सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 83
महिषासुर-वध
श्लोक 1 (markandeya.83.1)
ऋषिरुवाच निहन्यमानं तत्सैन्यमवलोक्य महासुरः । सेनानीश्चिक्षुरः कोपाद्ययौ योद्धुमथाम्बिकाम् ॥ 83.1 ॥
ṛṣiruvāca nihanyamānaṁ tatsainyamavalokya mahāsuraḥ senānīścikṣuraḥ kopādyayau yoddhumathāmbikām
ऋषि ने कहा — अपनी उस सेना को नष्ट होते देखकर सेनापति चिक्षुर नामक महासुर क्रोधपूर्वक अम्बिका से युद्ध करने चला।
श्लोक 2 (markandeya.83.2)
स देवीं शरवर्षेण ववर्ष समरेऽसुरः । यथा मेरुगिरेः शृङ्गं तोयवर्षेण तोयदः ॥ 83.2 ॥
sa devīṁ śaravarṣeṇa vavarṣa samare ’suraḥ yathā merugireḥ śṛṅgaṁ toyavarṣeṇa toyadaḥ
उस असुर ने रणभूमि में देवी पर उसी प्रकार बाणों की वर्षा की, जैसे मेघ मेरु पर्वत के शिखर पर जल की वर्षा करता है।
श्लोक 3 (markandeya.83.3)
तस्य च्छित्त्वा ततो देवी लीलयैव शरोत्करान् । जघान तुरगान् बाणैर्यन्तारं चैव वाजिनाम् ॥ 83.3 ॥
tasya cchittvā tato devī līlayaiva śarotkarān jaghāna turagān bāṇairyantāraṁ caiva vājinām
तब देवी ने मानो लीला मात्र में ही उसके बाण-समूहों को काट डाला, और अपने बाणों से उसके घोड़ों को तथा सारथि को भी मार डाला।
श्लोक 4 (markandeya.83.4)
चिच्छेद च धनुः सद्यो ध्वजं चातिसमुच्छ्रितम् । विव्याध चैव गात्रेषु च्छिन्नधन्वानमाशुगैः ॥ 83.4 ॥
ciccheda ca dhanuḥ sadyo dhvajaṁ cātisamucchritam vivyādha caiva gātreṣu cchinnadhanvānamāśugaiḥ
उसने तत्क्षण उसका धनुष तथा ऊँची ध्वजा भी काट डाली, और धनुष-विहीन हुए उस असुर के अंगों को अपने तीक्ष्ण बाणों से बींध डाला।
श्लोक 5 (markandeya.83.5)
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अभ्यधावत तां देवीं खड्ग-चर्मधरोऽसुरः ॥ 83.5 ॥
sa cchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ abhyadhāvata tāṁ devīṁ khaḍga-carmadharo ’suraḥ
धनुष-विहीन, रथ-विहीन, घोड़ों तथा सारथि से रहित हुआ वह असुर खड्ग और ढाल थामे देवी की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 6 (markandeya.83.6)
सिंहमाहत्य खड्गेन तीक्ष्णधारेण मूर्धनि । आजघान भुजे सव्ये देवीमप्यतिवेगवान् ॥ 83.6 ॥
siṁhamāhatya khaḍgena tīkṣṇadhāreṇa mūrdhani ājaghāna bhuje savye devīmapyativegavān
अत्यन्त तीव्रगति से उसने अपनी तीक्ष्ण-धार खड्ग से सिंह के मस्तक पर प्रहार किया, और देवी की बाईं भुजा पर भी आघात किया।
श्लोक 7 (markandeya.83.7)
तस्याः खड्गो भुजं प्राप्य पफाल नृपनन्दन । ततो जग्राह शूलं स कोपादरुणलोचनः ॥ 83.7 ॥
tasyāḥ khaḍgo bhujaṁ prāpya paphāla nṛpanandana tato jagrāha śūlaṁ sa kopādaruṇalocanaḥ
हे राजकुमार! उसका खड्ग देवी की भुजा पर लगते ही टूट गया; तब वह क्रोध से लाल नेत्रोंवाला होकर शूल उठा बैठा।
श्लोक 8 (markandeya.83.8)
चिक्षेप च ततस्तत्तु भद्रकाल्यां महासुरः । जाज्वल्यमानं तेजोभी रविबिम्बमिवाम्बरात् ॥ 83.8 ॥
