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भूमि खण्ड · अध्याय 78

ययाति द्वारा वृद्धावस्था का पूरु के यौवन से विनिमय

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

श्लोक 1 (padma.2.78.1)

ययातिरुवाच- एकेन गृह्यतां पुत्रा जरा मे दुःखदायिनी । धीरेण भवतां मध्ये तारुण्यं मम दीयताम्

yayātiruvāca- ekena gṛhyatāṁ putrā jarā me duḥkhadāyinī dhīreṇa bhavatāṁ madhye tāruṇyaṁ mama dīyatām

ययाति ने कहा - हे पुत्रो! मेरी यह दुःखदायिनी जरा तुममें से कोई एक ले ले; तुम्हारे बीच से कोई धैर्यवान मुझे अपना यौवन दे दे।

श्लोक 2 (padma.2.78.2)

स्वकीयं हि महाभागाः स्वरूपमिदमुत्तमम् । संतप्तं मानसं मेद्य स्त्रियां सक्तं सुचंचलम्

svakīyaṁ hi mahābhāgāḥ svarūpamidamuttamam saṁtaptaṁ mānasaṁ medya striyāṁ saktaṁ sucaṁcalam

हे महाभाग्यशालियो! यह तुम्हारा ही उत्तम स्वरूप है। आज मेरा मन संतप्त है, एक स्त्री में आसक्त और अत्यंत चंचल हो गया है।

श्लोक 3 (padma.2.78.3)

भाजनस्था यथा आप आवर्त्तयति पावकः । तथा मे मानसं पुत्राः कामानलसुचालितम्

bhājanasthā yathā āpa āvarttayati pāvakaḥ tathā me mānasaṁ putrāḥ kāmānalasucālitam

जैसे पात्र में रखे जल को अग्नि उबाल देती है, वैसे ही, हे पुत्रो! मेरा मन काम की अग्नि से हिलाया जा रहा है।

श्लोक 4 (padma.2.78.4)

एको गृह्णातु मे पुत्रा जरां दुःखप्रदायिनीम् । स्वकं ददातु तारुण्यं यथाकामं चराम्यहम्

eko gṛhṇātu me putrā jarāṁ duḥkhapradāyinīm svakaṁ dadātu tāruṇyaṁ yathākāmaṁ carāmyaham

हे पुत्रो! कोई एक मेरी दुःखदायिनी जरा ग्रहण कर ले, और अपना यौवन मुझे दे दे, जिससे मैं इच्छानुसार विचरण करूँ।

श्लोक 5 (padma.2.78.5)

यो मे जरापसरणं करिष्यति सुतोत्तमः । स च मे भोक्ष्यते राज्यं धनुर्वंशं धरिष्यति

yo me jarāpasaraṇaṁ kariṣyati sutottamaḥ sa ca me bhokṣyate rājyaṁ dhanurvaṁśaṁ dhariṣyati

जो श्रेष्ठ पुत्र मेरी जरा दूर करेगा, वही मेरे राज्य को भोगेगा और धनुर्वंश को धारण करेगा।

श्लोक 6 (padma.2.78.6)

तस्य सौख्यं सुसंपत्तिर्धनं धान्यं भविष्यति । विपुला संततिस्तस्य यशः कीर्तिर्भविष्यति

tasya saukhyaṁ susaṁpattirdhanaṁ dhānyaṁ bhaviṣyati vipulā saṁtatistasya yaśaḥ kīrtirbhaviṣyati

उसे सुख और उत्तम संपत्ति, धन और धान्य प्राप्त होगा; उसकी संतति विपुल होगी और उसका यश-कीर्ति फैलेगी।

श्लोक 7 (padma.2.78.7)

पुत्रा ऊचुः- भवान्धर्मपरो राजन्प्रजाः सत्येन पालकः । कस्मात्ते हीदृशो भावो जातः प्रकृतिचापलः

putrā ūcuḥ- bhavāndharmaparo rājanprajāḥ satyena pālakaḥ kasmātte hīdṛśo bhāvo jātaḥ prakṛticāpalaḥ

पुत्रों ने कहा - हे राजन्! आप धर्मपरायण हैं, सत्य से प्रजा का पालन करने वाले हैं; आपके स्वभाव में यह चंचलता कहाँ से आ गई?

