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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 5

कर्मविपाक-कथन

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (padma.4.5.1)

शौनक उवाच । कथयस्व महाप्राज्ञ पुत्रहीनो जनो भवेत् । कर्मणा केन वै सूत पुत्रो भवति केन च ।

śaunaka uvāca kathayasva mahāprājña putrahīno jano bhavet karmaṇā kena vai sūta putro bhavati kena ca

शौनक ने कहा — हे महाप्राज्ञ! कहिए, मनुष्य किस कर्म से पुत्रहीन होता है, और हे सूत! किस कर्म से पुत्र होता है?

श्लोक 2 (padma.4.5.2)

सूत उवाच । एतत्पृष्टः पुरा ब्रह्मा नारदेन महात्मना । स यदाह तदा तं च शृणुष्व मुनिपुंगव ।

sūta uvāca etatpṛṣṭaḥ purā brahmā nāradena mahātmanā sa yadāha tadā taṁ ca śṛṇuṣva munipuṁgava

सूत ने कहा — यही प्रश्न पूर्वकाल में महात्मा नारद ने ब्रह्मा जी से पूछा था; हे मुनिपुंगव! उन्होंने जो कहा, वह सुनिए।

श्लोक 3 (padma.4.5.3)

नारद उवाच । पितामह महाप्राज्ञ सर्वतत्त्वार्थपारग । अपुत्रो वै भवेन्मर्त्यः कर्मणा केन पद्मज ।

nārada uvāca pitāmaha mahāprājña sarvatattvārthapāraga aputro vai bhavenmartyaḥ karmaṇā kena padmaja

नारद ने कहा — हे पितामह, महाप्राज्ञ, समस्त तत्त्वों के पारगामी! हे पद्मज! मनुष्य किस कर्म से पुत्रहीन होता है?

श्लोक 4 (padma.4.5.4)

वंध्या स्त्री वा भवेत्केन वृजिनेन ममाग्रतः । कथय शृण्वतो वै मे सर्वप्राणिहिते रत ।

vaṁdhyā strī vā bhavetkena vṛjinena mamāgrataḥ kathaya śṛṇvato vai me sarvaprāṇihite rata

स्त्री किस पाप से वंध्या होती है? हे सर्वप्राणिहितरत! मुझसे कहिए, मैं सुन रहा हूँ।

श्लोक 5 (padma.4.5.5)

दुहिता जायते केन कर्मणा वा नपुंसकः । मृतवत्सो भवेत्केन मृतवत्सातिदुःखिता । केन पुण्येन भो ब्रह्मन्पुनः पुत्रो भवेद्वद ।

duhitā jāyate kena karmaṇā vā napuṁsakaḥ mṛtavatso bhavetkena mṛtavatsātiduḥkhitā kena puṇyena bho brahmanpunaḥ putro bhavedvada

किस कर्म से पुत्री उत्पन्न होती है या नपुंसक? किस कर्म से मनुष्य का पुत्र मर जाता है और अत्यंत दुःखी नारी बार-बार शिशु खोती है? और हे ब्रह्मन्! किस पुण्य से पुनः पुत्र होता है, यह कहिए।

श्लोक 6 (padma.4.5.6)

ब्रह्मोवाच । कथयामि समासेन सावधानेन तच्छ्रणु । वृत्तांतं पृच्छसि त्वं वै शृण्वतां विस्मयप्रदम् ।

brahmovāca kathayāmi samāsena sāvadhānena tacchraṇu vṛttāṁtaṁ pṛcchasi tvaṁ vai śṛṇvatāṁ vismayapradam

ब्रह्मा जी ने कहा — मैं संक्षेप में कहता हूँ, सावधान होकर सुनिए। आप जिस वृत्तांत को पूछ रहे हैं, वह सुनने वालों को विस्मित करने वाला है।

श्लोक 7 (padma.4.5.7)

पूर्वजन्मनि यो मर्त्यो वर्तनं ब्राह्मणस्य च । हरेद्वा हारयेदत्र पुत्रहीनो भवेत्किल ।

pūrvajanmani yo martyo vartanaṁ brāhmaṇasya ca haredvā hārayedatra putrahīno bhavetkila

जो मनुष्य पूर्वजन्म में ब्राह्मण की वृत्ति को हरता है या हरवाता है, वह इस जन्म में निश्चय ही पुत्रहीन होता है।

श्लोक 8 (padma.4.5.8)

