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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 84

शक्रादि-स्तुति

अध्याय 83अध्याय-सूचीअध्याय 85

श्लोक 1 (markandeya.84.1)

ऋषिरुवाच ततः सुरगणाः सर्वे देव्या इन्द्रपुरोगमाः । स्तुतिमारेभिरे कर्तुं निहते महिषासुरे ॥ 84.1 ॥

ṛṣiruvāca tataḥ suragaṇāḥ sarve devyā indrapurogamāḥ stutimārebhire kartuṁ nihate mahiṣāsure

ऋषि ने कहा — तब महिषासुर के मारे जाने पर, इन्द्र को आगे किए हुए समस्त देवगण उस देवी की स्तुति करने लगे।

श्लोक 2 (markandeya.84.2)

शक्रादयः सुरगणा निहतेऽतिवीर्ये तस्मिन् दुरात्मनि सुरारिबले च देव्या । तां तुष्टुवुः प्रणतिनम्रशिरोधरांसा वाग्भिः प्रहर्षपुलकोद्गमचारुदेहाः ॥ 84.2 ॥

śakrādayaḥ suragaṇā nihate ’tivīrye tasmin durātmani surāribale ca devyā tāṁ tuṣṭuvuḥ praṇatinamraśirodharāṁsā vāgbhiḥ praharṣapulakodgamacārudehāḥ

अत्यन्त पराक्रमी उस दुरात्मा तथा देवताओं के शत्रु-सेना के देवी द्वारा मारे जाने पर, शक्र आदि देवगण, अपने सिर, ग्रीवा और कन्धे नम्रतापूर्वक झुकाए, हर्ष से रोमांचित सुन्दर देहवाले, उसकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 3 (markandeya.84.3)

देवा ऊचुः देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निः शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या । तामम्बिकामखिलदेवमर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः ॥ 84.3 ॥

devā ūcuḥ devyā yayā tatamidaṁ jagadātmaśaktyā niḥ śeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā tāmambikāmakhiladevamarṣipūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ

देवताओं ने कहा — जिस देवी की आत्मशक्ति से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, जो समस्त देवगणों की शक्तियों के समुदाय का साकार रूप है, उस समस्त देव-ऋषियों द्वारा पूजित अम्बिका को हम भक्तिपूर्वक नमन करते हैं; वह हमारा कल्याण करे।

श्लोक 4 (markandeya.84.4)

यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च नहि वक्तुमलं बलं च । सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभयस्य मतिं करोतु ॥ 84.4 ॥

yasyāḥ prabhāvamatulaṁ bhagavānananto brahmā haraśca nahi vaktumalaṁ balaṁ ca sā caṇḍikākhilajagatparipālanāya nāśāya cāśubhayasya matiṁ karotu

जिसके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में स्वयं भगवान् अनन्त (विष्णु), ब्रह्मा और हर (शिव) भी समर्थ नहीं हैं — वह चण्डिका सम्पूर्ण जगत् के पालन और अशुभ के नाश का संकल्प करे।

श्लोक 5 (markandeya.84.5)

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः । श्रद्धां सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम् ॥ 84.5 ॥

yā śrīḥ svayaṁ sukṛtināṁ bhavaneṣvalakṣmīḥ pāpātmanāṁ kṛtadhiyāṁ hṛdayeṣu buddhiḥ śraddhāṁ satāṁ kulajanaprabhavasya lajjā tāṁ tvāṁ natāḥ sma paripālaya devi viśvam

जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं श्री है और पापियों के घरों में अलक्ष्मी; जो कुटिल-बुद्धियों के हृदय में बुद्धि है, सज्जनों में श्रद्धा है, तथा कुलीन जनों में लज्जा है — हे देवी, हम उसी तुम्हें नमन करते हैं; तुम विश्व का पालन करो।

श्लोक 6 (markandeya.84.6)

किं वर्णयाम तव रूपमचिन्त्यमेतत् किं चातिवीर्यमसुरक्षयकारि भूरि । किं चाहवेषु चरितानि तवाद्भुतानि सर्वेषु देव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥ 84.6 ॥

kiṁ varṇayāma tava rūpamacintyametat kiṁ cātivīryamasurakṣayakāri bhūri kiṁ cāhaveṣu caritāni tavādbhutāni sarveṣu devyasuradevagaṇādikeṣu

तुम्हारे इस अचिन्त्य रूप का हम क्या वर्णन करें? असुरों का नाश करनेवाले तुम्हारे उस अपार पराक्रम का ही क्या वर्णन करें? और देवों, असुरों तथा अन्य सभी के मध्य युद्धों में किए गए तुम्हारे उन अद्भुत चरित्रों का ही क्या वर्णन करें?

