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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 27

मंकणक का नृत्य, पृथूदक और कुरुक्षेत्र की महिमा

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (padma.3.27.1)

नारद उवाच । ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् । कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत्

nārada uvāca tato gaccheta dharmajña kanyātīrthamanuttamam kanyātīrthe naraḥ snātvā agniṣṭomaphalaṁ labhet

नारद जी ने कहा — फिर, हे धर्मज्ञ! अनुपम कन्या-तीर्थ को जाए; कन्या-तीर्थ में स्नान करके मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है।

श्लोक 2 (padma.3.27.2)

ततो गच्छेन्नरव्याघ्र ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः

tato gacchennaravyāghra brahmaṇaḥ sthānamuttamam tatra varṇāvaraḥ snātvā brāhmaṇyaṁ labhate naraḥ

फिर, हे नरव्याघ्र! ब्रह्मा के श्रेष्ठ स्थान को जाए; वहाँ नीच वर्ण वाला भी स्नान करके ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (padma.3.27.3)

ब्राह्मणस्तु विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । ततो गच्छेन्नरव्याघ्र सोमतीर्थमनुत्तमम्

brāhmaṇastu viśuddhātmā gaccheta paramāṁ gatim tato gacchennaravyāghra somatīrthamanuttamam

शुद्धात्मा ब्राह्मण परम गति को प्राप्त करता है। फिर, हे नरव्याघ्र! अनुपम सोमतीर्थ को जाए;

श्लोक 4 (padma.3.27.4)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्सोमलोकमवाप्नुयात् । सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप

tatra snātvā naro rājansomalokamavāpnuyāt saptasārasvataṁ tīrthaṁ tato gacchennarādhipa

वहाँ स्नान करके, हे राजन! मनुष्य सोमलोक को प्राप्त करता है। फिर, हे नराधिप! सप्तसारस्वत-तीर्थ को जाए,

श्लोक 5 (padma.3.27.5)

यत्र मंकणकः सिद्धो ब्रह्मर्षिर्लोकविश्रुतः । पुरा मंकणको राजन्कुशाग्रेणेति विश्रुतम्

yatra maṁkaṇakaḥ siddho brahmarṣirlokaviśrutaḥ purā maṁkaṇako rājankuśāgreṇeti viśrutam

जहाँ लोकविख्यात सिद्ध ब्रह्मर्षि मंकणक ने [तप किया]। हे राजन! पूर्वकाल में मंकणक कुशा की नोक से,

श्लोक 6 (padma.3.27.6)

क्षतः किल करे राजन्तस्य शाकरसोऽस्रवत् । स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टो महातपाः

kṣataḥ kila kare rājantasya śākaraso'sravat sa vai śākarasaṁ dṛṣṭvā harṣāviṣṭo mahātapāḥ

हे राजन! हाथ में कट गए, ऐसा विख्यात है, और उससे शाक (वनस्पति) का रस बहा। उस शाक-रस को देखकर, हर्ष से भरे महातपस्वी वे,

श्लोक 7 (padma.3.27.7)

ननर्त किल विप्रर्षिर्विस्मयोत्फुल्ललोचनः । ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते वै स्थावरं जंगमं च यत्

nanarta kila viprarṣirvismayotphullalocanaḥ tatastasminpranṛtte vai sthāvaraṁ jaṁgamaṁ ca yat

विस्मय से खिले नेत्रों वाले वे विप्रर्षि नाचने लगे, ऐसा कहा जाता है। तब उनके नाचने पर, जो कुछ स्थावर और जंगम था,

श्लोक 8 (padma.3.27.8)

प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् । ब्रह्मादिभिस्ततो देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः

pranṛttamubhayaṁ vīra tejasā tasya mohitam brahmādibhistato devairṛṣibhiśca tapodhanaiḥ

हे वीर! वह सब उसके तेज से मोहित होकर नाचने लगा। तब ब्रह्मा आदि देवताओं और तपोधन ऋषियों द्वारा,

श्लोक 9 (padma.3.27.9)

विज्ञप्तो वै ऋषेरर्थे महादेवो नराधिप । नायं नृत्येद्यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि

vijñapto vai ṛṣerarthe mahādevo narādhipa nāyaṁ nṛtyedyathā deva tathā tvaṁ kartumarhasi

हे नराधिप! ऋषि के हित के लिए महादेव से निवेदन किया गया — 'यह जिस प्रकार नाच रहा है, वह जगत उस प्रकार न नाचे — यह आप कीजिए, हे देव।'

श्लोक 10 (padma.3.27.10)

ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टेन चेतसा । नृत्यंतमब्रवीच्चैनं स्थिराणां हितकाम्यया

tato devo muniṁ dṛṣṭvā harṣāviṣṭena cetasā nṛtyaṁtamabravīccainaṁ sthirāṇāṁ hitakāmyayā

तब देव ने मुनि को नाचता देखकर, हर्ष से भरे मन से, स्थिर वस्तुओं के हित की कामना से उससे कहा —

श्लोक 11 (padma.3.27.11)

अहो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् । हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुंगव

aho maharṣe dharmajña kimarthaṁ nṛtyate bhavān harṣasthānaṁ kimarthaṁ vā tavādya munipuṁgava

'हे महर्षि, हे धर्मज्ञ! आप किसलिए नाच रहे हैं? हे मुनिश्रेष्ठ! आज आपके हर्ष का कारण क्या है?'

श्लोक 12 (padma.3.27.12)

ऋषिरुवाच । तपस्विनो धर्म्मपथस्थितस्य द्विजसत्तम । किं न पश्यसि मे ब्रह्मन्क्षताच्छाकरसं सृतम्

ṛṣiruvāca tapasvino dharmmapathasthitasya dvijasattama kiṁ na paśyasi me brahmankṣatācchākarasaṁ sṛtam

ऋषि ने कहा — हे द्विजसत्तम! धर्मपथ पर स्थित तपस्वी की — हे ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे घाव से शाक-रस बहा है?

