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भूमि खण्ड · अध्याय 88

उज्ज्वल द्वारा दिव्यादेवी का दुःख-मोचन

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

श्लोक 1 (padma.2.88.1)

कुंजल उवाच- व्रतं स्तोत्रं महाज्ञानं ध्यानं चैव सुपुत्रक । मयाख्यातं तवाग्रे वै विष्णोः पापप्रणाशनम्

kuṁjala uvāca- vrataṁ stotraṁ mahājñānaṁ dhyānaṁ caiva suputraka mayākhyātaṁ tavāgre vai viṣṇoḥ pāpapraṇāśanam

कुंजल ने कहा - हे सुपुत्र! व्रत, स्तोत्र, महाज्ञान और विष्णु का ध्यान - यह सब मैंने तुम्हें बताया, जो पाप का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (padma.2.88.2)

एवं चतुष्टयं सा हि यदा पुण्यं समाचरेत् । प्रयाति वैष्णवं लोकं देवानामपि दुर्लभम्

evaṁ catuṣṭayaṁ sā hi yadā puṇyaṁ samācaret prayāti vaiṣṇavaṁ lokaṁ devānāmapi durlabham

जब वह इस चतुष्टय पुण्य का आचरण करेगी, तब वह वैष्णव लोक को प्राप्त होगी, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 3 (padma.2.88.3)

इतो गत्वा व्रतं वत्स दिव्यां देवीं प्रबोधय । अशून्यशयनं नाम व्रतराजं वदस्व ताम्

ito gatvā vrataṁ vatsa divyāṁ devīṁ prabodhaya aśūnyaśayanaṁ nāma vratarājaṁ vadasva tām

हे वत्स! यहाँ से जाकर उस दिव्य देवी को व्रत के लिए जगाओ। उसे अशून्यशयन नामक व्रतराज बताओ।

श्लोक 4 (padma.2.88.4)

समुद्धर महापापाद्राजकन्यां यशस्विनीम् । त्वया पृष्टं मया ख्यातं पुण्यदं पापनाशनम्

samuddhara mahāpāpādrājakanyāṁ yaśasvinīm tvayā pṛṣṭaṁ mayā khyātaṁ puṇyadaṁ pāpanāśanam

उस यशस्विनी राजकन्या को महापाप से उद्धार करो; जो तुमने मुझसे पूछा था, वह मैंने बता दिया - यह पुण्यदायक और पापनाशक है।

श्लोक 5 (padma.2.88.5)

गच्छ गच्छ महाभाग इत्युक्त्वा विरराम सः । श्रीविष्णुरुवाच- उज्ज्वलोप्येवमुक्तस्तु स पित्रा कुंजलेन हि

gaccha gaccha mahābhāga ityuktvā virarāma saḥ śrīviṣṇuruvāca- ujjvalopyevamuktastu sa pitrā kuṁjalena hi

'जाओ, जाओ, हे महाभाग!' ऐसा कहकर वे चुप हो गए। श्रीविष्णु ने कहा - अपने पिता कुंजल द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर उज्ज्वल ने -

श्लोक 6 (padma.2.88.6)

प्रणम्य पादौ धर्मात्मा मातापित्रोर्महामतिः । जगाम त्वरितो राजन्प्लक्षद्वीपं स उज्ज्वलः

praṇamya pādau dharmātmā mātāpitrormahāmatiḥ jagāma tvarito rājanplakṣadvīpaṁ sa ujjvalaḥ

हे राजन्! माता-पिता के चरणों में प्रणाम कर, वह धर्मात्मा और महाबुद्धिमान उज्ज्वल शीघ्रता से प्लक्षद्वीप गया।

श्लोक 7 (padma.2.88.7)

तं गिरिं सर्वतोभद्रं नानाधातुसमाकुलम् । नानारत्नमयैस्तुंगैः शिखरैरुपशोभितम्

taṁ giriṁ sarvatobhadraṁ nānādhātusamākulam nānāratnamayaistuṁgaiḥ śikharairupaśobhitam

वह सर्वतोभद्र पर्वत, नाना धातुओं से भरा, नाना रत्नों से बने ऊँचे शिखरों से सुशोभित था।

श्लोक 8 (padma.2.88.8)

