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भूमि खण्ड · अध्याय 79

ययाति का अश्रुबिंदुमती से विवाह

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (padma.2.79.1)

विशालोवाच- शर्मिष्ठा यस्य वै भार्या देवयानी वरानना । सौभाग्यं तत्र वै दृष्टमन्यथा नास्ति भूपते

viśālovāca- śarmiṣṭhā yasya vai bhāryā devayānī varānanā saubhāgyaṁ tatra vai dṛṣṭamanyathā nāsti bhūpate

विशाला ने कहा - हे भूपते! जिसकी पत्नी शर्मिष्ठा और सुंदरी देवयानी हैं, वहाँ जो सौभाग्य दिखता है, वह अन्यथा नहीं है।

श्लोक 2 (padma.2.79.2)

तत्कथं त्वं महाभाग अस्याः कार्यवशो भवेः । सपत्नजेन भावेन भवान्भर्ता प्रतिष्ठितः

tatkathaṁ tvaṁ mahābhāga asyāḥ kāryavaśo bhaveḥ sapatnajena bhāvena bhavānbhartā pratiṣṭhitaḥ

हे महाभाग! तब आप इसकी सौत बनकर कैसे इसके अधीन कार्य के हो सकेंगे? आप तो पहले से ही सपत्नी वाले पति के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 3 (padma.2.79.3)

ससर्पोसि महाराज भूतले चंदनं यथा । सर्पैश्च वेष्टितो राजन्महाचंदन एव हि

sasarposi mahārāja bhūtale caṁdanaṁ yathā sarpaiśca veṣṭito rājanmahācaṁdana eva hi

हे महाराज! जैसे पृथ्वी पर चंदन का महान वृक्ष सर्पों से लिपटा रहता है, वैसे ही आप भी सर्पतुल्य सपत्नियों से लिपटे हुए हैं।

श्लोक 4 (padma.2.79.4)

तथा त्वं वेष्टितः सर्पैः सपत्नीनामसंज्ञकैः । वरमग्निप्रवेशश्च शिखाग्रात्पतनं वरम्

tathā tvaṁ veṣṭitaḥ sarpaiḥ sapatnīnāmasaṁjñakaiḥ varamagnipraveśaśca śikhāgrātpatanaṁ varam

हे राजन्! अनाम सौतों रूपी सर्पों से घिरा होना - इससे तो अग्नि में प्रवेश करना या शिखर से गिर जाना ही बेहतर है।

श्लोक 5 (padma.2.79.5)

रूपतेजः समायुक्तं सपत्नीसहितं प्रियम् । न वरं तादृशं कांतं सपत्नीविषसंयुतम्

rūpatejaḥ samāyuktaṁ sapatnīsahitaṁ priyam na varaṁ tādṛśaṁ kāṁtaṁ sapatnīviṣasaṁyutam

रूप और तेज से युक्त प्रियतम भी यदि सौतों सहित हो, तो वह श्रेष्ठ नहीं; सौतों के विष से युक्त ऐसा प्रिय वरणीय नहीं है।

श्लोक 6 (padma.2.79.6)

तस्मान्न मन्यते कांतं भवंतं गुणसागरम् । राजोवाच- देवयान्या न मे कार्यं शर्मिष्ठया वरानने

tasmānna manyate kāṁtaṁ bhavaṁtaṁ guṇasāgaram rājovāca- devayānyā na me kāryaṁ śarmiṣṭhayā varānane

इसलिए यह गुणों के सागर आपको प्रिय नहीं मानती। राजा ने कहा - हे सुंदरमुखी! मुझे अब देवयानी और शर्मिष्ठा से कोई प्रयोजन नहीं है।

श्लोक 7 (padma.2.79.7)

