सम्पूर्ण (सभी १३४ अध्याय) · अध्याय 95
रुच्युपाख्यान
श्लोक 1 (markandeya.95.1)
मार्कण्डेय उवाच रुचिः प्रजापतिः पूर्वं निर्ममो निरहंकृतः । यत्रास्तमितशायी च चचार पृथिवीमिमाम् ॥ 95.1 ॥
mārkaṇḍeya uvāca ruciḥ prajāpatiḥ pūrvaṁ nirmamo nirahaṁkṛtaḥ yatrāstamitaśāyī ca cacāra pṛthivīmimām
पूर्वकाल में रुचि नामक प्रजापति ममत्व-रहित और अहंकार-रहित होकर, जहाँ सूर्यास्त हो जाता वहीं शयन करते हुए इस पृथ्वी पर विचरण करते थे।
श्लोक 2 (markandeya.95.2)
अनग्निमनिकेतं तमेकाहारमनाश्रमम् । विमुक्तसङ्गं तं दृष्ट्वा प्रोचुस्तत्पितरो मुनिम् ॥ 95.2 ॥
anagnimaniketaṁ tamekāhāramanāśramam vimuktasaṅgaṁ taṁ dṛṣṭvā procustatpitaro munim
अग्नि-रहित, गृह-रहित, दिन में एक बार आहार करने वाले, आश्रम-रहित तथा समस्त आसक्ति से मुक्त उस मुनि को देखकर उनके पितरों ने उनसे कहा।
श्लोक 3 (markandeya.95.3)
पितर ऊचुः वत्स कस्मात्त्वया पुण्यो न कृतो दारसंग्रहः । स्वर्गापवर्गहतुत्वाद्बन्धस्तेनानिशं विना ॥ 95.3 ॥
pitara ūcuḥ vatsa kasmāttvayā puṇyo na kṛto dārasaṁgrahaḥ svargāpavargahatutvādbandhastenāniśaṁ vinā
पितरों ने कहा — हे वत्स! तुमने विवाह जैसा पुण्य कार्य क्यों नहीं किया? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्ष दोनों का हेतु है, और उसके बिना निरन्तर बन्धन ही बना रहता है।
श्लोक 4 (markandeya.95.4)
गृही समस्तदेवानां पितॄणां च तथार्हणाम् । ऋषीणामतिथीनां च कुर्वंल्लोकानुपाश्नुते ॥ 95.4 ॥
gṛhī samastadevānāṁ pitṝṇāṁ ca tathārhaṇām ṛṣīṇāmatithīnāṁ ca kurvaṁllokānupāśnute
गृहस्थ, समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों तथा अतिथियों की यथोचित अर्चा करते हुए, उन सब लोकों को प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (markandeya.95.5)
स्वाहोच्चारणतो देवान्स्वधोच्चारणतः पितॄन् । विभजत्यन्नदानेन भूताद्यानतिथीनपि ॥ 95.5 ॥
svāhoccāraṇato devānsvadhoccāraṇataḥ pitṝn vibhajatyannadānena bhūtādyānatithīnapi
वह स्वाहा-उच्चारण से देवताओं को, और स्वधा-उच्चारण से पितरों को तृप्त करता है, तथा अन्नदान से भूतों और अतिथियों को भी बाँटता है।
श्लोक 6 (markandeya.95.6)
स त्वं दैवादृणाद्बन्धं बन्धमस्मदृणादपि । अवाप्नोषि मनुष्यर्षिभूतेभ्यश्च दिनेदिने ॥ 95.6 ॥
sa tvaṁ daivādṛṇādbandhaṁ bandhamasmadṛṇādapi avāpnoṣi manuṣyarṣibhūtebhyaśca dinedine
किन्तु तुम, दैव-ऋण से बँधकर, तथा हमारे ऋण से भी बँधकर, दिन-प्रतिदिन मनुष्य, ऋषि तथा भूतों के ऋण से भी बँधते जा रहे हो।
श्लोक 7 (markandeya.95.7)
अनुत्पाद्य सुतान्देवानसन्तर्प्य पितॄंस्तथा । भूतादींश्च कथं मौढ्यात्सुगतिं गन्तुमिच्छसि ॥ 95.7 ॥
anutpādya sutāndevānasantarpya pitṝṁstathā bhūtādīṁśca kathaṁ mauḍhyātsugatiṁ gantumicchasi
पुत्र उत्पन्न किए बिना, देवताओं और पितरों को तृप्त किए बिना, तथा भूतों को भी तृप्त किए बिना, मूर्खतावश तुम सुगति कैसे पाना चाहते हो?
