Skip to main content

सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 81

मधुकैटभ-वध

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82

श्लोक 1 (markandeya.81.1)

मार्कण्डेय उवाच सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः । निशामय तदुत्पत्तिं विस्तराद् गदतो मम ॥ 81.1 ॥

mārkaṇḍeya uvāca sāvarṇiḥ sūryatanayo yo manuḥ kathyate ’ṣṭamaḥ niśāmaya tadutpattiṁ vistarād gadato mama

मार्कण्डेय ने कहा — सुनो, मैं विस्तारपूर्वक उस आठवें मनु सावर्णि की उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ, जो सूर्य के पुत्र कहलाते हैं।

श्लोक 2 (markandeya.81.2)

महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः । स बभूव महाभागः सावर्णिस्तनयो रवेः ॥ 81.2 ॥

mahāmāyānubhāvena yathā manvantarādhipaḥ sa babhūva mahābhāgaḥ sāvarṇistanayo raveḥ

महामाया के प्रभाव से वह महाभाग्यशाली सावर्णि, जो सूर्य का पुत्र था, किस प्रकार एक मन्वन्तर का अधिपति बना, यह सुनो।

श्लोक 3 (markandeya.81.3)

स्वारोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्रवंशसमुद्भवः । सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षितिमण्डले ॥ 81.3 ॥

svārociṣe ’ntare pūrvaṁ caitravaṁśasamudbhavaḥ suratho nāma rājābhūt samaste kṣitimaṇḍale

पूर्वकाल में, स्वारोचिष मन्वन्तर में, चैत्रवंश में उत्पन्न सुरथ नामक एक राजा सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल का स्वामी था।

श्लोक 4 (markandeya.81.4)

तस्य पालयतः सम्यक् प्रजाः पुत्रानिवौरसान् । बभूवुः शत्रवो भूपाः कोलाविध्वंसिनस्तथा ॥ 81.4 ॥

tasya pālayataḥ samyak prajāḥ putrānivaurasān babhūvuḥ śatravo bhūpāḥ kolāvidhvaṁsinastathā

वह अपनी प्रजा का भलीभाँति पालन अपने ही पुत्रों के समान करता था, तथापि कोलाविध्वंसी नामक शत्रु राजा उसके विरुद्ध उठ खड़े हुए।

श्लोक 5 (markandeya.81.5)

तस्य तैरभवद् युद्धमतिप्रबलदण्डिनः । न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जितः ॥ 81.5 ॥

tasya tairabhavad yuddhamatiprabaladaṇḍinaḥ nyūnairapi sa tairyuddhe kolāvidhvaṁsibhirjitaḥ

अत्यन्त प्रबल सेनावाले उस राजा का उनसे युद्ध हुआ; संख्या में कम होते हुए भी उन कोलाविध्वंसियों ने उस युद्ध में उसे पराजित कर दिया।

श्लोक 6 (markandeya.81.6)

ततः स्वपुरमायातो निजदेशाधिपोऽभवत् । आक्रान्तः स महाभागस्तैस्तदा प्रबलारिभिः ॥ 81.6 ॥

tataḥ svapuramāyāto nijadeśādhipo ’bhavat ākrāntaḥ sa mahābhāgastaistadā prabalāribhiḥ

तब वह अपनी ही नगरी को लौट आया और नाम मात्र को अपने देश का स्वामी रह गया, क्योंकि वह महाभाग्यशाली राजा उन प्रबल शत्रुओं द्वारा तब तक पूर्णतः दबाया जा चुका था।

श्लोक 7 (markandeya.81.7)

अमात्यैर्बलिभिर्दुष्टैर्दुर्बलस्य दुरात्मभिः । कोषो बलञ्चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥ 81.7 ॥

amātyairbalibhirduṣṭairdurbalasya durātmabhiḥ koṣo balañcāpahṛtaṁ tatrāpi svapure tataḥ

अपनी ही नगरी में भी, उसके दुर्बल हो जाने का लाभ उठाकर, उसके ही दुष्ट और दुरात्मा प्रबल मन्त्रियों ने उसका कोष और सेना छीन ली।

श्लोक 8 (markandeya.81.8)

ततो मृगयाव्याजेन हृतस्वाम्यः स भूपतिः । एकाकी हयमारुह्य जगाम गहनं वनम् ॥ 81.8 ॥

tato mṛgayāvyājena hṛtasvāmyaḥ sa bhūpatiḥ ekākī hayamāruhya jagāma gahanaṁ vanam

तब राज्य-वैभव से वंचित वह राजा शिकार के बहाने अकेला ही घोड़े पर चढ़कर घने वन में चला गया।

श्लोक 9 (markandeya.81.9)

स तत्राश्रममद्राक्षीद् द्विजवर्यस्य मेधसः । प्रशान्तश्वापदाकीर्णं मुनिशिष्योपशोभितम् ॥ 81.9 ॥

sa tatrāśramamadrākṣīd dvijavaryasya medhasaḥ praśāntaśvāpadākīrṇaṁ muniśiṣyopaśobhitam

वहाँ उसने श्रेष्ठ ब्राह्मण मेधा मुनि का आश्रम देखा, जो शान्त वन्य-पशुओं से भरा हुआ था और मुनि के शिष्यों से सुशोभित था।

श्लोक 10 (markandeya.81.10)

तस्थौ कञ्चित् स कालञ्च मुनिना तेन सत्कृतः । इतश्चैतश्च विचरंस्तस्मिन् मुनिवराश्रमे ॥ 81.10 ॥

tasthau kañcit sa kālañca muninā tena satkṛtaḥ itaścaitaśca vicaraṁstasmin munivarāśrame