इह जन्मनि यो मर्त्यः पुराणश्रवणं हि च । ससस्या भूमेर्दानं च कुर्याद्वै श्रद्धयान्वितः ।

iha janmani yo martyaḥ purāṇaśravaṇaṁ hi ca sasasyā bhūmerdānaṁ ca kuryādvai śraddhayānvitaḥ

जो मनुष्य इस जन्म में श्रद्धापूर्वक पुराण सुनता है और खेती-सहित भूमि का दान करता है,

श्लोक 9 (padma.4.5.9)

धेनुं बहुगुणां हैमीं बहुदुग्धां सदक्षिणाम् । सुवर्णप्रतिमां चैव तस्य पुत्रो भवेद्ध्रुवम् ।

dhenuṁ bahuguṇāṁ haimīṁ bahudugdhāṁ sadakṣiṇām suvarṇapratimāṁ caiva tasya putro bhaveddhruvam

जो बहुगुणी, स्वर्णदान-सहित, बहुदुग्धा गौ तथा दक्षिणा-सहित सुवर्ण-प्रतिमा भी दान करता है, उसे निश्चय ही पुत्र होता है।

श्लोक 10 (padma.4.5.10)

पूर्वजन्मनि या नारी परबालकघातनम् । करोति कपटेनैव बालहीना भवेद्ध्रुवम् ।

pūrvajanmani yā nārī parabālakaghātanam karoti kapaṭenaiva bālahīnā bhaveddhruvam

जो स्त्री पूर्वजन्म में कपट से पराए बालक का घात करती है, वह निश्चय ही बालहीन होती है।

श्लोक 11 (padma.4.5.11)

सौवर्णप्रतिमादानं या नारी श्रद्धयान्विता । कुर्यात्पानं ब्राह्मणस्य भक्त्या वै चरणोदकम् ।

sauvarṇapratimādānaṁ yā nārī śraddhayānvitā kuryātpānaṁ brāhmaṇasya bhaktyā vai caraṇodakam

जो स्त्री श्रद्धापूर्वक सुवर्ण-प्रतिमा का दान करती है और भक्तिपूर्वक ब्राह्मण के चरणोदक का पान करती है,

श्लोक 12 (padma.4.5.12)

पुराणश्रवणं चैव दद्याद्वै बहुदक्षिणाम् । बह्वपत्या जीववत्सा भवेन्नास्त्यत्र संशयः ।

purāṇaśravaṇaṁ caiva dadyādvai bahudakṣiṇām bahvapatyā jīvavatsā bhavennāstyatra saṁśayaḥ

तथा पुराण सुनकर बहुत दक्षिणा देती है, वह अनेक संतानों वाली तथा जीवित संतान वाली होती है — इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 13 (padma.4.5.13)

जले निमग्नं बालं यो दृष्ट्वा या न समुद्धरेत् । इह जन्मन्यपुत्रो वै साऽपुत्री च भवेद्ध्रुवम् ।

jale nimagnaṁ bālaṁ yo dṛṣṭvā yā na samuddharet iha janmanyaputro vai sā'putrī ca bhaveddhruvam

जो जल में डूबते बालक को देखकर उसका उद्धार नहीं करता या करती, वह इस जन्म में निश्चय ही पुत्रहीन या पुत्रीहीन होता है।

श्लोक 14 (padma.4.5.14)

वृषभं चैव कूष्मांडं ससुवर्णं सवस्त्रकम् । दद्याद्दानं ब्राह्मणस्य कुर्याद्बालव्रतं शुभम् ।

vṛṣabhaṁ caiva kūṣmāṁḍaṁ sasuvarṇaṁ savastrakam dadyāddānaṁ brāhmaṇasya kuryādbālavrataṁ śubham

वृषभ, कूष्मांड, स्वर्ण तथा वस्त्र-सहित ब्राह्मण को दान देना चाहिए और शुभ बाल-व्रत करना चाहिए।

श्लोक 15 (padma.4.5.15)

गौरीं कन्यां तथा कुर्यात्पुराणश्रवणं हि यः । पुत्रो वै जायते तस्य सर्वपातकनाशनम् ।

gaurīṁ kanyāṁ tathā kuryātpurāṇaśravaṇaṁ hi yaḥ putro vai jāyate tasya sarvapātakanāśanam

तथा गौरी को कन्या-गौ अर्पित करनी चाहिए; जो पुराण सुनता है, उसे सर्वपापनाशक पुत्र निश्चय ही प्राप्त होता है।

