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भूमि खण्ड · अध्याय 19

सोमशर्मा का तप, विष्णु-दर्शन तथा महास्तुति

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (padma.2.19.1)

सूत उवाच- सोमशर्मा महाप्राज्ञः सुमनया सह सत्तमः । कपिलासंगमे पुण्ये रेवातीरे सुपुण्यदे

sūta uvāca- somaśarmā mahāprājñaḥ sumanayā saha sattamaḥ kapilāsaṁgame puṇye revātīre supuṇyade

सूत जी ने कहा — महाप्राज्ञ सोमशर्मा, वह सत्तम, सुमना सहित, कपिला के पुण्य संगम पर, रेवा के अत्यंत पुण्यदायी तट पर —

श्लोक 2 (padma.2.19.2)

स्नात्वा तत्र स मेधावी तर्पयित्वा सुरान्पितॄन् । तपस्तेपे सुशांतात्मा जपन्नारायणं शिवम्

snātvā tatra sa medhāvī tarpayitvā surānpitṝn tapastepe suśāṁtātmā japannārāyaṇaṁ śivam

—वहाँ स्नान कर, वह मेधावी, देवताओं और पितरों का तर्पण कर, अत्यंत शांत आत्मा से तप करने लगा, नारायण शिव का जप करते हुए।

श्लोक 3 (padma.2.19.3)

द्वादशाक्षरमंत्रेण ध्यानयुक्तो महामनाः । तस्यैव देवदेवस्य वासुदेवस्य सुव्रतः

dvādaśākṣaramaṁtreṇa dhyānayukto mahāmanāḥ tasyaiva devadevasya vāsudevasya suvrataḥ

द्वादशाक्षर मंत्र से ध्यानयुक्त होकर, वह महामना, सुव्रत, उस देवदेव वासुदेव का ही ध्यान करता रहा —

श्लोक 4 (padma.2.19.4)

आसने शयने याने स्वप्ने पश्यति केशवम् । सदैव निश्चलो भूत्वा कामक्रोधविवर्जितः

āsane śayane yāne svapne paśyati keśavam sadaiva niścalo bhūtvā kāmakrodhavivarjitaḥ

—आसन पर, शय्या पर, यात्रा में, स्वप्न में वह केशव को देखता रहा; सदा निश्चल होकर, काम-क्रोध से रहित।

श्लोक 5 (padma.2.19.5)

सा च साध्वी महाभागा पतिव्रतपरायणा । सुमना कांतमेवापि शुश्रूषति तपोन्वितम्

sā ca sādhvī mahābhāgā pativrataparāyaṇā sumanā kāṁtamevāpi śuśrūṣati taponvitam

वह साध्वी महाभागा, पतिव्रत में परायण सुमना भी, तपोयुक्त अपने प्रिय पति की सेवा करती रही।

श्लोक 6 (padma.2.19.6)

ध्यायमानस्य तस्यापि विघ्नैः संदर्शितं भयम् । सर्पा विषोल्बणाः कृष्णास्तत्र यांति महात्मनः

dhyāyamānasya tasyāpi vighnaiḥ saṁdarśitaṁ bhayam sarpā viṣolbaṇāḥ kṛṣṇāstatra yāṁti mahātmanaḥ

ध्यानमग्न उसे भी विघ्नों द्वारा भय दिखाया गया — भयंकर विषैले काले सर्प उस महात्मा के पास आने लगे —

श्लोक 7 (padma.2.19.7)

पार्श्वे ते तप्यमानस्य तस्य ते सोमशर्मणः । सिंहव्याघ्रगजा दृष्टा भयमेवं प्रचक्रिरे

pārśve te tapyamānasya tasya te somaśarmaṇaḥ siṁhavyāghragajā dṛṣṭā bhayamevaṁ pracakrire

—तप करते हुए उस सोमशर्मा के पास सिंह, व्याघ्र, हाथी दिखाई दिए, उन्होंने इस प्रकार भय उत्पन्न किया।

श्लोक 8 (padma.2.19.8)

वेताला राक्षसा भूताः कूष्मांडाः प्रेतभैरवाः । भयं विदर्शयंत्येते दारुणं प्राणनाशनम्

vetālā rākṣasā bhūtāḥ kūṣmāṁḍāḥ pretabhairavāḥ bhayaṁ vidarśayaṁtyete dāruṇaṁ prāṇanāśanam

वेताल, राक्षस, भूत, कूष्मांड, भयंकर प्रेत — इन्होंने दारुण, प्राणनाशक भय दिखाया।

श्लोक 9 (padma.2.19.9)

नानाविधा महाभीमाः सिंहास्तत्र समागताः । दंष्ट्राकरालवक्त्राश्च जगर्जुश्चातिभैरवम्

nānāvidhā mahābhīmāḥ siṁhāstatra samāgatāḥ daṁṣṭrākarālavaktrāśca jagarjuścātibhairavam

नाना प्रकार के, अत्यंत भयंकर सिंह वहाँ आ गए, विकराल दाढ़ों वाले मुख से, अत्यंत भयंकर गर्जना करते हुए।