उस मुनि द्वारा सम्मानित होकर वह कुछ काल तक वहीं ठहरा और उस श्रेष्ठ मुनि के आश्रम में इधर-उधर विचरण करने लगा।

श्लोक 11 (markandeya.81.11)

सोऽचिन्तयत् तदा तत्र ममत्वाकृष्टचेतनः । मत्पूर्वैः पालितं पूर्वं मया हीनं पुरं हि तत् । मद्भृत्यैस्तैरसद्वृत्तैर्धर्मतः पाल्यते न वा ॥ 81.11 ॥

so ’cintayat tadā tatra mamatvākṛṣṭacetanaḥ matpūrvaiḥ pālitaṁ pūrvaṁ mayā hīnaṁ puraṁ hi tat madbhṛtyaistairasadvṛttairdharmataḥ pālyate na vā

वहाँ ममत्व से खिंचे हुए चित्तवाला वह तब यह सोचने लगा — "मेरे पूर्वजों द्वारा तथा पहले मेरे द्वारा पालित वह नगरी अब मेरे बिना है; क्या उसका पालन मेरे उन दुष्ट सेवकों द्वारा धर्मपूर्वक हो भी रहा है या नहीं,"

श्लोक 12 (markandeya.81.12)

न जाने स प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः । मम वैरिवशं यातः कान् भोगानुपलप्स्यते ॥ 81.12 ॥

na jāne sa pradhāno me śūrahastī sadāmadaḥ mama vairivaśaṁ yātaḥ kān bhogānupalapsyate

"मुझे नहीं मालूम कि मेरा वह प्रधान, सदा मदमस्त रहनेवाला वीर हाथी, अब मेरे शत्रु के वश में जाकर कैसे भोग पा रहा होगा।"

श्लोक 13 (markandeya.81.13)

ये ममानुगता नित्यं प्रसादधनभोजनैः । अनुवृत्तिं ध्रुवं तेऽद्य कुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ॥ 81.13 ॥

ye mamānugatā nityaṁ prasādadhanabhojanaiḥ anuvṛttiṁ dhruvaṁ te ’dya kurvantyanyamahībhṛtām

"जो लोग सदा मेरी कृपा, धन और भोजन से जुड़े रहकर मेरा अनुसरण करते थे, वे आज निश्चय ही किसी दूसरे राजा की सेवा में लगे होंगे।"

श्लोक 14 (markandeya.81.14)

असम्यग्व्ययशीलैस्तैः कुर्वद्भिः सततं व्ययम् । संचितः सोऽतिदुः खेन क्षयं कोशो गमिष्यति ॥ 81.14 ॥

asamyagvyayaśīlaistaiḥ kurvadbhiḥ satataṁ vyayam saṁcitaḥ so ’tiduḥ khena kṣayaṁ kośo gamiṣyati

"अत्यन्त कठिनाई से संचित वह मेरा कोष, अपव्ययी स्वभाव के उन सेवकों द्वारा निरन्तर व्यय किए जाने से निश्चय ही नष्ट हो जाएगा।"

श्लोक 15 (markandeya.81.15)

एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः । तत्र विप्राश्रमाभ्यासे वैश्यमेकं ददर्श सः ॥ 81.15 ॥

etaccānyacca satataṁ cintayāmāsa pārthivaḥ tatra viprāśramābhyāse vaiśyamekaṁ dadarśa saḥ

वह राजा निरन्तर इसी प्रकार की और भी अनेक बातों का चिन्तन करता रहा। वहीं, उस ब्राह्मण के आश्रम के निकट, उसने एक वैश्य को देखा।

श्लोक 16 (markandeya.81.16)

स पृष्टस्तेन कस्त्वं भोः हेतुश्चागमनेऽत्र कः । सशोक इव कस्मात्त्वं दुर्मना इव लक्ष्यसे ॥ 81.16 ॥

sa pṛṣṭastena kastvaṁ bhoḥ hetuścāgamane ’tra kaḥ saśoka iva kasmāttvaṁ durmanā iva lakṣyase

उसने उससे पूछा — "अरे, तुम कौन हो? यहाँ आने का क्या कारण है? तुम शोकयुक्त और उदास-मन से क्यों दिखाई देते हो?"

श्लोक 17 (markandeya.81.17)

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य भूपतेः प्रणयोदितम् । प्रत्युवाच स तं वैश्यः प्रश्रयावनतो नृपम् ॥ 81.17 ॥

ityākarṇya vacastasya bhūpateḥ praṇayoditam pratyuvāca sa taṁ vaiśyaḥ praśrayāvanato nṛpam

राजा के स्नेहपूर्ण वचन सुनकर, विनम्रतापूर्वक झुका हुआ वह वैश्य राजा को इस प्रकार उत्तर देने लगा।

श्लोक 18 (markandeya.81.18)

वैश्य उवाच समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले । पुत्रदारैर्निरस्तश्च धनलोभादसाधुभिः ॥ 81.18 ॥

vaiśya uvāca samādhirnāma vaiśyo ’hamutpanno dhanināṁ kule putradārairnirastaśca dhanalobhādasādhubhiḥ

वैश्य ने कहा — मैं समाधि नामक एक वैश्य हूँ, धनवानों के कुल में उत्पन्न; धन के लोभ से दुष्ट बने अपने ही पुत्रों और पत्नी ने मुझे निकाल दिया है।

श्लोक 19 (markandeya.81.19)

विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रैरादाय मे धनम् । वनमभ्यागतो दुः खी निरस्तश्चाप्तबन्धुभैः ॥ 81.19 ॥

vihīnaśca dhanairdāraiḥ putrairādāya me dhanam vanamabhyāgato duḥ khī nirastaścāptabandhubhaiḥ