नानाप्रवाहसंपूर्णैरुदकैरुज्ज्वलैर्नृप । नद्यः संति स्वच्छनीरास्तस्मिन्गिरिवरोत्तमे

nānāpravāhasaṁpūrṇairudakairujjvalairnṛpa nadyaḥ saṁti svacchanīrāstasmingirivarottame

हे राजन्! अनेक धाराओं से भरे, उज्ज्वल जल से युक्त निर्मल जल वाली नदियाँ उस श्रेष्ठ पर्वत पर थीं।

श्लोक 9 (padma.2.88.9)

किन्नरास्तत्र गायंति गंधर्वाः सुस्वरैर्नृप । अप्सरोभिः समाकीर्णं देववृंदैरुपावृतम्

kinnarāstatra gāyaṁti gaṁdharvāḥ susvarairnṛpa apsarobhiḥ samākīrṇaṁ devavṛṁdairupāvṛtam

हे राजन्! वहाँ किन्नर गाते थे, गंधर्व भी मधुर स्वरों में; वह अप्सराओं से भरा, देव-समूहों से घिरा हुआ था।

श्लोक 10 (padma.2.88.10)

सिद्धचारणसंघुष्टं मुनिवृंदैरलंकृतम् । नानापक्षिनिनादैश्च सर्वत्र परिनादितम्

siddhacāraṇasaṁghuṣṭaṁ munivṛṁdairalaṁkṛtam nānāpakṣininādaiśca sarvatra parināditam

सिद्धों और चारणों से गूँजता, मुनि-समूहों से सुशोभित; अनेक पक्षियों की ध्वनियों से सर्वत्र गूँज रहा था।

श्लोक 11 (padma.2.88.11)

एवं गिरिं समासाद्य उज्ज्वलो लघुविक्रमः । सुस्वरेणापि सा कन्या गिरौ तस्मिन्प्ररोदिति

evaṁ giriṁ samāsādya ujjvalo laghuvikramaḥ susvareṇāpi sā kanyā girau tasminpraroditi

इस प्रकार उस पर्वत पर पहुँचकर, शीघ्रगामी उज्ज्वल ने देखा कि वह कन्या उस पर्वत पर मधुर स्वर में रो रही थी।

श्लोक 12 (padma.2.88.12)

रोरूयमाणां स प्राज्ञो वचनं चेदमब्रवीत् । का त्वं भवसि कल्याणि कस्माद्रोदिषि सांप्रतम्

rorūyamāṇāṁ sa prājño vacanaṁ cedamabravīt kā tvaṁ bhavasi kalyāṇi kasmādrodiṣi sāṁpratam

उस रोती हुई से उस बुद्धिमान पक्षी ने यह वचन कहा - 'हे कल्याणी! तुम कौन हो, अभी क्यों रो रही हो?'

श्लोक 13 (padma.2.88.13)

कमाश्रिता महाभागे केन ते विप्रियं कृतम् । समाचक्ष्व ममाद्यैव सर्वदुःखस्य कारणम्

kamāśritā mahābhāge kena te vipriyaṁ kṛtam samācakṣva mamādyaiva sarvaduḥkhasya kāraṇam

'हे महाभागे! तुम किसकी शरण में हो, और किसने तुम्हारे साथ यह अप्रिय किया है? अभी मुझे अपने समस्त दुःख का कारण बताओ।'

श्लोक 14 (padma.2.88.14)

दिव्यादेव्युवाच- विपाको हि महाभाग कर्मणां मम सांप्रतम् । इह तिष्ठामि दुःखेन वैधव्येन समन्विता

divyādevyuvāca- vipāko hi mahābhāga karmaṇāṁ mama sāṁpratam iha tiṣṭhāmi duḥkhena vaidhavyena samanvitā

दिव्यादेवी ने कहा - हे महाभाग! यह अभी मेरे ही कर्मों का परिणाम है; मैं यहाँ वैधव्य से युक्त होकर दुःख में रहती हूँ।

श्लोक 15 (padma.2.88.15)

भवान्को हि महाभाग कृपया मम पीडितः । पक्षिरूपधरो वत्स सोत्सवं परिभाषते

bhavānko hi mahābhāga kṛpayā mama pīḍitaḥ pakṣirūpadharo vatsa sotsavaṁ paribhāṣate

'आप कौन हैं, हे महाभाग! जो कृपापूर्वक मेरे दुःख से द्रवित हुए हैं?' हे वत्स! पक्षी-रूप धारण किए हुए उस उज्ज्वल ने हर्षपूर्वक उससे कहा -

