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भूमि खण्ड · अध्याय 125

भूमिखंड-श्रवण का फल

अध्याय 124अध्याय-सूची

श्लोक 1 (padma.2.125.1)

सूत उवाच । वेनस्याज्ञां सुसंप्राप्य पृथुः परमधार्मिकः । संबभ्रे सर्वसंभारान्नानापुण्यान्नृपात्मजः

sūta uvāca venasyājñāṁ susaṁprāpya pṛthuḥ paramadhārmikaḥ saṁbabhre sarvasaṁbhārānnānāpuṇyānnṛpātmajaḥ

सूत ने कहा — वेन की आज्ञा भलीभाँति प्राप्त करके, परम धार्मिक पृथु, उस राजपुत्र ने, समस्त पुण्यमय यज्ञ-सामग्रियों को एकत्र किया।

श्लोक 2 (padma.2.125.2)

निमंत्र्य ब्राह्मणान्सर्वान्नानादेशोद्भवानपि । अथ वेन इयाजासावश्वमेधेन भूपतिः

nimaṁtrya brāhmaṇānsarvānnānādeśodbhavānapi atha vena iyājāsāvaśvamedhena bhūpatiḥ

नाना देशों से आए समस्त ब्राह्मणों को आमंत्रित करके, तब उस भूपति वेन ने अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया।

श्लोक 3 (padma.2.125.3)

दानान्यदाद्ब्राह्मणेभ्यो नानारूपाण्यनेकशः । जगाम वैष्णवं लोकं सकायो जगतीपतिः

dānānyadādbrāhmaṇebhyo nānārūpāṇyanekaśaḥ jagāma vaiṣṇavaṁ lokaṁ sakāyo jagatīpatiḥ

उसने ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिए, विविध रूपों में; और वह जगत्पति अपने ही शरीर सहित विष्णु के लोक को चला गया।

श्लोक 4 (padma.2.125.4)

विष्णुना सह धर्मात्मा नित्यमेव प्रवर्तते । एतद्वः सर्वमाख्यातं चरित्रं तस्य भूपतेः

viṣṇunā saha dharmātmā nityameva pravartate etadvaḥ sarvamākhyātaṁ caritraṁ tasya bhūpateḥ

वह धर्मात्मा नित्य ही विष्णु के साथ ही रहता है। यह सब मैंने तुम्हें उस भूपति का चरित्र कह सुनाया —

श्लोक 5 (padma.2.125.5)

सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखविनाशनम् । पृथुरेव स धर्मात्मा राजा पृथ्वीं प्रशासति

sarvapāpapraśamanaṁ sarvaduḥkhavināśanam pṛthureva sa dharmātmā rājā pṛthvīṁ praśāsati

— समस्त पापों को शांत करने वाला, समस्त दुःखों का नाश करने वाला। वह धर्मात्मा पृथु ही राजा होकर पृथ्वी पर शासन करने लगा।

श्लोक 6 (padma.2.125.6)

त्रैलोक्येन समं पृथ्वीं दुदोह नृपसत्तमः । प्रजास्तु रंजितास्तेन पुण्यधर्मानुकर्मभिः

trailokyena samaṁ pṛthvīṁ dudoha nṛpasattamaḥ prajāstu raṁjitāstena puṇyadharmānukarmabhiḥ

उस श्रेष्ठ राजा ने त्रैलोक्य के समान पृथ्वी का दोहन किया; और उसने पुण्यमय धर्म के अनुरूप कर्मों से प्रजा को प्रसन्न किया।

श्लोक 7 (padma.2.125.7)

एतत्ते सर्वमाख्यातं भूमिखण्डमनुत्तमम् । प्रथमं सृष्टिखंडं तु द्वितीयं भूमिखंडकम्

etatte sarvamākhyātaṁ bhūmikhaṇḍamanuttamam prathamaṁ sṛṣṭikhaṁḍaṁ tu dvitīyaṁ bhūmikhaṁḍakam

यह सब मैंने तुम्हें बता दिया — यह सर्वश्रेष्ठ भूमिखंड। प्रथम सृष्टिखंड है, और द्वितीय यह भूमिखंड है —

श्लोक 8 (padma.2.125.8)