श्लोक 8 (padma.2.78.8)

राजोवाच- आगता नर्तकाः पूर्वं पुरं मे हि प्रनर्तकाः । तेभ्यो मे कामसंमोहे जातो मोहश्च ईदृशः

rājovāca- āgatā nartakāḥ pūrvaṁ puraṁ me hi pranartakāḥ tebhyo me kāmasaṁmohe jāto mohaśca īdṛśaḥ

राजा ने कहा - पहले मेरे नगर में नर्तक आए थे, उत्तम नृत्य करने वाले; उन्हीं से मुझमें काम-मोह और ऐसा भ्रम उत्पन्न हुआ।

श्लोक 9 (padma.2.78.9)

जरया व्यापितः कायो मन्मथाविष्टमानसः । संबभूव सुतश्रेष्ठाः कामेनाकुलव्याकुलः

jarayā vyāpitaḥ kāyo manmathāviṣṭamānasaḥ saṁbabhūva sutaśreṣṭhāḥ kāmenākulavyākulaḥ

हे श्रेष्ठ पुत्रो! जरा से व्याप्त शरीर वाला, मन्मथ से आविष्ट मन वाला मैं काम से अत्यंत व्याकुल हो गया।

श्लोक 10 (padma.2.78.10)

काचिद्दृष्टा मया नारी दिव्यरूपा वरानना । मया संभाषिता पुत्राः किंचिन्नोवाच मे सती

kāciddṛṣṭā mayā nārī divyarūpā varānanā mayā saṁbhāṣitā putrāḥ kiṁcinnovāca me satī

मैंने एक दिव्यरूपा, अत्यंत सुंदर नारी देखी। हे पुत्रो! मैंने उससे बात की, पर उस सती ने मुझे कुछ नहीं कहा।

श्लोक 11 (padma.2.78.11)

विशालानाम तस्याश्च सखी चारुविचक्षणा । सा मामाह शुभं वाक्यं मम सौख्यप्रदायकम्

viśālānāma tasyāśca sakhī cāruvicakṣaṇā sā māmāha śubhaṁ vākyaṁ mama saukhyapradāyakam

विशाला नाम की उसकी सखी, जो चतुर और सुंदर थी, उसने मुझसे एक शुभ वचन कहा, जो मुझे सुख देने वाला था।

श्लोक 12 (padma.2.78.12)

जराहीनो यदा स्यास्त्वं तदा ते सुप्रिया भवेत् । एवमंगीकृतं वाक्यं तयोक्तं गृहमागतः

jarāhīno yadā syāstvaṁ tadā te supriyā bhavet evamaṁgīkṛtaṁ vākyaṁ tayoktaṁ gṛhamāgataḥ

'जब तुम जरा-रहित हो जाओगे, तब तुम इसे प्रिय हो जाओगे' - उसके इस वचन को स्वीकार कर मैं घर लौट आया।

श्लोक 13 (padma.2.78.13)

मया जरापनोदार्थं तदेवं समुदाहृतम् । एवं ज्ञात्वा प्रकर्तव्यं मत्सुखं हि सुपुत्रकाः

mayā jarāpanodārthaṁ tadevaṁ samudāhṛtam evaṁ jñātvā prakartavyaṁ matsukhaṁ hi suputrakāḥ

मैंने यह सब जरा दूर करने के लिए ही कहा है। हे पुत्रो! यह जानकर मेरे सुख के लिए यही करना चाहिए।

श्लोक 14 (padma.2.78.14)

तुरुरुवाच- शरीरं प्राप्यते पुत्रैः पितुर्मातुः प्रसादतः । धर्मश्च क्रियते राजञ्शरीरेण विपश्चिता

tururuvāca- śarīraṁ prāpyate putraiḥ piturmātuḥ prasādataḥ dharmaśca kriyate rājañśarīreṇa vipaścitā

तुरु ने कहा - पुत्रों को शरीर पिता-माता की कृपा से प्राप्त होता है; और हे राजन्! विद्वान पुरुष उसी शरीर से धर्म का आचरण करता है।

श्लोक 15 (padma.2.78.15)

पित्रोः शुश्रूषणं कार्यं पुत्रैश्चापि विशेषतः । न च यौवनदानस्य कालोऽयं मे नराधिप

pitroḥ śuśrūṣaṇaṁ kāryaṁ putraiścāpi viśeṣataḥ na ca yauvanadānasya kālo'yaṁ me narādhipa

पुत्रों को विशेष रूप से माता-पिता की सेवा करनी चाहिए; परंतु हे नराधिप! यह यौवन-दान का समय नहीं है।

श्लोक 16 (padma.2.78.16)

प्रथमे वयसि भोक्तव्यं विषयं मानवैर्नृप । इदानीं तन्न कालोयं वर्तते तव सांप्रतम्

prathame vayasi bhoktavyaṁ viṣayaṁ mānavairnṛpa idānīṁ tanna kāloyaṁ vartate tava sāṁpratam

हे राजन्! जीवन की पहली अवस्था में मनुष्यों को विषय-भोग करना चाहिए; अब आपके लिए वह समय नहीं रहा।

