सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 82
महिषासुर-सैन्य-वध
श्लोक 1 (markandeya.82.1)
ऋषिरुवाच देवासुरमभूद् युद्धं पूर्णमब्दशतं पुरा । महिषेऽसुराणामधिपे देवानां च पुरन्दरे ॥ 82.1 ॥
ṛṣiruvāca devāsuramabhūd yuddhaṁ pūrṇamabdaśataṁ purā mahiṣe ’surāṇāmadhipe devānāṁ ca purandare
ऋषि ने कहा — प्राचीन काल में, जब महिष असुरों का अधिपति था और पुरन्दर (इन्द्र) देवताओं का, देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक युद्ध हुआ।
श्लोक 2 (markandeya.82.2)
तत्रासुरैर्महावीर्यैर्देवसैन्यं पराजितम् । जित्वा च सकलान् देवानिन्द्रोऽभून्महिषासुरः ॥ 82.2 ॥
tatrāsurairmahāvīryairdevasainyaṁ parājitam jitvā ca sakalān devānindro ’bhūnmahiṣāsuraḥ
उस युद्ध में महाबली असुरों ने देवताओं की सेना को पराजित कर दिया; और समस्त देवताओं को जीतकर महिषासुर स्वयं इन्द्र बन बैठा।
श्लोक 3 (markandeya.82.3)
ततः पराजिता देवाः पद्मयोनिं प्रजापतिम् । पुरस्कृत्य गतास्तत्र यत्रेश-गरुडध्वजौ ॥ 82.3 ॥
tataḥ parājitā devāḥ padmayoniṁ prajāpatim puraskṛtya gatāstatra yatreśa-garuḍadhvajau
तब पराजित देवता कमलयोनि प्रजापति ब्रह्मा को आगे करके वहाँ गए, जहाँ ईश (शिव) और गरुड़ध्वज (विष्णु) विराजमान थे।
श्लोक 4 (markandeya.82.4)
यथावृत्तं तयोस्तद्वन्महिषासुरचेष्टितम् । त्रिदशाः कथयामासुर्देवाभिभवविस्तरम् ॥ 82.4 ॥
yathāvṛttaṁ tayostadvanmahiṣāsuraceṣṭitam tridaśāḥ kathayāmāsurdevābhibhavavistaram
देवताओं ने उन दोनों को महिषासुर की सारी करतूत, जैसी घटी थी वैसी ही, तथा अपनी पराजय का समस्त विवरण सुनाया।
श्लोक 5 (markandeya.82.5)
सूर्येन्द्रग्न्यनिलेन्दूनां यमस्य वरुणस्य च । अन्येषां चाधिकारान् स स्वयमेवाधितिष्ठिति ॥ 82.5 ॥
sūryendragnyanilendūnāṁ yamasya varuṇasya ca anyeṣāṁ cādhikārān sa svayamevādhitiṣṭhiti
"वह स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण तथा अन्य देवताओं के अधिकारों पर अधिकार जमाए बैठा है।"
श्लोक 6 (markandeya.82.6)
स्वर्गान्निराकृताः सर्वे तेन देवगणा भुवि । विचरन्ति यथा मर्त्या महिषेण दुरात्मना ॥ 82.6 ॥
svargānnirākṛtāḥ sarve tena devagaṇā bhuvi vicaranti yathā martyā mahiṣeṇa durātmanā
"उस दुरात्मा महिष के द्वारा स्वर्ग से निकाले गए हम सभी देवगण अब पृथ्वी पर मनुष्यों की भाँति विचरण कर रहे हैं।"
श्लोक 7 (markandeya.82.7)
एतद्वः कथितं सर्वममरारिविचेष्टितम् । शरणं वः प्रपन्नाः स्मो वधस्तस्य विचिन्त्यताम् ॥ 82.7 ॥
etadvaḥ kathitaṁ sarvamamarāriviceṣṭitam śaraṇaṁ vaḥ prapannāḥ smo vadhastasya vicintyatām
"यह देवताओं के शत्रु की समस्त करतूत आपको बता दी। हम आपकी शरण में आए हैं; उसके वध का विचार कीजिए।"
श्लोक 8 (markandeya.82.8)
ऋषिरुवाच इत्थं निशम्य देवानां वचांसि मधुसूदनः । चकार कोपं शम्भुश्च भ्रुकुटीकुटिलाननौ ॥ 82.8 ॥
ṛṣiruvāca itthaṁ niśamya devānāṁ vacāṁsi madhusūdanaḥ cakāra kopaṁ śambhuśca bhrukuṭīkuṭilānanau
ऋषि ने कहा — देवताओं के इन वचनों को सुनकर मधुसूदन (विष्णु) को क्रोध हो आया, और शम्भु (शिव) का मुख भी भौंहें चढ़ने से कुटिल हो उठा।
श्लोक 9 (markandeya.82.9)
ततोऽतिकोपपूर्णस्य चक्रिणो वदनात्ततः । निश्चक्राम महत्तेजो ब्रह्मणः शङ्करस्य च ॥ 82.9 ॥
tato ’tikopapūrṇasya cakriṇo vadanāttataḥ niścakrāma mahattejo brahmaṇaḥ śaṅkarasya ca
