुरों द्वारा निकाले गए वे सब देवता, उस अपराजिता देवी का स्मरण करने लगे।

श्लोक 5 (markandeya.85.5)

तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽपत्सु स्मृताखिलाः । भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात् परमापदः ॥ 85.5 ॥

tayāsmākaṁ varo datto yathā ’patsu smṛtākhilāḥ bhavatāṁ nāśayiṣyāmi tatkṣaṇāt paramāpadaḥ

"उसी देवी ने हमें यह वर दिया था कि जब सब मिलकर विपत्तियों में उसका स्मरण करेंगे, तब वह उसी क्षण तुम्हारी परम विपत्तियों का नाश कर देगी।"

श्लोक 6 (markandeya.85.6)

इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम् । जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ॥ 85.6 ॥

iti kṛtvā matiṁ devā himavantaṁ nageśvaram jagmustatra tato devīṁ viṣṇumāyāṁ pratuṣṭuvuḥ

ऐसा विचार करके देवगण पर्वतों के स्वामी हिमवान् के पास गए, और वहाँ उन्होंने देवी विष्णुमाया की स्तुति की।

श्लोक 7 (markandeya.85.7)

देवा ऊचुः नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ 85.7 ॥

devā ūcuḥ namo devyai mahādevyai śivāyai satataṁ namaḥ namaḥ prakṛtyai bhadrāyai niyatāḥ praṇatāḥ sma tām

देवताओं ने कहा — देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार, शिवा को सदा नमस्कार; प्रकृति को, भद्रा को नमस्कार — हम संयतचित्त होकर उसे प्रणाम करते हैं।

श्लोक 8 (markandeya.85.8)

रौद्रायै नमो नित्यायौ गौर्यै धात्र्यै नमो नमः । नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ 85.8 ॥

raudrāyai namo nityāyau gauryai dhātryai namo namaḥ namo jagatpratiṣṭhāyai devyai kṛtyai namo namaḥ

रौद्रा को, नित्या को, गौरी को, धात्री को बार-बार नमस्कार; जगत् की प्रतिष्ठा-रूपिणी देवी को, कृत्या (यज्ञ-क्रिया) को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 9 (markandeya.85.9)

द्योत्स्त्रायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः । कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ॥ 85.9 ॥

dyotstrāyai cendurūpiṇyai sukhāyai satataṁ namaḥ kalyāṇyai praṇatāṁ vṛddhyai siddhyai kurmo namo namaḥ

ज्योत्स्ना को, चन्द्ररूपिणी को, सुख को सदा नमस्कार; कल्याणी को, नत जनों की वृद्धि और सिद्धि को हम बार-बार नमस्कार करते हैं।

श्लोक 10 (markandeya.85.10)

नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः । दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै । ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ 85.10 ॥

nairṛtyai bhūbhṛtāṁ lakṣmyai śarvāṇyai te namo namaḥ durgāyai durgapārāyai sārāyai sarvakāriṇyai khyātyai tathaiva kṛṣṇāyai dhūmrāyai satataṁ namaḥ

नैरृती को, राजाओं की लक्ष्मी को, शर्वाणी को तुझे बार-बार नमस्कार; दुर्गा को, दुर्गम को पार करानेवाली को, सार-रूपिणी को, सब कुछ करनेवाली को, ख्याति को, तथा कृष्णा और धूम्रा को सदा नमस्कार।

श्लोक 11 (markandeya.85.11)

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः । मनो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ 85.11 ॥

atisaumyātiraudrāyai natāstasyai namo namaḥ mano jagatpratiṣṭhāyai devyai kṛtyai namo namaḥ

अत्यन्त सौम्य और अत्यन्त रौद्र उस देवी को हम झुककर बार-बार नमस्कार करते हैं; जगत् की प्रतिष्ठा-रूपिणी देवी को, कृत्या को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 12 (markandeya.85.12)

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.12 ॥

yā devī sarvabhūteṣu viṣṇumāyeti śabditā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 13 (markandeya.85.13)

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.13 ॥

yā devī sarvabhūteṣu cetanetyabhidhīyate namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में चेतना कहलाती है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 14 (markandeya.85.14)

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.14 ॥

yā devī sarvabhūteṣu buddhirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 15 (markandeya.85.15)