श्लोक 17 (padma.2.78.17)

जरां तात प्रदत्वा वै पुत्रे तात महद्गताम् । पश्चात्सुखं प्रभोक्तव्यं न तु स्यात्तव जीवितम्

jarāṁ tāta pradatvā vai putre tāta mahadgatām paścātsukhaṁ prabhoktavyaṁ na tu syāttava jīvitam

हे तात! पुत्र को अपनी विशाल जरा देकर, पश्चात् सुख भोगने पर भी, वह जीवन फिर आपका अपना नहीं रह जाएगा।

श्लोक 18 (padma.2.78.18)

तस्माद्वाक्यं महाराज करिष्ये नैव ते पुनः । एवमाभाषत नृपं तुरुर्ज्येष्ठसुतस्तदा

tasmādvākyaṁ mahārāja kariṣye naiva te punaḥ evamābhāṣata nṛpaṁ tururjyeṣṭhasutastadā

इसलिए, हे महाराज! मैं आपका यह वचन कभी नहीं मानूँगा। ज्येष्ठ पुत्र तुरु ने राजा से इस प्रकार कहा।

श्लोक 19 (padma.2.78.19)

तुरोर्वाक्यं तु तच्छ्रुत्वा क्रुद्धो राजा बभूव सः । तुरुं शशाप धर्मात्मा क्रोधेनारुणलोचनः

turorvākyaṁ tu tacchrutvā kruddho rājā babhūva saḥ turuṁ śaśāpa dharmātmā krodhenāruṇalocanaḥ

तुरु का यह वचन सुनकर राजा क्रुद्ध हो गया; क्रोध से लाल नेत्रों वाले उस धर्मात्मा राजा ने तुरु को शाप दिया।

श्लोक 20 (padma.2.78.20)

अपध्वस्तस्त्वयाऽदेशो ममायं पापचेतन । तस्मात्पापी भव स्वत्वं सर्वधर्मबहिष्कृतः

apadhvastastvayā'deśo mamāyaṁ pāpacetana tasmātpāpī bhava svatvaṁ sarvadharmabahiṣkṛtaḥ

'हे पापचेतन! तूने मेरे इस आदेश की अवहेलना की है, इसलिए तू स्वयं पापी बन जा, सभी धर्मों से बहिष्कृत हो जा।'

श्लोक 21 (padma.2.78.21)

शिखया त्वं विहीनश्च वेदशास्त्रविवर्जितः । सर्वाचारविहीनस्त्वं भविष्यसि न संशयः

śikhayā tvaṁ vihīnaśca vedaśāstravivarjitaḥ sarvācāravihīnastvaṁ bhaviṣyasi na saṁśayaḥ

'तू शिखा से रहित, वेद-शास्त्रों से वंचित हो जाएगा; निःसंदेह तू सभी सदाचार से रहित हो जाएगा।'

श्लोक 22 (padma.2.78.22)

ब्रह्मघ्नस्त्वं देवदुष्टः सुरापः सत्यवर्जितः । चंडकर्मप्रकर्ता त्वं भविष्यसि नराधमः

brahmaghnastvaṁ devaduṣṭaḥ surāpaḥ satyavarjitaḥ caṁḍakarmaprakartā tvaṁ bhaviṣyasi narādhamaḥ

'तू ब्रह्महत्यारा, देवताओं का द्वेषी, सुरापी, सत्यरहित बनेगा; तू क्रूर कर्म करने वाला अधम मनुष्य बनेगा।'

श्लोक 23 (padma.2.78.23)

सुरालीनः क्षुधी पापी गोघ्नश्च त्वं भविष्यसि । दुश्चर्मा मुक्तकच्छश्च ब्रह्मद्वेष्टा निराकृतिः

surālīnaḥ kṣudhī pāpī goghnaśca tvaṁ bhaviṣyasi duścarmā muktakacchaśca brahmadveṣṭā nirākṛtiḥ

'तू मद्यासक्त, क्षुधातुर, पापी और गोहत्यारा बनेगा; दुर्वस्त्र, कमरबंद रहित, ब्राह्मणद्वेषी और कुरूप बनेगा।'

श्लोक 24 (padma.2.78.24)

परदाराभिगामी त्वं महाचंडः प्रलंपटः । सर्वभक्षश्च दुर्मेधाः सदात्वं च भविष्यसि

paradārābhigāmī tvaṁ mahācaṁḍaḥ pralaṁpaṭaḥ sarvabhakṣaśca durmedhāḥ sadātvaṁ ca bhaviṣyasi