cikṣepa ca tatastattu bhadrakālyāṁ mahāsuraḥ jājvalyamānaṁ tejobhī ravibimbamivāmbarāt
फिर उस महासुर ने भद्रकाली पर वह शूल फेंका, जो अपने तेज से जलता हुआ, आकाश से गिरते सूर्य-बिम्ब के समान प्रतीत हो रहा था।
श्लोक 9 (markandeya.83.9)
दृष्ट्वा तदापतच्छूलं देवी शूलममुञ्चत । तच्छूलं शतधा तेन नीतं स च महासुरः ॥ 83.9 ॥
dṛṣṭvā tadāpatacchūlaṁ devī śūlamamuñcata tacchūlaṁ śatadhā tena nītaṁ sa ca mahāsuraḥ
उस आते हुए शूल को देखकर देवी ने अपना शूल छोड़ा; उससे उसका शूल सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गया — और उसी के साथ वह महासुर भी [अपनी नियति को प्राप्त हुआ]।
श्लोक 10 (markandeya.83.10)
हते तस्मिन् महावीर्ये महिषस्य चमूपतौ । आजगाम गजारूढश्चामरस्त्रिदशार्दनः ॥ 83.10 ॥
hate tasmin mahāvīrye mahiṣasya camūpatau ājagāma gajārūḍhaścāmarastridaśārdanaḥ
महिष के उस महापराक्रमी सेनापति के मारे जाने पर, देवताओं का उत्पीड़क चामर हाथी पर सवार होकर आगे आया।
श्लोक 11 (markandeya.83.11)
सोऽपि शक्तिं मुमोचाथ देव्यास्तामम्बिका द्रुतम् । हुङ्काराभिहतां भूमौ पातयामास निष्प्रभाम् ॥ 83.11 ॥
so ’pi śaktiṁ mumocātha devyāstāmambikā drutam huṅkārābhihatāṁ bhūmau pātayāmāsa niṣprabhām
उसने भी देवी पर शक्ति चलाई, किन्तु अम्बिका ने केवल "हुंकार" से आहत करके उसे तत्क्षण निस्तेज कर भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 12 (markandeya.83.12)
भग्नां शक्तिं निपतितां दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । चिक्षेप चामरः शूलं बाणैस्तदपि साच्छिनत् ॥ 83.12 ॥
bhagnāṁ śaktiṁ nipatitāṁ dṛṣṭvā krodhasamanvitaḥ cikṣepa cāmaraḥ śūlaṁ bāṇaistadapi sācchinat
अपनी टूटी और गिरी हुई शक्ति को देखकर क्रोध से भरे चामर ने त्रिशूल फेंका; उसे भी देवी ने अपने बाणों से काट डाला।
श्लोक 13 (markandeya.83.13)
ततः सिंहः समुत्पत्य गजकुम्भान्तरे स्थितः । बाहुयुद्धेन युयुधे तेनोच्चैस्त्रिदशारिणा ॥ 83.13 ॥
tataḥ siṁhaḥ samutpatya gajakumbhāntare sthitaḥ bāhuyuddhena yuyudhe tenoccaistridaśāriṇā
तब सिंह उछलकर हाथी के दोनों गण्डस्थलों के बीच जा बैठा, और उस देवताओं के शत्रु से भुजाओं द्वारा घोर युद्ध करने लगा।
श्लोक 14 (markandeya.83.14)
युधायमानो ततस्तौ तु तस्मान्नागान्महीं गतौ । युयुधातेऽतिसंरब्धौ प्रहारैरतिदारुणैः ॥ 83.14 ॥
yudhāyamāno tatastau tu tasmānnāgānmahīṁ gatau yuyudhāte ’tisaṁrabdhau prahārairatidāruṇaiḥ
इस प्रकार युद्धरत वे दोनों उस हाथी से भूमि पर उतर आए, और अत्यन्त क्रोध में भरकर घोर प्रहारों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 15 (markandeya.83.15)
ततो वेगात्खमुत्पत्य निपत्य च मृगारिणा । करप्रहारेण शिरश्चामरस्य पृथक्कृतम् ॥ 83.15 ॥
tato vegātkhamutpatya nipatya ca mṛgāriṇā karaprahāreṇa śiraścāmarasya pṛthakkṛtam
