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भूमि खण्ड · अध्याय 97

राजा सुबाहु की क्षुधा और वामदेव का अन्नदान-उपदेश

अध्याय 96अध्याय-सूचीअध्याय 98

श्लोक 1 (padma.2.97.1)

कुंजल उवाच- एवमाकर्ण्य तां राजा मुनिना भाषितां तदा । धर्माधर्मगतिं सर्वां तं मुनिं समभाषत

kuṁjala uvāca- evamākarṇya tāṁ rājā muninā bhāṣitāṁ tadā dharmādharmagatiṁ sarvāṁ taṁ muniṁ samabhāṣata

कुंजल ने कहा - इस प्रकार मुनि द्वारा कही गई उस समस्त धर्म-अधर्म की गति को सुनकर राजा ने तब उस मुनि से कहा।

श्लोक 2 (padma.2.97.2)

सुबाहुरुवाच- सोहं धर्मं करिष्यामि सोहं पुण्यं द्विजोत्तम । वासुदेवं जगद्योनिं यजिष्ये नितरां मुने

subāhuruvāca- sohaṁ dharmaṁ kariṣyāmi sohaṁ puṇyaṁ dvijottama vāsudevaṁ jagadyoniṁ yajiṣye nitarāṁ mune

सुबाहु ने कहा - हे द्विजोत्तम! मैं धर्म करूँगा, मैं पुण्य करूँगा। हे मुने! मैं जगत् के मूल-स्रोत वासुदेव की अत्यंत आराधना करूँगा।

श्लोक 3 (padma.2.97.3)

होमेन तु जपेनैव पूजयेन्मधुसूदनम् । यष्ट्वा यज्ञं तपस्तप्त्वा विष्णुलोकं स भूपतिः

homena tu japenaiva pūjayenmadhusūdanam yaṣṭvā yajñaṁ tapastaptvā viṣṇulokaṁ sa bhūpatiḥ

होम और जप से ही वह मधुसूदन की पूजा करने लगा; यज्ञ करके, तप तपकर, उस पृथ्वीपति ने -

श्लोक 4 (padma.2.97.4)

पूजितः सर्वकामैश्च प्राप्तवान्सत्वरं मुदा । गते तस्मिन्महालोके देवदेवं न पश्यति

pūjitaḥ sarvakāmaiśca prāptavānsatvaraṁ mudā gate tasminmahāloke devadevaṁ na paśyati

समस्त कामनाओं से पूजित होकर, शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक विष्णुलोक प्राप्त कर लिया। उस महालोक में जाने पर भी वह देवाधिदेव को नहीं देखता।

श्लोक 5 (padma.2.97.5)

क्षुधा जाता महातीव्रा तृष्णा चाति प्रवर्तते । तयोश्चापि महाप्राज्ञ जीवपीडाकरा बहु

kṣudhā jātā mahātīvrā tṛṣṇā cāti pravartate tayoścāpi mahāprājña jīvapīḍākarā bahu

अत्यंत तीव्र भूख उत्पन्न हुई, और प्यास भी अत्यधिक बढ़ने लगी; हे महाबुद्धिमान! उन दोनों ने उसके जीवन को अत्यंत पीड़ित कर दिया।

श्लोक 6 (padma.2.97.6)

राजापि प्रियया सार्द्धं क्षुधातृष्णाप्रपीडितः । न पश्यति हृषीकेशं दुःखेन महतान्वितः

rājāpi priyayā sārddhaṁ kṣudhātṛṣṇāprapīḍitaḥ na paśyati hṛṣīkeśaṁ duḥkhena mahatānvitaḥ

राजा भी अपनी प्रिया सहित, भूख-प्यास से पीड़ित होकर, महान दुःख से युक्त होकर हृषीकेश को नहीं देखता।

श्लोक 7 (padma.2.97.7)

सूत उवाच- एवं स दुःखितो राजा प्रियया सह सत्तम । आकुल व्याकुलो जातः पीडितः क्षुधया भृशम्

sūta uvāca- evaṁ sa duḥkhito rājā priyayā saha sattama ākula vyākulo jātaḥ pīḍitaḥ kṣudhayā bhṛśam

सूत ने कहा - हे सत्तम! इस प्रकार दुःखी वह राजा, अपनी प्रिया के साथ, भूख से अत्यंत पीड़ित होकर व्याकुल हो गया।

श्लोक 8 (padma.2.97.8)

इतश्चेतश्च वेगैश्च धावते वसुधाधिपः । सर्वाभरणशोभांगो वस्त्रचंदनभूषितः

itaścetaśca vegaiśca dhāvate vasudhādhipaḥ sarvābharaṇaśobhāṁgo vastracaṁdanabhūṣitaḥ

वह पृथ्वीपति इधर-उधर वेग से दौड़ता था; समस्त आभूषणों से सुशोभित शरीर वाला, वस्त्र-चंदन से भूषित,

श्लोक 9 (padma.2.97.9)

पुष्पमालाप्रशोभांगो हारकुंडलकंकणैः । रत्नदीप्तिप्रशोभांगः प्रययौ स महीपतिः

puṣpamālāpraśobhāṁgo hārakuṁḍalakaṁkaṇaiḥ ratnadīptipraśobhāṁgaḥ prayayau sa mahīpatiḥ

पुष्प-मालाओं से सुशोभित शरीर, हार-कुंडल-कंकणों से युक्त, रत्नों की चमक से देदीप्यमान - वह पृथ्वीपति इस प्रकार चलता था।

श्लोक 10 (padma.2.97.10)

एवं दुःखसमाचारः स्तूयमानश्च पाठकैः । दुःखशोकसमाविष्टः स्वप्रियां वाक्यमब्रवीत्

evaṁ duḥkhasamācāraḥ stūyamānaśca pāṭhakaiḥ duḥkhaśokasamāviṣṭaḥ svapriyāṁ vākyamabravīt

पाठकों द्वारा स्तुति किए जाते हुए भी इस प्रकार दुःखपूर्ण दशा में, शोक और दुःख से भरकर उसने अपनी प्रिया से यह वचन कहा -

श्लोक 11 (padma.2.97.11)

विष्णुलोकमहं प्राप्तस्त्वया सह सुशोभने । ऋषिभिः स्तूयमानोपि विमानेनापि भामिनि

viṣṇulokamahaṁ prāptastvayā saha suśobhane ṛṣibhiḥ stūyamānopi vimānenāpi bhāmini

'हे सुंदरी! मैं तुम्हारे साथ विष्णुलोक को प्राप्त हुआ हूँ। ऋषियों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, विमान से भी आया हुआ, हे भामिनी! -'

श्लोक 12 (padma.2.97.12)

कर्मणा केन मे चेयं क्षुधातीव प्रवर्द्धते । विष्णुलोकं च संप्राप्य न दृष्टो मधुसूदनः

karmaṇā kena me ceyaṁ kṣudhātīva pravarddhate viṣṇulokaṁ ca saṁprāpya na dṛṣṭo madhusūdanaḥ

'फिर किस कर्म से मेरी यह भूख इतनी बढ़ती जा रही है? विष्णुलोक प्राप्त करके भी मैंने मधुसूदन को नहीं देखा है।'

श्लोक 13 (padma.2.97.13)

तत्किं हि कारणं भद्रे न भुनज्मि महत्फलम् । कर्मणाथ निजेनापि एतद्दुःखं प्रवर्त्तते

tatkiṁ hi kāraṇaṁ bhadre na bhunajmi mahatphalam karmaṇātha nijenāpi etadduḥkhaṁ pravarttate

'हे भद्रे! उसका क्या कारण है कि मैं महाफल का भोग नहीं कर रहा? अपने ही किसी कर्म से यह दुःख उत्पन्न हुआ है।'

श्लोक 14 (padma.2.97.14)

सैवं श्रुत्वा च तद्वाक्यं राजानमिदमब्रवीत्

saivaṁ śrutvā ca tadvākyaṁ rājānamidamabravīt

यह वचन सुनकर उसने राजा से यह कहा।

श्लोक 15 (padma.2.97.15)