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै मनो नमः ॥ 85.15 ॥

yā devī sarvabhūteṣu nidrārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai mano namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में निद्रा के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 16 (markandeya.85.16)

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.16 ॥

yā devī sarvabhūteṣu kṣudhārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में क्षुधा के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 17 (markandeya.85.17)

या देवी सर्वभूतेषु च्छायारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.17 ॥

yā devī sarvabhūteṣu cchāyārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में छाया के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 18 (markandeya.85.18)

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.18 ॥

yā devī sarvabhūteṣu śaktirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 19 (markandeya.85.19)

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.19 ॥

yā devī sarvabhūteṣu tṛṣṇārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में तृष्णा के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 20 (markandeya.85.20)

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.20 ॥

yā devī sarvabhūteṣu kṣāntirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में क्षान्ति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 21 (markandeya.85.21)

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.21 ॥

yā devī sarvabhūteṣu jātirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में जाति (सहज-स्वभाव) के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 22 (markandeya.85.22)

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.22 ॥

yā devī sarvabhūteṣu lajjārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में लज्जा के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 23 (markandeya.85.23)

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.23 ॥

yā devī sarvabhūteṣu śāntirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में शान्ति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 24 (markandeya.85.24)

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.24 ॥

yā devī sarvabhūteṣu śraddhārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में श्रद्धा के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 25 (markandeya.85.25)

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.25 ॥

yā devī sarvabhūteṣu kāntirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में कान्ति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 26 (markandeya.85.26)

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.26 ॥

yā devī sarvabhūteṣu lakṣmīrūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में लक्ष्मी के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 27 (markandeya.85.27)

या देवी सर्वभूतेषु धृतिरूपेण संस्थिता । तमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.27 ॥

yā devī sarvabhūteṣu dhṛtirūpeṇa saṁsthitā tamastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में धृति (धैर्य) के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 28 (markandeya.85.28)

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.28 ॥

yā devī sarvabhūteṣu vṛttirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में वृत्ति (जीविका) के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 29 (markandeya.85.29)

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.29 ॥

yā devī sarvabhūteṣu smṛtirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में स्मृति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 30 (markandeya.85.30)

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.30 ॥

yā devī sarvabhūteṣu dayārūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में दया के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 31 (markandeya.85.31)

या देवी सर्वभूतेषु नीतिरूपेणं संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.31 ॥

yā devī sarvabhūteṣu nītirūpeṇaṁ saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में नीति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 32 (markandeya.85.32)

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.32 ॥

yā devī sarvabhūteṣu tuṣṭirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में तुष्टि के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 33 (markandeya.85.33)

या देवी सर्वभूतेषु पुष्टिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.33 ॥

yā devī sarvabhūteṣu puṣṭirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में पुष्टि के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 34 (markandeya.85.34)

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.34 ॥

yā devī sarvabhūteṣu mātṛrūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में मातृ-रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 35 (markandeya.85.35)

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.35 ॥

yā devī sarvabhūteṣu bhrāntirūpeṇa saṁsthitā namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो देवी समस्त प्राणियों में भ्रान्ति के रूप में स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 36 (markandeya.85.36)

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या । भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ 85.36 ॥

indriyāṇāmadhiṣṭhātrī bhūtānāṁ cākhileṣu yā bhūteṣu satataṁ tasyai vyāptidevyai namo namaḥ

जो इन्द्रियों की अधिष्ठात्री है, और समस्त प्राणियों में सदा व्याप्त है — उस व्याप्ति-रूपिणी देवी को बार-बार नमस्कार।

श्लोक 37 (markandeya.85.37)

चितिरूपेण या कृत्स्त्रमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ 85.37 ॥

citirūpeṇa yā kṛtstrametad vyāpya sthitā jagat namastasyai namastasyai namastasyai namo namaḥ

जो चिति (चेतना) के रूप में इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित है — उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, उसे नमस्कार, बार-बार नमस्कार।

श्लोक 38 (markandeya.85.38)

स्तु ता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात् तथासुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता । करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ 85.38 ॥

stu tā suraiḥ pūrvamabhīṣṭasaṁśrayāt tathāsurendreṇa dineṣu sevitā karotu sā naḥ śubhaheturīśvarī śubhāni bhadrāṇyabhihantu cāpadaḥ

