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सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 80

भावी मन्वन्तरों का वर्णन

अध्याय 79अध्याय-सूचीअध्याय 81

श्लोक 1 (markandeya.80.1)

क्रौष्टुकिरुवाच स्वायम्भुवाद्याः कथिताः सप्तैते मनवो मम । तदन्तरेषु ये देवा राजानो मुनयस्तथा ॥ 80.1 ॥

krauṣṭukiruvāca svāyambhuvādyāḥ kathitāḥ saptaite manavo mama tadantareṣu ye devā rājāno munayastathā

क्रौष्टुकि ने कहा — "आपने मुझे स्वायम्भुव आदि इन सात मनुओं का, तथा उनके अन्तरों में हुए देवों, राजाओं और ऋषियों का वर्णन किया है।"

श्लोक 2 (markandeya.80.2)

अस्मिन् कल्पे सप्त येऽन्ये भविष्यन्ति महामुने । मनवस्तान् समाचक्ष्व ये च देवादयश्च ये ॥ 80.2 ॥

asmin kalpe sapta ye 'nye bhaviṣyanti mahāmune manavastān samācakṣva ye ca devādayaśca ye

"अब, हे महामुने, इस कल्प में जो अन्य सात मनु होने वाले हैं, उन्हें, तथा उनके देवादि को भी मुझे बताइए।"

श्लोक 3 (markandeya.80.3)

मार्कण्डेय उवाच कथितस्तव सावर्णिश्छायासंज्ञासुतश्च यः । पूर्वजस्य मनोस्तुल्यः स मनुर्भविताष्टमः ॥ 80.3 ॥

mārkaṇḍeya uvāca kathitastava sāvarṇiśchāyāsaṁjñāsutaśca yaḥ pūrvajasya manostulyaḥ sa manurbhavitāṣṭamaḥ

मार्कण्डेय ने कहा — "तुम्हें छाया-संज्ञा के पुत्र सावर्णि के विषय में पहले ही बताया जा चुका है, जो पूर्व मनु के समान है — वही आठवें मनु होंगे।"

श्लोक 4 (markandeya.80.4)

रामो व्यासो गालवश्च दीप्तिमान् कृप एव च । ऋष्यशृङ्गस्तथा द्रोणस्तत्र सप्तर्षयोऽभवन् ॥ 80.4 ॥

rāmo vyāso gālavaśca dīptimān kṛpa eva ca ṛṣyaśṛṅgastathā droṇastatra saptarṣayo 'bhavan

"राम, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, कृप, ऋष्यशृंग और द्रोण — उस युग में ये सप्तर्षि होंगे।"

श्लोक 5 (markandeya.80.5)

सुतपाश्चामिताभाश्च मुख्याश्चैव त्रिधा सुराः । विंशकः कथिताश्चैषां त्रयाणां त्रिगुणो गणः ॥ 80.5 ॥

sutapāścāmitābhāśca mukhyāścaiva tridhā surāḥ viṁśakaḥ kathitāścaiṣāṁ trayāṇāṁ triguṇo gaṇaḥ

"सुतपा, अमिताभ और मुख्य — ये तीन प्रकार के देव होंगे। इन तीनों में से प्रत्येक के बीस देव कहे गए हैं, अर्थात् कुल साठ।"

श्लोक 6 (markandeya.80.6)

तपस्तप्तश्च शक्रश्च द्युतिर्ज्योतिः प्रभाकरः । प्रभासो दयितो धर्मस्तेजोरश्मिश्चिरक्रतुः ॥ 80.6 ॥

tapastaptaśca śakraśca dyutirjyotiḥ prabhākaraḥ prabhāso dayito dharmastejoraśmiścirakratuḥ

"तपस्तप्त, शक्र, द्युति, ज्योति, प्रभाकर, प्रभास, दयित, धर्म, तेजोरश्मि, चिरक्रतु —"

श्लोक 7 (markandeya.80.7)

इत्यादिकस्तु सुतपा देवानां विंशको गणः । प्रभुर्विभुर्विभासाद्यस्तथान्यो विंशको गणः ॥ 80.7 ॥

ityādikastu sutapā devānāṁ viṁśako gaṇaḥ prabhurvibhurvibhāsādyastathānyo viṁśako gaṇaḥ

"ये आदि रूप से सुतपा नामक बीस देवों का समूह है। प्रभु, विभु, विभास आदि दूसरा बीस देवों का समूह है।"

श्लोक 8 (markandeya.80.8)

सुराणाममिताभानां तृतीयमपि मे शृणु । दमो दान्तो ऋतः सोमो वित्ताद्याश्चैव विंशतिः ॥ 80.8 ॥

surāṇāmamitābhānāṁ tṛtīyamapi me śṛṇu damo dānto ṛtaḥ somo vittādyāścaiva viṁśatiḥ

"अमिताभ नामक देवों के तीसरे समूह को भी मुझसे सुनो — दम, दान्त, ऋत, सोम, वित्त आदि बीस देव।"

श्लोक 9 (markandeya.80.9)

मुख्या ह्येते समाख्याता देवा मन्वन्तराधिपाः । मारीचस्यैव ते पुत्राः कश्यपस्य प्रजापतेः ॥ 80.9 ॥

mukhyā hyete samākhyātā devā manvantarādhipāḥ mārīcasyaiva te putrāḥ kaśyapasya prajāpateḥ

"ये सभी मुख्य देव, उस मन्वन्तर के अधिपति कहे गए हैं। ये सभी प्रजापति कश्यप के, मारीच-वंश के पुत्र हैं।"

श्लोक 10 (markandeya.80.10)

भविष्याश्च भविष्यन्ति सावर्णस्यान्तरे मनोः । तेषामिन्द्रो भविष्यस्तु बलिर्वैरोचनिर्मुने ॥ 80.10 ॥

bhaviṣyāśca bhaviṣyanti sāvarṇasyāntare manoḥ teṣāmindro bhaviṣyastu balirvairocanirmune

"ये भावी देव सावर्णि मनु के अन्तर में उत्पन्न होंगे। हे मुने, उनका इन्द्र विरोचन-पुत्र बलि होगा।"

श्लोक 11 (markandeya.80.11)

पाताल आस्ते योऽद्यापि दैत्यः समयबन्धनः । विरजाश्चार्ववीरश्च निर्मोहः सत्यवाक् कृतिः । विष्ण्वाद्याश्चैव तनयाः सावर्णस्य मनोर्नृपाः ॥ 80.11 ॥

pātāla āste yo 'dyāpi daityaḥ samayabandhanaḥ virajāścārvavīraśca nirmohaḥ satyavāk kṛtiḥ viṣṇvādyāścaiva tanayāḥ sāvarṇasya manornṛpāḥ

"वह दैत्य जो आज भी प्रतिज्ञा-बद्ध होकर पाताल में निवास कर रहा है। विरजा, अर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति, विष्णु आदि सावर्णि मनु के राजपुत्र होंगे।"

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