भार्योवाच- सत्यमुक्तं त्वया राजन्नास्ति धर्मस्य वै फलम् । वेदशास्त्रपुराणेषु ये पठंति च ब्राह्मणाः

bhāryovāca- satyamuktaṁ tvayā rājannāsti dharmasya vai phalam vedaśāstrapurāṇeṣu ye paṭhaṁti ca brāhmaṇāḥ

पत्नी ने कहा - हे राजन्! आपने सत्य कहा है, धर्म का फल अवश्य होता है। जो ब्राह्मण वेद, शास्त्र और पुराणों को पढ़ते हैं -

श्लोक 16 (padma.2.97.16)

दुःखशोकौ विधूयेह सर्वदोषैः प्रमुच्यते । नामोच्चारेण देवस्य विष्णोश्चैव सुचक्रिणः

duḥkhaśokau vidhūyeha sarvadoṣaiḥ pramucyate nāmoccāreṇa devasya viṣṇoścaiva sucakriṇaḥ

वे यहाँ दुःख-शोक को झाड़कर सभी दोषों से मुक्त हो जाते हैं। उत्तम चक्रधारी देव विष्णु के नाम-उच्चारण से -

श्लोक 17 (padma.2.97.17)

पुण्यात्मानो महाभागा ध्यायमाना जनार्दनम् । त्वयैवाराधितो देवः शंखचक्रगदाधरः

puṇyātmāno mahābhāgā dhyāyamānā janārdanam tvayaivārādhito devaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

पुण्यात्मा, महाभाग्यशाली लोग जनार्दन का ध्यान करते हैं। आपने भी शंख-चक्र-गदाधारी उस देव की आराधना की है।

श्लोक 18 (padma.2.97.18)

अन्नादिदानं विप्रेभ्यो न प्रदत्तं द्विजोदितम् । फलं तस्य प्रजानामि न दृष्टो मधुसूदनः

annādidānaṁ viprebhyo na pradattaṁ dvijoditam phalaṁ tasya prajānāmi na dṛṣṭo madhusūdanaḥ

परंतु द्विजों द्वारा कहा गया ब्राह्मणों को अन्न आदि का दान आपने नहीं दिया। उसी का फल मैं जानती हूँ - मधुसूदन नहीं देखे गए।

श्लोक 19 (padma.2.97.19)

क्षुधा मे बाधते राजंस्तृष्णा चैव प्रशोषयेत् । कुंजल उवाच- एवमुक्तस्तु प्रियया राजा चिंताकुलेंद्रियः

kṣudhā me bādhate rājaṁstṛṣṇā caiva praśoṣayet kuṁjala uvāca- evamuktastu priyayā rājā ciṁtākuleṁdriyaḥ

'हे राजन्! भूख मुझे भी सता रही है, और प्यास भी मुझे सुखाए दे रही है।' कुंजल ने कहा - प्रिया द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, चिंता से व्याकुल इंद्रियों वाला राजा -

श्लोक 20 (padma.2.97.20)

ततो दृष्ट्वा महापुण्यमाश्रमं श्रमनाशनम् । दिव्यवृक्षसमाकीर्णं तडागैरुपशोभितम्

tato dṛṣṭvā mahāpuṇyamāśramaṁ śramanāśanam divyavṛkṣasamākīrṇaṁ taḍāgairupaśobhitam

तब उसने एक अत्यंत पवित्र, श्रम को दूर करने वाला आश्रम देखा, जो दिव्य वृक्षों से भरा और तालाबों से सुशोभित था।

श्लोक 21 (padma.2.97.21)

वापीकुंडतडागैश्च पुण्यतोयप्रपूरितैः । हंसकारंडवाकीर्णं कह्लारैरुपशोभितम्

vāpīkuṁḍataḍāgaiśca puṇyatoyaprapūritaiḥ haṁsakāraṁḍavākīrṇaṁ kahlārairupaśobhitam

बावड़ियों, कुंडों और तालाबों से, पवित्र जल से भरे हुए, हंस-कारंडवों से भरे, कह्लार पुष्पों से सुशोभित।

श्लोक 22 (padma.2.97.22)

आश्रमः शोभते पुत्र मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः । दिव्यवृक्षसमाकीर्णं मृगव्रातैश्च शोभितम्

āśramaḥ śobhate putra munibhistattvavedibhiḥ divyavṛkṣasamākīrṇaṁ mṛgavrātaiśca śobhitam

हे पुत्र! वह आश्रम तत्त्ववेत्ता मुनियों से सुशोभित था, दिव्य वृक्षों से भरा और मृगों के झुंडों से सुशोभित।

श्लोक 23 (padma.2.97.23)

नानापुष्पसमाकीर्णं हृद्यगंधसमाकुलम् । द्विजसिद्धैः समाकीर्णमृषिशिष्यैः समाकुलम्

nānāpuṣpasamākīrṇaṁ hṛdyagaṁdhasamākulam dvijasiddhaiḥ samākīrṇamṛṣiśiṣyaiḥ samākulam

नाना पुष्पों से भरा, हृदय को भाने वाली सुगंध से युक्त, द्विज-सिद्धों से भरा, ऋषियों के शिष्यों से भरा।

श्लोक 24 (padma.2.97.24)

योगियोगेंद्र संघुष्टं देववृंदैरलंकृतम् । कदलीवनसंबाधैः सुफलैः परिशोभितम्

yogiyogeṁdra saṁghuṣṭaṁ devavṛṁdairalaṁkṛtam kadalīvanasaṁbādhaiḥ suphalaiḥ pariśobhitam

योगियों और योगेंद्रों से गूँजता, देव-समूहों से सुशोभित, केले के वनों से भरा, उत्तम फलों से सुशोभित।

श्लोक 25 (padma.2.97.25)

नानावृक्षसमाकीर्णं सर्वकामसमन्वितम् । श्रीखंडैश्चारुगंधैश्च सुफलैः शोभितं सदा

nānāvṛkṣasamākīrṇaṁ sarvakāmasamanvitam śrīkhaṁḍaiścārugaṁdhaiśca suphalaiḥ śobhitaṁ sadā

नाना वृक्षों से भरा, समस्त कामनाओं से युक्त, चंदन की सुंदर सुगंध और उत्तम फलों से सदा सुशोभित।

श्लोक 26 (padma.2.97.26)

एवं पुण्यं समाकीर्णं ब्रह्मलक्ष्मसमायुतम् । स सुबाहुस्ततो राजा तया सुप्रियया सह

evaṁ puṇyaṁ samākīrṇaṁ brahmalakṣmasamāyutam sa subāhustato rājā tayā supriyayā saha

इस प्रकार पुण्यमय, ब्रह्म के चिह्नों से युक्त उस स्थान में, राजा सुबाहु उस समय अपनी प्रिया के साथ -

श्लोक 27 (padma.2.97.27)

प्रविवेश महापुण्यं तद्वनं सर्वकामदम् । भासमानो दिशः सर्वा यत्रास्ते सूर्यसंनिभः

praviveśa mahāpuṇyaṁ tadvanaṁ sarvakāmadam bhāsamāno diśaḥ sarvā yatrāste sūryasaṁnibhaḥ

उस समस्त कामनाओं को देने वाले महापवित्र वन में प्रवेश किया, जहाँ सूर्य के समान प्रकाशित होते हुए, सभी दिशाओं को आलोकित करते हुए,

श्लोक 28 (padma.2.97.28)

राजमानो महादीप्त्या परया सूर्यसंनिभः । योगासनसमारूढो योगपट्टेन संवृतः

rājamāno mahādīptyā parayā sūryasaṁnibhaḥ yogāsanasamārūḍho yogapaṭṭena saṁvṛtaḥ

परम, महान दीप्ति से सूर्य के समान देदीप्यमान, योगासन पर आरूढ़, योगपट्ट से आवृत -

श्लोक 29 (padma.2.97.29)

वामदेवऋषिश्रेष्ठो वैष्णवानां वरस्तथा । ध्यायमानो हृषीकेशं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्

vāmadevaṛṣiśreṣṭho vaiṣṇavānāṁ varastathā dhyāyamāno hṛṣīkeśaṁ bhuktimuktipradāyakam