तत्पश्चात् उस मृगराज (सिंह) ने वेगपूर्वक आकाश में उछलकर और गिरकर, अपने पंजे के प्रहार से चामर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 16 (markandeya.83.16)
उदग्रश्च रणे देव्या शिलावृक्षादिभिर्हतः । दन्तमुष्टितलैश्चैव करालश्च निपातितः ॥ 83.16 ॥
udagraśca raṇe devyā śilāvṛkṣādibhirhataḥ dantamuṣṭitalaiścaiva karālaśca nipātitaḥ
उद्ग्र रणभूमि में देवी द्वारा शिलाओं और वृक्षों आदि से मारा गया, और कराल भी उसके दाँतों, मुक्कों तथा तमाचों से भूमि पर गिरा दिया गया।
श्लोक 17 (markandeya.83.17)
देवी क्रुद्धा गदापातैश्चूर्णयामास चोद्धतम् । वाष्कलं भिन्दिपालेन बाणैस्ताम्रं तथान्धकम् ॥ 83.17 ॥
devī kruddhā gadāpātaiścūrṇayāmāsa coddhatam vāṣkalaṁ bhindipālena bāṇaistāmraṁ tathāndhakam
क्रुद्ध देवी ने गदा के प्रहारों से उद्दण्ड वाष्कल को चूर-चूर कर डाला; भिन्दिपाल से ताम्र को, और बाणों से अन्धक को मार डाला।
श्लोक 18 (markandeya.83.18)
उग्रास्यमुग्रवीर्यञ्च तथैव च महाहनुम् । त्रिनेत्रा च त्रिशूलेन जघान परमेश्वरी ॥ 83.18 ॥
ugrāsyamugravīryañca tathaiva ca mahāhanum trinetrā ca triśūlena jaghāna parameśvarī
त्रिनेत्रा परमेश्वरी ने उग्रास्य, उग्रवीर्य तथा महाहनु को भी अपने त्रिशूल से मार डाला।
श्लोक 19 (markandeya.83.19)
बिडालस्यासिना कायात् पातयामास वै शिरः । दुर्धरं दुर्मुखं चोभौ शरैर्निन्ये यमक्षयम् । कालं च कालदण्डेन कालरात्रिरपातयत् ॥ 83.19 ॥
biḍālasyāsinā kāyāt pātayāmāsa vai śiraḥ durdharaṁ durmukhaṁ cobhau śarairninye yamakṣayam kālaṁ ca kāladaṇḍena kālarātrirapātayat
उसने खड्ग से बिडाल का सिर धड़ से गिरा दिया, दुर्धर और दुर्मुख दोनों को बाणों से यमलोक भेज दिया; और कालरात्रि ने काल को कालदण्ड से गिरा दिया।
श्लोक 20 (markandeya.83.20)
अग्रदर्शनमत्युग्रैः खड्गपातैरताडयत् । असिनैवासिलोमानमच्छिदत् सा रणोत्सवे । गणैः सिंहेन देव्या च जयक्ष्वेडाकृतोत्सवैः ॥ 83.20 ॥
agradarśanamatyugraiḥ khaḍgapātairatāḍayat asinaivāsilomānamacchidat sā raṇotsave gaṇaiḥ siṁhena devyā ca jayakṣveḍākṛtotsavaiḥ
उसने अत्यन्त प्रचण्ड खड्ग-प्रहारों से अग्रदर्शन को मार गिराया, और उसी खड्ग से असिलोमा को भी काट डाला — उस युद्धोत्सव में, जिसे उसके गणों, सिंह और स्वयं देवी ने विजय-गर्जना से उत्सवमय बना दिया था।
श्लोक 21 (markandeya.83.21)
एवं संक्षीयमाणे तु स्वसैन्ये महिषासुरः । माहिषेण स्वरूपेण त्रासयामास तान् गणान् ॥ 83.21 ॥
evaṁ saṁkṣīyamāṇe tu svasainye mahiṣāsuraḥ māhiṣeṇa svarūpeṇa trāsayāmāsa tān gaṇān
इस प्रकार अपनी सेना क्षीण होते देखकर महिषासुर स्वयं भैंसे के अपने मूल रूप में उन गणों को त्रस्त करने लगा।
श्लोक 22 (markandeya.83.22)
कांश्चित्तुण्डप्रिहारेण खुरक्षेपैस्तथापरान् । लाङ्गूलताडितांश्चान्यान् शृङ्गाभ्याञ्च विदारितान् ॥ 83.22 ॥
kāṁścittuṇḍaprihāreṇa khurakṣepaistathāparān lāṅgūlatāḍitāṁścānyān śṛṅgābhyāñca vidāritān