जो पहले भी देवताओं द्वारा अभीष्ट-प्राप्ति के लिए शरण में जाकर स्तुत हुई, और इन्द्र द्वारा प्रतिदिन सेवित हुई — वह मंगल-कारिणी ईश्वरी हमारा कल्याण करे, हमारे अशुभ का नाश करे और शुभ प्रदान करे।

श्लोक 39 (markandeya.85.39)

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितैर् अस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते । या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः सर्वापदो भक्तिविनम्कमूर्तिभिः ॥ 85.39 ॥

yā sāmprataṁ coddhatadaityatāpitair asmābhirīśā ca surairnamasyate yā ca smṛtā tatkṣaṇameva hanti naḥ sarvāpado bhaktivinamkamūrtibhiḥ

जो अब उद्धत दैत्यों से पीड़ित हम देवताओं द्वारा भक्तिपूर्वक झुककर पूजित होती है, और जिसका स्मरण करते ही वह हमारी समस्त विपत्तियों को उसी क्षण नष्ट कर देती है — वह ईश्वरी हमारा कल्याण करे।

श्लोक 40 (markandeya.85.40)

ऋषिरूवाच एवं स्तवादियुक्तानां देवानां तत्र पार्वती । स्नातुमभ्याययौ तोये जाह्नव्या नृपनन्दन ॥ 85.40 ॥

ṛṣirūvāca evaṁ stavādiyuktānāṁ devānāṁ tatra pārvatī snātumabhyāyayau toye jāhnavyā nṛpanandana

ऋषि ने कहा — हे राजकुमार! देवताओं के इस प्रकार स्तुति में लगे रहते हुए, वहाँ पार्वती गंगाजल में स्नान करने आईं।

श्लोक 41 (markandeya.85.41)

साब्रवीत्तान् सुरान् सुभ्रूर्भवद्भिः स्तूयतेऽत्र का । शरीरकोशतश्चास्याः समुद्भूताब्रवीच्छिवा ॥ 85.41 ॥

sābravīttān surān subhrūrbhavadbhiḥ stūyate ’tra kā śarīrakośataścāsyāḥ samudbhūtābravīcchivā

उस सुन्दर भौंहोंवाली ने उन देवताओं से पूछा — "यहाँ आप किसकी स्तुति कर रहे हैं?" और उसी के शरीर-कोश से एक शिवा (देवी) प्रकट होकर बोली —

श्लोक 42 (markandeya.85.42)

स्तोत्रं ममैतत् क्रियते शुम्भदैत्यनिराकृतैः । देवैः समेतैः समरे निशुम्भेन पराजितैः ॥ 85.42 ॥

stotraṁ mamaitat kriyate śumbhadaityanirākṛtaiḥ devaiḥ sametaiḥ samare niśumbhena parājitaiḥ

"यह स्तोत्र मेरे लिए ही किया जा रहा है, उन देवताओं द्वारा जिन्हें दैत्य शुम्भ ने निकाल दिया है और जो युद्ध में निशुम्भ से पराजित हो चुके हैं।"

श्लोक 43 (markandeya.85.43)

शरीरकोशाद्यत्तस्याः पार्वत्या निः सृताम्बिका । कौशिकीति समस्तेषु ततो लोकेषु गीयते ॥ 85.43 ॥

śarīrakośādyattasyāḥ pārvatyā niḥ sṛtāmbikā kauśikīti samasteṣu tato lokeṣu gīyate

चूँकि वह अम्बिका पार्वती के शरीर-कोश से निकली, इसीलिए वह सम्पूर्ण लोकों में तब से "कौशिकी" के नाम से गाई जाती है।

श्लोक 44 (markandeya.85.44)

तस्यां विनिर्गतायां तु कृष्णाभूत् सापि पार्वती । कालिकेति समाख्याता हिमाचलकृताश्रया ॥ 85.44 ॥

tasyāṁ vinirgatāyāṁ tu kṛṣṇābhūt sāpi pārvatī kāliketi samākhyātā himācalakṛtāśrayā

उसके इस प्रकार निकल जाने पर वह पार्वती स्वयं भी श्याम वर्ण की हो गईं, और हिमाचल में निवास करने के कारण "कालिका" के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

श्लोक 45 (markandeya.85.45)