भूमिखंडस्यमाहात्म्यं कथयिष्याम्यहं पुनः । अस्य खंडस्य वै श्लोकं यः शृणोति नरोत्तमः

bhūmikhaṁḍasyamāhātmyaṁ kathayiṣyāmyahaṁ punaḥ asya khaṁḍasya vai ślokaṁ yaḥ śṛṇoti narottamaḥ

अब मैं पुनः भूमिखंड की महिमा कहता हूँ। इस खंड का एक भी श्लोक जो श्रेष्ठ मनुष्य सुनता है —

श्लोक 9 (padma.2.125.9)

दिनस्यैकस्य वै पापं तस्य चैव प्रणश्यति । यो नरो भावसंयुक्तोऽध्यायं संशृणुते सुधीः

dinasyaikasya vai pāpaṁ tasya caiva praṇaśyati yo naro bhāvasaṁyukto'dhyāyaṁ saṁśṛṇute sudhīḥ

— उसका एक दिन का पाप भी नष्ट हो जाता है। जो बुद्धिमान् मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर एक पूरा अध्याय सुनता है —

श्लोक 10 (padma.2.125.10)

तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि श्रूयतां द्विजसत्तमाः । दत्तस्य गोसहस्रस्य ब्राह्मणेभ्यः सुपर्वणि

tasya puṇyaṁ pravakṣyāmi śrūyatāṁ dvijasattamāḥ dattasya gosahasrasya brāhmaṇebhyaḥ suparvaṇi

उसका पुण्य मैं कहता हूँ, सुनिए, हे श्रेष्ठ द्विजगण। किसी शुभ पर्व पर ब्राह्मणों को सहस्र गौओं के दान से जो फल प्राप्त होता है —

श्लोक 11 (padma.2.125.11)

यत्फलं तत्प्रजायेत विष्णुस्तस्य प्रसीदति । अस्य पद्मपुराणस्य पठमानस्य नित्यशः

yatphalaṁ tatprajāyeta viṣṇustasya prasīdati asya padmapurāṇasya paṭhamānasya nityaśaḥ

— वही फल उसे भी प्राप्त होता है, और विष्णु उससे प्रसन्न हो जाते हैं। जो कोई इस पद्मपुराण को नित्य ही पढ़ता है —

श्लोक 12 (padma.2.125.12)

कलौयुगे तु विघ्नाश्च न जायंते नरस्य वै । व्यास उवाच । कस्मात्कलौ न जायंते शृण्वानस्य च पद्मज

kalauyuge tu vighnāśca na jāyaṁte narasya vai vyāsa uvāca kasmātkalau na jāyaṁte śṛṇvānasya ca padmaja

— कलियुग में उस मनुष्य के लिए कोई विघ्न उत्पन्न नहीं होता। व्यास ने कहा — हे पद्मज (ब्रह्मा)! सुनने वाले के लिए कलियुग में विघ्न क्यों उत्पन्न नहीं होते,

श्लोक 13 (padma.2.125.13)

नरस्य पुण्ययुक्तस्य नाना विघ्नाः सुदारुणाः । ब्रह्मोवाच । मखस्याप्यश्वमेधस्य यत्फलं परिकथ्यते

narasya puṇyayuktasya nānā vighnāḥ sudāruṇāḥ brahmovāca makhasyāpyaśvamedhasya yatphalaṁ parikathyate

— जबकि पुण्यवान् मनुष्य के लिए भी नाना भयंकर विघ्न उत्पन्न हो जाते हैं? ब्रह्मा ने कहा — अश्वमेध यज्ञ का जो फल कहा जाता है,

श्लोक 14 (padma.2.125.14)

तत्फलं दृश्यते तात पुराणे पद्मसंज्ञके । अश्वमेधमखः पुण्यः कलौ नैव प्रवर्तते

tatphalaṁ dṛśyate tāta purāṇe padmasaṁjñake aśvamedhamakhaḥ puṇyaḥ kalau naiva pravartate

— वही फल, हे तात, इस पद्म नामक पुराण में देखा जाता है। पवित्र अश्वमेध यज्ञ कलियुग में कदापि नहीं होता —

श्लोक 15 (padma.2.125.15)