श्लोक 10 (padma.2.19.10)

विष्णोर्ध्यानात्स धर्मात्मा न चचाल महामतिः । महाविघ्नैः सुसंरूढैश्चालितो मुनिपुंगवः

viṣṇordhyānātsa dharmātmā na cacāla mahāmatiḥ mahāvighnaiḥ susaṁrūḍhaiścālito munipuṁgavaḥ

विष्णु के ध्यान से वह धर्मात्मा, महामति विचलित नहीं हुआ; उन महाविघ्नों के बढ़ते जाने पर भी वह मुनिपुंगव विचलित नहीं हुआ।

श्लोक 11 (padma.2.19.11)

एवं न चलते ध्यानात्सोमशर्मा द्विजोत्तमः । झंझावातैश्च शीतेन महावृष्ट्या सुपीडितः

evaṁ na calate dhyānātsomaśarmā dvijottamaḥ jhaṁjhāvātaiśca śītena mahāvṛṣṭyā supīḍitaḥ

इस प्रकार सोमशर्मा, वह द्विजोत्तम, ध्यान से विचलित नहीं हुआ; प्रचंड आँधी, शीत और महावृष्टि से अत्यंत पीड़ित होकर भी —

श्लोक 12 (padma.2.19.12)

भंभारावमहाभीमः सिंहस्तत्र समागतः । तं दृष्ट्वा भयवित्रस्तः सस्मार नृहरिं द्विजः

bhaṁbhārāvamahābhīmaḥ siṁhastatra samāgataḥ taṁ dṛṣṭvā bhayavitrastaḥ sasmāra nṛhariṁ dvijaḥ

—वहाँ एक अत्यंत गर्जना करता, भयंकर सिंह आया। उसे देखकर भय से भयभीत हुए उस द्विज ने नृहरि (नरसिंह) का स्मरण किया —

श्लोक 13 (padma.2.19.13)

इंद्रनीलप्रतीकाशं पीतवस्त्रं महौजसम् । शंखचक्रधरं देवं गदापंकजधारिणम्

iṁdranīlapratīkāśaṁ pītavastraṁ mahaujasam śaṁkhacakradharaṁ devaṁ gadāpaṁkajadhāriṇam

—इंद्रनील के समान, पीत वस्त्र धारण किए, महातेजस्वी, शंख-चक्रधारी देव, गदा और कमल धारण किए हुए —

श्लोक 14 (padma.2.19.14)

महामौक्तिकहारेण इंदुवर्णानुकारिणा । कौस्तुभेनापि रत्नेन द्योतमानं जनार्दनम्

mahāmauktikahāreṇa iṁduvarṇānukāriṇā kaustubhenāpi ratnena dyotamānaṁ janārdanam

—महामोतियों के हार से, जो चंद्रमा के वर्ण के समान था, और कौस्तुभ रत्न से भी दीप्तिमान जनार्दन —

श्लोक 15 (padma.2.19.15)

श्रीवत्सांकेन दिव्येन हृदयं यस्य राजते । सर्वाभरणशोभांगं शतपत्रनिभेक्षणम्

śrīvatsāṁkena divyena hṛdayaṁ yasya rājate sarvābharaṇaśobhāṁgaṁ śatapatranibhekṣaṇam

—जिनका हृदय दिव्य श्रीवत्स चिह्न से सुशोभित है; सर्वाभूषणों से सुशोभित अंग, कमल-पत्रों के समान नेत्र —

श्लोक 16 (padma.2.19.16)

सुस्मितास्यं सुप्रसन्नं रत्नदामाभिशोभितम् । भ्राजमानं हृषीकेशं ध्यानं तेन कृतं ध्रुवम्

susmitāsyaṁ suprasannaṁ ratnadāmābhiśobhitam bhrājamānaṁ hṛṣīkeśaṁ dhyānaṁ tena kṛtaṁ dhruvam

—मुस्कुराते हुए मुख, अत्यंत प्रसन्न, रत्न-मालाओं से सुशोभित, दीप्तिमान हृषीकेश — उन्हीं का उसने दृढ़ ध्यान किया।

श्लोक 17 (padma.2.19.17)

त्वमेव शरणं कृष्ण शरणागतवत्सल । नमोस्तु देवदेवाय किं मे भयं करिष्यति

tvameva śaraṇaṁ kṛṣṇa śaraṇāgatavatsala namostu devadevāya kiṁ me bhayaṁ kariṣyati

'तुम्हीं मेरे शरण हो, हे कृष्ण, शरणागतों पर स्नेह रखने वाले! देवदेव को नमस्कार हो! अब मुझे क्या भय होगा?

श्लोक 18 (padma.2.19.18)

यस्योदरे त्रयो लोकाः सप्त चान्ये महात्मनः । शरणं तस्य प्रविष्टोस्मि क्वास्ते भयं ममैव हि

yasyodare trayo lokāḥ sapta cānye mahātmanaḥ śaraṇaṁ tasya praviṣṭosmi kvāste bhayaṁ mamaiva hi

जिनके उदर में तीन लोक और अन्य सात लोक भी हैं, हे महात्मन्, उन्हीं की शरण में मैं प्रविष्ट हुआ हूँ — फिर मुझे भय कहाँ रहेगा?