ततोऽम्बिकां परं रूपं बिभ्राणां सुमनोहरम् । ददर्श चण्डो मुण्डश्च भृत्यौ शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 85.45 ॥

tato ’mbikāṁ paraṁ rūpaṁ bibhrāṇāṁ sumanoharam dadarśa caṇḍo muṇḍaśca bhṛtyau śumbhaniśumbhayoḥ

तब शुम्भ-निशुम्भ के दो सेवकों, चण्ड और मुण्ड ने, अम्बिका को अत्यन्त मनोहर श्रेष्ठ रूप धारण किए हुए देखा।

श्लोक 46 (markandeya.85.46)

ताभ्यां शुम्भाय चाख्याता अतीव सुमनोहरा । काप्यास्ते स्त्री महाराज भासयन्ती हिमाचलम् ॥ 85.46 ॥

tābhyāṁ śumbhāya cākhyātā atīva sumanoharā kāpyāste strī mahārāja bhāsayantī himācalam

उन दोनों ने शुम्भ से जाकर कहा — "हे महाराज, कोई अत्यन्त मनोहर स्त्री अपनी कान्ति से हिमाचल को प्रकाशित करती हुई खड़ी है।"

श्लोक 47 (markandeya.85.47)

नैव तादृक् क्वचिद्रूपं दृष्टं केनचिदुत्तमम् । ज्ञायतां काप्यसौ देवी गृह्यतां चासुरेश्वर ॥ 85.47 ॥

naiva tādṛk kvacidrūpaṁ dṛṣṭaṁ kenaciduttamam jñāyatāṁ kāpyasau devī gṛhyatāṁ cāsureśvara

"ऐसा उत्तम रूप किसी ने कभी कहीं नहीं देखा। हे असुरेश्वर, पता लगाया जाए कि वह देवी कौन है, और उसे ग्रहण किया जाए।"

श्लोक 48 (markandeya.85.48)

स्त्रीरत्नमतिचार्वङ्गी द्योतयन्ती दिशस्त्विषा । सा तु तिष्ठति दैत्येन्द्र तां भवान् द्रष्टुमर्हति ॥ 85.48 ॥

strīratnamaticārvaṅgī dyotayantī diśastviṣā sā tu tiṣṭhati daityendra tāṁ bhavān draṣṭumarhati

"स्त्रियों में रत्न-स्वरूपा, अत्यन्त सुन्दर अंगोंवाली, अपनी कान्ति से दिशाओं को आलोकित करती हुई वह वहाँ खड़ी है, हे दैत्येन्द्र! उसे देखना आपके लिए उचित है।"

श्लोक 49 (markandeya.85.49)

यानि रत्नानि मणयो गजाश्वादीनि वै प्रभो । त्रैलोक्ये तु समस्तानि साम्प्रतं भान्ति ते गृहे ॥ 85.49 ॥

yāni ratnāni maṇayo gajāśvādīni vai prabho trailokye tu samastāni sāmprataṁ bhānti te gṛhe

"हे प्रभो! तीनों लोकों में जो भी रत्न, मणियाँ, हाथी, घोड़े आदि हैं, वे सब अब आपके ही घर में शोभा पा रहे हैं।"

श्लोक 50 (markandeya.85.50)

ऐरावतः समानीतो गजरत्नं पुरन्दरात् । पारिजाततरुश्चायं तथैवोच्चैः श्रवा हयः ॥ 85.50 ॥

airāvataḥ samānīto gajaratnaṁ purandarāt pārijātataruścāyaṁ tathaivoccaiḥ śravā hayaḥ

"पुरन्दर से गजरत्न ऐरावत लाया गया, और यह पारिजात वृक्ष भी, तथा उच्चैःश्रवा नामक अश्व भी।"

श्लोक 51 (markandeya.85.51)

विमानं हंससंयुक्तमेतत्तिष्ठति तेऽङ्गणे । रत्नभूतमिहानीतं यदासीद्वेधसोऽद्भुतम् ॥ 85.51 ॥

vimānaṁ haṁsasaṁyuktametattiṣṭhati te ’ṅgaṇe ratnabhūtamihānītaṁ yadāsīdvedhaso ’dbhutam

"यह हंसयुक्त विमान आपके आँगन में खड़ा है, जो रत्नस्वरूप ब्रह्मा का वह अद्भुत विमान यहाँ लाया गया।"

श्लोक 52 (markandeya.85.52)