श्लोक 7 (markandeya.84.7)

हेतुः समस्तजगतां त्रिगुणापि दोषैर् न ज्ञायसे हरिहरादिभिरप्यपारा । सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूतम् अव्याकृता हि परमा प्रकृतिस्त्वमाद्या ॥ 84.7 ॥

hetuḥ samastajagatāṁ triguṇāpi doṣair na jñāyase hariharādibhirapyapārā sarvāśrayākhilamidaṁ jagadaṁśabhūtam avyākṛtā hi paramā prakṛtistvamādyā

तुम समस्त जगत् के कारण हो; तीनों गुणों से युक्त होकर भी उनके दोषों से अछूती हो; हरि-हर आदि के द्वारा भी पूर्णतः न जानी जा सकनेवाली, अपार हो; सबकी आश्रयस्थल, जिसका यह सम्पूर्ण जगत् एक अंश मात्र है — तुम्हीं वह आदिम, अव्यक्त, परम प्रकृति हो।

श्लोक 8 (markandeya.84.8)

यस्याः समस्तसुरता समुदीरणेन तृप्तिं प्रयान्ति सकलेषु मखेषु देवि । स्वाहासि वै पितृगणस्य च तृप्तिहेतुर् उच्चार्यसे त्वमत एव जनैः स्वधा च ॥ 84.8 ॥

yasyāḥ samastasuratā samudīraṇena tṛptiṁ prayānti sakaleṣu makheṣu devi svāhāsi vai pitṛgaṇasya ca tṛptihetur uccāryase tvamata eva janaiḥ svadhā ca

हे देवी! जिसके नाम के उच्चारण मात्र से समस्त देवगण प्रत्येक यज्ञ में तृप्ति पाते हैं — तुम्हीं स्वाहा हो; और पितृगणों की तृप्ति का कारण होने से ही लोग तुम्हें स्वधा भी कहकर पुकारते हैं।

श्लोक 9 (markandeya.84.9)

या मुक्तिहेतुरविचिन्त्यमहाव्रता त्वम् अभ्यस्यसे सुनियतेन्द्रियतत्त्वसारैः । मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषैर् विद्यासि सा भगवती परमा हि देवि ॥ 84.9 ॥

yā muktiheturavicintyamahāvratā tvam abhyasyase suniyatendriyatattvasāraiḥ mokṣārthibhirmunibhirastasamastadoṣair vidyāsi sā bhagavatī paramā hi devi

मुक्ति की कारणभूता, अचिन्त्य महाव्रतवाली तुम्हारा अभ्यास वे मुमुक्षु मुनि करते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ सुसंयत हैं, जो तत्त्व के सार को जाननेवाले हैं, और जिनके समस्त दोष नष्ट हो चुके हैं — हे देवी, तुम्हीं वह परम भगवती विद्या हो।

श्लोक 10 (markandeya.84.10)

शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधानम् उद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् । देवी त्रयी भगवती भवभावनाय वार्ता च सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥ 84.10 ॥

śabdātmikā suvimalargyajuṣāṁ nidhānam udgītharamyapadapāṭhavatāṁ ca sāmnām devī trayī bhagavatī bhavabhāvanāya vārtā ca sarvajagatāṁ paramārtihantrī

तुम शब्दस्वरूपा हो, अत्यन्त निर्मल ऋग्वेद और यजुर्वेद का, तथा सुन्दर उद्गीथपदों से युक्त सामवेद का भण्डार हो; तुम भगवती त्रयी (तीनों वेद) हो, संसार की स्थिति के लिए; और तुम्हीं समस्त जगत् की जीविका हो, परम पीड़ाहारिणी हो।

श्लोक 11 (markandeya.84.11)

मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा । श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥ 84.11 ॥

medhāsi devi viditākhilaśāstrasārā durgāsi durgabhavasāgaranaurasaṅgā śrīḥ kaiṭabhārihṛdayaikakṛtādhivāsā gaurī tvameva śaśimaulikṛtapratiṣṭhā