धन और पत्नी से वंचित — मेरे पुत्रों ने ही मेरा धन हर लिया — और अपने ही विश्वस्त बन्धुओं द्वारा भी निकाला जाकर, मैं दुःखी होकर इस वन में आ गया हूँ।

श्लोक 20 (markandeya.81.20)

सोऽहं न वेद्मि पुत्राणां कुशलाकुशलात्मिकाम् । प्रवृत्तिं स्वजनानाञ्च दाराणाञ्चात्र संस्थितः ॥ 81.20 ॥

so ’haṁ na vedmi putrāṇāṁ kuśalākuśalātmikām pravṛttiṁ svajanānāñca dārāṇāñcātra saṁsthitaḥ

यहाँ रहते हुए मुझे अपने पुत्रों, स्वजनों और पत्नी का कुशल-अकुशल कुछ भी समाचार नहीं मिलता।

श्लोक 21 (markandeya.81.21)

किं नु तेषां गृहे क्षेममक्षेमं किं नु साम्प्रतम् । कथं ते किं नु सद्वृत्ताः दुर्वृत्ताः किं नु मे सुताः ॥ 81.21 ॥

kiṁ nu teṣāṁ gṛhe kṣemamakṣemaṁ kiṁ nu sāmpratam kathaṁ te kiṁ nu sadvṛttāḥ durvṛttāḥ kiṁ nu me sutāḥ

क्या उनके घर में अभी कुशल है या अकुशल? वे कैसे हैं? क्या मेरे पुत्र सदाचारी बने हुए हैं, या दुराचारी हो गए हैं?

श्लोक 22 (markandeya.81.22)

राजोवाच यैर्निरस्तो भवांल्लुब्धैः पुत्रदारादिभिर्धनैः । तेषु किं भवतः स्नेहमनुबध्नाति मानसम् ॥ 81.22 ॥

rājovāca yairnirasto bhavāṁllubdhaiḥ putradārādibhirdhanaiḥ teṣu kiṁ bhavataḥ snehamanubadhnāti mānasam

राजा ने कहा — जिन धन-लोभी पुत्रों, पत्नी आदि ने तुम्हें निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति तुम्हारा मन अब भी स्नेह से क्यों बँधा हुआ है?

श्लोक 23 (markandeya.81.23)

वैश्य उवाच एवमेतद्यथा प्राह भवानस्मद्गतं वचः । किं करोमि न बध्नाति मम निष्ठुरतां मनः ॥ 81.23 ॥

vaiśya uvāca evametadyathā prāha bhavānasmadgataṁ vacaḥ kiṁ karomi na badhnāti mama niṣṭhuratāṁ manaḥ

वैश्य ने कहा — आप जो कह रहे हैं, मेरे विषय में यह सत्य ही है; परन्तु मैं क्या करूँ, मेरा मन कठोर नहीं बन पाता।

श्लोक 24 (markandeya.81.24)

यैः सन्त्यज्य पितृस्नेहं धनलुब्धैर्निराकृतः । पतिस्वजनहार्दं च हार्दि तेष्वेव मे मनः ॥ 81.24 ॥

yaiḥ santyajya pitṛsnehaṁ dhanalubdhairnirākṛtaḥ patisvajanahārdaṁ ca hārdi teṣveva me manaḥ

जिन्होंने पितृ-स्नेह त्यागकर, धन के लोभ में मुझे त्याग दिया, उन्हीं पर — पति और स्वजन के नाते के प्रति — मेरे मन का स्नेह अब भी बना हुआ है।

श्लोक 25 (markandeya.81.25)

किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते । यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु ॥ 81.25 ॥

kimetannābhijānāmi jānannapi mahāmate yatpremapravaṇaṁ cittaṁ viguṇeṣvapi bandhuṣu

हे महामते! यह जानते हुए भी कि वे निर्गुण हैं, मेरा चित्त उन बन्धुओं के प्रति प्रेम से आकर्षित क्यों होता है — यह मैं नहीं समझ पाता।

श्लोक 26 (markandeya.81.26)

तेषां कृते मे निः श्वासो दौर्मनस्यं च जायते । करोमि किं यन्न मनस्तेष्वप्रीतिषु निष्ठुरम् ॥ 81.26 ॥

teṣāṁ kṛte me niḥ śvāso daurmanasyaṁ ca jāyate karomi kiṁ yanna manasteṣvaprītiṣu niṣṭhuram

उन्हीं के कारण मुझे निःश्वास और मानसिक खिन्नता होती है। जो मुझसे प्रीति नहीं रखते, उनके प्रति भी मेरा मन कठोर नहीं बन पाता — मैं क्या करूँ?

श्लोक 27 (markandeya.81.27)

मार्कण्डेय उवाच ततस्तौ सहितौ विप्र तं मुनिं समुपस्थितौ । समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः ॥ 81.27 ॥

mārkaṇḍeya uvāca tatastau sahitau vipra taṁ muniṁ samupasthitau samādhirnāma vaiśyo ’sau sa ca pārthivasattamaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — हे ब्राह्मण! तब वे दोनों — समाधि नामक वह वैश्य और वह श्रेष्ठ राजा — साथ-साथ उस मुनि के पास पहुँचे।

श्लोक 28 (markandeya.81.28)

कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् । उपविष्टौ कथाः काश्चिच्चक्रतुर्वैश्य-पार्थिवौ ॥ 81.28 ॥

kṛtvā tu tau yathānyāyaṁ yathārhaṁ tena saṁvidam upaviṣṭau kathāḥ kāściccakraturvaiśya-pārthivau