श्लोक 16 (padma.2.88.16)

एवमाकर्ण्य तत्सर्वं भाषितं राजकन्यया । अहं पक्षी महाभागे कृपया तव पीडितः

evamākarṇya tatsarvaṁ bhāṣitaṁ rājakanyayā ahaṁ pakṣī mahābhāge kṛpayā tava pīḍitaḥ

राजकन्या के इस सारे कथन को सुनकर - 'हे महाभागे! मैं एक पक्षी हूँ, तुम्हारी करुणा से द्रवित हुआ हूँ।'

श्लोक 17 (padma.2.88.17)

पक्षिरूपधरो भद्रे नाहं सिद्धो न ज्ञानवान् । रुदमानां महालापैर्भवतीं दृष्टवानिह

pakṣirūpadharo bhadre nāhaṁ siddho na jñānavān rudamānāṁ mahālāpairbhavatīṁ dṛṣṭavāniha

'हे भद्रे! मैं पक्षी-रूप धारण किए हूँ, न सिद्ध हूँ, न ज्ञानी। मैंने तुम्हें यहाँ महाविलाप करते हुए रोते देखा,'

श्लोक 18 (padma.2.88.18)

ततः पृच्छाम्यहं देवि वद मे कारणं त्विह । पितुर्गेहे यथावृत्तमात्मवृत्तांतमेव हि

tataḥ pṛcchāmyahaṁ devi vada me kāraṇaṁ tviha piturgehe yathāvṛttamātmavṛttāṁtameva hi

'इसलिए, हे देवी! मैं पूछता हूँ, मुझे यहाँ का कारण बताओ - अपने पिता के घर में जैसा हुआ था, वह अपना सारा वृत्तांत।'

श्लोक 19 (padma.2.88.19)

तया निवेदितं सर्वं यथासंख्येन दुःखदम् । समासेन समाकर्ण्य उज्ज्वलस्तु महमनाः

tayā niveditaṁ sarvaṁ yathāsaṁkhyena duḥkhadam samāsena samākarṇya ujjvalastu mahamanāḥ

उसने उसे क्रमशः वह सारा दुःखदायी वृत्तांत सुना दिया। इसे संक्षेप में सुनकर महामना उज्ज्वल ने -

श्लोक 20 (padma.2.88.20)

तामुवाच महापक्षी दिव्यादेवीं सुदुःखिताम् । यथा विवाहकाले ते भर्तारो मरणं गताः

tāmuvāca mahāpakṣī divyādevīṁ suduḥkhitām yathā vivāhakāle te bhartāro maraṇaṁ gatāḥ

अत्यंत दुःखित उस दिव्यादेवी से, वह महापक्षी बोला - 'जिस प्रकार विवाह के समय तुम्हारे पति मृत्यु को प्राप्त होते रहे,'

श्लोक 21 (padma.2.88.21)

स्वयंवरनिमित्तं ते क्षयं याताश्च क्षत्रियाः । एतत्ते चेष्टितं सर्वं मया पितरि भाषितम्

svayaṁvaranimittaṁ te kṣayaṁ yātāśca kṣatriyāḥ etatte ceṣṭitaṁ sarvaṁ mayā pitari bhāṣitam

'और जैसे तुम्हारे स्वयंवर के निमित्त क्षत्रिय नष्ट हो गए - यह तुम्हारा सारा वृत्तांत मैंने अपने पिता से कह दिया था।'

श्लोक 22 (padma.2.88.22)

अन्यजन्मकृतंकर्मतव पापं सुलोचने । मम पित्रा ममाग्रे तु कृपया परिभाषितम्

anyajanmakṛtaṁkarmatava pāpaṁ sulocane mama pitrā mamāgre tu kṛpayā paribhāṣitam

'हे सुनयने! यह तुम्हारा पाप किसी अन्य जन्म में किए गए कर्म से उत्पन्न है; यह पहले मेरे पिता ने मेरे समक्ष कृपापूर्वक बताया था।'

श्लोक 23 (padma.2.88.23)

तेन दोषेण संपुष्टा लिप्ता जाता वरानने । एतावत्कारणं सर्वं तातेन परिभाषितम्

tena doṣeṇa saṁpuṣṭā liptā jātā varānane etāvatkāraṇaṁ sarvaṁ tātena paribhāṣitam