श्लोक 19 (padma.2.19.19)

यस्माद्भयाः प्रवर्तंते कृत्यादिक महाबलाः । सर्वभयप्रहर्तारं तमस्मि शरणं गतः

yasmādbhayāḥ pravartaṁte kṛtyādika mahābalāḥ sarvabhayaprahartāraṁ tamasmi śaraṇaṁ gataḥ

जिनसे भयभीत होकर महाबली जादू-टोना आदि भी भाग जाते हैं, उसी समस्त भयों के नाशक की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 20 (padma.2.19.20)

पातकानां तु सर्वेषां दानवानां महाभयम् । रक्षको विष्णुभक्तानां तमस्मि शरणं गतः

pātakānāṁ tu sarveṣāṁ dānavānāṁ mahābhayam rakṣako viṣṇubhaktānāṁ tamasmi śaraṇaṁ gataḥ

समस्त पापियों और दानवों के लिए महाभय स्वरूप, विष्णुभक्तों के रक्षक — उसी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 21 (padma.2.19.21)

वृंदारकाणां सर्वेषां दानवानां महात्मनाम् । यो गतिः कृष्णभक्तानां तमस्मि शरणं गतः

vṛṁdārakāṇāṁ sarveṣāṁ dānavānāṁ mahātmanām yo gatiḥ kṛṣṇabhaktānāṁ tamasmi śaraṇaṁ gataḥ

समस्त देवगणों और महात्मा दानवों की भी, जो गति है, कृष्णभक्तों की भी जो गति है, उसी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 22 (padma.2.19.22)

अभयो भयनाशाय पापनाशाय ज्ञानवान् । एकश्चेंद्रस्वरूपेण तमस्मि शरणं गतः

abhayo bhayanāśāya pāpanāśāya jñānavān ekaśceṁdrasvarūpeṇa tamasmi śaraṇaṁ gataḥ

निर्भय, भय-नाश के लिए, पाप-नाश के लिए, ज्ञानवान, अकेले इंद्र-स्वरूप में — उसी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 23 (padma.2.19.23)

व्याधीनां नाशकायैव य औषधस्वरूपवान् । निरामयो निरानंदस्तमस्मि शरणंगतः

vyādhīnāṁ nāśakāyaiva ya auṣadhasvarūpavān nirāmayo nirānaṁdastamasmi śaraṇaṁgataḥ

व्याधियों के नाश के लिए ही जो औषध-स्वरूप है, निरामय, निरातंक — उसी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 24 (padma.2.19.24)

अचलश्चालयेल्लोकानपापो ज्ञानमेव च । तमस्मि शरणं प्राप्तो भयं किं मे करिष्यति

acalaścālayellokānapāpo jñānameva ca tamasmi śaraṇaṁ prāpto bhayaṁ kiṁ me kariṣyati

अचल होते हुए भी जो लोकों को हिला सकता है, निष्पाप, स्वयं ज्ञान — उसी की मैं शरण गया हूँ; अब मुझे क्या भय होगा?

श्लोक 25 (padma.2.19.25)

साधूनां चापि सर्वेषां पालको यो ह्यनामयः । पाति विश्वं च विश्वात्मा तमस्मि शरणंगतः

sādhūnāṁ cāpi sarveṣāṁ pālako yo hyanāmayaḥ pāti viśvaṁ ca viśvātmā tamasmi śaraṇaṁgataḥ

समस्त साधुओं का पालक, जो स्वयं निरोग है, जो विश्व की रक्षा करता है, विश्वात्मा — उसी की मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 26 (padma.2.19.26)

यो मे मृगेंद्ररूपेण भयं दर्शयतेग्रतः । तमहं शरणं प्राप्तो नरसिंहं नमाम्यहम्

yo me mṛgeṁdrarūpeṇa bhayaṁ darśayategrataḥ tamahaṁ śaraṇaṁ prāpto narasiṁhaṁ namāmyaham

जो मुझे सिंह के रूप में सामने भय दिखा रहा है, उसी की मैं शरण में आया हूँ; मैं नरसिंह को नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 27 (padma.2.19.27)

मदमत्तो महाकायो वनहस्ती समागतः । गजलीलागतिं देवं शरणागतवत्सलम्

madamatto mahākāyo vanahastī samāgataḥ gajalīlāgatiṁ devaṁ śaraṇāgatavatsalam

मद से मत्त, विशाल शरीर वाला वनहस्ती आया है — गजलीलागामी उस देव की, जो शरणागतों पर स्नेह रखते हैं —

श्लोक 28 (padma.2.19.28)

गजास्यं ज्ञानसंपन्नं सपाशांकुशधारिणम् । कालास्यं गजतुंडं च शरणं सुगतोस्म्यहम्

gajāsyaṁ jñānasaṁpannaṁ sapāśāṁkuśadhāriṇam kālāsyaṁ gajatuṁḍaṁ ca śaraṇaṁ sugatosmyaham

