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भूमि खण्ड · अध्याय 4

सोमशर्मा की परीक्षा — कुष्ठरोगी माता-पिता की सेवा और रिक्त कुंभ

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (padma.2.4.1)

सूत उवाच- गतेषु तेषु गोलोकं वैष्णवं तमसः परम् । शिवशर्मा महाप्राज्ञः कनिष्ठं वाक्यमब्रवीत्

sūta uvāca- gateṣu teṣu golokaṁ vaiṣṇavaṁ tamasaḥ param śivaśarmā mahāprājñaḥ kaniṣṭhaṁ vākyamabravīt

सूत जी ने कहा — जब वे तमस से परे वैष्णव गोलोक चले गए, तब महाप्राज्ञ शिवशर्मा ने अपने सबसे छोटे पुत्र से यह वचन कहा —

श्लोक 2 (padma.2.4.2)

ब्राह्मण उवाच- सोमशर्मन्महाप्राज्ञ त्वं पितुर्भक्तितत्परः । अमृतस्य महाकुंभं रक्ष दत्तं मयाधुना

brāhmaṇa uvāca- somaśarmanmahāprājña tvaṁ piturbhaktitatparaḥ amṛtasya mahākuṁbhaṁ rakṣa dattaṁ mayādhunā

ब्राह्मण ने कहा — 'हे महाप्राज्ञ सोमशर्मा! तुम पितृभक्ति में तत्पर हो। अभी मेरे द्वारा दिए गए इस अमृत के महाकुंभ की रक्षा करो।

श्लोक 3 (padma.2.4.3)

तीर्थयात्रां प्रयास्यामि अनया भार्यया सह । एवमस्तु महाभाग करिष्ये रक्षणं शुभम्

tīrthayātrāṁ prayāsyāmi anayā bhāryayā saha evamastu mahābhāga kariṣye rakṣaṇaṁ śubham

मैं अपनी पत्नी के साथ तीर्थयात्रा पर जाऊँगा।' 'ऐसा ही हो, हे महाभाग! मैं इसकी शुभ रक्षा करूँगा।'

श्लोक 4 (padma.2.4.4)

कुंभं दत्वा स मेधावी तस्य हस्ते महात्मनः । दशवर्षप्रमाणं तु तपस्तेपे निरंतरम्

kuṁbhaṁ datvā sa medhāvī tasya haste mahātmanaḥ daśavarṣapramāṇaṁ tu tapastepe niraṁtaram

वह कुंभ उस महात्मा पुत्र के हाथ में देकर उस बुद्धिमान ने निरंतर दस वर्षों तक तप किया।

श्लोक 5 (padma.2.4.5)

कुंभं रक्षति धर्मात्मा दिवारात्रमतंद्रितः । पुनः स हि समायातः शिवशर्मा महायशाः

kuṁbhaṁ rakṣati dharmātmā divārātramataṁdritaḥ punaḥ sa hi samāyātaḥ śivaśarmā mahāyaśāḥ

वह धर्मात्मा दिन-रात अथक भाव से कुंभ की रक्षा करता रहा; फिर महायशस्वी शिवशर्मा लौट आए —

श्लोक 6 (padma.2.4.6)

मायां कृत्वा महाप्राज्ञो भार्यया सह तं सुतम् । कुष्ठरोगातुरो भूत्वा तस्य भार्या च तादृशी

māyāṁ kṛtvā mahāprājño bhāryayā saha taṁ sutam kuṣṭharogāturo bhūtvā tasya bhāryā ca tādṛśī

—वह महाप्राज्ञ अपनी पत्नी सहित माया रचकर, उस पुत्र की परीक्षा के लिए, कुष्ठरोग से पीड़ित होकर, और उसकी पत्नी भी वैसी ही होकर —

श्लोक 7 (padma.2.4.7)

मांसपिंडोपमौ जातौ द्वावेतौ मायया कृतौ । संनिधिं तस्य घोरस्य विप्रस्य सोमशर्मणः

māṁsapiṁḍopamau jātau dvāvetau māyayā kṛtau saṁnidhiṁ tasya ghorasya viprasya somaśarmaṇaḥ