'तू परस्त्रीगामी, अत्यंत क्रूर, लंपट बनेगा; सर्वभक्षी और दुर्बुद्धि सदा ऐसा ही बना रहेगा।'

श्लोक 25 (padma.2.78.25)

सगोत्रां रमसे नारीं सर्वधर्मप्रणाशकः । पुण्यज्ञानविहीनात्मा कुष्ठवांश्च भविष्यसि

sagotrāṁ ramase nārīṁ sarvadharmapraṇāśakaḥ puṇyajñānavihīnātmā kuṣṭhavāṁśca bhaviṣyasi

'तू अपने ही कुल की स्त्री से रमण करेगा, सभी धर्मों का नाशक बनेगा; पुण्य और ज्ञान से रहित होकर कुष्ठरोगी बनेगा।'

श्लोक 26 (padma.2.78.26)

तव पुत्राश्च पौत्राश्च भविष्यंति न संशयः । ईदृशाः सर्वपुण्यघ्ना म्लेच्छाः सुकलुषीकृताः

tava putrāśca pautrāśca bhaviṣyaṁti na saṁśayaḥ īdṛśāḥ sarvapuṇyaghnā mlecchāḥ sukaluṣīkṛtāḥ

'तेरे पुत्र और पौत्र भी निश्चय ही ऐसे ही, सभी पुण्यों के नाशक, अत्यंत कलुषित म्लेच्छ होंगे।'

श्लोक 27 (padma.2.78.27)

एवं तुरुं सुशप्त्वैव यदुं पुत्रमथाब्रवीत् । जरां वै धारयस्वेह भुंक्ष्व राज्यमकंटकम्

evaṁ turuṁ suśaptvaiva yaduṁ putramathābravīt jarāṁ vai dhārayasveha bhuṁkṣva rājyamakaṁṭakam

इस प्रकार तुरु को शाप देकर उन्होंने पुत्र यदु से कहा - 'यहाँ तू जरा धारण कर, और निष्कंटक राज्य का भोग कर।'

श्लोक 28 (padma.2.78.28)

बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा यदू राजानमब्रवीत् । यदुरुवाच- जराभारं न शक्नोमि वोढुं तात कृपां कुरु

baddhāñjalipuṭo bhūtvā yadū rājānamabravīt yaduruvāca- jarābhāraṁ na śaknomi voḍhuṁ tāta kṛpāṁ kuru

हाथ जोड़कर यदु ने राजा से कहा। यदु ने कहा - हे तात! मैं जरा का भार वहन करने में असमर्थ हूँ, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 29 (padma.2.78.29)

शीतमध्वा कदन्नं च वयोतीताश्च योषितः । मनसः प्रातिकूल्यं च जरायाः पंचहेतवः

śītamadhvā kadannaṁ ca vayotītāśca yoṣitaḥ manasaḥ prātikūlyaṁ ca jarāyāḥ paṁcahetavaḥ

शीत, लंबी यात्रा, कदन्न, यौवन बीत चुकी स्त्रियाँ और मन की प्रतिकूलता - ये जरा के पाँच कारण हैं।

श्लोक 30 (padma.2.78.30)

जरादुःखं न शक्नोमि नवे वयसि भूपते । कः समर्थो हि वै धर्तुं क्षमस्व त्वं ममाधुना

jarāduḥkhaṁ na śaknomi nave vayasi bhūpate kaḥ samartho hi vai dhartuṁ kṣamasva tvaṁ mamādhunā

हे भूपते! अपनी नई अवस्था में मैं जरा के दुःख को सहन करने में असमर्थ हूँ। इसे धारण करने में कौन समर्थ है? अभी मुझे क्षमा कीजिए।

श्लोक 31 (padma.2.78.31)

यदुं क्रुद्धो महाराजः शशाप द्विजनंदन । राज्यार्हो न च ते वंशः कदाचिद्वै भविष्यति

yaduṁ kruddho mahārājaḥ śaśāpa dvijanaṁdana rājyārho na ca te vaṁśaḥ kadācidvai bhaviṣyati

हे द्विजनंदन! क्रुद्ध महाराज ने यदु को शाप दिया - 'तेरा वंश कभी भी राज्य के योग्य नहीं होगा।'

श्लोक 32 (padma.2.78.32)

बलतेजः क्षमाहीनः क्षात्रधर्मविवर्जितः । भविष्यति न संदेहो मच्छासनपराङ्मुखः

balatejaḥ kṣamāhīnaḥ kṣātradharmavivarjitaḥ bhaviṣyati na saṁdeho macchāsanaparāṅmukhaḥ

'बल-तेज और क्षमा से रहित, क्षात्रधर्म से वंचित, मेरे शासन से विमुख - निश्चय ही ऐसा ही होगा।'

