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भूमि खण्ड · अध्याय 59

धर्म का कृकल को उपदेश

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (padma.2.59.1)

विष्णुरुवाच- कृकलः सर्वतीर्थानि साधयित्वा गृहं प्रति । प्रस्थितः सार्थवाहेन महानंदसमन्वितः

viṣṇuruvāca- kṛkalaḥ sarvatīrthāni sādhayitvā gṛhaṁ prati prasthitaḥ sārthavāhena mahānaṁdasamanvitaḥ

विष्णु ने कहा — कृकल समस्त तीर्थों को साध लेने के बाद, महान आनंद से युक्त होकर, एक सार्थवाह (व्यापारी-दल) के साथ घर की ओर चल पड़ा।

श्लोक 2 (padma.2.59.2)

एवं चिंतयते नित्यं संसारः सफलो मम । तृप्ताः स्वर्गं प्रयास्यंति पितरो मम नान्यथा

evaṁ ciṁtayate nityaṁ saṁsāraḥ saphalo mama tṛptāḥ svargaṁ prayāsyaṁti pitaro mama nānyathā

वह सदा यही सोचता रहा — 'अब मेरा यह संसार सफल हो गया; मेरे संतुष्ट पितर स्वर्ग को जाएँगे, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 3 (padma.2.59.3)

तावत्प्रत्यक्षरूपेण बद्ध्वा तस्य पितामहान् । पुरतस्तस्य संब्रूते नहि ते पुण्यमुत्तमम्

tāvatpratyakṣarūpeṇa baddhvā tasya pitāmahān puratastasya saṁbrūte nahi te puṇyamuttamam

तभी प्रत्यक्ष रूप में, उसके पितरों को बाँधकर, उसके सामने प्रकट होकर किसी ने कहा — 'तुम्हें कोई उत्तम पुण्य प्राप्त नहीं हुआ है।'

श्लोक 4 (padma.2.59.4)

दिव्यरूपो महाकायः कृकलं वाक्यमब्रवीत् । तव तीर्थफलं नास्ति श्रममेव वृथा कृथाः

divyarūpo mahākāyaḥ kṛkalaṁ vākyamabravīt tava tīrthaphalaṁ nāsti śramameva vṛthā kṛthāḥ

उस दिव्यरूप, महाकाय ने कृकल से कहा — 'तुम्हें तीर्थ का कोई फल नहीं मिला है — तुमने केवल व्यर्थ ही परिश्रम किया है।'

श्लोक 5 (padma.2.59.5)

स्वयं संतोषमाप्नोषि नहि ते पुण्यमुत्तमम् । एवं श्रुत्वा ततो वैश्यः कृकलो दुःखपीडितः

svayaṁ saṁtoṣamāpnoṣi nahi te puṇyamuttamam evaṁ śrutvā tato vaiśyaḥ kṛkalo duḥkhapīḍitaḥ

'तुमने केवल स्वयं ही संतोष प्राप्त किया है — तुम्हें कोई उत्तम पुण्य नहीं मिला।' यह सुनकर वैश्य कृकल दुःख से पीड़ित हो उठा।

श्लोक 6 (padma.2.59.6)

भवान्कः संवदस्येवं कस्माद्बद्धाः पितामहाः । केन दोषप्रभावेण तन्मेत्वं कारणं वद

bhavānkaḥ saṁvadasyevaṁ kasmādbaddhāḥ pitāmahāḥ kena doṣaprabhāveṇa tanmetvaṁ kāraṇaṁ vada

'आप कौन हैं, जो मुझसे इस प्रकार कह रहे हैं? मेरे पितर क्यों बँधे हुए हैं? यह किस दोष के प्रभाव से हुआ है — मुझे इसका कारण बताइए।'

श्लोक 7 (padma.2.59.7)

कस्मात्तीर्थफलं नास्ति मम यात्रा कथं नहि । सर्वमेव समाचक्ष्व यदि जानासि संस्फुटम्

kasmāttīrthaphalaṁ nāsti mama yātrā kathaṁ nahi sarvameva samācakṣva yadi jānāsi saṁsphuṭam