श्लोक 13 (padma.3.27.13)

यं दृष्ट्वा संप्रनृत्तोऽहं हर्षेण महता वृतः । तं प्रहस्याब्रवीद्देव ऋषिं रागेण मोहितम्

yaṁ dṛṣṭvā saṁpranṛtto'haṁ harṣeṇa mahatā vṛtaḥ taṁ prahasyābravīddeva ṛṣiṁ rāgeṇa mohitam

'उसे देखकर मैं महान हर्ष से भरकर नाच उठा।' उस राग से मोहित ऋषि से हँसते हुए देव ने कहा —

श्लोक 14 (padma.3.27.14)

अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीह पश्य माम् । एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन वै तदा

ahaṁ tu vismayaṁ vipra na gacchāmīha paśya mām evamuktvā naraśreṣṭha mahādevena vai tadā

'मुझे तो, हे विप्र, कोई विस्मय नहीं होता — मुझे देखो!' हे नरश्रेष्ठ! इस प्रकार कहकर महादेव ने तब,

श्लोक 15 (padma.3.27.15)

अंगुल्यग्रेण राजेंद्र स्वांगुष्ठस्ताडितोऽनघ । तस्य भस्मक्षताद्राजन्निःसृतं हिमसंनिभम्

aṁgulyagreṇa rājeṁdra svāṁguṣṭhastāḍito'nagha tasya bhasmakṣatādrājanniḥsṛtaṁ himasaṁnibham

हे राजेंद्र, हे निष्पाप! अपने अंगूठे को उँगली की नोक से मारा; उस घाव से, हे राजन! हिम के समान श्वेत [भस्म] निकली।

श्लोक 16 (padma.3.27.16)

यं दृष्ट्वा व्रीडितो राजन्स मुनिः पादयोर्गतः । नान्यं देवादहं मन्ये रुद्रात्परतरं महत्

yaṁ dṛṣṭvā vrīḍito rājansa muniḥ pādayorgataḥ nānyaṁ devādahaṁ manye rudrātparataraṁ mahat

उसे देखकर, हे राजन! वे मुनि लज्जित होकर उनके चरणों में गिर पड़े — 'मैं रुद्र से बढ़कर कोई अन्य महान देव नहीं मानता।'

श्लोक 17 (padma.3.27.17)

सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् । त्वया सृष्टमिदं विश्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्

surāsurasya jagato gatistvamasi śūladhṛk tvayā sṛṣṭamidaṁ viśvaṁ trailokyaṁ sacarācaram

'हे शूलधारी! आप देव-दानव सहित संसार के आश्रय हैं; आपने ही चराचर सहित इस त्रिलोक-विश्व को रचा है।'

श्लोक 18 (padma.3.27.18)

त्वामेव भगवन्सर्वे प्रविशंति युगक्षये । देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया

tvāmeva bhagavansarve praviśaṁti yugakṣaye devairapi na śakyastvaṁ parijñātuṁ kuto mayā

'हे भगवन! युग के अंत में सभी आप में ही प्रवेश करते हैं। देवताओं द्वारा भी आपको पूर्णतः जानना संभव नहीं — तो मेरे द्वारा कैसे?'

श्लोक 19 (padma.3.27.19)

त्वयि सर्वेश दृश्यंते सुराः शक्रादयोऽनघ । सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयितान्वहम्

tvayi sarveśa dṛśyaṁte surāḥ śakrādayo'nagha sarvastvamasi lokānāṁ kartā kārayitānvaham

'हे सर्वेश्वर, हे निष्पाप! आप में ही इंद्र आदि देवगण दिखाई देते हैं; आप ही समस्त लोकों के कर्ता और सदा कारयिता हैं।'

श्लोक 20 (padma.3.27.20)

त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे मोदंतीहाकुतोभयाः । एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽब्रवीत्

tvatprasādātsurāḥ sarve modaṁtīhākutobhayāḥ evaṁ stutvā mahādevaṁ sa ṛṣiḥ praṇato'bravīt

'आपकी ही कृपा से समस्त देवगण यहाँ निर्भय होकर आनंद मनाते हैं।' इस प्रकार महादेव की स्तुति करके उस ऋषि ने प्रणाम करते हुए कहा —

श्लोक 21 (padma.3.27.21)

त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै । ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत्

tvatprasādānmahādeva tapo me na kṣareta vai tato devaḥ prahṛṣṭātmā brahmarṣimidamabravīt

'आपकी कृपा से, हे महादेव! मेरा तप कभी क्षीण न हो।' तब प्रसन्नचित्त देव ने उस ब्रह्मर्षि से यह कहा —

श्लोक 22 (padma.3.27.22)

तपस्ते वर्द्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रधा । आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्द्धं महामुने

tapaste varddhatāṁ vipra matprasādātsahasradhā āśrame ceha vatsyāmi tvayā sārddhaṁ mahāmune

'हे विप्र! मेरी कृपा से तुम्हारा तप हजार गुना बढ़े। हे महामुने! मैं इस आश्रम में तुम्हारे साथ ही निवास करूँगा।'

श्लोक 23 (padma.3.27.23)

सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चयिष्यंति ये तु माम् । न तेषां दुर्लभं किंचिदिह लोके परत्र वा

saptasārasvate snātvā arcayiṣyaṁti ye tu mām na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcidiha loke paratra vā

'सप्तसारस्वत में स्नान करके जो मेरी पूजा करेंगे, उनके लिए इस लोक में या परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा।'