श्लोक 33 (padma.2.78.33)

यदुरुवाच- निर्दोषोहं महाराज कस्माच्छप्तस्त्वयाधुना । कृपां कुरुष्व दीनस्य प्रसादसुमुखो भव

yaduruvāca- nirdoṣohaṁ mahārāja kasmācchaptastvayādhunā kṛpāṁ kuruṣva dīnasya prasādasumukho bhava

यदु ने कहा - हे महाराज! मैं निर्दोष हूँ, फिर आपने मुझे अभी क्यों शाप दिया? इस दीन पर कृपा कीजिए, प्रसन्न मुख होइए।

श्लोक 34 (padma.2.78.34)

राजोवाच- महादेवः कुले ते वै स्वांशेनापि हि पुत्रक । करिष्यति विसृष्टिं च तदा पूतं कुलं तव

rājovāca- mahādevaḥ kule te vai svāṁśenāpi hi putraka kariṣyati visṛṣṭiṁ ca tadā pūtaṁ kulaṁ tava

राजा ने कहा - हे पुत्र! स्वयं महादेव ही अपने अंश से तेरे कुल में जन्म लेंगे, तभी तेरा कुल पवित्र होगा।

श्लोक 35 (padma.2.78.35)

यदुरुवाच- अहं पुत्रो महाराज निर्दोषः शापितस्त्वया । अनुग्रहो दीयतां मे यदि मे वर्त्तते दया

yaduruvāca- ahaṁ putro mahārāja nirdoṣaḥ śāpitastvayā anugraho dīyatāṁ me yadi me varttate dayā

यदु ने कहा - हे महाराज! मैं आपका निर्दोष पुत्र होकर भी आपसे शापित हुआ हूँ। यदि आपमें दया शेष हो, तो मुझ पर अनुग्रह कीजिए।

श्लोक 36 (padma.2.78.36)

राजोवाच- यो भवेज्ज्येष्ठपुत्रस्तु पितुर्दुःखापहारकः । राज्यदायं सुभुंक्ते च भारवोढा भवेत्स हि

rājovāca- yo bhavejjyeṣṭhaputrastu piturduḥkhāpahārakaḥ rājyadāyaṁ subhuṁkte ca bhāravoḍhā bhavetsa hi

राजा ने कहा - जो पिता के दुःख को दूर करने वाला ज्येष्ठ पुत्र होता है, वही राज्य के उत्तराधिकार को भोगता है, वही उसका भार वहन करने वाला होता है।

श्लोक 37 (padma.2.78.37)

त्वया धर्मं न प्रवृत्तमभाष्योसि न संशयः । भवता नाशिताज्ञा मे महादंडेन घातिनः

tvayā dharmaṁ na pravṛttamabhāṣyosi na saṁśayaḥ bhavatā nāśitājñā me mahādaṁḍena ghātinaḥ

तूने धर्म का पालन नहीं किया, निश्चय ही तू बोलने योग्य नहीं है। तूने मेरी आज्ञा का नाश किया है, महादंड का पात्र होकर।

श्लोक 38 (padma.2.78.38)

तस्मादनुग्रहो नास्ति यथेष्टं च तथा कुरु । यदुरुवाच- यस्मान्मे नाशितं राज्यं कुलं रूपं त्वया नृप

tasmādanugraho nāsti yatheṣṭaṁ ca tathā kuru yaduruvāca- yasmānme nāśitaṁ rājyaṁ kulaṁ rūpaṁ tvayā nṛpa

इसलिए तुझ पर कोई अनुग्रह नहीं है; जैसा चाहे वैसा कर। यदु ने कहा - हे राजन्! जब आपने मेरा राज्य, कुल और रूप नष्ट कर दिया है -

श्लोक 39 (padma.2.78.39)

तस्माद्दुष्टो भविष्यामि तव वंशपतिर्नृप । तव वंशे भविष्यंति नानाभेदास्तु क्षत्त्रियाः

tasmādduṣṭo bhaviṣyāmi tava vaṁśapatirnṛpa tava vaṁśe bhaviṣyaṁti nānābhedāstu kṣattriyāḥ

तो, हे राजन्! मैं आपके ही वंश का दुष्ट स्वामी बनूँगा; आपके वंश में अनेक भेद वाले क्षत्रिय उत्पन्न होंगे -

श्लोक 40 (padma.2.78.40)

तेषां ग्रामान्सुदेशांश्च स्त्रियो रत्नानि यानि वै । भोक्ष्यंति च न संदेहो अतिचंडा महाबलाः

teṣāṁ grāmānsudeśāṁśca striyo ratnāni yāni vai bhokṣyaṁti ca na saṁdeho aticaṁḍā mahābalāḥ