'मेरी तीर्थ-यात्रा का फल क्यों नहीं है — मेरी यात्रा कैसे व्यर्थ हुई? यदि आप जानते हैं, तो मुझे सब कुछ स्पष्ट रूप से बताइए।'

श्लोक 8 (padma.2.59.8)

धर्म उवाच- पूतां पुण्यतमां स्वीयां भार्यां त्यक्त्वा प्रयाति यः । तस्य पुण्यफलं सर्वं वृथा भवति नान्यथा

dharma uvāca- pūtāṁ puṇyatamāṁ svīyāṁ bhāryāṁ tyaktvā prayāti yaḥ tasya puṇyaphalaṁ sarvaṁ vṛthā bhavati nānyathā

धर्म ने कहा — 'जो व्यक्ति अपनी पवित्र, परम पुण्यशालिनी पत्नी को त्यागकर चला जाता है, उसका समस्त पुण्य-फल व्यर्थ हो जाता है, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 9 (padma.2.59.9)

धर्माचारपरां पुण्यां साधुव्रतपरायणाम् । पतिव्रतरतां भार्यां सुगुणां पुण्यवत्सलाम्

dharmācāraparāṁ puṇyāṁ sādhuvrataparāyaṇām pativrataratāṁ bhāryāṁ suguṇāṁ puṇyavatsalām

'जो पत्नी धर्माचार में परायण, पुण्यशालिनी, सद्व्रतों में तत्पर, पतिव्रत-रत, सद्गुणी और पुण्य-प्रिय हो —'

श्लोक 10 (padma.2.59.10)

तामेवापि परित्यज्य धर्मकार्यं प्रयाति यः । वृथा तस्य कृतः सर्वो धर्मो भवति नान्यथा

tāmevāpi parityajya dharmakāryaṁ prayāti yaḥ vṛthā tasya kṛtaḥ sarvo dharmo bhavati nānyathā

'—ऐसी पत्नी को भी त्यागकर जो धर्म-कार्य के लिए जाता है, उसका किया हुआ समस्त धर्म व्यर्थ हो जाता है, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 11 (padma.2.59.11)

सर्वाचारपरा भव्या धर्मसाधनतत्परा । पतिव्रतरता नित्यं सर्वदा ज्ञानवत्सला

sarvācāraparā bhavyā dharmasādhanatatparā pativrataratā nityaṁ sarvadā jñānavatsalā

'जो सभी आचारों में तत्पर, भव्य, धर्म-साधन में लीन, नित्य पतिव्रत-रत, सदा ज्ञानवत्सला हो —'

श्लोक 12 (padma.2.59.12)

एवं गुणा भवेद्भार्या यस्य पुण्या महासती । तस्य गेहे सदा देवास्तिष्ठंति च महौजसः

evaṁ guṇā bhavedbhāryā yasya puṇyā mahāsatī tasya gehe sadā devāstiṣṭhaṁti ca mahaujasaḥ

'—ऐसे गुणों वाली, पुण्यशालिनी महासती पत्नी जिसके घर में हो, उसके घर में सदा महातेजस्वी देवता निवास करते हैं।'

श्लोक 13 (padma.2.59.13)

पितरो गेहमध्यस्थाः श्रेयो वांछंति तस्य च । गंगाद्याः पुण्यनद्यश्च सागरास्तत्र नान्यथा

pitaro gehamadhyasthāḥ śreyo vāṁchaṁti tasya ca gaṁgādyāḥ puṇyanadyaśca sāgarāstatra nānyathā

'उस घर के भीतर स्थित पितर उसका कल्याण चाहते हैं; गंगा आदि पुण्य नदियाँ तथा सागर भी वहीं निवास करते हैं, अन्यत्र नहीं।'

श्लोक 14 (padma.2.59.14)

