सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 94
रौच्य-वर्णन
श्लोक 1 (markandeya.94.1)
मार्कण्डेय उवाच सावर्णिकमिदं सम्यक्प्रोक्तं मन्वन्तरं तव । तथैव देवीमाहात्म्ये महिषासुरघातनम् ॥ 94.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca sāvarṇikamidaṁ samyakproktaṁ manvantaraṁ tava tathaiva devīmāhātmye mahiṣāsuraghātanam
इस प्रकार सावर्णिक मन्वन्तर तुम्हें भलीभाँति कहा जा चुका, और इसी प्रकार देवीमाहात्म्य में महिषासुर का वध भी कहा जा चुका है।
श्लोक 2 (markandeya.94.2)
उत्पत्तयश्च या देव्या मातॄणां च महाहवे । तथैव सम्भवो देव्याश्चामुण्डाया यथा भवः ॥ 94.2 ॥
utpattayaśca yā devyā mātṝṇāṁ ca mahāhave tathaiva sambhavo devyāścāmuṇḍāyā yathā bhavaḥ
देवी की उत्पत्ति, महासंग्राम में मातृकाओं की उत्पत्ति, तथा देवी का चामुण्डा के रूप में प्रादुर्भाव भी उसी प्रकार बताया जा चुका है।
श्लोक 3 (markandeya.94.3)
शिवदूत्याश्च माहात्म्यं वधः शुम्भनिशुम्भयोः । रक्तबीजवधश्चैव सर्वमेतत्तवोदितम् ॥ 94.3 ॥
śivadūtyāśca māhātmyaṁ vadhaḥ śumbhaniśumbhayoḥ raktabījavadhaścaiva sarvametattavoditam
शिवदूती का माहात्म्य, शुम्भ-निशुम्भ का वध, तथा रक्तबीज का वध — यह सब तुम्हें कह दिया गया है।
श्लोक 4 (markandeya.94.4)
श्रूयतां मुनिशार्दूल सावर्णिकमथापरम् । दत्तपुत्रश्च सावर्णिर्भावी यो नवमो मनुः ॥ 94.4 ॥
śrūyatāṁ muniśārdūla sāvarṇikamathāparam dattaputraśca sāvarṇirbhāvī yo navamo manuḥ
हे मुनिश्रेष्ठ! अब एक और सावर्णिक वृत्तान्त सुनो — दत्त के पुत्र सावर्णि, जो भावी नवम मनु होंगे।
श्लोक 5 (markandeya.94.5)
कथयामि मनोस्तस्य ये देवा मुनयो नृपाः । पारा मरीचिभर्गाश्च सुधर्माणस्तथा सुराः ॥ 94.5 ॥
kathayāmi manostasya ye devā munayo nṛpāḥ pārā marīcibhargāśca sudharmāṇastathā surāḥ
उस मनु के जो देवता, मुनि और राजा होंगे, वे मैं बताता हूँ — देवताओं में पार, मरीचिगर्भ तथा सुधर्मा नामक गण होंगे।
श्लोक 6 (markandeya.94.6)
एते त्रिधा भविष्यन्ति सर्वे द्वादशका गणाः । तेषामिन्द्रो भविष्यस्तु सहस्राक्षो महाबलः ॥ 94.6 ॥
ete tridhā bhaviṣyanti sarve dvādaśakā gaṇāḥ teṣāmindro bhaviṣyastu sahasrākṣo mahābalaḥ
ये सब तीन प्रकार के होंगे, और प्रत्येक गण बारह-बारह देवताओं का होगा; उनके इन्द्र महाबली सहस्राक्ष नामक होंगे।
श्लोक 7 (markandeya.94.7)
साम्प्रतं कार्तिकेयो यो वह्निपुत्रः षडाननः । अद्भुतो नाम शक्रोऽसौ भावी तस्यान्तरे मनोः ॥ 94.7 ॥
sāmprataṁ kārtikeyo yo vahniputraḥ ṣaḍānanaḥ adbhuto nāma śakro 'sau bhāvī tasyāntare manoḥ
जो अभी अग्निपुत्र षडानन कार्तिकेय हैं, वे ही उस मन्वन्तर में अद्भुत नामक शक्र (इन्द्र) होंगे।
श्लोक 8 (markandeya.94.8)
मेधातिथिर्वसुः सत्यो ज्योतिष्मान्द्युतिमांस्तथा । सप्तर्षयोऽन्यः सबलस्तथान्यो हव्यवाहनः ॥ 94.8 ॥
medhātithirvasuḥ satyo jyotiṣmāndyutimāṁstathā saptarṣayo 'nyaḥ sabalastathānyo havyavāhanaḥ
मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान् तथा द्युतिमान्, एक अन्य सबल नामक, और एक अन्य हव्यवाहन — ये सप्तर्षि होंगे।
श्लोक 9 (markandeya.94.9)
धृष्टकेतुर्बर्हकेतुः खड्गहस्तो निरामयः । पृथुश्रवास्तथार्चिष्मान्भूरिद्युम्नो बृहद्भयः ॥ 94.9 ॥
dhṛṣṭaketurbarhaketuḥ khaḍgahasto nirāmayaḥ pṛthuśravāstathārciṣmānbhūridyumno bṛhadbhayaḥ
धृष्टकेतु, बर्हकेतु, खड्गहस्त, निरामय, पृथुश्रवा, अर्चिष्मान्, भूरिद्युम्न तथा बृहद्भय — ये सब उस दत्तपुत्र मनु के राजपुत्र होंगे।
श्लोक 10 (markandeya.94.10)
एते नृपसुतास्तस्य दत्तपुत्रस्य वै नृपाः । मनोस्तु दशमस्यान्यच्छृणु मन्वन्तरं द्विज ॥ 94.10 ॥
ete nṛpasutāstasya dattaputrasya vai nṛpāḥ manostu daśamasyānyacchṛṇu manvantaraṁ dvija
ये उस दत्तपुत्र मनु के राजपुत्र अर्थात् राजा होंगे। अब हे द्विज! दसवें मन्वन्तर का वृत्तान्त सुनो।
श्लोक 11 (markandeya.94.11)
मन्वन्तरे च दशमे ब्रह्मपुत्रस्य धीमतः । सुखासीना निरुद्धाश्च द्विप्रकाराः सुराः स्मृताः ॥ 94.11 ॥
manvantare ca daśame brahmaputrasya dhīmataḥ sukhāsīnā niruddhāśca dviprakārāḥ surāḥ smṛtāḥ
दसवें मन्वन्तर में बुद्धिमान् ब्रह्मपुत्र के देवता दो प्रकार के स्मरण किए गए हैं — सुखासीन तथा निरुद्ध।
श्लोक 12 (markandeya.94.12)
शतसंख्या हि ते देवा भविष्या भाविनो मनोः । यत्पुत्राणां शतं भावि तद्देवानां तदा शतम् ॥ 94.12 ॥
śatasaṁkhyā hi te devā bhaviṣyā bhāvino manoḥ yatputrāṇāṁ śataṁ bhāvi taddevānāṁ tadā śatam
उस भावी मनु के वे देवता संख्या में सौ होंगे; जैसे उसके पुत्र सौ होंगे, वैसे ही उस समय देवता भी सौ होंगे।
श्लोक 13 (markandeya.94.13)
शान्तिरिन्द्रस्तथा भावी सर्वैरिन्द्रगुणैर्युतः । सप्तर्षींस्तान्निबोध त्वं ये भविष्यन्ति वै तदा ॥ 94.13 ॥
śāntirindrastathā bhāvī sarvairindraguṇairyutaḥ saptarṣīṁstānnibodha tvaṁ ye bhaviṣyanti vai tadā
उस समय शान्ति नामक इन्द्र होंगे, जो इन्द्र के समस्त गुणों से युक्त होंगे; अब तुम उन सप्तर्षियों को भी जानो जो उस समय होंगे।
श्लोक 14 (markandeya.94.14)
आपोमूतिर्हविष्मांश्च सुकृती सत्य एव च । नाभागोऽप्रतिमश्चैव वासिष्ठश्चैव सप्तमः ॥ 94.14 ॥
āpomūtirhaviṣmāṁśca sukṛtī satya eva ca nābhāgo 'pratimaścaiva vāsiṣṭhaścaiva saptamaḥ
आपोमूर्ति, हविष्मान्, सुकृती और सत्य, नाभाग, अप्रतिम, तथा सातवें वासिष्ठ — ये सप्तर्षि होंगे।
श्लोक 15 (markandeya.94.15)
सुक्षेत्रश्चोत्तमौजाश्च भूरिषेणश्च वीर्यवान् । शतानीकोऽथ वृषभो ह्यनमित्रो जयद्रथः ॥ 94.15 ॥
sukṣetraścottamaujāśca bhūriṣeṇaśca vīryavān śatānīko 'tha vṛṣabho hyanamitro jayadrathaḥ
सुक्षेत्र, उत्तमौजा, बलवान् भूरिषेण, शतानीक, वृषभ, अनमित्र तथा जयद्रथ —
श्लोक 16 (markandeya.94.16)
भूरिद्युम्नः सुपर्वा च तस्यैते तनया मनोः । भविष्या धर्मपुत्रस्य सावर्णस्यान्तरं शृणु ॥ 94.16 ॥
