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पाताल खण्ड · अध्याय 106

ब्राह्मण, विधवा और श्वान: पाप, सती और भस्म की कृपा

अध्याय 105अध्याय-सूचीअध्याय 107

श्लोक 1 (padma.5.106.1)

शुचिस्मितोवाच- आयुष्यवर्द्धनं भस्माशनं दृष्टं महामुने । परलोकगतिं दातुं शक्तमेतं वदस्व मे

śucismitovāca- āyuṣyavarddhanaṁ bhasmāśanaṁ dṛṣṭaṁ mahāmune paralokagatiṁ dātuṁ śaktametaṁ vadasva me

शुचिस्मिता ने कहा— हे महामुने! भस्म-भक्षण आयु बढ़ाने वाला देखा गया है; क्या यह परलोक-गति देने में भी समर्थ है, यह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (padma.5.106.2)

दधीच उवाच- अत्र ते कथयिष्यामि इतिहासं पुरातनम् । चित्रगुप्तयमाभ्यां च यद्विख्यातं बभूव ह

dadhīca uvāca- atra te kathayiṣyāmi itihāsaṁ purātanam citraguptayamābhyāṁ ca yadvikhyātaṁ babhūva ha

दधीचि ने कहा— इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जो चित्रगुप्त और यम के द्वारा विख्यात हुआ था।

श्लोक 3 (padma.5.106.3)

मिथिलायां पुरा कश्चिच्छुनः पर्यटते क्षुधा । पुरा जन्मशतात्पूर्वं ब्राह्मणः पापनिश्चयः

mithilāyāṁ purā kaścicchunaḥ paryaṭate kṣudhā purā janmaśatātpūrvaṁ brāhmaṇaḥ pāpaniścayaḥ

प्राचीनकाल में मिथिला में भूख से भटकता हुआ एक कुत्ता था, जो सौ जन्म पहले एक पापनिश्चयी ब्राह्मण था।

श्लोक 4 (padma.5.106.4)

पूर्वेवयसि वेदाढ्यः शास्त्राढ्यश्च सुबुद्धिमान् । स स्नातुं जाह्नवीं गत्वा स्नानं कृत्वा पितॄनपि

pūrvevayasi vedāḍhyaḥ śāstrāḍhyaśca subuddhimān sa snātuṁ jāhnavīṁ gatvā snānaṁ kṛtvā pitṝnapi

पूर्व जन्म में वह वेद-शास्त्रों में समृद्ध, सुबुद्धिमान था। वह गंगा-स्नान के लिए जाकर, स्नान और पितृ-कर्म करके —

श्लोक 5 (padma.5.106.5)

देवानृषीन्समभ्यर्च्य ययौ प्रात्तलिकापुरम् । प्रतिश्रयमथो चक्रे ब्राह्मणस्य निवेशने

devānṛṣīnsamabhyarcya yayau prāttalikāpuram pratiśrayamatho cakre brāhmaṇasya niveśane

देवताओं-ऋषियों की पूजा करके प्रात्तलिका नामक नगर गया। वहाँ एक ब्राह्मण के घर उसने आश्रय लिया।

श्लोक 6 (padma.5.106.6)

तत्रैका क्षत्रियसुता यौवनस्था हतप्रिया । भ्रष्टराज्या च षट्कोटि निष्कद्रव्येण संयुता

tatraikā kṣatriyasutā yauvanasthā hatapriyā bhraṣṭarājyā ca ṣaṭkoṭi niṣkadravyeṇa saṁyutā

वहाँ एक युवा क्षत्रिय-कन्या थी, जिसका प्रिय मारा जा चुका था, जिसका राज्य नष्ट हो चुका था, जिसके पास साठ लाख स्वर्ण-मुद्राएँ थीं।

श्लोक 7 (padma.5.106.7)

भुक्त्वाथ शयितं विप्रं सर्वावयवसुंदरम् । रात्रौ चंद्रोदये शुद्धे ज्योत्स्नाहसितदिङ्मुखे

bhuktvātha śayitaṁ vipraṁ sarvāvayavasuṁdaram rātrau caṁdrodaye śuddhe jyotsnāhasitadiṅmukhe

भोजन करके, सर्वांगसुंदर उस ब्राह्मण को शयन करते देखकर — रात्रि में स्वच्छ चंद्रोदय के समय, जब दिशाएँ मानो चाँदनी से मुस्कुरा रही थीं —

श्लोक 8 (padma.5.106.8)

ब्राह्मणाभ्याशमागत्य तमुदीक्ष्येदमब्रवीत् । कुतस्त्वमागतो विप्र कं वा देशं गमिष्यसि

brāhmaṇābhyāśamāgatya tamudīkṣyedamabravīt kutastvamāgato vipra kaṁ vā deśaṁ gamiṣyasi

ब्राह्मण के निकट आकर, उसे देखकर यह बोली— हे विप्र! तुम कहाँ से आए हो, और किस देश जाओगे?

श्लोक 9 (padma.5.106.9)

ब्राह्मण उवाच- अकालचर्या सर्वेषां शंकामुत्पादयेद्ध्रुवम् । वयःस्थयोर्मिथोवादो रहस्ये हास्यमंदिरे

brāhmaṇa uvāca- akālacaryā sarveṣāṁ śaṁkāmutpādayeddhruvam vayaḥsthayormithovādo rahasye hāsyamaṁdire

ब्राह्मण ने कहा— असमय का यह व्यवहार निश्चय ही सबमें शंका उत्पन्न करेगा; एकांत में, हास्य-गृह में समवयस्कों की बातचीत भी संदिग्ध है।

श्लोक 10 (padma.5.106.10)

क्षत्रियोवाच- कथाप्रसंगे यात्रायां तीर्थे देशादि विप्लवे । दुर्भिक्षे ग्रामदहने रहोवादो न दूषितः

kṣatriyovāca- kathāprasaṁge yātrāyāṁ tīrthe deśādi viplave durbhikṣe grāmadahane rahovādo na dūṣitaḥ

क्षत्रिय-कन्या ने कहा— कथा-प्रसंग में, यात्रा में, तीर्थ में, देश के उपद्रव में, दुर्भिक्ष में, गाँव जलने पर — एकांत-वार्ता दूषित नहीं मानी जाती।

श्लोक 11 (padma.5.106.11)

प्रतिश्रयस्तु मद्गेहे भवतैव पुरा कृतः । मद्गेहवासिनी चाहं न शंका त्विह कस्यचित्

pratiśrayastu madgehe bhavataiva purā kṛtaḥ madgehavāsinī cāhaṁ na śaṁkā tviha kasyacit

आपने ही पहले मेरे घर में आश्रय लिया है, और मैं अपने ही घर में रहती हूँ — यहाँ किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए।

श्लोक 12 (padma.5.106.12)