पुण्या सती यस्य गेहे वर्तते सत्यतत्परा । तत्र यज्ञाश्च गावश्च ऋषयस्तत्र नान्यथा

puṇyā satī yasya gehe vartate satyatatparā tatra yajñāśca gāvaśca ṛṣayastatra nānyathā

'जिसके घर में पुण्यशालिनी, सत्य-तत्पर सती निवास करती है, वहीं यज्ञ हैं, वहीं गौएँ हैं, वहीं ऋषिगण हैं, अन्यत्र नहीं।'

श्लोक 15 (padma.2.59.15)

तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यानि विविधानि च । भार्यायोगेन तिष्ठंति सर्वाण्येतानि नान्यथा

tatra sarvāṇi tīrthāni puṇyāni vividhāni ca bhāryāyogena tiṣṭhaṁti sarvāṇyetāni nānyathā

'वहीं समस्त विविध पुण्य तीर्थ भी निवास करते हैं — ये सभी पत्नी के संयोग से ही रहते हैं, अन्यथा नहीं।'

श्लोक 16 (padma.2.59.16)

पुण्यभार्याप्रयोगेण गार्हस्थ्यं संप्रजायते । गार्हस्थ्यात्परमो धर्मो द्वितीयो नास्ति भूतले

puṇyabhāryāprayogeṇa gārhasthyaṁ saṁprajāyate gārhasthyātparamo dharmo dvitīyo nāsti bhūtale

'पुण्यशालिनी पत्नी के संयोग से ही गृहस्थाश्रम सार्थक होता है; गार्हस्थ्य से बढ़कर इस पृथ्वी पर दूसरा कोई धर्म नहीं है।'

श्लोक 17 (padma.2.59.17)

गृहस्थस्य गृहः पुण्यः सत्यपुण्यसमन्वितः । सर्वतीर्थमयो वैश्य सर्वदेवसमन्वितः

gṛhasthasya gṛhaḥ puṇyaḥ satyapuṇyasamanvitaḥ sarvatīrthamayo vaiśya sarvadevasamanvitaḥ

'हे वैश्य! गृहस्थ का घर पुण्यमय, सत्य-पुण्य से युक्त, समस्त तीर्थों से युक्त और समस्त देवताओं से युक्त होता है।'

श्लोक 18 (padma.2.59.18)

गार्हस्थ्यं च समाश्रित्य सर्वे जीवंति जंतवः । तादृशं नैव पश्यामि अन्यमाश्रममुत्तमम्

gārhasthyaṁ ca samāśritya sarve jīvaṁti jaṁtavaḥ tādṛśaṁ naiva paśyāmi anyamāśramamuttamam

'गार्हस्थ्य का आश्रय लेकर ही सभी प्राणी जीवित रहते हैं; मुझे इसके समान कोई अन्य उत्तम आश्रम दिखाई नहीं देता।'

श्लोक 19 (padma.2.59.19)

मंत्राग्निहोत्रं देवाश्च सर्वे धर्माः सनातनाः । दानाचाराः प्रवर्तंते यस्य पुंसश्च वै गृहे

maṁtrāgnihotraṁ devāśca sarve dharmāḥ sanātanāḥ dānācārāḥ pravartaṁte yasya puṁsaśca vai gṛhe

'जिस पुरुष के घर में मंत्र, अग्निहोत्र, सभी देवता, सभी सनातन धर्म तथा दान-आचार प्रवर्तित होते हैं —'

श्लोक 20 (padma.2.59.20)

एवं यो भार्यया हीनस्तस्यगेहं वनायते । यज्ञाश्च वै न सिध्यंति दानानि विविधानि च

evaṁ yo bhāryayā hīnastasyagehaṁ vanāyate yajñāśca vai na sidhyaṁti dānāni vividhāni ca

'—किंतु जो पत्नी-रहित होता है, उसका घर वन के समान हो जाता है; वहाँ यज्ञ सिद्ध नहीं होते, न ही विविध दान।'

श्लोक 21 (padma.2.59.21)