पुराणं चापि यत्तद्वदश्वमेधसमं किल । अश्वमेधस्य यत्पुण्यं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्

purāṇaṁ cāpi yattadvadaśvamedhasamaṁ kila aśvamedhasya yatpuṇyaṁ svargamokṣaphalapradam

— किंतु यह पुराण भी उसके समान ही कहा गया है। अश्वमेध का जो पुण्य स्वर्ग और मोक्ष का फल देने वाला है,

श्लोक 16 (padma.2.125.16)

न भुंजंति नराः पापाः पापमार्गेषु संस्थिताः । पुराणस्यास्य पुण्यस्य पद्मसंज्ञस्य सत्तम

na bhuṁjaṁti narāḥ pāpāḥ pāpamārgeṣu saṁsthitāḥ purāṇasyāsya puṇyasya padmasaṁjñasya sattama

— उसे पापमार्ग में स्थित पापी मनुष्य नहीं भोग पाते। हे श्रेष्ठ! इस पवित्र पद्म-नामक पुराण के पुण्य को,

श्लोक 17 (padma.2.125.17)

अश्वमेधसमं पुण्यं न भुंजंति कलौ नराः । कलौ युगे नरैः पापैर्गंतव्यं नरकार्णवम्

aśvamedhasamaṁ puṇyaṁ na bhuṁjaṁti kalau narāḥ kalau yuge naraiḥ pāpairgaṁtavyaṁ narakārṇavam

— अश्वमेध के समान उस पुण्य को, कलियुग में मनुष्य नहीं भोग पाते। कलियुग में पापी मनुष्यों को नरक-सागर में जाना ही पड़ता है।

श्लोक 18 (padma.2.125.18)

कस्माच्छ्रोष्यंति तत्पुण्यं चतुर्वर्गप्रसाधनम् । येन श्रुतमिदं पुण्यं पुराणं पद्मसंज्ञकम्

kasmācchroṣyaṁti tatpuṇyaṁ caturvargaprasādhanam yena śrutamidaṁ puṇyaṁ purāṇaṁ padmasaṁjñakam

वे उस पुण्य को क्यों सुनेंगे, जो चतुर्वर्ग को सिद्ध करने वाला है? जिसके द्वारा यह पवित्र पद्म-नामक पुराण सुना जाता है,

श्लोक 19 (padma.2.125.19)

सर्वं हि साधितं तेन चतुर्वर्गस्य साधनम् । अश्वमेधादयो यज्ञास्तस्मान्नष्टा महामते

sarvaṁ hi sādhitaṁ tena caturvargasya sādhanam aśvamedhādayo yajñāstasmānnaṣṭā mahāmate

— उसके द्वारा ही चतुर्वर्ग की समस्त सिद्धि प्राप्त कर ली जाती है। हे महाबुद्धिमान्! इसीलिए अश्वमेध आदि यज्ञ नष्ट हो गए —

श्लोक 20 (padma.2.125.20)

कलौ युगे गताः स्वर्गे सवेदाः सांगसस्वराः । यः कोपि सत्वसंपन्नः श्रद्धावान्भगवत्परः

kalau yuge gatāḥ svarge savedāḥ sāṁgasasvarāḥ yaḥ kopi satvasaṁpannaḥ śraddhāvānbhagavatparaḥ

कलियुग में, वेद और उनके अंगों तथा स्वरों सहित, वे स्वर्ग को चले गए। जो कोई सत्त्वगुण-संपन्न, श्रद्धावान्, भगवान् के प्रति समर्पित —

श्लोक 21 (padma.2.125.21)

श्रोतुमिच्छति धर्मात्मा सपुत्रो भार्यया सह । श्रवणार्थं महाश्रद्धा पूर्वं तस्य प्रजायते

śrotumicchati dharmātmā saputro bhāryayā saha śravaṇārthaṁ mahāśraddhā pūrvaṁ tasya prajāyate

— वह धर्मात्मा अपने पुत्र और पत्नी सहित इसे सुनना चाहे, उसके लिए पहले श्रवण की महाश्रद्धा उत्पन्न होती है।

श्लोक 22 (padma.2.125.22)