ब्राह्मण उवाच- तूष्णींभावो मया कार्यो गच्छ त्वं शीघ्रमग्रतः । इत्युक्ता ब्राह्मणेनासौ मनसेदमचिंतयत्

brāhmaṇa uvāca- tūṣṇīṁbhāvo mayā kāryo gaccha tvaṁ śīghramagrataḥ ityuktā brāhmaṇenāsau manasedamaciṁtayat

ब्राह्मण ने कहा— मुझे मौन ही रहना चाहिए; तुम शीघ्र आगे जाओ। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर उसने मन ही मन यह सोचा।

श्लोक 13 (padma.5.106.13)

अनेन संगमो मह्यं यथाभूयात्तथाविधि । रोदनं तु करिष्यामि तथा यास्यति सांत्वितुम्

anena saṁgamo mahyaṁ yathābhūyāttathāvidhi rodanaṁ tu kariṣyāmi tathā yāsyati sāṁtvitum

जिस भी विधि से मुझे इसका संगम प्राप्त हो, वह मैं करूँगी। मैं रुदन करूँगी, जिससे यह सांत्वना देने आएगा।

श्लोक 14 (padma.5.106.14)

मां च सांत्वयितुं प्राप्तो मां समुत्थापयिष्यति । अहमुत्तिष्ठमानैव दोर्लताकंठसंगिनी

māṁ ca sāṁtvayituṁ prāpto māṁ samutthāpayiṣyati ahamuttiṣṭhamānaiva dorlatākaṁṭhasaṁginī

मुझे सांत्वना देने आकर यह मुझे उठाएगा; और मैं उठते हुए ही अपनी लता-सी भुजाओं से उसका गला घेर लूँगी —

श्लोक 15 (padma.5.106.15)

कुचयुग्मेन तद्गात्रं स्पर्शयंती विमूर्च्छिता । गतभानां हि मां दृष्ट्वा निषण्णः स्वयमेव सः

kucayugmena tadgātraṁ sparśayaṁtī vimūrcchitā gatabhānāṁ hi māṁ dṛṣṭvā niṣaṇṇaḥ svayameva saḥ

अपने स्तन-युगल से उसके शरीर को स्पर्श कराती हुई मूर्च्छित-सी बन जाऊँगी। मुझे इस प्रकार निश्चेत देखकर वह स्वयं ही बैठ जाएगा —

श्लोक 16 (padma.5.106.16)

उत्संगे मामकं देहं निधास्यति द्विजाग्रणीः । अचेतनेव वसनमपास्य रुदतीव च

utsaṁge māmakaṁ dehaṁ nidhāsyati dvijāgraṇīḥ acetaneva vasanamapāsya rudatīva ca

वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे शरीर को अपनी गोद में रखेगा। मानो चेतना-रहित होकर, रोती हुई-सी मैं वस्त्र हटा दूँगी —

श्लोक 17 (padma.5.106.17)

सुस्निग्धं रोमरहितं पक्वाश्वत्थदलाकृति । दर्शयिष्यामि तत्स्थानं कामगेहं सुगंधि च

susnigdhaṁ romarahitaṁ pakvāśvatthadalākṛti darśayiṣyāmi tatsthānaṁ kāmagehaṁ sugaṁdhi ca

अत्यंत स्निग्ध, रोमरहित, पके पीपल-पत्ते के आकार वाला वह कामगृह, सुगंधित, उसे दिखा दूँगी।

श्लोक 18 (padma.5.106.18)

मयैव विलुठंत्यांगे तस्य वस्त्रमपास्यते । विलुप्यमानसं तस्य करिष्ये स्ववशं द्विजम्

mayaiva viluṭhaṁtyāṁge tasya vastramapāsyate vilupyamānasaṁ tasya kariṣye svavaśaṁ dvijam

तड़पते हुए अंगों से मैं ही उसका वस्त्र हटा दूँगी। उसका मन चुराकर मैं उस ब्राह्मण को अपने वश में कर लूँगी।

श्लोक 19 (padma.5.106.19)

अदृष्टौ यादृशं चित्तं दृष्टौ नैतादृशं भवेत् । दर्शने यादृशं चित्तं संलापे नैव तादृशम्

adṛṣṭau yādṛśaṁ cittaṁ dṛṣṭau naitādṛśaṁ bhavet darśane yādṛśaṁ cittaṁ saṁlāpe naiva tādṛśam

न देखने पर जैसा चित्त होता है, देखने पर वैसा नहीं होता; देखने पर जैसा चित्त होता है, बातचीत में वैसा नहीं होता —

श्लोक 20 (padma.5.106.20)

संलापे यादृशं चित्तं हास्योक्तौ नैव तादृशम् । हास्योक्तौ यादृशं चित्तं स्पर्शने नैव तादृशम्

saṁlāpe yādṛśaṁ cittaṁ hāsyoktau naiva tādṛśam hāsyoktau yādṛśaṁ cittaṁ sparśane naiva tādṛśam

बातचीत में जैसा चित्त होता है, हास्य-वचन में वैसा नहीं होता; हास्य-वचन में जैसा चित्त होता है, स्पर्श में वैसा नहीं होता —

श्लोक 21 (padma.5.106.21)

स्पर्शने यादृशं चित्तं योनिदृष्टौ न तादृशम् । तद्दृष्टौ यादृशं चित्तं योनिस्पर्शे न तादृशम्

sparśane yādṛśaṁ cittaṁ yonidṛṣṭau na tādṛśam taddṛṣṭau yādṛśaṁ cittaṁ yonisparśe na tādṛśam

स्पर्श में जैसा चित्त होता है, योनि-दर्शन में वैसा नहीं होता; उस दर्शन में जैसा चित्त होता है, योनि-स्पर्श में वैसा नहीं होता —

श्लोक 22 (padma.5.106.22)

बाहुमूलकुचद्वंद्व स्वयोनिस्पर्शदर्शनात् । कस्य न स्खलते चेतो रेतः स्कन्नं च नो भवेत्

bāhumūlakucadvaṁdva svayonisparśadarśanāt kasya na skhalate ceto retaḥ skannaṁ ca no bhavet

बाहु-मूल, स्तन-युगल और अपनी ही योनि के स्पर्श-दर्शन से किसका चित्त नहीं डगमगाता, किसका वीर्य नहीं स्खलित होता?