हे देवी, तुम्हीं मेधा हो, जिससे समस्त शास्त्रों का सार जाना जाता है; तुम्हीं दुर्गा हो, संसार-रूपी दुर्गम सागर को पार करानेवाली अटूट नौका; तुम्हीं श्री हो, कैटभ के शत्रु (विष्णु) के हृदय में एकमात्र निवास करनेवाली; और तुम्हीं गौरी हो, चन्द्रमौलि (शिव) द्वारा प्रतिष्ठित।

श्लोक 12 (markandeya.84.12)

ईषत्सहासममलं परिपूर्णचन्द्र- बिम्बानुकारि कनकोत्तमकान्तिकान्तम् । अत्यद्भुतं प्रहृतमात्तरुषा तथापि वक्त्रं विलोक्य सहसा महिषासुरेण ॥ 84.12 ॥

īṣatsahāsamamalaṁ paripūrṇacandra- bimbānukāri kanakottamakāntikāntam atyadbhutaṁ prahṛtamāttaruṣā tathāpi vaktraṁ vilokya sahasā mahiṣāsureṇa

कुछ मुसकानयुक्त, निर्मल, पूर्ण चन्द्रमण्डल के समान, उत्तम स्वर्ण-कान्ति से सुन्दर तुम्हारे उस मुख को, महिषासुर ने क्रोध से भरकर अत्यन्त अद्भुत रूप से अचानक प्रहार किया —

श्लोक 13 (markandeya.84.13)

दृष्ट्वा तु देवि कुपितं भ्रुकुटीकरालम् उद्यच्छशाङ्कसदृशच्छवि यन्न सद्यः । प्राणान्मुमोच महीषस्तदतीव चित्रं कैर्जीव्यते हि कुपितान्तकदर्शनेन ॥ 84.13 ॥

dṛṣṭvā tu devi kupitaṁ bhrukuṭīkarālam udyacchaśāṅkasadṛśacchavi yanna sadyaḥ prāṇānmumoca mahīṣastadatīva citraṁ kairjīvyate hi kupitāntakadarśanena

किन्तु हे देवी, भौंहों की कुटिलता से भयंकर बना हुआ, फिर भी उदित चन्द्रमा-सा कान्तिमान् वह क्रुद्ध मुख देखकर भी महिष तत्क्षण प्राण नहीं छोड़ बैठा — यह अत्यन्त विचित्र है! क्योंकि साक्षात् क्रुद्ध काल के दर्शन से भला कौन जीवित रह सकता है?

श्लोक 14 (markandeya.84.14)

देवि प्रसीद परमा भवती भवाय सद्यो विनाशयसि कोपवती कुलानि । विज्ञातमेतदधुनैव यदस्तमेतन् नीतं बलं सुविपुलं महिषासुरस्य ॥ 84.14 ॥

devi prasīda paramā bhavatī bhavāya sadyo vināśayasi kopavatī kulāni vijñātametadadhunaiva yadastametan nītaṁ balaṁ suvipulaṁ mahiṣāsurasya

हे देवी, प्रसन्न हो! तुम, शान्त रहने पर, परम कल्याणकारिणी हो; और क्रुद्ध होने पर सम्पूर्ण कुलों को तत्क्षण नष्ट कर डालती हो — यह अभी-अभी हमने प्रत्यक्ष देख लिया, जब महिषासुर की वह विशाल सेना क्षणभर में समाप्त हो गई।

श्लोक 15 (markandeya.84.15)

ते संमता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः । धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना ॥ 84.15 ॥

te saṁmatā janapadeṣu dhanāni teṣāṁ teṣāṁ yaśāṁsi na ca sīdati dharmavargaḥ dhanyāsta eva nibhṛtātmajabhṛtyadārā yeṣāṁ sadābhyudayadā bhavatī prasannā

जिन पर तुम सदा कृपा-प्रसन्न रहती हो, वे अपने-अपने प्रदेशों में सम्मानित होते हैं, उनका धन सुरक्षित रहता है, उनका यश क्षीण नहीं होता, उनका पुण्य-समूह भी नहीं घटता; धन्य हैं वे, जिनके पुत्र, सेवक और पत्नी सदा निश्चिन्त रहते हैं।