जो अत्यंत उग्र और महाबली होकर उनके गाँवों, सुंदर देशों, स्त्रियों और रत्नों को निःसंदेह भोगेंगे।

श्लोक 41 (padma.2.78.41)

मम वंशात्समुत्पन्नास्तुरुष्का म्लेच्छरूपिणः । त्वया ये नाशिताः सर्वे शप्ताः शापैः सुदारुणैः

mama vaṁśātsamutpannāsturuṣkā mleccharūpiṇaḥ tvayā ye nāśitāḥ sarve śaptāḥ śāpaiḥ sudāruṇaiḥ

मेरे वंश से म्लेच्छरूपी तुरुष्क उत्पन्न होंगे; आपने जिन सबको नष्ट किया है, उन सबको मैंने भयंकर शापों से शापित कर दिया है।

श्लोक 42 (padma.2.78.42)

एवं बभाषे राजानं यदुः क्रुद्धो नृपोत्तम । अथ क्रुद्धो महाराजः पुनश्चैवं शशाप ह

evaṁ babhāṣe rājānaṁ yaduḥ kruddho nṛpottama atha kruddho mahārājaḥ punaścaivaṁ śaśāpa ha

हे नृपोत्तम! क्रुद्ध यदु ने राजा से इस प्रकार कहा; तब क्रुद्ध महाराज ने पुनः इस प्रकार शाप दिया।

श्लोक 43 (padma.2.78.43)

मत्प्रजानाशकाः सर्वे वंशजास्ते शृणुष्व हि । यावच्चंद्रश्च सूर्यश्च पृथ्वी नक्षत्रतारकाः

matprajānāśakāḥ sarve vaṁśajāste śṛṇuṣva hi yāvaccaṁdraśca sūryaśca pṛthvī nakṣatratārakāḥ

'सुनो, तुम्हारे वंश में उत्पन्न सभी जन मेरी प्रजा के नाशक हैं; जब तक चंद्र, सूर्य, पृथ्वी और नक्षत्र-तारे रहेंगे -'

श्लोक 44 (padma.2.78.44)

तावन्म्लेच्छाः प्रपक्ष्यंते कुंभीपाके चरौ रवे । कुरुं दृष्ट्वा ततो बालं क्रीडमानं सुलक्षणम्

tāvanmlecchāḥ prapakṣyaṁte kuṁbhīpāke carau rave kuruṁ dṛṣṭvā tato bālaṁ krīḍamānaṁ sulakṣaṇam

'तब तक ये म्लेच्छ कुंभीपाक नरक की भयंकर अग्नि में पकाए जाएँगे।' तब कुरु को एक शुभ लक्षणों वाले खेलते हुए बालक के रूप में देखकर -

श्लोक 45 (padma.2.78.45)

समाह्वयति तं राजा न सुतं नृपनंदनम् । शिशुं ज्ञात्वा परित्यक्तः सकुरुस्तेन वै तदा

samāhvayati taṁ rājā na sutaṁ nṛpanaṁdanam śiśuṁ jñātvā parityaktaḥ sakurustena vai tadā

राजा ने उसे पुत्र के रूप में नहीं बुलाया; उसे बालक जानकर कुरु को उस समय इस कार्य से अलग रखा गया।

श्लोक 46 (padma.2.78.46)

शर्मिष्ठायाः सुतं पुण्यं तं पूरुं जगदीश्वरः । समाहूय बभाषे च जरा मे गृह्यतां पुनः

śarmiṣṭhāyāḥ sutaṁ puṇyaṁ taṁ pūruṁ jagadīśvaraḥ samāhūya babhāṣe ca jarā me gṛhyatāṁ punaḥ

तब जगदीश्वर राजा ने शर्मिष्ठा के पुण्यवान पुत्र पूरु को बुलाकर कहा - 'मेरी यह जरा फिर से ग्रहण कर लो -'

श्लोक 47 (padma.2.78.47)

भुंक्ष्व राज्यं मया दत्तं सुपुण्यं हतकंटकम् । पूरुरुवाच- राज्यं देवे न भोक्तव्यं पित्रा भुक्तं यथा तव

bhuṁkṣva rājyaṁ mayā dattaṁ supuṇyaṁ hatakaṁṭakam pūruruvāca- rājyaṁ deve na bhoktavyaṁ pitrā bhuktaṁ yathā tava

'मेरे द्वारा दिया गया यह पुण्यमय, निष्कंटक राज्य भोगो।' पूरु ने कहा - हे देवतुल्य! जब तक आपने भोगा है, तब तक राज्य मुझे नहीं भोगना है।