श्लोक 8 (markandeya.95.8)
क्लेशमेवैहिकं पुत्र मन्यामोऽत्र भवेत्तव । मृतस्य नरकं तद्वत्क्लेशमेवान्यजन्मनि ॥ 95.8 ॥
kleśamevaihikaṁ putra manyāmo 'tra bhavettava mṛtasya narakaṁ tadvatkleśamevānyajanmani
हे पुत्र! हम मानते हैं कि इस लोक में तुम्हें केवल क्लेश ही प्राप्त होगा; और मरने पर, उसी प्रकार दूसरे जन्म में नरक का ही क्लेश मिलेगा।
श्लोक 9 (markandeya.95.9)
रुचिरुवाच परिग्रहोऽतिदुःखाय पापायाधोगतेस्तथा । भवत्यतो मया पूर्वं न कृतो दारसंग्रहः ॥ 95.9 ॥
ruciruvāca parigraho 'tiduḥkhāya pāpāyādhogatestathā bhavatyato mayā pūrvaṁ na kṛto dārasaṁgrahaḥ
रुचि ने कहा — परिग्रह अत्यन्त दुःख, पाप तथा अधोगति का कारण होता है; इसीलिए मैंने अब तक विवाह नहीं किया।
श्लोक 10 (markandeya.95.10)
आत्मनः संयमो योऽयं क्रियतेऽक्षनियन्त्रणात् । स मुक्तिहेतुर्न भवत्यासावपि परिग्रहात् ॥ 95.10 ॥
ātmanaḥ saṁyamo yo 'yaṁ kriyate 'kṣaniyantraṇāt sa muktiheturna bhavatyāsāvapi parigrahāt
इन्द्रियों के निग्रह से जो यह आत्म-संयम किया जाता है, वह परिग्रह से युक्त होने पर मुक्ति का कारण नहीं बनता।
श्लोक 11 (markandeya.95.11)
प्रक्षाल्यतेऽनुदिवसं यदात्मा निष्परिग्रहैः । ममत्वपङ्कदिग्धोऽपि चित्ताम्भोभिर्वरं हि तत् ॥ 95.11 ॥
prakṣālyate 'nudivasaṁ yadātmā niṣparigrahaiḥ mamatvapaṅkadigdho 'pi cittāmbhobhirvaraṁ hi tat
यह श्रेष्ठ है कि ममत्व के कीचड़ से लिप्त होने पर भी, परिग्रह-रहित पुरुष का आत्मा प्रतिदिन चित्त-रूपी जल से धोया जाता रहे।
श्लोक 12 (markandeya.95.12)
अनेकभवसंभूतकर्मपङ्कांकितो बुधैः । आत्मा सद्वासनातोयैः प्रक्षाल्यो नियतेन्द्रियैः ॥ 95.12 ॥
anekabhavasaṁbhūtakarmapaṅkāṁkito budhaiḥ ātmā sadvāsanātoyaiḥ prakṣālyo niyatendriyaiḥ
अनेक जन्मों में संचित कर्म-कीचड़ से चिह्नित इस आत्मा को बुद्धिमान् पुरुष संयत इन्द्रियों तथा शुभ वासनाओं रूपी जल से धोते हैं।
श्लोक 13 (markandeya.95.13)
पितर ऊचुः युक्तं प्रक्षालनं कर्तुमात्मनो नियतेन्द्रियैः । किन्तु लेपाय मार्गोऽयं यत्र त्वं पुत्र वर्तसे ॥ 95.13 ॥
pitara ūcuḥ yuktaṁ prakṣālanaṁ kartumātmano niyatendriyaiḥ kintu lepāya mārgo 'yaṁ yatra tvaṁ putra vartase
