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स्वर्ग खण्ड · अध्याय 36

मध्यमेश्वर का माहात्म्य

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (padma.3.36.1)

नारद उवाच । वाराणस्यां महाराज मध्यमेशं परात्परम् । तस्मिन्स्थाने महादेवो देव्या सह महेश्वरः ।

nārada uvāca vārāṇasyāṁ mahārāja madhyameśaṁ parātparam tasminsthāne mahādevo devyā saha maheśvaraḥ

नारद जी ने कहा — हे महाराज! वाराणसी में परात्पर मध्यमेश हैं। उस स्थान में देवी के साथ महादेव महेश्वर —

श्लोक 2 (padma.3.36.2)

रमते भगवान्नित्यं रुद्रैश्च परिवारितः । तत्र पूर्वं हृषीकेशो विश्वात्मा देवकीसुतः ।

ramate bhagavānnityaṁ rudraiśca parivāritaḥ tatra pūrvaṁ hṛṣīkeśo viśvātmā devakīsutaḥ

रुद्रों से घिरे हुए भगवान् वहाँ नित्य रमण करते हैं। वहाँ पूर्वकाल में विश्वात्मा देवकीनंदन हृषीकेश —

श्लोक 3 (padma.3.36.3)

उवास वत्सरं कृष्णः सदा पाशुपतैर्युतः । भस्मोद्धूलितसर्वांगो रुद्राध्ययनतत्परः ।

uvāsa vatsaraṁ kṛṣṇaḥ sadā pāśupatairyutaḥ bhasmoddhūlitasarvāṁgo rudrādhyayanatatparaḥ

कृष्ण सदा पाशुपत तपस्वियों के साथ एक वर्ष तक निवास किए, संपूर्ण अंगों पर भस्म रमाए हुए, रुद्र-अध्ययन में तत्पर।

श्लोक 4 (padma.3.36.4)

आराधयन्हरिः शंभुं कृत्वा पाशुपतंव्रतम् । तस्य ते बहवः शिष्याः ब्रह्मचर्यपरायणाः ।

ārādhayanhariḥ śaṁbhuṁ kṛtvā pāśupataṁvratam tasya te bahavaḥ śiṣyāḥ brahmacaryaparāyaṇāḥ

पाशुपत व्रत धारण करके हरि ने शंभु की आराधना की। उनके अनेक शिष्य थे, जो ब्रह्मचर्य में तत्पर रहते थे।

श्लोक 5 (padma.3.36.5)

लब्ध्वा तद्वदनाज्ज्ञानं दृष्टवंतो महेश्वरम् । तस्य देवो महादेवः प्रत्यक्षं नीललोहितः ।

labdhvā tadvadanājjñānaṁ dṛṣṭavaṁto maheśvaram tasya devo mahādevaḥ pratyakṣaṁ nīlalohitaḥ

उनके मुख से ज्ञान पाकर उन्होंने महेश्वर का दर्शन किया। उन कृष्ण को नीललोहित महादेव ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया।

श्लोक 6 (padma.3.36.6)

ददौ कृष्णस्य भगवान्वरदो वरमुत्तमम् । येऽर्चयंति च गोविंदं मद्भक्ता विधिपूर्वकम् ।

dadau kṛṣṇasya bhagavānvarado varamuttamam ye'rcayaṁti ca goviṁdaṁ madbhaktā vidhipūrvakam

वरदाता भगवान् ने कृष्ण को उत्तम वर दिया — जो भी मेरे भक्त विधिपूर्वक गोविंद की पूजा करेंगे,

श्लोक 7 (padma.3.36.7)

तेषां तदैश्वरं ज्ञानमुत्पत्स्यति जगन्मयम् । नमस्योऽर्चयितव्यश्च ध्यातव्यो मत्परैर्जनैः ।

teṣāṁ tadaiśvaraṁ jñānamutpatsyati jaganmayam namasyo'rcayitavyaśca dhyātavyo matparairjanaiḥ