—गजमुख, ज्ञानसंपन्न, पाश-अंकुशधारी; जिनका मुख काल के समान और सूंड गज के समान है — उसी की मैं भली-भाँति शरण गया हूँ।

श्लोक 29 (padma.2.19.29)

हिरण्याक्षप्रहर्तारं वाराहं शरणंगतः । वामनं तं प्रपन्नोस्मि शरणागतवत्सलम्

hiraṇyākṣaprahartāraṁ vārāhaṁ śaraṇaṁgataḥ vāmanaṁ taṁ prapannosmi śaraṇāgatavatsalam

हिरण्याक्ष के वध करने वाले वराह की मैं शरण गया हूँ; वामन की मैं शरण गया हूँ, जो शरणागतों पर स्नेह रखते हैं।

श्लोक 30 (padma.2.19.30)

ह्रस्वास्तु वामनाः कुब्जाः प्रेताः कूष्मांडकादयः । मृत्युरूपधराः सर्वे दर्शयंति भयं मम

hrasvāstu vāmanāḥ kubjāḥ pretāḥ kūṣmāṁḍakādayaḥ mṛtyurūpadharāḥ sarve darśayaṁti bhayaṁ mama

छोटे बौने, कुबड़े, प्रेत, कूष्मांड आदि — सभी मृत्यु का रूप धारण किए मुझे भय दिखा रहे हैं —

श्लोक 31 (padma.2.19.31)

अमृतं तं प्रपन्नोस्मि किं भयं मे करिष्यति । ब्रह्मण्यो ब्रह्मदो ब्रह्मा ब्रह्मज्ञानमयो हरिः

amṛtaṁ taṁ prapannosmi kiṁ bhayaṁ me kariṣyati brahmaṇyo brahmado brahmā brahmajñānamayo hariḥ

—फिर भी मैं उसी अमृत की शरण गया हूँ; मुझे क्या भय होगा? ब्राह्मणों के हितकारी, ब्रह्मदाता, स्वयं ब्रह्मा, ब्रह्मज्ञानमय हरि —

श्लोक 32 (padma.2.19.32)

शरणं तं प्रपन्नोस्मि भयं किं मे करिष्यति । अभयो यो हि जगतो भीतिघ्नो भीतिदायकः

śaraṇaṁ taṁ prapannosmi bhayaṁ kiṁ me kariṣyati abhayo yo hi jagato bhītighno bhītidāyakaḥ

—उसी की मैं शरण गया हूँ; मुझे क्या भय होगा? जो निर्भय होकर भी जगत का भय-नाशक और पापियों को भय देने वाला है —

श्लोक 33 (padma.2.19.33)

भयरूपं प्रपन्नोस्मि भयं किं मे करिष्यति । तारकः सर्वलोकानां नाशकः सर्वपापिनाम्

bhayarūpaṁ prapannosmi bhayaṁ kiṁ me kariṣyati tārakaḥ sarvalokānāṁ nāśakaḥ sarvapāpinām

—मैं उसके भयरूप की भी शरण गया हूँ; मुझे क्या भय होगा? समस्त लोकों का तारक, समस्त पापियों का नाशक —

श्लोक 34 (padma.2.19.34)

तमहं शरणं प्राप्तो धर्मरूपं जनार्दनम् । सुरारणं यो हि रणे वपुर्द्धारयतेऽद्भुतम्

tamahaṁ śaraṇaṁ prāpto dharmarūpaṁ janārdanam surāraṇaṁ yo hi raṇe vapurddhārayate'dbhutam

—उसी धर्मरूप जनार्दन की मैं शरण गया हूँ; जो युद्ध में देवताओं के शत्रुओं के विरुद्ध अद्भुत शरीर धारण करते हैं —

श्लोक 35 (padma.2.19.35)

शरणं तस्य गंतास्मि सदागतिरयं मम । झंझावातो महाचंडो वपुर्दूयति मे भृशम्

śaraṇaṁ tasya gaṁtāsmi sadāgatirayaṁ mama jhaṁjhāvāto mahācaṁḍo vapurdūyati me bhṛśam

—उन्हीं की शरण में मैं जाऊँगा, वे ही सदा मेरी गति हैं। भयंकर प्रचंड आँधी मेरे शरीर को अत्यंत पीड़ा दे रही है —

श्लोक 36 (padma.2.19.36)

शरणं तं प्रपन्नोस्मि सदागतिरयं मम । अतिशीतं चातिवर्षा आतपस्तापदायकः

śaraṇaṁ taṁ prapannosmi sadāgatirayaṁ mama atiśītaṁ cātivarṣā ātapastāpadāyakaḥ

—फिर भी मैंने उनकी शरण ली है, वे ही सदा मेरी गति हैं। अत्यंत शीत, अत्यंत वर्षा, संतापदायी धूप —

श्लोक 37 (padma.2.19.37)