पितरों ने कहा — संयत इन्द्रियों द्वारा आत्मा का प्रक्षालन करना उचित है, किन्तु हे पुत्र! जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो, वह तो और अधिक लिप्त करने वाला है।
श्लोक 14 (markandeya.95.14)
पञ्चर्णदीनैरशुभं नुद्यतेऽनभिसन्धितैः । फलैस्तथोपभोगैश्च पूर्वकर्मशुभाशुभैः ॥ 95.14 ॥
pañcarṇadīnairaśubhaṁ nudyate 'nabhisandhitaiḥ phalaistathopabhogaiśca pūrvakarmaśubhāśubhaiḥ
बिना किसी आसक्ति के किए गए शुभ-अशुभ पूर्वकर्मों के फल तथा भोग से ही अशुभ दूर हो जाता है, और पाँचों ऋण चुकाने से भी।
श्लोक 15 (markandeya.95.15)
एवं न बन्धो भवति कुर्वतः कारणात्मकः । न च बन्धाय तत्कर्म भवत्यनभिसन्धितम् ॥ 95.15 ॥
evaṁ na bandho bhavati kurvataḥ kāraṇātmakaḥ na ca bandhāya tatkarma bhavatyanabhisandhitam
इस प्रकार निमित्तमात्र होकर कर्म करने वाले को बन्धन नहीं होता; और जो कर्म बिना आसक्ति के किया जाता है, वह भी बन्धनकारक नहीं होता।
श्लोक 16 (markandeya.95.16)
पूर्वकर्म कृतं भोगैः क्षीयतेऽहर्निशं तथा । सुखदुःखात्मकैर्वत्स पुण्यापुण्यात्मकैर्नृणाम् ॥ 95.16 ॥
pūrvakarma kṛtaṁ bhogaiḥ kṣīyate 'harniśaṁ tathā sukhaduḥkhātmakairvatsa puṇyāpuṇyātmakairnṛṇām
हे वत्स! मनुष्यों का पूर्वकृत पुण्य-पाप कर्म सुख-दुःखरूपी भोगों के द्वारा दिन-रात क्षीण होता रहता है।
श्लोक 17 (markandeya.95.17)
एवं प्रक्षाल्यते प्राज्ञैरात्मा बन्धाच्च रक्ष्यते । न त्वेवमविवेकेन पापपङ्केन लिप्यते ॥ 95.17 ॥
evaṁ prakṣālyate prājñairātmā bandhācca rakṣyate na tvevamavivekena pāpapaṅkena lipyate
इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुषों का आत्मा प्रक्षालित होकर बन्धन से रक्षित रहता है; किन्तु विवेकहीन पुरुष इस प्रकार नहीं, वह पाप-रूपी कीचड़ से लिप्त ही रहता है।
श्लोक 18 (markandeya.95.18)
रुचिरुवाच अविद्या पठ्यते वेदः कर्ममार्गः पितामहाः । तत्कथं कर्मणो मार्गे भवन्तो योजयन्ति माम् ॥ 95.18 ॥
ruciruvāca avidyā paṭhyate vedaḥ karmamārgaḥ pitāmahāḥ tatkathaṁ karmaṇo mārge bhavanto yojayanti mām
रुचि ने कहा — वेद में कर्ममार्ग को अविद्या कहा गया है, हे पितामहो! तो फिर आप मुझे कर्म के मार्ग में क्यों लगा रहे हैं?
