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भूमि खण्ड · अध्याय 89

समुज्ज्वल का मानसरोवर-दर्शन और व्याध का रूपांतरण

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

श्लोक 1 (padma.2.89.1)

विष्णुरुवाच- कुंजलस्तु सुतं वाक्यं समुज्ज्वलमथाब्रवीत् । भवान्कथय भोः पुत्र किमपूर्वं तु दृष्टवान्

viṣṇuruvāca- kuṁjalastu sutaṁ vākyaṁ samujjvalamathābravīt bhavānkathaya bhoḥ putra kimapūrvaṁ tu dṛṣṭavān

विष्णु ने कहा - कुंजल ने अपने पुत्र समुज्ज्वल से यह वचन कहा - 'हे पुत्र! तुम भी बताओ, तुमने क्या अपूर्व देखा?'

श्लोक 2 (padma.2.89.2)

तन्मे कथय सुप्रीतः श्रोतुकामोऽस्मि सांप्रतम् । एवमादिश्य तं पुत्रं विरराम स कुंजलः

tanme kathaya suprītaḥ śrotukāmo'smi sāṁpratam evamādiśya taṁ putraṁ virarāma sa kuṁjalaḥ

'वह मुझे बताओ, मैं प्रसन्नतापूर्वक अभी सुनना चाहता हूँ।' अपने पुत्र को इस प्रकार आदेश देकर कुंजल चुप हो गए।

श्लोक 3 (padma.2.89.3)

पितरं प्रत्युवाचाथ विनयावनतस्सुतः । समुज्ज्वल उवाच- हिमवंतं नगश्रेष्ठं देववृंदसमन्वितम्

pitaraṁ pratyuvācātha vinayāvanatassutaḥ samujjvala uvāca- himavaṁtaṁ nagaśreṣṭhaṁ devavṛṁdasamanvitam

तब पुत्र ने विनयपूर्वक झुककर पिता को उत्तर दिया। समुज्ज्वल ने कहा - देवताओं के समूह से युक्त, पर्वतश्रेष्ठ हिमवान को -

श्लोक 4 (padma.2.89.4)

आहारार्थं प्रगच्छामि भवतश्चात्मनः पितः । पश्यामि कौतुकं तत्र न दृष्टं न श्रुतं पुरा

āhārārthaṁ pragacchāmi bhavataścātmanaḥ pitaḥ paśyāmi kautukaṁ tatra na dṛṣṭaṁ na śrutaṁ purā

हे पिता! आपके और अपने लिए भोजन के निमित्त मैं जाता हूँ। वहाँ मैंने ऐसा कौतुक देखा, जो पहले न देखा गया, न सुना गया।

श्लोक 5 (padma.2.89.5)

प्रदेशमृषिगणाकीर्णमप्सरोभिः प्रशोभितम् । बहुकौतुकशोभाढ्यं मंगल्यं मंगलैर्युतम्

pradeśamṛṣigaṇākīrṇamapsarobhiḥ praśobhitam bahukautukaśobhāḍhyaṁ maṁgalyaṁ maṁgalairyutam

वह प्रदेश ऋषिगणों से भरा, अप्सराओं से सुशोभित, अनेक कौतुकों की शोभा से युक्त, मंगलमय और मंगलों से परिपूर्ण था।

श्लोक 6 (padma.2.89.6)

बहुपुण्यफलोपेतैर्वनैर्नानाविधैस्ततः । अनेककौतुकभरैर्मनसः परिमोहनम्

bahupuṇyaphalopetairvanairnānāvidhaistataḥ anekakautukabharairmanasaḥ parimohanam

अनेक प्रकार के, पुण्यमय फलों से युक्त वनों से, अनेक कौतुकों के भार से भरा हुआ, मन को मोहित करने वाला।

श्लोक 7 (padma.2.89.7)

तत्र दृष्टं मया तात अपूर्वं मानसांतिके । बहुहंसैः समाकीर्णो हंस एकः समागतः

tatra dṛṣṭaṁ mayā tāta apūrvaṁ mānasāṁtike bahuhaṁsaiḥ samākīrṇo haṁsa ekaḥ samāgataḥ