bhūridyumnaḥ suparvā ca tasyaite tanayā manoḥ bhaviṣyā dharmaputrasya sāvarṇasyāntaraṁ śṛṇu
भूरिद्युम्न तथा सुपर्वा — ये सब उस मनु के पुत्र होंगे। अब धर्म के पुत्र भावी सावर्णि का मन्वन्तर सुनो।
श्लोक 17 (markandeya.94.17)
विहङ्गमाः कामगाश्च निर्माणरतयस्तथा । त्रिःप्रकारा भविष्यन्ति एकैकस्त्रिंशको गणः ॥ 94.17 ॥
vihaṅgamāḥ kāmagāśca nirmāṇaratayastathā triḥprakārā bhaviṣyanti ekaikastriṁśako gaṇaḥ
विहंगम, कामग तथा निर्माणरति — ये तीन प्रकार के देवगण होंगे, और एक-एक गण तीस-तीस देवताओं का होगा।
श्लोक 18 (markandeya.94.18)
मासर्तुदिवसा ये तु निर्माणपतयस्तु ते । विहङ्गमा रात्रयोऽथ मौहूर्त्ताः कामगा गणाः ॥ 94.18 ॥
māsartudivasā ye tu nirmāṇapatayastu te vihaṅgamā rātrayo 'tha mauhūrttāḥ kāmagā gaṇāḥ
जो निर्माणपति हैं, वे मास, ऋतु तथा दिनों की संख्या के अनुरूप होंगे; विहंगम रात्रियों के अनुरूप, और कामगण मुहूर्तों के अनुरूप होंगे।
श्लोक 19 (markandeya.94.19)
इन्द्रो वृषाख्यो भविता तेषां प्रख्यातविक्रमः । हविष्मांश्च वरिष्ठश्च ऋष्टिरन्यस्तथारुणिः ॥ 94.19 ॥
indro vṛṣākhyo bhavitā teṣāṁ prakhyātavikramaḥ haviṣmāṁśca variṣṭhaśca ṛṣṭiranyastathāruṇiḥ
उनके इन्द्र प्रख्यात पराक्रमी वृष नामक होंगे; सप्तर्षि होंगे — हविष्मान्, वरिष्ठ, ऋष्टि नामक अन्य, तथा आरुणि।
श्लोक 20 (markandeya.94.20)
निश्चरश्चानघश्चैव विष्टिश्चान्यो महामुनिः । सप्तर्षयोऽन्तरे तस्मिन्नग्नितेजाश्च सप्तमः ॥ 94.20 ॥
niścaraścānaghaścaiva viṣṭiścānyo mahāmuniḥ saptarṣayo 'ntare tasminnagnitejāśca saptamaḥ
निश्चर, अनघ, तथा एक अन्य महामुनि विष्टि — उस मन्वन्तर में सप्तर्षियों में सातवें अग्नितेजा होंगे।
श्लोक 21 (markandeya.94.21)
सर्वत्रगः सुशर्मा च देवानीकः पुरूद्वहः । हेमधन्वा दृढायुश्च भाविनस्तत्सुता नृपाः ॥ 94.21 ॥
sarvatragaḥ suśarmā ca devānīkaḥ purūdvahaḥ hemadhanvā dṛḍhāyuśca bhāvinastatsutā nṛpāḥ
सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानीक, पुरूद्वह, हेमधन्वा तथा दृढायु — ये उस मनु के भावी राजपुत्र होंगे।
श्लोक 22 (markandeya.94.22)
द्वादशे रुद्रपुत्रस्य प्राप्ते मन्वन्तरे मनोः । सावर्णाख्याश्च ये देवा मुनयश्च शृणुष्व तान् ॥ 94.22 ॥
dvādaśe rudraputrasya prāpte manvantare manoḥ sāvarṇākhyāśca ye devā munayaśca śṛṇuṣva tān
जब रुद्र के पुत्र मनु का बारहवाँ मन्वन्तर आएगा, तब सावर्ण नामक देवताओं तथा मुनियों को सुनो।
श्लोक 23 (markandeya.94.23)
सुधर्माणः सुमनसो हरितो रोहितस्तथा । सुवर्णाश्च सुरास्तत्र पञ्चैते दशका गणाः ॥ 94.23 ॥
sudharmāṇaḥ sumanaso harito rohitastathā suvarṇāśca surāstatra pañcaite daśakā gaṇāḥ
सुधर्मा, सुमनस्, हरित तथा रोहित, और सुवर्ण — वहाँ ये पाँच देवगण होंगे, प्रत्येक दस-दस देवताओं का।
श्लोक 24 (markandeya.94.24)