—वे दोनों माया से मांस के पिंड के समान बना दिए गए, और घोर रूप में उस विप्र सोमशर्मा के समीप आ गए।

श्लोक 8 (padma.2.4.8)

समागतौ हि तौ दृष्ट्वा सर्वतो हि सुदुःखितौ । कृपया परयाविष्टः सोमशर्मा महायशाः

samāgatau hi tau dṛṣṭvā sarvato hi suduḥkhitau kṛpayā parayāviṣṭaḥ somaśarmā mahāyaśāḥ

उन्हें इस प्रकार आया देखकर, सर्वथा अत्यंत दुःखी उन्हें देखकर, परम करुणा से आविष्ट होकर महायशस्वी सोमशर्मा ने —

श्लोक 9 (padma.2.4.9)

तयोः पादं नमस्कृत्य भक्त्या नमितकंधरः । भवादृशौ न पश्यामि तपसाभिसमन्वितम्

tayoḥ pādaṁ namaskṛtya bhaktyā namitakaṁdharaḥ bhavādṛśau na paśyāmi tapasābhisamanvitam

—भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया, और कहा — 'मैंने आप जैसे तपोयुक्त किसी को नहीं देखा —

श्लोक 10 (padma.2.4.10)

गुणव्रातैः सुपुण्यैश्च किमिदं वर्तितं त्वयि । दासवद्देवताः सर्वा वर्तंते सर्वदा तव

guṇavrātaiḥ supuṇyaiśca kimidaṁ vartitaṁ tvayi dāsavaddevatāḥ sarvā vartaṁte sarvadā tava

—गुणों के समूहों और महान पुण्य से युक्त आप पर यह क्या बीत गई है? समस्त देवता सदा आपके सेवक के समान रहते हैं —

श्लोक 11 (padma.2.4.11)

आदेशं प्राप्य विप्रेंद्र आकृष्टास्तेजसा तव । तवांगे केन पापेन गदोयं वेदनान्वितः

ādeśaṁ prāpya vipreṁdra ākṛṣṭāstejasā tava tavāṁge kena pāpena gadoyaṁ vedanānvitaḥ

—हे विप्रेंद्र! आपकी आज्ञा पाकर, आपके तेज से आकर्षित होकर। आपके शरीर पर किस पाप से यह वेदनायुक्त रोग —

श्लोक 12 (padma.2.4.12)

संजातो ब्राह्मणश्रेष्ठ तन्मे कथय कारणम् । इयं पुण्यवती माता महापुण्या पतिव्रता

saṁjāto brāhmaṇaśreṣṭha tanme kathaya kāraṇam iyaṁ puṇyavatī mātā mahāpuṇyā pativratā

—उत्पन्न हुआ है, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ? मुझे उसका कारण बताइए। यह पुण्यवती माता, अत्यंत पुण्यशाली, पतिव्रता —

श्लोक 13 (padma.2.4.13)

या हि भर्तृप्रसादेन त्रैलोक्यं कर्तुमिच्छति । सा कथं दुःखमाप्नोति किं नास्ति तपसः फलम्

yā hi bhartṛprasādena trailokyaṁ kartumicchati sā kathaṁ duḥkhamāpnoti kiṁ nāsti tapasaḥ phalam

—जो पति की कृपा से त्रैलोक्य को भी वश में कर सकती हैं, वे इस प्रकार दुःख कैसे पा सकती हैं? क्या तप का फल नहीं होता?

श्लोक 14 (padma.2.4.14)

रागद्वेषौ परित्यज्य विविधेनापि कर्मणा । या च शुश्रूषते कांतं देववद्गुरुवत्सला

rāgadveṣau parityajya vividhenāpi karmaṇā yā ca śuśrūṣate kāṁtaṁ devavadguruvatsalā

—राग-द्वेष त्यागकर, नाना प्रकार के कर्मों से जो पति की सेवा देवता के समान, गुरु के समान भाव से करती हैं —

श्लोक 15 (padma.2.4.15)

सा कथं दुःखमाप्नोति कुष्ठरोगं सुदुःखदम् । शिवशर्मोवाच- मा शुचस्त्वं महाभाग भुज्यते कर्मजं फलम्

sā kathaṁ duḥkhamāpnoti kuṣṭharogaṁ suduḥkhadam śivaśarmovāca- mā śucastvaṁ mahābhāga bhujyate karmajaṁ phalam