हे पिता! वहाँ मानसरोवर के निकट मैंने एक अपूर्व दृश्य देखा - अनेक हंसों के बीच एक हंस आगे आया।

श्लोक 8 (padma.2.89.8)

एवं कृष्णा महाभाग अन्ये तत्र समागताः । सितेतरैश्चंचुपादैरन्यतः शुक्लविग्रहाः

evaṁ kṛṣṇā mahābhāga anye tatra samāgatāḥ sitetaraiścaṁcupādairanyataḥ śuklavigrahāḥ

हे महाभाग! इस प्रकार वहाँ अन्य काले हंस भी आए; कुछ के चोंच और पैर भिन्न रंग के थे, शेष शरीर श्वेत था,

श्लोक 9 (padma.2.89.9)

तादृशास्ते च नीला वै अन्ये शुभ्रा महामते । चतस्रस्तत्र वै नार्यो रौद्राकारा विभीषणाः

tādṛśāste ca nīlā vai anye śubhrā mahāmate catasrastatra vai nāryo raudrākārā vibhīṣaṇāḥ

हे महामते! उसी प्रकार कुछ नीले थे, अन्य शुभ्र थे। वहाँ चार स्त्रियाँ भी थीं, भयंकर और डरावने रूप वाली,

श्लोक 10 (padma.2.89.10)

दंष्ट्राकरालसंक्रूरा ऊर्ध्वकेश्यो भयानकाः । पश्चात्तास्तु समायातास्तस्मिन्सरसि मानसे

daṁṣṭrākarālasaṁkrūrā ūrdhvakeśyo bhayānakāḥ paścāttāstu samāyātāstasminsarasi mānase

क्रूर दाढ़ों वाली, ऊपर उठे बालों वाली, भयानक; वे बाद में उस मानसरोवर में आईं।

श्लोक 11 (padma.2.89.11)

कृष्णा हंसास्तु संस्नाता मानसे तात मत्पुरः । विभ्रांताः परितश्चान्ये न स्नातास्तत्र मानसे

kṛṣṇā haṁsāstu saṁsnātā mānase tāta matpuraḥ vibhrāṁtāḥ paritaścānye na snātāstatra mānase

हे पिता! काले हंस मेरे देखते-देखते मानसरोवर में स्नान कर गए; अन्य इधर-उधर भ्रमित होकर वहाँ स्नान नहीं कर सके।

श्लोक 12 (padma.2.89.12)

जहसुस्ताः स्त्रियस्तात हास्यैरट्टाट्टदारुणैः । तस्मात्सराद्विनिष्क्रांतो हंस एको महातनुः

jahasustāḥ striyastāta hāsyairaṭṭāṭṭadāruṇaiḥ tasmātsarādviniṣkrāṁto haṁsa eko mahātanuḥ

हे पिता! वे स्त्रियाँ भयंकर, कर्कश अट्टहास से हँस पड़ीं। तब उस सरोवर से एक विशालकाय हंस बाहर निकला।

श्लोक 13 (padma.2.89.13)

पश्चात्त्रयो विनिष्क्रांतास्तैश्चाहं समुपेक्षितः । याता आकाशमार्गेण विवदंतः परस्परम्

paścāttrayo viniṣkrāṁtāstaiścāhaṁ samupekṣitaḥ yātā ākāśamārgeṇa vivadaṁtaḥ parasparam

बाद में तीन और निकले; उन्होंने मुझे भी देखा। वे आपस में विवाद करते हुए आकाश-मार्ग से चले गए।

श्लोक 14 (padma.2.89.14)

तास्तु स्त्रियो महाभीमाः समंतात्परिबभ्रमुः । विंध्यस्य शिखरे पुण्ये वृक्षच्छायासुपक्षिणः

tāstu striyo mahābhīmāḥ samaṁtātparibabhramuḥ viṁdhyasya śikhare puṇye vṛkṣacchāyāsupakṣiṇaḥ

वे अत्यंत भयंकर स्त्रियाँ सब ओर भटकती रहीं। विंध्य के पवित्र शिखर पर, वृक्ष की छाया में कुछ पक्षी -

श्लोक 15 (padma.2.89.15)