किन्हीं को उसने अपने थूथन के प्रहार से, किन्हीं को खुरों की चोट से, किन्हीं को पूँछ के प्रहार से, तो किन्हीं को अपने सींगों से विदीर्ण कर डाला।
श्लोक 23 (markandeya.83.23)
वेगेन कांश्चिदपरान् नादेन भ्रमणेन च । निश्वासपवनेनान्यान् पातयामास भूतले ॥ 83.23 ॥
vegena kāṁścidaparān nādena bhramaṇena ca niśvāsapavanenānyān pātayāmāsa bhūtale
किन्हीं को उसने अपने वेग से, किन्हीं को अपनी गर्जना और घुमाव से, तो किन्हीं और को अपने निःश्वास के झोंके मात्र से ही भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 24 (markandeya.83.24)
निपात्य प्रमथानीकमभ्यधावत सोऽसुरः । सिंहं हन्तुं महादेव्याः कोपं चक्रे ततोऽम्बिका ॥ 83.24 ॥
nipātya pramathānīkamabhyadhāvata so ’suraḥ siṁhaṁ hantuṁ mahādevyāḥ kopaṁ cakre tato ’mbikā
उस असुर ने देवी की गणसेना को गिराकर सिंह का वध करने के लिए दौड़ लगाई; तब अम्बिका को क्रोध आ गया।
श्लोक 25 (markandeya.83.25)
सोऽपि कोपान्महावीर्यः खुरक्षुण्णमहीतलः । शृङ्गाभ्यां पर्वतानुच्चैश्चिक्षेप च ननाद च ॥ 83.25 ॥
so ’pi kopānmahāvīryaḥ khurakṣuṇṇamahītalaḥ śṛṅgābhyāṁ parvatānuccaiścikṣepa ca nanāda ca
अत्यन्त बलशाली वह असुर भी क्रोध में भरकर, अपने खुरों से पृथ्वी को कुरेदता हुआ, सींगों से पर्वतों को ऊँचा उछालने और गरजने लगा।
श्लोक 26 (markandeya.83.26)
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥ 83.26 ॥
vegabhramaṇavikṣuṇṇā mahī tasya vyaśīryata lāṅgūlenāhataścābdhiḥ plāvayāmāsa sarvataḥ
उसके वेगपूर्ण घुमाव से क्षत-विक्षत हुई पृथ्वी बिखर गई, और उसकी पूँछ की चोट से आहत समुद्र चारों ओर उमड़ पड़ा।
श्लोक 27 (markandeya.83.27)
धुतशृङ्गविभिन्नाश्च खण्डं खण्डं ययुर्घना । श्वासानिलास्ताः शतशो निपेतुर्नभसोऽचलाः ॥ 83.27 ॥
dhutaśṛṅgavibhinnāśca khaṇḍaṁ khaṇḍaṁ yayurghanā śvāsānilāstāḥ śataśo nipeturnabhaso ’calāḥ
उसके हिलाए गए सींगों से बादल टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गए, और उसके निःश्वासों की आँधी से सैकड़ों पर्वत आकाश से गिर पड़े।
श्लोक 28 (markandeya.83.28)
इति क्रोधसमाध्मातमापतन्तं महासुरम् । दृष्ट्वा सा चण्डिका कोपं तद्वधाय तदाकरोत् ॥ 83.28 ॥
iti krodhasamādhmātamāpatantaṁ mahāsuram dṛṣṭvā sā caṇḍikā kopaṁ tadvadhāya tadākarot
इस प्रकार क्रोध से उन्मत्त होकर आक्रमण करते हुए उस महासुर को देखकर चण्डिका क्रुद्ध हुई और उसके वध का संकल्प लिया।
श्लोक 29 (markandeya.83.29)
सा क्षिप्त्वा तस्य वै पाशं तं बबन्ध महासुरम् । तत्याज माहिषं रूपं सोऽपि बद्धो महामृधे ॥ 83.29 ॥
sā kṣiptvā tasya vai pāśaṁ taṁ babandha mahāsuram tatyāja māhiṣaṁ rūpaṁ so ’pi baddho mahāmṛdhe
उसने अपना पाश फेंककर उस महासुर को बाँध दिया; बँध जाने पर वह उस महासमर में अपना भैंसे का रूप छोड़ बैठा।
श्लोक 30 (markandeya.83.30)
ततः सिंहोऽभवत् सद्यो यावत्तस्याम्बिका शिरः । छिनत्ति तावत्पुरुषः खड्गपाणिरदृश्यत ॥ 83.30 ॥