—वे इतना कष्टदायक कुष्ठरोग कैसे पा सकती हैं?' शिवशर्मा ने कहा — 'हे महाभाग! शोक मत करो, कर्मजन्य फल तो भोगना ही पड़ता है —

श्लोक 16 (padma.2.4.16)

नरेण कर्मयुक्तेन पापपुण्यमयेन हि । शोधनं च कुरुष्व त्वमुभयो रोगयुक्तयोः

nareṇa karmayuktena pāpapuṇyamayena hi śodhanaṁ ca kuruṣva tvamubhayo rogayuktayoḥ

—हर मनुष्य को, जो पाप-पुण्य से युक्त कर्मों में लगा है। तुम हम दोनों रोगग्रस्तों की सेवा-शुश्रूषा करो —

श्लोक 17 (padma.2.4.17)

शुश्रूषणं महाभाग यदि पुण्यमिहेच्छसि । एवमुक्ते शुभे वाक्ये सोमशर्मा महायशाः

śuśrūṣaṇaṁ mahābhāga yadi puṇyamihecchasi evamukte śubhe vākye somaśarmā mahāyaśāḥ

—हे महाभाग! यदि यहाँ पुण्य चाहते हो।' यह शुभ वचन कहे जाने पर महायशस्वी सोमशर्मा ने —

श्लोक 18 (padma.2.4.18)

शुश्रूषां वा करिष्यामि युवयोः पुण्ययुक्तयोः । मया पापेन दुष्टेन कृपणेन द्विजोत्तम

śuśrūṣāṁ vā kariṣyāmi yuvayoḥ puṇyayuktayoḥ mayā pāpena duṣṭena kṛpaṇena dvijottama

—'मैं आप दोनों पुण्यवानों की सेवा अवश्य करूँगा। हे द्विजोत्तम! मुझ पापी, दुष्ट, दीन के लिए —

श्लोक 19 (padma.2.4.19)

किं कर्तव्यमिहाद्यैव यो गुरुं न हि पूजयेत् । एवमाभाष्य दुःखाद्वा तयोर्दुःखेन दुःखितः

kiṁ kartavyamihādyaiva yo guruṁ na hi pūjayet evamābhāṣya duḥkhādvā tayorduḥkhena duḥkhitaḥ

—आज इसके अतिरिक्त और क्या करणीय है? जो गुरुजनों की पूजा न करे वह क्या करे?' ऐसा कहकर, उनके दुःख से स्वयं दुःखी होकर —

श्लोक 20 (padma.2.4.20)

श्लेष्ममूत्रपुरीषं च उभयोः पर्यशोधयत् । पादप्रक्षालनं चक्रे अंगसंवाहनं तथा

śleṣmamūtrapurīṣaṁ ca ubhayoḥ paryaśodhayat pādaprakṣālanaṁ cakre aṁgasaṁvāhanaṁ tathā

—उसने दोनों का कफ, मूत्र और मल शुद्ध किया; उनके पैर धोए और अंगों की मालिश की।

श्लोक 21 (padma.2.4.21)

स्नानस्थानादिकं सोपि तयोर्भक्त्यान्वितः स्वयम् । द्वावेतौ हि गुरू विप्रः सोमशर्मा महायशाः

snānasthānādikaṁ sopi tayorbhaktyānvitaḥ svayam dvāvetau hi gurū vipraḥ somaśarmā mahāyaśāḥ

—वह स्वयं भक्तिपूर्वक उनके स्नान आदि सब कार्य करता रहा। महायशस्वी विप्र सोमशर्मा उन दोनों को गुरु मानकर —

श्लोक 22 (padma.2.4.22)

तीर्थं नयति धर्मात्मा स्कंधमारोप्य सत्तमः । द्वावेतौ हि स्वहस्तेन स्नापयित्वा तु मंगलैः

tīrthaṁ nayati dharmātmā skaṁdhamāropya sattamaḥ dvāvetau hi svahastena snāpayitvā tu maṁgalaiḥ

