Skip to main content

स्वर्ग खण्ड · अध्याय 2

आदिसर्ग और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (padma.3.2.1)

सूत उवाच । आदिसर्गमहं तावत्कथयामि द्विजोत्तमाः । ज्ञायते येन भगवान्परमात्मा सनातनः

sūta uvāca ādisargamahaṁ tāvatkathayāmi dvijottamāḥ jñāyate yena bhagavānparamātmā sanātanaḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजोत्तमो! अब मैं आदिसर्ग का वर्णन करता हूँ, जिससे सनातन भगवान परमात्मा जाने जाते हैं।

श्लोक 2 (padma.3.2.2)

सृष्टेषु प्रलयादूर्ध्वं नासीत्किंचिद्द्विजोत्तमाः । ब्रह्मसंज्ञमभूदेकं ज्योतिर्वै सर्वकारकम्

sṛṣṭeṣu pralayādūrdhvaṁ nāsītkiṁciddvijottamāḥ brahmasaṁjñamabhūdekaṁ jyotirvai sarvakārakam

हे द्विजोत्तमो! सृष्टि से पहले, प्रलय के बाद, कुछ भी नहीं था; केवल ब्रह्म नामक एक ही ज्योति थी, जो सबकी कारण है।

श्लोक 3 (padma.3.2.3)

नित्यं निरंजनं शांतं निर्मलं नित्यनिर्मलम् । आनंदसागरंस्वच्छं यत्कांक्षंति मुमुक्षवः

nityaṁ niraṁjanaṁ śāṁtaṁ nirmalaṁ nityanirmalam ānaṁdasāgaraṁsvacchaṁ yatkāṁkṣaṁti mumukṣavaḥ

वह नित्य, निर्मल, शांत, सदा निर्मल, आनंद का स्वच्छ सागर है, जिसे मुमुक्षुजन चाहते हैं।

श्लोक 4 (padma.3.2.4)

सर्वज्ञं ज्ञानरूपत्वादनंतमजमव्ययम् । अविनाशि सदास्वच्छमच्युतं व्यापकं महत्

sarvajñaṁ jñānarūpatvādanaṁtamajamavyayam avināśi sadāsvacchamacyutaṁ vyāpakaṁ mahat

ज्ञानस्वरूप होने के कारण सर्वज्ञ, अनंत, अजन्मा, अव्यय, अविनाशी, सदा स्वच्छ, अच्युत, व्यापक और महान है।

श्लोक 5 (padma.3.2.5)

सर्गकाले तु संप्राप्ते ज्ञात्वा तं ज्ञानरूपकम् । आत्मलीनं विकारं च तत्स्रष्टुमुपचक्रमे

sargakāle tu saṁprāpte jñātvā taṁ jñānarūpakam ātmalīnaṁ vikāraṁ ca tatsraṣṭumupacakrame

सृष्टि का समय आने पर, उस ज्ञानस्वरूप परमात्मा को जानकर, अपने में लीन हुई प्रकृति और उसके विकार को उसने रचना के लिए प्रवृत्त किया।

श्लोक 6 (padma.3.2.6)

तस्मात्प्रधानमुद्भूतं ततश्चापि महानभूत् । सात्विको राजसश्चैव तामसश्च त्रिधा महान्

tasmātpradhānamudbhūtaṁ tataścāpi mahānabhūt sātviko rājasaścaiva tāmasaśca tridhā mahān

उससे प्रधान (प्रकृति) उत्पन्न हुआ, और उससे महत्तत्त्व भी उत्पन्न हुआ, जो सात्त्विक, राजस और तामस — इस प्रकार तीन प्रकार का है।

श्लोक 7 (padma.3.2.7)

प्रधानेनावृतो ह्येव त्वचा बीजमिवावृतम् । वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः

pradhānenāvṛto hyeva tvacā bījamivāvṛtam vaikārikastaijasaśca bhūtādiścaiva tāmasaḥ

