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भूमि खण्ड · अध्याय 61

पिप्पल का अहंकार और सारस की फटकार

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

श्लोक 1 (padma.2.61.1)

वेन उवाच- भार्यातीर्थं समाख्यातं सर्वतीर्थोत्तमोत्तमम् । पितृतीर्थं समाख्याहि पुत्राणां तारणं परम्

vena uvāca- bhāryātīrthaṁ samākhyātaṁ sarvatīrthottamottamam pitṛtīrthaṁ samākhyāhi putrāṇāṁ tāraṇaṁ param

वेन ने कहा — 'पत्नी-तीर्थ का वर्णन किया जा चुका, जो सभी तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है। अब मुझे पितृ-तीर्थ बताइए, जो पुत्रों के लिए परम तारक है।'

श्लोक 2 (padma.2.61.2)

विष्णुरुवाच- कुरुक्षेत्रे महाक्षेत्रे कुंडलो नाम ब्राह्मणः । सुकर्मा नाम सत्पुत्रः कुंडलस्य महात्मनः

viṣṇuruvāca- kurukṣetre mahākṣetre kuṁḍalo nāma brāhmaṇaḥ sukarmā nāma satputraḥ kuṁḍalasya mahātmanaḥ

विष्णु ने कहा — कुरुक्षेत्र महाक्षेत्र में कुंडल नामक एक ब्राह्मण था; उस महात्मा कुंडल का सत्पुत्र सुकर्मा नामक था।

श्लोक 3 (padma.2.61.3)

गुरू तस्य महावृद्धौ धर्मज्ञौ शास्त्रकोविदौ । द्वावेतौ तु महात्मानौ जरया परिपीडितौ

gurū tasya mahāvṛddhau dharmajñau śāstrakovidau dvāvetau tu mahātmānau jarayā paripīḍitau

उसके दोनों गुरुजन (माता-पिता) अत्यंत वृद्ध, धर्मज्ञ और शास्त्रकोविद थे; ये दोनों महात्मा जरावस्था से पीड़ित थे।

श्लोक 4 (padma.2.61.4)

तयोः शुश्रूषणं चक्रे भक्त्या च परया ततः । धर्मज्ञो भावसंयुक्तो अहर्निशमनारतम्

tayoḥ śuśrūṣaṇaṁ cakre bhaktyā ca parayā tataḥ dharmajño bhāvasaṁyukto aharniśamanāratam

वह धर्मज्ञ, भाव से युक्त होकर, दिन-रात निरंतर परम भक्ति से उन दोनों की सेवा करता रहा।

श्लोक 5 (padma.2.61.5)

तस्माद्वेदानधीते स पितुः शास्त्राण्यनेकशः । सर्वाचारपरो दक्षो धर्मज्ञो ज्ञानवत्सलः

tasmādvedānadhīte sa pituḥ śāstrāṇyanekaśaḥ sarvācāraparo dakṣo dharmajño jñānavatsalaḥ

उसी से उसने वेदों का, और अपने पिता के अनेक शास्त्रों का भी अध्ययन किया; वह सभी आचारों में तत्पर, दक्ष, धर्मज्ञ और ज्ञानवत्सल था।

श्लोक 6 (padma.2.61.6)

अंगसंवाहनं चक्रे गुर्वोश्च स्वयमेव सः । पादप्रक्षालनं चैव स्नानभोजनकीं क्रियाम्

aṁgasaṁvāhanaṁ cakre gurvośca svayameva saḥ pādaprakṣālanaṁ caiva snānabhojanakīṁ kriyām

वह स्वयं ही अपने गुरुजनों के अंगों की मालिश करता था, उनके चरण धोता था, और स्नान-भोजन की सेवा करता था।

श्लोक 7 (padma.2.61.7)

भक्त्या चैव स्वभावेन तद्ध्याने तन्मयो भवेत् । मातापित्रोश्च राजेंद्र उपचर्यां प्रकारयेत्

bhaktyā caiva svabhāvena taddhyāne tanmayo bhavet mātāpitrośca rājeṁdra upacaryāṁ prakārayet

भक्ति और स्वभाव से वह उन्हीं के ध्यान में तन्मय रहता था; हे राजेंद्र! वह अपनी माता-पिता की सेवा करता रहता था।

श्लोक 8 (padma.2.61.8)