तेषामिन्द्रस्तु विज्ञेय ऋतधामा महाबलः । सर्वैरिन्द्रगुणैर्युक्ताः सप्तर्षीनपि मे शृणु ॥ 94.24 ॥
teṣāmindrastu vijñeya ṛtadhāmā mahābalaḥ sarvairindraguṇairyuktāḥ saptarṣīnapi me śṛṇu
उनके इन्द्र महाबली ऋतधामा जानने चाहिए, जो इन्द्र के समस्त गुणों से युक्त होंगे; अब मुझसे सप्तर्षियों को भी सुनो।
श्लोक 25 (markandeya.94.25)
द्युतिस्तपस्वी सुतपास्तपोमूर्तिस्तपोनिधिः । तपोरतिस्तथैवान्यः सप्तमस्तु तपोधृतिः ॥ 94.25 ॥
dyutistapasvī sutapāstapomūrtistaponidhiḥ taporatistathaivānyaḥ saptamastu tapodhṛtiḥ
द्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तथा एक अन्य तपोरति — सातवें तपोधृति होंगे।
श्लोक 26 (markandeya.94.26)
देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठो विदूरथः । मित्रवान्मित्रविन्दश्च भाविनस्तत्सुता नृपाः ॥ 94.26 ॥
devavānupadevaśca devaśreṣṭho vidūrathaḥ mitravānmitravindaśca bhāvinastatsutā nṛpāḥ
देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान् तथा मित्रविन्द — ये उस मनु के भावी राजपुत्र होंगे।
श्लोक 27 (markandeya.94.27)
त्रयोदशस्य पर्याये रौच्याख्यस्य मनोः सुरान् । सप्तर्षींश्च नृपाञ्श्चैव गदतो मे निशामय ॥ 94.27 ॥
trayodaśasya paryāye raucyākhyasya manoḥ surān saptarṣīṁśca nṛpāñścaiva gadato me niśāmaya
तेरहवें मन्वन्तर में, रौच्य नामक मनु के देवताओं, सप्तर्षियों तथा राजाओं को मुझसे कहते हुए सुनो।
श्लोक 28 (markandeya.94.28)
सुधर्माणः सुरास्तत्र सुकर्माणस्तथापरे । सुशर्माणः सुरा ह्येते समस्ता मुनिसत्तम ॥ 94.28 ॥
sudharmāṇaḥ surāstatra sukarmāṇastathāpare suśarmāṇaḥ surā hyete samastā munisattama
वहाँ सुधर्मा नामक देवता, तथा अन्य सुकर्मा, और उसी प्रकार सुशर्मा नामक देवता — हे मुनिश्रेष्ठ! ये सब उस काल के देवता होंगे।
श्लोक 29 (markandeya.94.29)
महाबलो महावीर्यस्तेषामिन्द्रो दिवस्पतिः । भविष्यानथ सप्तर्षीन्गदतो मे निशामय ॥ 94.29 ॥
mahābalo mahāvīryasteṣāmindro divaspatiḥ bhaviṣyānatha saptarṣīngadato me niśāmaya
उनके इन्द्र, दिवस्पति, महाबली और महापराक्रमी होंगे; अब मुझसे भावी सप्तर्षियों को भी सुनो।
श्लोक 30 (markandeya.94.30)
धृतिमानव्ययश्चैव तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः । निर्मोहः सुतपाश्चान्यो निष्प्रकम्पश्च सप्तमः ॥ 94.30 ॥
dhṛtimānavyayaścaiva tattvadarśī nirutsukaḥ nirmohaḥ sutapāścānyo niṣprakampaśca saptamaḥ
धृतिमान्, अव्यय, तत्त्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह तथा अन्य सुतपा — सातवें निष्प्रकम्प होंगे।
श्लोक 31 (markandeya.94.31)
चित्रसेनो विचित्रश्च नियतिर्निर्भयो दृढः । सुनेत्रः क्षत्रबुद्धिश्च सुव्रतश्चैव तत्सुताः ॥ 94.31 ॥
citraseno vicitraśca niyatirnirbhayo dṛḍhaḥ sunetraḥ kṣatrabuddhiśca suvrataścaiva tatsutāḥ
चित्रसेन, विचित्र, नियति, निर्भय, दृढ़, सुनेत्र, क्षत्रबुद्धि तथा सुव्रत — ये उस मनु के पुत्र होंगे।