इत्यर्थं पश्य मे कोशं सत्वधर्मसमन्वितम् । अश्रुबिंदुमत्युवाच- अहं राज्यस्य भोक्त्री च तव कायस्य भूपते

ityarthaṁ paśya me kośaṁ satvadharmasamanvitam aśrubiṁdumatyuvāca- ahaṁ rājyasya bhoktrī ca tava kāyasya bhūpate

इसी अर्थ में मेरा सत्त्व और धर्म से युक्त कोश देख लो। अश्रुबिंदुमती ने कहा - हे भूपते! मैं आपके राज्य और आपके शरीर की ही भोक्त्री बनूँगी।

श्लोक 8 (padma.2.79.8)

यद्यद्वदाम्यहं भूप तत्तत्कार्यं त्वया ध्रुवम् । इत्यर्थे मम देहि स्वं करं त्वं धर्मवत्सल

yadyadvadāmyahaṁ bhūpa tattatkāryaṁ tvayā dhruvam ityarthe mama dehi svaṁ karaṁ tvaṁ dharmavatsala

हे राजन्! मैं जो कुछ भी कहूँ, वह आपको अवश्य करना होगा। हे धर्मवत्सल! इसी शर्त पर आप मुझे अपना हाथ दीजिए,

श्लोक 9 (padma.2.79.9)

बहुधर्मसमोपेतं चारुलक्षणसंयुतम् । राजोवाच- अन्य भार्यां न विंदामि त्वां विना वरवर्णिनि

bahudharmasamopetaṁ cārulakṣaṇasaṁyutam rājovāca- anya bhāryāṁ na viṁdāmi tvāṁ vinā varavarṇini

जो अनेक धर्मों से युक्त और सुंदर लक्षणों वाला है। राजा ने कहा - हे वरवर्णिनी! तुम्हारे बिना मुझे कोई अन्य पत्नी नहीं चाहिए।

श्लोक 10 (padma.2.79.10)

राज्यं च सकलामुर्वीं मम कायं वरानने । सकोशं भुंक्ष्व चार्वंगि एष दत्तः करस्तव

rājyaṁ ca sakalāmurvīṁ mama kāyaṁ varānane sakośaṁ bhuṁkṣva cārvaṁgi eṣa dattaḥ karastava

हे सुंदरांगी! राज्य, यह संपूर्ण पृथ्वी और मेरा शरीर - कोश सहित सब भोग करो, यह मेरा हाथ तुम्हें दिया गया।

श्लोक 11 (padma.2.79.11)

यदेव भाषसे भद्रे तदेवं तु करोम्यहम् । अश्रुबिंदुमत्युवाच- अनेनापि महाभाग तव भार्या भवाम्यहम्

yadeva bhāṣase bhadre tadevaṁ tu karomyaham aśrubiṁdumatyuvāca- anenāpi mahābhāga tava bhāryā bhavāmyaham

हे भद्रे! तुम जो भी कहोगी, वही मैं करूँगा। अश्रुबिंदुमती ने कहा - हे महाभाग! इसी शर्त पर मैं आपकी पत्नी बनूँगी।

श्लोक 12 (padma.2.79.12)

एवमाकर्ण्य राजेंद्रो हर्षव्याकुललोचनः । गांधर्वेण विवाहेन ययातिः पृथिवीपतिः

evamākarṇya rājeṁdro harṣavyākulalocanaḥ gāṁdharveṇa vivāhena yayātiḥ pṛthivīpatiḥ

यह सुनकर हर्ष से व्याकुल नेत्रों वाले राजाओं के राजा, पृथ्वीपति ययाति ने गांधर्व विधि से विवाह किया।

श्लोक 13 (padma.2.79.13)

उपयेमे सुतां पुण्यां मन्मथस्य नरोत्तम । तया सार्द्धं महात्मा वै रमते नृपनंदनः

upayeme sutāṁ puṇyāṁ manmathasya narottama tayā sārddhaṁ mahātmā vai ramate nṛpanaṁdanaḥ