एषां रूपेण यो देवस्तस्याहं शरणं गतः । कालरूपा अमी प्राप्ता भयदा मम चालकाः

eṣāṁ rūpeṇa yo devastasyāhaṁ śaraṇaṁ gataḥ kālarūpā amī prāptā bhayadā mama cālakāḥ

—इन सबके रूप में जो देव हैं, उन्हीं की मैं शरण गया हूँ। ये कालरूपी, भयदायी शक्तियाँ मुझे डिगाने के लिए आई हैं —

श्लोक 38 (padma.2.19.38)

एषां शरणं प्रपन्नोस्मि हरेः स्वरूपिणां सदा

eṣāṁ śaraṇaṁ prapannosmi hareḥ svarūpiṇāṁ sadā

—इन सभी में, जो सदा हरि के ही स्वरूप हैं, मैं शरण गया हूँ।

श्लोक 39 (padma.2.19.39)

यं सर्वदेवं परमेश्वरं हि निष्केवलं ज्ञानमयं प्रदीपम् । वदंति नारायणमादिसिद्धं सिद्धेश्वरं तं शरणं प्रपद्ये

yaṁ sarvadevaṁ parameśvaraṁ hi niṣkevalaṁ jñānamayaṁ pradīpam vadaṁti nārāyaṇamādisiddhaṁ siddheśvaraṁ taṁ śaraṇaṁ prapadye

जिसे सभी लोग सर्वदेव, परमेश्वर, केवल ज्ञानमय दीपक कहते हैं, वह आदिसिद्ध नारायण, सिद्धेश्वर — उनकी मैं शरण लेता हूँ।'

श्लोक 40 (padma.2.19.40)

इति ध्यायन्स्तुवन्नित्यं केशवं क्लेशनाशनम् । भक्त्या तेन समानीतस्तदात्महृदये हरिः

iti dhyāyanstuvannityaṁ keśavaṁ kleśanāśanam bhaktyā tena samānītastadātmahṛdaye hariḥ

इस प्रकार ध्यान करते और सदा केशव, क्लेशनाशक की स्तुति करते हुए, उसकी भक्ति से हरि उसके हृदय में उतर आए।

श्लोक 41 (padma.2.19.41)

उद्यमं विक्रमं तस्य स दृष्ट्वा सोमशर्मणः । आविर्भूय हृषीकेशस्तमुवाच प्रहृष्टवान्

udyamaṁ vikramaṁ tasya sa dṛṣṭvā somaśarmaṇaḥ āvirbhūya hṛṣīkeśastamuvāca prahṛṣṭavān

सोमशर्मा के उद्यम और पराक्रम को देखकर, हृषीकेश प्रकट होकर, अत्यंत प्रसन्न होकर उससे कहा —

श्लोक 42 (padma.2.19.42)

सोमशर्मन्महाप्राज्ञ श्रूयतां भार्यया सह । वासुदेवोस्मि विप्रेंद्र वरं याचय सुव्रत

somaśarmanmahāprājña śrūyatāṁ bhāryayā saha vāsudevosmi vipreṁdra varaṁ yācaya suvrata

'हे महाप्राज्ञ सोमशर्मा! अपनी पत्नी सहित सुनो — मैं वासुदेव हूँ, हे विप्रेंद्र, वर माँगो, हे सुव्रत!'

श्लोक 43 (padma.2.19.43)

तेनोक्तो हि स विप्रेन्द्र उन्मील्य नयनद्वयम् । दृष्ट्वा विश्वेश्वरं देवं घनश्यामं महोदयम्

tenokto hi sa viprendra unmīlya nayanadvayam dṛṣṭvā viśveśvaraṁ devaṁ ghanaśyāmaṁ mahodayam

उनके द्वारा यह कहे जाने पर उस विप्रेंद्र ने अपने दोनों नेत्र खोलकर विश्वेश्वर देव को देखा, घनश्याम, महान गौरव वाले —

श्लोक 44 (padma.2.19.44)

सर्वाभरणशोभांगं सर्वायुधसमन्वितम् । दिव्यलक्षणसंपन्नं पुंडरीकनिभेक्षणम्

sarvābharaṇaśobhāṁgaṁ sarvāyudhasamanvitam divyalakṣaṇasaṁpannaṁ puṁḍarīkanibhekṣaṇam

—सर्वाभूषणों से सुशोभित अंग, समस्त आयुधों से युक्त, दिव्य लक्षणों से संपन्न, कमल के समान नेत्र —

श्लोक 45 (padma.2.19.45)

पीतेन वाससा युक्तं राजमानं सुरेश्वरम् । वैनतेयसमारूढं शंखचक्रगदाधरम्

pītena vāsasā yuktaṁ rājamānaṁ sureśvaram vainateyasamārūḍhaṁ śaṁkhacakragadādharam

—पीत वस्त्र धारण किए, शोभायमान सुरेश्वर, वैनतेय (गरुड़) पर आरूढ़, शंख-चक्र-गदाधारी —

श्लोक 46 (padma.2.19.46)