श्लोक 23 (padma.5.106.23)

दधीच उवाच- इति संचिंत्य मनसा क्षत्रिया गृहमभ्यगात् । स्वगृहद्वारमासाद्य मंदं मंदं रुरोद वै

dadhīca uvāca- iti saṁciṁtya manasā kṣatriyā gṛhamabhyagāt svagṛhadvāramāsādya maṁdaṁ maṁdaṁ ruroda vai

दधीचि ने कहा— मन में इस प्रकार सोचकर वह क्षत्रिय-कन्या घर लौट गई। अपने घर के द्वार पर पहुँचकर वह धीरे-धीरे रोने लगी।

श्लोक 24 (padma.5.106.24)

चिरं कालं च रुदितं ब्राह्मणः करुणानिधिः

ciraṁ kālaṁ ca ruditaṁ brāhmaṇaḥ karuṇānidhiḥ

वह लंबे समय तक रोती रही, और वह करुणानिधि ब्राह्मण [उसे सुनता रहा]।

श्लोक 25 (padma.5.106.25)

स्त्रीबालवृद्धातुर राजयोगिनां विषाग्नितोयाद्रि निपातनादिना । दुःखस्य चैवोद्धरणं प्रशस्यते कूपस्यदानेन समं वदंति

strībālavṛddhātura rājayogināṁ viṣāgnitoyādri nipātanādinā duḥkhasya caivoddharaṇaṁ praśasyate kūpasyadānena samaṁ vadaṁti

स्त्री, बालक, वृद्ध, रोगी, राजा या योगी को विष, अग्नि, जल या पर्वत से गिरने आदि से बचाने द्वारा दुःख का उद्धार करना कूप-दान के बराबर श्रेष्ठ कहा जाता है।

श्लोक 26 (padma.5.106.26)

इत्थं विचार्य विप्रोऽसौ शुचिर्भूतः प्रसन्नधीः । तस्याः समीपमगमत्तामुवाच ततो द्विजः

itthaṁ vicārya vipro'sau śucirbhūtaḥ prasannadhīḥ tasyāḥ samīpamagamattāmuvāca tato dvijaḥ

इस प्रकार विचार करके वह ब्राह्मण पवित्र, प्रसन्नचित्त होकर उसके पास गया, और तब उससे यह कहा।

श्लोक 27 (padma.5.106.27)

अलं शोकेन महता इहामुत्र विरोधिना । शरीरशोषणं ह्येतच्चित्तविध्वंसनं तथा

alaṁ śokena mahatā ihāmutra virodhinā śarīraśoṣaṇaṁ hyetaccittavidhvaṁsanaṁ tathā

इस लोक और परलोक दोनों के विरोधी इस महाशोक को बस करो। यह तो केवल शरीर को सुखाने वाला और चित्त को नष्ट करने वाला है।

श्लोक 28 (padma.5.106.28)

त्यज शोकमिमं बाले न चार्थः शोचितेन वै । शोकस्य कारणं किं वा येनेत्थं रुद्यते त्वया

tyaja śokamimaṁ bāle na cārthaḥ śocitena vai śokasya kāraṇaṁ kiṁ vā yenetthaṁ rudyate tvayā

हे बाला! यह शोक त्याग दो, शोक करने से कोई लाभ नहीं है। तुम्हारे शोक का क्या कारण है, जिससे तुम इस प्रकार रो रही हो?

श्लोक 29 (padma.5.106.29)

दधीच उवाच- एवमुक्ता द्विजेनाथ न सा किंचिदुवाच ह । मूर्च्छितेवापतद्भूमौ तमदृष्ट्वेव वीक्षते

dadhīca uvāca- evamuktā dvijenātha na sā kiṁciduvāca ha mūrcchitevāpatadbhūmau tamadṛṣṭveva vīkṣate

दधीचि ने कहा— ब्राह्मण द्वारा ऐसा कहे जाने पर भी उसने कुछ नहीं कहा। बिना उसे देखे-सी वह मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 30 (padma.5.106.30)

तामथोत्थापयामास ब्राह्मणः परमार्थवित् । उत्थितोत्थापिता तेन निपपात पुनः पुनः

tāmathotthāpayāmāsa brāhmaṇaḥ paramārthavit utthitotthāpitā tena nipapāta punaḥ punaḥ

वह परमार्थ-ज्ञाता ब्राह्मण उसे उठाने लगा; उठाए जाने पर भी वह बार-बार फिर गिर पड़ती रही।

श्लोक 31 (padma.5.106.31)

पतितां पतितां विप्रो निषद्योत्थाप्य तां पुनः । अंकमारोपयामास प्रममार्ज विलोचने

patitāṁ patitāṁ vipro niṣadyotthāpya tāṁ punaḥ aṁkamāropayāmāsa pramamārja vilocane

बार-बार गिरती उस पर बैठकर ब्राह्मण उसे फिर से उठाकर अपनी गोद में बिठाने लगा, और उसके नेत्र पोंछने लगा।

श्लोक 32 (padma.5.106.32)

अथ सा मूर्च्छितेवाशु वसनं परिमुच्य तम् । दर्शयंती स्तनौ गुह्यं बाहुमूले विलोचने

atha sā mūrcchitevāśu vasanaṁ parimucya tam darśayaṁtī stanau guhyaṁ bāhumūle vilocane

तब वह मानो मूर्च्छित-सी होकर तुरंत ही अपना वस्त्र छोड़कर, स्तन, गुह्य-स्थान, बाहु-मूल और नेत्र दिखाती हुई —

श्लोक 33 (padma.5.106.33)

आलंब्य कंठे बाहुभ्यां स्तनाभ्यामस्पृशद्द्विजम् । चंद्रातपश्च विशदो मंदमारुतसंभवः

ālaṁbya kaṁṭhe bāhubhyāṁ stanābhyāmaspṛśaddvijam caṁdrātapaśca viśado maṁdamārutasaṁbhavaḥ

दोनों भुजाओं से उसके गले को पकड़कर स्तनों से ब्राह्मण का स्पर्श करने लगी; चाँदनी निर्मल थी, और मंद वायु बह रही थी।

श्लोक 34 (padma.5.106.34)

अथ चिंतापरो विप्रो नैव कार्यमिदं मम । पितुर्वा मातुरुचितं पत्युर्वाथ गुरोस्तथा

atha ciṁtāparo vipro naiva kāryamidaṁ mama piturvā māturucitaṁ patyurvātha gurostathā

तब चिंतित ब्राह्मण ने सोचा — यह मेरे लिए उचित कार्य नहीं है, न पिता के लिए, न माता के लिए, न पति या गुरु के लिए उचित है।

श्लोक 35 (padma.5.106.35)

असंबुद्धस्य मे सर्वं विपरीतं विभाति वै । अथ कामः समायातो रहस्ये स्थितयोस्तयोः

asaṁbuddhasya me sarvaṁ viparītaṁ vibhāti vai atha kāmaḥ samāyāto rahasye sthitayostayoḥ

अज्ञानी मुझे सब कुछ विपरीत ही दिखाई दे रहा है। तभी उन दोनों के एकांत में रहते हुए काम आ पहुँचा।

श्लोक 36 (padma.5.106.36)