निधिरेष महापद्मः समानीतो धनेश्वरात् । किञ्जल्किनीं ददौ चाब्धिर्मालामम्लानपङ्कजाम् ॥ 85.52 ॥

nidhireṣa mahāpadmaḥ samānīto dhaneśvarāt kiñjalkinīṁ dadau cābdhirmālāmamlānapaṅkajām

"यह महापद्म नामक निधि कुबेर से लाई गई है, और समुद्र ने आपको केसर-युक्त, कभी न कुम्हलानेवाले कमलों की माला दी।"

श्लोक 53 (markandeya.85.53)

छत्रं ते वारुणं गेहे काञ्चनस्त्रावि तिष्ठति । तथायं स्यन्तनवरो यः पुरासीत् प्रजापतेः ॥ 85.53 ॥

chatraṁ te vāruṇaṁ gehe kāñcanastrāvi tiṣṭhati tathāyaṁ syantanavaro yaḥ purāsīt prajāpateḥ

"स्वर्ण से टपकता हुआ वरुण का छत्र आपके घर में विद्यमान है; तथा प्रजापति का यह सर्वश्रेष्ठ रथ भी।"

श्लोक 54 (markandeya.85.54)

मृत्योरुत्क्रान्तिदा नाम शक्तिरीश त्वया हृता । पाशः सलिलराजस्य भ्रातुस्तव परिग्रहे ॥ 85.54 ॥

mṛtyorutkrāntidā nāma śaktirīśa tvayā hṛtā pāśaḥ salilarājasya bhrātustava parigrahe

"हे ईश! मृत्यु की उत्क्रान्तिदा नामक शक्ति आपने ही छीनी है; और जल के राजा वरुण का पाश आपके भाई के पास है।"

श्लोक 55 (markandeya.85.55)

निशुम्भस्याब्धिजाताश्च समस्ता रत्नजातयः । वह्निरपि ददौ तुभ्यमग्निशौचे च वाससी ॥ 85.55 ॥

niśumbhasyābdhijātāśca samastā ratnajātayaḥ vahnirapi dadau tubhyamagniśauce ca vāsasī

"समुद्र से उत्पन्न समस्त रत्न-जातियाँ निशुम्भ के पास हैं; अग्नि ने भी आपको अग्नि से शुद्ध किए हुए दो वस्त्र दिए हैं।"

श्लोक 56 (markandeya.85.56)

एवं दैत्येन्द्र रत्नानि समस्तान्याहृतानि ते । स्त्रीरत्नमेषा कल्याणी त्वया कस्मान्न गृह्यते ॥ 85.56 ॥

evaṁ daityendra ratnāni samastānyāhṛtāni te strīratnameṣā kalyāṇī tvayā kasmānna gṛhyate

"इस प्रकार, हे दैत्येन्द्र! समस्त रत्न आपके पास लाए जा चुके हैं। तो फिर यह कल्याणी स्त्री-रत्न आपके द्वारा क्यों नहीं ग्रहण की जाती?"

श्लोक 57 (markandeya.85.57)

ऋषिरुवाच निशम्येति वचः शुम्भः स तदा चण्डमुण्डयोः । प्रेषयामास सुग्रीवं दूतं देव्या महासुरः ॥ 85.57 ॥

ṛṣiruvāca niśamyeti vacaḥ śumbhaḥ sa tadā caṇḍamuṇḍayoḥ preṣayāmāsa sugrīvaṁ dūtaṁ devyā mahāsuraḥ

ऋषि ने कहा — चण्ड और मुण्ड के ये वचन सुनकर उस समय महासुर शुम्भ ने सुग्रीव नामक दूत को देवी के पास भेजा।

श्लोक 58 (markandeya.85.58)

शुम्भ उवाच इति चेति च वक्तव्या सा गत्वा वचनान्मम । यथा चाभ्येति संप्रीत्या तथा कार्यं त्वया लघु ॥ 85.58 ॥

śumbha uvāca iti ceti ca vaktavyā sā gatvā vacanānmama yathā cābhyeti saṁprītyā tathā kāryaṁ tvayā laghu

शुम्भ ने कहा — जाकर मेरी ओर से उससे यह-यह बात कहना, और शीघ्र ऐसा प्रयत्न करना कि वह प्रसन्नतापूर्वक स्वयं यहाँ चली आए।

श्लोक 59 (markandeya.85.59)