मुनियों में श्रेष्ठ ऋषि वामदेव, वैष्णवों में भी श्रेष्ठ, भोग और मोक्ष दोनों देने वाले हृषीकेश का ध्यान करते हुए बैठे थे।

श्लोक 30 (padma.2.97.30)

वामदेवं महात्मानं तं दृष्ट्वा मुनिसत्तमम् । त्वरं गत्वा प्रणम्यैव स राजा प्रियया सह

vāmadevaṁ mahātmānaṁ taṁ dṛṣṭvā munisattamam tvaraṁ gatvā praṇamyaiva sa rājā priyayā saha

उस महात्मा, मुनिश्रेष्ठ वामदेव को देखकर, वह राजा अपनी प्रिया के साथ शीघ्रता से जाकर प्रणाम करने लगा।

श्लोक 31 (padma.2.97.31)

वामदेवस्ततो दृष्ट्वा प्रणतं राजसत्तमम् । आशीर्भिरभिनंद्यैव राजानं प्रिययान्वितम्

vāmadevastato dṛṣṭvā praṇataṁ rājasattamam āśīrbhirabhinaṁdyaiva rājānaṁ priyayānvitam

तब वामदेव ने उस प्रणत श्रेष्ठ राजा को देखकर, प्रिया सहित उस राजा का आशीर्वादों से अभिनंदन किया,

श्लोक 32 (padma.2.97.32)

उपवेश्यासने पुण्ये सुबाहुं राजसत्तमम् । आसनादि ततः पाद्यैरर्घपूजादिभिस्तथा

upaveśyāsane puṇye subāhuṁ rājasattamam āsanādi tataḥ pādyairarghapūjādibhistathā

उस श्रेष्ठ राजा सुबाहु को पवित्र आसन पर बिठाकर; फिर आसन आदि से, चरण-जल, अर्घ्य और पूजा आदि से -

श्लोक 33 (padma.2.97.33)

मुनिना पूजितो भूपः प्रियया सह चागतः । अथ पप्रच्छ राजानं महाभागवतोत्तमम्

muninā pūjito bhūpaḥ priyayā saha cāgataḥ atha papraccha rājānaṁ mahābhāgavatottamam

प्रिया सहित आए उस राजा को मुनि ने पूजा। फिर उन्होंने उस महाभागवत-श्रेष्ठ राजा से पूछा।

श्लोक 34 (padma.2.97.34)

वामदेव उवाच- त्वामहं विष्णुधर्मज्ञं विष्णुभक्तं नरोत्तमम् । जाने ज्ञानेन राजेंद्र दिव्येन चोलभूमिपम्

vāmadeva uvāca- tvāmahaṁ viṣṇudharmajñaṁ viṣṇubhaktaṁ narottamam jāne jñānena rājeṁdra divyena colabhūmipam

वामदेव ने कहा - हे राजेंद्र! मैं दिव्य ज्ञान से जानता हूँ कि आप विष्णु-धर्म के ज्ञाता, विष्णु-भक्त, नरोत्तम और चोल भूमि के राजा हैं।

श्लोक 35 (padma.2.97.35)

निरामयश्चागतोसि तार्क्ष्यया भार्यया सह । राजोवाच- निरामयश्चागतोऽस्मि प्राप्तो विष्णोः परं पदम्

nirāmayaścāgatosi tārkṣyayā bhāryayā saha rājovāca- nirāmayaścāgato'smi prāpto viṣṇoḥ paraṁ padam

आप निरामय होकर अपनी पत्नी सहित आए हैं। राजा ने कहा - मैं निरामय होकर आया हूँ, विष्णु के परम पद को प्राप्त किया है।

श्लोक 36 (padma.2.97.36)

मया हि परया भक्त्या देवदेवो जनार्दनः । आराधितो जगन्नाथो भक्तिप्रीतः सुरेश्वरम्

mayā hi parayā bhaktyā devadevo janārdanaḥ ārādhito jagannātho bhaktiprītaḥ sureśvaram

मैंने परम भक्ति से देवाधिदेव जनार्दन, जगत्पति की आराधना की; भक्ति से प्रसन्न, देवताओं के स्वामी को -

श्लोक 37 (padma.2.97.37)

कस्मात्पश्याम्यहं तात न देवं कमलापतिम् । क्षुधा मे बाधते तात तृष्णातीव सुदारुणा

kasmātpaśyāmyahaṁ tāta na devaṁ kamalāpatim kṣudhā me bādhate tāta tṛṣṇātīva sudāruṇā

फिर भी, हे पिता! मैं कमलापति देव को क्यों नहीं देख पाता? हे पिता! भूख मुझे सता रही है, और प्यास भी अत्यंत भयंकर।

श्लोक 38 (padma.2.97.38)

ताभ्यां शांतिं न गच्छाव सुखं विंदाव नैव च । एतन्मेकारणं दुःखं संजातं मुनिसत्तम

tābhyāṁ śāṁtiṁ na gacchāva sukhaṁ viṁdāva naiva ca etanmekāraṇaṁ duḥkhaṁ saṁjātaṁ munisattama

इन दोनों से हमें न शांति मिलती है, न सुख। हे मुनिश्रेष्ठ! यही मेरा दुःख उत्पन्न होने का कारण है।

श्लोक 39 (padma.2.97.39)

तन्मे त्वं कारणं ब्रूहि प्रसादात्सुमुखो भव । वामदेव उवाच- त्वं तु भक्तोसि राजेंद्र श्रीकृष्णस्य सदैव हि

tanme tvaṁ kāraṇaṁ brūhi prasādātsumukho bhava vāmadeva uvāca- tvaṁ tu bhaktosi rājeṁdra śrīkṛṣṇasya sadaiva hi

वह कारण मुझे बताइए, कृपापूर्वक प्रसन्न मुख हो जाइए। वामदेव ने कहा - हे राजेंद्र! आप सदा ही श्रीकृष्ण के भक्त हैं।

श्लोक 40 (padma.2.97.40)

आराधितस्त्वया भक्त्या परया मधुसूदनः । भक्त्योपचारैः स्नानाद्यैर्गंधपुष्पादिभिस्तथा

ārādhitastvayā bhaktyā parayā madhusūdanaḥ bhaktyopacāraiḥ snānādyairgaṁdhapuṣpādibhistathā

आपने परम भक्ति से मधुसूदन की आराधना की, स्नान आदि भक्ति-उपचारों से, गंध-पुष्प आदि से भी;

श्लोक 41 (padma.2.97.41)

न पूजितोऽथ नैवेद्यैः फलैश्च जगतांपतिः । दशमीं प्राप्य राजेंद्र त्वयैव च सदा कृतम्

na pūjito'tha naivedyaiḥ phalaiśca jagatāṁpatiḥ daśamīṁ prāpya rājeṁdra tvayaiva ca sadā kṛtam

परंतु जगत्पति की नैवेद्य और फलों से पूजा नहीं की गई। हे राजेंद्र! दशमी को प्राप्त कर आपने सदा ऐसा ही किया -

श्लोक 42 (padma.2.97.42)

एकभक्तं न दत्तं तु ब्राह्मणाय सुभोजनम् । एकादशीं तु संप्राप्य न कृतं भोजनं त्वया

ekabhaktaṁ na dattaṁ tu brāhmaṇāya subhojanam ekādaśīṁ tu saṁprāpya na kṛtaṁ bhojanaṁ tvayā

आपने ब्राह्मण को एक बार भी उत्तम भोजन नहीं दिया। एकादशी को प्राप्त कर भी आपने भोजन नहीं कराया;

श्लोक 43 (padma.2.97.43)

विष्णुमुद्दिश्य विप्राय न दत्तं भोजनं त्वया । अन्नं चामृतरूपेण पृथिव्यां संस्थितं सदा

viṣṇumuddiśya viprāya na dattaṁ bhojanaṁ tvayā annaṁ cāmṛtarūpeṇa pṛthivyāṁ saṁsthitaṁ sadā

विष्णु के निमित्त आपने ब्राह्मण को भोजन नहीं दिया। अन्न सदा अमृत-रूप में पृथ्वी पर विद्यमान रहता है।