श्लोक 16 (markandeya.84.16)

धर्म्याणि देवि सकलानि सदैव कर्माण्य् अत्यादृतः प्रतिदिनं सुकृती करोति । स्वर्गं प्रयाति च ततो भवतीप्रसादाल् लोकत्रयेऽपि फलदा ननु देवि तेन ॥ 84.16 ॥

dharmyāṇi devi sakalāni sadaiva karmāṇy atyādṛtaḥ pratidinaṁ sukṛtī karoti svargaṁ prayāti ca tato bhavatīprasādāl lokatraye ’pi phaladā nanu devi tena

हे देवी, जो पुण्यात्मा प्रतिदिन अत्यन्त आदरपूर्वक समस्त धर्मकर्म करता रहता है, वह तुम्हारी कृपा से स्वर्ग को प्राप्त होता है; इसीलिए, हे देवी, तुम तीनों लोकों में भी फलदायिनी हो।

श्लोक 17 (markandeya.84.17)

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि । दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥ 84.17 ॥

durge smṛtā harasi bhītimaśeṣajantoḥ svasthaiḥ smṛtā matimatīva śubhāṁ dadāsi dāridryaduḥkhabhayahāriṇi kā tvadanyā sarvopakārakaraṇāya sadā ’ ’rdracittā

हे दुर्गे, संकट में स्मरण की जाने पर तुम प्रत्येक प्राणी का भय हर लेती हो; सुखी अवस्था में स्मरण की जाने पर तुम अत्यन्त शुभ बुद्धि प्रदान करती हो। हे दरिद्रता, दुःख और भय हरनेवाली! तुम्हारे अतिरिक्त और कौन सबके कल्याण के लिए सदा इतने कोमल हृदय की है?

श्लोक 18 (markandeya.84.18)

एभिर्हतैर्जगदुपैति सुखं तथैते कुर्वन्तु नाम नरकाय चिराय पापम् । संग्राममृत्युमधिगम्य दिवं प्रयान्तु मत्वेति नूनमहितान् विनिहंसि देवि ॥ 84.18 ॥

ebhirhatairjagadupaiti sukhaṁ tathaite kurvantu nāma narakāya cirāya pāpam saṁgrāmamṛtyumadhigamya divaṁ prayāntu matveti nūnamahitān vinihaṁsi devi

"इनके मारे जाने से संसार को सुख मिलेगा — भले ही इन्होंने चिरकाल तक नरक ले जानेवाला पाप किया हो, फिर भी युद्ध में मृत्यु पाकर ये स्वर्ग को प्राप्त हो जाएँ" — ऐसा सोचकर ही, हे देवी, तुम निश्चय ही शत्रुओं का वध करती हो।

श्लोक 19 (markandeya.84.19)

दृष्ट्वैव किं न भवती प्रकरोति भस्म सर्वासुरानरिषु यत्प्रहिणोषि शस्त्रम् । लोकान् प्रयान्तु रिपवोऽपि हि शस्त्रपूता इत्थं मतिर्भवति तेष्वपि तेऽतिसाध्वी ॥ 84.19 ॥

dṛṣṭvaiva kiṁ na bhavatī prakaroti bhasma sarvāsurānariṣu yatprahiṇoṣi śastram lokān prayāntu ripavo ’pi hi śastrapūtā itthaṁ matirbhavati teṣvapi te ’tisādhvī

क्या तुम केवल दृष्टिमात्र से ही समस्त असुर-शत्रुओं को भस्म नहीं कर सकतीं? फिर भी तुम उन पर शस्त्र चलाती हो, यह सोचकर कि "शस्त्र से पवित्र होकर मेरे शत्रु भी उत्तम लोकों को प्राप्त हों" — उनके प्रति भी तुम्हारा यह भाव कितना अति-साधु है!