'उसी दोष से युक्त होकर, हे सुंदरमुखी! तुम इससे लिप्त हुई हो; इतना ही सारा कारण मेरे पिता ने बताया है।'

श्लोक 24 (padma.2.88.24)

पूर्वकर्मविपाकं तु भुंक्ष्व त्वं च समाश्वस । एवं सा भाषितं तस्य श्रुत्वा कन्योज्ज्वलस्य तत्

pūrvakarmavipākaṁ tu bhuṁkṣva tvaṁ ca samāśvasa evaṁ sā bhāṣitaṁ tasya śrutvā kanyojjvalasya tat

'अपने पूर्वकर्म के फल को भोगो और धैर्य रखो।' उज्ज्वल का यह वचन सुनकर वह कन्या -

श्लोक 25 (padma.2.88.25)

प्रत्युवाच महात्मानं ब्रुवंतं पक्षिणं पुनः । प्रणता दीनया वाचा कुरु पक्षिन्कृपां मम

pratyuvāca mahātmānaṁ bruvaṁtaṁ pakṣiṇaṁ punaḥ praṇatā dīnayā vācā kuru pakṣinkṛpāṁ mama

उस बोलते हुए महात्मा पक्षी से फिर बोली, विनम्र होकर, दीन वाणी से - 'हे पक्षी! मुझ पर कृपा करो।'

श्लोक 26 (padma.2.88.26)

कथयस्व प्रसादेन तस्य पापस्य निष्कृतिम् । प्रायश्चित्तं सुपुण्यं च मम पातकशोधनम्

kathayasva prasādena tasya pāpasya niṣkṛtim prāyaścittaṁ supuṇyaṁ ca mama pātakaśodhanam

'कृपापूर्वक उस पाप के निष्कृति (निवारण) का उपाय बताओ - वह पुण्यमय प्रायश्चित्त, जो मेरे पाप को शुद्ध करे।'

श्लोक 27 (padma.2.88.27)

येन व्रजाम्यहं पुण्यं विशुद्धाधौतकल्मषा । प्रायश्चित्तं महाभाग वद मे त्वं प्रसादतः

yena vrajāmyahaṁ puṇyaṁ viśuddhādhautakalmaṣā prāyaścittaṁ mahābhāga vada me tvaṁ prasādataḥ

'जिससे मैं शुद्ध, धुले हुए मल से रहित होकर पुण्य को प्राप्त हो सकूँ। हे महाभाग! मुझे कृपापूर्वक प्रायश्चित्त बताओ।'

श्लोक 28 (padma.2.88.28)

उज्ज्वल उवाच- तवार्थं तु महाभागे पितरं पृष्टवानहम् । समाख्यातमतः पित्रा प्रायश्चित्तमनुत्तमम्

ujjvala uvāca- tavārthaṁ tu mahābhāge pitaraṁ pṛṣṭavānaham samākhyātamataḥ pitrā prāyaścittamanuttamam

उज्ज्वल ने कहा - हे महाभागे! तुम्हारे लिए ही मैंने अपने पिता से पूछा था; उसके बाद पिता ने मुझे अनुपम प्रायश्चित्त बताया।

श्लोक 29 (padma.2.88.29)

तत्त्वं कुरु महाभागे सर्वपातकशोधनम् । ध्यायस्व हि हृषीकेशं शतनामजपस्व च

tattvaṁ kuru mahābhāge sarvapātakaśodhanam dhyāyasva hi hṛṣīkeśaṁ śatanāmajapasva ca

हे महाभागे! तुम वह करो, जो समस्त पापों को शुद्ध करता है - हृषीकेश का ध्यान करो और सौ नामों का जप करो।

श्लोक 30 (padma.2.88.30)

भव ज्ञानपरा नित्यं कुरु व्रतमनुत्तमम् । अशून्यशयनं पुण्यं व्रतं पापप्रणाशकम्

bhava jñānaparā nityaṁ kuru vratamanuttamam aśūnyaśayanaṁ puṇyaṁ vrataṁ pāpapraṇāśakam

सदा ज्ञान में तत्पर रहो, और वह अनुपम व्रत करो - पुण्यमय अशून्यशयन व्रत, जो पाप का नाशक है।

श्लोक 31 (padma.2.88.31)