उन दोनों ने विधिपूर्वक और यथोचित रूप से मुनि से भेंट की; फिर बैठकर वह वैश्य और वह राजा परस्पर कुछ बातचीत करने लगे।

श्लोक 29 (markandeya.81.29)

राजौवाच भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छाम्येकं वदस्व तत् । दुः खाय यन्मे मनसः स्वचित्तायत्ततां विना ॥ 81.29 ॥

rājauvāca bhagavaṁstvāmahaṁ praṣṭumicchāmyekaṁ vadasva tat duḥ khāya yanme manasaḥ svacittāyattatāṁ vinā

राजा ने कहा — हे भगवन्! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ; कृपया वह मुझे बताइए — जो बात मेरे मन को दुःख देती है, मेरे अपने चित्त के वश में न होने के कारण।

श्लोक 30 (markandeya.81.30)

ममत्वं गतराज्यस्य राज्याङ्गेष्वखिलेष्वपि । जानतोऽपि यथाज्ञस्य किमेतन्मुनिसत्तम ॥ 81.30 ॥

mamatvaṁ gatarājyasya rājyāṅgeṣvakhileṣvapi jānato ’pi yathājñasya kimetanmunisattama

हे मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि राज्य मेरे हाथ से जा चुका है, मुझे अब भी अज्ञानी के समान उस राज्य और उसके समस्त अंगों में ममत्व क्यों बना हुआ है?

श्लोक 31 (markandeya.81.31)

अयं च निकृतः पुत्रैर्दारैर्भृत्यैस्तथोज्झितः । स्वजनेन च सन्त्यक्तस्तेषु हार्दे तथाप्यति ॥ 81.31 ॥

ayaṁ ca nikṛtaḥ putrairdārairbhṛtyaistathojjhitaḥ svajanena ca santyaktasteṣu hārde tathāpyati

और यह वैश्य भी — जो अपने ही पुत्रों से ठुकराया गया, पत्नी और सेवकों द्वारा त्यागा गया, अपने ही बन्धुओं द्वारा भी छोड़ा गया — फिर भी उन्हीं के प्रति इसका हृदय स्नेह से बँधा है।

श्लोक 32 (markandeya.81.32)

एवमेष तथाहं च द्वावप्यत्यन्तदुः खितौ । दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्टमानसौ ॥ 81.32 ॥

evameṣa tathāhaṁ ca dvāvapyatyantaduḥ khitau dṛṣṭadoṣe ’pi viṣaye mamatvākṛṣṭamānasau

इस प्रकार यह भी और मैं भी, दोनों अत्यन्त दुःखी होते हुए भी, जिस विषय के दोष प्रत्यक्ष देख चुके हैं, उसी में ममत्व से खिंचे हुए मन वाले बने हुए हैं।

श्लोक 33 (markandeya.81.33)

तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि । ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता ॥ 81.33 ॥

tatkimetanmahābhāga yanmoho jñāninorapi mamāsya ca bhavatyeṣā vivekāndhasya mūḍhatā

हे महाभाग! तो यह क्या है, जो ज्ञानी होते हुए भी हम दोनों को मोह घेर लेता है — यह विवेक को अन्धा कर देनेवाली मूढ़ता आखिर है क्या?

श्लोक 34 (markandeya.81.34)

ऋषिरुवाच ज्ञानमस्ति समस्तस्य जन्तोर्विषयगोचरे । विषयश्च महाभाग याति चैवं पृथक्-पृथक् ॥ 81.34 ॥

ṛṣiruvāca jñānamasti samastasya jantorviṣayagocare viṣayaśca mahābhāga yāti caivaṁ pṛthak-pṛthak

ऋषि (मेधा) ने कहा — हे महाभाग! प्रत्येक प्राणी को अपने-अपने विषय-क्षेत्र में ज्ञान होता है, और विषय भी इसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्राणियों में भिन्न-भिन्न रूप से विद्यमान रहता है।

श्लोक 35 (markandeya.81.35)

दिवान्धाः प्राणिनः केचिद् रात्रावन्धास्तथापरे । केचिद् दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ॥ 81.35 ॥

divāndhāḥ prāṇinaḥ kecid rātrāvandhāstathāpare kecid divā tathā rātrau prāṇinastulyadṛṣṭayaḥ

कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं, कुछ अन्य रात में अन्धे होते हैं; और कुछ प्राणियों की दृष्टि दिन और रात दोनों में समान रहती है।

श्लोक 36 (markandeya.81.36)

ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किन्तु ते न हि केवलम् । यतो हि ज्ञानिनः सर्वे पशु-पक्षि-मृगादयः ॥ 81.36 ॥

jñānino manujāḥ satyaṁ kintu te na hi kevalam yato hi jñāninaḥ sarve paśu-pakṣi-mṛgādayaḥ

यह सत्य है कि मनुष्य ज्ञानवान् होते हैं, परन्तु केवल वे ही नहीं — क्योंकि सभी पशु, पक्षी, मृग आदि भी ज्ञानसम्पन्न होते हैं।

श्लोक 37 (markandeya.81.37)

ज्ञानं च तन्मनुष्याणां यत् तेषां मृगृपक्षिणाम् । मनुष्याणां च यत्तेषां तुल्यमन्यत् तथोभयोः ॥ 81.37 ॥

jñānaṁ ca tanmanuṣyāṇāṁ yat teṣāṁ mṛgṛpakṣiṇām manuṣyāṇāṁ ca yatteṣāṁ tulyamanyat tathobhayoḥ