ब्रह्मादीनां सुधातारं जगतोस्य महायशाः । विश्वस्यास्य सदातीतं रूपातीतं जगद्गुरुम्

brahmādīnāṁ sudhātāraṁ jagatosya mahāyaśāḥ viśvasyāsya sadātītaṁ rūpātītaṁ jagadgurum

—ब्रह्मा आदि के भी सच्चे धारक, इस जगत के महायशस्वी, इस विश्व से सदा परे, रूपातीत जगद्गुरु —

श्लोक 47 (padma.2.19.47)

हर्षेण महताविष्टो दंडवत्प्रणिपत्य तम् । श्रियायुक्तं भासमानं सूर्यकोटिसमप्रभम्

harṣeṇa mahatāviṣṭo daṁḍavatpraṇipatya tam śriyāyuktaṁ bhāsamānaṁ sūryakoṭisamaprabham

—महान हर्ष से आविष्ट होकर उसने उन्हें दंडवत् प्रणाम किया — श्री से युक्त, दीप्तिमान, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले —

श्लोक 48 (padma.2.19.48)

बद्धांजलिपुटोभूत्वा तया सुमनया सह । जयजयेत्युवाचैनं जयमाधवमानद

baddhāṁjalipuṭobhūtvā tayā sumanayā saha jayajayetyuvācainaṁ jayamādhavamānada

—हाथ जोड़कर, सुमना सहित, उसने 'जय-जय' कहते हुए उनसे कहा — 'जय माधव, हे मानद!

श्लोक 49 (padma.2.19.49)

जय योगीश योगीन्द्र जय नागांगशायन । यज्ञांग जय यज्ञेश जय शाश्वतसर्वग

jaya yogīśa yogīndra jaya nāgāṁgaśāyana yajñāṁga jaya yajñeśa jaya śāśvatasarvaga

जय हे योगीश, योगींद्र! जय हे नागशय्या पर शयन करने वाले! हे यज्ञांग! जय हे यज्ञेश! जय हे शाश्वत, सर्वव्यापी!

श्लोक 50 (padma.2.19.50)

जय सर्वेश्वरानंत यज्ञरूप नमोऽस्तु ते । जय ज्ञानवतां श्रेष्ठ जय त्वं ज्ञाननायक

jaya sarveśvarānaṁta yajñarūpa namo'stu te jaya jñānavatāṁ śreṣṭha jaya tvaṁ jñānanāyaka

जय हे सर्वेश्वर, अनंत! हे यज्ञरूप! आपको नमस्कार हो! जय हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ! जय आप ही ज्ञान के नायक हैं!

श्लोक 51 (padma.2.19.51)

जय सर्वदसर्वज्ञ जय त्वं सर्वभावन । जय जीवस्वरूपेश महाजीव नमोस्तुते

jaya sarvadasarvajña jaya tvaṁ sarvabhāvana jaya jīvasvarūpeśa mahājīva namostute

जय हे सर्वदाता, सर्वज्ञ! जय आप ही समस्त भावों के कारण हैं! जय हे जीवस्वरूप ईश्वर, महाजीव! आपको नमस्कार हो!

श्लोक 52 (padma.2.19.52)

जय प्रज्ञादप्रज्ञांग जय प्राणप्रदायक । जय पापघ्न पुण्येश जय पुण्यपते हरे

jaya prajñādaprajñāṁga jaya prāṇapradāyaka jaya pāpaghna puṇyeśa jaya puṇyapate hare

जय हे प्रज्ञादाता, प्रज्ञांग! जय हे प्राणदाता! जय हे पापनाशक, पुण्येश! जय हे पुण्यपते हरि!

श्लोक 53 (padma.2.19.53)

जय ज्ञानस्वरूपेश ज्ञानगम्याय ते नमः । जय पद्मपलाशाक्ष पद्मनाभाय ते नमः

jaya jñānasvarūpeśa jñānagamyāya te namaḥ jaya padmapalāśākṣa padmanābhāya te namaḥ

जय हे ज्ञानस्वरूप ईश! ज्ञानगम्य आपको नमस्कार हो! जय हे कमल-पत्र नेत्र! पद्मनाभ आपको नमस्कार हो!

श्लोक 54 (padma.2.19.54)

जय गोविंदगोपाल जय शंखधरामल । जय चक्रधराव्यक्त व्यक्तरूपाय ते नमः

jaya goviṁdagopāla jaya śaṁkhadharāmala jaya cakradharāvyakta vyaktarūpāya te namaḥ

जय हे गोविंद, गोपाल! जय हे निर्मल शंखधारी! जय हे चक्रधारी, अव्यक्त! व्यक्तरूप आपको नमस्कार हो!

श्लोक 55 (padma.2.19.55)

जय विक्रमशोभांग जय विक्रमनायक । जय लक्ष्मीविलासांग नमो वेदमयाय ते

jaya vikramaśobhāṁga jaya vikramanāyaka jaya lakṣmīvilāsāṁga namo vedamayāya te

जय हे पराक्रम से सुशोभित अंग! जय हे पराक्रम के नायक! जय हे लक्ष्मी-विलास अंग! वेदमय आपको नमस्कार हो!