समाचष्ट स धर्मात्मा सर्वज्ञानप्रकाशकम् । ज्ञानं स्तोत्रं व्रतं ध्यानं विष्णोश्चैव महात्मनः

samācaṣṭa sa dharmātmā sarvajñānaprakāśakam jñānaṁ stotraṁ vrataṁ dhyānaṁ viṣṇoścaiva mahātmanaḥ

उस धर्मात्मा ने इस प्रकार समस्त ज्ञान का प्रकाशक बताया - महात्मा विष्णु का ज्ञान, स्तोत्र, व्रत और ध्यान।

श्लोक 32 (padma.2.88.32)

विष्णुरुवाच- तस्मात्सा हि प्रजग्राह संस्थिता निर्जने वने । सर्वद्वंद्वविनिर्मुक्ता संजाता तपसि स्थिता

viṣṇuruvāca- tasmātsā hi prajagrāha saṁsthitā nirjane vane sarvadvaṁdvavinirmuktā saṁjātā tapasi sthitā

विष्णु ने कहा - तब उसने उसे ग्रहण कर लिया, निर्जन वन में स्थित होकर; वह समस्त द्वंद्वों से मुक्त होकर तप में स्थिर हो गई।

श्लोक 33 (padma.2.88.33)

व्रतं चक्रे जिताहारा निराधारा सुदुःखिता । कामक्रोधविहीना सा वर्गं संयम्य नित्यशः

vrataṁ cakre jitāhārā nirādhārā suduḥkhitā kāmakrodhavihīnā sā vargaṁ saṁyamya nityaśaḥ

वह भूख को जीतकर, बिना किसी आधार के, अत्यंत दुःखी होकर व्रत करने लगी; काम-क्रोध से रहित होकर उसने अपनी इंद्रियों को सदा संयमित रखा।

श्लोक 34 (padma.2.88.34)

इंद्रियाणां महाराज महामोहं निरस्य सा । अब्दे चतुर्थके प्राप्ते सुप्रसन्नो जनार्दनः

iṁdriyāṇāṁ mahārāja mahāmohaṁ nirasya sā abde caturthake prāpte suprasanno janārdanaḥ

हे महाराज! उसने इंद्रियों के महामोह को त्याग दिया। चौथा वर्ष पूर्ण होने पर जनार्दन अत्यंत प्रसन्न होकर -

श्लोक 35 (padma.2.88.35)

तस्यै वरं दातुकामश्चायातो वरनायकः । तस्यै संदर्शयामास स्वरूपं वरदः प्रभुः

tasyai varaṁ dātukāmaścāyāto varanāyakaḥ tasyai saṁdarśayāmāsa svarūpaṁ varadaḥ prabhuḥ

उसे वर देने की इच्छा से वह वरदाता आया; उस वरद प्रभु ने उसे अपना स्वरूप दिखाया।

श्लोक 36 (padma.2.88.36)

सूत उवाच- इंद्रनीलघनश्यामं शंखचक्रगदाधरम् । सर्वाभरणशोभाढ्यं पद्महस्तं महेश्वरम्

sūta uvāca- iṁdranīlaghanaśyāmaṁ śaṁkhacakragadādharam sarvābharaṇaśobhāḍhyaṁ padmahastaṁ maheśvaram

सूत ने कहा - इंद्रनील मणि के समान श्याम, शंख-चक्र-गदाधारी, समस्त आभूषणों से सुशोभित, कमल-हस्त महेश्वर को -

श्लोक 37 (padma.2.88.37)

बद्धांजलिपुटा भूत्वा वेपमाना निराश्रया । उवाच गद्गदैर्वाक्यैः प्रणता मधुसूदनम्

baddhāṁjalipuṭā bhūtvā vepamānā nirāśrayā uvāca gadgadairvākyaiḥ praṇatā madhusūdanam

हाथ जोड़े, काँपती हुई, निराधार वह प्रणत होकर मधुसूदन से गद्गद वाणी में बोली -

श्लोक 38 (padma.2.88.38)

तेजसा तव दिव्येन स्थातुं शक्नोमि नैव हि । दिव्यरूपो भवेः कस्त्वं कृपया मम चाग्रतः

tejasā tava divyena sthātuṁ śaknomi naiva hi divyarūpo bhaveḥ kastvaṁ kṛpayā mama cāgrataḥ

'आपके दिव्य तेज को सहन करना मेरे लिए असंभव है। हे दिव्यरूप! आप कृपापूर्वक मेरे समक्ष कौन आए हैं?'