tataḥ siṁho ’bhavat sadyo yāvattasyāmbikā śiraḥ chinatti tāvatpuruṣaḥ khaḍgapāṇiradṛśyata
तब वह तत्क्षण सिंह बन गया; और ज्यों ही अम्बिका उसका सिर काटने चली, त्यों ही वह हाथ में खड्ग लिए पुरुष के रूप में दिखाई पड़ा।
श्लोक 31 (markandeya.83.31)
तत एवाशु पुरुषं देवी चिच्छेद सायकैः । तं खड्गचर्मणा सार्धं ततः सोऽभून्महागजः ॥ 83.31 ॥
tata evāśu puruṣaṁ devī ciccheda sāyakaiḥ taṁ khaḍgacarmaṇā sārdhaṁ tataḥ so ’bhūnmahāgajaḥ
तत्क्षण देवी ने खड्ग और ढाल सहित उस पुरुष को भी अपने बाणों से काट डाला; तब वह एक विशाल हाथी बन गया।
श्लोक 32 (markandeya.83.32)
करेण च महासिंहं तं चकर्ष जगर्ज च । कर्षतस्तु करं देवी खड्गेन निरकृन्तत ॥ 83.32 ॥
kareṇa ca mahāsiṁhaṁ taṁ cakarṣa jagarja ca karṣatastu karaṁ devī khaḍgena nirakṛntata
उसने अपनी सूँड से उस महासिंह को खींचकर गर्जना की; परन्तु जैसे ही वह खींचने लगा, देवी ने अपने खड्ग से ही उसकी सूँड काट डाली।
श्लोक 33 (markandeya.83.33)
ततो महासुरो भूयो माहिषं वपुरास्थितः । तथैव क्षोभयामास त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ 83.33 ॥
tato mahāsuro bhūyo māhiṣaṁ vapurāsthitaḥ tathaiva kṣobhayāmāsa trailokyaṁ sacarācaram
तब वह महासुर फिर से भैंसे का शरीर धारण कर उसी रूप में पुनः चराचरसहित तीनों लोकों को क्षुब्ध करने लगा।
श्लोक 34 (markandeya.83.34)
ततः क्रुद्धा जगन्माता चण्डिका पानमुत्तमम् । पपौ पुनः पुनश्चैव जहासारुणलोचना ॥ 83.34 ॥
tataḥ kruddhā jaganmātā caṇḍikā pānamuttamam papau punaḥ punaścaiva jahāsāruṇalocanā
तब क्रुद्ध हुई जगन्माता चण्डिका बार-बार उत्तम मदिरा का पान करने लगी, और अपने लाल नेत्रों से हँस पड़ी।
श्लोक 35 (markandeya.83.35)
ननर्द चासुरः सोऽपि बलवीर्यमदोद्धतः । विषाणाब्याञ्च चिक्षेप चण्डिकां प्रति भूधरान् ॥ 83.35 ॥
nanarda cāsuraḥ so ’pi balavīryamadoddhataḥ viṣāṇābyāñca cikṣepa caṇḍikāṁ prati bhūdharān
अपने बल-पराक्रम के मद से उद्धत वह असुर भी गरज उठा, और अपने सींगों से चण्डिका पर पर्वत फेंकने लगा।
श्लोक 36 (markandeya.83.36)
सा च तान् प्रहितांस्तेन चूर्णयन्ती शरोत्करैः । उवाच तं मदोद्धूतमुखरागाकुलाक्षरम् ॥ 83.36 ॥
sā ca tān prahitāṁstena cūrṇayantī śarotkaraiḥ uvāca taṁ madoddhūtamukharāgākulākṣaram
देवी ने उसके फेंके हुए उन पर्वतों को अपने बाण-समूहों से चूर-चूर करते हुए, मद से उद्धत मुखवर्ण और अस्पष्ट वाणी वाले उस असुर से यह कहा।
श्लोक 37 (markandeya.83.37)
देव्युवाच गर्ज गर्ज क्षणं मूढ मधु यावत्पिबाम्यहम् । मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ 83.37 ॥
devyuvāca garja garja kṣaṇaṁ mūḍha madhu yāvatpibāmyaham mayā tvayi hate ’traiva garjiṣyantyāśu devatāḥ
देवी ने कहा — गरज ले, मूर्ख, क्षणभर और गरज ले, जब तक मैं यह मधुपान करती हूँ! मेरे हाथों तेरे यहीं मारे जाने पर तो शीघ्र ही देवता गरजने लगेंगे।