शृण्वानस्य नरस्यापि महाविघ्नो न संचरेत् । अश्रद्धा जायते पूर्वं पाठकस्य नरस्य च

śṛṇvānasya narasyāpi mahāvighno na saṁcaret aśraddhā jāyate pūrvaṁ pāṭhakasya narasya ca

ऐसे सुनने वाले मनुष्य के मार्ग में कोई महाविघ्न नहीं आता। किंतु पाठक और श्रोता मनुष्य में पहले अश्रद्धा उत्पन्न होती है —

श्लोक 23 (padma.2.125.23)

लोभश्च जायते तस्य शृण्वानस्य द्विजोत्तम । प्रेषितो विष्णुदेवेन महामोहः स दारुणः

lobhaśca jāyate tasya śṛṇvānasya dvijottama preṣito viṣṇudevena mahāmohaḥ sa dāruṇaḥ

— हे श्रेष्ठ द्विज! उस सुनने वाले में लोभ भी उत्पन्न हो जाता है। विष्णु देव द्वारा ही भेजा गया वह भयंकर महामोह —

श्लोक 24 (padma.2.125.24)

अकरोत्स विनाशं तु शृण्वतश्चास्य नित्यशः । दूषकाः कुत्सकाः पापाः संभवंति दिने दिने

akarotsa vināśaṁ tu śṛṇvataścāsya nityaśaḥ dūṣakāḥ kutsakāḥ pāpāḥ saṁbhavaṁti dine dine

— उस निरंतर सुनने वाले का ही नाश करता रहता है। निंदक, कुत्सक और पापी लोग प्रतिदिन उत्पन्न होते रहते हैं।

श्लोक 25 (padma.2.125.25)

ज्ञातव्यं तु सुबुद्धेन विघ्नरूपं ममाधुना । संजातं दृश्यते व्यास तथा होमं समाचरेत्

jñātavyaṁ tu subuddhena vighnarūpaṁ mamādhunā saṁjātaṁ dṛśyate vyāsa tathā homaṁ samācaret

हे व्यास! सुबुद्धि व्यक्ति को यह जान लेना चाहिए कि यही मेरे लिए अभी विघ्न का रूप उत्पन्न हुआ है — और तब उसे होम करना चाहिए,

श्लोक 26 (padma.2.125.26)

वैष्णवैश्च महामंत्रैर्विष्णुसूक्तैः सुपुण्यदैः । विष्णोरराटमंत्रेण सहस्रशीर्षकेण च

vaiṣṇavaiśca mahāmaṁtrairviṣṇusūktaiḥ supuṇyadaiḥ viṣṇorarāṭamaṁtreṇa sahasraśīrṣakeṇa ca

वैष्णव महामंत्रों से, पवित्र फलदायक विष्णु-सूक्तों से, विष्णु के अराट-मंत्र से, और सहस्रशीर्ष-मंत्र से —

श्लोक 27 (padma.2.125.27)

इदं विष्णु सुमंत्रेण आब्रह्मेण पुनः पुनः । त्र्यंबकेन च मंत्रेण होममेवं समाचरेत्

idaṁ viṣṇu sumaṁtreṇa ābrahmeṇa punaḥ punaḥ tryaṁbakena ca maṁtreṇa homamevaṁ samācaret

— इस उत्तम विष्णु-मंत्र से, और बार-बार 'आब्रह्म'-मंत्र से, तथा त्र्यंबक-मंत्र से भी — इस प्रकार होम करना चाहिए,

श्लोक 28 (padma.2.125.28)

बृहत्साम्ना सुमंत्रेण द्वादशाक्षरकेण च । यस्य देवस्य यो होमस्तस्य मंत्रेण होमयेत्

bṛhatsāmnā sumaṁtreṇa dvādaśākṣarakeṇa ca yasya devasya yo homastasya maṁtreṇa homayet

— उत्तम बृहत्साम-मंत्र से, और द्वादशाक्षर-मंत्र से भी। जिस भी देवता का होम करना हो, उसी देवता के मंत्र से होम करे।

श्लोक 29 (padma.2.125.29)

अष्टोत्तरतिलाज्यैश्च पालाशैः समिधैरपि । ग्रहाणामपि कर्त्तव्यं स्थापनं पूजनं द्विज

aṣṭottaratilājyaiśca pālāśaiḥ samidhairapi grahāṇāmapi karttavyaṁ sthāpanaṁ pūjanaṁ dvija

