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भूमि खण्ड · अध्याय 124

पृथु का राज्यशासन

अध्याय 123अध्याय-सूचीअध्याय 125

श्लोक 1 (padma.2.124.1)

सूत उवाच । अंतर्द्धानं गते विष्णौ वेनो राजा महामतिः । क्व गतो देवदेवेश इति चिंतापरोऽभवत्

sūta uvāca aṁtarddhānaṁ gate viṣṇau veno rājā mahāmatiḥ kva gato devadeveśa iti ciṁtāparo'bhavat

सूत ने कहा — विष्णु के अंतर्धान हो जाने पर, महाबुद्धिमान् राजा वेन यह सोचकर चिंतित हो गए कि देवाधिदेव कहाँ चले गए।

श्लोक 2 (padma.2.124.2)

हर्षेण महताविष्टश्चिंतयित्वा नृपोत्तमः । समाहूय नृपश्रेष्ठं तं पृथुं मधुराक्षरैः

harṣeṇa mahatāviṣṭaściṁtayitvā nṛpottamaḥ samāhūya nṛpaśreṣṭhaṁ taṁ pṛthuṁ madhurākṣaraiḥ

फिर, अत्यंत हर्ष से भरकर विचार करते हुए, उस श्रेष्ठ राजा ने राजश्रेष्ठ पृथु को मधुर वचनों से बुलाया।

श्लोक 3 (padma.2.124.3)

तमुवाच महात्मानं हर्षेण महता तदा । त्वया पुत्रेण भूर्लोके तारितोस्मि सुपातकात्

tamuvāca mahātmānaṁ harṣeṇa mahatā tadā tvayā putreṇa bhūrloke tāritosmi supātakāt

उस महात्मा से उन्होंने अत्यंत हर्षपूर्वक कहा — 'हे पुत्र! तुम्हारे द्वारा ही मैं इस भूलोक में महापाप से तर गया हूँ।'

श्लोक 4 (padma.2.124.4)

नीत उज्ज्वलतां वत्स वंशो मे सांप्रतं पृथो । मया विनाशितो दोषैस्त्वया गुणैः प्रकाशितः

nīta ujjvalatāṁ vatsa vaṁśo me sāṁprataṁ pṛtho mayā vināśito doṣaistvayā guṇaiḥ prakāśitaḥ

'हे वत्स! अब मेरा वंश उज्ज्वलता को प्राप्त हो गया, हे पृथु। मैंने ही उसे अपने दोषों से कलंकित किया था, और तुमने अपने गुणों से उसे प्रकाशित किया।'

श्लोक 5 (padma.2.124.5)

यजेहमश्वमेधेन दास्ये दानान्यनेकशः । विष्णुलोकं व्रजाम्यद्य सकायस्ते प्रसादतः

yajehamaśvamedhena dāsye dānānyanekaśaḥ viṣṇulokaṁ vrajāmyadya sakāyaste prasādataḥ

'मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा, अनेक प्रकार के दान दूँगा। आज तुम्हारी ही कृपा से मैं सशरीर विष्णुलोक को जाऊँगा।'

श्लोक 6 (padma.2.124.6)

संभरस्व महाभाग संभारांस्त्वं नृपोत्तम । आमंत्रय महाभाग ब्राह्मणान्वेदपारगान्

saṁbharasva mahābhāga saṁbhārāṁstvaṁ nṛpottama āmaṁtraya mahābhāga brāhmaṇānvedapāragān

'हे महाभाग, हे श्रेष्ठ राजन्! तुम यज्ञ-सामग्री एकत्र करो। हे महाभाग! वेद के पारगामी ब्राह्मणों को आमंत्रित करो।'

श्लोक 7 (padma.2.124.7)

एवं पृथुः समादिष्टो वेनेनापि महात्मना । प्रत्युवाच महात्मा स वेनं पितरमादरात्

evaṁ pṛthuḥ samādiṣṭo venenāpi mahātmanā pratyuvāca mahātmā sa venaṁ pitaramādarāt

महात्मा वेन द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर, वह महात्मा पृथु ने आदरपूर्वक अपने पिता वेन से उत्तर दिया —

श्लोक 8 (padma.2.124.8)

कुरु राज्यं महाराज भुंक्ष्व भोगान्मनोनुगान् । दिव्यान्वा मानुषान्पुण्यान्यज्ञैर्यज जनार्दनम्

kuru rājyaṁ mahārāja bhuṁkṣva bhogānmanonugān divyānvā mānuṣānpuṇyānyajñairyaja janārdanam

'हे महाराज! आप राज्य ही कीजिए, मनचाहे भोगों का उपभोग कीजिए — दिव्य या मानवीय, जो भी पुण्यमय हों — यज्ञों से जनार्दन की पूजा कीजिए।'

श्लोक 9 (padma.2.124.9)

एवमुक्त्वा प्रणम्यैव पितरं ज्ञानतत्परम् । धनुरादाय पृथ्वीशः सबाणं यत्नपूर्वकम्

evamuktvā praṇamyaiva pitaraṁ jñānatatparam dhanurādāya pṛthvīśaḥ sabāṇaṁ yatnapūrvakam