और मनुष्यों में जो ज्ञान है, वही उन मृगों और पक्षियों में भी है; तथा उन मृग-पक्षियों में जो ज्ञान है, वही मनुष्यों में भी है — शेष बातों में भी दोनों में समानता ही है।

श्लोक 38 (markandeya.81.38)

ज्ञानेऽपि सति पश्यैतान् पतङ्गाञ्छावचञ्चुषु । कणमोक्षादृतान् मोहात्पीड्यमानानपि क्षुधा ॥ 81.38 ॥

jñāne ’pi sati paśyaitān pataṅgāñchāvacañcuṣu kaṇamokṣādṛtān mohātpīḍyamānānapi kṣudhā

ज्ञान होते हुए भी देखो — ये पक्षी, स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी, मोहवश अपने बच्चों की चोंचों में दाना डालने में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 39 (markandeya.81.39)

मानुषा मनुजव्याघ्र साभिलाषाः सुतान् प्रति । लोभात् प्रत्युपकाराय नन्वेतान् किं न पश्यसि ॥ 81.39 ॥

mānuṣā manujavyāghra sābhilāṣāḥ sutān prati lobhāt pratyupakārāya nanvetān kiṁ na paśyasi

हे नरश्रेष्ठ! क्या तुम यह नहीं देखते कि मनुष्य भी इसी प्रकार अपने पुत्रों के प्रति स्नेहवश, लोभ से, बदले में उपकार पाने की इच्छा रखते हैं?

श्लोक 40 (markandeya.81.40)

तथापि ममतावर्ते मोहगर्ते निपातिताः । महामायाप्रभावेण संसारस्थितिकारिणा ॥ 81.40 ॥

tathāpi mamatāvarte mohagarte nipātitāḥ mahāmāyāprabhāveṇa saṁsārasthitikāriṇā

फिर भी, संसार की स्थिति बनाए रखनेवाली महामाया के प्रभाव से, सभी प्राणी ममत्व के भँवर में, मोह के गड्ढे में गिरा दिए जाते हैं।

श्लोक 41 (markandeya.81.41)

तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः । महामाया हरेश्चैतत् तथा संमोह्यते जगत् ॥ 81.41 ॥

tannātra vismayaḥ kāryo yoganidrā jagatpateḥ mahāmāyā hareścaitat tathā saṁmohyate jagat

अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए — यह जगत्पति (विष्णु) की योगनिद्रा है, यह हरि की महामाया है, और इसी के द्वारा जगत् इस प्रकार मोहित किया जाता है।

श्लोक 42 (markandeya.81.42)

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ 81.42 ॥

jñānināmapi cetāṁsi devī bhagavatī hi sā balādākṛṣya mohāya mahāmāyā prayacchati

वह भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है।

श्लोक 43 (markandeya.81.43)

तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् । सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ॥ 81.43 ॥

tayā visṛjyate viśvaṁ jagadetaccarācaram saiṣā prasannā varadā nṛṇāṁ bhavati muktaye

चराचर से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् उसी के द्वारा रचा जाता है; और वही, प्रसन्न होकर, मनुष्यों की मुक्ति का वरदान देनेवाली बनती है।

श्लोक 44 (markandeya.81.44)

सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी । संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ 81.44 ॥

sā vidyā paramā mukterhetubhūtā sanātanī saṁsārabandhahetuśca saiva sarveśvareśvarī

वह सनातन विद्या है, जो मुक्ति का परम कारण है; और वही संसार-बन्धन का भी कारण है — वही समस्त ईश्वरों की भी ईश्वरी है।

श्लोक 45 (markandeya.81.45)

राजोवाच भगवन् ! का हि सा देवी महामायेति यां भवान् । ब्रवीति कथमुत्पन्ना सा कर्मास्याश्च किं द्विज ॥ 81.45 ॥

rājovāca bhagavan ! kā hi sā devī mahāmāyeti yāṁ bhavān bravīti kathamutpannā sā karmāsyāśca kiṁ dvija

राजा ने कहा — हे भगवन्! जिसे आप महामाया कहते हैं, वह देवी कौन है? हे द्विज! वह कैसे उत्पन्न हुई, और उसका कार्य क्या है?

श्लोक 46 (markandeya.81.46)

यत्स्वभावा च सा देवी यत्स्वरूपा यदुद्भवा । तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर ॥ 81.46 ॥

yatsvabhāvā ca sā devī yatsvarūpā yadudbhavā tat sarvaṁ śrotumicchāmi tvatto brahmavidāṁ vara

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! वह देवी किस स्वभाव की है, किस रूप की है, और किससे उत्पन्न हुई है — यह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 47 (markandeya.81.47)

ऋषिरुवाच नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिदं ततम् । तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रुयतां मम ॥ 81.47 ॥

ṛṣiruvāca nityaiva sā jaganmūrtistayā sarvamidaṁ tatam tathāpi tatsamutpattirbahudhā śruyatāṁ mama

ऋषि ने कहा — वह तो नित्य ही जगत्-स्वरूपा है, उसी से यह सब कुछ व्याप्त है; तथापि उसकी उत्पत्ति की अनेक कथाएँ हैं, वे मुझसे सुनो।

श्लोक 48 (markandeya.81.48)

देवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा । उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते ॥ 81.48 ॥

devānāṁ kāryasiddhyarthamāvirbhavati sā yadā utpanneti tadā loke sā nityāpyabhidhīyate

जब वह देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए प्रकट होती है, तब लोक में वह — नित्य होते हुए भी — "उत्पन्न" कही जाती है।

श्लोक 49 (markandeya.81.49)