—उन्हें कंधे पर उठाकर तीर्थों में ले जाता रहा, वह धर्मात्मा, वह सत्तम। दोनों को अपने ही हाथों से मंगलपूर्वक स्नान कराकर —

श्लोक 23 (padma.2.4.23)

सुमंत्रैर्वेदविच्चैव स्नानस्य विधिपूर्वकम् । तर्पणं च पितॄणां तु देवतानां तु पूजनम्

sumaṁtrairvedaviccaiva snānasya vidhipūrvakam tarpaṇaṁ ca pitṝṇāṁ tu devatānāṁ tu pūjanam

—सुमंत्रों से, वेदज्ञ होने के कारण, विधिपूर्वक स्नान कराता, पितरों का तर्पण और देवताओं की पूजा भी —

श्लोक 24 (padma.2.4.24)

द्वाभ्यामपि स धर्मात्मा स कारयति नित्यशः । स्वयं होमं ददात्यग्नौ पचत्यन्नमनुत्तमम्

dvābhyāmapi sa dharmātmā sa kārayati nityaśaḥ svayaṁ homaṁ dadātyagnau pacatyannamanuttamam

—वह धर्मात्मा दोनों से नित्य कराता रहा। स्वयं अग्नि में हवन करता और उत्तम अन्न पकाता।

श्लोक 25 (padma.2.4.25)

संज्ञापयति सुप्रीतौ द्वावेतौ च महागुरू । शय्यासने च तौ विप्रः प्रस्वापयति नित्यशः

saṁjñāpayati suprītau dvāvetau ca mahāgurū śayyāsane ca tau vipraḥ prasvāpayati nityaśaḥ

—वह उन दोनों महागुरुओं को प्रसन्न रखता; वह विप्र उन्हें प्रतिदिन शय्या पर सुलाता।

श्लोक 26 (padma.2.4.26)

वस्त्रपुष्पादिकं सर्वं ताभ्यां नित्यं प्रयच्छति । तांबूलं बहुगंधाढ्यमुभयोरर्पयेत्स तु

vastrapuṣpādikaṁ sarvaṁ tābhyāṁ nityaṁ prayacchati tāṁbūlaṁ bahugaṁdhāḍhyamubhayorarpayetsa tu

—वह उन्हें नित्य वस्त्र, पुष्प आदि सब कुछ देता; अनेक सुगंधों से युक्त ताम्बूल भी दोनों को अर्पित करता।

श्लोक 27 (padma.2.4.27)

सोमशर्मा महाभागस्ताभ्यामपि च पूरयेत् । मूलं पयः सुभक्ष्याद्यं नित्यमेव ददात्यसौ

somaśarmā mahābhāgastābhyāmapi ca pūrayet mūlaṁ payaḥ subhakṣyādyaṁ nityameva dadātyasau

—महाभाग सोमशर्मा उनकी हर इच्छा पूर्ण करता; वह नित्य ही मूल, दूध और उत्तम भोज्य पदार्थ देता।

श्लोक 28 (padma.2.4.28)

तयोस्तु वांछितं नित्यं सोमशर्मा महायशाः । अनेन क्रमयोगेन नित्यमेव प्रसादयेत्

tayostu vāṁchitaṁ nityaṁ somaśarmā mahāyaśāḥ anena kramayogena nityameva prasādayet

—महायशस्वी सोमशर्मा उनकी नित्य इच्छाओं को इसी क्रम से सदा पूर्ण करता रहता।

श्लोक 29 (padma.2.4.29)

सोमशर्मा सुधर्मात्मा पितरौ परिपूजयेत् । सोमशर्माणमाहूय पिता कुत्सति निष्ठुरः

somaśarmā sudharmātmā pitarau paripūjayet somaśarmāṇamāhūya pitā kutsati niṣṭhuraḥ

—सुधर्मात्मा सोमशर्मा दोनों माता-पिता की पूर्ण पूजा करता। सोमशर्मा को बुलाकर निष्ठुर पिता उसकी निंदा करते —

श्लोक 30 (padma.2.4.30)

निंदितैर्निष्ठुरैर्वाक्यैस्ताडयेन्मुनिसन्निधौ । कृतकार्ये कृते पुण्ये नित्यमेव सुते पुनः

niṁditairniṣṭhurairvākyaistāḍayenmunisannidhau kṛtakārye kṛte puṇye nityameva sute punaḥ