श्लोक 56 (padma.2.19.56)

जय विक्रमशोभांग जय उद्यमदायक । जय उद्यमकालाय उद्यमाय नमोनमः

jaya vikramaśobhāṁga jaya udyamadāyaka jaya udyamakālāya udyamāya namonamaḥ

जय हे पराक्रम से सुशोभित अंग! जय हे उद्यमदाता! जय हे उद्यम-काल! उद्यम को नमस्कार, नमस्कार!

श्लोक 57 (padma.2.19.57)

जय उद्यमशक्ताय उद्यमत्रयधारक । युद्धोद्यमप्रवृत्ताय तस्मै धर्माय ते नमः

jaya udyamaśaktāya udyamatrayadhāraka yuddhodyamapravṛttāya tasmai dharmāya te namaḥ

जय हे उद्यम-शक्ति! त्रिविध उद्यम के धारक! युद्ध के उद्यम में प्रवृत्त, उस धर्म को आपको नमस्कार!

श्लोक 58 (padma.2.19.58)

नमो हिरण्यरेताय तस्मै ते जायते नमः । अतितेजःस्वरूपाय सर्वतेजोमयाय च

namo hiraṇyaretāya tasmai te jāyate namaḥ atitejaḥsvarūpāya sarvatejomayāya ca

हिरण्यरेता को नमस्कार, जो सदा उत्पन्न होते हैं, आपको नमस्कार! अत्यंत तेज-स्वरूप, समस्त तेज से युक्त —

श्लोक 59 (padma.2.19.59)

दैत्यतेजोविनाशाय पापतेजोहराय च । गोब्राह्मणहितार्थाय नमोस्तु परमात्मने

daityatejovināśāya pāpatejoharāya ca gobrāhmaṇahitārthāya namostu paramātmane

—दैत्यों के तेज के विनाशक, पाप के तेज को हरने वाले; गौ-ब्राह्मणों के हित के लिए, परमात्मा आपको नमस्कार हो!

श्लोक 60 (padma.2.19.60)

नमोस्तु हुतभोक्त्रे च नमो हव्यवहाय ते । नमः कव्यवहायैव स्वधारूपाय ते नमः

namostu hutabhoktre ca namo havyavahāya te namaḥ kavyavahāyaiva svadhārūpāya te namaḥ

हवि के भोक्ता को नमस्कार, देवताओं तक हव्य ले जाने वाले आपको नमस्कार! पितरों तक कव्य ले जाने वाले, स्वधा-स्वरूप आपको नमस्कार!

श्लोक 61 (padma.2.19.61)

स्वाहारूपाय यज्ञाय पावनाय नमोनमः । नमस्ते शार्ङ्गहस्ताय हरये पापहारिणे

svāhārūpāya yajñāya pāvanāya namonamaḥ namaste śārṁgahastāya haraye pāpahāriṇe

स्वाहा-स्वरूप यज्ञ, पावन को नमस्कार, नमस्कार! शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले हरि, पापहारी आपको नमस्कार!

श्लोक 62 (padma.2.19.62)

सदसच्चोदनायैव नमो विज्ञानशालिने । नमो वेदस्वरूपाय पावनाय नमोनमः

sadasaccodanāyaiva namo vijñānaśāline namo vedasvarūpāya pāvanāya namonamaḥ

सत्-असत् दोनों को प्रेरित करने वाले, विज्ञानशाली को नमस्कार! वेदस्वरूप, पावन को नमस्कार, नमस्कार!

श्लोक 63 (padma.2.19.63)

नमोस्तु हरिकेशाय सर्वक्लेशहराय ते । केशवाय परायैव नमस्ते विश्वधारिणे

namostu harikeśāya sarvakleśaharāya te keśavāya parāyaiva namaste viśvadhāriṇe

हरिकेश को नमस्कार, समस्त क्लेशों को हरने वाले आपको नमस्कार! परम केशव, विश्वधारी आपको नमस्कार!

श्लोक 64 (padma.2.19.64)

नमः कृपाकरायैव नमो हर्षमयाय ते । अनंताय नमो नित्यं शुद्धाय क्लेशनाशिने

namaḥ kṛpākarāyaiva namo harṣamayāya te anaṁtāya namo nityaṁ śuddhāya kleśanāśine

कृपा करने वाले को नमस्कार, हर्षमय आपको नमस्कार! अनंत को सदा नमस्कार, शुद्ध, क्लेशनाशक को!

श्लोक 65 (padma.2.19.65)

आनंदाय नमो नित्यं शुद्धाय केवलाय ते । रुद्रैर्नमितपादाय विरंचिनमिताय ते

ānaṁdāya namo nityaṁ śuddhāya kevalāya te rudrairnamitapādāya viraṁcinamitāya te

आनंदस्वरूप को सदा नमस्कार, शुद्ध, केवल आपको नमस्कार! रुद्रों द्वारा नमित चरणों वाले, विरंचि द्वारा नमित आपको!