योगनिद्रां यदा विष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते । आस्तीर्य शेषमभजत् कल्पान्ते भगवान् प्रभुः ॥ 81.49 ॥

yoganidrāṁ yadā viṣṇurjagatyekārṇavīkṛte āstīrya śeṣamabhajat kalpānte bhagavān prabhuḥ

कल्प के अन्त में, जब सम्पूर्ण जगत् एक ही समुद्र बन गया था, भगवान् विष्णु शेषनाग को बिछाकर योगनिद्रा में लीन हुए।

श्लोक 50 (markandeya.81.50)

तदा द्वावसुरौ घोरौ विख्यातौ मधुकैटभौ । विष्णुकर्णमलोद्भूतौ हन्तुं ब्रह्माणमुद्यतौ ॥ 81.50 ॥

tadā dvāvasurau ghorau vikhyātau madhukaiṭabhau viṣṇukarṇamalodbhūtau hantuṁ brahmāṇamudyatau

उसी समय विष्णु के कर्ण-मल से उत्पन्न, मधु और कैटभ नामक विख्यात दो भयंकर असुर, ब्रह्मा का वध करने के लिए उद्यत हो उठे।

श्लोक 51 (markandeya.81.51)

स नाभिकमले विष्णोः स्थितो ब्रह्मा प्रजापतिः । दृष्ट्वा तावसुरौ चोग्रौ प्रसुप्तं च जनार्दनम् ॥ 81.51 ॥

sa nābhikamale viṣṇoḥ sthito brahmā prajāpatiḥ dṛṣṭvā tāvasurau cograu prasuptaṁ ca janārdanam

विष्णु की नाभि-कमल पर स्थित प्रजापति ब्रह्मा ने उन दोनों भीषण असुरों को और सोए हुए जनार्दन को देखकर,

श्लोक 52 (markandeya.81.52)

तुष्टाव योगनिद्रां तामेकाग्रहृदयस्थितः । विबोधनार्थाय हरेर्हरिनेत्रकृतालयाम् ॥ 81.52 ॥

tuṣṭāva yoganidrāṁ tāmekāgrahṛdayasthitaḥ vibodhanārthāya harerharinetrakṛtālayām

एकाग्रचित्त होकर, हरि को जगाने के लिए, हरि के नेत्रों में निवास करनेवाली उस योगनिद्रा की स्तुति की।

श्लोक 53 (markandeya.81.53)

ब्रह्मोवाच विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थिति-संहारकारिणीम् । निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसः प्रभुः ॥ 81.53 ॥

brahmovāca viśveśvarīṁ jagaddhātrīṁ sthiti-saṁhārakāriṇīm nidrāṁ bhagavatīṁ viṣṇoratulāṁ tejasaḥ prabhuḥ

ब्रह्मा ने कहा — हे विश्व की ईश्वरी, जगत् की धारण करनेवाली, स्थिति और संहार करनेवाली, विष्णु की अनुपम तेजोमयी भगवती निद्रा,

श्लोक 54 (markandeya.81.54)

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कारः स्वरात्मिका । सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता ॥ 81.54 ॥

tvaṁ svāhā tvaṁ svadhā tvaṁ hi vaṣaṭkāraḥ svarātmikā sudhā tvamakṣare nitye tridhā mātrātmikā sthitā

तुम्हीं स्वाहा हो, तुम्हीं स्वधा हो, तुम्हीं वषट्कार, स्वररूपिणी हो; तुम्हीं अमृत हो; अविनाशी, नित्य, तीन मात्राओं से युक्त होकर तुम स्थित रहती हो।

श्लोक 55 (markandeya.81.55)

अर्धमात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः । त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा ॥ 81.55 ॥

ardhamātrā sthitā nityā yānuccāryā viśeṣataḥ tvameva sandhyā sāvitrī tvaṁ devi jananī parā

तुम्हीं वह नित्य अर्धमात्रा हो, जिसका विशेष रूप से उच्चारण किया जाता है; तुम्हीं सन्ध्या हो, सावित्री हो; हे देवी, तुम्हीं परम जननी हो।

श्लोक 56 (markandeya.81.56)

त्वयैव धार्यते सर्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत् । त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ 81.56 ॥

tvayaiva dhāryate sarvaṁ tvayaitatsṛjyate jagat tvayaitatpālyate devi tvamatsyante ca sarvadā

तुम्हीं से यह सब धारण किया जाता है, तुम्हीं से यह जगत् रचा जाता है; हे देवी, तुम्हीं से इसका पालन होता है, और तुम्हीं सदा इसे अन्त में निगल जाती हो।

श्लोक 57 (markandeya.81.57)

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने । तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये ॥ 81.57 ॥

visṛṣṭau sṛṣṭirūpā tvaṁ sthitirūpā ca pālane tathā saṁhṛtirūpānte jagato ’sya jaganmaye

सृष्टि के समय तुम सृष्टि-रूपा हो, पालन में स्थिति-रूपा; तथा इस जगत् के अन्त में, हे जगत्मयी, तुम संहार-रूपा हो।

श्लोक 58 (markandeya.81.58)

महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः । महामोहा च भवती महादेवी महेश्वरी ॥ 81.58 ॥

mahāvidyā mahāmāyā mahāmedhā mahāsmṛtiḥ mahāmohā ca bhavatī mahādevī maheśvarī

तुम महाविद्या, महामाया, महामेधा, महास्मृति हो; तुम महामोहा भी हो, महादेवी और महेश्वरी।

श्लोक 59 (markandeya.81.59)

प्रकृतिस्त्वञ्च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी । कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ॥ 81.59 ॥

prakṛtistvañca sarvasya guṇatrayavibhāvinī kālarātrirmahārātrirmoharātriśca dāruṇā