सूत उवाच- तद्वर्तमानकाले तु बभूव नृपसत्तम । पिप्पलो नाम वै विप्रः कश्यपस्य महात्मनः

sūta uvāca- tadvartamānakāle tu babhūva nṛpasattama pippalo nāma vai vipraḥ kaśyapasya mahātmanaḥ

सूत ने कहा — हे नृपसत्तम! उसी समय, कश्यप के महात्मा वंश का पिप्पल नामक एक विप्र था।

श्लोक 9 (padma.2.61.9)

तपस्तेपे निराहारो जितात्मा जितमत्सरः । दयादानदमोपेतः कामं क्रोधं विजित्य सः

tapastepe nirāhāro jitātmā jitamatsaraḥ dayādānadamopetaḥ kāmaṁ krodhaṁ vijitya saḥ

वह निराहार रहकर तप करता था, जितात्मा और जितमत्सर था; दया, दान और दम से युक्त, उसने काम और क्रोध को जीत लिया था।

श्लोक 10 (padma.2.61.10)

दशारण्यगतो धीमाञ्ज्ञानशांतिपरायणः । सर्वेंद्रियाणि संयम्य तपस्तेपे महामनाः

daśāraṇyagato dhīmāñjñānaśāṁtiparāyaṇaḥ sarveṁdriyāṇi saṁyamya tapastepe mahāmanāḥ

वह बुद्धिमान दशारण्य में जाकर, ज्ञान और शांति में परायण होकर, समस्त इंद्रियों को संयमित कर तप करने लगा।

श्लोक 11 (padma.2.61.11)

तपःप्रभावतस्तस्य जंतवो गतविग्रहाः । वसंति सुयुगे तत्र एकोदरगता इव

tapaḥprabhāvatastasya jaṁtavo gatavigrahāḥ vasaṁti suyuge tatra ekodaragatā iva

उसके तप के प्रभाव से जीव-जंतु अपना वैर त्यागकर, कृतयुग की भाँति वहाँ मानो एक ही उदर से उत्पन्न हुए हों ऐसे रहने लगे।

श्लोक 12 (padma.2.61.12)

तत्तपस्तस्य मुनयो दृष्ट्वा विस्मयमाययुः । नेदृशं केनचित्तप्तं यथासौ तप्यते मुनिः

tattapastasya munayo dṛṣṭvā vismayamāyayuḥ nedṛśaṁ kenacittaptaṁ yathāsau tapyate muniḥ

उसके उस तप को देखकर मुनि आश्चर्यचकित हो उठे — 'ऐसा तप किसी ने भी नहीं किया, जैसा यह मुनि कर रहा है।'

श्लोक 13 (padma.2.61.13)

देवाश्च इंद्रप्रमुखाः परं विस्मयमाययुः । अहो अस्य तपस्तीव्रं शमश्चेंद्रियसंयमः

devāśca iṁdrapramukhāḥ paraṁ vismayamāyayuḥ aho asya tapastīvraṁ śamaśceṁdriyasaṁyamaḥ

इंद्र आदि देवगण भी परम आश्चर्य में डूब गए — 'अहो! इसका तप कितना तीव्र है, इसका शम और इंद्रिय-संयम कैसा है!'

श्लोक 14 (padma.2.61.14)

निर्विकारो निरुद्वेगः कामक्रोधविवर्जितः । शीतवातातपसहो धराधर इवस्थितः

nirvikāro nirudvegaḥ kāmakrodhavivarjitaḥ śītavātātapasaho dharādhara ivasthitaḥ

विकार-रहित, उद्वेगहीन, काम-क्रोध से रहित, शीत-वायु-धूप को सहन करता हुआ, वह किसी पर्वत के समान स्थिर खड़ा रहा।

श्लोक 15 (padma.2.61.15)

विषये विमुखो धीरो मनसोतीतसंग्रहम् । न शृणोति यथा शब्दं कस्यचिद्द्विजसत्तमः

viṣaye vimukho dhīro manasotītasaṁgraham na śṛṇoti yathā śabdaṁ kasyaciddvijasattamaḥ

विषयों से विमुख, धीर, मन से समस्त ग्रहण-वृत्ति से परे — वह द्विजसत्तम किसी की भी ध्वनि नहीं सुनता था।

श्लोक 16 (padma.2.61.16)