तब अत्यन्त क्रोध से भरे हुए चक्रधारी (विष्णु) के मुख से, तथा ब्रह्मा और शंकर के मुख से भी, महान् तेज प्रकट हुआ।
श्लोक 10 (markandeya.82.10)
अन्येषाञ्चैव देवानां शक्रादीनां शरीरतः । निर्गतं सुमहत्तेजस्तच्चैक्यं समगच्छत ॥ 82.10 ॥
anyeṣāñcaiva devānāṁ śakrādīnāṁ śarīrataḥ nirgataṁ sumahattejastaccaikyaṁ samagacchata
इन्द्र आदि अन्य देवताओं के शरीरों से भी अत्यन्त महान् तेज निकला, और वह सब एक हो गया।
श्लोक 11 (markandeya.82.11)
अतीव तेजसः कूटं ज्वलन्तमिव पर्वतम् । ददृशुस्ते सुरास्तत्र ज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥ 82.11 ॥
atīva tejasaḥ kūṭaṁ jvalantamiva parvatam dadṛśuste surāstatra jvālāvyāptadigantaram
वहाँ देवताओं ने उस तेज की अत्यन्त विशाल राशि को, जो जलते हुए पर्वत के समान थी और अपनी ज्वालाओं से सम्पूर्ण दिशाओं को व्याप्त किए हुए थी, देखा।
श्लोक 12 (markandeya.82.12)
अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम् । एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ॥ 82.12 ॥
atulaṁ tatra tattejaḥ sarvadevaśarīrajam ekasthaṁ tadabhūnnārī vyāptalokatrayaṁ tviṣā
समस्त देवताओं के शरीर से उत्पन्न वह अनुपम तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक स्त्री के रूप में परिणत हो गया, जिसने अपनी कान्ति से तीनों लोकों को व्याप्त कर लिया।
श्लोक 13 (markandeya.82.13)
यदभूच्छाम्भवं तेजस्तेनाजायत तन्मुखम् । याम्येन चाभवन् केशा बहवो विष्णुतेजसा ॥ 82.13 ॥
yadabhūcchāmbhavaṁ tejastenājāyata tanmukham yāmyena cābhavan keśā bahavo viṣṇutejasā
जो तेज शिव का था, उससे उसका मुख उत्पन्न हुआ; यम के तेज से उसके प्रचुर केश बने; विष्णु के तेज से उसकी भुजाएँ बनीं।
श्लोक 14 (markandeya.82.14)
सौम्येन स्तनयोर्युग्मं मध्यं चैन्द्रेण चाभवत् । वारुणेन च जङ्घोरू नितम्बस्तेजसा भुवः ॥ 82.14 ॥
saumyena stanayoryugmaṁ madhyaṁ caindreṇa cābhavat vāruṇena ca jaṅghorū nitambastejasā bhuvaḥ
सोम (चन्द्रमा) के तेज से उसके दोनों स्तन बने, इन्द्र के तेज से उसकी कटि; वरुण के तेज से उसकी जंघाएँ और ऊरु, तथा पृथ्वी के तेज से उसके नितम्ब बने।
श्लोक 15 (markandeya.82.15)
ब्रह्मणस्तेजसा पादौ तदङ्गुल्योऽर्कतेजसा । वसूनाञ्च कराङ्गुल्यः कौबेरेण च नासिका ॥ 82.15 ॥
brahmaṇastejasā pādau tadaṅgulyo ’rkatejasā vasūnāñca karāṅgulyaḥ kaubereṇa ca nāsikā
ब्रह्मा के तेज से उसके दोनों चरण बने, सूर्य के तेज से उसकी अंगुलियाँ; वसुओं के तेज से उसके हाथ की अंगुलियाँ, और कुबेर के तेज से उसकी नासिका बनी।
श्लोक 16 (markandeya.82.16)
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥ 82.16 ॥
tasyāstu dantāḥ sambhūtāḥ prājāpatyena tejasā nayanatritayaṁ jajñe tathā pāvakatejasā
प्रजापति के तेज से उसके दाँत उत्पन्न हुए, तथा अग्नि के तेज से उसके तीनों नेत्र प्रकट हुए।
श्लोक 17 (markandeya.82.17)
भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च । अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥ 82.17 ॥
bhruvau ca sandhyayostejaḥ śravaṇāvanilasya ca anyeṣāṁ caiva devānāṁ sambhavastejasāṁ śivā
दोनों सन्ध्याओं के तेज से उसकी भौंहें बनीं, वायु के तेज से उसके कान; और हे कल्याणी! शेष अंग अन्य देवताओं के तेज से उत्पन्न हुए।