श्लोक 24 (padma.3.27.24)

गच्छेत्सारस्वतं चापि लोकं नास्त्यत्र संशयः । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवांतरधीयत

gacchetsārasvataṁ cāpi lokaṁ nāstyatra saṁśayaḥ evamuktvā mahādevastatraivāṁtaradhīyata

'सारस्वत लोक को भी प्राप्त होगा, इसमें संशय नहीं।' यह कहकर महादेव वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 25 (padma.3.27.25)

ततस्त्वौशनसं गच्छेत्त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः

tatastvauśanasaṁ gacchettriṣu lokeṣu viśrutam yatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ

फिर तीनों लोकों में विख्यात औशनस को जाए, जहाँ ब्रह्मा आदि देवगण और तपोधन ऋषि,

श्लोक 26 (padma.3.27.26)

कार्तिकेयश्च भगवांस्त्रिसंध्यां किल भारत । सान्निध्यमकरोत्तत्र भार्गवप्रियकाम्यया

kārtikeyaśca bhagavāṁstrisaṁdhyāṁ kila bhārata sānnidhyamakarottatra bhārgavapriyakāmyayā

हे भारत! और भगवान कार्तिकेय ने भी भार्गव (शुक्राचार्य) को प्रसन्न करने की इच्छा से तीनों संध्याओं में वहाँ सान्निध्य किया।

श्लोक 27 (padma.3.27.27)

कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रणाशनम् । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते

kapālamocanaṁ tīrthaṁ sarvapāpapraṇāśanam tatra snātvā naravyāghra sarvapāpaiḥ pramucyate

कपालमोचन तीर्थ समस्त पापों का नाश करने वाला है; वहाँ स्नान करके, हे नरव्याघ्र! मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 28 (padma.3.27.28)

अग्नितीर्थं ततो गच्छेत्स्नात्वा च भरतर्षभ । अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्

agnitīrthaṁ tato gacchetsnātvā ca bharatarṣabha agnilokamavāpnoti kulaṁ caiva samuddharet

फिर अग्नितीर्थ को जाकर स्नान करे, हे भरतर्षभ; मनुष्य अग्निलोक को प्राप्त करता है और अपने कुल का उद्धार करता है।

श्लोक 29 (padma.3.27.29)

विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा महाराज ब्राह्मण्यमभिजायते

viśvāmitrasya tatraiva tīrthaṁ bharatasattama tatra snātvā mahārāja brāhmaṇyamabhijāyate

हे भरतसत्तम! वहीं विश्वामित्र का तीर्थ है; वहाँ स्नान करके, हे महाराज! मनुष्य ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 30 (padma.3.27.30)

ब्रह्मयोनिं समासाद्य शुचिः प्रयतमानसः । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र ब्रह्मलोकं प्रपद्यते

brahmayoniṁ samāsādya śuciḥ prayatamānasaḥ tatra snātvā naravyāghra brahmalokaṁ prapadyate

ब्रह्मयोनि को पाकर, पवित्र और संयत मन से, वहाँ स्नान करके, हे नरव्याघ्र! मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है,

श्लोक 31 (padma.3.27.31)

पुनात्या सप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशयः । ततो गच्छेत राजेंद्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्

punātyā saptamaṁ caiva kulaṁ nāstyatra saṁśayaḥ tato gaccheta rājeṁdra tīrthaṁ trailokyaviśrutam

और सातवीं पीढ़ी तक अपने कुल को पवित्र करता है, इसमें संशय नहीं। फिर, हे राजेंद्र! तीनों लोकों में विख्यात तीर्थ को जाए,

श्लोक 32 (padma.3.27.32)

पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य व्नृप । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः

pṛthūdakamiti khyātaṁ kārtikeyasya vnṛpa tatrābhiṣekaṁ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ

हे राजन! कार्तिकेय का पृथूदक नाम से विख्यात तीर्थ; वहाँ पितृ-देव पूजा में रत होकर स्नान करना चाहिए।

श्लोक 33 (padma.3.27.33)

अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा । यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना

ajñānājjñānato vāpi striyā vā puruṣeṇa vā yatkiṁcidaśubhaṁ karma kṛtaṁ mānuṣabuddhinā

अज्ञान से या ज्ञान से, स्त्री द्वारा या पुरुष द्वारा, मानवी बुद्धि से जो भी अशुभ कर्म किया गया हो,

श्लोक 34 (padma.3.27.34)

तत्सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत । अश्वमेधफलं चापि लभते स्वर्गमेव च

tatsarvaṁ naśyate tatra snātamātrasya bhārata aśvamedhaphalaṁ cāpi labhate svargameva ca

हे भारत! वह सब वहाँ स्नान मात्र से नष्ट हो जाता है; वह अश्वमेध का फल भी पाता है और स्वर्ग भी।

श्लोक 35 (padma.3.27.35)

पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वतीम् । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम्

puṇyamāhuḥ kurukṣetraṁ kurukṣetrātsarasvatīm sarasvatyāśca tīrthāni tīrthebhyaśca pṛthūdakam

कुरुक्षेत्र को पुण्यमय कहते हैं, कुरुक्षेत्र से सरस्वती को, सरस्वती से तीर्थों को, और तीर्थों में पृथूदक को [श्रेष्ठ कहते हैं]।

श्लोक 36 (padma.3.27.36)

उत्तमे सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् । पृथूदके जप्यपरो नैव संसरणं लभेत्

uttame sarvatīrthānāṁ yastyajedātmanastanum pṛthūdake japyaparo naiva saṁsaraṇaṁ labhet

जो समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम पृथूदक में जप में तत्पर होकर अपना शरीर त्यागता है, उसे फिर संसार-चक्र में नहीं भटकना पड़ता।