स तत्र गत्वा यत्रास्ते शैलोद्देशेऽतिशोभने । तां च देवीं ततः प्राह श्लक्ष्णं मधुरया गिरा ॥ 85.59 ॥

sa tatra gatvā yatrāste śailoddeśe ’tiśobhane tāṁ ca devīṁ tataḥ prāha ślakṣṇaṁ madhurayā girā

वह वहाँ गया, जहाँ वह उस अत्यन्त सुन्दर पर्वत-प्रदेश में विराजमान थी, और फिर मधुर तथा कोमल वाणी में उस देवी से बोला।

श्लोक 60 (markandeya.85.60)

दूत उवाच देवि दैत्येश्वरः शुम्भस्त्रैलोक्ये परमेश्वरः । दूतोऽहं प्रेषितस्तेन त्वत्सकाशमिहागतः ॥ 85.60 ॥

dūta uvāca devi daityeśvaraḥ śumbhastrailokye parameśvaraḥ dūto ’haṁ preṣitastena tvatsakāśamihāgataḥ

दूत ने कहा — हे देवी! दैत्यों के स्वामी शुम्भ तीनों लोकों के परमेश्वर हैं। मैं उन्हीं के द्वारा भेजा हुआ दूत, आपके समीप यहाँ आया हूँ।

श्लोक 61 (markandeya.85.61)

अव्याहताज्ञः सर्वासु यः सदा देवयोनिषु । निर्जिताखिलदैत्यारिः स यदाह शृणुष्व तत् ॥ 85.61 ॥

avyāhatājñaḥ sarvāsu yaḥ sadā devayoniṣu nirjitākhiladaityāriḥ sa yadāha śṛṇuṣva tat

जिनकी आज्ञा देवताओं की समस्त योनियों में सदा अबाधित रहती है, जिन्होंने समस्त दैत्य-शत्रुओं को जीत लिया है, वे जो कहते हैं, सुनिए।

श्लोक 62 (markandeya.85.62)

मम त्रैलोक्यमखिलं मम देवा वशानुगाः । यज्ञभागानहं सर्वानुपाश्नामि पृथक् पृथक् ॥ 85.62 ॥

mama trailokyamakhilaṁ mama devā vaśānugāḥ yajñabhāgānahaṁ sarvānupāśnāmi pṛthak pṛthak

"सम्पूर्ण त्रिलोक मेरा है, देवता मेरे वश में हैं; मैं ही समस्त यज्ञ-भागों को अलग-अलग भोगता हूँ।"

श्लोक 63 (markandeya.85.63)

त्रैलोक्ये वररत्नानि मम वश्यान्यशेषतः । तथैव गजरत्नं च हृत्वा देवेन्द्रवाहनम् ॥ 85.63 ॥

trailokye vararatnāni mama vaśyānyaśeṣataḥ tathaiva gajaratnaṁ ca hṛtvā devendravāhanam

"त्रिलोक के समस्त श्रेष्ठ रत्न बिना किसी अपवाद के मेरे अधीन हैं; इसी प्रकार देवराज के वाहन, गजरत्न को भी हरकर [मैंने प्राप्त किया]।"

श्लोक 64 (markandeya.85.64)

क्षीरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नं ममामरैः । उच्चैः श्रवससंज्ञं तत्प्रणिपत्य समर्पितम् ॥ 85.64 ॥

kṣīrodamathanodbhūtamaśvaratnaṁ mamāmaraiḥ uccaiḥ śravasasaṁjñaṁ tatpraṇipatya samarpitam

"क्षीरसागर के मन्थन से उत्पन्न, उच्चैःश्रवा नामक अश्वरत्न भी, देवताओं ने प्रणाम करके स्वयं मुझे समर्पित कर दिया है।"

श्लोक 65 (markandeya.85.65)

यानि चान्यानि देवेषु गन्धर्वेषूरगेषु च । रत्नभूतानि भूतानि तानि मय्येव शोभने ॥ 85.65 ॥

yāni cānyāni deveṣu gandharveṣūrageṣu ca ratnabhūtāni bhūtāni tāni mayyeva śobhane

"हे शोभने! देवताओं, गन्धर्वों और नागों में जो भी अन्य रत्न-तुल्य प्राणी हैं, वे सब भी मेरे ही पास हैं।"

श्लोक 66 (markandeya.85.66)