ऐसा कहकर, ज्ञान में तत्पर अपने पिता को प्रणाम करके, वह पृथ्वीपति यत्नपूर्वक धनुष और बाण लेकर,

श्लोक 10 (padma.2.124.10)

आदिदेश भटान्सर्वान्घोषध्वं भूतले मम । पापमेव न कर्तव्यं कर्मणा त्रिविधेन वै

ādideśa bhaṭānsarvānghoṣadhvaṁ bhūtale mama pāpameva na kartavyaṁ karmaṇā trividhena vai

अपने समस्त सैनिकों को यह आदेश दिया — 'मेरी इस पृथ्वी पर यह उद्घोषणा करो कि तीनों प्रकार के कर्मों से भी किसी को पाप नहीं करना चाहिए।'

श्लोक 11 (padma.2.124.11)

करिष्यंति च यत्पापं आज्ञां वेनस्य भूपतेः । उल्लंघ्य वध्यतां सो हि यास्यते नात्र संशयः

kariṣyaṁti ca yatpāpaṁ ājñāṁ venasya bhūpateḥ ullaṁghya vadhyatāṁ so hi yāsyate nātra saṁśayaḥ

'जो कोई राजा वेन के पुत्र (मेरी) आज्ञा का उल्लंघन करके पाप करेगा, वह अवश्य वध्य होगा, इसमें कोई संशय नहीं।'

श्लोक 12 (padma.2.124.12)

दानमेव प्रदातव्यं यज्ञैश्चैव जनार्दनम् । यजध्वं मानवाः सर्वे तन्मनस्का विमत्सराः

dānameva pradātavyaṁ yajñaiścaiva janārdanam yajadhvaṁ mānavāḥ sarve tanmanaskā vimatsarāḥ

'दान ही देना चाहिए, यज्ञों से जनार्दन की पूजा करनी चाहिए। हे समस्त मनुष्यो! ईर्ष्यारहित मन से, उन्हीं में मन लगाकर पूजा करो।'

श्लोक 13 (padma.2.124.13)

एवं शिक्षां प्रदत्वासौ राज्यं भृत्येषु वेनजः । निःक्षिप्य च गतो विप्रास्तपसोर्थे तपोवनम्

evaṁ śikṣāṁ pradatvāsau rājyaṁ bhṛtyeṣu venajaḥ niḥkṣipya ca gato viprāstapasorthe tapovanam

वेन-पुत्र पृथु ने इस प्रकार शिक्षा देकर, राज्य को अपने सेवकों के हाथों सौंपकर, हे विप्रगण, तप के लिए तपोवन को चले गए।

श्लोक 14 (padma.2.124.14)

सर्वान्दोषान्परित्यज्य संयम्य विषयेन्द्रियान् । शतवर्षप्रमाणं वै निराहारो बभूव ह

sarvāndoṣānparityajya saṁyamya viṣayendriyān śatavarṣapramāṇaṁ vai nirāhāro babhūva ha

समस्त दोषों को त्यागकर, विषयों और इंद्रियों को संयत करके, वे पूरे सौ वर्षों तक बिना किसी आहार के रहे।

श्लोक 15 (padma.2.124.15)

तपसा तस्य वै तुष्टो ब्रह्मा पृथुमुवाच ह । तपस्तपसि कस्मात्त्वं तन्मे त्वं कारणं वद

tapasā tasya vai tuṣṭo brahmā pṛthumuvāca ha tapastapasi kasmāttvaṁ tanme tvaṁ kāraṇaṁ vada

उनके उस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने पृथु से कहा — 'तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रहे हो? वह कारण मुझे बताओ।'

श्लोक 16 (padma.2.124.16)

पृथुरुवाच । वेन एष महाप्राज्ञः पिता मे कीर्तिवर्द्धनः । समाचरति यः पापमस्य राज्ये नराधमः

pṛthuruvāca vena eṣa mahāprājñaḥ pitā me kīrtivarddhanaḥ samācarati yaḥ pāpamasya rājye narādhamaḥ

पृथु ने कहा — 'यह महाबुद्धिमान् वेन ही मेरे पिता हैं, मेरी कीर्ति को बढ़ाने वाले। इनके राज्य में जो कोई अधम मनुष्य पाप करेगा —'

श्लोक 17 (padma.2.124.17)

शिरश्छेत्ता भवत्वेष तस्य देवो जनार्दनः । अदृष्टैश्च महाचक्रैर्हरिः शास्ता भवेत्स्वयम्

śiraśchettā bhavatveṣa tasya devo janārdanaḥ adṛṣṭaiśca mahācakrairhariḥ śāstā bhavetsvayam

'— उसका शिरच्छेदन करने वाले स्वयं देव जनार्दन हों। अदृश्य महाचक्रों द्वारा हरि स्वयं ही उसका शासक (दंडदाता) बनें।'

श्लोक 18 (padma.2.124.18)