संस्थानं तादृशं गत्वा स्थित्वा एकाग्रमानसः । ब्रह्मध्यानमयो भूत्वा सानंदमुखपंकजः

saṁsthānaṁ tādṛśaṁ gatvā sthitvā ekāgramānasaḥ brahmadhyānamayo bhūtvā sānaṁdamukhapaṁkajaḥ

ऐसे ही स्थान पर जाकर, वहीं स्थिर होकर, एकाग्रमन होकर, ब्रह्मध्यान में लीन होकर, आनंद से भरे कमल-मुख वाला होकर —

श्लोक 17 (padma.2.61.17)

अश्मकाष्ठमयो भूत्वा निश्चेष्टो गिरिवत्स्थितः । स्थाणुवद्दृश्यते चासौ सुस्थिरो धर्मवत्सलः

aśmakāṣṭhamayo bhūtvā niśceṣṭo girivatsthitaḥ sthāṇuvaddṛśyate cāsau susthiro dharmavatsalaḥ

—वह मानो पत्थर और काष्ठ का बना हो, निश्चेष्ट, पर्वत के समान खड़ा रहा; वह स्थाणु के समान दिखाई देता था, अत्यंत स्थिर, धर्मवत्सल।

श्लोक 18 (padma.2.61.18)

तपःक्लिष्टशरीरोति श्रद्धावाननसूयकः । एवं वर्षसहस्रैकं संजातं तस्य धीमतः

tapaḥkliṣṭaśarīroti śraddhāvānanasūyakaḥ evaṁ varṣasahasraikaṁ saṁjātaṁ tasya dhīmataḥ

तप से क्लिष्ट शरीर वाला, श्रद्धावान् और ईर्ष्यारहित — इस प्रकार उस बुद्धिमान के एक सहस्र वर्ष बीत गए।

श्लोक 19 (padma.2.61.19)

पिपीलिकाभिर्बह्वीभिः कृतं मृद्भारसंचयम् । तस्योपरि महाकायं वल्मीकं निजमंदिरम्

pipīlikābhirbahvībhiḥ kṛtaṁ mṛdbhārasaṁcayam tasyopari mahākāyaṁ valmīkaṁ nijamaṁdiram

अनेक चींटियों ने उसके ऊपर मिट्टी का ढेर इकट्ठा कर दिया, एक विशाल बाँबी, जो उनका अपना घर बन गई।

श्लोक 20 (padma.2.61.20)

वल्मीकोदरमध्यस्थो जडीभूत इवस्थितः । स एवं पिप्पलो विप्रस्तपते सुमहत्तपः

valmīkodaramadhyastho jaḍībhūta ivasthitaḥ sa evaṁ pippalo viprastapate sumahattapaḥ

बाँबी के भीतर मध्य में स्थित होकर वह मानो जड़वत् खड़ा रहा; इस प्रकार वह विप्र पिप्पल अत्यंत महान तप करता रहा।

श्लोक 21 (padma.2.61.21)

कृष्णसर्पैस्तु सर्वत्र वेष्टितो द्विजसत्तमः । तमुग्रतेजसं विप्रं प्रदशंति विषोल्बणाः

kṛṣṇasarpaistu sarvatra veṣṭito dvijasattamaḥ tamugratejasaṁ vipraṁ pradaśaṁti viṣolbaṇāḥ

वह द्विजसत्तम सर्वत्र काले सर्पों से लिपटा हुआ था; विषभरे वे सर्प उस उग्रतेजस्वी विप्र को डँसते रहे।

श्लोक 22 (padma.2.61.22)

संप्राप्य गात्रमर्माणि विषं तस्य न भेदयेत् । तेजसा तस्य विप्रस्य नागाः शांतिमथागमन्

saṁprāpya gātramarmāṇi viṣaṁ tasya na bhedayet tejasā tasya viprasya nāgāḥ śāṁtimathāgaman

उसके शरीर के मर्मस्थलों तक पहुँचकर भी उनका विष उसे भेद न सका; उस विप्र के तेज से स्वयं वे सर्प भी शांत हो गए।

श्लोक 23 (padma.2.61.23)

तस्य कायात्समुद्भूता अर्चिषो दीप्ततेजसः । नानारूपाः सुबहुशो दृश्यंते च पृथक्पृथक्

tasya kāyātsamudbhūtā arciṣo dīptatejasaḥ nānārūpāḥ subahuśo dṛśyaṁte ca pṛthakpṛthak