हे नरोत्तम! उन्होंने मन्मथ की उस पवित्र कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार किया। उस महात्मा राजपुत्र ने उसके साथ रमण किया।

श्लोक 14 (padma.2.79.14)

सागरस्य च तीरेषु वनेषूपवनेषु च । पर्वतेषु च रम्येषु सरित्सु च तया सह

sāgarasya ca tīreṣu vaneṣūpavaneṣu ca parvateṣu ca ramyeṣu saritsu ca tayā saha

समुद्र के तटों पर, वनों और उपवनों में, सुंदर पर्वतों पर और नदियों में, उसी के साथ -

श्लोक 15 (padma.2.79.15)

रमते राजराजेंद्रस्तारुण्येन महीपतिः । एवं विंशत्सहस्राणि गतानि निरतस्य च

ramate rājarājeṁdrastāruṇyena mahīpatiḥ evaṁ viṁśatsahasrāṇi gatāni niratasya ca

वह राजाओं का राजा, पृथ्वीपति यौवन में लीन होकर रमण करता रहा। इस प्रकार बीस हजार वर्ष व्यतीत हो गए,

श्लोक 16 (padma.2.79.16)

भूपस्य तस्य राजेंद्र ययातेस्तु महात्मनः । विष्णुरुवाच- एवं तया महाराजो ययातिर्मोहितस्तदा

bhūpasya tasya rājeṁdra yayātestu mahātmanaḥ viṣṇuruvāca- evaṁ tayā mahārājo yayātirmohitastadā

हे राजेंद्र! उस महात्मा राजा ययाति के, जो निरंतर उसी में लीन रहे। विष्णु ने कहा - इस प्रकार उस महाराज ययाति को -

श्लोक 17 (padma.2.79.17)

कंदर्पस्य प्रपंचेन इंद्रस्यार्थे महामते । सुकर्मोवाच- एवं पिप्पल राजासौ ययातिः पृथिवीपतिः

kaṁdarpasya prapaṁcena iṁdrasyārthe mahāmate sukarmovāca- evaṁ pippala rājāsau yayātiḥ pṛthivīpatiḥ

हे महामते! कंदर्प के इस छल से, इंद्र के प्रयोजन हेतु, मोहित कर दिया गया। सुकर्मा ने कहा - हे पिप्पल! इस प्रकार वह राजा ययाति, पृथ्वीपति,

श्लोक 18 (padma.2.79.18)

तस्या मोहनकामेन रतेन ललितेन च । न जानाति दिनं रात्रिं मुग्धः कामस्य कन्यया

tasyā mohanakāmena ratena lalitena ca na jānāti dinaṁ rātriṁ mugdhaḥ kāmasya kanyayā

उसके मोहक प्रेम और मधुर चेष्टाओं में, काम की उस कन्या से मुग्ध होकर, दिन और रात का भान भी नहीं रखता था।

श्लोक 19 (padma.2.79.19)

एकदा मोहितं भूपं ययातिं कामनंदिनी । उवाच प्रणतं नम्रं वशगं चारुलोचना

ekadā mohitaṁ bhūpaṁ yayātiṁ kāmanaṁdinī uvāca praṇataṁ namraṁ vaśagaṁ cārulocanā

एक दिन काम की उस प्रसन्न पुत्री ने, मोहित राजा ययाति को, जो नम्र होकर उसके वश में था, सुनयना ने कहा -

श्लोक 20 (padma.2.79.20)

अश्रुबिंदुमत्युवाच- संजातं दोहदं कांत तन्मे कुरु मनोरथम् । अश्वमेधमखश्रेष्ठं यजस्व पृथिवीपते

aśrubiṁdumatyuvāca- saṁjātaṁ dohadaṁ kāṁta tanme kuru manoratham aśvamedhamakhaśreṣṭhaṁ yajasva pṛthivīpate

अश्रुबिंदुमती ने कहा - हे प्रिय! मुझे एक दोहद (अभिलाषा) उत्पन्न हुई है, मेरी वह मनोकामना पूर्ण कीजिए। हे पृथ्वीपते! श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ कीजिए।