उनमें वह ईश्वरीय, जगत्व्यापी ज्ञान उत्पन्न होगा। मेरे भक्तजनों द्वारा वे नमस्करणीय, पूजनीय और ध्यान करने योग्य होंगे।

श्लोक 8 (padma.3.36.8)

भविष्यंति न संदेहो मत्प्रसादाद्द्विजातयः । येऽत्र द्रक्ष्यंति देवेशं स्नात्वा देवं पिनाकिनम् ।

bhaviṣyaṁti na saṁdeho matprasādāddvijātayaḥ ye'tra drakṣyaṁti deveśaṁ snātvā devaṁ pinākinam

मेरी कृपा से वे द्विज हो जाएँगे — इसमें संदेह नहीं। जो यहाँ स्नान करके देवेश पिनाकधारी देव का दर्शन करेंगे,

श्लोक 9 (padma.3.36.9)

ब्रह्महत्यादिकं पापं तेषामाशु विनश्यति । प्राणांस्त्यक्ष्यंति ये र्मत्याः पापकर्मरता अपि ।

brahmahatyādikaṁ pāpaṁ teṣāmāśu vinaśyati prāṇāṁstyakṣyaṁti ye rmatyāḥ pāpakarmaratā api

उनका ब्रह्महत्या आदि पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य यहाँ प्राण त्यागते हैं, चाहे वे पापकर्म में रत ही क्यों न हों,

श्लोक 10 (padma.3.36.10)

ते यांति तत्परं स्थानं नात्र कार्या विचारणा । धन्यास्तु खलु ते विज्ञा मंदाकिन्यां कृतोदकाः ।

te yāṁti tatparaṁ sthānaṁ nātra kāryā vicāraṇā dhanyāstu khalu te vijñā maṁdākinyāṁ kṛtodakāḥ

वे उस परम स्थान को जाते हैं — इसमें कोई विचारणा नहीं करनी चाहिए। धन्य हैं वे विज्ञ जन, जिन्होंने मंदाकिनी में जल-तर्पण करके —

श्लोक 11 (padma.3.36.11)

अर्चयित्वा महादेवं मध्यमेश्वरमीश्वरम् । ज्ञानं दानं तपः श्राद्धं पिंडनिर्वपणं त्विह ।

arcayitvā mahādevaṁ madhyameśvaramīśvaram jñānaṁ dānaṁ tapaḥ śrāddhaṁ piṁḍanirvapaṇaṁ tviha

महादेव मध्यमेश्वर की पूजा की है। यहाँ किया गया ज्ञान, दान, तप, श्राद्ध और पिंडदान —

श्लोक 12 (padma.3.36.12)

एकैकशः कृतं कर्म पुनात्यासप्तमं कुलम् । सन्निहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे ।

ekaikaśaḥ kṛtaṁ karma punātyāsaptamaṁ kulam sannihatyāmupaspṛśya rāhugraste divākare

इनमें से प्रत्येक कर्म अकेला ही सात पीढ़ियों के कुल को पवित्र कर देता है। सूर्यग्रहण के समय सन्निहत्य तीर्थ में स्पर्श करने से —

श्लोक 13 (padma.3.36.13)

यत्फलं लभते मर्त्त्यस्तस्माद्दशगुणं त्विह । एवमुक्तं महाराज माहात्म्यं मध्यमेश्वरे । यः शृणोति परं भक्त्या स याति परमं पदम् ।

yatphalaṁ labhate marttyastasmāddaśaguṇaṁ tviha evamuktaṁ mahārāja māhātmyaṁ madhyameśvare yaḥ śṛṇoti paraṁ bhaktyā sa yāti paramaṁ padam

मनुष्य को जो फल वहाँ मिलता है, उससे दस गुना फल यहाँ मिलता है। हे महाराज! इस प्रकार मध्यमेश्वर का माहात्म्य कहा गया है; जो इसे परम भक्ति से सुनता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

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