—मुनियों के समक्ष भी निंदापूर्ण, कठोर वचनों से उसे ताड़ना देते, पुत्र द्वारा पुण्यपूर्वक किए गए कार्य के बाद भी, बार-बार —

श्लोक 31 (padma.2.4.31)

न कृतं शोभनं मह्यं त्वयैव कुलपांसन । एवं नानाविधैर्वाक्यैर्निष्ठुरैर्दुःखदायकैः

na kṛtaṁ śobhanaṁ mahyaṁ tvayaiva kulapāṁsana evaṁ nānāvidhairvākyairniṣṭhurairduḥkhadāyakaiḥ

—'हे कुलपांसन! तूने मेरे लिए कुछ भी अच्छा नहीं किया।' इस प्रकार नाना प्रकार के कठोर, दुःखदायी वचनों से —

श्लोक 32 (padma.2.4.32)

अताडयद्दंडघातैः शिवशर्मा सदातुरः । एवं कृतेपि धर्मात्मा नैव कुप्यति कर्हिचित्

atāḍayaddaṁḍaghātaiḥ śivaśarmā sadāturaḥ evaṁ kṛtepi dharmātmā naiva kupyati karhicit

—सदा रोगातुर बने शिवशर्मा उसे दंड के प्रहारों से मारते। ऐसा किए जाने पर भी वह धर्मात्मा कभी क्रोधित नहीं होता —

श्लोक 33 (padma.2.4.33)

मनसा वचसा चैव कर्मणा त्रिविधेन च । संतुष्टः सर्वदा सोपि पितरं परिपूजयेत्

manasā vacasā caiva karmaṇā trividhena ca saṁtuṣṭaḥ sarvadā sopi pitaraṁ paripūjayet

—मन, वचन और कर्म — इन तीनों प्रकार से। वह सदा संतुष्ट रहकर पिता की पूर्ण पूजा करता —

श्लोक 34 (padma.2.4.34)

तद्वत्स सोमशर्मा वै मातरं च दिनेदिने । यज्ज्ञात्वा शिवशर्मा च चरितं स्वीयमीक्षते

tadvatsa somaśarmā vai mātaraṁ ca dinedine yajjñātvā śivaśarmā ca caritaṁ svīyamīkṣate

—और वैसे ही, हे वत्स सोमशर्मा, प्रतिदिन माता की भी। यह जानकर शिवशर्मा अपने ही आचरण पर विचार करते हैं —

श्लोक 35 (padma.2.4.35)

अमृतं मत्कृते चापि आनीतं विष्णुशर्मणा । पुण्ययुक्तः स धर्मात्मा पितृभक्तिपरः सदा

amṛtaṁ matkṛte cāpi ānītaṁ viṣṇuśarmaṇā puṇyayuktaḥ sa dharmātmā pitṛbhaktiparaḥ sadā

—'मेरे लिए ही तो विष्णुशर्मा द्वारा अमृत लाया गया था; यह पुण्ययुक्त धर्मात्मा भी सदा पितृभक्ति में परायण है।'

श्लोक 36 (padma.2.4.36)

एवं बहुतिथे काले शतसंख्ये गते सति । शिवशर्मा पितस्यैव भक्तिं दृष्ट्वा विचिंत्य वै

evaṁ bahutithe kāle śatasaṁkhye gate sati śivaśarmā pitasyaiva bhaktiṁ dṛṣṭvā viciṁtya vai

इस प्रकार बहुत समय, सैकड़ों दिन बीत जाने पर, शिवशर्मा ने पिता के प्रति इस भक्ति को देखकर और विचार कर —

श्लोक 37 (padma.2.4.37)

मया वै पूर्वमित्युक्तं सुपुत्रं यज्ञसंज्ञकम् । मातृखंडानिमान्पुत्र यत्र तत्र क्षिपस्व हि

mayā vai pūrvamityuktaṁ suputraṁ yajñasaṁjñakam mātṛkhaṁḍānimānputra yatra tatra kṣipasva hi

—'मैंने पहले सुपुत्र यज्ञशर्मा से कहा था — हे पुत्र! अपनी माता के इन टुकड़ों को यहाँ-वहाँ फेंक दो —