उसके शरीर से देदीप्यमान तेज की ज्वालाएँ निकलती थीं, नाना रूपों वाली, अत्यंत बहुसंख्यक, पृथक्-पृथक् दिखाई देती थीं।

श्लोक 24 (padma.2.61.24)

यथा वह्नेः खरतरास्तथाविधा नरोत्तम । यथामेघोदरे सूर्यः प्रविष्टो भाति रश्मिभिः

yathā vahneḥ kharatarāstathāvidhā narottama yathāmeghodare sūryaḥ praviṣṭo bhāti raśmibhiḥ

हे नरोत्तम! जैसे अग्नि की तीव्र लपटें, वैसी ही वे थीं; जैसे मेघ के भीतर प्रविष्ट सूर्य अपनी किरणों से चमकता है —

श्लोक 25 (padma.2.61.25)

वल्मीकस्थस्तथाविप्रः पिप्पलो भाति तेजसा । सर्पा दशंति विप्रं तं सक्रोधा दशनैरपि

valmīkasthastathāvipraḥ pippalo bhāti tejasā sarpā daśaṁti vipraṁ taṁ sakrodhā daśanairapi

—वैसे ही बाँबी में स्थित वह विप्र पिप्पल अपने तेज से चमकता था। क्रोध से भरे वे सर्प अपने दाँतों से उस विप्र को डँसते रहे —

श्लोक 26 (padma.2.61.26)

न भिंदंति च दंष्ट्राग्राच्चर्म भित्त्वा नृपोत्तम । एवं वर्षसहस्रैकं तप आचरतस्ततः

na bhiṁdaṁti ca daṁṣṭrāgrāccarma bhittvā nṛpottama evaṁ varṣasahasraikaṁ tapa ācaratastataḥ

—फिर भी, हे नृपोत्तम! अपनी दाढ़ों की नोक से चमड़ी को बींधकर भी वे उसे सचमुच घायल नहीं कर सके। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष तक तप का आचरण करते हुए —

श्लोक 27 (padma.2.61.27)

गतं तु राजराजेंद्र मुनेस्तस्य महात्मनः । त्रिकालं साध्यमानस्य शीतवर्षातपान्वितः

gataṁ tu rājarājeṁdra munestasya mahātmanaḥ trikālaṁ sādhyamānasya śītavarṣātapānvitaḥ

—हे राजराजेंद्र! उस महात्मा मुनि का वह समय बीत गया, जो त्रिकाल-साधना करते हुए शीत-वर्षा-धूप सहता रहा।

श्लोक 28 (padma.2.61.28)

गतः कालो महाराज पिप्पलस्य महात्मनः । तद्वच्च वायुभक्षं तु कृतं तेन महात्मना

gataḥ kālo mahārāja pippalasya mahātmanaḥ tadvacca vāyubhakṣaṁ tu kṛtaṁ tena mahātmanā

हे महाराज! उस महात्मा पिप्पल का वह समय बीत गया; और उस महात्मा ने फिर वायु-भक्षण करना आरंभ किया।

श्लोक 29 (padma.2.61.29)

त्रीणि वर्षसहस्राणि गतानि तस्य तप्यतः । तस्य मूर्ध्नि ततो देवैः पुष्पवृष्टिः कृता पुरा

trīṇi varṣasahasrāṇi gatāni tasya tapyataḥ tasya mūrdhni tato devaiḥ puṣpavṛṣṭiḥ kṛtā purā

तप करते हुए उसके तीन सहस्र वर्ष बीत गए; तब पूर्वकाल में देवताओं ने उसके सिर पर पुष्पों की वर्षा की।

श्लोक 30 (padma.2.61.30)

ब्रह्मज्ञोसि महाभाग धर्मज्ञोसि न संशयः । सर्वज्ञानमयोऽसि त्वं संजातः स्वेनकर्मणा

brahmajñosi mahābhāga dharmajñosi na saṁśayaḥ sarvajñānamayo'si tvaṁ saṁjātaḥ svenakarmaṇā

'हे महाभाग! तुम ब्रह्मज्ञ हो, धर्मज्ञ हो, इसमें संदेह नहीं। अपने ही कर्मों से तुम सर्वज्ञानमय हो गए हो।'

श्लोक 31 (padma.2.61.31)