विव्याध निशितैर्बाणैर्द्विजं कामो दुरात्मवान् । स्मरबाणातुरो विप्रश्चिंतयामास कामुकः

vivyādha niśitairbāṇairdvijaṁ kāmo durātmavān smarabāṇāturo vipraściṁtayāmāsa kāmukaḥ

दुरात्मा काम ने तीक्ष्ण बाणों से ब्राह्मण को बींध डाला। काम-बाण से पीड़ित, कामातुर ब्राह्मण ने सोचा —

श्लोक 37 (padma.5.106.37)

इयं सुचारु सर्वांगी कामिनीव प्रदृश्यते । नोचेद्योनिमुखे ह्यस्याः कथं रोमांचसंभवः

iyaṁ sucāru sarvāṁgī kāminīva pradṛśyate nocedyonimukhe hyasyāḥ kathaṁ romāṁcasaṁbhavaḥ

यह सुंदर-सर्वांगी कामिनी-सी ही प्रतीत होती है; अन्यथा इसके योनि-मुख में यह रोमांच कैसे होता?

श्लोक 38 (padma.5.106.38)

तदेतस्याः कुचस्पर्शात्सर्वं व्यक्तं भविष्यति । इति संचिंत्य मनसा कुचौ योनिं द्विजोऽस्पृशत्

tadetasyāḥ kucasparśātsarvaṁ vyaktaṁ bhaviṣyati iti saṁciṁtya manasā kucau yoniṁ dvijo'spṛśat

इसके स्तन-स्पर्श से ही सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा — यह सोचकर ब्राह्मण ने उसके स्तन और योनि का स्पर्श किया।

श्लोक 39 (padma.5.106.39)

सापि मूर्च्छितरूपेव मंदस्मितमुखाभवत् । आलिलिंग द्विजं गाढमाननं च चुचुंब ह

sāpi mūrcchitarūpeva maṁdasmitamukhābhavat āliliṁga dvijaṁ gāḍhamānanaṁ ca cucuṁba ha

वह भी मूर्च्छित-रूप में ही मंद मुस्कान वाले मुख वाली हो गई। उसने ब्राह्मण को दृढ़ता से आलिंगन किया और मुख चूम लिया।

श्लोक 40 (padma.5.106.40)

तयोरथ समायोगो वर्षाणां शतमप्यभूत् । गते वर्षशते पश्चादेकस्मिन्दिवसे द्विजः

tayoratha samāyogo varṣāṇāṁ śatamapyabhūt gate varṣaśate paścādekasmindivase dvijaḥ

तब उन दोनों का संयोग सौ वर्षों तक चला। सौ वर्ष बीत जाने पर, एक दिन ब्राह्मण —

श्लोक 41 (padma.5.106.41)

स्नातुं ययौ नदीं प्रातः सापि विप्रप्रसंगतः । स्नानं तत्र तथा चक्रे पुराणं श्रुतवानथ

snātuṁ yayau nadīṁ prātaḥ sāpi vipraprasaṁgataḥ snānaṁ tatra tathā cakre purāṇaṁ śrutavānatha

प्रातःकाल नदी में स्नान करने गया, और उसी के साथ वह भी गई। वहाँ स्नान करके उसने एक पुराण सुना —

श्लोक 42 (padma.5.106.42)

कौर्मं समस्तपापानां नाशनं शिवभक्तिदम् । इदं च पद्यं शुश्राव पुराणज्ञेन भाषितम्

kaurmaṁ samastapāpānāṁ nāśanaṁ śivabhaktidam idaṁ ca padyaṁ śuśrāva purāṇajñena bhāṣitam

कौर्म पुराण, जो समस्त पापों का नाशक और शिवभक्ति देने वाला है। और उसने पुराणज्ञ द्वारा कहा गया यह श्लोक सुना —

श्लोक 43 (padma.5.106.43)

ब्रह्महा मद्यपः स्तेनस्तथैव गुरुतल्पगः । कौर्मं पुराणं श्रुत्वैव मुच्यते पातकात्ततः

brahmahā madyapaḥ stenastathaiva gurutalpagaḥ kaurmaṁ purāṇaṁ śrutvaiva mucyate pātakāttataḥ

'ब्रह्महत्यारा, मद्यपायी, चोर और गुरु-पत्नीगामी भी कौर्म पुराण सुनकर ही पाप से मुक्त हो जाता है।'

श्लोक 44 (padma.5.106.44)

श्रुत्वैतद्वचनं विप्रः पौराणिकमभाषत । मया कृतानां पापानां न च संख्यास्ति काचन

śrutvaitadvacanaṁ vipraḥ paurāṇikamabhāṣata mayā kṛtānāṁ pāpānāṁ na ca saṁkhyāsti kācana

यह वचन सुनकर ब्राह्मण ने पुराणज्ञ से कहा — मैंने जो पाप किए हैं, उनकी कोई गिनती नहीं है।

श्लोक 45 (padma.5.106.45)

अशेषपापसंदोहनाशनं तदिहोच्यताम् । पौराणिक उवाच- आराधय स्वदेवेशं शंकरं त्रिदशेश्वरम्

aśeṣapāpasaṁdohanāśanaṁ tadihocyatām paurāṇika uvāca- ārādhaya svadeveśaṁ śaṁkaraṁ tridaśeśvaram

उन समस्त पापों के समूह का नाशक यहाँ मुझे बताइए। पुराणज्ञ ने कहा— अपने देवाधिदेव, त्रिदशेश्वर शंकर की आराधना कीजिए।

श्लोक 46 (padma.5.106.46)

तस्य संपूजनाद्विप्र सर्वं पापं विनश्यति । पापमेव तमः प्रोक्तं ज्ञानदीपेन नश्यति

tasya saṁpūjanādvipra sarvaṁ pāpaṁ vinaśyati pāpameva tamaḥ proktaṁ jñānadīpena naśyati

उनकी पूजा से, हे विप्र! सब पाप नष्ट हो जाता है। पाप को ही अंधकार कहा गया है, जो ज्ञान के दीपक से नष्ट होता है।

श्लोक 47 (padma.5.106.47)

अथवा पूजया विप्र समस्ताघविनाशनम् । ज्ञानपूजाविहीनानां नरके पतनं ध्रुवम्

athavā pūjayā vipra samastāghavināśanam jñānapūjāvihīnānāṁ narake patanaṁ dhruvam

अथवा पूजा से भी, हे विप्र! समस्त पाप का नाश होता है। ज्ञान और पूजा दोनों से रहित लोगों का नरक में गिरना निश्चित है।

श्लोक 48 (padma.5.106.48)

दधीच उवाच- अथ द्विजो ह्यभिगतः शिवालयमनुत्तमम् । द्रोणपुष्पसहस्रेण पूजयामास शंकरम्

dadhīca uvāca- atha dvijo hyabhigataḥ śivālayamanuttamam droṇapuṣpasahasreṇa pūjayāmāsa śaṁkaram