श्लोक 38 (padma.2.4.38)

मद्वाक्यं पालितं तेन कृता न मातरि कृपा । एतत्स्वल्पतरं दुःखं निर्जीवे घातमिच्छतः

madvākyaṁ pālitaṁ tena kṛtā na mātari kṛpā etatsvalpataraṁ duḥkhaṁ nirjīve ghātamicchataḥ

—और मेरा वचन उसने पालन किया, माता के प्रति कोई करुणा नहीं दिखाई। किंतु यह तो अपेक्षाकृत छोटा दुःख था, क्योंकि निष्प्राण शरीर पर प्रहार करने की इच्छा थी —

श्लोक 39 (padma.2.4.39)

साहसं तु कृतं तेन पुत्रेण वेदशर्मणा । अस्याधिकमहं मन्ये यतोऽयं चलते न च

sāhasaṁ tu kṛtaṁ tena putreṇa vedaśarmaṇā asyādhikamahaṁ manye yato'yaṁ calate na ca

—वेदशर्मा पुत्र ने जो साहस किया, वह भी बड़ा था। इससे भी अधिक मैं इस सोमशर्मा को मानता हूँ, क्योंकि यह विचलित नहीं होता —

श्लोक 40 (padma.2.4.40)

निमेषमात्रमेवापि साहसं कारयेत्पुनः । अपरं सत्यसंपन्नं प्रभावं तपसः पुनः

nimeṣamātramevāpi sāhasaṁ kārayetpunaḥ aparaṁ satyasaṁpannaṁ prabhāvaṁ tapasaḥ punaḥ

—एक पलक झपकने भर के लिए भी। और भी सत्य से संपन्न, तप के प्रभाव को —

श्लोक 41 (padma.2.4.41)

नित्यं समाराधनेपि अधिकं चास्य दृश्यते । तस्मादस्य परीक्षा च समये तपसः कृता

nityaṁ samārādhanepi adhikaṁ cāsya dṛśyate tasmādasya parīkṣā ca samaye tapasaḥ kṛtā

—इसकी नित्य सेवा में और भी अधिक देखा जाता है। अतः उचित समय पर इसकी तप की परीक्षा ली जाए —

श्लोक 42 (padma.2.4.42)

भक्तिभावात्तथा सत्यान्नैव पुत्रः प्रणश्यति । मायया च निजांगेऽपि कुष्ठरोगो निदर्शितः

bhaktibhāvāttathā satyānnaiva putraḥ praṇaśyati māyayā ca nijāṁge'pi kuṣṭharogo nidarśitaḥ

—क्योंकि भक्तिभाव और सत्य से पुत्र कभी नष्ट नहीं होता।' और माया से अपने ही शरीर पर कुष्ठरोग दिखाया गया।

श्लोक 43 (padma.2.4.43)

श्लेष्ममूत्रमलानां च घृणां नैव करोति च । व्रणान्विशोधयेन्नित्यं स्वहस्तेन महायशाः

śleṣmamūtramalānāṁ ca ghṛṇāṁ naiva karoti ca vraṇānviśodhayennityaṁ svahastena mahāyaśāḥ

वह सोमशर्मा कफ, मूत्र, मल से घृणा बिल्कुल नहीं करता; वह महायशस्वी नित्य अपने ही हाथों से उनके घावों को शुद्ध करता।

श्लोक 44 (padma.2.4.44)

पादसंवाहनं दद्याच्छौचं चैव महामतिः । दुःसहं वचनं मह्यं दारुणं सहते सदा

pādasaṁvāhanaṁ dadyācchaucaṁ caiva mahāmatiḥ duḥsahaṁ vacanaṁ mahyaṁ dāruṇaṁ sahate sadā

वह महामति पैरों की मालिश करता और शुद्धि का ध्यान रखता। शिवशर्मा सोचते — 'यह मुझसे दुःसह, कठोर वचन सदा सहता है —

श्लोक 45 (padma.2.4.45)

भर्त्सने ताडने चैव सदाभीष्टप्रवाचकः । एवं दुःखसमाचारो मम पुत्रो महामतिः

bhartsane tāḍane caiva sadābhīṣṭapravācakaḥ evaṁ duḥkhasamācāro mama putro mahāmatiḥ