तिल और घी से एक सौ आठ बार, तथा पलाश की समिधाओं से भी — हे द्विज! ग्रहों की स्थापना और पूजा भी करनी चाहिए।

श्लोक 30 (padma.2.125.30)

विघ्नेशं पूजयेत्तत्र शारदां च सुरेश्वरीम् । जातवेदां महामायां चंडिकां क्षेत्रनायकम्

vighneśaṁ pūjayettatra śāradāṁ ca sureśvarīm jātavedāṁ mahāmāyāṁ caṁḍikāṁ kṣetranāyakam

वहाँ विघ्नेश (गणेश) की पूजा करनी चाहिए, तथा देवताओं की स्वामिनी शारदा की, अग्निदेव जातवेदा की, महामाया चंडिका की, और क्षेत्र के अधिष्ठाता देवता की भी —

श्लोक 31 (padma.2.125.31)

तिलैश्च तंदुलैराज्यैस्तेषां मंत्रसमुद्यतैः । एवं होमः प्रकर्त्तव्यो ब्राह्मणेभ्यो ददेद्धनम्

tilaiśca taṁdulairājyaisteṣāṁ maṁtrasamudyataiḥ evaṁ homaḥ prakarttavyo brāhmaṇebhyo dadeddhanam

— तिल, तंडुल और घी से, उनके ही मंत्रों सहित अर्पित करके। इस प्रकार होम करना चाहिए, और ब्राह्मणों को धन देना चाहिए,

श्लोक 32 (padma.2.125.32)

यथासंभाविकां तात दक्षिणां धेनुसंयुताम् । ततो विघ्नाः प्रणश्यंति पुराणं सिद्धिमाप्नुयात्

yathāsaṁbhāvikāṁ tāta dakṣiṇāṁ dhenusaṁyutām tato vighnāḥ praṇaśyaṁti purāṇaṁ siddhimāpnuyāt

हे तात! यथासंभव गौ सहित उचित दक्षिणा भी। तब विघ्न नष्ट हो जाते हैं, और पुराण अपनी सिद्धि को प्राप्त होता है।

श्लोक 33 (padma.2.125.33)

एवं न कुरुते यो हि तस्य विघ्नं वदाम्यहम् । तस्यांगे जायते रोगो बहुपीडाप्रदायकः

evaṁ na kurute yo hi tasya vighnaṁ vadāmyaham tasyāṁge jāyate rogo bahupīḍāpradāyakaḥ

जो कोई ऐसा नहीं करता, उसका विघ्न मैं बताता हूँ — उसके शरीर में अनेक पीड़ाएँ देने वाला रोग उत्पन्न हो जाता है।

श्लोक 34 (padma.2.125.34)

भार्या शोकः पुत्रशोको धनहानिः प्रजायते । नानाविधान्महारोगान्भुंजते नात्र संशयः

bhāryā śokaḥ putraśoko dhanahāniḥ prajāyate nānāvidhānmahārogānbhuṁjate nātra saṁśayaḥ

पत्नी का शोक, पुत्र का शोक, धन की हानि उत्पन्न होती है। वह नाना प्रकार के महारोगों को भोगता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 35 (padma.2.125.35)

यस्य गेहे नास्ति वित्तमुपवासं समाचरेत् । एकादशीं सुसंप्राप्य पूजयेन्मधुसूदनम्

yasya gehe nāsti vittamupavāsaṁ samācaret ekādaśīṁ susaṁprāpya pūjayenmadhusūdanam

जिसके घर में धन न हो, उसे उपवास करना चाहिए; एकादशी को भलीभाँति प्राप्त करके मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए,

श्लोक 36 (padma.2.125.36)

षोडशैश्चोपचारैश्च भावयुक्तेन चेतसा । ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्यथावित्तानुसारतः

ṣoḍaśaiścopacāraiśca bhāvayuktena cetasā brāhmaṇānbhojayetpaścādyathāvittānusārataḥ

षोडश उपचारों से, भावयुक्त हृदय से; फिर उसके पश्चात्, अपने सामर्थ्य के अनुसार, ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए,

श्लोक 37 (padma.2.125.37)