दधीचि ने कहा— तब ब्राह्मण उस अनुपम शिवालय में गया, और हज़ार द्रोण-पुष्पों से शंकर की पूजा की।

श्लोक 49 (padma.5.106.49)

गृहं जगाम च ततो भोजनं कृतवानथ । विहाय क्षत्रियां विप्रो जगामेष्टां भुवं ततः

gṛhaṁ jagāma ca tato bhojanaṁ kṛtavānatha vihāya kṣatriyāṁ vipro jagāmeṣṭāṁ bhuvaṁ tataḥ

फिर घर जाकर उसने भोजन किया। फिर वह ब्राह्मण उस क्षत्रिय-कन्या को छोड़कर अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।

श्लोक 50 (padma.5.106.50)

हविष्यमन्नमादाय भुक्त्यशक्तेः शिवालयम् । गत्वा दीपस्थिताज्येन भोजनं कृतवान्बहिः

haviṣyamannamādāya bhuktyaśakteḥ śivālayam gatvā dīpasthitājyena bhojanaṁ kṛtavānbahiḥ

हविष्यान्न लेकर, खाने में असमर्थ होने के कारण, वह शिवालय गया और वहाँ दीपक में रखे घी से बाहर भोजन कर लिया।

श्लोक 51 (padma.5.106.51)

अथ मृत्युवशं प्राप्तो यमलोकं जगाम वै । यम उवाच- त्वया कृतानां पापानां केषांचिन्नाशनं पुरा

atha mṛtyuvaśaṁ prāpto yamalokaṁ jagāma vai yama uvāca- tvayā kṛtānāṁ pāpānāṁ keṣāṁcinnāśanaṁ purā

फिर मृत्यु के वश में आकर वह यमलोक गया। यम ने कहा— तुम्हारे किए पापों में से कुछ का पहले ही नाश हो चुका है —

श्लोक 52 (padma.5.106.52)

त्वयैकदिवसे पूजा शंकरस्य यतः कृता । तव पापसहस्रं च प्रणष्टं भवतो द्विज

tvayaikadivase pūjā śaṁkarasya yataḥ kṛtā tava pāpasahasraṁ ca praṇaṣṭaṁ bhavato dvija

क्योंकि तुमने एक दिन शंकर की पूजा की थी; हे विप्र! उससे तुम्हारे एक हज़ार पाप नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 53 (padma.5.106.53)

स्थितानामपि पापानां फलं नरकपातनम् । वर्षकोटिद्वयं विप्र श्वानजन्मशतं पुनः

sthitānāmapi pāpānāṁ phalaṁ narakapātanam varṣakoṭidvayaṁ vipra śvānajanmaśataṁ punaḥ

परंतु जो पाप शेष हैं, उनका फल नरक में गिरना है — दो करोड़ वर्ष, हे विप्र! फिर सौ बार कुत्ते का जन्म —

श्लोक 54 (padma.5.106.54)

शिवदीपाज्यहरणात्फलं नरकसेवनम् । नरके च स्थितिस्तस्य शतवर्षं सुभीषणम्

śivadīpājyaharaṇātphalaṁ narakasevanam narake ca sthitistasya śatavarṣaṁ subhīṣaṇam

शिव के दीपक का घी चुराने का फल नरक-सेवन है, और वहाँ उसका सौ वर्ष का अत्यंत भयंकर निवास होगा।

श्लोक 55 (padma.5.106.55)

कुंभीपाके च काष्ठत्वं भस्म भूत्वा पुनः पुनः । वर्षाणां दशकं त्वेवं कृमिभुक्तिः परं दश

kuṁbhīpāke ca kāṣṭhatvaṁ bhasma bhūtvā punaḥ punaḥ varṣāṇāṁ daśakaṁ tvevaṁ kṛmibhuktiḥ paraṁ daśa

कुंभीपाक में लकड़ी बनकर, बार-बार भस्म होकर, इस प्रकार दस वर्ष; फिर दस वर्ष तक कीड़ों का भक्ष्य —

श्लोक 56 (padma.5.106.56)

पुनश्च दीपवर्तित्वं वर्षाणां च तथा दश । श्लेष्मामेध्यपुरीषेषु मूत्ररेतोह्रदेषु च

punaśca dīpavartitvaṁ varṣāṇāṁ ca tathā daśa śleṣmāmedhyapurīṣeṣu mūtraretohradeṣu ca

फिर दस वर्ष तक दीपक की बत्ती बनना; कफ, मल, मूत्र और वीर्य के तालाबों में —

श्लोक 57 (padma.5.106.57)

उन्मज्ज्य च निमज्ज्याथ श्लेष्मविण्मलभोजनम् । ततो नरकशेषेण श्वानजन्मशतं परम्

unmajjya ca nimajjyātha śleṣmaviṇmalabhojanam tato narakaśeṣeṇa śvānajanmaśataṁ param

उतराता-डूबता, कफ और मल खाता हुआ। फिर उस नरक-भोग के शेष से सौ बार कुत्ते का जन्म।

श्लोक 58 (padma.5.106.58)

यमवाक्यमिति श्रुत्वा ब्राह्मणो निपपात च । अथ तस्य प्रिया भार्या पतिचिंतापराभवत्

yamavākyamiti śrutvā brāhmaṇo nipapāta ca atha tasya priyā bhāryā paticiṁtāparābhavat

यम का यह वचन सुनकर ब्राह्मण [स्तब्ध होकर] गिर पड़ा। तब उसकी प्रिय पत्नी पति की चिंता में डूब गई।

श्लोक 59 (padma.5.106.59)

एतस्मिन्नंतरे तस्याः समीपं नारदोऽभ्यगात् । नारदस्य पपातासौ पादयोरतिदुःखिता

etasminnaṁtare tasyāḥ samīpaṁ nārado'bhyagāt nāradasya papātāsau pādayoratiduḥkhitā

इसी बीच नारद उसके पास आ पहुँचे। वह अत्यंत दुःखी होकर नारद के चरणों में गिर पड़ी।

श्लोक 60 (padma.5.106.60)

तामुत्थाप्य मुनिः शुद्धां गतायुषमभाषत । अयि मुग्धे विशालाक्षि भर्तारं गंतुमर्हसि

tāmutthāpya muniḥ śuddhāṁ gatāyuṣamabhāṣata ayi mugdhe viśālākṣi bhartāraṁ gaṁtumarhasi

मुनि ने उस पवित्र स्त्री को उठाकर, जिसके पति का जीवन समाप्त हो चुका था, कहा — हे मुग्धे, विशालाक्षि! तुम पति के पास जाने योग्य हो।

श्लोक 61 (padma.5.106.61)