—भर्त्सना और ताड़ना भी, फिर भी सदा प्रिय वचन ही बोलता है। इस प्रकार मेरा यह महामति पुत्र कष्टपूर्ण व्यवहार सहता है —

श्लोक 46 (padma.2.4.46)

दुःखानां सागरं मन्ये बहुक्लेशैस्तु क्लेशितः । अपनेष्याम्यहं दुःखं विष्णोश्चैव प्रसादतः

duḥkhānāṁ sāgaraṁ manye bahukleśaistu kleśitaḥ apaneṣyāmyahaṁ duḥkhaṁ viṣṇoścaiva prasādataḥ

—अनेक क्लेशों से क्लेशित, मैं इसे दुःखों का सागर मानता हूँ। मैं विष्णु की कृपा से इसका यह दुःख दूर करूँगा।'

श्लोक 47 (padma.2.4.47)

विचार्य मनसा विप्रः शिवशर्मा महामतिः । पुनर्मायां चकाराथ कुंभादपहृतं पयः

vicārya manasā vipraḥ śivaśarmā mahāmatiḥ punarmāyāṁ cakārātha kuṁbhādapahṛtaṁ payaḥ

मन में यह विचार कर, महामति विप्र शिवशर्मा ने पुनः माया रची — कुंभ से अमृत हरण करके ऐसा दिखाया।

श्लोक 48 (padma.2.4.48)

पश्चात्तं च समाहूय सोमशर्माणमब्रवीत् । तव हस्ते मया दत्तममृतं व्याधिनाशनम्

paścāttaṁ ca samāhūya somaśarmāṇamabravīt tava haste mayā dattamamṛtaṁ vyādhināśanam

फिर उसे बुलाकर सोमशर्मा से कहा — 'तुम्हारे हाथ में मैंने जो रोगनाशक अमृत दिया था —

श्लोक 49 (padma.2.4.49)

तन्मे शीघ्रं प्रयच्छस्व यथा पानं करोम्यहम् । येन नीरुग्भवाम्यद्य प्रसादाद्विष्णुशर्मणः

tanme śīghraṁ prayacchasva yathā pānaṁ karomyaham yena nīrugbhavāmyadya prasādādviṣṇuśarmaṇaḥ

—वह मुझे शीघ्र लाकर दो, ताकि मैं उसका पान कर सकूँ, जिससे विष्णुशर्मा की कृपा से मैं आज नीरोग हो जाऊँ।'

श्लोक 50 (padma.2.4.50)

एवमुक्ते तदा वाक्ये ऋषिणा शिवशर्मणा । समुत्थाय त्वरायुक्तः सोमशर्मा कमंडलुम्

evamukte tadā vākye ṛṣiṇā śivaśarmaṇā samutthāya tvarāyuktaḥ somaśarmā kamaṁḍalum

ऋषि शिवशर्मा का यह वचन कहे जाने पर, सोमशर्मा तुरंत उठकर कमंडलु कुंभ लेने के लिए शीघ्रता से गया —

श्लोक 51 (padma.2.4.51)

तं च रिक्तं ततो दृष्ट्वा ह्यमृतेन विना कृतम् । कस्य पापस्य वै कर्म केन मे विप्रियं कृतम्

taṁ ca riktaṁ tato dṛṣṭvā hyamṛtena vinā kṛtam kasya pāpasya vai karma kena me vipriyaṁ kṛtam

—और उसे रिक्त, अमृत रहित देखकर सोचने लगा — 'यह किस पाप का कर्म है? किसने मेरे साथ यह अनिष्ट किया है?