श्लोक 19 (markandeya.95.19)
पितर ऊचुः अविद्या सत्यमेवैतत्कर्म नैतन्मृषावचः । किन्तु विद्या परिप्राप्तौ हेतु कर्म न संशयः ॥ 95.19 ॥
pitara ūcuḥ avidyā satyamevaitatkarma naitanmṛṣāvacaḥ kintu vidyā pariprāptau hetu karma na saṁśayaḥ
पितरों ने कहा — यह सत्य ही है कि कर्म को अविद्या कहा गया है, यह कोई मिथ्या वचन नहीं; किन्तु निःसन्देह कर्म ही विद्या की प्राप्ति का हेतु है।
श्लोक 20 (markandeya.95.20)
विहिताकरणात्पुंभिरसद्भिः क्रियते तु यः । संयमो मुक्तये नासौ प्रत्युताऽधोगतिप्रदः ॥ 95.20 ॥
vihitākaraṇātpuṁbhirasadbhiḥ kriyate tu yaḥ saṁyamo muktaye nāsau pratyutā 'dhogatipradaḥ
किन्तु जो संयम असज्जन पुरुषों द्वारा विहित कर्मों के अकरण से किया जाता है, वह मुक्ति के लिए नहीं होता, अपितु उलटे अधोगति ही देने वाला होता है।
श्लोक 21 (markandeya.95.21)
प्रक्षालयामीति भवान्वत्सात्मानं तु मन्यते । विहिताकरणोद्भूतैः पापैस्त्वं तु विलिप्यसे ॥ 95.21 ॥
prakṣālayāmīti bhavānvatsātmānaṁ tu manyate vihitākaraṇodbhūtaiḥ pāpaistvaṁ tu vilipyase
हे वत्स! तुम यह सोचते हो कि 'मैं आत्मा को शुद्ध कर रहा हूँ', किन्तु विहित कर्म के न करने से उत्पन्न पापों से तुम स्वयं लिप्त होते जा रहे हो।
श्लोक 22 (markandeya.95.22)
अविद्याप्युपकाराय विषवज्जायते नृणाम् । अनुष्ठिताभ्युपायेन बन्धायान्यायतो हि सा ॥ 95.22 ॥
avidyāpyupakārāya viṣavajjāyate nṛṇām anuṣṭhitābhyupāyena bandhāyānyāyato hi sā
अविद्या (कर्म) भी विष के समान मनुष्यों के लिए हितकर हो जाती है यदि उचित उपाय से किया जाए; किन्तु अन्यायपूर्वक किया जाने पर वही बन्धन का कारण बनती है।
श्लोक 23 (markandeya.95.23)
तस्माद्वत्स कुरुष्व त्वं विधिवद्दारसंग्रहम् । मां जन्म विफलं तेऽस्तु असम्प्राप्य तु लौकिकम् ॥ 95.23 ॥
tasmādvatsa kuruṣva tvaṁ vidhivaddārasaṁgraham māṁ janma viphalaṁ te 'stu asamprāpya tu laukikam
इसलिए हे वत्स! तुम विधिपूर्वक विवाह करो; लौकिक कर्तव्य को प्राप्त किए बिना तुम्हारा यह जन्म व्यर्थ न हो।
श्लोक 24 (markandeya.95.24)
रुचिरुवाच वृद्धोऽहं साम्प्रतं को मे पितरः सम्प्रदास्यति । भार्यां तथा दरिद्रस्य दुष्करो दारसंग्रहः ॥ 95.24 ॥
ruciruvāca vṛddho 'haṁ sāmprataṁ ko me pitaraḥ sampradāsyati bhāryāṁ tathā daridrasya duṣkaro dārasaṁgrahaḥ
रुचि ने कहा — अब मैं वृद्ध हो गया हूँ, मुझे कन्या कौन देगा? और निर्धन के लिए विवाह करना अत्यन्त कठिन है।
श्लोक 25 (markandeya.95.25)
पितर ऊचुः अस्माकं पतनं वत्स भवतश्चाप्यधोगतिः । नूनं भावि भवित्री च नाभिनन्दसि नो वचः ॥ 95.25 ॥
pitara ūcuḥ asmākaṁ patanaṁ vatsa bhavataścāpyadhogatiḥ nūnaṁ bhāvi bhavitrī ca nābhinandasi no vacaḥ
पितरों ने कहा — हे वत्स! हमारा पतन और तुम्हारी भी अधोगति निश्चय ही होकर रहेगी, क्योंकि तुम हमारे वचन का अभिनन्दन नहीं कर रहे।
श्लोक 26 (markandeya.95.26)
मार्कण्डेय उवाच इत्युक्त्वा पितरस्तस्य पश्यतो मुनिसत्तम । बभूवुः सहसाऽदृश्या दीपा वाताहता इव ॥ 95.26 ॥
mārkaṇḍeya uvāca ityuktvā pitarastasya paśyato munisattama babhūvuḥ sahasā 'dṛśyā dīpā vātāhatā iva
मार्कण्डेय ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! यह कहकर, उनके देखते-देखते ही, वे पितर सहसा वायु से बुझे हुए दीपकों के समान अदृश्य हो गए।