भर्ता ते हि विशालाक्षि मृतो बंधुविवर्जितः । न रोदितव्यं ते भद्रे ज्वलनं प्रविशस्व भोः

bhartā te hi viśālākṣi mṛto baṁdhuvivarjitaḥ na roditavyaṁ te bhadre jvalanaṁ praviśasva bhoḥ

हे विशालाक्षि! तुम्हारा पति मरकर बंधुओं से रहित हो गया है। हे भद्रे! तुम्हें रोना नहीं चाहिए; अग्नि में प्रवेश करो।

श्लोक 62 (padma.5.106.62)

ब्राह्मण्युवाच- अशक्यं यदि वा शक्यं मया गंतुं मुने वद । अग्निप्रवेशकालो वै व्यतीतो न भवेद्यथा

brāhmaṇyuvāca- aśakyaṁ yadi vā śakyaṁ mayā gaṁtuṁ mune vada agnipraveśakālo vai vyatīto na bhavedyathā

ब्राह्मणी ने कहा— चाहे यह असंभव हो या संभव, मुझे कैसे जाना है, यह बताइए, हे मुने! जिससे अग्नि-प्रवेश का समय व्यतीत न हो।

श्लोक 63 (padma.5.106.63)

नारद उवाच- योजनानां शतं त्वेकमितः स्थानात्पुरं हितत् । श्वो दाहः किल विप्रस्य भविता गंतुमर्हसि

nārada uvāca- yojanānāṁ śataṁ tvekamitaḥ sthānātpuraṁ hitat śvo dāhaḥ kila viprasya bhavitā gaṁtumarhasi

नारद ने कहा— यहाँ से एक सौ योजन दूर वह नगर है; कल ही निश्चय ही ब्राह्मण का दाह-संस्कार होगा, तुम्हें जाना ही चाहिए।

श्लोक 64 (padma.5.106.64)

अव्ययोवाच- दूरस्थितं कायनाथं गंतुमर्हामि हे मुने । तद्वचस्तु समाकर्ण्य नारदस्तामभाषत

avyayovāca- dūrasthitaṁ kāyanāthaṁ gaṁtumarhāmi he mune tadvacastu samākarṇya nāradastāmabhāṣata

अव्यया ने कहा— हे मुने! मैं दूर स्थित अपने शरीर के स्वामी के पास जाने योग्य हूँ। यह वचन सुनकर नारद ने उससे कहा —

श्लोक 65 (padma.5.106.65)

विपंची नालसंस्था त्वं भव गच्छाम्यहं क्षणात् । इत्युदीर्य तदा गत्वा त्वरां चक्रे गतं च तत्

vipaṁcī nālasaṁsthā tvaṁ bhava gacchāmyahaṁ kṣaṇāt ityudīrya tadā gatvā tvarāṁ cakre gataṁ ca tat

मेरी वीणा की दंडी पर बैठ जाओ, मैं क्षणभर में वहाँ पहुँचता हूँ। यह कहकर, तब जाकर, उन्होंने वह दूरी शीघ्रता से पार कर ली।

श्लोक 66 (padma.5.106.66)

देशं नष्टद्विजस्थानं तामुवाचाव्ययां मुनिः । रोदनं नेह कर्तव्यं यदि तत्राग्निमेष्यसि

deśaṁ naṣṭadvijasthānaṁ tāmuvācāvyayāṁ muniḥ rodanaṁ neha kartavyaṁ yadi tatrāgnimeṣyasi

मृत ब्राह्मण के स्थान पर पहुँचकर मुनि ने अव्यया से कहा — यहाँ रोना नहीं चाहिए, यदि तुम्हें वहाँ अग्नि में प्रवेश करना है।

श्लोक 67 (padma.5.106.67)

पापं यदि कृतं भद्रे परपूरुषसेवनम् । एतद्विशुद्धये पुत्रि प्रायश्चित्तं समाचर

pāpaṁ yadi kṛtaṁ bhadre parapūruṣasevanam etadviśuddhaye putri prāyaścittaṁ samācara

हे भद्रे! यदि परपुरुष-सेवन का पाप किया गया हो, तो उसकी शुद्धि के लिए, हे पुत्री! प्रायश्चित्त करो।

श्लोक 68 (padma.5.106.68)

तवोपपातकव्रात नाशो वह्निप्रवेशनात् । नान्यत्पश्यामि नारीणां सर्वपापोपशांतये

tavopapātakavrāta nāśo vahnipraveśanāt nānyatpaśyāmi nārīṇāṁ sarvapāpopaśāṁtaye

तुम्हारे उपपातकों के समूह का नाश अग्नि-प्रवेश से ही होगा; स्त्रियों के सब पापों की शांति के लिए मुझे इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं दिखता।

श्लोक 69 (padma.5.106.69)

अग्निप्रवेशं मुक्त्वैकं प्रायश्चित्तं जगत्त्रये । दधीच उवाच- अथ नारदवाक्येन नोदिता सा वचोऽब्रवीत्

agnipraveśaṁ muktvaikaṁ prāyaścittaṁ jagattraye dadhīca uvāca- atha nāradavākyena noditā sā vaco'bravīt

अग्नि-प्रवेश के अतिरिक्त तीनों लोकों में इसका कोई एक प्रायश्चित्त नहीं है। दधीचि ने कहा— नारद के इस वचन से प्रेरित होकर उसने यह कहा।

श्लोक 70 (padma.5.106.70)

अग्निप्रवेशे नारीणां किं कर्तव्यं महामुने । नारद उवाच- स्नानं मंगलसंस्कारो भूषणांजनधारणम्

agnipraveśe nārīṇāṁ kiṁ kartavyaṁ mahāmune nārada uvāca- snānaṁ maṁgalasaṁskāro bhūṣaṇāṁjanadhāraṇam

अग्नि-प्रवेश में स्त्रियों को क्या करना चाहिए, हे महामुने? नारद ने कहा— स्नान, मंगल-संस्कार, आभूषण और अंजन धारण करना —

श्लोक 71 (padma.5.106.71)

गंधपुष्पं तथा धूपं हरिद्राक्षतधारणम् । मंगलं च तथा सूत्रं पादालक्तकमेव च

gaṁdhapuṣpaṁ tathā dhūpaṁ haridrākṣatadhāraṇam maṁgalaṁ ca tathā sūtraṁ pādālaktakameva ca

गंध-पुष्प, धूप, हल्दी-अक्षत धारण करना; मंगल-सूत्र और पैरों में अलता भी —

श्लोक 72 (padma.5.106.72)

शक्त्या दानं प्रियोक्तिश्च प्रसन्नास्यत्वमेव च । नानामंगलवाद्यानां श्रवणं गीतकस्य च