श्लोक 21 (padma.2.79.21)

राजोवाच- एवमस्तु महाभागे करोमि तव सुप्रियम् । समाहूय सुतश्रेष्ठं राज्यभोगे विनिःस्पृहम्

rājovāca- evamastu mahābhāge karomi tava supriyam samāhūya sutaśreṣṭhaṁ rājyabhoge viniḥspṛham

राजा ने कहा - हे महाभागे! ऐसा ही हो, मैं तुम्हारा यह प्रिय कार्य करता हूँ। उन्होंने राज्य-भोग से विरक्त अपने श्रेष्ठ पुत्र को बुलवाया।

श्लोक 22 (padma.2.79.22)

समाहूतः समायातो भक्त्यानमितकंधरः । बद्धांजलिपुटो भूत्वा प्रणाममकरोत्तदा

samāhūtaḥ samāyāto bhaktyānamitakaṁdharaḥ baddhāṁjalipuṭo bhūtvā praṇāmamakarottadā

बुलाए जाने पर वह भक्तिपूर्वक सिर झुकाए हुए आया; हाथ जोड़कर उसने प्रणाम किया।

श्लोक 23 (padma.2.79.23)

तस्याः पादौ ननामाथ भक्त्या नमितकंधरः । आदेशो दीयतां राजन्येनाहूतः समागतः

tasyāḥ pādau nanāmātha bhaktyā namitakaṁdharaḥ ādeśo dīyatāṁ rājanyenāhūtaḥ samāgataḥ

भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर उसने उसके [राजा के] चरणों में प्रणाम किया - 'हे राजन्! आज्ञा दीजिए, जिस कारण आपने मुझे बुलाया है, वह मैं जान लूँ।'

श्लोक 24 (padma.2.79.24)

किं करोमि महाभाग दासस्ते प्रणतोस्मि च । राजोवाच- अश्वमेधस्य यज्ञस्य संभारं कुरु पुत्रक

kiṁ karomi mahābhāga dāsaste praṇatosmi ca rājovāca- aśvamedhasya yajñasya saṁbhāraṁ kuru putraka

'हे महाभाग! मैं क्या करूँ? मैं आपका सेवक होकर प्रणत हूँ।' राजा ने कहा - हे पुत्र! अश्वमेध यज्ञ की सामग्री जुटाओ।

श्लोक 25 (padma.2.79.25)

समाहूय द्विजान्पुण्यानृत्विजो भूमिपालकान् । एवमुक्तो महातेजाः पूरुः परमधार्मिकः

samāhūya dvijānpuṇyānṛtvijo bhūmipālakān evamukto mahātejāḥ pūruḥ paramadhārmikaḥ

पवित्र ब्राह्मणों, ऋत्विजों और भूमिपालकों को बुलाकर [यह करो]। इस प्रकार आज्ञा पाकर वह महातेजस्वी, परम धर्मात्मा पूरु -

श्लोक 26 (padma.2.79.26)

सर्वं चकार संपूर्णं यथोक्तं तु महात्मना । तया सार्धं स जग्राह सुदीक्षां कामकन्यया

sarvaṁ cakāra saṁpūrṇaṁ yathoktaṁ tu mahātmanā tayā sārdhaṁ sa jagrāha sudīkṣāṁ kāmakanyayā

उस महात्मा ने जैसा कहा गया था, वैसा सब कुछ पूर्ण किया। उन्होंने उस काम-कन्या के साथ यज्ञ-दीक्षा ग्रहण की।

श्लोक 27 (padma.2.79.27)

अश्वमेधयज्ञवाटे दत्वा दानान्यनेकधा । ब्राह्मणेभ्यो महाराज भूरिदानमनंतकम्

aśvamedhayajñavāṭe datvā dānānyanekadhā brāhmaṇebhyo mahārāja bhūridānamanaṁtakam