यं यं त्वं वांछसे कामं तं तं प्राप्स्यसि नान्यथा । सर्वकामप्रसिद्धस्त्वं स्वत एव भविष्यसि

yaṁ yaṁ tvaṁ vāṁchase kāmaṁ taṁ taṁ prāpsyasi nānyathā sarvakāmaprasiddhastvaṁ svata eva bhaviṣyasi

'तुम जिस-जिस कामना की इच्छा करोगे, वह-वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगी; तुम स्वयं ही सर्वकाम-सिद्ध हो जाओगे।'

श्लोक 32 (padma.2.61.32)

समाकर्ण्य महद्वाक्यं पिप्पलोपि महामनाः । प्रणम्य देवताः सर्वा भक्त्या नमितकंधरः

samākarṇya mahadvākyaṁ pippalopi mahāmanāḥ praṇamya devatāḥ sarvā bhaktyā namitakaṁdharaḥ

यह महान वचन सुनकर वह महामना पिप्पल भी, भक्तिपूर्वक अपनी गर्दन झुकाकर, समस्त देवताओं को प्रणाम करने लगा।

श्लोक 33 (padma.2.61.33)

हर्षेण महताविष्टो वचनं प्रत्युवाच सः । इदं विश्वं जगत्सर्वं ममवश्यं यथा भवेत्

harṣeṇa mahatāviṣṭo vacanaṁ pratyuvāca saḥ idaṁ viśvaṁ jagatsarvaṁ mamavaśyaṁ yathā bhavet

अत्यंत हर्ष से भरकर उसने यह वचन कहा — 'यह समस्त विश्व, यह सारा जगत् मेरे ही वश में हो जाए।'

श्लोक 34 (padma.2.61.34)

तथा कुरुध्वं देवेंद्रा विद्याधरो भवाम्यहम् । एवमुक्त्वा स मेधावी विरराम नृपोत्तम

tathā kurudhvaṁ deveṁdrā vidyādharo bhavāmyaham evamuktvā sa medhāvī virarāma nṛpottama

'हे देवेंद्रो! ऐसा ही करो; मैं विद्याधर बन जाऊँ।' हे नृपोत्तम! ऐसा कहकर वह मेधावी चुप हो गया।

श्लोक 35 (padma.2.61.35)

एवमस्त्विति ते प्रोचुर्द्विजश्रेष्ठं सुरास्तदा । दत्वा वरं महाभाग जग्मुस्तस्मै महात्मने

evamastviti te procurdvijaśreṣṭhaṁ surāstadā datvā varaṁ mahābhāga jagmustasmai mahātmane

'ऐसा ही हो' — देवताओं ने तब उस द्विजश्रेष्ठ से कहा; और हे महाभाग! उस महात्मा को वर देकर वे चले गए।

श्लोक 36 (padma.2.61.36)

गतेषु तेषु देवेषु पिप्पलो द्विजसत्तमः । ब्रह्मण्यं साधयेन्नित्यं विश्ववश्यं प्रचिंतयेत्

gateṣu teṣu deveṣu pippalo dvijasattamaḥ brahmaṇyaṁ sādhayennityaṁ viśvavaśyaṁ praciṁtayet

जब वे देवगण चले गए, तब वह द्विजसत्तम पिप्पल सदा अपनी ब्राह्मणोचित साधना करता हुआ, समस्त विश्व के अपने वश में होने का ही चिंतन करता रहा।

श्लोक 37 (padma.2.61.37)

तदाप्रभृति राजेंद्र पिप्पलो द्विजसत्तमः । विद्याधरपदं लब्ध्वा कामगामी महीयते

tadāprabhṛti rājeṁdra pippalo dvijasattamaḥ vidyādharapadaṁ labdhvā kāmagāmī mahīyate

हे राजेंद्र! उस समय से वह द्विजसत्तम पिप्पल, विद्याधर-पद प्राप्त कर, इच्छानुसार विचरण करता हुआ महिमामंडित हुआ।

श्लोक 38 (padma.2.61.38)

एवं स पिप्पलो विप्रो विद्याधरपदं गतः । संजातो देवलोकेशः सर्वशास्त्रविशारदः

evaṁ sa pippalo vipro vidyādharapadaṁ gataḥ saṁjāto devalokeśaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ

इस प्रकार वह विप्र पिप्पल विद्याधर-पद को प्राप्त हुआ, और देवलोक का स्वामी बन गया, समस्त शास्त्रों में निपुण।