भार्याहीनस्य पुंसोपि न सिध्यति महाव्रतम् । धर्मकर्माणि सर्वाणि पुण्यानि विविधानि च

bhāryāhīnasya puṁsopi na sidhyati mahāvratam dharmakarmāṇi sarvāṇi puṇyāni vividhāni ca

'पत्नी-रहित पुरुष के महाव्रत भी सिद्ध नहीं होते, न ही उसके सभी धर्म-कर्म, न विविध पुण्य-कर्म।'

श्लोक 22 (padma.2.59.22)

नास्ति भार्यासमं तीर्थं धर्मसाधनहेतवे । शृणुष्व त्वं गृहस्थस्य नान्यो धर्मो जगत्त्रये

nāsti bhāryāsamaṁ tīrthaṁ dharmasādhanahetave śṛṇuṣva tvaṁ gṛhasthasya nānyo dharmo jagattraye

'धर्म-साधन के लिए पत्नी के समान कोई तीर्थ नहीं है। सुनो, गृहस्थ के लिए त्रिलोक में इससे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है।'

श्लोक 23 (padma.2.59.23)

यत्र भार्या गृहं तत्र पुरुषस्यापि नान्यथा । ग्रामे वाप्यथवारण्ये सर्वधर्मस्य साधनम्

yatra bhāryā gṛhaṁ tatra puruṣasyāpi nānyathā grāme vāpyathavāraṇye sarvadharmasya sādhanam

'जहाँ पत्नी है, वहीं पुरुष का सच्चा घर है, अन्यत्र नहीं — चाहे गाँव में हो या वन में, वही सभी धर्मों की सिद्धि का साधन है।'

श्लोक 24 (padma.2.59.24)

नास्ति भार्यासमं तीर्थं नास्ति भार्यासमं सुखम् । नास्ति भार्यासमं पुण्यं तारणाय हिताय च

nāsti bhāryāsamaṁ tīrthaṁ nāsti bhāryāsamaṁ sukham nāsti bhāryāsamaṁ puṇyaṁ tāraṇāya hitāya ca

'पत्नी के समान कोई तीर्थ नहीं, पत्नी के समान कोई सुख नहीं, तारण और हित के लिए पत्नी के समान कोई पुण्य नहीं है।'

श्लोक 25 (padma.2.59.25)

धर्मयुक्तां सतीं भार्यां त्यक्त्वा यासि नराधम । गृहं धर्मं परित्यज्य क्वास्ते धर्मस्य ते फलम्

dharmayuktāṁ satīṁ bhāryāṁ tyaktvā yāsi narādhama gṛhaṁ dharmaṁ parityajya kvāste dharmasya te phalam

'हे नराधम! तुमने अपनी धर्मयुक्त सती पत्नी को छोड़कर, घर और धर्म को त्यागकर यात्रा की — तो फिर तुम्हारे धर्म का फल कहाँ है?'

श्लोक 26 (padma.2.59.26)

तया विना यदा तीर्थे श्राद्धदानं कृतं त्वया । तेन दोषेण वै बद्धास्तव पूर्वपितामहाः

tayā vinā yadā tīrthe śrāddhadānaṁ kṛtaṁ tvayā tena doṣeṇa vai baddhāstava pūrvapitāmahāḥ

'जब तुमने उसके बिना तीर्थ में श्राद्ध-दान किया, तो उसी दोष से तुम्हारे पूर्वज पितर बँध गए हैं।'

श्लोक 27 (padma.2.59.27)

भवांश्चौरो ह्यमी चौरा यैस्तु भुक्तं सुलोलुपैः । त्वया दत्तस्य श्राद्धस्य अन्नमेवं तया विना

bhavāṁścauro hyamī caurā yaistu bhuktaṁ sulolupaiḥ tvayā dattasya śrāddhasya annamevaṁ tayā vinā

'तुम स्वयं चोर हो, और वे भी चोर हैं, जिन लोभी लोगों ने तुम्हारे द्वारा दिए गए, उसके बिना किए गए श्राद्ध के अन्न को खाया।'