निषण्णास्तत्र ते सर्वे दग्धा दुःखैः सुदारुणैः । तेषां सुवीक्षमाणानां भिल्ल एकः समागतः

niṣaṇṇāstatra te sarve dagdhā duḥkhaiḥ sudāruṇaiḥ teṣāṁ suvīkṣamāṇānāṁ bhilla ekaḥ samāgataḥ

वहाँ सब बैठे थे, अत्यंत भयंकर दुःखों से संतप्त। उन्हें ध्यान से देखते हुए एक भील वहाँ आया,

श्लोक 16 (padma.2.89.16)

मृगान्स पीडयित्वा तु बाणपाणिर्धनुर्द्धरः । शिलातलं समाश्रित्य निषसाद सुखेन वै

mṛgānsa pīḍayitvā tu bāṇapāṇirdhanurddharaḥ śilātalaṁ samāśritya niṣasāda sukhena vai

मृगों को खदेड़कर, हाथ में बाण, धनुष धारण किए हुए, वह एक शिला-तल का आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठ गया।

श्लोक 17 (padma.2.89.17)

पश्चाद्भिल्ली समायाता अन्नमादाय सोदकम् । स्वं प्रियं वीक्षते राज्ञा मुदितैर्लक्षणैर्युतम्

paścādbhillī samāyātā annamādāya sodakam svaṁ priyaṁ vīkṣate rājñā muditairlakṣaṇairyutam

बाद में उसकी भीलनी अन्न और जल लेकर आई; उसने अपने प्रिय को, राजा के समान प्रसन्न लक्षणों से युक्त होकर देखा।

श्लोक 18 (padma.2.89.18)

अन्यादृशं समावीक्ष्य स्वकांतं तेजसावृतम् । दिव्यतेजः समाक्रांतं यथा सूर्यं दिविस्थितम्

anyādṛśaṁ samāvīkṣya svakāṁtaṁ tejasāvṛtam divyatejaḥ samākrāṁtaṁ yathā sūryaṁ divisthitam

परंतु अपने ही प्रियतम को कुछ भिन्न देखकर, तेज से आवृत, दिव्य तेज से व्याप्त, मानो आकाश में स्थित सूर्य के समान -

श्लोक 19 (padma.2.89.19)

नरमन्यं परिज्ञाय तं परित्यज्य सा ययौ । व्याध उवाच- एह्येहि त्वं प्रिये चात्र कस्मान्मां त्वं न पश्यसि

naramanyaṁ parijñāya taṁ parityajya sā yayau vyādha uvāca- ehyehi tvaṁ priye cātra kasmānmāṁ tvaṁ na paśyasi

उसे किसी अन्य पुरुष के रूप में जानकर, उसे छोड़कर वह चली गई। व्याध ने कहा - हे प्रिये! यहाँ आओ, तुम मुझे क्यों नहीं देखतीं?

श्लोक 20 (padma.2.89.20)

क्षुधया पीड्यमानोहं त्वामहं चावलोकये । तस्य वाक्यं समाकर्ण्य शीघ्रं व्याधी समागता

kṣudhayā pīḍyamānohaṁ tvāmahaṁ cāvalokaye tasya vākyaṁ samākarṇya śīghraṁ vyādhī samāgatā

मैं भूख से पीड़ित हूँ और तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ। उसके वचन को सुनकर भीलनी शीघ्रता से आई -

श्लोक 21 (padma.2.89.21)

भर्तुः पार्श्वं समासाद्य विस्मिता साभवत्तदा । कोयं तेजः समाचारो देवोयं मां समाह्वयेत्

bhartuḥ pārśvaṁ samāsādya vismitā sābhavattadā koyaṁ tejaḥ samācāro devoyaṁ māṁ samāhvayet

अपने पति के पास आकर वह विस्मित हो गई - 'यह कैसा तेजस्वी और आचरण वाला है? यह देवता मुझे बुला रहा है!'

श्लोक 22 (padma.2.89.22)

तमुवाच ततो व्याधी भर्तारं दीप्ततेजसम् । अत्र किं ते कृतं वीर भवान्को दिव्यलक्षणः

tamuvāca tato vyādhī bhartāraṁ dīptatejasam atra kiṁ te kṛtaṁ vīra bhavānko divyalakṣaṇaḥ

तब भीलनी ने उस दीप्ततेजस्वी पति से कहा - 'हे वीर! आपने यहाँ क्या किया है? आप कौन हैं, ऐसे दिव्य लक्षणों वाले?'