श्लोक 39 (padma.2.61.39)

एकदा तु महातेजाः पिप्पलः पर्यचिंतयत् । विश्ववश्यं भवेत्सर्वं मम दत्तो वरोत्तमः

ekadā tu mahātejāḥ pippalaḥ paryaciṁtayat viśvavaśyaṁ bhavetsarvaṁ mama datto varottamaḥ

एक बार उस महातेजस्वी पिप्पल ने विचार किया — 'समस्त विश्व मेरे वश में होना चाहिए — मुझे यह उत्तम वर प्राप्त है।'

श्लोक 40 (padma.2.61.40)

तदर्थं प्रत्ययं कर्तुमुद्यतो द्विजपुंगवः । यं यं चिंतयते कर्तुं तं तं हि वशमानयेत्

tadarthaṁ pratyayaṁ kartumudyato dvijapuṁgavaḥ yaṁ yaṁ ciṁtayate kartuṁ taṁ taṁ hi vaśamānayet

इसीलिए वह द्विजश्रेष्ठ इसकी परीक्षा करने को उद्यत हुआ — वह जो कुछ करने का विचार करता, उसे वश में ला लेता।

श्लोक 41 (padma.2.61.41)

एवं स प्रत्यये जाते मनसा पर्यकल्पयत् । द्वितीयो नास्ति वै लोके मत्समः पुरुषोत्तमः

evaṁ sa pratyaye jāte manasā paryakalpayat dvitīyo nāsti vai loke matsamaḥ puruṣottamaḥ

जब यह इस प्रकार सिद्ध हो गया, तो उसने मन ही मन विचार किया — 'इस लोक में मेरे समान दूसरा कोई पुरुषोत्तम नहीं है।'

श्लोक 42 (padma.2.61.42)

सूत उवाच- एवं हि कल्पमानस्य पिप्पलस्य महात्मनः । ज्ञात्वा मानसिकं भावं सारसस्तमुवाच ह

sūta uvāca- evaṁ hi kalpamānasya pippalasya mahātmanaḥ jñātvā mānasikaṁ bhāvaṁ sārasastamuvāca ha

सूत ने कहा — जब वह महात्मा पिप्पल इस प्रकार कल्पना कर रहा था, तब उसके मानसिक भाव को जानकर एक सारस (क्रौंच पक्षी) ने उससे कहा —

श्लोक 43 (padma.2.61.43)

सरस्तीरगतो राजन्सुस्वरं व्यंजनान्वितम् । स्वनं सौष्ठवसंयुक्तमुक्तवान्पिप्पलं प्रति

sarastīragato rājansusvaraṁ vyaṁjanānvitam svanaṁ sauṣṭhavasaṁyuktamuktavānpippalaṁ prati

—हे राजन्! सरोवर के तट पर गया वह सारस मधुर, स्पष्ट, सुगठित स्वर में पिप्पल से बोला —

श्लोक 44 (padma.2.61.44)

कस्मादुद्वहसे गर्वमेवं त्वं परमात्मकम् । सर्ववश्यात्मिकीं सिद्धिं नाहं मन्ये तवैव हि

kasmādudvahase garvamevaṁ tvaṁ paramātmakam sarvavaśyātmikīṁ siddhiṁ nāhaṁ manye tavaiva hi

'तुम अपने भीतर ऐसा परम गर्व क्यों धारण करते हो? मैं तो नहीं मानता कि तुम्हें सर्व-वश्यकारी सिद्धि प्राप्त है।'

श्लोक 45 (padma.2.61.45)

वश्यावश्यमिदं कर्म अर्वाचीनं प्रशस्यते । पराचीनं न जानासि पिप्पल त्वं हि मूढधीः

vaśyāvaśyamidaṁ karma arvācīnaṁ praśasyate parācīnaṁ na jānāsi pippala tvaṁ hi mūḍhadhīḥ

'यह वश्य-अवश्य का कार्य केवल वर्तमान, अर्वाचीन दृष्टि से सराहा जाता है; तुम उसके पराचीन (गूढ़तर) अर्थ को नहीं जानते, हे पिप्पल! तुम मूढ़बुद्धि हो।'

श्लोक 46 (padma.2.61.46)

वर्षाणां तु सहस्राणि यावत्त्रीणि त्वया तपः । समाचीर्णं ततो गर्वं कुरुषे किं मुधा द्विज

varṣāṇāṁ tu sahasrāṇi yāvattrīṇi tvayā tapaḥ samācīrṇaṁ tato garvaṁ kuruṣe kiṁ mudhā dvija

'तीन सहस्र वर्षों तक तुमने तप का आचरण किया — तो हे द्विज! तुम व्यर्थ ही गर्व क्यों धारण करते हो?'