श्लोक 20 (markandeya.84.20)

खड्गप्रभानिकरविस्फुरणैस्तथोग्रैः शूलाग्रकान्तिनिवहेन दृशोऽसुराणाम् । यन्नागता विलयमंशुमदिन्दुखण्ड- योग्याननं तव विलोकयतां तदेतत् ॥ 84.20 ॥

khaḍgaprabhānikaravisphuraṇaistathograiḥ śūlāgrakāntinivahena dṛśo ’surāṇām yannāgatā vilayamaṁśumadindukhaṇḍa- yogyānanaṁ tava vilokayatāṁ tadetat

चन्द्रकला के खण्ड के समान सुन्दर तुम्हारे मुख को देखते हुए भी असुरों के नेत्र, तुम्हारी खड्ग की तीव्र चमकती धार और त्रिशूल की नोक की कान्ति-राशि से चौंधियाकर नष्ट नहीं हुए — यह भी तुम्हारी ही कृपा है।

श्लोक 21 (markandeya.84.21)

दुर्वृत्तवृत्तशमनं तव देवि शीलं रूपं तथैतदविचिन्त्यमतुल्यमन्यैः । वीर्यं च हन्तृ हृतदेवपराक्रमाणां वैरिष्वपि प्रकटितैव दया त्वयेत्थम् ॥ 84.21 ॥

durvṛttavṛttaśamanaṁ tava devi śīlaṁ rūpaṁ tathaitadavicintyamatulyamanyaiḥ vīryaṁ ca hantṛ hṛtadevaparākramāṇāṁ vairiṣvapi prakaṭitaiva dayā tvayettham

हे देवी, दुष्टों के दुराचार का शमन करना ही तुम्हारा स्वभाव है; तुम्हारा यह रूप भी अचिन्त्य और किसी अन्य के तुल्य नहीं है; तुम्हारा पराक्रम देवताओं का बल हर लेनेवालों का संहार करता है, और फिर भी शत्रुओं के प्रति तुम केवल दया ही प्रकट करती हो।

श्लोक 22 (markandeya.84.22)

केनोपमा भवतु तेऽस्य पराक्रमस्य रूपं च शत्रुभयकार्यतिहारि कुत्र । चित्ते कृपा समरनिष्ठुरता च दृष्टा त्वय्येव देवि वरदे भुवनत्रयेऽपि ॥ 84.22 ॥

kenopamā bhavatu te ’sya parākramasya rūpaṁ ca śatrubhayakāryatihāri kutra citte kṛpā samaraniṣṭhuratā ca dṛṣṭā tvayyeva devi varade bhuvanatraye ’pi

तुम्हारे इस पराक्रम की तुलना किससे हो? और तुम्हारा वह रूप कहाँ है, जो शत्रुओं में भय भी उत्पन्न करता है और मन को मोहित भी कर लेता है? हृदय में करुणा और युद्ध में निष्ठुरता — हे वरदायिनी देवी, ये दोनों तीनों लोकों में तुम्हीं में साथ-साथ देखे जाते हैं।

श्लोक 23 (markandeya.84.23)

त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं त्वया समरमूर्धनि तेऽपि हत्वा । नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्तम् अस्माकमुन्मदसुरारिभवं नमस्ते ॥ 84.23 ॥

trailokyametadakhilaṁ ripunāśanena trātaṁ tvayā samaramūrdhani te ’pi hatvā nītā divaṁ ripugaṇā bhayamapyapāstam asmākamunmadasurāribhavaṁ namaste

शत्रु का नाश करके तुमने ही यह सम्पूर्ण त्रिलोक बचाया है; युद्ध के अग्रभाग में उन्हें मारकर तुमने शत्रु-गणों को भी स्वर्ग पहुँचा दिया, और उन्मत्त असुर-शत्रुओं से उत्पन्न हमारा भय भी दूर कर दिया — तुम्हें नमस्कार है!

श्लोक 24 (markandeya.84.24)

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके । घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिः स्वनेन च ॥ 84.24 ॥

śūlena pāhi no devi pāhi khaḍgena cāmbike ghaṇṭāsvanena naḥ pāhi cāpajyāniḥ svanena ca

हे देवी, त्रिशूल से हमारी रक्षा करो; हे अम्बिके, खड्ग से भी रक्षा करो; घण्टा की ध्वनि से हमारी रक्षा करो, और धनुष की टंकार से भी।

श्लोक 25 (markandeya.84.25)

प्राच्यां रक्ष प्रतीच्यां च चण्डिके रक्ष दक्षिणे । भ्रामणेनात्मशूलस्य उत्तरस्यां तथेश्वरि ॥ 84.25 ॥

prācyāṁ rakṣa pratīcyāṁ ca caṇḍike rakṣa dakṣiṇe bhrāmaṇenātmaśūlasya uttarasyāṁ tatheśvari