स्त्रीरत्नभूतां त्वां देवि लोके मन्यामहे वयम् । सा त्वमस्मानुपागच्छ यतो रत्नभुजो वयम् ॥ 85.66 ॥

strīratnabhūtāṁ tvāṁ devi loke manyāmahe vayam sā tvamasmānupāgaccha yato ratnabhujo vayam

"हे देवी! हम आपको इस संसार में स्त्रियों में रत्न-स्वरूपा मानते हैं; अतः चूँकि हम रत्नों के भोक्ता हैं, आप हमारे पास चली आइए।"

श्लोक 67 (markandeya.85.67)

मां वा ममानुजं वापि निशुम्भमुरुविक्रमम् । भज त्वं चञ्चलापाङ्गि रत्नभूतासि वै यतः ॥ 85.67 ॥

māṁ vā mamānujaṁ vāpi niśumbhamuruvikramam bhaja tvaṁ cañcalāpāṅgi ratnabhūtāsi vai yataḥ

"हे चंचल-नयनी! आप मुझे या मेरे छोटे भाई, महापराक्रमी निशुम्भ को अपना लीजिए — क्योंकि आप स्वयं एक रत्न ही हैं।"

श्लोक 68 (markandeya.85.68)

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यसे मत्परिग्रहात् । एतद् बुद्ध्या समालोच्य मत्परिग्रहतां व्रज ॥ 85.68 ॥

paramaiśvaryamatulaṁ prāpsyase matparigrahāt etad buddhyā samālocya matparigrahatāṁ vraja

"मुझसे विवाह करने पर आपको अनुपम परम ऐश्वर्य प्राप्त होगा। बुद्धिपूर्वक इस पर विचार कीजिए, और मेरी पत्नी बनकर आइए।"

श्लोक 69 (markandeya.85.69)

ऋषिरुवाच इत्युक्ता सा तदा देवी गम्भीरान्तः स्मिता जगौ । दुर्गा भगवती भद्रा ययेदं धार्यते जगत् ॥ 85.69 ॥

ṛṣiruvāca ityuktā sā tadā devī gambhīrāntaḥ smitā jagau durgā bhagavatī bhadrā yayedaṁ dhāryate jagat

ऋषि ने कहा — इस प्रकार कही जाने पर वह देवी, गम्भीर एवं अन्तर्हित मुसकान के साथ बोली — वह दुर्गा, भगवती, भद्रा, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है —

श्लोक 70 (markandeya.85.70)

देव्युवाच सत्यमुक्तत्वया नात्र मिथ्या किञ्चित्त्वयोदितम् । त्रैलोक्याधिपतिः सुम्भो निशुम्भश्चापि तादृशः ॥ 85.70 ॥

devyuvāca satyamuktatvayā nātra mithyā kiñcittvayoditam trailokyādhipatiḥ sumbho niśumbhaścāpi tādṛśaḥ

देवी ने कहा — आपने जो कहा वह सत्य है, इसमें आपका कहा हुआ कुछ भी असत्य नहीं है। शुम्भ तीनों लोकों के स्वामी हैं, और निशुम्भ भी वैसे ही हैं।

श्लोक 71 (markandeya.85.71)

किं त्वत्र यत्प्रतिज्ञातं मिथ्या तत्क्रियते कथम् । श्रूयतामल्पबुद्धित्वात् प्रतिज्ञा या कृता पुरा ॥ 85.71 ॥

kiṁ tvatra yatpratijñātaṁ mithyā tatkriyate katham śrūyatāmalpabuddhitvāt pratijñā yā kṛtā purā

किन्तु यहाँ जो प्रतिज्ञा की जा चुकी है, वह भला असत्य कैसे की जाए? सुनिए, अल्पबुद्धि के कारण पूर्वकाल में जो प्रतिज्ञा की गई थी, वह यह है —

श्लोक 72 (markandeya.85.72)

यो मां जयति संग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति । यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति ॥ 85.72 ॥

yo māṁ jayati saṁgrāme yo me darpaṁ vyapohati yo me pratibalo loke sa me bhartā bhaviṣyati

"जो मुझे युद्ध में जीत ले, जो मेरा घमण्ड चूर कर दे, जो संसार में मेरे बल का समकक्ष हो — वही मेरा पति होगा।"

श्लोक 73 (markandeya.85.73)