श्लोक 18 (markandeya.82.18)
ततः समस्तदेवानां तेजोराशिसमुद्भवाम् । तां विलोक्य मुदं प्रापुरमरा महिषार्दिताः ॥ 82.18 ॥
tataḥ samastadevānāṁ tejorāśisamudbhavām tāṁ vilokya mudaṁ prāpuramarā mahiṣārditāḥ
तब समस्त देवताओं के तेज-समूह से उत्पन्न उस देवी को देखकर, महिष से पीड़ित वे अमर देवता अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 19 (markandeya.82.19)
ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि च । ऊचुर्जयजयेत्युच्चैर्जयन्तीं ते जयैषिणः ॥ 82.19 ॥
tato devā dadustasyai svāni svānyāyudhāni ca ūcurjayajayetyuccairjayantīṁ te jayaiṣiṇaḥ
तत्पश्चात् विजय के इच्छुक देवताओं ने उसे अपने-अपने आयुध दिए, और उस विजयशीला के लिए ऊँचे स्वर में "जय-जय" कहा।
श्लोक 20 (markandeya.82.20)
शूलं शूलाद्विनिष्कृष्य ददौ तस्यै पिनाकधृक् । चक्रं च दत्तवान् कृष्णः समुत्पाद्य स्वचक्रतः ॥ 82.20 ॥
śūlaṁ śūlādviniṣkṛṣya dadau tasyai pinākadhṛk cakraṁ ca dattavān kṛṣṇaḥ samutpādya svacakrataḥ
पिनाकधारी (शिव) ने अपने ही त्रिशूल से एक त्रिशूल निकालकर उसे दिया; कृष्ण (विष्णु) ने अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके दिया।
श्लोक 21 (markandeya.82.21)
शङ्खञ्च वरुणः शक्तिं ददौ तस्यै हुताशनः । मारुतो दत्तवांश्चापं बाणपूर्णे तथेषुधी ॥ 82.21 ॥
śaṅkhañca varuṇaḥ śaktiṁ dadau tasyai hutāśanaḥ māruto dattavāṁścāpaṁ bāṇapūrṇe tatheṣudhī
वरुण ने शंख दिया, हुताशन (अग्नि) ने उसे शक्ति दी; मारुत (वायु) ने धनुष तथा बाणों से भरे दो तूणीर दिए।
श्लोक 22 (markandeya.82.22)
वज्रमिन्द्रः समुत्पाद्य कुलिशादमराधिपः । ददौ तस्यै सहस्राक्षो घण्टामैरावताद् गजात् ॥ 82.22 ॥
vajramindraḥ samutpādya kuliśādamarādhipaḥ dadau tasyai sahasrākṣo ghaṇṭāmairāvatād gajāt
अमरों के अधिपति सहस्रनेत्र इन्द्र ने अपने ही वज्र से वज्र उत्पन्न करके उसे दिया, तथा ऐरावत हाथी से एक घण्टा भी दिया।
श्लोक 23 (markandeya.82.23)
कालदण्डाद्यमो दण्डं पाशं चाम्बुपतिर्ददौ । प्रजापतिश्चाक्षमालां ददौ ब्रह्मा कमण्डलुम् ॥ 82.23 ॥
kāladaṇḍādyamo daṇḍaṁ pāśaṁ cāmbupatirdadau prajāpatiścākṣamālāṁ dadau brahmā kamaṇḍalum
यम ने कालदण्ड से एक दण्ड दिया, और जलों के स्वामी (वरुण) ने पाश दिया; प्रजापति और ब्रह्मा ने अक्षमाला तथा कमण्डलु दिए।
श्लोक 24 (markandeya.82.24)
समस्तरोमकूपेषु निजरश्मीन् दिवाकरः । कालख्च दत्तवान् खड्गं तस्याश्चर्म च निर्मलम् ॥ 82.24 ॥
samastaromakūpeṣu nijaraśmīn divākaraḥ kālakhca dattavān khaḍgaṁ tasyāścarma ca nirmalam
सूर्य ने अपनी किरणें उसके समस्त रोमकूपों में भर दीं, और काल ने उसे खड्ग तथा एक निर्मल ढाल दी।
श्लोक 25 (markandeya.82.25)
क्षीरोदश्चामलं हारमजरे च तथाम्बरे । चूडामणिं तथा दिव्यं कुण्डले कटकानि च ॥ 82.25 ॥
kṣīrodaścāmalaṁ hāramajare ca tathāmbare cūḍāmaṇiṁ tathā divyaṁ kuṇḍale kaṭakāni ca
क्षीरसागर ने उसे एक निर्मल हार, तथा जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र दिए; साथ ही एक दिव्य चूड़ामणि, कुण्डल और कड़े भी दिए।
श्लोक 26 (markandeya.82.26)
अर्धचन्द्रं तथा शुभ्रं केयूरान् सर्वबाहुषु । नूपुरौ विमलौ तद्वद् ग्रैवेयकमनुत्तमम् । अङ्गुलीयकरत्नानि समस्तास्वङ्गुलीषु च ॥ 82.26 ॥
ardhacandraṁ tathā śubhraṁ keyūrān sarvabāhuṣu nūpurau vimalau tadvad graiveyakamanuttamam aṅgulīyakaratnāni samastāsvaṅgulīṣu ca