जैसे बीज छिलके से ढका रहता है, वैसे ही वह महत्तत्त्व प्रधान से आवृत रहता है। उससे वैकारिक, तैजस और तामस — तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ।

श्लोक 8 (padma.3.2.8)

त्रिविधोयमहंकारो महत्तत्वादजायत । यथा प्रधानेन महान्महता स तथा वृतः

trividhoyamahaṁkāro mahattatvādajāyata yathā pradhānena mahānmahatā sa tathā vṛtaḥ

यह त्रिविध अहंकार महत्तत्त्व से उत्पन्न हुआ; जैसे प्रधान से महत्तत्त्व आवृत था, वैसे ही महत्तत्त्व से वह अहंकार आवृत हुआ।

श्लोक 9 (padma.3.2.9)

भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दतन्मात्रकं ततः । ससर्ज शब्दतन्मात्रादाकाशं शब्दलक्षणम्

bhūtādistu vikurvāṇaḥ śabdatanmātrakaṁ tataḥ sasarja śabdatanmātrādākāśaṁ śabdalakṣaṇam

तामस अहंकार (भूतादि) ने विकार को प्राप्त होकर पहले शब्द-तन्मात्रा को उत्पन्न किया; उस शब्द-तन्मात्रा से शब्द-गुणयुक्त आकाश की रचना की।

श्लोक 10 (padma.3.2.10)

शब्दमात्रं तथाकाशं भूतादिः सममावृणोत् । शब्दमात्रं तथाकाशं स्पर्शमात्रं ससर्ज ह

śabdamātraṁ tathākāśaṁ bhūtādiḥ samamāvṛṇot śabdamātraṁ tathākāśaṁ sparśamātraṁ sasarja ha

आकाश सहित शब्द-तन्मात्रा को भूतादि (अहंकार) ने समान रूप से आवृत किया; फिर शब्द-तन्मात्रा और आकाश ने स्पर्श-तन्मात्रा को उत्पन्न किया।

श्लोक 11 (padma.3.2.11)

बलवानभवद्वायुस्तस्य स्पर्शो गुणो मतः । आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्

balavānabhavadvāyustasya sparśo guṇo mataḥ ākāśaṁ śabdamātraṁ tu sparśamātraṁ samāvṛṇot

उससे बलवान वायु उत्पन्न हुआ, जिसका गुण स्पर्श माना गया है; शब्द-तन्मात्रा सहित आकाश ने स्पर्श-तन्मात्रा को आवृत किया।

श्लोक 12 (padma.3.2.12)

ततो वायुविकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह । ज्योतिरुत्पद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते

tato vāyuvikurvāṇo rūpamātraṁ sasarja ha jyotirutpadyate vāyostadrūpaguṇamucyate

फिर वायु ने विकार को प्राप्त होकर रूप-तन्मात्रा को उत्पन्न किया; वायु से ज्योति (तेज) उत्पन्न होती है, जिसका गुण रूप कहा जाता है।

श्लोक 13 (padma.3.2.13)

स्पर्शमात्रस्तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत् । ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह

sparśamātrastu vai vāyū rūpamātraṁ samāvṛṇot jyotiścāpi vikurvāṇaṁ rasamātraṁ sasarja ha

स्पर्श-तन्मात्रायुक्त वायु ने रूप-तन्मात्रा को आवृत किया; ज्योति ने भी विकार को प्राप्त होकर रस-तन्मात्रा को उत्पन्न किया।

श्लोक 14 (padma.3.2.14)

संभवंति ततोंभांसि रसमात्राणि तानि तु । रसमात्राणिचांभांसि रूपमात्रं समावृणोत्

saṁbhavaṁti tatoṁbhāṁsi rasamātrāṇi tāni tu rasamātrāṇicāṁbhāṁsi rūpamātraṁ samāvṛṇot

उससे जल उत्पन्न हुआ, जो रस-तन्मात्रा से युक्त है; रस-तन्मात्रायुक्त जल ने रूप-तन्मात्रा को आवृत किया।

श्लोक 15 (padma.3.2.15)