अश्वमेध यज्ञ के मंडप में अनेक प्रकार के दान देकर, हे महाराज! ब्राह्मणों को अनंत, प्रचुर दान देकर,

श्लोक 28 (padma.2.79.28)

दीनेषु च विशेषेण ययातिः पृथिवीपतिः । यज्ञांते च महाराजस्तामुवाच वराननाम्

dīneṣu ca viśeṣeṇa yayātiḥ pṛthivīpatiḥ yajñāṁte ca mahārājastāmuvāca varānanām

विशेष रूप से दीनों को भी - पृथ्वीपति ययाति ने ऐसा किया। यज्ञ के अंत में महाराज ने उस सुंदरी से कहा -

श्लोक 29 (padma.2.79.29)

अन्यत्ते सुप्रियं बाले किं करोमि वदस्व मे । तत्सर्वं देवि कर्तास्मि साध्यासाध्यं वरानने

anyatte supriyaṁ bāle kiṁ karomi vadasva me tatsarvaṁ devi kartāsmi sādhyāsādhyaṁ varānane

'हे बाला! तुम्हें और क्या प्रिय है, मुझे बताओ। हे देवी! तुम्हारा साध्य या असाध्य, जो भी हो, मैं वह सब करूँगा।'

श्लोक 30 (padma.2.79.30)

सुकर्मोवाच- इत्युक्ता तेन सा राज्ञा भूपालं प्रत्युवाच ह । जातो मे दोहदो राजंस्तत्कुरुष्व ममानघ

sukarmovāca- ityuktā tena sā rājñā bhūpālaṁ pratyuvāca ha jāto me dohado rājaṁstatkuruṣva mamānagha

सुकर्मा ने कहा - राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर उसने राजा से कहा - 'हे राजन्! मुझमें एक दोहद उत्पन्न हुआ है, हे निष्पाप! उसे पूर्ण कीजिए।'

श्लोक 31 (padma.2.79.31)

इंद्रलोकं ब्रह्मलोकं शिवलोकं तथैव च । विष्णुलोकं महाराज द्रष्टुमिच्छामि सुप्रियम्

iṁdralokaṁ brahmalokaṁ śivalokaṁ tathaiva ca viṣṇulokaṁ mahārāja draṣṭumicchāmi supriyam

'हे महाराज! इंद्रलोक, ब्रह्मलोक, शिवलोक और वैसे ही विष्णुलोक को भी देखना चाहती हूँ, हे प्रिय!'

श्लोक 32 (padma.2.79.32)

दर्शयस्व महाभाग यदहं सुप्रिया तव । एवमुक्तस्तया राजा तामुवाच स सुप्रियाम्

darśayasva mahābhāga yadahaṁ supriyā tava evamuktastayā rājā tāmuvāca sa supriyām

'हे महाभाग! मुझे यह दिखाइए, यदि मैं आपकी प्रिय हूँ।' उसके इस प्रकार कहे जाने पर राजा ने अपनी उस प्रिया से कहा -

श्लोक 33 (padma.2.79.33)

साधु साधु वरारोहे पुण्यमेव प्रभाषसे । स्त्रीस्वभावाच्च चापल्यात् कौतुकाच्च वरानने

sādhu sādhu varārohe puṇyameva prabhāṣase strīsvabhāvācca cāpalyāt kautukācca varānane

'साधु, साधु! हे वरारोहे! तुम पुण्य की ही बात कहती हो, स्त्री-स्वभाव, चंचलता और कौतूहल के कारण, हे सुंदरमुखी!'