श्लोक 37 (padma.3.27.37)

गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना । वेदे च नियतं राजन्नभिगच्छेत्पृथूदकम्

gītaṁ sanatkumāreṇa vyāsena ca mahātmanā vede ca niyataṁ rājannabhigacchetpṛthūdakam

सनत्कुमार और महात्मा व्यास द्वारा गाया गया, हे राजन, और वेद में भी स्थापित — पृथूदक की ओर जाना चाहिए।

श्लोक 38 (padma.3.27.38)

पृथूदकात्पुण्यतमं नान्यत्तीर्थं नरोत्तम । एतन्मेध्यं पवित्रं च पावनं च न संशयः

pṛthūdakātpuṇyatamaṁ nānyattīrthaṁ narottama etanmedhyaṁ pavitraṁ ca pāvanaṁ ca na saṁśayaḥ

हे नरोत्तम! पृथूदक से बढ़कर कोई अन्य तीर्थ नहीं है; यह पवित्र, शुद्ध करने वाला और पावन है, संशय नहीं।

श्लोक 39 (padma.3.27.39)

तत्र स्नात्वा दिवं यांति अपि पापकृतो जनाः । पृथूदके नरश्रेष्ठमाहुरेवं मनीषिणः

tatra snātvā divaṁ yāṁti api pāpakṛto janāḥ pṛthūdake naraśreṣṭhamāhurevaṁ manīṣiṇaḥ

वहाँ स्नान करके पापकर्मी लोग भी स्वर्ग को जाते हैं। हे नरश्रेष्ठ! विद्वान लोग पृथूदक के विषय में ऐसा ही कहते हैं।

श्लोक 40 (padma.3.27.40)

मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत्

madhusravaṁ ca tatraiva tīrthaṁ bharatasattama tatra snātvā naro rājangosahasraphalaṁ labhet

हे भरतसत्तम! वहीं मधुस्रव नामक तीर्थ है; वहाँ स्नान करके, हे राजन! मनुष्य सहस्र गौओं का फल पाता है।

श्लोक 41 (padma.3.27.41)

ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ तीर्थं देव्या यथाक्रमम् । सरस्वत्यारुणायाश्च संगमं लोकविश्रुतम्

tato gacchennaraśreṣṭha tīrthaṁ devyā yathākramam sarasvatyāruṇāyāśca saṁgamaṁ lokaviśrutam

फिर, हे नरश्रेष्ठ! क्रमानुसार देवी के तीर्थ को जाए — सरस्वती और अरुणा के लोकविख्यात संगम को।

श्लोक 42 (padma.3.27.42)

त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं चैव समश्नुते

trirātropoṣitaḥ snātvā mucyate brahmahatyayā agniṣṭomātirātrābhyāṁ phalaṁ caiva samaśnute

तीन रात्रि उपवास करके स्नान करने से मनुष्य ब्रह्महत्या से मुक्त होता है और अग्निष्टोम-अतिरात्र का फल भी पाता है।

श्लोक 43 (padma.3.27.43)

पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशयः । अवकीर्णं च तत्रैव तीर्थं कुरुकुलोद्वह

punātyāsaptamaṁ caiva kulaṁ nāstyatra saṁśayaḥ avakīrṇaṁ ca tatraiva tīrthaṁ kurukulodvaha

सातवीं पीढ़ी तक अपने कुल को भी पवित्र करता है, इसमें संशय नहीं। हे कुरुकुलोद्वह! वहीं अवकीर्ण नामक तीर्थ है,

श्लोक 44 (padma.3.27.44)

विप्राणामनुकंपार्थं दर्भिणा निर्मितं पुरा । व्रतोपनयनाभ्यां चाप्युपवासेन वा द्विजः

viprāṇāmanukaṁpārthaṁ darbhiṇā nirmitaṁ purā vratopanayanābhyāṁ cāpyupavāsena vā dvijaḥ

जो पूर्वकाल में ब्राह्मणों पर दया करने के लिए कुश से निर्मित किया गया था। व्रत और उपनयन से, अथवा उपवास से भी, कोई द्विज,

श्लोक 45 (padma.3.27.45)

क्रियामंत्रैश्च संयुक्तो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्रियामंत्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ

kriyāmaṁtraiśca saṁyukto brāhmaṇaḥ syānna saṁśayaḥ kriyāmaṁtravihīno'pi tatra snātvā nararṣabha

क्रिया और मंत्रों से युक्त होकर निश्चय ही ब्राह्मण बनता है। हे नरर्षभ! क्रिया-मंत्र से रहित होकर भी वहाँ स्नान करके,

श्लोक 46 (padma.3.27.46)

चीर्णव्रतो भवेद्विप्रो दृष्टमेतत्पुरातनम् । समुद्राश्चापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा

cīrṇavrato bhavedvipro dṛṣṭametatpurātanam samudrāścāpi catvāraḥ samānītāśca darbhiṇā

वह विप्र व्रतधारी हो जाता है — यह प्राचीन तथ्य देखा गया है। और चारों समुद्र भी वहाँ कुश द्वारा लाए गए थे।

श्लोक 47 (padma.3.27.47)

तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् । फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विंदते च सः

tatra snātvā naravyāghra na durgatimavāpnuyāt phalāni gosahasrāṇāṁ caturṇāṁ viṁdate ca saḥ

वहाँ स्नान करके, हे नरव्याघ्र! मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता; और वह चारों सहस्र गौओं का फल भी पाता है।

श्लोक 48 (padma.3.27.48)

ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं शतसहस्रकम् । साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते

tato gaccheta rājendra tīrthaṁ śatasahasrakam sāhasrakaṁ ca tatraiva dve tīrthe lokaviśrute