श्लोक 23 (padma.2.89.23)

सूत उवाच- एवमाभाषितो व्याध्या व्याधः प्रियामभाषत । अहं ते वल्लभः कांते भवती च मम प्रिया

sūta uvāca- evamābhāṣito vyādhyā vyādhaḥ priyāmabhāṣata ahaṁ te vallabhaḥ kāṁte bhavatī ca mama priyā

सूत ने कहा - भीलनी द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर व्याध ने अपनी प्रिया से कहा - 'हे कांते! मैं तुम्हारा वही प्रियतम हूँ, और तुम मेरी प्रिया हो।'

श्लोक 24 (padma.2.89.24)

कस्मात्त्वं मां न जानासि कथं शंका प्रवर्तते । क्षुधया पीड्यमानेन पयश्चान्नं प्रतीक्ष्यते

kasmāttvaṁ māṁ na jānāsi kathaṁ śaṁkā pravartate kṣudhayā pīḍyamānena payaścānnaṁ pratīkṣyate

'तुम मुझे क्यों नहीं पहचानतीं? यह शंका कैसे उत्पन्न हुई?' भूख से पीड़ित वह दूध और अन्न की प्रतीक्षा करने लगा।

श्लोक 25 (padma.2.89.25)

व्याध्युवाच- बर्बरः कृष्णवर्णश्च रक्ताक्षः कृष्णकंचुकः । ईदृशश्चास्ति मे भर्ता सर्वसत्वभयंकरः

vyādhyuvāca- barbaraḥ kṛṣṇavarṇaśca raktākṣaḥ kṛṣṇakaṁcukaḥ īdṛśaścāsti me bhartā sarvasatvabhayaṁkaraḥ

भीलनी ने कहा - मेरा पति असभ्य, काले रंग का, लाल आँखों वाला, काला अंगरखा पहनने वाला और सब प्राणियों के लिए भयंकर है, ऐसा है।

श्लोक 26 (padma.2.89.26)

भवान्को दिव्यदेहस्तु प्रियेत्युक्त्वा समाह्वयेत् । एष मे संशयो जातो वद सत्यं ममाग्रतः

bhavānko divyadehastu priyetyuktvā samāhvayet eṣa me saṁśayo jāto vada satyaṁ mamāgrataḥ

आप दिव्य शरीर वाले होकर कौन हैं, जो 'प्रिये' कहकर पुकारते हैं? मुझे यह संशय हुआ है; मेरे समक्ष सत्य बताइए।

श्लोक 27 (padma.2.89.27)

कुलं नाम स्वकं ग्रामं क्रीडां लिगं सुतं सुताम् । समाचष्ट प्रियाग्रे तु तस्याः प्रत्यय हेतवे

kulaṁ nāma svakaṁ grāmaṁ krīḍāṁ ligaṁ sutaṁ sutām samācaṣṭa priyāgre tu tasyāḥ pratyaya hetave

उसने अपनी प्रिया को विश्वास दिलाने के लिए अपना कुल, गाँव, क्रीड़ा, चिह्न, पुत्र और पुत्री बता दिए।

श्लोक 28 (padma.2.89.28)

प्रत्युवाच स्वभर्तारं सा व्याधी हृष्टमानसा । कस्मात्ते ईदृशः कायः श्वेतकंचुकधारकः

pratyuvāca svabhartāraṁ sā vyādhī hṛṣṭamānasā kasmātte īdṛśaḥ kāyaḥ śvetakaṁcukadhārakaḥ

प्रसन्न मन होकर उस भीलनी ने अपने पति को उत्तर दिया - 'आपका शरीर श्वेत वस्त्र धारण किए हुए ऐसा कैसे हो गया?'