श्लोक 34 (padma.2.79.34)

यत्तवोक्तं महाभागे तदसाध्यं विभाति मे । तत्साध्यं पुण्यदानेन यज्ञेन तपसापि च

yattavoktaṁ mahābhāge tadasādhyaṁ vibhāti me tatsādhyaṁ puṇyadānena yajñena tapasāpi ca

'हे महाभागे! तुमने जो कहा, वह मुझे असंभव प्रतीत होता है। वह पुण्य-दान, यज्ञ और तप से भी साध्य नहीं है।'

श्लोक 35 (padma.2.79.35)

अन्यथा न भवेत्साध्यं यत्त्वयोक्तं वरानने । असाध्यं तु भवत्या वै भाषितं पुण्यमिश्रितम्

anyathā na bhavetsādhyaṁ yattvayoktaṁ varānane asādhyaṁ tu bhavatyā vai bhāṣitaṁ puṇyamiśritam

'हे सुंदरमुखी! तुमने जो कहा वह अन्यथा साध्य नहीं हो सकता। तुमने जो पुण्यमिश्रित बात कही है, वह असाध्य ही है।'

श्लोक 36 (padma.2.79.36)

मर्त्यलोकाच्छरीरेण अनेनापि च मानवः । श्रुतो दृष्टो न मेद्यापि गतः स्वर्गं सुपुण्यकृत्

martyalokāccharīreṇa anenāpi ca mānavaḥ śruto dṛṣṭo na medyāpi gataḥ svargaṁ supuṇyakṛt

'इस मर्त्य शरीर के साथ भी कोई मनुष्य - ऐसा मैंने आज तक न सुना, न देखा है - इस शरीर से स्वर्ग गया हो, चाहे वह कितना ही पुण्यवान क्यों न हो।'

श्लोक 37 (padma.2.79.37)

ततोऽसाध्यं वरारोहे यत्त्वया भाषितं मम । अन्यदेव करिष्यामि प्रियं ते तद्वद प्रिये

tato'sādhyaṁ varārohe yattvayā bhāṣitaṁ mama anyadeva kariṣyāmi priyaṁ te tadvada priye

'इसलिए, हे वरारोहे! जो तुमने मुझसे कहा वह असाध्य है। तुम्हारे लिए मैं कुछ और प्रिय कार्य करूँगा, हे प्रिये! वह बताओ।'

श्लोक 38 (padma.2.79.38)

देव्युवाच- अन्यैश्च मानुषै राजन्न साध्यं स्यान्न संशयः । त्वयि साध्यं महाराज सत्यंसत्यं वदाम्यहम्

devyuvāca- anyaiśca mānuṣai rājanna sādhyaṁ syānna saṁśayaḥ tvayi sādhyaṁ mahārāja satyaṁsatyaṁ vadāmyaham

देवी ने कहा - हे राजन्! अन्य मनुष्यों के लिए यह असाध्य हो सकता है, इसमें संशय नहीं। परंतु हे महाराज! यह आपके लिए साध्य है, मैं सत्य ही सत्य कहती हूँ।

श्लोक 39 (padma.2.79.39)

तपसा यशसा क्षात्रै र्दानैर्यज्ञैश्च भूपते । नास्ति भवादृशश्चान्यो मर्त्यलोके च मानवः

tapasā yaśasā kṣātrai rdānairyajñaiśca bhūpate nāsti bhavādṛśaścānyo martyaloke ca mānavaḥ

हे भूपते! तप से, यश से, क्षात्रबल से, दान और यज्ञों से - मर्त्यलोक में आपके समान कोई अन्य मनुष्य नहीं है।

श्लोक 40 (padma.2.79.40)

क्षात्रं बलं सुतेजश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । तस्मादेवं प्रकर्तव्यं मत्प्रियं नहुषात्मज

kṣātraṁ balaṁ sutejaśca tvayi sarvaṁ pratiṣṭhitam tasmādevaṁ prakartavyaṁ matpriyaṁ nahuṣātmaja

हे नहुषपुत्र! क्षात्र बल, तेज - यह सब आपमें प्रतिष्ठित है। इसलिए मेरा यह प्रिय कार्य आपको अवश्य करना चाहिए।

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80