श्लोक 38 (markandeya.83.38)
ऋषिरुवाच एवमुक्त्वा समुत्पत्य सारूढा तं महासुरम् । पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत् ॥ 83.38 ॥
ṛṣiruvāca evamuktvā samutpatya sārūḍhā taṁ mahāsuram pādenākramya kaṇṭhe ca śūlenainamatāḍayat
ऋषि ने कहा — ऐसा कहकर वह उछली और उस महासुर पर सवार हो गई; उसकी गर्दन को पैर से दबाकर उसने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया।
श्लोक 39 (markandeya.83.39)
ततः सोऽपि पदाक्रान्तस्तया निजमुखात्ततः । अर्धनिष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृतः ॥ 83.39 ॥
tataḥ so ’pi padākrāntastayā nijamukhāttataḥ ardhaniṣkrānta evāsīd devyā vīryeṇa saṁvṛtaḥ
तब पैर से दबाया गया वह असुर अपने ही (भैंसे के) मुख से आधा बाहर निकलने लगा, किन्तु देवी के बल से वह वहीं रोक दिया गया।
श्लोक 40 (markandeya.83.40)
अर्धनिष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः । तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥ 83.40 ॥
ardhaniṣkrānta evāsau yudhyamāno mahāsuraḥ tayā mahāsinā devyā śiraśchittvā nipātitaḥ
इस प्रकार आधा बाहर निकला हुआ, युद्धरत वह महासुर, देवी द्वारा अपनी विशाल तलवार से सिर काट दिए जाने पर, गिर पड़ा।
श्लोक 41 (markandeya.83.41)
एवं स महिषो नाम ससैन्यः ससुहृद्गणः । त्रैलोक्यं मोहयित्वा तु तया देव्या विनाशितः ॥ 83.41 ॥
evaṁ sa mahiṣo nāma sasainyaḥ sasuhṛdgaṇaḥ trailokyaṁ mohayitvā tu tayā devyā vināśitaḥ
इस प्रकार वह महिष नामक असुर, अपनी सेना और मित्रगणों सहित, जिसने तीनों लोकों को मोहित कर रखा था, उस देवी द्वारा नष्ट कर दिया गया।
श्लोक 42 (markandeya.83.42)
त्रैलोक्यस्थैस्तदा भूतैर्महिषे विनिपातिते । जयेत्युक्तं ततः सर्वैः सदेवासुरमानवैः ॥ 83.42 ॥
trailokyasthaistadā bhūtairmahiṣe vinipātite jayetyuktaṁ tataḥ sarvaiḥ sadevāsuramānavaiḥ
महिष के इस प्रकार गिराए जाने पर, तीनों लोकों में स्थित सभी प्राणियों ने — देव, असुर और मनुष्य सभी ने — "जय हो" ऐसा कह उठा।
श्लोक 43 (markandeya.83.43)
ततो हाहाकृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् । प्रहर्षञ्च परं जग्मुः सकला देवतागणाः ॥ 83.43 ॥
tato hāhākṛtaṁ sarvaṁ daityasainyaṁ nanāśa tat praharṣañca paraṁ jagmuḥ sakalā devatāgaṇāḥ
तब हाहाकार करती हुई दैत्यों की सम्पूर्ण सेना नष्ट हो गई, और समस्त देवगण अत्यन्त हर्ष को प्राप्त हुए।
श्लोक 44 (markandeya.83.44)
तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं सह दिव्यैर्महर्षिभिः । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ 83.44 ॥
tuṣṭuvustāṁ surā devīṁ saha divyairmaharṣibhiḥ jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ
देवताओं ने दिव्य महर्षियों के साथ उस देवी की स्तुति की; गन्धर्वों के स्वामी गाने लगे, और अप्सराओं के समूह नाचने लगे।