श्लोक 66 (padma.2.19.66)

सुरासुरेंद्रनमित पादपद्माय ते नमः । नमोनमः परेशाय अजितायामृतात्मने

surāsureṁdranamita pādapadmāya te namaḥ namonamaḥ pareśāya ajitāyāmṛtātmane

सुर-असुरों के इंद्रों द्वारा नमित चरण-कमलों वाले आपको नमस्कार! नमस्कार, नमस्कार परमेश्वर को, अजित, अमृतात्मा को!

श्लोक 67 (padma.2.19.67)

क्षीरसागरवासाय नमः पद्माप्रियाय ते । ॐकाराय च शुद्धाय अचलाय नमोनमः

kṣīrasāgaravāsāya namaḥ padmāpriyāya te oṁkārāya ca śuddhāya acalāya namonamaḥ

क्षीरसागर-निवासी, पद्मा के प्रिय आपको नमस्कार! ओंकार, शुद्ध, अचल को नमस्कार, नमस्कार!

श्लोक 68 (padma.2.19.68)

व्यापिने व्यापकायैव सर्वव्यसनहारिणे । नमोनमो वराहाय महाकूर्माय ते नमः

vyāpine vyāpakāyaiva sarvavyasanahāriṇe namonamo varāhāya mahākūrmāya te namaḥ

व्यापी, व्यापक, समस्त विपत्तियों को हरने वाले को! वराह को नमस्कार, नमस्कार, महाकूर्म आपको नमस्कार!

श्लोक 69 (padma.2.19.69)

नमो वामनरूपाय नृसिंहाय महात्मने । नमो रामाय दिव्याय सर्वक्षत्रवधाय च

namo vāmanarūpāya nṛsiṁhāya mahātmane namo rāmāya divyāya sarvakṣatravadhāya ca

वामनरूप को नमस्कार, नृसिंह महात्मा को नमस्कार! दिव्य राम को नमस्कार, समस्त क्षत्रियों का वध करने वाले को भी!

श्लोक 70 (padma.2.19.70)

सर्वज्ञानाय मत्स्याय नमो रामाय ते नमः । नमः कृष्णाय बुद्धाय नमो म्लेच्छप्रणाशिने

sarvajñānāya matsyāya namo rāmāya te namaḥ namaḥ kṛṣṇāya buddhāya namo mlecchapraṇāśine

सर्वज्ञानी मत्स्य को नमस्कार, राम आपको नमस्कार! कृष्ण को नमस्कार, बुद्ध को नमस्कार, म्लेच्छों के नाशक को नमस्कार!

श्लोक 71 (padma.2.19.71)

नमः कपिलविप्राय हयग्रीवाय ते नमः । नमो व्यासस्वरूपाय नमः सर्वमयाय ते

namaḥ kapilaviprāya hayagrīvāya te namaḥ namo vyāsasvarūpāya namaḥ sarvamayāya te

कपिल विप्र को नमस्कार, हयग्रीव आपको नमस्कार! व्यास-स्वरूप को नमस्कार, सर्वमय आपको नमस्कार!'

श्लोक 72 (padma.2.19.72)

एवं स्तुत्वा हृषीकेशं तमुवाच जनार्दनम् । गुणानां तु परं पारं ब्रह्मा वेत्ति न पावन

evaṁ stutvā hṛṣīkeśaṁ tamuvāca janārdanam guṇānāṁ tu paraṁ pāraṁ brahmā vetti na pāvana

इस प्रकार हृषीकेश की स्तुति कर उसने उस जनार्दन से कहा — 'हे पावन! आपके गुणों की परम सीमा को तो ब्रह्मा भी नहीं जानते —

श्लोक 73 (padma.2.19.73)

न चैव स्तोतुं सर्वज्ञस्तथा रुद्र सःहस्रदृक् । वक्तुं को हि समर्थस्तु कीदृशी मे मतिर्विभो

na caiva stotuṁ sarvajñastathā rudra saḥhasradṛk vaktuṁ ko hi samarthastu kīdṛśī me matirvibho

—सर्वज्ञ ब्रह्मा, रुद्र, और सहस्रनेत्र इंद्र भी आपकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं। फिर आपके विषय में पूर्णतः कहने में कौन समर्थ है? मेरी बुद्धि तो कैसी है, हे विभो!

श्लोक 74 (padma.2.19.74)

निर्गुणं सगुणं स्तोत्रं मयैव तव केशव । क्षमशब्दापशब्दं मे तव दासोस्मि सुव्रत

nirguṇaṁ saguṇaṁ stotraṁ mayaiva tava keśava kṣamaśabdāpaśabdaṁ me tava dāsosmi suvrata

निर्गुण और सगुण दोनों रूपों में यह स्तुति मैंने ही आपके लिए की है, हे केशव। मेरे शब्दों की त्रुटियों को क्षमा कीजिए, मैं आपका दास हूँ, हे सुव्रत!

श्लोक 75 (padma.2.19.75)

जन्मजन्मनि लोकेश दयां मे कुरु पावन

janmajanmani lokeśa dayāṁ me kuru pāvana

जन्म-जन्म में, हे लोकेश, मुझ पर दया कीजिए, हे पावन!'

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