श्लोक 29 (padma.2.89.29)

कथं जातः समाचक्ष्व ममाश्चर्यं प्रवर्तते । एवं संपृच्छमानस्तु भार्यया मृगघातकः

kathaṁ jātaḥ samācakṣva mamāścaryaṁ pravartate evaṁ saṁpṛcchamānastu bhāryayā mṛgaghātakaḥ

'यह कैसे हुआ, मुझे बताइए, मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है।' अपनी पत्नी द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर वह मृगहंता -

श्लोक 30 (padma.2.89.30)

सूत उवाच- प्रत्युवाच ततः श्रुत्वा तां प्रियां प्रश्रयान्विताम् । नर्मदा उत्तरे कूले संगमश्चास्ति सुव्रते

sūta uvāca- pratyuvāca tataḥ śrutvā tāṁ priyāṁ praśrayānvitām narmadā uttare kūle saṁgamaścāsti suvrate

सूत ने कहा - उसकी बात सुनकर, विनयशील प्रिया को उसने उत्तर दिया - 'हे सुव्रते! नर्मदा के उत्तर तट पर एक संगम है।'

श्लोक 31 (padma.2.89.31)

आतपेनाकुलो जीवो मम जातोति सुप्रिये । अस्मिन्वै संगमे कांते श्रमश्रांतो हि सत्वरः

ātapenākulo jīvo mama jātoti supriye asminvai saṁgame kāṁte śramaśrāṁto hi satvaraḥ

'हे सुप्रिये! धूप से व्याकुल मेरा जीवन हो गया था; इसी संगम पर, हे कांते! श्रम से थका हुआ, शीघ्रता से -'

श्लोक 32 (padma.2.89.32)

गतः स्नात्वा जलं पीत्वा पश्चाच्चाहं समागतः । तदाप्रभृति मे काय ईदृशस्तेजसावृतः

gataḥ snātvā jalaṁ pītvā paścāccāhaṁ samāgataḥ tadāprabhṛti me kāya īdṛśastejasāvṛtaḥ

'मैं गया, स्नान किया, जल पिया और फिर लौट आया। तभी से मेरा यह शरीर ऐसे तेज से आवृत हो गया -'

श्लोक 33 (padma.2.89.33)

संजातो वस्त्रसंयुक्तः कंचुकः शुभ्रतां गतः । पूर्वोक्तलिंगसंस्थानैः कुलैः स्थानेन वै तथा

saṁjāto vastrasaṁyuktaḥ kaṁcukaḥ śubhratāṁ gataḥ pūrvoktaliṁgasaṁsthānaiḥ kulaiḥ sthānena vai tathā

'वस्त्र से युक्त होकर मेरा यह अंगरखा शुभ्रता को प्राप्त हो गया।' पूर्वोक्त चिह्नों, कुल और स्थान से -

श्लोक 34 (padma.2.89.34)

स्वप्रियं लक्षयित्वा तु ज्ञात्वा पुण्यस्य संभवम् । प्रत्युवाचाथ भर्तारं संगमं मम दर्शय

svapriyaṁ lakṣayitvā tu jñātvā puṇyasya saṁbhavam pratyuvācātha bhartāraṁ saṁgamaṁ mama darśaya

अपने पति को पहचानकर और इसे पुण्य की उत्पत्ति समझकर उसने पति से कहा - 'मुझे वह संगम दिखाइए -'

श्लोक 35 (padma.2.89.35)

तव पश्चात्प्रदास्यामि भोजनं पानसंयुतम् । इत्युक्तः प्रियया व्याधः सत्वरेण जगाम ह

tava paścātpradāsyāmi bhojanaṁ pānasaṁyutam ityuktaḥ priyayā vyādhaḥ satvareṇa jagāma ha

'उसके बाद मैं आपको पान सहित भोजन दूँगी।' प्रिया द्वारा ऐसा कहे जाने पर व्याध शीघ्रता से गया।

श्लोक 36 (padma.2.89.36)

संगमो दर्शितस्तेन ततोग्रे पापनाशनः । समुड्डीना महाभाग पक्षिणो लघुविक्रमाः

saṁgamo darśitastena tatogre pāpanāśanaḥ samuḍḍīnā mahābhāga pakṣiṇo laghuvikramāḥ

उसने वह पापनाशक संगम दिखाया। हे महाभाग! तब हल्की उड़ान वाले पक्षी -

श्लोक 37 (padma.2.89.37)