śaktyā dānaṁ priyoktiśca prasannāsyatvameva ca nānāmaṁgalavādyānāṁ śravaṇaṁ gītakasya ca

सामर्थ्य अनुसार दान, प्रिय वचन और प्रसन्न मुख; अनेक मंगल-वाद्यों और गीतों को सुनना —

श्लोक 73 (padma.5.106.73)

व्यभिचारकृते पापे तत्पापस्य प्रशांतये । अतीतं पातकं स्पृष्ट्वा प्रायश्चित्तं तदीरितम्

vyabhicārakṛte pāpe tatpāpasya praśāṁtaye atītaṁ pātakaṁ spṛṣṭvā prāyaścittaṁ tadīritam

व्यभिचार से किए गए पाप की शांति के लिए भी है। बीते हुए पाप का स्पर्श करके यह प्रायश्चित्त कहा गया है।

श्लोक 74 (padma.5.106.74)

कुर्यादथ स्वकां भूषां विप्राय प्रतिपादयेत् । भूषाभावे स्वकीयेन प्रायश्चित्तं तु कारयेत्

kuryādatha svakāṁ bhūṣāṁ viprāya pratipādayet bhūṣābhāve svakīyena prāyaścittaṁ tu kārayet

फिर अपने आभूषण किसी ब्राह्मण को समर्पित करना चाहिए। आभूषण न हों तो अपनी वस्तु से ही प्रायश्चित्त करवाना चाहिए।

श्लोक 75 (padma.5.106.75)

नान्यथा तस्य पापस्य नाशनं वेति कुत्रचित् । अव्ययोवाच- सर्वमेतत्करिष्यामि हरिद्रा मे न विद्यते

nānyathā tasya pāpasya nāśanaṁ veti kutracit avyayovāca- sarvametatkariṣyāmi haridrā me na vidyate

अन्यथा उस पाप का नाश कहीं भी नहीं होता। अव्यया ने कहा— यह सब मैं करूँगी, परंतु मेरे पास हल्दी नहीं है।

श्लोक 76 (padma.5.106.76)

भूषणं किमुत ब्रह्मन्सर्वमेतत्प्रदीयताम् । नारद उवाच- न ह्यस्ति किंचित्सौभाग्यद्रव्यमन्यत्त्वपेक्षया

bhūṣaṇaṁ kimuta brahmansarvametatpradīyatām nārada uvāca- na hyasti kiṁcitsaubhāgyadravyamanyattvapekṣayā

हे ब्रह्मन्! आभूषण भी नहीं है, यह सब मुझे दिलवा दीजिए। नारद ने कहा— इस उद्देश्य के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य सौभाग्य-द्रव्य नहीं है।

श्लोक 77 (padma.5.106.77)

दधीच उवाच- अथ क्षणेनाभ्यगमत्कैलासं शिवमंदिरम् । गिरिजामथ दृष्ट्वासौ प्रणिपत्येदमब्रवीत्

dadhīca uvāca- atha kṣaṇenābhyagamatkailāsaṁ śivamaṁdiram girijāmatha dṛṣṭvāsau praṇipatyedamabravīt

दधीचि ने कहा— फिर क्षणभर में वे कैलास के शिव-मंदिर पहुँचे। गिरिजा को देखकर, प्रणाम करके, उन्होंने यह कहा।

श्लोक 78 (padma.5.106.78)

हरिद्रा दीयतां मातर्भूषणानि च सूत्रकम् । पार्वत्युवाच- विधवायै मया किंचिद्भूषणं दीयतां कथम्

haridrā dīyatāṁ mātarbhūṣaṇāni ca sūtrakam pārvatyuvāca- vidhavāyai mayā kiṁcidbhūṣaṇaṁ dīyatāṁ katham

हे माता! हल्दी, आभूषण और मंगल-सूत्र दे दीजिए। पार्वती ने कहा— मैं विधवा को कोई आभूषण कैसे दूँ?

श्लोक 79 (padma.5.106.79)

मया दत्ते हि तस्मिन्वै वैधव्यं नोपपद्यते । नारद उवाच- मातर्न विधवा यावद्धवांगं वर्तते स्त्रियः

mayā datte hi tasminvai vaidhavyaṁ nopapadyate nārada uvāca- mātarna vidhavā yāvaddhavāṁgaṁ vartate striyaḥ

मेरे द्वारा दिए जाने पर उसमें वैधव्य संभव ही नहीं होता। नारद ने कहा— हे माता! जब तक स्त्री का पति-शरीर विद्यमान है, वह विधवा नहीं है —

श्लोक 80 (padma.5.106.80)

आदाहात्सूतकं नास्ति तिष्ठेत्सौभाग्यमुत्तमम् । पार्वत्युवाच- न चान्यदेहो मद्भूषां हरिद्रां धर्तुमर्हति

ādāhātsūtakaṁ nāsti tiṣṭhetsaubhāgyamuttamam pārvatyuvāca- na cānyadeho madbhūṣāṁ haridrāṁ dhartumarhati

दाह-संस्कार तक सूतक नहीं होता; उत्तम सौभाग्य बना रहना चाहिए। पार्वती ने कहा— कोई अन्य शरीर मेरे आभूषण-हल्दी धारण करने योग्य नहीं है।

श्लोक 81 (padma.5.106.81)

भूषणादौ मया दत्ते चिरंजीवितमिष्यते । दीयते हि जयंत्यैव सर्वमेतत्त्वयोदितम्

bhūṣaṇādau mayā datte ciraṁjīvitamiṣyate dīyate hi jayaṁtyaiva sarvametattvayoditam

मेरे द्वारा आभूषण आदि दिए जाने पर दीर्घायु की कामना होती है; तुमने जो कुछ भी कहा है, वह सब जयंती के द्वारा ही दिया जाएगा।

श्लोक 82 (padma.5.106.82)

जयंतीं स जगामाथ तया दत्तमथाहरत् । स्नपंत्या अव्ययायास्तु हरिद्रां दत्तवान्मुनिः

jayaṁtīṁ sa jagāmātha tayā dattamathāharat snapaṁtyā avyayāyāstu haridrāṁ dattavānmuniḥ

तब वे जयंती के पास गए, और उनसे दिया गया वह ले आए। स्नान करती हुई अव्यया को मुनि ने वह हल्दी दे दी।

श्लोक 83 (padma.5.106.83)

ततः स सूक्ष्मवसनभूषणानि मुनिर्ददौ । आह चैनां तवांतेष्टिं कः करोति नियुंक्ष्व तम्

tataḥ sa sūkṣmavasanabhūṣaṇāni munirdadau āha caināṁ tavāṁteṣṭiṁ kaḥ karoti niyuṁkṣva tam

फिर उस मुनि ने उसे सूक्ष्म वस्त्र और आभूषण दिए, और उससे कहा — तुम्हारा अंत्येष्टि-कर्म कौन करेगा? उसे नियुक्त करो।