श्लोक 48 (padma.2.78.48)

त्वदादेशं करिष्यामि जरा मे दीयतां नृप । तारुण्येन ममाद्यैव भूत्वा सुंदररूपदृक्

tvadādeśaṁ kariṣyāmi jarā me dīyatāṁ nṛpa tāruṇyena mamādyaiva bhūtvā suṁdararūpadṛk

'मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, हे राजन्! मुझे जरा दे दीजिए। आज ही यौवन से युक्त, सुंदर रूप वाले होकर -'

श्लोक 49 (padma.2.78.49)

भुंक्ष्व भोगान्सुकर्माणि विषयासक्तचेतसा । यावदिच्छा महाभाग विहरस्व तया सह

bhuṁkṣva bhogānsukarmāṇi viṣayāsaktacetasā yāvadicchā mahābhāga viharasva tayā saha

'विषयों में आसक्त मन से सुंदर भोगों और उत्तम कर्मों का उपभोग कीजिए; हे महाभाग! जब तक इच्छा हो, उसके साथ विहार कीजिए।'

श्लोक 50 (padma.2.78.50)

यावज्जीवाम्यहं तात जरां तावद्धराम्यहम् । एवमुक्तस्तु तेनापि पूरुणा जगतीपतिः

yāvajjīvāmyahaṁ tāta jarāṁ tāvaddharāmyaham evamuktastu tenāpi pūruṇā jagatīpatiḥ

'हे तात! जब तक मैं जीवित रहूँगा, तब तक यह जरा धारण किए रहूँगा।' पूरु के इस वचन को सुनकर पृथ्वीपति -

श्लोक 51 (padma.2.78.51)

हर्षेण महताविष्टस्तं पुत्रं प्रत्युवाच सः । यस्माद्वत्स ममाज्ञा वै न हता कृतवानिह

harṣeṇa mahatāviṣṭastaṁ putraṁ pratyuvāca saḥ yasmādvatsa mamājñā vai na hatā kṛtavāniha

अत्यंत हर्ष से भरकर उस पुत्र से बोले - 'हे वत्स! चूँकि तूने यहाँ मेरी आज्ञा को नष्ट नहीं किया, बल्कि उसका पालन किया -'

श्लोक 52 (padma.2.78.52)

तस्मादहं विधास्यामि बहुसौख्यप्रदायकम् । यस्माज्जरागृहीता मे दत्तं तारुण्यकं स्वकम्

tasmādahaṁ vidhāsyāmi bahusaukhyapradāyakam yasmājjarāgṛhītā me dattaṁ tāruṇyakaṁ svakam

'इसलिए मैं तुझे अत्यंत सुखदायक वर दूँगा। चूँकि तूने जरा ग्रहण करके मुझे अपना यौवन दे दिया है -'

श्लोक 53 (padma.2.78.53)

तेन राज्यं प्रभुंक्ष्व त्वं मया दत्तं महामते । एवमुक्तः सुपूरुश्च तेन राज्ञा महीपते

tena rājyaṁ prabhuṁkṣva tvaṁ mayā dattaṁ mahāmate evamuktaḥ supūruśca tena rājñā mahīpate

'हे महामते! उसी के बदले तू मेरे दिए इस राज्य को भोग।' राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस श्रेष्ठ पूरु ने -

श्लोक 54 (padma.2.78.54)

तारुण्यंदत्तवानस्मै जग्राहास्माज्जरां नृप । ततः कृते विनिमये वयसोस्तातपुत्रयोः

tāruṇyaṁdattavānasmai jagrāhāsmājjarāṁ nṛpa tataḥ kṛte vinimaye vayasostātaputrayoḥ

हे राजन्! उसे अपना यौवन दे दिया और उससे उसकी जरा ले ली। इस प्रकार पिता-पुत्र की आयु का विनिमय होने पर -

श्लोक 55 (padma.2.78.55)

तस्माद्वृद्धतरः पूरुः सर्वांगेषु व्यदृश्यत । नूतनत्वं गतो राजा यथा षोडशवार्षिकः

tasmādvṛddhataraḥ pūruḥ sarvāṁgeṣu vyadṛśyata nūtanatvaṁ gato rājā yathā ṣoḍaśavārṣikaḥ

पूरु सभी अंगों में अधिक वृद्ध दिखाई देने लगा। राजा नवीन होकर सोलह वर्ष के समान दिखाई देने लगे।

श्लोक 56 (padma.2.78.56)

रूपेण महताविष्टो द्वितीय इव मन्मथः । धनूराज्यं च छत्रं च व्यजनं चासनं गजम्

rūpeṇa mahatāviṣṭo dvitīya iva manmathaḥ dhanūrājyaṁ ca chatraṁ ca vyajanaṁ cāsanaṁ gajam