फिर, हे राजेंद्र! शतसहस्रक तीर्थ को जाए; और वहीं साहस्रक — दोनों लोकविख्यात तीर्थ हैं।

श्लोक 49 (padma.3.27.49)

उभयोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । दानं वाप्युपवासो वा सहस्रगुणितो भवेत्

ubhayorhi naraḥ snātvā gosahasraphalaṁ labhet dānaṁ vāpyupavāso vā sahasraguṇito bhavet

दोनों में स्नान करके मनुष्य सहस्र गौओं का फल पाता है; और दान या उपवास भी सहस्र गुना हो जाता है।

श्लोक 50 (padma.3.27.50)

ततो गच्छेत राजेंद्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः

tato gaccheta rājeṁdra reṇukātīrthamuttamam tatrābhiṣekaṁ kurvīta pitṛdevārcane rataḥ

फिर, हे राजेंद्र! श्रेष्ठ रेणुका-तीर्थ को जाए; वहाँ पितृ-देव पूजा में रत होकर स्नान करना चाहिए।

श्लोक 51 (padma.3.27.51)

सर्वपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् । विमोचन उपस्पृश्य जितमन्युर्जितेंद्रियः

sarvapāpaviśuddhātmā agniṣṭomaphalaṁ labhet vimocana upaspṛśya jitamanyurjiteṁdriyaḥ

समस्त पापों से शुद्ध आत्मा होकर वह अग्निष्टोम का फल पाता है। विमोचन का स्पर्श करके, क्रोध और इंद्रियों पर विजय पाकर,

श्लोक 52 (padma.3.27.52)

प्रतिग्रहकृतैः पापैः सर्वैः संपरिमुच्यते । ततः पंचवटं गत्वा ब्रह्मचारी जितेंद्रियः

pratigrahakṛtaiḥ pāpaiḥ sarvaiḥ saṁparimucyate tataḥ paṁcavaṭaṁ gatvā brahmacārī jiteṁdriyaḥ

अनुचित प्रतिग्रह (दान ग्रहण) से किए गए समस्त पापों से वह पूर्ण मुक्त हो जाता है। फिर पंचवट जाकर, जितेंद्रिय ब्रह्मचारी,

श्लोक 53 (padma.3.27.53)

पुण्येन महता युक्तः स्वर्गलोके महीयते । यत्र योगीश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः

puṇyena mahatā yuktaḥ svargaloke mahīyate yatra yogīśvaraḥ sthāṇuḥ svayameva vṛṣadhvajaḥ

महान पुण्य से युक्त होकर स्वर्गलोक में सम्मानित होता है — जहाँ स्वयं योगेश्वर स्थाणु, वृषभध्वज विराजते हैं।

श्लोक 54 (padma.3.27.54)

तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति । तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यते स्वेन तेजसा

tamarcayitvā deveśaṁ gamanādeva sidhyati taijasaṁ vāruṇaṁ tīrthaṁ dīpyate svena tejasā

उन देवेश्वर की पूजा करके, जाने मात्र से ही सिद्धि प्राप्त होती है। तैजस-वारुण तीर्थ अपने ही तेज से चमकता है,

श्लोक 55 (padma.3.27.55)

यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः । सैनापत्ये च देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा

yatra brahmādibhirdevairṛṣibhiśca tapodhanaiḥ saināpatye ca devānāmabhiṣikto guhastadā

जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं और तपोधन ऋषियों द्वारा, गुह (स्कंद) को देवताओं के सेनापति पद पर अभिषिक्त किया गया था।

श्लोक 56 (padma.3.27.56)

तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह । कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेंद्रियः

taijasasya tu pūrveṇa kurutīrthaṁ kurūdvaha kurutīrthe naraḥ snātvā brahmacārī jiteṁdriyaḥ

हे कुरुवंशी! तैजस के पूर्व में कुरु-तीर्थ है; कुरु-तीर्थ में स्नान करके जितेंद्रिय ब्रह्मचारी,

श्लोक 57 (padma.3.27.57)

सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं प्रपद्यते । स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः

sarvapāpaviśuddhātmā rudralokaṁ prapadyate svargadvāraṁ tato gacchenniyato niyatāśanaḥ

समस्त पापों से शुद्ध आत्मा होकर रुद्रलोक को प्राप्त करता है। फिर संयमित और नियंत्रित आहार से स्वर्गद्वार को जाए;

श्लोक 58 (padma.3.27.58)

अग्निष्टोममवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति । ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप

agniṣṭomamavāpnoti brahmalokaṁ ca gacchati tato gacchedanarakaṁ tīrthasevī narādhipa

मनुष्य अग्निष्टोम का फल पाता है और ब्रह्मलोक को जाता है। फिर, हे नराधिप! तीर्थसेवी होकर अनरक को जाए,

श्लोक 59 (padma.3.27.59)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुयात् । तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैस्सह महीयते

tatra snātvā naro rājanna durgatimavāpnuyāt tatra brahmā svayaṁ nityaṁ devaissaha mahīyate

वहाँ स्नान करके, हे राजन! मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। वहाँ ब्रह्मा स्वयं सदा देवताओं सहित सम्मानित होते हैं,

श्लोक 60 (padma.3.27.60)

अध्यास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपरागमैः । सान्निध्यं चैव राजेंद्र रुद्रवेद्यां कुरुद्वह

adhyāste puruṣavyāghra nārāyaṇaparāgamaiḥ sānnidhyaṁ caiva rājeṁdra rudravedyāṁ kurudvaha

हे पुरुषव्याघ्र! नारायण के अनुयायियों द्वारा उपासित। हे राजेंद्र, हे कुरुवंशी! और वहाँ रुद्र-वेदी में देवी का सान्निध्य है;