उसने सुन्दर अर्धचन्द्र भी दिया, समस्त भुजाओं के लिए बाजूबन्द, वैसे ही दो निर्मल नूपुर, एक अनुपम कण्ठहार, तथा सभी अंगुलियों के लिए रत्नजड़ित अँगूठियाँ दीं।
श्लोक 27 (markandeya.82.27)
विश्वकर्मा ददौ तस्यै परशुञ्चातिनिर्मलम् । अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यं च दंशनम् ॥ 82.27 ॥
viśvakarmā dadau tasyai paraśuñcātinirmalam astrāṇyanekarūpāṇi tathābhedyaṁ ca daṁśanam
विश्वकर्मा ने उसे एक अत्यन्त निर्मल फरसा, अनेक प्रकार के अस्त्र, और एक अभेद्य कवच दिया।
श्लोक 28 (markandeya.82.28)
अम्लानपङ्कजां मालां शिरस्युरसि चापराम् । अददज्जलधिस्तस्यै पङ्कजं चातिशोभनम् ॥ 82.28 ॥
amlānapaṅkajāṁ mālāṁ śirasyurasi cāparām adadajjaladhistasyai paṅkajaṁ cātiśobhanam
समुद्र ने उसके शीश के लिए एक कभी न मुरझानेवाली कमल-माला, वक्षःस्थल के लिए एक और माला, तथा एक अत्यन्त सुन्दर कमल भी दिया।
श्लोक 29 (markandeya.82.29)
हिमवान् वाहनं सिंहं रत्नानि विविधानि च । ददावशून्यं सुरया पानपात्रं धनाधिपः ॥ 82.29 ॥
himavān vāhanaṁ siṁhaṁ ratnāni vividhāni ca dadāvaśūnyaṁ surayā pānapātraṁ dhanādhipaḥ
हिमवान् ने वाहन के रूप में सिंह तथा विविध रत्न दिए; धनाधिपति (कुबेर) ने कभी न रीतनेवाला मदिरा का पानपात्र दिया।
श्लोक 30 (markandeya.82.30)
शेषश्च सर्वनागेशो महामणिविभूषितम् । नागहारं ददौ तस्यै धत्ते यः पृथिवीमिमाम् ॥ 82.30 ॥
śeṣaśca sarvanāgeśo mahāmaṇivibhūṣitam nāgahāraṁ dadau tasyai dhatte yaḥ pṛthivīmimām
इस पृथ्वी को धारण करनेवाले सर्वनागेश्वर शेष ने उसे महामणि से विभूषित नागहार प्रदान किया।
श्लोक 31 (markandeya.82.31)
अन्यैरपि सुरैर्देवी भूषणैरायुधैस्तथा । संमानिता ननादोच्चैः साट्टहासं मुहुर्मुहुः ॥ 82.31 ॥
anyairapi surairdevī bhūṣaṇairāyudhaistathā saṁmānitā nanādoccaiḥ sāṭṭahāsaṁ muhurmuhuḥ
अन्य देवताओं द्वारा भी आभूषणों और आयुधों से सम्मानित होकर वह देवी बारम्बार ऊँची अट्टहास-ध्वनि से गूँज उठी।
श्लोक 32 (markandeya.82.32)
तस्या नादेन घोरेण कृत्स्त्रमापूरितं नभः । अमायतातिमहता प्रतिशब्दो महानभूत् ॥ 82.32 ॥
tasyā nādena ghoreṇa kṛtstramāpūritaṁ nabhaḥ amāyatātimahatā pratiśabdo mahānabhūt
उसकी उस भीषण गर्जना से सम्पूर्ण आकाश भर गया, और अत्यन्त प्रबल प्रतिध्वनि से एक महान् प्रतिशब्द उत्पन्न हुआ।
श्लोक 33 (markandeya.82.33)
चुक्षुभुः सकला लोकाः समुद्राश्च चकम्पिरे । चचाल वसुधा चेलुः सकलाश्च महीधराः ॥ 82.33 ॥
cukṣubhuḥ sakalā lokāḥ samudrāśca cakampire cacāla vasudhā celuḥ sakalāśca mahīdharāḥ
सभी लोक क्षुब्ध हो उठे, समुद्र काँप गए; पृथ्वी डोल उठी, और समस्त पर्वत हिल गए।
श्लोक 34 (markandeya.82.34)
जयेति देवाश्च मुदा तामूचुः सिंहवाहिनीम् । तुष्टुवुर्मुनयश्चैनां भक्तिनम्रात्ममूर्तयः ॥ 82.34 ॥
jayeti devāśca mudā tāmūcuḥ siṁhavāhinīm tuṣṭuvurmunayaścaināṁ bhaktinamrātmamūrtayaḥ
देवताओं ने हर्षपूर्वक उस सिंहवाहिनी को "जय" कहा, और मुनियों ने भक्ति से झुके हुए अपने शरीरों सहित उसकी स्तुति की।
श्लोक 35 (markandeya.82.35)
दृष्ट्वा समस्तं संक्षुब्धं त्रैलोक्यममरारयः । सन्नद्धाखिलसैन्यास्ते समुत्तस्थुरुदायुधाः ॥ 82.35 ॥
dṛṣṭvā samastaṁ saṁkṣubdhaṁ trailokyamamarārayaḥ sannaddhākhilasainyāste samuttasthurudāyudhāḥ