श्लोक 44 (padma.2.97.44)

अन्नदानं विशेषेण कदा दत्तं न हि त्वया । ओषध्यश्च महाराज नानाभेदास्तु ताः शृणु

annadānaṁ viśeṣeṇa kadā dattaṁ na hi tvayā oṣadhyaśca mahārāja nānābhedāstu tāḥ śṛṇu

आपने विशेष रूप से कब अन्नदान दिया? हे महाराज! और अनेक भेदों वाली उन औषधियों को सुनिए -

श्लोक 45 (padma.2.97.45)

कटु तिक्त कषायाश्च मधुराम्लाश्च क्षारकाः । हिंग्वाद्योपस्कराः सर्वे नानारूपाश्च भूपते

kaṭu tikta kaṣāyāśca madhurāmlāśca kṣārakāḥ hiṁgvādyopaskarāḥ sarve nānārūpāśca bhūpate

कटु, तिक्त, कषाय, मधुर, खट्टे और खारे, हींग आदि मसाले, हे भूपते! सभी नाना रूपों में -

श्लोक 46 (padma.2.97.46)

अमृताज्जज्ञिरे सर्वा ओषध्यः पुष्टिहेतवः । अन्नमेव सुसंस्कृत्य औषधव्यंजनान्वितम्

amṛtājjajñire sarvā oṣadhyaḥ puṣṭihetavaḥ annameva susaṁskṛtya auṣadhavyaṁjanānvitam

ये सभी पुष्टि के कारण औषधियाँ अमृत से उत्पन्न हुई हैं। अन्न को ही भलीभाँति संस्कारित कर, इन औषधीय व्यंजनों से युक्त कर -

श्लोक 47 (padma.2.97.47)

देवेभ्यो विष्णुरूपेभ्य इति संकल्प्य दीयते । पितृभ्यो विष्णुरूपेभ्यो हस्ते च ब्राह्मणस्य हि

devebhyo viṣṇurūpebhya iti saṁkalpya dīyate pitṛbhyo viṣṇurūpebhyo haste ca brāhmaṇasya hi

'विष्णु-स्वरूप देवताओं के लिए' - ऐसा संकल्प कर दिया जाता है; विष्णु-स्वरूप पितरों के लिए, और ब्राह्मण के हाथ में भी,

श्लोक 48 (padma.2.97.48)

अतिथिभ्यस्ततो दत्वा परिजनं प्रभोजयेत् । स्वयं तु भुंजते पश्चात्तदन्नममृतोपमम्

atithibhyastato datvā parijanaṁ prabhojayet svayaṁ tu bhuṁjate paścāttadannamamṛtopamam

अतिथियों को देकर फिर अपने परिवार को भोजन कराना चाहिए। स्वयं तो बाद में ही उस अमृत-तुल्य अन्न का भोग करे।

श्लोक 49 (padma.2.97.49)

प्रेत्य दुःखं न चैवास्ति तस्य सौख्यं तु भूपते । ब्राह्मणाः पितरो देवाः क्षत्ररूपाश्च भूपते

pretya duḥkhaṁ na caivāsti tasya saukhyaṁ tu bhūpate brāhmaṇāḥ pitaro devāḥ kṣatrarūpāśca bhūpate

उसके लिए मरणोपरांत कोई दुःख नहीं, हे भूपते! उसके लिए सुख ही सुख है। ब्राह्मण, पितर और देवता - क्षत्रिय के लिए, हे भूपते! -

श्लोक 50 (padma.2.97.50)

यथा हि कर्षकः कश्चित्सुकृषिं कुरुते सदा । तद्वन्मर्त्यः कृषिं कुर्यात्क्षेत्रे विप्रास्यके नृप

yathā hi karṣakaḥ kaścitsukṛṣiṁ kurute sadā tadvanmartyaḥ kṛṣiṁ kuryātkṣetre viprāsyake nṛpa

जैसे कोई किसान सदा अच्छी खेती करता है, वैसे ही, हे राजन्! मनुष्य को ब्राह्मण-मुख रूपी खेत में खेती करनी चाहिए -

श्लोक 51 (padma.2.97.51)

स्वभावलांगलेनापि श्रद्धा शस्त्रेण भेदयेत् । वृषभौ तु मतौ नित्यं बुद्धिश्चैव तपस्तथा

svabhāvalāṁgalenāpi śraddhā śastreṇa bhedayet vṛṣabhau tu matau nityaṁ buddhiścaiva tapastathā

अपने ही स्वभाव रूपी हल से, श्रद्धा रूपी फाल से भूमि को भेदते हुए; बुद्धि और तप को सदा दो बैल माना गया है,

श्लोक 52 (padma.2.97.52)

सत्यज्ञानानुभावीशः शुद्धात्मा तु प्रतोदकः । विप्रनाम्नि महाक्षेत्रे नमस्कारैर्विसर्जयेत्

satyajñānānubhāvīśaḥ śuddhātmā tu pratodakaḥ vipranāmni mahākṣetre namaskārairvisarjayet

सत्य, ज्ञान, ईश्वर की अनुभूति और शुद्ध आत्मा को ही अंकुश मानकर; 'ब्राह्मण' नामक महाक्षेत्र में नमस्कार करते हुए बीज छोड़े,

श्लोक 53 (padma.2.97.53)

स्फोटयेत्कल्मषं नित्यं कृषिको हि यथा नृप । क्षेत्रस्य उद्यमे युक्तो विष्णुकामः प्रसादयेत्

sphoṭayetkalmaṣaṁ nityaṁ kṛṣiko hi yathā nṛpa kṣetrasya udyame yukto viṣṇukāmaḥ prasādayet

जैसे किसान करता है, वैसे ही पाप के ढेलों को सदा तोड़ता रहे, हे राजन्! उस खेत की कृषि में लगा हुआ विष्णु-कामी मनुष्य ब्राह्मणों को प्रसन्न करे,

श्लोक 54 (padma.2.97.54)

तद्वद्वाक्यैः शुभैः पुण्यैर्विप्रांश्चापि प्रसादयेत् । पर्वतीर्थाप्तिकालश्च घनरूपोभिवर्षणे

tadvadvākyaiḥ śubhaiḥ puṇyairviprāṁścāpi prasādayet parvatīrthāptikālaśca ghanarūpobhivarṣaṇe

वैसे ही शुभ, पुण्यमय वचनों से भी उन्हें प्रसन्न करे। जैसे पर्व-तीर्थ का समय आने पर मेघ वर्षा के लिए घनरूप हो जाते हैं -

श्लोक 55 (padma.2.97.55)

वप्तुकामो भवेत्क्षेत्री ततः क्षेत्रे प्रवापयेत् । तद्वद्भूपप्रसन्नाय विप्राय परिदीयते

vaptukāmo bhavetkṣetrī tataḥ kṣetre pravāpayet tadvadbhūpaprasannāya viprāya paridīyate

बोने की इच्छा रखने वाला किसान तब अपने खेत में बीज बोता है; वैसे ही राजा से प्रसन्न ब्राह्मण को वह दान दिया जाता है।

श्लोक 56 (padma.2.97.56)

क्षेत्रस्य उप्तबीजस्य यथा क्षेत्री प्रभुंजति । फलमेव महाराज तथा दाता भुनक्ति च

kṣetrasya uptabījasya yathā kṣetrī prabhuṁjati phalameva mahārāja tathā dātā bhunakti ca

जैसे किसान अपने बोए हुए खेत के बीज का फल भोगता है, वैसे ही, हे महाराज! दाता भी उसी फल को भोगता है।

श्लोक 57 (padma.2.97.57)

प्रेत्य चात्रैव नित्यं च तृप्तो भवति नान्यथा । ब्राह्मणाः पितरो देवाः क्षेत्ररूपा न संशयः

pretya cātraiva nityaṁ ca tṛpto bhavati nānyathā brāhmaṇāḥ pitaro devāḥ kṣetrarūpā na saṁśayaḥ