तुम सबकी प्रकृति हो, तीनों गुणों की प्रकट करनेवाली; तुम कालरात्रि, महारात्रि, और भयंकर मोहरात्रि हो।

श्लोक 60 (markandeya.81.60)

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा । लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्तिः क्षान्तिरेव च ॥ 81.60 ॥

tvaṁ śrīstvamīśvarī tvaṁ hrīstvaṁ buddhirbodhalakṣaṇā lajjā puṣṭistathā tuṣṭistvaṁ śāntiḥ kṣāntireva ca

तुम श्री हो, तुम ईश्वरी हो, तुम ह्री हो, तुम बोधस्वरूपा बुद्धि हो; तुम लज्जा, पुष्टि, तुष्टि हो; तुम शान्ति और क्षान्ति भी हो।

श्लोक 61 (markandeya.81.61)

खडिगनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा । शङ्खिनी चापिनी बाण-भुशुण्डी परिघायुधा ॥ 81.61 ॥

khaḍiganī śūlinī ghorā gadinī cakriṇī tathā śaṅkhinī cāpinī bāṇa-bhuśuṇḍī parighāyudhā

तुम भयंकर हो, खड्गधारिणी, शूलधारिणी; तुम गदाधारिणी और चक्रधारिणी भी हो; तुम शंख और धनुष धारण करनेवाली, बाण, भुशुण्डी और परिघ को अपने आयुध बनानेवाली हो।

श्लोक 62 (markandeya.81.62)

सौम्या सौम्यतराशेष-सौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी । परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी ॥ 81.62 ॥

saumyā saumyatarāśeṣa-saumyebhyastvatisundarī parāparāṇāṁ paramā tvameva parameśvarī

तुम सौम्य हो, समस्त सौम्य वस्तुओं से भी अधिक सौम्य, अत्यन्त सुन्दर हो; तुम्हीं परों और अपरों में परम, परमेश्वरी हो।

श्लोक 63 (markandeya.81.63)

यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके । तस्य सर्वस्य या शिक्तिः सा त्वं किं स्तूयते तदा ॥ 81.63 ॥

yacca kiñcit kvacidvastu sadasadvākhilātmike tasya sarvasya yā śiktiḥ sā tvaṁ kiṁ stūyate tadā

हे समस्त वस्तुओं में व्याप्त देवी! जो कुछ भी वस्तु, कहीं भी, सत् या असत् रूप में है, उस सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो — फिर तुम्हारी स्तुति कैसे हो सकती है?

श्लोक 64 (markandeya.81.64)

यया त्वया जगत्स्त्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत् । सोऽपि निद्रावशं नीतः कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः ॥ 81.64 ॥

yayā tvayā jagatstraṣṭā jagatpātyatti yo jagat so ’pi nidrāvaśaṁ nītaḥ kastvāṁ stotumiheśvaraḥ

जिस जगत् का स्रष्टा, पालक और संहारक है, उसे भी तुमने ही निद्रा के वश में कर रखा है — तो फिर तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ है?

श्लोक 65 (markandeya.81.65)

विष्णुः शरीरग्रहणमहामीशान एव च । कारितास्ते यतोऽतस्त्वां कः स्तोतुं शक्तिमान् भवेत् ॥ 81.65 ॥

viṣṇuḥ śarīragrahaṇamahāmīśāna eva ca kāritāste yato ’tastvāṁ kaḥ stotuṁ śaktimān bhavet

विष्णु, महान् ईश्वर शिव, और मैं स्वयं भी — तुमने ही हम सबको यह-यह शरीर धारण कराया है; तो फिर तुम्हारी स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है?

श्लोक 66 (markandeya.81.66)

सा त्वमित्थं प्रभावैः स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता । मोहयैतौ दुराधर्षावसुरो मधुकैटभौ ॥ 81.66 ॥

sā tvamitthaṁ prabhāvaiḥ svairudārairdevi saṁstutā mohayaitau durādharṣāvasuro madhukaiṭabhau

हे देवी! इस प्रकार अपने ही उदार प्रभावों से स्तुत हुई तुम, इन दुर्धर्ष असुरों — मधु और कैटभ — को मोहित करो।

श्लोक 67 (markandeya.81.67)

प्रबोधञ्च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु । बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ ॥ 81.67 ॥

prabodhañca jagatsvāmī nīyatāmacyuto laghu bodhaśca kriyatāmasya hantumetau mahāsurau

और जगत्स्वामी अच्युत को शीघ्र ही जागृति की ओर ले चलो; इन दोनों महासुरों के वध हेतु इन्हें जगाया जाए।

श्लोक 68 (markandeya.81.68)

ऋषिरुवाच एवं स्तुता तदा देवी तामसी तत्र वेधसा । विष्णोः प्रबोधनार्थाय निहन्तुं मधुकैटभौ ॥ 81.68 ॥

ṛṣiruvāca evaṁ stutā tadā devī tāmasī tatra vedhasā viṣṇoḥ prabodhanārthāya nihantuṁ madhukaiṭabhau

ऋषि ने कहा — इस प्रकार वहाँ विधाता (ब्रह्मा) द्वारा स्तुत हुई वह तामसी देवी, विष्णु को जगाने के लिए — जिससे वे मधु-कैटभ का वध कर सकें —

श्लोक 69 (markandeya.81.69)

नेत्रास्य-नासिका-बाहु-हृदयेभ्यस्तथोरसः । निर्गम्य दर्शने तस्थौ ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ 81.69 ॥

netrāsya-nāsikā-bāhu-hṛdayebhyastathorasaḥ nirgamya darśane tasthau brahmaṇo ’vyaktajanmanaḥ