हे चण्डिके, पूर्व दिशा में रक्षा करो, पश्चिम में भी रक्षा करो, दक्षिण में रक्षा करो; और हे ईश्वरी, उत्तर दिशा में भी अपने त्रिशूल के भ्रमण से रक्षा करो।

श्लोक 26 (markandeya.84.26)

सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यर्थघोराणि तै रक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥ 84.26 ॥

saumyāni yāni rūpāṇi trailokye vicaranti te yāni cātyarthaghorāṇi tai rakṣāsmāṁstathā bhuvam

तुम्हारे जो सौम्य रूप तीनों लोकों में विचरण करते हैं, और जो अत्यन्त भयंकर रूप हैं — उन सबसे हमारी और इस पृथ्वी की भी रक्षा करो।

श्लोक 27 (markandeya.84.27)

खड्गशूलगदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके । करपल्लवसङ्गीनि तैरस्मान् रक्ष सर्वतः ॥ 84.27 ॥

khaḍgaśūlagadādīni yāni cāstrāṇi te ’mbike karapallavasaṅgīni tairasmān rakṣa sarvataḥ

हे अम्बिके, तुम्हारे कोमल पल्लव-सदृश हाथों में जो खड्ग, त्रिशूल, गदा आदि अस्त्र सुशोभित हैं, उनसे हमारी सब ओर से रक्षा करो।

श्लोक 28 (markandeya.84.28)

ऋषीरुवाच एवं स्तुता सुरैर्दिव्यैः कुसुमैर्नन्दनोद्भवैः । अर्चिता जगतां धात्री तथा गन्धानुलेपनैः ॥ 84.28 ॥

ṛṣīruvāca evaṁ stutā surairdivyaiḥ kusumairnandanodbhavaiḥ arcitā jagatāṁ dhātrī tathā gandhānulepanaiḥ

ऋषि ने कहा — इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत, नन्दनवन में उत्पन्न दिव्य पुष्पों और सुगन्धित अंगराग से पूजित वह जगत्-धात्री देवी —

श्लोक 29 (markandeya.84.29)

भक्त्या समस्तैस्त्रिदशार्दिव्यैर्धूपैस्तु धूपिता । प्राह प्रसादसुमुखी समस्तान् प्रणतान् सुरान् ॥ 84.29 ॥

bhaktyā samastaistridaśārdivyairdhūpaistu dhūpitā prāha prasādasumukhī samastān praṇatān surān

— समस्त देवताओं द्वारा भक्तिपूर्वक दिव्य धूप से सुवासित की गई, अनुग्रह से प्रसन्नमुख होकर उन सभी नत देवताओं से बोली।

श्लोक 30 (markandeya.84.30)

देव्युवाच व्रियतां त्रिदशाः सर्वे यदस्मत्तोऽभिवाञ्छितम् । ददाम्यहमतिप्रीत्या स्तवैरेभिः सुपूजिता ॥ 84.30 ॥

devyuvāca vriyatāṁ tridaśāḥ sarve yadasmatto ’bhivāñchitam dadāmyahamatiprītyā stavairebhiḥ supūjitā

देवी ने कहा — हे देवगणों! तुम सब जो चाहो, वही माँग लो; मैं इन स्तोत्रों से भलीभाँति पूजित होकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वह दे रही हूँ।

श्लोक 31 (markandeya.84.31)

कर्तव्यमपरं यच्च दुष्करं तन्न विद्महे । इत्याकर्ण्ये वचो देव्याः प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ॥ 84.31 ॥

kartavyamaparaṁ yacca duṣkaraṁ tanna vidmahe ityākarṇye vaco devyāḥ pratyūcuste divaukasaḥ

और जो कुछ भी और करना कठिन हो, उसे भी हम असम्भव नहीं मानते। देवी के इन वचनों को सुनकर देवताओं ने उत्तर दिया।

श्लोक 32 (markandeya.84.32)

देवा ऊचुः भगवत्या कृतं सर्वं न किञ्चिदवशिष्यते । यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः ॥ 84.32 ॥

devā ūcuḥ bhagavatyā kṛtaṁ sarvaṁ na kiñcidavaśiṣyate yadayaṁ nihataḥ śatrurasmākaṁ mahiṣāsuraḥ