विकुर्वाणानिचांभांसिगंधमात्रंससर्जिरे । तस्माज्जाता मही चेयं सर्वभूतगुणाधिका

vikurvāṇānicāṁbhāṁsigaṁdhamātraṁsasarjire tasmājjātā mahī ceyaṁ sarvabhūtaguṇādhikā

विकार को प्राप्त हुए जल ने गंध-तन्मात्रा को उत्पन्न किया; उससे यह पृथ्वी उत्पन्न हुई, जो समस्त भूतों के गुणों से अधिक है।

श्लोक 16 (padma.3.2.16)

ससंघातो यतस्तस्मात्तस्य गंधो गुणो मतः । तस्मिंस्तस्मिंस्तु तन्मात्रात्तेन तन्मात्रता स्मृता

sasaṁghāto yatastasmāttasya gaṁdho guṇo mataḥ tasmiṁstasmiṁstu tanmātrāttena tanmātratā smṛtā

चूँकि यह उसी (गंध-तन्मात्रा) के संघात से बनी है, इसलिए इसका गुण गंध माना गया है। जिस-जिस तन्मात्रा से जो-जो तत्त्व बनता है, उसी से उसकी तन्मात्रता कही गई है।

श्लोक 17 (padma.3.2.17)

तन्मात्राण्यविशेषाणि विशेषाः क्रमशो पराः । भूततन्मात्रसर्गोयमहंकारात्तु तामसात्

tanmātrāṇyaviśeṣāṇi viśeṣāḥ kramaśo parāḥ bhūtatanmātrasargoyamahaṁkārāttu tāmasāt

तन्मात्राएँ सामान्य (अविशेष) होती हैं, उनके विशेष रूप क्रमशः बाद में आते हैं। यह भूत और तन्मात्राओं की सृष्टि तामस अहंकार से हुई है — यह संक्षेप में कहा गया, हे तपोधन मुनिश्रेष्ठो!

श्लोक 18 (padma.3.2.18)

कीर्तितस्तु समासेन मुनिवर्यास्तपोधनाः । तैजसानींद्रियाण्याहुर्देवा वैकारिका दश

kīrtitastu samāsena munivaryāstapodhanāḥ taijasānīṁdriyāṇyāhurdevā vaikārikā daśa

विद्वान कहते हैं कि दस इन्द्रियाँ वैकारिक (सात्त्विक अहंकार से उत्पन्न) हैं, और देवता भी वैकारिक से ही उत्पन्न हैं।

श्लोक 19 (padma.3.2.19)

एकादशं मनश्चात्र कीर्तितं तत्त्वचिंतकैः । ज्ञानेंद्रियाणि पंचात्र पंचकर्मेंद्रियाणि च

ekādaśaṁ manaścātra kīrtitaṁ tattvaciṁtakaiḥ jñāneṁdriyāṇi paṁcātra paṁcakarmeṁdriyāṇi ca

तत्त्वचिन्तकों ने यहाँ ग्यारहवाँ मन भी कहा है। यहाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं।

श्लोक 20 (padma.3.2.20)

तानि वक्ष्यामि तेषां च कर्माणि कुलपावनाः । श्रवणं त्वक्चक्षुर्जिह्वा नासिका चैव पंचमी

tāni vakṣyāmi teṣāṁ ca karmāṇi kulapāvanāḥ śravaṇaṁ tvakcakṣurjihvā nāsikā caiva paṁcamī

हे कुलपावनो! अब मैं उन्हें और उनके कर्मों को कहूँगा — श्रवण (कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा और पाँचवीं नासिका —

श्लोक 21 (padma.3.2.21)

शब्दादिज्ञानसिद्ध्यर्थं बुद्धियुक्तानि पंच वै । पायूपस्थं हस्तपादौ कीर्तिता वाक्चपंचमी

śabdādijñānasiddhyarthaṁ buddhiyuktāni paṁca vai pāyūpasthaṁ hastapādau kīrtitā vākcapaṁcamī