मरणोपरांत और यहाँ भी वह सदा तृप्त रहता है, अन्यथा नहीं। ब्राह्मण, पितर और देवता निश्चय ही क्षेत्र-रूप हैं -

श्लोक 58 (padma.2.97.58)

मानवानां महाराज वापिताः प्रददंति च । फलमेवं न संदेहो यादृशं तादृशं ध्रुवम्

mānavānāṁ mahārāja vāpitāḥ pradadaṁti ca phalamevaṁ na saṁdeho yādṛśaṁ tādṛśaṁ dhruvam

हे महाराज! मनुष्यों के लिए, जो कुछ बोया (दिया) जाता है, वे उसका फल देते हैं; इसमें संशय नहीं - जैसा बोया जाता है, वैसा ही निश्चय होता है।

श्लोक 59 (padma.2.97.59)

कटुकाद्धि न जायेत राजन्मधुर एव च । तद्वच्च मधुराख्याच्च न जायेत्कटुकः पुनः

kaṭukāddhi na jāyeta rājanmadhura eva ca tadvacca madhurākhyācca na jāyetkaṭukaḥ punaḥ

हे राजन्! कटु से मधुर फल कभी उत्पन्न नहीं होता; और वैसे ही मधुर से भी कड़वा फल कभी उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 60 (padma.2.97.60)

यादृशं वपते बीजं तादृशं फलमश्नुते । न वापयति यः क्षेत्रं न स भुंजति तत्फलम्

yādṛśaṁ vapate bījaṁ tādṛśaṁ phalamaśnute na vāpayati yaḥ kṣetraṁ na sa bhuṁjati tatphalam

जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही फल भोगा जाता है। जो अपने खेत में बुवाई नहीं करता, वह उसका फल नहीं भोगता।

श्लोक 61 (padma.2.97.61)

तद्वद्विप्राश्च देवाश्च पितरः क्षेत्ररूपिणः । दर्शयंति फलं राजन्दत्तस्यापि न संशयः

tadvadviprāśca devāśca pitaraḥ kṣetrarūpiṇaḥ darśayaṁti phalaṁ rājandattasyāpi na saṁśayaḥ

वैसे ही ब्राह्मण, देवता और पितर, क्षेत्र-रूप होकर, हे राजन्! दिए हुए का फल दिखाते हैं, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 62 (padma.2.97.62)

यादृशं हि कृतं कर्म त्वयैव च शुभाशुभम् । तादृशं भुंक्ष्व वै राजन्नन्यथा तन्न जायते

yādṛśaṁ hi kṛtaṁ karma tvayaiva ca śubhāśubham tādṛśaṁ bhuṁkṣva vai rājannanyathā tanna jāyate

आपने ही जो शुभ या अशुभ कर्म किया है, हे राजन्! वैसा ही आपको भोगना है; अन्यथा वह नहीं हो सकता।

श्लोक 63 (padma.2.97.63)

न पुरा देवविप्रेभ्यः पितृभ्यश्च कदाचन । मिष्टान्नपानमेवापि दत्तं सुमनसा तदा

na purā devaviprebhyaḥ pitṛbhyaśca kadācana miṣṭānnapānamevāpi dattaṁ sumanasā tadā

पहले आपने कभी भी, प्रसन्न मन से, देवताओं, ब्राह्मणों या पितरों को मिष्ट अन्न-पान नहीं दिया।

श्लोक 64 (padma.2.97.64)

सुभोज्यैर्भोजनैर्मृष्टैर्मधुरैश्चोष्यपेयकैः । सुभक्ष्यैरात्मना भुक्तं कस्मै दत्तं न च त्वया

subhojyairbhojanairmṛṣṭairmadhuraiścoṣyapeyakaiḥ subhakṣyairātmanā bhuktaṁ kasmai dattaṁ na ca tvayā

आपने स्वयं ही उत्तम व्यंजन, स्वादिष्ट भोजन, मिष्ट पदार्थ, पेय और उत्तम खाद्य पदार्थ खाए - किसे आपने कभी दिए?

श्लोक 65 (padma.2.97.65)

स्वशरीरं त्वया पुष्टमन्नैरमृतसन्निभैः । यस्मात्कृतं महाराज तस्मात्क्षुधा प्रवर्तते

svaśarīraṁ tvayā puṣṭamannairamṛtasannibhaiḥ yasmātkṛtaṁ mahārāja tasmātkṣudhā pravartate

आपने अपने ही शरीर को अमृत-तुल्य अन्नों से पुष्ट किया। हे महाराज! चूँकि आपने ऐसा किया, इसीलिए भूख उत्पन्न होती है।

श्लोक 66 (padma.2.97.66)

कर्मैव कारणं राजन्नराणां सुखदुःखयोः । जन्ममृत्य्वोर्महाभाग भुंक्ष्व तत्कर्मणः फलम्

karmaiva kāraṇaṁ rājannarāṇāṁ sukhaduḥkhayoḥ janmamṛtyvormahābhāga bhuṁkṣva tatkarmaṇaḥ phalam

हे राजन्! कर्म ही मनुष्यों के सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु का कारण है, हे महाभाग! उसी कर्म का फल भोगिए।

श्लोक 67 (padma.2.97.67)

पूर्वेपि च महात्मानो दिवं प्राप्ताः स्वकर्मणा । पुनः प्रयाता भूर्लोकं कर्मणः क्षयकालतः

pūrvepi ca mahātmāno divaṁ prāptāḥ svakarmaṇā punaḥ prayātā bhūrlokaṁ karmaṇaḥ kṣayakālataḥ

पूर्वकाल में भी महात्माओं ने अपने ही कर्म से स्वर्ग प्राप्त किया, और कर्म के क्षय-काल में पुनः भूलोक को लौट गए।

श्लोक 68 (padma.2.97.68)

नलो भगीरथश्चैव विश्वामित्रो युधिष्ठिरः । कर्मणैव हि संप्राप्ताः स्वर्गं राजन्स्वकालतः

nalo bhagīrathaścaiva viśvāmitro yudhiṣṭhiraḥ karmaṇaiva hi saṁprāptāḥ svargaṁ rājansvakālataḥ

नल, भगीरथ, विश्वामित्र और युधिष्ठिर - हे राजन्! सभी अपने-अपने समय में कर्म से ही स्वर्ग को प्राप्त हुए।

श्लोक 69 (padma.2.97.69)

दिष्टं हि प्राक्तनं कर्म तेन दुःखं सुखं लभेत् । तदुल्लंघयितुं राजन्कः समर्थोपि हीश्वरः

diṣṭaṁ hi prāktanaṁ karma tena duḥkhaṁ sukhaṁ labhet tadullaṁghayituṁ rājankaḥ samarthopi hīśvaraḥ

पूर्वकृत कर्म ही नियत होता है, उसी से मनुष्य दुःख-सुख प्राप्त करता है। हे राजन्! उसे टालने में कौन समर्थ है, चाहे वह ईश्वर ही क्यों न हो?

श्लोक 70 (padma.2.97.70)

अथ तस्मान्नृपश्रेष्ठ स्वर्गतस्यापि तेऽभवत् । क्षुत्तृष्णासंभवो वेगस्ततो दुष्टं हि कर्म ते

atha tasmānnṛpaśreṣṭha svargatasyāpi te'bhavat kṣuttṛṣṇāsaṁbhavo vegastato duṣṭaṁ hi karma te

हे नृपश्रेष्ठ! इसीलिए स्वर्ग प्राप्त कर लेने पर भी आपको यह भूख-प्यास का वेग उत्पन्न हुआ; अतः यह आपका ही दुष्ट कर्म है।

श्लोक 71 (padma.2.97.71)

यदि ते क्षुत्प्रतीकारो ह्यभीष्टो नृपसत्तम । तद्गत्वा भुंक्ष्व कायं स्वमानंदारण्यसंस्थितम्

yadi te kṣutpratīkāro hyabhīṣṭo nṛpasattama tadgatvā bhuṁkṣva kāyaṁ svamānaṁdāraṇyasaṁsthitam

हे नृपसत्तम! यदि आप भूख का प्रतिकार चाहते हैं, तो जाकर आनंदवन में स्थित अपने शरीर का भोग कीजिए।

श्लोक 72 (padma.2.97.72)

तव चेयं महाराज्ञी क्षुत्क्षामातीव दृश्यते । सुबाहुरुवाच- कियत्कालमिदं कर्म कर्तव्यं प्रियया सह

tava ceyaṁ mahārājñī kṣutkṣāmātīva dṛśyate subāhuruvāca- kiyatkālamidaṁ karma kartavyaṁ priyayā saha

हे महाराज! आपकी यह महारानी भी भूख से अत्यंत क्षीण दिखाई देती है। सुबाहु ने कहा - यह कर्म कितने समय तक प्रिया के साथ करना होगा?