सम्पूर्ण त्रिलोक को क्षुब्ध देखकर देवताओं के शत्रुओं ने अपनी सारी सेना सजाकर आयुध उठाए और खड़े हो गए।
श्लोक 36 (markandeya.82.36)
आः किमेतदिति क्रोधादाभाष्य महिषासुरः । अभ्यधावत तं शब्दमशेषैरसुरैर्वृतः ॥ 82.36 ॥
āḥ kimetaditi krodhādābhāṣya mahiṣāsuraḥ abhyadhāvata taṁ śabdamaśeṣairasurairvṛtaḥ
"अरे, यह क्या है!" यह कहते हुए क्रोध से भरा महिषासुर, समस्त असुरों से घिरा हुआ, उस ध्वनि की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 37 (markandeya.82.37)
स ददर्श ततो देवीं व्याप्तलोकत्रयां त्विषा । पादाक्रान्त्या नतभुवं किरीटोल्लिखिताम्बराम् ॥ 82.37 ॥
sa dadarśa tato devīṁ vyāptalokatrayāṁ tviṣā pādākrāntyā natabhuvaṁ kirīṭollikhitāmbarām
तब उसने उस देवी को देखा, जो अपनी कान्ति से तीनों लोकों को व्याप्त किए हुए थी, जिसके चरण के आघात से पृथ्वी नत हो गई थी, और जिसका मुकुट आकाश को छू रहा था।
श्लोक 38 (markandeya.82.38)
क्षोभिताशेषपातालां धनुर्ज्यानिः स्वनेन ताम् । दिशो भुजसहस्रेण समन्ताद् व्याप्य संस्थिताम् ॥ 82.38 ॥
kṣobhitāśeṣapātālāṁ dhanurjyāniḥ svanena tām diśo bhujasahasreṇa samantād vyāpya saṁsthitām
जो अपने धनुष की टंकार से समस्त पाताल को क्षुब्ध कर रही थी, और अपनी सहस्र भुजाओं से चारों ओर की सभी दिशाओं को व्याप्त कर खड़ी थी।
श्लोक 39 (markandeya.82.39)
ततः प्रववृते युद्धं तया देव्या सुरद्विषाम् । शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैरादीपितदिगन्तरम् ॥ 82.39 ॥
tataḥ pravavṛte yuddhaṁ tayā devyā suradviṣām śastrāstrairbahudhā muktairādīpitadigantaram
तब उस देवी और देवताओं के शत्रुओं के बीच युद्ध छिड़ गया, जिसमें छोड़े गए विविध शस्त्र-अस्त्रों से सम्पूर्ण दिगन्त प्रकाशित हो उठा।
श्लोक 40 (markandeya.82.40)
महिषासुरसेनानीश्चिक्षुराख्यो महासुरः । युयुधे चामरश्चान्यैश्चतुरङ्गबलान्वितः ॥ 82.40 ॥
mahiṣāsurasenānīścikṣurākhyo mahāsuraḥ yuyudhe cāmaraścānyaiścaturaṅgabalānvitaḥ
महिषासुर का सेनापति चिक्षुर नामक महासुर, तथा चतुरंगिणी सेना से युक्त चामर आदि अन्य असुर भी युद्ध करने लगे।
श्लोक 41 (markandeya.82.41)
रथानामयुतैः षड्भिरुदग्राख्यो महासुरः । अयुध्यतायुतानाञ्च सहस्रेण महाहनुः ॥ 82.41 ॥
rathānāmayutaiḥ ṣaḍbhirudagrākhyo mahāsuraḥ ayudhyatāyutānāñca sahasreṇa mahāhanuḥ
उद्ग्र नामक महासुर साठ हज़ार रथों के साथ युद्ध करने लगा, और महाहनु एक करोड़ रथों के साथ।
श्लोक 42 (markandeya.82.42)
पञ्चाशद्भिश्च नियुतैरसिलोमा महासुरः । अयुतानां शतैः षड्भिर्वाष्कलो युयुधे रणे ॥ 82.42 ॥
pañcāśadbhiśca niyutairasilomā mahāsuraḥ ayutānāṁ śataiḥ ṣaḍbhirvāṣkalo yuyudhe raṇe
असिलोमा महासुर पचास लाख रथों के साथ, और वाष्कल साठ लाख रथों के साथ रणभूमि में युद्ध करने लगे।
श्लोक 43 (markandeya.82.43)
गजवाजिसहस्रौघैरनेकैरुग्रदर्शनः । वृतो रथानां कोट्या च युद्धे तस्मिन्नयुध्यत ॥ 82.43 ॥
gajavājisahasraughairanekairugradarśanaḥ vṛto rathānāṁ koṭyā ca yuddhe tasminnayudhyata
भयंकर दिखनेवाला एक असुर, अनेक सहस्रों हाथियों और घोड़ों के समूहों तथा एक करोड़ रथों से घिरा हुआ, उस युद्ध में जूझने लगा।
श्लोक 44 (markandeya.82.44)
बिडालाक्षोऽयुतानाञ्च पञ्चाशद्भिरथायुतैः । युयुधे संयुगे तत्र रथानां परिवारितः ॥ 82.44 ॥