तया सार्द्धं ययुः सर्वे रेवासंगममुत्तमम् । तेषां तु वीक्षमाणानां पक्षिणां मम पश्यतः

tayā sārddhaṁ yayuḥ sarve revāsaṁgamamuttamam teṣāṁ tu vīkṣamāṇānāṁ pakṣiṇāṁ mama paśyataḥ

उसके साथ सब उस श्रेष्ठ रेवा-संगम को गए। मेरे देखते-देखते उन पक्षियों में से -

श्लोक 38 (padma.2.89.38)

तया हि स्नापितो भर्ता पुनः स्नाता हि सा स्वयम् । दिव्यदेहधरौ चोभौ दिव्यकांतिसमन्वितौ

tayā hi snāpito bhartā punaḥ snātā hi sā svayam divyadehadharau cobhau divyakāṁtisamanvitau

उसके द्वारा पति को स्नान कराया गया, फिर वह स्वयं भी स्नान कर गई; दोनों दिव्य शरीर धारण किए, दिव्य कांति से युक्त -

श्लोक 39 (padma.2.89.39)

संजातौ पक्षिणां श्रेष्ठ दिव्यवस्त्रानुलेपनौ । दिव्यमालांबरधरौ दिव्यगंधानुलेपनौ

saṁjātau pakṣiṇāṁ śreṣṭha divyavastrānulepanau divyamālāṁbaradharau divyagaṁdhānulepanau

हे श्रेष्ठ! पक्षियों में दिव्य वस्त्र और अनुलेपन धारण किए हुए हो गए; दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य सुगंध से लिप्त -

श्लोक 40 (padma.2.89.40)

वैष्णवं यानमासाद्य मुनिगंधर्वपूजितौ । गतौ तौ वैष्णवं लोकं वैष्णवैः परिपूजितौ

vaiṣṇavaṁ yānamāsādya munigaṁdharvapūjitau gatau tau vaiṣṇavaṁ lokaṁ vaiṣṇavaiḥ paripūjitau

वैष्णव विमान पर आरूढ़ होकर, मुनियों और गंधर्वों द्वारा पूजित होकर, वे दोनों वैष्णव लोक को गए, वैष्णवों द्वारा सम्मानित।

श्लोक 41 (padma.2.89.41)

स्तूयमानौ महात्मानौ दंपती दृष्टवानहम् । व्रजंतौ स्वर्गमार्गेण कूजंते पक्षिणस्तथा

stūyamānau mahātmānau daṁpatī dṛṣṭavānaham vrajaṁtau svargamārgeṇa kūjaṁte pakṣiṇastathā

मैंने उस महात्मा दंपती को स्तुति किए जाते देखा, स्वर्ग-मार्ग से जाते हुए, जबकि पक्षी उनके चारों ओर कलरव कर रहे थे।

श्लोक 42 (padma.2.89.42)

तीर्थराजं परं दृष्ट्वा हर्षव्यक्ताक्षरैस्तदा । चत्वारः कृष्णहंसास्ते संगमे पापनाशने

tīrtharājaṁ paraṁ dṛṣṭvā harṣavyaktākṣaraistadā catvāraḥ kṛṣṇahaṁsāste saṁgame pāpanāśane

उस परम तीर्थराज को देखकर, हर्ष से भरे स्वरों में, तब चार काले हंसों ने उस पापनाशक संगम में -

श्लोक 43 (padma.2.89.43)

स्नात्वा वै भावशुद्धास्ते प्राप्ता उज्ज्वलतां पुनः । स्नात्वा पीत्वा जलं ते तु पुनर्बहिर्विनिर्गताः

snātvā vai bhāvaśuddhāste prāptā ujjvalatāṁ punaḥ snātvā pītvā jalaṁ te tu punarbahirvinirgatāḥ

स्नान किया, भावशुद्ध होकर वे पुनः उज्ज्वलता को प्राप्त हुए। स्नान कर, जल पीकर, वे फिर बाहर निकले।

श्लोक 44 (padma.2.89.44)

तावत्यस्ताः स्त्रियः कृष्णा मृतास्तत्स्नानमात्रतः । क्रंदमाना विचेष्टंत्यो हाहाकार विकंपिताः

tāvatyastāḥ striyaḥ kṛṣṇā mṛtāstatsnānamātrataḥ kraṁdamānā viceṣṭaṁtyo hāhākāra vikaṁpitāḥ