श्लोक 61 (padma.3.27.61)

अभिगम्य तु तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् । तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम्

abhigamya tu tāṁ devīṁ na durgatimavāpnuyāt tatraiva ca mahārāja viśveśvaramumāpatim

उस देवी के पास जाकर मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। और वहीं, हे महाराज! विश्वेश्वर उमापति के पास जाकर,

श्लोक 62 (padma.3.27.62)

अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । नारायणं चाभिगम्य पद्मनाभमरिंदम

abhigamya mahādevaṁ mucyate sarvakilbiṣaiḥ nārāyaṇaṁ cābhigamya padmanābhamariṁdama

महादेव की पूजा करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। और नारायण, कमलनाभ के पास जाकर, हे शत्रुदमन,

श्लोक 63 (padma.3.27.63)

शोभमानो महाराज विष्णुलोकं प्रपद्यते । तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातमात्रो नराधिप

śobhamāno mahārāja viṣṇulokaṁ prapadyate tīrtheṣu sarvadevānāṁ snātamātro narādhipa

हे महाराज! शोभायमान होकर मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त करता है। समस्त देवताओं के तीर्थों में स्नान मात्र से, हे नराधिप,

श्लोक 64 (padma.3.27.64)

सर्वदुःखपरित्यक्तो द्योतते शिववत्सदा । ततस्त्वस्थिपुरं गच्छेत्तीर्थसेवी नराधिप

sarvaduḥkhaparityakto dyotate śivavatsadā tatastvasthipuraṁ gacchettīrthasevī narādhipa

समस्त दुःखों से मुक्त होकर वह सदा शिव के समान चमकता है। फिर, हे नराधिप! तीर्थसेवी होकर अस्थिपुर को जाए,

श्लोक 65 (padma.3.27.65)

पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत्पितृदेवताः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमाप्नोति भारत

pāvanaṁ tīrthamāsādya tarpayetpitṛdevatāḥ agniṣṭomasya yajñasya phalamāpnoti bhārata

वहाँ पावन तीर्थ को पाकर पितर-देवताओं का तर्पण करे; हे भारत! उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।

श्लोक 66 (padma.3.27.66)

गंगाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ । तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन्कूपे महीयते

gaṁgāhradaśca tatraiva kūpaśca bharatarṣabha tisraḥ koṭyastu tīrthānāṁ tasminkūpe mahīyate

हे भरतर्षभ! वहीं गंगा-सरोवर और एक कुआँ भी है; उस कुएँ में तीन करोड़ तीर्थों का सम्मान होता है।

श्लोक 67 (padma.3.27.67)

तत्र स्नात्वा नरो राजन्ब्रह्मलोके प्रपद्यते । आपगायां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम्

tatra snātvā naro rājanbrahmaloke prapadyate āpagāyāṁ naraḥ snātvā arcayitvā maheśvaram

वहाँ स्नान करके, हे राजन! मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। आपगा में स्नान करके और महेश्वर की पूजा करके,

श्लोक 68 (padma.3.27.68)

गतिं परामवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । ततः स्थाणुवटं गछेत्त्रिषुलोकेषु विश्रुतम्

gatiṁ parāmavāpnoti kulaṁ caiva samuddharet tataḥ sthāṇuvaṭaṁ gachettriṣulokeṣu viśrutam

मनुष्य परम गति को प्राप्त करता है और अपने कुल का उद्धार करता है। फिर तीनों लोकों में विख्यात स्थाणुवट को जाए;

श्लोक 69 (padma.3.27.69)

तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात् । बदरीणां वनं गच्छेद्वसिष्ठस्याश्रमं ततः

tatra snātvā sthito rātriṁ rudralokamavāpnuyāt badarīṇāṁ vanaṁ gacchedvasiṣṭhasyāśramaṁ tataḥ

वहाँ स्नान करके रात्रि निवास करने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है। फिर बदरी के वन को जाए, फिर वसिष्ठ के आश्रम को,

श्लोक 70 (padma.3.27.70)

बदरी भक्ष्यते यत्र त्रिरात्रोपोषितो नरः । सम्यग्द्वादशवर्षाणि बदरीं भक्षयेत्तु यः

badarī bhakṣyate yatra trirātropoṣito naraḥ samyagdvādaśavarṣāṇi badarīṁ bhakṣayettu yaḥ

जहाँ बदरी फल खाया जाता है; तीन रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य, जो पूरे बारह वर्ष तक बदरी फल खाता है,

श्लोक 71 (padma.3.27.71)

त्रिरात्रोपोषितश्चैव भवेत्तुल्यो नराधिप । इंद्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप

trirātropoṣitaścaiva bhavettulyo narādhipa iṁdramārgaṁ samāsādya tīrthasevī narādhipa

उतना ही फल पाता है जितना तीन रात्रि के उपवास से मिलता है, हे नराधिप। हे नराधिप! तीर्थसेवी होकर इंद्रमार्ग को पाकर,

श्लोक 72 (padma.3.27.72)

अहोरात्रोपवासेन स्वर्गलोके महीयते । एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः

ahorātropavāsena svargaloke mahīyate ekarātraṁ samāsādya ekarātroṣito naraḥ

एक दिन-रात के उपवास से स्वर्गलोक में सम्मानित होता है। एक रात्रि के लिए वहाँ पहुँचकर, एक रात्रि उपवास करने वाला मनुष्य,

श्लोक 73 (padma.3.27.73)

नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते । तथा गछेच्च राजेंद्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्

niyataḥ satyavādī ca brahmaloke mahīyate tathā gachecca rājeṁdra tīrthaṁ trailokyaviśrutam