केशवाय ततो दत्वा संकल्पं हविषान्वितम् । स्वयं कुर्यात्ततः प्राज्ञो भोजनं सह बांधवैः

keśavāya tato datvā saṁkalpaṁ haviṣānvitam svayaṁ kuryāttataḥ prājño bhojanaṁ saha bāṁdhavaiḥ

तत्पश्चात् केशव को हविष्य सहित संकल्प अर्पित करके, वह बुद्धिमान् स्वयं भी अपने बंधुओं के साथ भोजन करे।

श्लोक 38 (padma.2.125.38)

पुत्रैस्तु भार्यया युक्तस्ततः सिद्धिमवाप्नुयात् । पुराणसंहितापूर्णा श्रोतव्या धर्मतत्परैः

putraistu bhāryayā yuktastataḥ siddhimavāpnuyāt purāṇasaṁhitāpūrṇā śrotavyā dharmatatparaiḥ

पुत्रों और पत्नी सहित वह तब सिद्धि को प्राप्त करता है। धर्मपरायण लोगों को इस संपूर्ण पुराण-संहिता को सुनना चाहिए —

श्लोक 39 (padma.2.125.39)

चतुर्वर्गस्य वै सिद्धिर्जायते तस्य नान्यथा । सपादं लक्षमेकं तु ब्रह्माख्यं पुष्करं शृणु

caturvargasya vai siddhirjāyate tasya nānyathā sapādaṁ lakṣamekaṁ tu brahmākhyaṁ puṣkaraṁ śṛṇu

— उसे ही चतुर्वर्ग की सिद्धि प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। सुनिए अब ब्रह्मा-नामक पुष्कर (पूर्ण संख्या) — सवा लाख श्लोकों की —

श्लोक 40 (padma.2.125.40)

कृते युगे तु निष्पापाः शृण्वंति मनुजा द्विज । लक्षस्यार्द्धं ततः कृत्स्नं पुराणं पद्मसंज्ञकम्

kṛte yuge tu niṣpāpāḥ śṛṇvaṁti manujā dvija lakṣasyārddhaṁ tataḥ kṛtsnaṁ purāṇaṁ padmasaṁjñakam

— सतयुग में निष्पाप मनुष्य, हे द्विज, इसे सुनते हैं। उसके बाद, आधा लाख — यह संपूर्ण पद्म-नामक पुराण —

श्लोक 41 (padma.2.125.41)

श्लोकानां तु सहस्राभ्यां द्वाभ्यामेव तथाधिकम् । त्रेतायुगे तथा प्राप्ते यदा श्रोष्यंति मानवाः

ślokānāṁ tu sahasrābhyāṁ dvābhyāmeva tathādhikam tretāyuge tathā prāpte yadā śroṣyaṁti mānavāḥ

— दो हजार श्लोकों के साथ और भी अधिक — त्रेतायुग में जब मनुष्य इसे सुनते हैं।

श्लोक 42 (padma.2.125.42)

चतुर्वर्गफलं भुक्त्वा ते यास्यंति हरिं पुनः । द्वाविंशतिसहस्राणि संहितापद्मसंज्ञिता

caturvargaphalaṁ bhuktvā te yāsyaṁti hariṁ punaḥ dvāviṁśatisahasrāṇi saṁhitāpadmasaṁjñitā

चतुर्वर्ग के फल को भोगकर वे पुनः हरि को प्राप्त हो जाते हैं। बाईस हज़ार श्लोकों की — पद्म-नामक संहिता —

श्लोक 43 (padma.2.125.43)

द्वापरे कथिता विप्र ब्रह्मणा परमात्मना । द्वादशैव सहस्राणां पद्माख्या सा तु संहिता

dvāpare kathitā vipra brahmaṇā paramātmanā dvādaśaiva sahasrāṇāṁ padmākhyā sā tu saṁhitā

— द्वापर में, हे विप्र, परमात्मा ब्रह्मा ने कही है। केवल बारह हज़ार श्लोकों की वह पद्म-नामक संहिता —

श्लोक 44 (padma.2.125.44)

कलौ युगे पठिष्यंति मानवा विष्णुतत्पराः । एकोर्थश्चैकभावश्च चतुर्ष्वपि प्रवर्तितः

kalau yuge paṭhiṣyaṁti mānavā viṣṇutatparāḥ ekorthaścaikabhāvaśca caturṣvapi pravartitaḥ