देवताओं ने कहा — हे भगवती, आपने सब कुछ कर दिया, अब कुछ भी शेष नहीं रहा, क्योंकि हमारा यह शत्रु महिषासुर मारा जा चुका है।

श्लोक 33 (markandeya.84.33)

यदि चापि वरो देयस्त्वयास्माकं महेश्वरि । संस्मृता संस्मृता त्वं नो हिंसेथाः परमापदः ॥ 84.33 ॥

yadi cāpi varo deyastvayāsmākaṁ maheśvari saṁsmṛtā saṁsmṛtā tvaṁ no hiṁsethāḥ paramāpadaḥ

हे महेश्वरी! फिर भी यदि आप हमें कोई वर देना ही चाहती हैं, तो जब-जब हम आपका स्मरण करें, तब-तब आप हमारी घोर विपत्तियों का नाश करती रहें।

श्लोक 34 (markandeya.84.34)

यश्च मर्त्यः स्तवैरेभिस्त्वां स्तोष्यत्यमलानने । तस्य वित्तर्धिविभवैर्धनदारादिसम्पदाम् । वृद्धयेऽस्मात्प्रसन्ना त्वं भवेथाः सर्वदाम्बिके ॥ 84.34 ॥

yaśca martyaḥ stavairebhistvāṁ stoṣyatyamalānane tasya vittardhivibhavairdhanadārādisampadām vṛddhaye ’smātprasannā tvaṁ bhavethāḥ sarvadāmbike

और हे निर्मल-मुख अम्बिके! जो भी मनुष्य इन स्तोत्रों से आपकी स्तुति करेगा, उससे प्रसन्न होकर आप सदा उसके धन, ऐश्वर्य, वैभव तथा धन-दारा आदि सम्पदाओं की वृद्धि करती रहें।

श्लोक 35 (markandeya.84.35)

ऋषिरुवाच इति प्रसादिता देवैर्जगतोऽर्थे तथात्मनः । तथेत्युक्त्वा भद्रकाली बभूवान्तर्हिता नृप ॥ 84.35 ॥

ṛṣiruvāca iti prasāditā devairjagato ’rthe tathātmanaḥ tathetyuktvā bhadrakālī babhūvāntarhitā nṛpa

ऋषि ने कहा — हे राजन्! इस प्रकार जगत् के हित तथा अपने ही हित के लिए देवताओं द्वारा प्रसन्न की गई भद्रकाली "ऐसा ही हो" कहकर वहीं अन्तर्धान हो गई।

श्लोक 36 (markandeya.84.36)

इत्येतत्कथितं भूप सम्भूता सा यथा पुरा । देवी देवशरीरेभ्यो जगत्त्रयहितैषिणी ॥ 84.36 ॥

ityetatkathitaṁ bhūpa sambhūtā sā yathā purā devī devaśarīrebhyo jagattrayahitaiṣiṇī

हे राजन्! इस प्रकार यह बताया गया कि किस प्रकार प्राचीन काल में तीनों लोकों की हितकारिणी वह देवी देवताओं के शरीरों से उत्पन्न हुई।

श्लोक 37 (markandeya.84.37)

पुनश्च गौरीदेहात् सा समुद्भूता यथाभवत् । वधाय दुष्टदैत्यानां तथा शुम्भनिशुम्भयोः ॥ 84.37 ॥

punaśca gaurīdehāt sā samudbhūtā yathābhavat vadhāya duṣṭadaityānāṁ tathā śumbhaniśumbhayoḥ

और वह पुनः गौरी के शरीर से भी उसी प्रकार प्रकट हुई, दुष्ट दैत्यों के तथा शुम्भ-निशुम्भ के वध के लिए,

श्लोक 38 (markandeya.84.38)

रक्षणाय च लोकानां देवानामुपकारिणी । तच्छृणुष्व मयाऽख्यातं यथावत्कथयामि ते ॥ 84.38 ॥

rakṣaṇāya ca lokānāṁ devānāmupakāriṇī tacchṛṇuṣva mayā ’khyātaṁ yathāvatkathayāmi te

— लोकों की रक्षा तथा देवताओं के उपकार के लिए। वह कथा सुनो; मैं उसे यथावत् तुमसे कहता हूँ।

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