श्लोक 39 (padma.2.88.39)

कथयस्व प्रसादेन किमत्र तव कारणम् । सर्वमेव प्रसादेन प्रब्रवीहि महामते

kathayasva prasādena kimatra tava kāraṇam sarvameva prasādena prabravīhi mahāmate

'मुझे कृपापूर्वक बताइए, इसका क्या कारण है। हे महामते! मुझे सब कुछ कृपापूर्वक बताइए।'

श्लोक 40 (padma.2.88.40)

देवमेवं विजानामि तेजसा इंगितैस्तव । ज्ञानहीना जगन्नाथ न जाने रूपनामनी

devamevaṁ vijānāmi tejasā iṁgitaistava jñānahīnā jagannātha na jāne rūpanāmanī

'हे जगन्नाथ! आपके तेज और संकेतों से मैं आपको देवता जानती हूँ, परंतु ज्ञानहीन होने से मैं आपका रूप और नाम नहीं जानती।'

श्लोक 41 (padma.2.88.41)

किं ब्रह्मा वा भवान्विष्णुः किं वा शंकर एव हि । एवमुक्त्वा प्रणम्यैवं दंडवद्धरणीं गता

kiṁ brahmā vā bhavānviṣṇuḥ kiṁ vā śaṁkara eva hi evamuktvā praṇamyaivaṁ daṁḍavaddharaṇīṁ gatā

'क्या आप ब्रह्मा हैं, या विष्णु, या फिर शंकर ही हैं?' ऐसा कहकर वह प्रणाम कर दंडवत् पृथ्वी पर गिर पड़ी।

श्लोक 42 (padma.2.88.42)

तामुवाच जगन्नाथः प्रणतां राजनंदिनीम् । श्रीभगवानुवाच- त्रयाणामपि देवानामंतरं नास्ति शोभने

tāmuvāca jagannāthaḥ praṇatāṁ rājanaṁdinīm śrībhagavānuvāca- trayāṇāmapi devānāmaṁtaraṁ nāsti śobhane

जगन्नाथ ने प्रणत उस राजकुमारी से कहा। श्रीभगवान ने कहा - हे शोभने! तीनों ही देवताओं में कोई अंतर नहीं है।

श्लोक 43 (padma.2.88.43)

ब्रह्मा समर्चितो येन शंकरो वा वरानने । तेनाहमर्चितो नित्यं नात्र कार्या विचारणा

brahmā samarcito yena śaṁkaro vā varānane tenāhamarcito nityaṁ nātra kāryā vicāraṇā

जिसके द्वारा ब्रह्मा या शंकर पूजित होते हैं, हे सुंदरमुखी! उसी के द्वारा मैं भी सदा पूजित होता हूँ, इसमें कोई विचार की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 44 (padma.2.88.44)

एतौ ममाभिन्नतरौ नित्यं चापि त्रिरूपवान् । अहं हि पूजितो यैश्च तावेतौ तैः सुपूजितौ

etau mamābhinnatarau nityaṁ cāpi trirūpavān ahaṁ hi pūjito yaiśca tāvetau taiḥ supūjitau

ये दोनों मुझसे सदा अभिन्न हैं, यद्यपि सदा त्रिरूप में हैं; जिनके द्वारा मैं पूजित हूँ, उन्हीं के द्वारा ये दोनों भी सुपूजित हैं।

श्लोक 45 (padma.2.88.45)

अहं देवो हृषीकेशः कृपया तव चागतः । स्तवेनानेन पुण्येन व्रतेन नियमेन च

ahaṁ devo hṛṣīkeśaḥ kṛpayā tava cāgataḥ stavenānena puṇyena vratena niyamena ca

मैं हृषीकेश देव हूँ, जो तुम्हारी करुणा से यहाँ आया हूँ। इस पुण्यमय स्तोत्र, व्रत और नियम से -

श्लोक 46 (padma.2.88.46)

संजाता कल्मषैर्हीना वरं वरय शोभने । दिव्यादेव्युवाच- विजयस्व हृषीकेश कृष्णक्लेशापहारक

saṁjātā kalmaṣairhīnā varaṁ varaya śobhane divyādevyuvāca- vijayasva hṛṣīkeśa kṛṣṇakleśāpahāraka

हे शोभने! तुम मलों से रहित हो गई हो। वर माँगो। दिव्यादेवी ने कहा - हे हृषीकेश! हे कृष्ण-क्लेश के हरने वाले! आपकी विजय हो!