ये पाँचों, बुद्धि से युक्त होकर, शब्द आदि के ज्ञान की सिद्धि के लिए हैं। गुदा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), हाथ, पैर, और पाँचवीं वाणी — ये कर्मेन्द्रियाँ कही गई हैं।

श्लोक 22 (padma.3.2.22)

विसर्गानंदनादानगत्युक्तिकर्मतत्स्मृतम् । आकाशवायुतेजांसि सलिलं पृथिवी तथा

visargānaṁdanādānagatyuktikarmatatsmṛtam ākāśavāyutejāṁsi salilaṁ pṛthivī tathā

उनके कर्म क्रमशः विसर्ग (मलत्याग), आनंद, गति, ग्रहण और वाणी कहे गए हैं। इसी प्रकार आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी —

श्लोक 23 (padma.3.2.23)

शब्दादिभिर्गुणैर्विप्राः संयुक्ता उत्तरोत्तरैः । नानावीर्याः पृथग्भूतास्ततस्ते संहतिं विना

śabdādibhirguṇairviprāḥ saṁyuktā uttarottaraiḥ nānāvīryāḥ pṛthagbhūtāstataste saṁhatiṁ vinā

हे विप्रो! ये शब्द आदि उत्तरोत्तर गुणों से युक्त हैं; भिन्न-भिन्न शक्तियों वाले होने से वे पहले संयोग के बिना पृथक-पृथक रहे।

श्लोक 24 (padma.3.2.24)

नाशक्नुवन्प्रजाः स्रष्टुमसमागत्य कृत्स्नशः । समेत्यान्योन्यसंयोगं परस्परमथाश्रयात्

nāśaknuvanprajāḥ sraṣṭumasamāgatya kṛtsnaśaḥ sametyānyonyasaṁyogaṁ parasparamathāśrayāt

पूर्ण रूप से एक साथ मिले बिना वे प्रजा को उत्पन्न करने में असमर्थ थे; इसलिए वे परस्पर मिलकर, एक-दूसरे के आश्रय से,

श्लोक 25 (padma.3.2.25)

एकसंघास्सलक्ष्याश्च संप्राप्यैक्यमशेषतः । पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च प्रधानानुग्रहेण च

ekasaṁghāssalakṣyāśca saṁprāpyaikyamaśeṣataḥ puruṣādhiṣṭhitatvācca pradhānānugraheṇa ca

पुरुष के अधिष्ठान और प्रधान की कृपा से एक समूह और एक लक्ष्य वाले होकर पूर्ण रूप से एकता को प्राप्त हुए।

श्लोक 26 (padma.3.2.26)

महदादयो विशेषांता अंडमुत्पादयंति ते । तत्क्रमेण विवृद्धं तु जलबुद्बुदवत्सदा

mahadādayo viśeṣāṁtā aṁḍamutpādayaṁti te tatkrameṇa vivṛddhaṁ tu jalabudbudavatsadā

महत्तत्त्व से लेकर विशेष तत्त्वों तक वे सब मिलकर अण्ड को उत्पन्न करते हैं, जो क्रमशः जल के बुलबुले के समान सदा बढ़ता रहा।

श्लोक 27 (padma.3.2.27)

भूतेभ्योंडं महाप्राज्ञा वृद्धं तदुदकेशयम् । प्राकृतं ब्रह्मरूपस्य विष्णोः स्थानमनुत्तमम्

bhūtebhyoṁḍaṁ mahāprājñā vṛddhaṁ tadudakeśayam prākṛtaṁ brahmarūpasya viṣṇoḥ sthānamanuttamam

हे महाप्राज्ञो! भूतों से बना वह अण्ड, बढ़कर, उन्हीं जलों पर स्थित हुआ — यह ब्रह्मरूप विष्णु का मूल और सर्वोत्तम धाम है।

श्लोक 28 (padma.3.2.28)