संयमित और सत्यवादी होकर ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है। और, हे राजेंद्र! इसी प्रकार तीनों लोकों में विख्यात तीर्थ को जाए,

श्लोक 74 (padma.3.27.74)

आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोराशेर्महात्मनः । तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम्

ādityasyāśramo yatra tejorāśermahātmanaḥ tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā pūjayitvā vibhāvasum

जहाँ तेज की राशि, महात्मा आदित्य का आश्रम है; उस तीर्थ में स्नान करके विभावसु (सूर्य) की पूजा करके,

श्लोक 75 (padma.3.27.75)

आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् । सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी कुरूद्वह

ādityalokaṁ vrajati kulaṁ caiva samuddharet somatīrthe naraḥ snātvā tīrthasevī kurūdvaha

मनुष्य आदित्यलोक को जाता है और अपने कुल का उद्धार करता है। हे कुरुवंशी! तीर्थसेवी होकर सोमतीर्थ में स्नान करके,

श्लोक 76 (padma.3.27.76)

सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य नराधिप

somalokamavāpnoti naro nāstyatra saṁśayaḥ tato gaccheta dharmajña dadhīcasya narādhipa

मनुष्य सोमलोक को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं। फिर, हे धर्मज्ञ, हे नराधिप! दधीच के,

श्लोक 77 (padma.3.27.77)

तीर्थं पुण्यतमं राजन्पावनं लोकविश्रुतम् । यत्र सारस्वतो यातः सिद्धिं स तपसोनिधिः

tīrthaṁ puṇyatamaṁ rājanpāvanaṁ lokaviśrutam yatra sārasvato yātaḥ siddhiṁ sa tapasonidhiḥ

हे राजन! अत्यंत पुण्यमय, पावन और लोकविख्यात तीर्थ को जाए, जहाँ तप की वह निधि साधु सारस्वत लोक को सिद्धि प्राप्त हुए।

श्लोक 78 (padma.3.27.78)

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् । सारस्वतीं मतिं चैव लभते नात्र संशयः

tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā vājapeyaphalaṁ labhet sārasvatīṁ matiṁ caiva labhate nātra saṁśayaḥ

उस तीर्थ में स्नान करके मनुष्य वाजपेय का फल पाता है, और सारस्वती (वाणी की) बुद्धि भी पाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 79 (padma.3.27.79)

ततः कन्याश्रमं गत्वा नियतो ब्रह्मचर्यया । त्रिरात्रमुषितो राजन्नुपवासपरायणः

tataḥ kanyāśramaṁ gatvā niyato brahmacaryayā trirātramuṣito rājannupavāsaparāyaṇaḥ

फिर कन्याश्रम को जाकर, ब्रह्मचर्य में संयमित होकर, हे राजन! तीन रात्रि निवास करके उपवासपरायण होकर,

श्लोक 80 (padma.3.27.80)

लभेत्कन्याशतं दिव्यं बह्मलोकं च गच्छति । ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं संनिहितीमपि

labhetkanyāśataṁ divyaṁ bahmalokaṁ ca gacchati tato gaccheta dharmajña tīrthaṁ saṁnihitīmapi

मनुष्य सौ दिव्य कन्याएँ पाता है और ब्रह्मलोक को जाता है। फिर, हे धर्मज्ञ! संनिहिती तीर्थ को भी जाए,

श्लोक 81 (padma.3.27.81)

यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः । मासि मासि समेष्यंति पुण्येन महतान्विताः

yatra brahmādayo devā ṛṣayaśca tapodhanāḥ māsi māsi sameṣyaṁti puṇyena mahatānvitāḥ

जहाँ ब्रह्मा आदि देवगण और तपोधन ऋषि, महान पुण्य से युक्त होकर, प्रति मास एकत्र होते हैं।

श्लोक 82 (padma.3.27.82)

सन्निहित्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे । अश्वमेधशतं तेन इष्टं भवति शाश्वतम्

sannihityāmupaspṛśya rāhugraste divākare aśvamedhaśataṁ tena iṣṭaṁ bhavati śāśvatam

सूर्य के राहु द्वारा ग्रस्त होने पर संनिहिती का स्पर्श करने से, उससे सौ अश्वमेध सदा के लिए किए हुए के समान हो जाते हैं।

श्लोक 83 (padma.3.27.83)

पृथिव्यां यानि तीर्थानि अंतरिक्षचराणि च । उदपानाश्च विप्राश्च पुण्यान्यायतनानि च

pṛthivyāṁ yāni tīrthāni aṁtarikṣacarāṇi ca udapānāśca viprāśca puṇyānyāyatanāni ca

पृथ्वी पर जो भी तीर्थ हैं, और जो आकाश में विचरण करते हैं, कुएँ, ब्राह्मण और पुण्य आयतन भी —

श्लोक 84 (padma.3.27.84)

निःसंशयममावास्यां समेष्यंति नराधिप । मासिमासि नरव्याघ्र सन्निहित्यां जनेश्वर

niḥsaṁśayamamāvāsyāṁ sameṣyaṁti narādhipa māsimāsi naravyāghra sannihityāṁ janeśvara

हे नराधिप! वे सब निःसंशय अमावस्या को, हर मास, हे नरव्याघ्र, हे जनेश्वर! संनिहिती में एकत्र होते हैं।

श्लोक 85 (padma.3.27.85)

तीर्थसन्नयनादेव सन्निहिती भुवि विश्रुता । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते

tīrthasannayanādeva sannihitī bhuvi viśrutā tatra snātvā ca pītvā ca svargaloke mahīyate

तीर्थों के वहाँ लाए जाने के कारण ही संनिहिती पृथ्वी पर विख्यात है। वहाँ स्नान करके और जल पीकर मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 86 (padma.3.27.86)