विष्णु के नेत्रों, मुख, नासिका, भुजाओं, हृदय और वक्षःस्थल से निकलकर, अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के सामने प्रकट होकर खड़ी हो गई।

श्लोक 70 (markandeya.81.70)

उत्तस्थौ च जगन्नाथस्तया मुक्तो जनार्दनः । एकार्णवेऽहिशयनात् ततः स ददृशे च तौ ॥ 81.70 ॥

uttasthau ca jagannāthastayā mukto janārdanaḥ ekārṇave ’hiśayanāt tataḥ sa dadṛśe ca tau

उससे मुक्त होकर जगन्नाथ जनार्दन एक-समुद्र बने जगत् में शेषशय्या से उठ खड़े हुए, और तब उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा।

श्लोक 71 (markandeya.81.71)

मधुकैटभौ दुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमौ । क्रोधरक्तेक्षणावत्तुं ब्रह्माणं जनितोद्यमौ ॥ 81.71 ॥

madhukaiṭabhau durātmānāvativīryaparākramau krodharaktekṣaṇāvattuṁ brahmāṇaṁ janitodyamau

अत्यन्त बल-पराक्रमी, दुरात्मा मधु और कैटभ, क्रोध से लाल नेत्रोंवाले, ब्रह्मा को निगल जाने के लिए उद्यत हो गए।

श्लोक 72 (markandeya.81.72)

समुत्थाय ततस्ताभ्यां युयुधे भगवान् हरिः । पञ्चवर्षसहस्राणि बाहुप्रहरणो विभुः ॥ 81.72 ॥

samutthāya tatastābhyāṁ yuyudhe bhagavān hariḥ pañcavarṣasahasrāṇi bāhupraharaṇo vibhuḥ

तब समर्थ भगवान् हरि उठकर अपनी भुजाओं को ही अस्त्र बनाकर उन दोनों के साथ पाँच हज़ार वर्षों तक युद्ध करते रहे।

श्लोक 73 (markandeya.81.73)

तावप्यतिबलोन्मत्तौ महामायाविमोहितौ । उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम् ॥ 81.73 ॥

tāvapyatibalonmattau mahāmāyāvimohitau uktavantau varo ’smatto vriyatāmiti keśavam

अत्यधिक बल से उन्मत्त और महामाया से मोहित वे दोनों भी केशव से बोले — "हमसे कोई वर माँग लो।"

श्लोक 74 (markandeya.81.74)

भगवानुवाच भवेतामद्य मे तुष्टौ मम वध्यावुभावपि । किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम ॥ 81.74 ॥

bhagavānuvāca bhavetāmadya me tuṣṭau mama vadhyāvubhāvapi kimanyena vareṇātra etāvaddhi vṛtaṁ mama

भगवान् ने कहा — यदि तुम दोनों वास्तव में मुझसे प्रसन्न हो, तो तुम दोनों ही आज मेरे हाथों वध्य बन जाओ — इसके अतिरिक्त और किस वर से क्या प्रयोजन? मैंने तो यही वर चुना है।

श्लोक 75 (markandeya.81.75)

ऋषिरुवाच वञ्चिताभ्यामिति तदा सर्वमापोमयं जगत् । विलोक्यं ताभ्यां गदितो भगवान् कमलेक्षणः ॥ 81.75 ॥

ṛṣiruvāca vañcitābhyāmiti tadā sarvamāpomayaṁ jagat vilokyaṁ tābhyāṁ gadito bhagavān kamalekṣaṇaḥ

ऋषि ने कहा — इस प्रकार छले गए वे दोनों, सम्पूर्ण जगत् को जलमय देखकर, कमलनयन भगवान् से बोले —

श्लोक 76 (markandeya.81.76)

आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता । प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः ॥ 81.76 ॥

āvāṁ jahi na yatrorvī salilena pariplutā prītau svastava yuddhena ślāghyastvaṁ mṛtyurāvayoḥ

"हमें वहाँ मारो, जहाँ पृथ्वी जल से आप्लावित न हो! हम तुम्हारे युद्ध से प्रसन्न हैं; तुम प्रशंसनीय हो — हम दोनों की मृत्यु तुम्हारे ही हाथों हो!"

श्लोक 77 (markandeya.81.77)

ऋषिरुवाच तथेत्युक्त्वा भगवता शङ्ख-चक्र-गदाभृता । कृत्वा चक्रेण वै च्छिन्ने जघने शिरसी तयोः ॥ 81.77 ॥

ṛṣiruvāca tathetyuktvā bhagavatā śaṅkha-cakra-gadābhṛtā kṛtvā cakreṇa vai cchinne jaghane śirasī tayoḥ

ऋषि ने कहा — "ऐसा ही हो" कहकर, शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् ने उन दोनों को अपनी ही जाँघों पर रखकर, अपने चक्र से उनके दोनों सिर काट डाले।

श्लोक 78 (markandeya.81.78)

एवमेषा समुत्पन्ना ब्रह्मणा संस्तुता स्वयम् । प्रभावमस्या देव्यास्तु भूयः शृणु वदामि ते ॥ 81.78 ॥

evameṣā samutpannā brahmaṇā saṁstutā svayam prabhāvamasyā devyāstu bhūyaḥ śṛṇu vadāmi te

इस प्रकार यह देवी उत्पन्न हुई, स्वयं ब्रह्मा द्वारा स्तुत हुई। अब इस देवी का प्रभाव आगे भी सुनो, जो मैं तुमसे कहता हूँ।

अध्याय 80अध्याय-सूचीअध्याय 82