श्लोक 47 (padma.2.61.47)

कुंडलस्य सुतो धीरः सुकर्मानाम यः सुधीः । वश्यावश्यं जगत्सर्वं तस्यासीच्छृणु सांप्रतम्

kuṁḍalasya suto dhīraḥ sukarmānāma yaḥ sudhīḥ vaśyāvaśyaṁ jagatsarvaṁ tasyāsīcchṛṇu sāṁpratam

'कुंडल का पुत्र, वह धीर, सुबुद्धि सुकर्मा नामक — उसके लिए तो, अब सुनो, समस्त वश्य-अवश्य जगत् उसी का था।'

श्लोक 48 (padma.2.61.48)

अर्वाचीनं पराचीनं स वै जानाति बुद्धिमान् । लोके नास्ति महाज्ञानी तत्समः शृणु पिप्पल

arvācīnaṁ parācīnaṁ sa vai jānāti buddhimān loke nāsti mahājñānī tatsamaḥ śṛṇu pippala

'वह बुद्धिमान अर्वाचीन और पराचीन दोनों को जानता है। हे पिप्पल! सुनो, इस लोक में उसके समान कोई महाज्ञानी नहीं है।'

श्लोक 49 (padma.2.61.49)

न कुंडलस्य पुत्रेण सदृशस्त्वं सुकर्मणा । न दत्तं तेन वै दानं न ज्ञानं परिचिंतितम्

na kuṁḍalasya putreṇa sadṛśastvaṁ sukarmaṇā na dattaṁ tena vai dānaṁ na jñānaṁ pariciṁtitam

'तुम कुंडल के पुत्र सुकर्मा के समान नहीं हो। उसने न तो कोई (औपचारिक) दान दिया, न ही किसी ज्ञान का चिंतन किया —'

श्लोक 50 (padma.2.61.50)

हुतयज्ञादिकं कर्म न कृतं तेन वै कदा । न गतस्तीर्थयात्रायां न च वह्नेरुपासनम्

hutayajñādikaṁ karma na kṛtaṁ tena vai kadā na gatastīrthayātrāyāṁ na ca vahnerupāsanam

'—उसने कभी हवन-यज्ञ आदि कर्म नहीं किए, न तीर्थयात्रा पर गया, न अग्नि की उपासना की।'

श्लोक 51 (padma.2.61.51)

स कदा कृतवान्विप्र धर्मसेवार्थमुत्तमम् । स्वच्छंदचारी ज्ञानात्मा पितृमातृसुहृत्सदा

sa kadā kṛtavānvipra dharmasevārthamuttamam svacchaṁdacārī jñānātmā pitṛmātṛsuhṛtsadā

'हे विप्र! उसने कब धर्म-सेवा के लिए कोई उत्तम कार्य किया? वह तो स्वच्छंद विचरण करने वाला, ज्ञानात्मा, सदा अपने माता-पिता का सुहृद ही रहा।'

श्लोक 52 (padma.2.61.52)

वेदाध्ययनसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थकोविदः । यादृशं तस्य वै ज्ञानं बालस्यापि सुकर्मणः

vedādhyayanasaṁpannaḥ sarvaśāstrārthakovidaḥ yādṛśaṁ tasya vai jñānaṁ bālasyāpi sukarmaṇaḥ

'वेदाध्ययन में संपन्न, समस्त शास्त्रों के अर्थ में निपुण — बालक सुकर्मा का ऐसा ही ज्ञान था —'

श्लोक 53 (padma.2.61.53)

तादृशं नास्ति ते ज्ञानं वृथा त्वं गर्वमुद्वहेः । पिप्पल उवाच- को भवान्पक्षिरूपेण मामेवं परिकुत्सयेत्

tādṛśaṁ nāsti te jñānaṁ vṛthā tvaṁ garvamudvaheḥ pippala uvāca- ko bhavānpakṣirūpeṇa māmevaṁ parikutsayet

'—वैसा ज्ञान तुम्हारे पास नहीं है; तुम व्यर्थ ही गर्व धारण करते हो।' पिप्पल ने कहा — 'तुम कौन हो, जो एक पक्षी के रूप में मुझे इस प्रकार धिक्कार रहे हो?'