मनसा कर्मणा वाचा कर्तुं वांछति पातकम् । तेषां शिरांसि त्रुट्यंतु फलं पक्वं यथा द्रुमात्

manasā karmaṇā vācā kartuṁ vāṁchati pātakam teṣāṁ śirāṁsi truṭyaṁtu phalaṁ pakvaṁ yathā drumāt

'जो कोई मन, वचन या कर्म से पाप करना चाहे, उनके सिर उसी प्रकार टूट जाएँ, जैसे वृक्ष से पका हुआ फल गिर जाता है।'

श्लोक 19 (padma.2.124.19)

एतदेव वरं मन्ये त्वत्तः शृणु सुरेश्वर । प्रजानां दोषभावेन न लिप्यति पिता मम

etadeva varaṁ manye tvattaḥ śṛṇu sureśvara prajānāṁ doṣabhāvena na lipyati pitā mama

'हे सुरेश्वर! मैं आपसे यही वर मानता हूँ, सुनिए। मेरे पिता प्रजा के दोष से कभी लिप्त न हों।'

श्लोक 20 (padma.2.124.20)

तथा कुरुष्व देवेश वरं दातुं यदीच्छसि । ददस्व उत्तमं कामं चतुर्मुखनमोऽस्तु ते

tathā kuruṣva deveśa varaṁ dātuṁ yadīcchasi dadasva uttamaṁ kāmaṁ caturmukhanamo'stu te

'हे देवेश! यदि आप वर देना ही चाहते हैं, तो ऐसा ही कीजिए — यह उत्तम कामना पूर्ण कीजिए। हे चतुर्मुख! आपको नमस्कार है।'

श्लोक 21 (padma.2.124.21)

ब्रह्मोवाच । एवमस्तु महाभाग पिता ते पूततां गतः । विष्णुना शासितो वत्स पुत्रेणापि त्वया पृथो

brahmovāca evamastu mahābhāga pitā te pūtatāṁ gataḥ viṣṇunā śāsito vatsa putreṇāpi tvayā pṛtho

ब्रह्मा ने कहा — 'हे महाभाग! ऐसा ही हो। हे वत्स पृथु! तुम्हारे ही द्वारा, तुम पुत्र के माध्यम से, विष्णु से अनुशासित होकर, तुम्हारे पिता पवित्रता को प्राप्त हो गए हैं।'

श्लोक 22 (padma.2.124.22)

एवं पृथुं समुद्दिश्य वरं दत्वा गतो विभुः । पृथुरेव समायातो राज्यकर्मणि संस्थितः

evaṁ pṛthuṁ samuddiśya varaṁ datvā gato vibhuḥ pṛthureva samāyāto rājyakarmaṇi saṁsthitaḥ

इस प्रकार पृथु को लक्ष्य करके वर देकर वे प्रभु चले गए। तब पृथु स्वयं लौट आए और राज्य के कार्यों में स्थित हो गए।

श्लोक 23 (padma.2.124.23)

वैन्यस्य राज्ये विप्रेन्द्राः पापं कश्चिन्न चाचरेत् । यस्तु चिंतयते पापं त्रिविधेनापि कर्मणा

vainyasya rājye viprendrāḥ pāpaṁ kaścinna cācaret yastu ciṁtayate pāpaṁ trividhenāpi karmaṇā

हे श्रेष्ठ द्विजगण! वैन्य (पृथु) के राज्य में कोई भी पाप नहीं करता था। जो कोई भी तीनों प्रकार के कर्मों से पाप का चिंतन करता —

श्लोक 24 (padma.2.124.24)

शिरश्छेदो भवेत्तस्य यथाचक्रैर्निकृंतितः । तदाप्रभृति वै पापं नैव कोपि समाचरेत्

śiraśchedo bhavettasya yathācakrairnikṛṁtitaḥ tadāprabhṛti vai pāpaṁ naiva kopi samācaret

— उसका सिर उसी प्रकार कट जाता, मानो चक्रों से काटा गया हो। तभी से कोई भी पाप का आचरण कभी नहीं करता था।

श्लोक 25 (padma.2.124.25)

इत्याज्ञा वर्तते तस्य वैन्यस्यापि महात्मनः । सर्वलोकाः समाचारैः परिवर्तंति नित्यशः

ityājñā vartate tasya vainyasyāpi mahātmanaḥ sarvalokāḥ samācāraiḥ parivartaṁti nityaśaḥ

उस महात्मा वैन्य की यही आज्ञा प्रचलित रही; समस्त लोक उसी के अनुसार सदा आचरण करते रहे।

श्लोक 26 (padma.2.124.26)

दानभोगैः प्रवर्तंते सर्वधर्मपरायणाः । सर्वसौख्यैः प्रवर्द्धंते प्रसादात्तस्य भूपतेः

dānabhogaiḥ pravartaṁte sarvadharmaparāyaṇāḥ sarvasaukhyaiḥ pravarddhaṁte prasādāttasya bhūpateḥ

दान और भोग के साथ वे सब आगे बढ़ते रहे, सब धर्म में तत्पर होकर। उस भूपति की कृपा से सभी समस्त सुखों से समृद्ध होते रहे।

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