श्लोक 16 (padma.4.5.16)

पूर्वजन्मनि यो मर्त्यो निराशं चातिथिं द्विज । कुर्यात्क्रोधेन दंडं च पुत्रहीनो भवेद्ध्रुवम् ।

pūrvajanmani yo martyo nirāśaṁ cātithiṁ dvija kuryātkrodhena daṁḍaṁ ca putrahīno bhaveddhruvam

हे द्विज! जो मनुष्य पूर्वजन्म में अतिथि को निराश करता है या क्रोधवश किसी को दंड देता है, वह निश्चय ही पुत्रहीन होता है।

श्लोक 17 (padma.4.5.17)

ब्राह्मणं चातिथिं चैव कुर्याद्भक्त्या प्रपूजनम् । अन्नदानं जलं चैव तथा देवालयं शुभम् ।

brāhmaṇaṁ cātithiṁ caiva kuryādbhaktyā prapūjanam annadānaṁ jalaṁ caiva tathā devālayaṁ śubham

ब्राह्मण और अतिथि की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए, अन्न-जल का दान करना चाहिए तथा शुभ देवालय बनवाना चाहिए।

श्लोक 18 (padma.4.5.18)

पूर्वजन्मनि या नारी भ्रूणहत्यां च यो नरः । कुर्यात्सा मृतवत्सा च मृतवत्सो भवेद्ध्रुवम् ।

pūrvajanmani yā nārī bhrūṇahatyāṁ ca yo naraḥ kuryātsā mṛtavatsā ca mṛtavatso bhaveddhruvam

जो स्त्री या पुरुष पूर्वजन्म में भ्रूण-हत्या करता है, वह निश्चय ही इस जन्म में शिशु खोने वाला होता है।

श्लोक 19 (padma.4.5.19)

या नारी स्वामिसहिता कुर्याच्च हरिवासरम् । सुपुत्रा भर्तृसुभगा भवेत्सा प्रतिजन्मनि ।

yā nārī svāmisahitā kuryācca harivāsaram suputrā bhartṛsubhagā bhavetsā pratijanmani

जो स्त्री अपने पति के साथ हरिवासर का व्रत करती है, वह जन्म-जन्मांतर में सुपुत्रा तथा पति द्वारा सम्मानित होती है।

श्लोक 20 (padma.4.5.20)

यो नरो गोधनं कुर्याच्छूद्रः कुर्याद्विमोहितः । ब्राह्मणीहरणं वापि कर्मणा स नपुंसकः ।

yo naro godhanaṁ kuryācchūdraḥ kuryādvimohitaḥ brāhmaṇīharaṇaṁ vāpi karmaṇā sa napuṁsakaḥ

जो मनुष्य गोधन चुराता है, या मोहवश कोई शूद्र ब्राह्मणी का हरण करता है, वह उस कर्म से नपुंसक होता है।

श्लोक 21 (padma.4.5.21)

इदं तु वृजिनं कृत्वा पश्चात्पुण्यं करोति यः । इह पुण्यप्रभावेण दुहिता जायते द्विज ।

idaṁ tu vṛjinaṁ kṛtvā paścātpuṇyaṁ karoti yaḥ iha puṇyaprabhāveṇa duhitā jāyate dvija

परंतु जो यह पाप करके बाद में पुण्य करता है, हे द्विज! उस पुण्य के प्रभाव से इस जन्म में उसे कन्या प्राप्त होती है।

श्लोक 22 (padma.4.5.22)

आसीत्त्रेतायुगे राजा श्रीधरो नामतो द्विज । अपुत्रो धनवांस्तस्य जाया हेमप्रभावती ।

āsīttretāyuge rājā śrīdharo nāmato dvija aputro dhanavāṁstasya jāyā hemaprabhāvatī

हे द्विज! त्रेतायुग में श्रीधर नामक एक राजा था, जो धनवान् था परंतु पुत्रहीन था; उसकी पत्नी का नाम हेमप्रभावती था।

श्लोक 23 (padma.4.5.23)

व्यासं सकलशास्त्रज्ञं सर्वलोकहितैषिणम् । आगतं चैव पप्रच्छ चापुत्रोऽहं कथं द्विज ।

vyāsaṁ sakalaśāstrajñaṁ sarvalokahitaiṣiṇam āgataṁ caiva papraccha cāputro'haṁ kathaṁ dvija

जब समस्त शास्त्रों के ज्ञाता तथा सर्वलोक-हितैषी व्यास जी वहाँ आए, तब उसने पूछा — 'हे द्विज! मैं क्यों पुत्रहीन हूँ?'