श्लोक 52 (padma.2.4.52)

इति चिंतापरो भूत्वा सोमशर्मा सुदुःखितः । पितुरग्रे च वृत्तांतं कथयिष्याम्यहं यदा

iti ciṁtāparo bhūtvā somaśarmā suduḥkhitaḥ pituragre ca vṛttāṁtaṁ kathayiṣyāmyahaṁ yadā

—ऐसा चिंतित होकर सोमशर्मा अत्यंत दुःखी हुआ — 'जब मैं पिता के समक्ष यह सारा वृत्तांत कहूँगा —

श्लोक 53 (padma.2.4.53)

ततः कोपं प्रयास्येत गुरुर्मे व्याधिपीडितः । सुचिरं चिंतयित्वा तु सोमशर्मा महामतिः

tataḥ kopaṁ prayāsyeta gururme vyādhipīḍitaḥ suciraṁ ciṁtayitvā tu somaśarmā mahāmatiḥ

—तो रोगपीड़ित मेरे गुरु क्रुद्ध हो जाएँगे।' बहुत देर तक विचार कर महामति सोमशर्मा ने संकल्प किया —

श्लोक 54 (padma.2.4.54)

यदि मे सत्यमस्तीति गुरुशुश्रूषणं यदि । तपस्तप्तं मयापूर्वं निर्व्यलीकेन चेतसा

yadi me satyamastīti guruśuśrūṣaṇaṁ yadi tapastaptaṁ mayāpūrvaṁ nirvyalīkena cetasā

—'यदि मुझमें सत्य है, यदि मैंने गुरुजनों की सच्ची सेवा की है, यदि मैंने निष्कपट हृदय से अभूतपूर्व तप किया है —

श्लोक 55 (padma.2.4.55)

दमशौचादिभिः सत्यं धर्ममेव प्रपालितम् । तदा घटोऽमृतयुतो भवत्वेष न संशयः

damaśaucādibhiḥ satyaṁ dharmameva prapālitam tadā ghaṭo'mṛtayuto bhavatveṣa na saṁśayaḥ

—यदि दम, शौच आदि से मैंने सत्य धर्म का ही पालन किया है — तो यह घट पुनः अमृत से भर जाए, इसमें संदेह नहीं।'

श्लोक 56 (padma.2.4.56)

यावदेव महाभागश्चिंतयित्वा विलोकयेत् । तावच्चामृतपूर्णस्तु पुनरेवाभवद्घटः

yāvadeva mahābhāgaściṁtayitvā vilokayet tāvaccāmṛtapūrṇastu punarevābhavadghaṭaḥ

जैसे ही उस महाभाग ने ऐसा सोचकर देखा, वैसे ही वह घट पुनः अमृत से पूर्ण हो गया।

श्लोक 57 (padma.2.4.57)

तं दृष्ट्वा हर्षसंयुक्तः सोमशर्मा महायशाः । गत्वा गुरुं नमस्कृत्य कुंभमादाय सत्वरम्

taṁ dṛṣṭvā harṣasaṁyuktaḥ somaśarmā mahāyaśāḥ gatvā guruṁ namaskṛtya kuṁbhamādāya satvaram

यह देखकर हर्ष से भरे महायशस्वी सोमशर्मा ने गुरु के पास जाकर प्रणाम किया, और शीघ्रता से कुंभ लेकर —

श्लोक 58 (padma.2.4.58)

गृहाण त्वं पितश्चेमं पयः कुंभं समागतम् । पानं कुरु महाभाग गदान्मुक्तो भवाचिरम्

gṛhāṇa tvaṁ pitaścemaṁ payaḥ kuṁbhaṁ samāgatam pānaṁ kuru mahābhāga gadānmukto bhavāciram

—'हे पिता! यह लौटा हुआ अमृत का कुंभ ग्रहण कीजिए। हे महाभाग! इसका पान करें, शीघ्र ही रोगमुक्त हो जाएँ।'

श्लोक 59 (padma.2.4.59)

एतद्वाक्यं महापुण्यं सत्यधर्मार्थकं पुनः । शिवशर्मा सुतस्यापि श्रुत्वा च मधुराक्षरम्

etadvākyaṁ mahāpuṇyaṁ satyadharmārthakaṁ punaḥ śivaśarmā sutasyāpi śrutvā ca madhurākṣaram

पुत्र का यह अत्यंत पुण्यमय, सत्य-धर्म से युक्त, मधुर वचन सुनकर शिवशर्मा —

श्लोक 60 (padma.2.4.60)

हर्षेण महताविष्ट इदं वचनमब्रवीत्

harṣeṇa mahatāviṣṭa idaṁ vacanamabravīt

—महान हर्ष से आविष्ट होकर यह वचन बोले...

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