श्लोक 54 (padma.2.61.54)

कस्मान्निंदसि मे ज्ञानं पराचीनं तु कीदृशम् । तन्मे विस्तरतो ब्रूहि त्वयि ज्ञानं कथं भवेत्

kasmānniṁdasi me jñānaṁ parācīnaṁ tu kīdṛśam tanme vistarato brūhi tvayi jñānaṁ kathaṁ bhavet

'तुम मेरे ज्ञान की निंदा क्यों करते हो? वह पराचीन ज्ञान कैसा है? मुझे विस्तार से बताओ — और तुममें भला ऐसा ज्ञान कैसे हो सकता है?'

श्लोक 55 (padma.2.61.55)

अर्वाचीनगतिं सर्वां पराचीनस्य सांप्रतम् । वद त्वमंडजश्रेष्ठ ज्ञानपूर्वं सुविस्तरम्

arvācīnagatiṁ sarvāṁ parācīnasya sāṁpratam vada tvamaṁḍajaśreṣṭha jñānapūrvaṁ suvistaram

'हे अंडज-श्रेष्ठ! अर्वाचीन और पराचीन, दोनों की समस्त गति मुझे ज्ञानपूर्वक विस्तार से बताओ।'

श्लोक 56 (padma.2.61.56)

किं वा ब्रह्मा च विष्णुश्च किं वा रुद्रो भविष्यसि । सारस उवाच- नास्ति ते तपसो भावः फलं नास्ति च तस्य तु

kiṁ vā brahmā ca viṣṇuśca kiṁ vā rudro bhaviṣyasi sārasa uvāca- nāsti te tapaso bhāvaḥ phalaṁ nāsti ca tasya tu

'क्या तुम ब्रह्मा हो, या विष्णु, या रुद्र बन जाओगे?' सारस ने कहा — 'तुम्हारे तप में न कोई सच्चा भाव है, न ही उसका कोई फल है।'

श्लोक 57 (padma.2.61.57)

त्वया न परितप्तस्य तपसः सांप्रतं शृणु । कुंडलस्यापि पुत्रस्य बालस्यापि यथा गुणः

tvayā na paritaptasya tapasaḥ sāṁprataṁ śṛṇu kuṁḍalasyāpi putrasya bālasyāpi yathā guṇaḥ

'अब सुनो उस तप के विषय में, जो तुमने वास्तव में नहीं किया — जैसा गुण कुंडल के पुत्र में था, यद्यपि वह बालक ही था।'

श्लोक 58 (padma.2.61.58)

तथा ते नास्ति वै ज्ञानं परिज्ञातं न तत्पदम् । इतो गत्वापि पृच्छ त्वं मम रूपं द्विजोत्तम

tathā te nāsti vai jñānaṁ parijñātaṁ na tatpadam ito gatvāpi pṛccha tvaṁ mama rūpaṁ dvijottama

'तुम्हें वैसा ज्ञान बिल्कुल भी नहीं है; वह पद तुम्हें ज्ञात नहीं है। हे द्विजोत्तम! यहाँ से जाकर मेरे वास्तविक रूप के विषय में पूछो।'

श्लोक 59 (padma.2.61.59)

स वदिष्यति धर्मात्मा सर्वं ज्ञानं तवैव हि । विष्णुरुवाच- एवमाकर्ण्य तत्सर्वं सारसेन प्रभाषितम्

sa vadiṣyati dharmātmā sarvaṁ jñānaṁ tavaiva hi viṣṇuruvāca- evamākarṇya tatsarvaṁ sārasena prabhāṣitam

'वह धर्मात्मा ही तुम्हें यह सारा ज्ञान बताएगा।' विष्णु ने कहा — सारस द्वारा कहे गए इस सब को सुनकर —

श्लोक 60 (padma.2.61.60)

निर्जगाम स वेगेन दशारण्यं महाश्रमम्

nirjagāma sa vegena daśāraṇyaṁ mahāśramam

—वह वेगपूर्वक दशारण्य के उस महान आश्रम की ओर चल पड़ा।

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