श्लोक 24 (padma.4.5.24)

उवाच नृपतेः श्रुत्वा वचनं विनयान्वितम् । राज्ञा दत्ते च पीठे च निर्मिते कनकादिभिः ।

uvāca nṛpateḥ śrutvā vacanaṁ vinayānvitam rājñā datte ca pīṭhe ca nirmite kanakādibhiḥ

राजा के विनययुक्त वचन सुनकर, राजा द्वारा दिए गए स्वर्णनिर्मित आसन पर बैठकर, उन्होंने उत्तर दिया।

श्लोक 25 (padma.4.5.25)

राजाराज्ञी तस्य पादौ धौतं कृत्वा च हर्षितौ । पीत्वा पादोदकं द्वौ च सर्वपातकनाशनम् ।

rājārājñī tasya pādau dhautaṁ kṛtvā ca harṣitau pītvā pādodakaṁ dvau ca sarvapātakanāśanam

राजा और रानी दोनों ने हर्षित होकर उनके चरण धोए और सर्वपापनाशक चरणोदक का पान किया।

श्लोक 26 (padma.4.5.26)

व्यास उवाच । राजन्शृणुष्व यत्पृष्टमपुत्रो येन कर्मणा । तवेयं राज्ञी चापुत्री चैकपत्नीव्रतस्तथा ।

vyāsa uvāca rājanśṛṇuṣva yatpṛṣṭamaputro yena karmaṇā taveyaṁ rājñī cāputrī caikapatnīvratastathā

व्यास जी ने कहा — हे राजन्! सुनिए, आपने जो पूछा, किस कर्म से आप पुत्रहीन हैं। यह आपकी रानी भी पुत्रहीन है, यद्यपि आप एकपत्नीव्रती हैं।

श्लोक 27 (padma.4.5.27)

पूर्वजन्मनि चंद्रस्त्वं नाम्ना वरतनु स्मृतः । भार्या तवापि शुभ्रांगी नाम्ना वै शंकरी स्मृता ।

pūrvajanmani caṁdrastvaṁ nāmnā varatanu smṛtaḥ bhāryā tavāpi śubhrāṁgī nāmnā vai śaṁkarī smṛtā

पूर्वजन्म में आप वरतनु नामक ब्राह्मण थे; आपकी पत्नी भी शुभ्रांगी, शंकरी नाम से जानी जाती थी।

श्लोक 28 (padma.4.5.28)

एकदा पथियातौ च नीचपुत्रं जलेपि च । मग्नं दृष्ट्वा हेलया च गतौ स पंचतां गतः ।

ekadā pathiyātau ca nīcaputraṁ jalepi ca magnaṁ dṛṣṭvā helayā ca gatau sa paṁcatāṁ gataḥ

एक बार मार्ग में जाते हुए आप दोनों ने जल में डूबते हुए एक नीच कुल के बालक को देखा, और उपेक्षा से आगे बढ़ गए; वह बालक मृत्यु को प्राप्त हो गया।

श्लोक 29 (padma.4.5.29)

बहुपुण्यप्रभावेण राज्ञीराजा गतौ युवाम् । तेन कर्मविपाकेन युवायोर्न भवेत्सुतः ।

bahupuṇyaprabhāveṇa rājñīrājā gatau yuvām tena karmavipākena yuvāyorna bhavetsutaḥ

अपने बड़े पुण्यों के प्रभाव से आप दोनों राजा-रानी हुए; परंतु उसी कर्म के फल से आप दोनों को पुत्र नहीं हुआ।

श्लोक 30 (padma.4.5.30)

राजोवाच । इदानीं केन पुण्येन सुतो वै जायते प्रभो । अपुत्रस्य मनुष्याणां जीवनं हि निरर्थकम् ।

rājovāca idānīṁ kena puṇyena suto vai jāyate prabho aputrasya manuṣyāṇāṁ jīvanaṁ hi nirarthakam

राजा ने कहा — हे प्रभो! अब किस पुण्य से पुत्र होगा? क्योंकि पुत्रहीन मनुष्यों का जीवन व्यर्थ है।

श्लोक 31 (padma.4.5.31)

व्यास उवाच । सवस्त्रं चैव कूष्मांडं वृषभं ससुवर्णकम् । देहि दानं ब्राह्मणस्य कुरु बालव्रतं तथा ।

vyāsa uvāca savastraṁ caiva kūṣmāṁḍaṁ vṛṣabhaṁ sasuvarṇakam dehi dānaṁ brāhmaṇasya kuru bālavrataṁ tathā