श्लोक 73 (padma.2.97.73)

तन्मे ब्रूहि महाभागानुग्रहो दृश्यते कदा । कस्य दानेन किं पुण्यं द्रव्यस्य मुनिसत्तम

tanme brūhi mahābhāgānugraho dṛśyate kadā kasya dānena kiṁ puṇyaṁ dravyasya munisattama

हे महाभाग! मुझे बताइए, कब कृपा दिखाई देगी? हे मुनिश्रेष्ठ! किस वस्तु के दान से क्या पुण्य होता है?

श्लोक 74 (padma.2.97.74)

तत्प्रब्रूहि महाप्राज्ञ यदि तुष्टोसि सांप्रतम् । वामदेव उवाच- अन्नदानान्महासौख्यमुदकस्य महामते

tatprabrūhi mahāprājña yadi tuṣṭosi sāṁpratam vāmadeva uvāca- annadānānmahāsaukhyamudakasya mahāmate

हे महाप्राज्ञ! यदि आप अभी मुझ पर प्रसन्न हैं, तो वह बताइए। वामदेव ने कहा - अन्नदान से महासुख होता है, और जल के दान से भी, हे महामते! -

श्लोक 75 (padma.2.97.75)

भुंजंति मर्त्याः स्वर्गं वै पीड्यंते नैव पातकैः । यदा दानं न दत्तं तु भवेदपि हि मानवैः

bhuṁjaṁti martyāḥ svargaṁ vai pīḍyaṁte naiva pātakaiḥ yadā dānaṁ na dattaṁ tu bhavedapi hi mānavaiḥ

मनुष्य स्वर्ग का भोग करते हैं, और पापों से पीड़ित नहीं होते। जब मनुष्य कोई दान नहीं देते -

श्लोक 76 (padma.2.97.76)

मृत्युकालेपि संप्राप्ते दानं सर्वे ददंति च । आदावेव प्रदातव्यमन्नं चोदकसंयुतम्

mṛtyukālepi saṁprāpte dānaṁ sarve dadaṁti ca ādāveva pradātavyamannaṁ codakasaṁyutam

तो मृत्यु का समय आने पर भी सभी कोई न कोई दान अवश्य देते हैं। सबसे पहले अन्न, जल सहित, दिया जाना चाहिए;

श्लोक 77 (padma.2.97.77)

सुच्छत्रोपानहौ दद्याज्जलपात्रं सुशोभनम् । भूमिं सुकांचनं धेनुमष्टौ दानानि योऽर्पयेत्

succhatropānahau dadyājjalapātraṁ suśobhanam bhūmiṁ sukāṁcanaṁ dhenumaṣṭau dānāni yo'rpayet

उत्तम छत्र और जूते देने चाहिए, और एक सुंदर जल-पात्र भी। जो भूमि, उत्तम स्वर्ण और गाय सहित ये आठ दान अर्पित करता है -

श्लोक 78 (padma.2.97.78)

स्वर्गे न जायते तस्य क्षुधातृष्णादिसंभवः । क्षुधा न बाधते राजन्नन्नदानात्स तृप्तिमान्

svarge na jāyate tasya kṣudhātṛṣṇādisaṁbhavaḥ kṣudhā na bādhate rājannannadānātsa tṛptimān

उसे स्वर्ग में भूख-प्यास आदि की उत्पत्ति नहीं होती। हे राजन्! अन्नदान से वह तृप्त होकर भूख से पीड़ित नहीं होता।

श्लोक 79 (padma.2.97.79)

तृष्णा तीव्रा नहि स्याद्वै तृप्तो भवति सर्वदा । पादुकायाः प्रदानेन च्छत्रदानेन भूपते

tṛṣṇā tīvrā nahi syādvai tṛpto bhavati sarvadā pādukāyāḥ pradānena cchatradānena bhūpate

उसकी प्यास कभी तीव्र नहीं होती, वह सदा संतुष्ट रहता है। जूते और छत्र के दान से, हे भूपते! -

श्लोक 80 (padma.2.97.80)

छायामाप्नोति दाता वै वाहनं च नृपोत्तम । उपानहप्रदानेन अन्यदेवं वदाम्यहम्

chāyāmāpnoti dātā vai vāhanaṁ ca nṛpottama upānahapradānena anyadevaṁ vadāmyaham

हे नृपोत्तम! दाता को छाया और वाहन भी प्राप्त होता है। जूतों के दान से - मैं तुम्हें एक और बात बताता हूँ -

श्लोक 81 (padma.2.97.81)

भूमिदानान्महाभाग सर्वकामानवाप्नुयात् । गोदानेन महाराज रसैः पुष्टो भवेत्सदा

bhūmidānānmahābhāga sarvakāmānavāpnuyāt godānena mahārāja rasaiḥ puṣṭo bhavetsadā

हे महाभाग! भूमि-दान से मनुष्य समस्त कामनाओं की पूर्ति प्राप्त करता है; हे महाराज! गोदान से वह सदा सारभूत रसों से पुष्ट होता है,

श्लोक 82 (padma.2.97.82)

सर्वान्भोगान्प्रभुंजानः स्वर्गलोके वसेन्नरः । तृप्तो भवति वै दाता गोदानेन न संशयः

sarvānbhogānprabhuṁjānaḥ svargaloke vasennaraḥ tṛpto bhavati vai dātā godānena na saṁśayaḥ

स्वर्गलोक में समस्त भोगों का उपभोग करते हुए निवास करता है। गोदान से दाता निश्चय ही तृप्त हो जाता है,

श्लोक 83 (padma.2.97.83)

नीरुजः सुखसंपन्नः संतुष्टस्तु धनान्वितः । कांचनेन सुवर्णस्तु जायते नात्र संशयः

nīrujaḥ sukhasaṁpannaḥ saṁtuṣṭastu dhanānvitaḥ kāṁcanena suvarṇastu jāyate nātra saṁśayaḥ

रोगरहित, सुख-संपन्न, संतुष्ट और धन से युक्त। स्वर्ण से मनुष्य स्वयं सुवर्ण (कांतिमान) बन जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 84 (padma.2.97.84)

श्रीमांश्च रूपवांस्त्यागी रत्नभोक्ता भवेन्नरः । मृत्युकाले तु संप्राप्ते तिलदानं प्रयच्छति

śrīmāṁśca rūpavāṁstyāgī ratnabhoktā bhavennaraḥ mṛtyukāle tu saṁprāpte tiladānaṁ prayacchati

वह श्रीमान, रूपवान, त्यागी और रत्नों का भोक्ता बनता है। मृत्यु का समय आने पर जो तिल का दान देता है -

श्लोक 85 (padma.2.97.85)

सर्वभोगपतिर्भूत्वा विष्णुलोकं प्रयाति सः । एवं दानविशेषेण प्राप्यते परमं सुखम्

sarvabhogapatirbhūtvā viṣṇulokaṁ prayāti saḥ evaṁ dānaviśeṣeṇa prāpyate paramaṁ sukham

वह समस्त भोगों का स्वामी बनकर विष्णुलोक को जाता है। इस प्रकार विशेष दानों से परम सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 86 (padma.2.97.86)

गोदानं भूमिदानं तु अन्नोदके च वै त्वया । जीवमानेन राजेंद्र न दत्तं ब्राह्मणाय वै

godānaṁ bhūmidānaṁ tu annodake ca vai tvayā jīvamānena rājeṁdra na dattaṁ brāhmaṇāya vai