अमावास्यां तथा चैव राहुग्रस्ते दिवाकरे । यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु

amāvāsyāṁ tathā caiva rāhugraste divākare yaḥ śrāddhaṁ kurute martyastasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

और इसी प्रकार अमावस्या को, सूर्य के राहु द्वारा ग्रस्त होने पर, जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करता है, उसके पुण्य का फल सुनो —

श्लोक 87 (padma.3.27.87)

अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत्फलम् । स्नात एव तदाप्नोति श्राद्धं कृत्वा च मानवः

aśvamedhasahasrasya samyagiṣṭasya yatphalam snāta eva tadāpnoti śrāddhaṁ kṛtvā ca mānavaḥ

भली भाँति संपन्न किए हुए एक हजार अश्वमेधों का जो फल है, वही फल मनुष्य वहाँ स्नान करके और श्राद्ध करके पाता है।

श्लोक 88 (padma.3.27.88)

यत्किंचिद्दुष्कृतं कर्म्म स्त्रिया वा पुरुषस्य वा । स्नातमात्रस्य तत्सर्वं नश्यते नात्र संशयः

yatkiṁcidduṣkṛtaṁ karmma striyā vā puruṣasya vā snātamātrasya tatsarvaṁ naśyate nātra saṁśayaḥ

स्त्री या पुरुष का जो भी दुष्कर्म हो, वह सब स्नान मात्र से नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 89 (padma.3.27.89)

पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं स गच्छति । अभिवाद्य ततो नाम्ना द्वारपालं मचक्रुकम्

padmavarṇena yānena brahmalokaṁ sa gacchati abhivādya tato nāmnā dvārapālaṁ macakrukam

वह कमल के रंग वाले यान में ब्रह्मलोक को जाता है। फिर द्वारपाल मचक्रुक को नाम से नमस्कार करके,

श्लोक 90 (padma.3.27.90)

गंगाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः

gaṁgāhradaśca tatraiva tīrthaṁ bharatasattama tatra snāyīta dharmajña brahmacārī samāhitaḥ

हे भरतसत्तम! और वहीं गंगा-सरोवर, एक तीर्थ है; वहाँ, हे धर्मज्ञ! संयत ब्रह्मचारी को स्नान करना चाहिए,

श्लोक 91 (padma.3.27.91)

राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विंदति मानवः । पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमंतरिक्षे च पुष्करम्

rājasūyāśvamedhābhyāṁ phalaṁ viṁdati mānavaḥ pṛthivyāṁ naimiṣaṁ puṇyamaṁtarikṣe ca puṣkaram

और मनुष्य राजसूय-अश्वमेध का फल पाता है। पृथ्वी पर नैमिष पुण्यमय है, और आकाश में पुष्कर;

श्लोक 92 (padma.3.27.92)

त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुनाति समीरिताः

trayāṇāmapi lokānāṁ kurukṣetraṁ viśiṣyate pāṁsavo'pi kurukṣetre vāyunāti samīritāḥ

किंतु तीनों लोकों में भी कुरुक्षेत्र श्रेष्ठ है। कुरुक्षेत्र की धूल भी, वायु द्वारा उड़ाई गई,

श्लोक 93 (padma.3.27.93)

अपि दुष्कृतकर्म्माणं नयंति परमां गतिम् । दक्षिणेन सरस्वत्यामुत्तरेण सरस्वतीम्

api duṣkṛtakarmmāṇaṁ nayaṁti paramāṁ gatim dakṣiṇena sarasvatyāmuttareṇa sarasvatīm

दुष्कर्मी को भी परम गति तक पहुँचा देती है। सरस्वती के दक्षिण में और [दूसरी] सरस्वती के उत्तर में,

श्लोक 94 (padma.3.27.94)

ये वसंति कुरुक्षेत्रे ते वसंति त्रिविष्टपे । कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्

ye vasaṁti kurukṣetre te vasaṁti triviṣṭape kurukṣetraṁ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyaham

जो लोग कुरुक्षेत्र में निवास करते हैं, वे स्वर्ग में निवास करते हैं। 'मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा, मैं कुरुक्षेत्र में निवास करूँगा' —

श्लोक 95 (padma.3.27.95)

अप्येकां वाचमुत्मृज्य स्वर्गलोके महीयते । ब्रह्मवेद्यां कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम्

apyekāṁ vācamutmṛjya svargaloke mahīyate brahmavedyāṁ kurukṣetraṁ puṇyaṁ brahmarṣisevitam

यह वचन एक बार भी उच्चारण करने से मनुष्य स्वर्गलोक में सम्मानित होता है। ब्रह्मा की वेदी पर स्थित कुरुक्षेत्र पुण्यमय है, ब्रह्मर्षियों द्वारा सेवित —

श्लोक 96 (padma.3.27.96)

तस्मिन्वसंति ये राजन्न ते शोच्याः कथंचन । तरंडकारंडकयोर्यदंतरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत्कुरुक्षेत्र समंतपंचकं पितामहस्योत्तर वेदिरुच्यते

tasminvasaṁti ye rājanna te śocyāḥ kathaṁcana taraṁḍakāraṁḍakayoryadaṁtaraṁ rāmahradānāṁ ca macakrukasya ca etatkurukṣetra samaṁtapaṁcakaṁ pitāmahasyottara vedirucyate

हे राजन! जो वहाँ निवास करते हैं, वे किसी भी प्रकार शोक के पात्र नहीं हैं। तरंडक और कारंडव झीलों के बीच, तथा रामह्रदों और मचक्रुक के बीच का जो क्षेत्र है — यही कुरुक्षेत्र, यही समंतपंचक, पितामह की उत्तरी वेदी कहलाता है।

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