biḍālākṣo ’yutānāñca pañcāśadbhirathāyutaiḥ yuyudhe saṁyuge tatra rathānāṁ parivāritaḥ
बिडालाक्ष पचास हज़ार रथों से घिरा हुआ उस युद्धभूमि में युद्ध करने लगा।
श्लोक 45 (markandeya.82.45)
वृतः कालो रथानाञ्च रणे पञ्चाशतायुतैः । युयुधे संयुगे तत्र तावद्भिः परिवारितः ॥ 82.45 ॥
vṛtaḥ kālo rathānāñca raṇe pañcāśatāyutaiḥ yuyudhe saṁyuge tatra tāvadbhiḥ parivāritaḥ
काल नामक असुर भी उतने ही, अर्थात् पचास हज़ार रथों से घिरा हुआ, उस संग्राम में युद्ध करने लगा।
श्लोक 46 (markandeya.82.46)
अन्ये च तत्रायुतशो रथनागहयैर्वृताः । युयुधुः संयुगे देव्या सह तत्र महासुराः ॥ 82.46 ॥
anye ca tatrāyutaśo rathanāgahayairvṛtāḥ yuyudhuḥ saṁyuge devyā saha tatra mahāsurāḥ
अन्य महासुर भी वहाँ रथों, हाथियों और घोड़ों से दस-दस हज़ार की संख्या में घिरे हुए, देवी के साथ युद्ध करने लगे।
श्लोक 47 (markandeya.82.47)
कोटिकोटिसहस्रैस्तु रथानां दन्तिनां तथा । हयानाञ्च वृतो युद्धे तत्राभून्महिषासुरः ॥ 82.47 ॥
koṭikoṭisahasraistu rathānāṁ dantināṁ tathā hayānāñca vṛto yuddhe tatrābhūnmahiṣāsuraḥ
स्वयं महिषासुर भी उस युद्ध में हज़ारों करोड़ रथों, हाथियों तथा घोड़ों से घिरा हुआ उपस्थित था।
श्लोक 48 (markandeya.82.48)
तोमरैर्भिन्दिपालैश्च शक्तिभिर्मुसलैस्तथा । युयुधुः संयुगे देव्या खड्गैः परशुपट्टिशैः ॥ 82.48 ॥
tomarairbhindipālaiśca śaktibhirmusalaistathā yuyudhuḥ saṁyuge devyā khaḍgaiḥ paraśupaṭṭiśaiḥ
वे सब देवी के साथ तोमर, भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, खड्ग, फरसे और पट्टिशों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 49 (markandeya.82.49)
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित् पाशांस्तथापरे । देवीं खड्गप्रहारैस्तु ते तां हन्तुं प्रचक्रमुः ॥ 82.49 ॥
kecicca cikṣipuḥ śaktīḥ kecit pāśāṁstathāpare devīṁ khaḍgaprahāraistu te tāṁ hantuṁ pracakramuḥ
किन्हीं ने शक्तियाँ फेंकीं, किन्हीं ने पाश; और अन्य लोग खड्ग के प्रहारों से देवी का वध करने का प्रयत्न करने लगे।
श्लोक 50 (markandeya.82.50)
सापि देवी ततस्तानि शस्त्राण्यस्त्राणि चण्डिका । लीलयैव प्रचिच्छेद निजशस्त्रास्त्रवर्षिणी ॥ 82.50 ॥
sāpi devī tatastāni śastrāṇyastrāṇi caṇḍikā līlayaiva praciccheda nijaśastrāstravarṣiṇī
किन्तु वह देवी चण्डिका भी उन समस्त शस्त्र-अस्त्रों को अपने ही शस्त्रों की वर्षा करते हुए, मानो लीला मात्र में, काट डालने लगी।
श्लोक 51 (markandeya.82.51)
अनायस्तानना देवी स्तूयमाना सुरर्षिभिः । मुमोचासुरदेहेषु शस्त्राण्यस्त्राणि चेश्वरी ॥ 82.51 ॥
anāyastānanā devī stūyamānā surarṣibhiḥ mumocāsuradeheṣu śastrāṇyastrāṇi ceśvarī
मुखमण्डल पर तनिक भी विकार न लाती हुई वह देवी ईश्वरी, देवताओं और ऋषियों द्वारा स्तुत होते हुए, असुरों के शरीरों पर अपने शस्त्र-अस्त्र छोड़ने लगी।
श्लोक 52 (markandeya.82.52)
सोऽपि क्रुद्धो धुतसटो देव्या वाहनकेशरी । चचारासुरसैन्येषु वनेष्विव हुताशनः ॥ 82.52 ॥
so ’pi kruddho dhutasaṭo devyā vāhanakeśarī cacārāsurasainyeṣu vaneṣviva hutāśanaḥ
और देवी का वह वाहन सिंह भी क्रुद्ध होकर, अपनी अयाल फैलाए हुए, असुर-सेना में उसी प्रकार विचरने लगा जैसे वन में अग्नि विचरती है।
श्लोक 53 (markandeya.82.53)
निश्वसान्मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका । त एव सद्यः सम्भूता गणाः शतसहस्रशः ॥ 82.53 ॥