श्लोक 47 (padma.2.88.47)

नमामि चरणद्वंद्वं मामुद्धर सुरेश्वर । वरं मे दातुकामोऽसि चक्रपाणे प्रसीद मे

namāmi caraṇadvaṁdvaṁ māmuddhara sureśvara varaṁ me dātukāmo'si cakrapāṇe prasīda me

मैं आपके दोनों चरणों को नमस्कार करती हूँ, हे सुरेश्वर! मेरा उद्धार कीजिए। हे चक्रपाणि! आप मुझे वर देना चाहते हैं, मुझ पर प्रसन्न होइए।

श्लोक 48 (padma.2.88.48)

आत्मपादयुगस्यापि भक्तिं देहि ममानघ । दर्शयस्व जगन्नाथ मोक्षमार्गं निरामयम्

ātmapādayugasyāpi bhaktiṁ dehi mamānagha darśayasva jagannātha mokṣamārgaṁ nirāmayam

हे निष्पाप! मुझे अपने चरण-युगल की भक्ति दीजिए। हे जगन्नाथ! मुझे निरामय मोक्ष-मार्ग दिखाइए।

श्लोक 49 (padma.2.88.49)

दासत्वं देहि वैकुंठ यदि तुष्टो जनार्दन । श्रीभगवानुवाच- एवमस्तु महाभागे गच्छ निर्धूतकल्मषा

dāsatvaṁ dehi vaikuṁṭha yadi tuṣṭo janārdana śrībhagavānuvāca- evamastu mahābhāge gaccha nirdhūtakalmaṣā

हे वैकुंठनाथ! यदि आप प्रसन्न हैं, हे जनार्दन! मुझे अपना दास्य दीजिए। श्रीभगवान ने कहा - हे महाभागे! ऐसा ही हो, तुम मलरहित होकर -

श्लोक 50 (padma.2.88.50)

वैष्णवं परमं लोकं दुर्लभं योगिभिः सदा । गच्छ गच्छ परं लोकं प्रसादान्मम सांप्रतम्

vaiṣṇavaṁ paramaṁ lokaṁ durlabhaṁ yogibhiḥ sadā gaccha gaccha paraṁ lokaṁ prasādānmama sāṁpratam

उस परम वैष्णव लोक को जाओ, जो योगियों के लिए भी सदा दुर्लभ है। मेरी कृपा से अभी जाओ, उस परम लोक को जाओ।

श्लोक 51 (padma.2.88.51)

एवमुक्ते ततो वाक्ये माधवेन महात्मना । दिव्यादेवी अभूद्दिव्या सूर्यतेजः समप्रभा

evamukte tato vākye mādhavena mahātmanā divyādevī abhūddivyā sūryatejaḥ samaprabhā

महात्मा माधव द्वारा यह वचन कहे जाने पर दिव्यादेवी दिव्य हो गई, सूर्य के तेज के समान प्रभा से युक्त,

श्लोक 52 (padma.2.88.52)

पश्यतां सर्वलोकानां दिव्याभरणभूषिता । दिव्यमालान्विता सा च दिव्यहारविलंबिनी

paśyatāṁ sarvalokānāṁ divyābharaṇabhūṣitā divyamālānvitā sā ca divyahāravilaṁbinī

समस्त लोकों के देखते-देखते दिव्य आभूषणों से भूषित, दिव्य मालाओं से युक्त और दिव्य हार से सुशोभित -

श्लोक 53 (padma.2.88.53)

गता सा वैष्णवं लोकं दाहप्रलयवर्जितम् । पुनः पक्षी समायातः स्वगृहं हर्षसंयुतः

gatā sā vaiṣṇavaṁ lokaṁ dāhapralayavarjitam punaḥ pakṣī samāyātaḥ svagṛhaṁ harṣasaṁyutaḥ

वह दाह और प्रलय से रहित वैष्णव लोक को चली गई। वह पक्षी पुनः हर्षपूर्वक अपने घर लौट आया,

श्लोक 54 (padma.2.88.54)

तत्सर्वं कथयामास पितरं प्रति सत्तमः

tatsarvaṁ kathayāmāsa pitaraṁ prati sattamaḥ

और उस श्रेष्ठ पक्षी ने अपने पिता से यह सब कह सुनाया।

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