व्यास जी ने कहा — वस्त्र-सहित कूष्मांड तथा स्वर्ण-सहित वृषभ ब्राह्मण को दान दीजिए, और बाल-व्रत भी कीजिए।

श्लोक 32 (padma.4.5.32)

गौरीं कन्यां तथा देहि पुराणश्रवणं कुरु । पुत्रो वै जायते तत्र सर्वपातकनाशनम् ।

gaurīṁ kanyāṁ tathā dehi purāṇaśravaṇaṁ kuru putro vai jāyate tatra sarvapātakanāśanam

गौरी को कन्या-गौ भी दीजिए, तथा पुराण सुनिए; इससे सर्वपापनाशक पुत्र निश्चय ही उत्पन्न होगा।

श्लोक 33 (padma.4.5.33)

ब्रह्मोवाच । इति श्रुत्वा ततो राजा व्यासोक्तं दानमुत्तमम् । पुराणश्रवणं चैव चकार गतकिल्बिषः ।

brahmovāca iti śrutvā tato rājā vyāsoktaṁ dānamuttamam purāṇaśravaṇaṁ caiva cakāra gatakilbiṣaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — यह सुनकर राजा ने व्यास जी द्वारा कहा गया उत्तम दान किया और पुराण भी सुना, और वह पापरहित हो गया।

श्लोक 34 (padma.4.5.34)

ततः पुत्रो वर्षमध्ये बभूव सर्वपूजितः । अभूद्राजा सार्वभौमः सुंदरः कुलनायकः ।

tataḥ putro varṣamadhye babhūva sarvapūjitaḥ abhūdrājā sārvabhaumaḥ suṁdaraḥ kulanāyakaḥ

तब एक वर्ष के भीतर सर्वपूजित पुत्र उत्पन्न हुआ; वह सुंदर, कुल का नायक, सार्वभौम राजा हुआ।

श्लोक 35 (padma.4.5.35)

सूत उवाच । य इदं शृणुयाद्भक्त्या करोति दानमुत्तमम् । अपुत्रो लभते पुत्रं संक्षेपात्कथितं मया ।

sūta uvāca ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā karoti dānamuttamam aputro labhate putraṁ saṁkṣepātkathitaṁ mayā

सूत ने कहा — जो इसे भक्तिपूर्वक सुनकर यह उत्तम दान करता है, उस पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है — यह मैंने संक्षेप में कहा।

श्लोक 36 (padma.4.5.36)

भक्त्या श्रुत्वा तु या नारी कुर्याद्ब्राह्मणपूजनम् । सुपुत्रा सा भवेन्नित्यं शास्त्रोक्तविधिना द्विज ।

bhaktyā śrutvā tu yā nārī kuryādbrāhmaṇapūjanam suputrā sā bhavennityaṁ śāstroktavidhinā dvija

हे द्विज! जो स्त्री भक्तिपूर्वक इसे सुनकर शास्त्रोक्त विधि से ब्राह्मण-पूजन करती है, वह सदा सुपुत्रा होती है।

श्लोक 37 (padma.4.5.37)

सुवर्णं रजतं वस्त्रं पुष्पमाल्यं च चंदनम् । यो दद्यात्पुस्तके भक्त्या सर्वपापप्रणाशनम् ।

suvarṇaṁ rajataṁ vastraṁ puṣpamālyaṁ ca caṁdanam yo dadyātpustake bhaktyā sarvapāpapraṇāśanam

जो भक्तिपूर्वक स्वर्ण, रजत, वस्त्र, पुष्पमाला तथा चंदन पुस्तक (पुराण-ग्रंथ) को अर्पित करता है, वह सर्वपापनाशक होता है।

श्लोक 38 (padma.4.5.38)

पूर्वजन्मनि यो मूढो ब्रह्मबालकघातकः । तस्य क्रूरो भवेत्पुत्रः सप्तजन्मांतरैर्द्विजः ।

pūrvajanmani yo mūḍho brahmabālakaghātakaḥ tasya krūro bhavetputraḥ saptajanmāṁtarairdvijaḥ

हे द्विज! जो मूढ़ पूर्वजन्म में ब्राह्मण-बालक का घातक होता है, उसे सात जन्मों तक क्रूर पुत्र प्राप्त होता है।

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