परंतु वे चारों काली स्त्रियाँ उसी स्नान से ही मृत्यु को प्राप्त हो गईं; विलाप करती, तड़पती, हाहाकार से काँपती हुई -

श्लोक 45 (padma.2.89.45)

यमलोकं गतास्तास्तु तात दृष्टा मया तदा । उड्डीनास्तु ततो हंसाः स्वस्थानं प्रतिजग्मिरे

yamalokaṁ gatāstāstu tāta dṛṣṭā mayā tadā uḍḍīnāstu tato haṁsāḥ svasthānaṁ pratijagmire

हे पिता! वे यमलोक चली गईं, यह मैंने उस समय देखा। तब हंस उड़कर अपने स्थान को लौट गए।

श्लोक 46 (padma.2.89.46)

एवं तात मया दृष्टं प्रत्यक्षं कथितं तव । कृष्णपक्षा महाकाया धार्तराष्ट्रास्तु ताः स्त्रियः

evaṁ tāta mayā dṛṣṭaṁ pratyakṣaṁ kathitaṁ tava kṛṣṇapakṣā mahākāyā dhārtarāṣṭrāstu tāḥ striyaḥ

हे पिता! यह मैंने प्रत्यक्ष देखा, आपको कह सुनाया। काले पंखों वाली, विशालकाय वे धार्तराष्ट्र स्त्रियाँ -

श्लोक 47 (padma.2.89.47)

कथयस्व प्रसादेन के भविष्यंति वै पितः । निर्गतान्मानसान्मध्याद्धार्तराष्ट्रान्वदस्व मे

kathayasva prasādena ke bhaviṣyaṁti vai pitaḥ nirgatānmānasānmadhyāddhārtarāṣṭrānvadasva me

हे पिता! कृपापूर्वक बताइए, वे क्या बनेंगी? मानसरोवर के बीच से निकले उन धार्तराष्ट्रों के विषय में मुझे बताइए।

श्लोक 48 (padma.2.89.48)

के भविष्यंति ते तात कथय त्वं तु सांप्रतम् । कस्मात्सुकृष्णतां प्राप्ता हंसाः शुद्धाश्च ते पुनः

ke bhaviṣyaṁti te tāta kathaya tvaṁ tu sāṁpratam kasmātsukṛṣṇatāṁ prāptā haṁsāḥ śuddhāśca te punaḥ

हे पिता! वे क्या बनेंगी, अभी मुझे बताइए। वे हंस पुनः शुद्ध होकर काले रंग को कैसे प्राप्त हुए?

श्लोक 49 (padma.2.89.49)

संजातास्तत्क्षणात्तात कस्मान्मृतास्तु ताः स्त्रियः । एवं मे संशयस्तात संजातो दारुणो हृदि

saṁjātāstatkṣaṇāttāta kasmānmṛtāstu tāḥ striyaḥ evaṁ me saṁśayastāta saṁjāto dāruṇo hṛdi

हे पिता! वे स्त्रियाँ उसी क्षण क्यों मर गईं? इस प्रकार, हे पिता! मेरे हृदय में यह भयंकर संशय उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 50 (padma.2.89.50)

छेत्तुमर्हसि अद्यैव भवाञ्ज्ञानविचक्षणः । प्रसादसुमुखो भूत्वा प्रणतस्य सदैव मे

chettumarhasi adyaiva bhavāñjñānavicakṣaṇaḥ prasādasumukho bhūtvā praṇatasya sadaiva me

ज्ञान में निपुण आप ही आज इसका निवारण करने योग्य हैं; सदा आपके सामने प्रणत मुझ पर प्रसन्न मुख होइए।

श्लोक 51 (padma.2.89.51)

एवं संभाष्य पितरं विरराम समुज्ज्वलः । ततः प्रवक्तुमारेभे स शुकः कुंजलाभिधः

evaṁ saṁbhāṣya pitaraṁ virarāma samujjvalaḥ tataḥ pravaktumārebhe sa śukaḥ kuṁjalābhidhaḥ

अपने पिता से इस प्रकार कहकर समुज्ज्वल चुप हो गया। तब कुंजल नामक वह शुक बोलने लगा।

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90