हे राजेंद्र! गोदान, भूमिदान, अन्न-जल का दान - ये सब आपने जीवित रहते हुए -

श्लोक 87 (padma.2.97.87)

मृत्युकालेपि नो दत्तं तस्मात्क्षुधा प्रवर्तते । एतत्ते कारणं प्रोक्तं जातं कर्मवशानुगम्

mṛtyukālepi no dattaṁ tasmātkṣudhā pravartate etatte kāraṇaṁ proktaṁ jātaṁ karmavaśānugam

ब्राह्मण को कभी नहीं दिए; मृत्यु के समय भी नहीं दिए, इसीलिए भूख उत्पन्न होती है। यही कारण मैंने आपको बताया, जो आपके ही कर्म के वशीभूत होकर उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 88 (padma.2.97.88)

यादृशं तु कृतं कर्म तादृशं परिभुज्यते । सुबाहुरुवाच- कथं क्षुधा प्रशांतिं मे प्रयाति मुनिसत्तम

yādṛśaṁ tu kṛtaṁ karma tādṛśaṁ paribhujyate subāhuruvāca- kathaṁ kṣudhā praśāṁtiṁ me prayāti munisattama

जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही भोगा जाता है। सुबाहु ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ! मेरी यह भूख कैसे शांत होगी?

श्लोक 89 (padma.2.97.89)

अनया शोषितः कायो ह्यतीव परिदूयते । क्षुधां प्रति द्विजश्रेष्ठ प्रायश्चित्तं वदस्व नौः

anayā śoṣitaḥ kāyo hyatīva paridūyate kṣudhāṁ prati dvijaśreṣṭha prāyaścittaṁ vadasva nauḥ

इससे सूखा हुआ मेरा शरीर अत्यंत संतप्त है। हे द्विजश्रेष्ठ! भूख के विरुद्ध प्रायश्चित्त हमें बताइए।

श्लोक 90 (padma.2.97.90)

कर्मणश्चास्यघोरस्य यथा शांतिर्भवेन्मम । वामदेव उवाच- प्रायश्चित्तं न चैवास्ति ऋतेभोगान्नृपोत्तम

karmaṇaścāsyaghorasya yathā śāṁtirbhavenmama vāmadeva uvāca- prāyaścittaṁ na caivāsti ṛtebhogānnṛpottama

इस भयंकर कर्म से मुझे किस प्रकार शांति मिलेगी। वामदेव ने कहा - हे नृपोत्तम! भोग के अतिरिक्त कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

श्लोक 91 (padma.2.97.91)

कर्मणोस्य फलं सर्वं भवान्स्वस्थः प्रभोक्ष्यति । यत्र ते पतितः कायः प्रियायाश्चैव भूपते

karmaṇosya phalaṁ sarvaṁ bhavānsvasthaḥ prabhokṣyati yatra te patitaḥ kāyaḥ priyāyāścaiva bhūpate

आप इस कर्म का सारा फल स्वस्थ चित्त से भोगेंगे। हे भूपते! जहाँ आपका और आपकी प्रिया का शरीर पड़ा है -

श्लोक 92 (padma.2.97.92)

युवाभ्यां हि प्रगंतव्यमितश्चैव न संशयः । उभाभ्यामपि भोक्तव्यं कायमक्षयमेव तत्

yuvābhyāṁ hi pragaṁtavyamitaścaiva na saṁśayaḥ ubhābhyāmapi bhoktavyaṁ kāyamakṣayameva tat

वहाँ आप दोनों को यहाँ से जाना ही होगा, इसमें संशय नहीं। दोनों को ही उस अक्षय शरीर का भोग करना होगा -

श्लोक 93 (padma.2.97.93)

स्वंस्वं राजन्न संदेहस्त्वया वै प्रियया सह । राजोवाच- कियत्कालं प्रभोक्तव्यं मयैवं प्रियया सह

svaṁsvaṁ rājanna saṁdehastvayā vai priyayā saha rājovāca- kiyatkālaṁ prabhoktavyaṁ mayaivaṁ priyayā saha

हे राजन्! अपना-अपना, इसमें संशय नहीं, आपको प्रिया के साथ। राजा ने कहा - मुझे प्रिया सहित कब तक ऐसा भोगना होगा?

श्लोक 94 (padma.2.97.94)

तदादिश महाभाग प्रमाणं तद्वचो मम । वामदेव उवाच- वासुदेव महास्तोत्रं महापातकनाशनम्

tadādiśa mahābhāga pramāṇaṁ tadvaco mama vāmadeva uvāca- vāsudeva mahāstotraṁ mahāpātakanāśanam

हे महाभाग! वह मुझे बताइए, आपका वचन ही मेरे लिए प्रमाण हो। वामदेव ने कहा - वासुदेव नामक महास्तोत्र, जो महापातकों का नाशक है -

श्लोक 95 (padma.2.97.95)

यदा त्वं श्रोष्यसे पुण्यं तदा मोक्षं प्रयास्यसि । एतत्ते सर्वमाख्यातं गच्छ राजन्प्रभुंक्ष्वहि

yadā tvaṁ śroṣyase puṇyaṁ tadā mokṣaṁ prayāsyasi etatte sarvamākhyātaṁ gaccha rājanprabhuṁkṣvahi

जब आप उस पुण्यमय स्तोत्र को सुनेंगे, तब आप मोक्ष को प्राप्त होंगे। यह सब मैंने आपको बता दिया; हे राजन्! जाइए और भोग कीजिए।

श्लोक 96 (padma.2.97.96)

एवं श्रुत्वा ततो राजा भार्यया सह वै पुनः । स्वशरीरस्य वै मांसं भक्षते प्रियया सह

evaṁ śrutvā tato rājā bhāryayā saha vai punaḥ svaśarīrasya vai māṁsaṁ bhakṣate priyayā saha

यह सुनकर राजा ने फिर अपनी पत्नी सहित अपने ही शरीर का मांस खाना आरंभ किया, प्रिया सहित,

श्लोक 97 (padma.2.97.97)

नित्यमेव महाप्राज्ञ तद्वत्पूर्णं भवेद्वपुः । नित्यं प्रभक्षते राजा राज्ञी तस्य च पुत्रक

nityameva mahāprājña tadvatpūrṇaṁ bhavedvapuḥ nityaṁ prabhakṣate rājā rājñī tasya ca putraka

हे महाबुद्धिमान! निरंतर, और वैसे ही वह शरीर पुनः पूर्ण हो जाता था। राजा निरंतर खाता रहा, और हे पुत्रक! उसकी रानी भी।

श्लोक 98 (padma.2.97.98)

यथायथा च राजा च भक्षते च कलेवरम् । हसेते वै सदा नार्यौ तयोर्भावं वदाम्यहम्

yathāyathā ca rājā ca bhakṣate ca kalevaram hasete vai sadā nāryau tayorbhāvaṁ vadāmyaham

जैसे-जैसे राजा अपने ही शरीर को खाता जाता, वैसे-वैसे वे दोनों स्त्रियाँ सदा हँसती थीं; मैं तुम्हें उनके भाव का अर्थ बताता हूँ।

श्लोक 99 (padma.2.97.99)

प्रज्ञा सार्द्धं महासाध्वी चरित्रं तस्य भूपतेः । हास्यं हि कुरुते नित्यं तस्य श्रद्धानपायिनी

prajñā sārddhaṁ mahāsādhvī caritraṁ tasya bhūpateḥ hāsyaṁ hi kurute nityaṁ tasya śraddhānapāyinī

प्रज्ञा, उस महासाध्वी (श्रद्धा) के साथ, उस राजा के आचरण को देखकर, उसकी श्रद्धा-रहितता के कारण सदा हास्य करती है।

श्लोक 100 (padma.2.97.100)

प्रज्ञया प्रेर्यमाणेन न दत्तं श्रद्धयान्वितम् । ब्राह्मणेभ्यः सुसंकल्प्य अन्नमुद्दिश्य वैष्णवे

prajñayā preryamāṇena na dattaṁ śraddhayānvitam brāhmaṇebhyaḥ susaṁkalpya annamuddiśya vaiṣṇave