श्लोक 28 (padma.2.59.28)

सुपुत्रः श्रद्धया युक्तः श्राद्धदानं ददाति यः । भार्या दत्तेन पिंडेन तस्य पुण्यं वदाम्यहम्

suputraḥ śraddhayā yuktaḥ śrāddhadānaṁ dadāti yaḥ bhāryā dattena piṁḍena tasya puṇyaṁ vadāmyaham

'जो सुपुत्र श्रद्धा से युक्त होकर श्राद्ध-दान करता है, उसकी पत्नी द्वारा दिए गए पिंड से जो पुण्य होता है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ।'

श्लोक 29 (padma.2.59.29)

यथाऽमृतस्य पानेन नृणां तृप्तिर्हि जायते । तथा पितॄणां श्राद्धेन सत्यंसत्यं वदाम्यहम्

yathā'mṛtasya pānena nṛṇāṁ tṛptirhi jāyate tathā pitṝṇāṁ śrāddhena satyaṁsatyaṁ vadāmyaham

'जैसे अमृत पीने से मनुष्यों को तृप्ति होती है, वैसे ही उस श्राद्ध से पितरों को तृप्ति होती है — यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।'

श्लोक 30 (padma.2.59.30)

गार्हस्थ्यस्य च धर्मस्य भार्या भवति स्वामिनी । त्वयैषा वंचिता मूढ चौरकर्मकृतं वृथा

gārhasthyasya ca dharmasya bhāryā bhavati svāminī tvayaiṣā vaṁcitā mūḍha caurakarmakṛtaṁ vṛthā

'गृहस्थ-धर्म की स्वामिनी पत्नी ही होती है। हे मूढ़! तुमने उसे इस प्रकार ठगा है, और तुम्हारा यह कार्य चोरी के समान व्यर्थ ही हुआ है।'

श्लोक 31 (padma.2.59.31)

अमी पितामहाश्चौरा यैर्भुक्तं तु तया विना । भार्या पचति चेदन्नं स्वहस्तेनामृतोपमम्

amī pitāmahāścaurā yairbhuktaṁ tu tayā vinā bhāryā pacati cedannaṁ svahastenāmṛtopamam

'इन पितरों ने भी उसके बिना दिया गया अन्न खाकर चोर बन गए हैं। किंतु यदि पत्नी अपने हाथ से अन्न पकाए, तो वह अमृत के समान हो जाता है।'

श्लोक 32 (padma.2.59.32)

तदन्नमेवभुंजंति पितरो हृष्टमानसाः । तेनैव तृप्तिमायांति संतुष्टाश्च भवंति ते

tadannamevabhuṁjaṁti pitaro hṛṣṭamānasāḥ tenaiva tṛptimāyāṁti saṁtuṣṭāśca bhavaṁti te

'उसी अन्न को पितर प्रसन्नचित्त होकर ग्रहण करते हैं; उसी से उन्हें तृप्ति मिलती है, और वे संतुष्ट होते हैं।'

श्लोक 33 (padma.2.59.33)

तस्माद्भार्यां विना धर्मः पुरुषस्य न सिध्यति । नास्ति भार्यासमं तीर्थं पुंसां सुगतिदायकम्

tasmādbhāryāṁ vinā dharmaḥ puruṣasya na sidhyati nāsti bhāryāsamaṁ tīrthaṁ puṁsāṁ sugatidāyakam

'इसलिए पत्नी के बिना पुरुष का धर्म सिद्ध नहीं होता। पुरुषों को सुगति देने वाला पत्नी के समान कोई तीर्थ नहीं है।'

श्लोक 34 (padma.2.59.34)

भार्यां विना च यो धर्मः स एव विफलो भवेत्

bhāryāṁ vinā ca yo dharmaḥ sa eva viphalo bhavet

'पत्नी के बिना जो भी धर्म किया जाए, वह निश्चय ही निष्फल हो जाता है।'

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60