niśvasānmumuce yāṁśca yudhyamānā raṇe ’mbikā ta eva sadyaḥ sambhūtā gaṇāḥ śatasahasraśaḥ
युद्ध करते हुए अम्बिका ने जो-जो निःश्वास छोड़े, उन्हीं से तत्क्षण सैकड़ों-हज़ारों गणों की उत्पत्ति हुई।
श्लोक 54 (markandeya.82.54)
युयुधुस्ते परशुभिर्भिन्दिपालासिपट्टिशैः । नाशयन्तोऽसुरगणान् देवीशक्त्युपबृंहिताः ॥ 82.54 ॥
yuyudhuste paraśubhirbhindipālāsipaṭṭiśaiḥ nāśayanto ’suragaṇān devīśaktyupabṛṁhitāḥ
देवी की शक्ति से बलशाली बने वे गण फरसों, भिन्दिपालों, खड्गों तथा पट्टिशों से युद्ध करते हुए असुर-समूहों का विनाश करने लगे।
श्लोक 55 (markandeya.82.55)
अवादयन्त पटहान् गणाः शङ्खांस्तथापरे । मृदङ्गांश्च तथैवान्ये तस्मिन् युद्धमहोत्सवे ॥ 82.55 ॥
avādayanta paṭahān gaṇāḥ śaṅkhāṁstathāpare mṛdaṅgāṁśca tathaivānye tasmin yuddhamahotsave
उस युद्धोत्सव में कुछ गण नगाड़े बजाने लगे, कुछ शंख, और कुछ अन्य मृदंग भी बजाने लगे।
श्लोक 56 (markandeya.82.56)
ततो देवी त्रिशूलेन गदया शक्तिवृष्टिभिः । शड्गादिभिश्च शतशो निजघान महासुरान् ॥ 82.56 ॥
tato devī triśūlena gadayā śaktivṛṣṭibhiḥ śaḍgādibhiśca śataśo nijaghāna mahāsurān
तब देवी ने त्रिशूल, गदा, शक्तियों की वर्षा तथा खड्ग आदि से सैकड़ों महासुरों का संहार कर डाला।
श्लोक 57 (markandeya.82.57)
पातयामास चैवान्यान् घण्टास्वनविमोहितान् । असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् ॥ 82.57 ॥
pātayāmāsa caivānyān ghaṇṭāsvanavimohitān asurān bhuvi pāśena baddhvā cānyānakarṣayat
घण्टा-ध्वनि से मोहित हुए अन्य असुरों को भी उसने गिरा दिया, तथा कुछ को पाश से बाँधकर भूमि पर घसीट लिया।
श्लोक 58 (markandeya.82.58)
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्णैः खड्गपातैस्तथापरे । विपोथिता निपातेन गदया भुवि शेरते ॥ 82.58 ॥
kecid dvidhā kṛtāstīkṣṇaiḥ khaḍgapātaistathāpare vipothitā nipātena gadayā bhuvi śerate
कुछ असुर तीक्ष्ण खड्ग-प्रहारों से दो टुकड़े कर दिए गए; कुछ गदा के आघात से चूर-चूर होकर भूमि पर पड़ गए।
श्लोक 59 (markandeya.82.59)
वेमुश्च केचिद्रुधिरं मुसले भृशं हताः । केचिन्नपातिता भूमौ भिन्नाः शूलेन वक्षसि ॥ 82.59 ॥
vemuśca kecidrudhiraṁ musale bhṛśaṁ hatāḥ kecinnapātitā bhūmau bhinnāḥ śūlena vakṣasi
मूसल की प्रबल चोट खाकर कुछ असुर रक्त उगलने लगे; कुछ त्रिशूल से वक्षःस्थल भिन्न होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 60 (markandeya.82.60)
निरन्तराः शरौघेण कृताः केचिद्रणाजिरे । शैलानुकारिणः प्राणान् मुमुचुस्त्रिदशार्दनाः ॥ 82.60 ॥
nirantarāḥ śaraugheṇa kṛtāḥ kecidraṇājire śailānukāriṇaḥ prāṇān mumucustridaśārdanāḥ
कुछ असुर, बाणों की झड़ी से आद्योपान्त बिंधकर, पर्वतों के समान रणभूमि में प्राणहीन हो गए — वे देवताओं के सतानेवाले वहीं अपने प्राण त्याग बैठे।
श्लोक 61 (markandeya.82.61)
केषाञ्चिद्वाहवश्छिन्नाश्छिन्नग्रीवास्तथापरे । शिरांसि पेतुरन्येषामन्ये मध्ये विदारिताः ॥ 82.61 ॥
keṣāñcidvāhavaśchinnāśchinnagrīvāstathāpare śirāṁsi peturanyeṣāmanye madhye vidāritāḥ
किन्हीं की भुजाएँ कट गईं, किन्हीं की ग्रीवाएँ; किन्हीं के सिर गिर पड़े, तो किन्हीं के शरीर बीच से ही विदीर्ण हो गए।
श्लोक 62 (markandeya.82.62)