केवल बुद्धि से प्रेरित होकर, श्रद्धा से युक्त कुछ भी नहीं दिया गया - 'विष्णु के निमित्त ब्राह्मणों को अन्न दूँगा' - ऐसा संकल्प मात्र करके,

श्लोक 101 (padma.2.97.101)

एवं स भक्षते मांसं स्वस्य कायस्य नित्यदा । योषिदप्यात्मकायं च रसैश्चामृतसन्निभैः

evaṁ sa bhakṣate māṁsaṁ svasya kāyasya nityadā yoṣidapyātmakāyaṁ ca rasaiścāmṛtasannibhaiḥ

वह इस प्रकार निरंतर अपने ही शरीर का मांस खाता है; और वह स्त्री (रानी) भी अपने ही शरीर को, अमृत-तुल्य रसों सहित।

श्लोक 102 (padma.2.97.102)

ततो वर्षशतांते तु वामदेवं महामुनिम् । स्मृत्वा स गर्हयामास आत्मानं प्रति सुव्रत

tato varṣaśatāṁte tu vāmadevaṁ mahāmunim smṛtvā sa garhayāmāsa ātmānaṁ prati suvrata

तब सौ वर्ष के अंत में, महामुनि वामदेव को स्मरण कर, हे सुव्रत! उसने स्वयं को धिक्कारना आरंभ किया -

श्लोक 103 (padma.2.97.103)

न दत्तं पितृदेवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यः कदा मया । न दत्तमतिथिभ्यो हि वृद्धेभ्यश्च विशेषतः

na dattaṁ pitṛdevebhyo brāhmaṇebhyaḥ kadā mayā na dattamatithibhyo hi vṛddhebhyaśca viśeṣataḥ

'मैंने कभी पितरों, देवताओं और ब्राह्मणों को कुछ नहीं दिया; अतिथियों को नहीं दिया, विशेष रूप से वृद्धों को नहीं दिया;'

श्लोक 104 (padma.2.97.104)

दीनेभ्यो हि न दत्तं च कृपया चातुराय च । एवं स भुंक्ते स्वं मांसं गर्हयन्स्वीय कर्म च

dīnebhyo hi na dattaṁ ca kṛpayā cāturāya ca evaṁ sa bhuṁkte svaṁ māṁsaṁ garhayansvīya karma ca

'दीनों को कृपापूर्वक नहीं दिया, और पीड़ितों को भी नहीं दिया।' इस प्रकार वह अपने ही कर्म को धिक्कारते हुए अपना मांस खाता रहा।

श्लोक 105 (padma.2.97.105)

एवं स्वमांसं भुंजानं सुबाहुं प्रियया सह । हसेते च तदा दृष्ट्वा प्रज्ञा श्रद्धा च द्वे स्त्रियौ

evaṁ svamāṁsaṁ bhuṁjānaṁ subāhuṁ priyayā saha hasete ca tadā dṛṣṭvā prajñā śraddhā ca dve striyau

इस प्रकार सुबाहु को प्रिया सहित अपना ही मांस खाते देखकर, प्रज्ञा और श्रद्धा नामक वे दोनों स्त्रियाँ तब हँस पड़ीं।

श्लोक 106 (padma.2.97.106)

तस्य कर्मविपाकस्य शुभात्मा हसते नृप । मम संगप्रसंगेन न दत्तं पापचेतन

tasya karmavipākasya śubhātmā hasate nṛpa mama saṁgaprasaṁgena na dattaṁ pāpacetana

हे राजन्! उसके कर्म के इस परिणाम पर वह पवित्र आत्मा हँसती है - 'मेरे संग-प्रसंग से भी तुमने कुछ नहीं दिया, हे पापचेतन!'

श्लोक 107 (padma.2.97.107)

प्रज्ञा च वचनैस्तैस्तु राजानं हसते पुनः । क्वगतोसौ महामोहो येन त्वं मोहितो नृप

prajñā ca vacanaistaistu rājānaṁ hasate punaḥ kvagatosau mahāmoho yena tvaṁ mohito nṛpa

और प्रज्ञा भी उन्हीं वचनों से राजा पर फिर हँसती है - 'हे राजन्! वह महामोह कहाँ चला गया, जिससे तुम मोहित हुए थे?'

श्लोक 108 (padma.2.97.108)

लोभेन मोहयुक्तेन तमोगर्ते निपात्यते । तत्रापतित्वा मामैव पतितं दुःखसंकटे

lobhena mohayuktena tamogarte nipātyate tatrāpatitvā māmaiva patitaṁ duḥkhasaṁkaṭe

'लोभ से युक्त मोह के द्वारा अंधकार के गड्ढे में गिराया जाकर, उसी में गिरकर, मेरे साथ ही तुम इस दुःखपूर्ण संकट में गिरे हो -'

श्लोक 109 (padma.2.97.109)

दानमार्गं परित्यज्य लोभमार्गं गतो नृप । भार्यया सह भुंक्ष्व त्वं व्यापितः क्षुधया भृशम्

dānamārgaṁ parityajya lobhamārgaṁ gato nṛpa bhāryayā saha bhuṁkṣva tvaṁ vyāpitaḥ kṣudhayā bhṛśam

'हे राजन्! दान के मार्ग को त्यागकर तुम लोभ के मार्ग पर चले गए; अब पत्नी सहित, भूख से अत्यंत व्याप्त होकर, इसका भोग करो।'

श्लोक 110 (padma.2.97.110)

एवं तं हसते प्रज्ञा सुबाहुं प्रिययान्वितम् । एतद्धि कारणं सर्वं तयोर्हासस्य पुत्रक

evaṁ taṁ hasate prajñā subāhuṁ priyayānvitam etaddhi kāraṇaṁ sarvaṁ tayorhāsasya putraka

इस प्रकार प्रज्ञा, प्रिया सहित सुबाहु पर हँसती है; हे पुत्रक! उन दोनों के हास्य का यही सारा कारण है।

श्लोक 111 (padma.2.97.111)

भक्ष्यमाणस्य भूपस्य देहं स्वं दुःखिते तदा । ऊचतुर्देहिदेहीति याच्यमानः सदैव हि

bhakṣyamāṇasya bhūpasya dehaṁ svaṁ duḥkhite tadā ūcaturdehidehīti yācyamānaḥ sadaiva hi

राजा का शरीर खाया जाते समय, वे दोनों तब दुःखी होकर 'दे दो, दे दो' कहती रहीं, सदा माँगती हुई -

श्लोक 112 (padma.2.97.112)

क्षुधातृष्णामहाप्राज्ञ भीमरूपे भयानके । पयसा मिश्रितं भक्षं याचेते नृपतीश्वरम्

kṣudhātṛṣṇāmahāprājña bhīmarūpe bhayānake payasā miśritaṁ bhakṣaṁ yācete nṛpatīśvaram

हे महाबुद्धिमान! उस भयंकर, डरावने भूख-प्यास के रूप में, वे दूध मिश्रित भोजन राजा से माँगती हैं।

श्लोक 113 (padma.2.97.113)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्त्वया परिपृच्छितम् । अन्यत्किं ते प्रवक्ष्यामि तद्वदस्व महामते

etatte sarvamākhyātaṁ yattvayā paripṛcchitam anyatkiṁ te pravakṣyāmi tadvadasva mahāmate

यह सब मैंने तुम्हें बताया, जो तुमने मुझसे पूछा था। अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ? हे महामते! वह बताओ।

श्लोक 114 (padma.2.97.114)

विज्वल उवाच- वासुदेवाभिधानं तत्स्तोत्रं कथय मे पितः । येन मोक्षं व्रजेद्राजा तद्विष्णोः परमं पदम्

vijvala uvāca- vāsudevābhidhānaṁ tatstotraṁ kathaya me pitaḥ yena mokṣaṁ vrajedrājā tadviṣṇoḥ paramaṁ padam

विज्वल ने कहा - हे पिता! मुझे वह वासुदेव नामक स्तोत्र बताइए, जिससे राजा मोक्ष को, विष्णु के उस परम पद को प्राप्त करेगा।

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