तत्राव्यक्तस्वरूपोसौ विष्णुर्विश्वेश्वरः प्रभुः । ब्रह्मरूपं समास्थाय स्वयमेव व्यवस्थितः

tatrāvyaktasvarūposau viṣṇurviśveśvaraḥ prabhuḥ brahmarūpaṁ samāsthāya svayameva vyavasthitaḥ

वहाँ अव्यक्तस्वरूप विश्वेश्वर प्रभु विष्णु, ब्रह्मा का रूप धारण कर स्वयं ही उसमें स्थित हुए।

श्लोक 29 (padma.3.2.29)

स्वेदजांडमभूत्तस्य जरायुश्च महीधराः । गर्भोदकं समुद्राश्च तस्याभून्महदात्मनः

svedajāṁḍamabhūttasya jarāyuśca mahīdharāḥ garbhodakaṁ samudrāśca tasyābhūnmahadātmanaḥ

उस महात्मा विष्णु के स्वेद (पसीने) से अण्ड की जरायु (झिल्ली) बनी, जो पर्वत बने; उसका गर्भजल समुद्र बना।

श्लोक 30 (padma.3.2.30)

साद्रिद्वीपसमुद्राश्च सज्योतिर्लोकसंग्रहः । तस्मिन्नंडेभवत्सर्वं सदेवासुरमानुषम्

sādridvīpasamudrāśca sajyotirlokasaṁgrahaḥ tasminnaṁḍebhavatsarvaṁ sadevāsuramānuṣam

पर्वतों, द्वीपों और समुद्रों सहित, ज्योतिष्मान लोकों के समूह सहित, उस अण्ड में देवता, असुर और मनुष्यों सहित सब कुछ उत्पन्न हुआ।

श्लोक 31 (padma.3.2.31)

अनादिनिधनस्यैव विष्णोर्नाभेः समुत्थितम् । यत्पद्मं तद्धैममंडमभूच्छ्रीकेशवेच्छया

anādinidhanasyaiva viṣṇornābheḥ samutthitam yatpadmaṁ taddhaimamaṁḍamabhūcchrīkeśavecchayā

आदि और अंत रहित उन्हीं विष्णु की नाभि से जो कमल उत्पन्न हुआ, वही स्वर्णिम अण्ड श्रीकेशव की इच्छा से बना।

श्लोक 32 (padma.3.2.32)

रजोगुणधरो देवः स्वयमेव हरिः परः । ब्रह्मरूपंसमास्थाय जगत्स्रष्टुं प्रवर्तते

rajoguṇadharo devaḥ svayameva hariḥ paraḥ brahmarūpaṁsamāsthāya jagatsraṣṭuṁ pravartate

रजोगुण को धारण करने वाले वे स्वयं परम देव हरि, ब्रह्मा का रूप धारण कर जगत की रचना में प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 33 (padma.3.2.33)

सृष्टं च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना । नारसिंहादिरूपेण रुद्ररुपेण संहरेत्

sṛṣṭaṁ ca pātyanuyugaṁ yāvatkalpavikalpanā nārasiṁhādirūpeṇa rudrarupeṇa saṁharet

और रचकर, वे प्रत्येक युग में उसका पालन करते हैं, जब तक कल्प की गणना रहती है; फिर नृसिंह आदि रूपों से, अथवा रुद्र के रूप से, वे उसका संहार करते हैं।

श्लोक 34 (padma.3.2.34)

सब्रह्मरूपं विसृजन्महात्मा जगत्समस्तं परिपातुमिच्छन् । रामादिरूपं स तु गृह्य याति बभूव रुद्रो जगदेतदत्तुम्

sabrahmarūpaṁ visṛjanmahātmā jagatsamastaṁ paripātumicchan rāmādirūpaṁ sa tu gṛhya yāti babhūva rudro jagadetadattum

वह महात्मा ब्रह्मरूप को त्यागकर, समस्त जगत का पूर्ण रक्षण करने की इच्छा से, राम आदि रूप धारण करते हैं; और अंत में इस जगत को ग्रसने के लिए वे ही रुद्र होकर जाते हैं।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3