विच्छिन्नजङ्घास्त्वपरे पेतुरुर्व्यां महासुराः । एकबाह्वक्षिचरणाः केचिद्देव्या द्विधा कृताः ॥ 82.62 ॥
vicchinnajaṅghāstvapare petururvyāṁ mahāsurāḥ ekabāhvakṣicaraṇāḥ keciddevyā dvidhā kṛtāḥ
कुछ महासुर, जिनकी जंघाएँ कट चुकी थीं, भूमि पर गिर पड़े; कुछ, जो केवल एक भुजा, एक नेत्र और एक चरण से शेष रह गए थे, देवी द्वारा दो भागों में काट दिए गए।
श्लोक 63 (markandeya.82.63)
छिन्नेऽपि चान्ये शिरसि पतिताः पुनरुत्थिताः । कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः ॥ 82.63 ॥
chinne ’pi cānye śirasi patitāḥ punarutthitāḥ kabandhā yuyudhurdevyā gṛhītaparamāyudhāḥ
और कुछ, सिर कट जाने पर भी, पुनः उठ खड़े हुए — धड़मात्र रह जाने पर भी वे अपने श्रेष्ठ आयुध थामे देवी से युद्ध करते रहे।
श्लोक 64 (markandeya.82.64)
ननृतुश्चापरे तत्र युद्धे तूर्यलयाश्रिताः । कबन्धाश्छिन्नखिरसः खड्ग-शक्त्यृष्टिपाणयः ॥ 82.64 ॥
nanṛtuścāpare tatra yuddhe tūryalayāśritāḥ kabandhāśchinnakhirasaḥ khaḍga-śaktyṛṣṭipāṇayaḥ
कुछ धड़ वहाँ युद्ध-वाद्यों की लय पर, सिर कटे हुए भी, हाथों में खड्ग, शक्ति और ऋष्टि लिए नाचने लगे।
श्लोक 65 (markandeya.82.65)
तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः। रुधिरौघविलुप्ताङ्गाः संग्रामे लोमहर्षणे ॥ 82.65 ॥
tiṣṭha tiṣṭheti bhāṣanto devīmanye mahāsurāḥ rudhiraughaviluptāṅgāḥ saṁgrāme lomaharṣaṇe
रक्त की धाराओं में अंग-भंग हुए कुछ अन्य महासुर उस रोंगटे खड़े कर देनेवाले संग्राम में देवी से चिल्लाकर कहने लगे — "ठहरो, ठहरो!"
श्लोक 66 (markandeya.82.66)
पातितै रथनागाश्वैरसुरैश्च वसुन्धरा । अगम्या साभवत् तत्र यत्राभूत् स महारणः ॥ 82.66 ॥
pātitai rathanāgāśvairasuraiśca vasundharā agamyā sābhavat tatra yatrābhūt sa mahāraṇaḥ
जहाँ वह महासंग्राम हुआ था, वहाँ गिरे हुए रथों, हाथियों, घोड़ों और असुरों से पृथ्वी दुर्गम्य हो गई।
श्लोक 67 (markandeya.82.67)
शोणितौघा महानद्यः सद्यस्तत्र विसुस्त्रुवुः । मध्ये चासुरसैन्यस्य वारणासुरवाजिनाम् ॥ 82.67 ॥
śoṇitaughā mahānadyaḥ sadyastatra visustruvuḥ madhye cāsurasainyasya vāraṇāsuravājinām
असुर-सेना के हाथियों, असुरों और घोड़ों के मध्य वहाँ तत्क्षण रक्त की महानदियाँ बह चलीं।
श्लोक 68 (markandeya.82.68)
क्षणेन तन्महासैन्यमसुराणां तथाम्बिका । निन्ये क्षयं यथा वह्निस्तृणदारुमहाचयम् ॥ 82.68 ॥
kṣaṇena tanmahāsainyamasurāṇāṁ tathāmbikā ninye kṣayaṁ yathā vahnistṛṇadārumahācayam
अम्बिका ने उस असुरों की महासेना को क्षणभर में उसी प्रकार नष्ट कर डाला, जैसे अग्नि तृण-काष्ठ के विशाल ढेर को भस्म कर देती है।
श्लोक 69 (markandeya.82.69)
स च सिंहो महानादमुत्सृजन् धुतकेसरः । शरीरेभ्योऽमरारीणामसूनिव विचिन्वति ॥ 82.69 ॥
sa ca siṁho mahānādamutsṛjan dhutakesaraḥ śarīrebhyo ’marārīṇāmasūniva vicinvati
और वह सिंह भी, अपनी अयाल फैलाकर महागर्जना करता हुआ, मानो देवताओं के शत्रुओं के शरीरों से उनके प्राण ही बटोर रहा हो।
श्लोक 70 (markandeya.82.70)
देव्या गणैश्च तैस्तत्र कृतं युद्धं तथासुरैः । यथैषां तुतुषुर्देवाः पुष्पवृष्टिमुचो दिवि ॥ 82.70 ॥
devyā gaṇaiśca taistatra kṛtaṁ yuddhaṁ tathāsuraiḥ yathaiṣāṁ tutuṣurdevāḥ puṣpavṛṣṭimuco divi
देवी और उसके उन गणों ने असुरों के साथ वहाँ ऐसा युद्ध किया कि उससे प्रसन्न होकर देवता आकाश से पुष्पों की वर्षा करने लगे।