रूप से अत्यंत सुशोभित, मानो दूसरा मन्मथ हो, महाराज ने धनुष, राज्य, छत्र, चँवर, आसन और गज -

श्लोक 57 (padma.2.78.57)

कोशं देशं बलं सर्वं चामरं स्यंदनं तथा । ददौ तस्य महाराजः पूरोश्चैव महात्मनः

kośaṁ deśaṁ balaṁ sarvaṁ cāmaraṁ syaṁdanaṁ tathā dadau tasya mahārājaḥ pūroścaiva mahātmanaḥ

कोश, देश, समस्त सेना और चँवर तथा रथ भी - यह सब उस महात्मा पूरु को महाराज ने दे दिया।

श्लोक 58 (padma.2.78.58)

कामासक्तश्च धर्मात्मा तां नारीमनुचिंतयन् । तत्सरः सागरप्रख्यंकामाख्यं नहुषात्मजः

kāmāsaktaśca dharmātmā tāṁ nārīmanuciṁtayan tatsaraḥ sāgaraprakhyaṁkāmākhyaṁ nahuṣātmajaḥ

काम में आसक्त, उस नारी का ही निरंतर चिंतन करते हुए, नहुषपुत्र धर्मात्मा राजा उस समुद्र-सदृश काम नामक सरोवर की ओर -

श्लोक 59 (padma.2.78.59)

अश्रुबिंदुमती यत्र जगाम लघुविक्रमः । तां दृष्ट्वा तु विशालाक्षीं चारुपीनपयोधराम्

aśrubiṁdumatī yatra jagāma laghuvikramaḥ tāṁ dṛṣṭvā tu viśālākṣīṁ cārupīnapayodharām

जहाँ अश्रुबिंदुमती थी, तेज़ी से गए। उस विशाल नेत्रों वाली, सुंदर स्थूल स्तनों वाली को देखकर -

श्लोक 60 (padma.2.78.60)

विशालां च महाराजः कंदर्पाकृष्टमानसः । राजोवाच- आगतोऽस्मि महाभागे विशाले चारुलोचने

viśālāṁ ca mahārājaḥ kaṁdarpākṛṣṭamānasaḥ rājovāca- āgato'smi mahābhāge viśāle cārulocane

और विशाला को भी, कंदर्प से आकृष्ट मन वाले महाराज ने कहा। राजा ने कहा - हे महाभागे विशाले! हे सुनयने! मैं आ गया हूँ।

श्लोक 61 (padma.2.78.61)

जरात्यागःकृतो भद्रे तारुण्येन समन्वितः । युवा भूत्वा समायातो भवत्वेषा ममाधुना

jarātyāgaḥkṛto bhadre tāruṇyena samanvitaḥ yuvā bhūtvā samāyāto bhavatveṣā mamādhunā

'हे भद्रे! मैंने जरा का त्याग कर दिया है और यौवन से युक्त हो गया हूँ। युवा होकर आया हूँ, अब यह मेरी हो जाए।'

श्लोक 62 (padma.2.78.62)

यंयं हि वांछते चैषा तंतं दद्मि न संशयः । विशालोवाच- यदा भवान्समायातो जरां दुष्टां विहाय च

yaṁyaṁ hi vāṁchate caiṣā taṁtaṁ dadmi na saṁśayaḥ viśālovāca- yadā bhavānsamāyāto jarāṁ duṣṭāṁ vihāya ca

'यह जो कुछ भी चाहे, वह मैं उसे दूँगा, इसमें संशय नहीं।' विशाला ने कहा - अब जब आप दुष्ट जरा को त्यागकर आए हैं -

श्लोक 63 (padma.2.78.63)

दोषेणैकेनलिप्तोसि भवंतं नैव मन्यते । राजोवाच- मम दोषं वदस्व त्वं यदि जानासि निश्चितम्

doṣeṇaikenaliptosi bhavaṁtaṁ naiva manyate rājovāca- mama doṣaṁ vadasva tvaṁ yadi jānāsi niścitam

तब भी आप एक दोष से लिप्त हैं; यह अब भी आपको स्वीकार नहीं करती। राजा ने कहा - यदि तुम निश्चित रूप से जानती हो, तो मुझे मेरा दोष बताओ -

श्लोक 64 (padma.2.78.64)

तं तु दोषं परित्यक्ष्ये गुणरूपं न संशयः

taṁ tu doṣaṁ parityakṣye guṇarūpaṁ na saṁśayaḥ

'उस दोष को मैं त्याग दूँगा, और निश्चय ही गुणरूप हो जाऊँगा।'

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