तदागच्छतु शुम्भोऽत्र निशुम्भो वा महासुरः । मां जित्वा किं चिरेणात्र पाणि गृह्णातु मे लघु ॥ 85.73 ॥

tadāgacchatu śumbho ’tra niśumbho vā mahāsuraḥ māṁ jitvā kiṁ cireṇātra pāṇi gṛhṇātu me laghu

अतः शुम्भ यहाँ आएँ, या महासुर निशुम्भ — मुझे जीतकर विलम्ब किए बिना यहीं शीघ्र मेरा पाणिग्रहण कर लें।

श्लोक 74 (markandeya.85.74)

दूत उवाच अवलिप्तासि मैवं त्वं देवि ब्रूहि ममाग्रतः । त्रैलोक्ये कः पुमांस्तिष्ठेदग्रे शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 85.74 ॥

dūta uvāca avaliptāsi maivaṁ tvaṁ devi brūhi mamāgrataḥ trailokye kaḥ pumāṁstiṣṭhedagre śumbhaniśumbhayoḥ

दूत ने कहा — हे देवी! आप अहंकार में भरी हुई हैं। मुझसे ऐसा मत कहिए। तीनों लोकों में ऐसा कौन पुरुष है, जो शुम्भ-निशुम्भ के सामने ठहर सके?

श्लोक 75 (markandeya.85.75)

अन्येषामपि दैत्यानां सर्वे देवा न वै युधि । तिष्ठन्ति संमुखे देवि किं पुनः स्त्री त्वमेकिका ॥ 85.75 ॥

anyeṣāmapi daityānāṁ sarve devā na vai yudhi tiṣṭhanti saṁmukhe devi kiṁ punaḥ strī tvamekikā

अन्य दैत्यों के सामने भी युद्ध में समस्त देवता टिक नहीं पाते, हे देवी, फिर आप अकेली स्त्री होकर कैसे टिकेंगी?

श्लोक 76 (markandeya.85.76)

इन्द्राद्याः सकला देवास्तस्थुर्येषां न संयुगे । शुम्भादीनां कथं तेषां स्त्री प्रयास्यसि संमुखम् ॥ 85.76 ॥

indrādyāḥ sakalā devāstasthuryeṣāṁ na saṁyuge śumbhādīnāṁ kathaṁ teṣāṁ strī prayāsyasi saṁmukham

जिनके सामने संग्राम में इन्द्र आदि समस्त देवता भी नहीं टिक सके, उन्हीं शुम्भ आदि के सम्मुख आप स्त्री होकर कैसे जाएँगी?

श्लोक 77 (markandeya.85.77)

सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता पार्श्वं शुम्भनिशुम्भयोः । केशाकर्षणनिर्धूतगौरवा मा गमिष्यसि ॥ 85.77 ॥

sā tvaṁ gaccha mayaivoktā pārśvaṁ śumbhaniśumbhayoḥ keśākarṣaṇanirdhūtagauravā mā gamiṣyasi

अतः आप मेरे ही कहे अनुसार शुम्भ-निशुम्भ के पास जाइए; ऐसा न कीजिए कि आपको केश पकड़कर घसीटते हुए वहाँ ले जाना पड़े और आपका गौरव नष्ट हो जाए।

श्लोक 78 (markandeya.85.78)

देव्युवाच एवमेतद् बली शुम्भो निशुम्भश्चातिवीर्यवान् । किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ॥ 85.78 ॥

devyuvāca evametad balī śumbho niśumbhaścātivīryavān kiṁ karomi pratijñā me yadanālocitā purā

देवी ने कहा — यह सत्य है कि शुम्भ बलवान् है और निशुम्भ भी अत्यन्त पराक्रमी है; किन्तु मैं क्या करूँ? मेरी प्रतिज्ञा तो पूर्वकाल में बिना सोचे-समझे ही की गई थी।

श्लोक 79 (markandeya.85.79)

स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः । तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत् ॥ 85.79 ॥

sa tvaṁ gaccha mayoktaṁ te yadetatsarvamādṛtaḥ tadācakṣvāsurendrāya sa ca yuktaṁ karotu tat

अतः आप जाइए, और मैंने जो कुछ भी आदरपूर्वक कहा है, वह सब असुरेन्द्र से जाकर कह दीजिए; और वे जो उचित समझें, वही करें।

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