— कलियुग में विष्णुभक्त मनुष्य पढ़ेंगे। एक ही अर्थ, एक ही भाव चारों युगों में समान रूप से प्रवर्तित है,

श्लोक 45 (padma.2.125.45)

संहितास्वेव विप्रेंद्र शेषाख्यानप्रविस्तरः । द्वादशैव सहस्राणि नाशं यास्यंति सत्तम

saṁhitāsveva vipreṁdra śeṣākhyānapravistaraḥ dvādaśaiva sahasrāṇi nāśaṁ yāsyaṁti sattama

— किंतु हे श्रेष्ठ द्विज! इन्हीं संहिताओं में विस्तृत उपाख्यानों के शेष विस्तार के बारह हज़ार श्लोक ही नष्ट हो जाएँगे, हे श्रेष्ठ।

श्लोक 46 (padma.2.125.46)

कलौ युगे तु संप्राप्ते प्रथमं हि भविष्यति । भूमिखंडं नरः श्रुत्वासर्वपापैः प्रमुच्यते

kalau yuge tu saṁprāpte prathamaṁ hi bhaviṣyati bhūmikhaṁḍaṁ naraḥ śrutvāsarvapāpaiḥ pramucyate

कलियुग के पूर्णतः आ जाने पर, यही सबसे पहले होगा — इस भूमिखंड को सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है,

श्लोक 47 (padma.2.125.47)

मुच्यते सर्वदुःखेभ्यः सर्वरोगैः प्रमुच्यते । अन्यत्सर्वं परित्यज्य जपं दानं तथा श्रुतम्

mucyate sarvaduḥkhebhyaḥ sarvarogaiḥ pramucyate anyatsarvaṁ parityajya japaṁ dānaṁ tathā śrutam

— वह समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है, समस्त रोगों से मुक्त हो जाता है। अन्य सब कुछ — जप, दान और अन्य श्रवण को — त्यागकर,

श्लोक 48 (padma.2.125.48)

श्रोतव्यं हि प्रयत्नेन पद्माख्यं पापनाशनम् । प्रथमं सृष्टिखंडं तु द्वितीयं भूमिखंडकम्

śrotavyaṁ hi prayatnena padmākhyaṁ pāpanāśanam prathamaṁ sṛṣṭikhaṁḍaṁ tu dvitīyaṁ bhūmikhaṁḍakam

— यह पापनाशक, पद्म-नामक ग्रंथ ही प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए। प्रथम है सृष्टिखंड, द्वितीय है यह भूमिखंड,

श्लोक 49 (padma.2.125.49)

तृतीयं स्वर्गखंडं च पातालं तु चतुर्थकम् । पंचमं चोत्तरं खंडं सर्वपापप्रणाशनम्

tṛtīyaṁ svargakhaṁḍaṁ ca pātālaṁ tu caturthakam paṁcamaṁ cottaraṁ khaṁḍaṁ sarvapāpapraṇāśanam

तृतीय है स्वर्गखंड, और चतुर्थ है पातालखंड; पंचम है उत्तरखंड, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 50 (padma.2.125.50)

यः शृणोति नरो भक्त्या पंचखंडान्यनुक्रमात् । गोप्रदानसहस्रस्य मानवो लभते फलम्

yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā paṁcakhaṁḍānyanukramāt gopradānasahasrasya mānavo labhate phalam

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन पाँचों खंडों को क्रमशः सुनता है, वह मनुष्य सहस्र गौओं के दान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 51 (padma.2.125.51)

महाभाग्येन लभ्यंते पंचखंडानि भूसुराः । श्रुतानि मोक्षदानि स्युः सत्यं सत्यं न संशयः

mahābhāgyena labhyaṁte paṁcakhaṁḍāni bhūsurāḥ śrutāni mokṣadāni syuḥ satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

महाभाग्य से ही ब्राह्मणों को ये पाँचों खंड प्राप्त होते हैं; इन्हें सुन लेने पर ये मोक्ष प्रदान करने वाले सिद्ध होते हैं — यह सत्य है, यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं।

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