श्लोक 84 (padma.5.106.84)

अव्ययोवाच- त्वयैव मे समस्तानां क्रियाणां कारणं मुने । पितासि सर्वं कुर्वद्य नमस्ते मुनिसत्तम

avyayovāca- tvayaiva me samastānāṁ kriyāṇāṁ kāraṇaṁ mune pitāsi sarvaṁ kurvadya namaste munisattama

अव्यया ने कहा— हे मुने! मेरे समस्त कार्यों के कारण आप ही हैं। आप ही मेरे पिता हैं, आज सब कुछ आप ही कीजिए, हे मुनिश्रेष्ठ! आपको नमस्कार।

श्लोक 85 (padma.5.106.85)

दधीच उवाच- अथ तं ब्राह्मणं दग्ध्वा नारदस्तामुवाच ह । अव्यये गच्छ दहनं प्रविश त्वं यदीच्छसि

dadhīca uvāca- atha taṁ brāhmaṇaṁ dagdhvā nāradastāmuvāca ha avyaye gaccha dahanaṁ praviśa tvaṁ yadīcchasi

दधीचि ने कहा— फिर उस ब्राह्मण का दाह-संस्कार करके नारद ने उससे कहा — हे अव्ये! अग्नि के पास जाओ, यदि चाहो तो उसमें प्रवेश करो।

श्लोक 86 (padma.5.106.86)

अथ सा भूषिता साध्वी त्रिःप्रदक्षिणपूर्वकम् । नारदं तु नमस्कृत्य गौरांगीमर्पयन्मनः

atha sā bhūṣitā sādhvī triḥpradakṣiṇapūrvakam nāradaṁ tu namaskṛtya gaurāṁgīmarpayanmanaḥ

तब वह आभूषित साध्वी तीन बार प्रदक्षिणा करके, नारद को प्रणाम करके, गौरांगी ने अपना मन अर्पित किया —

श्लोक 87 (padma.5.106.87)

सुसूक्ष्मं मंगलंसूत्रं हरिद्रामक्षतांस्तथा । कुसुमानि च वासांसि कस्तूरीचंदनं तथा

susūkṣmaṁ maṁgalaṁsūtraṁ haridrāmakṣatāṁstathā kusumāni ca vāsāṁsi kastūrīcaṁdanaṁ tathā

अत्यंत सूक्ष्म मंगल-सूत्र, हल्दी और अक्षत, फूल और वस्त्र, कस्तूरी और चंदन भी —

श्लोक 88 (padma.5.106.88)

सौवर्णकंकतिकां च फलानि विविधानि च । स्वदक्षिणादिवस्त्रांतं स्पर्शयित्वा पृथक्पृथक्

sauvarṇakaṁkatikāṁ ca phalāni vividhāni ca svadakṣiṇādivastrāṁtaṁ sparśayitvā pṛthakpṛthak

सोने की कंघी और विविध फल — अपने ही दान-वस्त्र आदि के साथ, इन सबको अलग-अलग स्पर्श कराकर —

श्लोक 89 (padma.5.106.89)

पार्वतीप्रीतिकामा सा पुरंध्रीभ्योऽखिलं ददौ । ज्वालामालाभिराकाशं दहंतमिव चानलम्

pārvatīprītikāmā sā puraṁdhrībhyo'khilaṁ dadau jvālāmālābhirākāśaṁ dahaṁtamiva cānalam

पार्वती की प्रसन्नता चाहती हुई उसने वह सब विवाहित स्त्रियों को दे दिया। फिर ज्वाला-मालाओं से मानो आकाश को जलाते हुए उस अग्नि के —

श्लोक 90 (padma.5.106.90)

त्रिःप्रदक्षिणमागत्य स्थित्वाग्नेः पुरतः सती । इदं प्राह तदा वाक्यं प्रांजलिः प्रहसन्मुखी

triḥpradakṣiṇamāgatya sthitvāgneḥ purataḥ satī idaṁ prāha tadā vākyaṁ prāṁjaliḥ prahasanmukhī

तीन बार प्रदक्षिणा करके, अग्नि के सामने खड़ी होकर उस सती ने हाथ जोड़कर, मुस्कुराते हुए मुख से यह वचन कहा।

श्लोक 91 (padma.5.106.91)

अव्ययोवाच- इंद्रादयो दिशांपाला मातर्मेदिनि भास्कर । धर्मादयः सुराः सर्वे शृणुध्वं मम भाषितम्

avyayovāca- iṁdrādayo diśāṁpālā mātarmedini bhāskara dharmādayaḥ surāḥ sarve śṛṇudhvaṁ mama bhāṣitam

अव्यया ने कहा— इंद्र आदि दिक्पालो, हे माता पृथ्वी, हे सूर्य, धर्म आदि सब देवताओ! मेरा वचन सुनिए।

श्लोक 92 (padma.5.106.92)

पाणिपीडनमारभ्य चैतदंतमहर्निशम् । वाङ्मनःकर्मभिर्भर्ता सेवितो यदि भक्तितः

pāṇipīḍanamārabhya caitadaṁtamaharniśam vāṅmanaḥkarmabhirbhartā sevito yadi bhaktitaḥ

विवाह से लेकर आज तक, दिन-रात, यदि मैंने वाणी-मन-कर्म से भक्तिपूर्वक पति की सेवा की हो —

श्लोक 93 (padma.5.106.93)

व्यभिचारो यथा न स्यादवस्थात्रितये मम । तेन सत्येन मे पत्या सार्द्धं यानं प्रयच्छत

vyabhicāro yathā na syādavasthātritaye mama tena satyena me patyā sārddhaṁ yānaṁ prayacchata

जिससे तीनों अवस्थाओं में मेरा कोई व्यभिचार न हुआ हो — उसी सत्य से मुझे मेरे पति के साथ जाने के लिए वाहन प्रदान कीजिए।

श्लोक 94 (padma.5.106.94)

इत्युक्त्वाथ स्वहस्ताग्रपुष्पकं द्रुतमाक्षिपत् । प्रविष्टा ज्वलनं दीप्तमथापश्यद्विमानकम्

ityuktvātha svahastāgrapuṣpakaṁ drutamākṣipat praviṣṭā jvalanaṁ dīptamathāpaśyadvimānakam

यह कहकर उसने अपने हाथ के अग्र भाग से फूल शीघ्र फेंक दिया। तब देदीप्यमान अग्नि में प्रवेश करके उसने एक विमान देखा —

श्लोक 95 (padma.5.106.95)

सूर्येण सममुत्कृष्टमप्सरोगीतशोभितम् । आरुरोह विमानं सा भर्त्रा साकं दिवं ययौ

sūryeṇa samamutkṛṣṭamapsarogītaśobhitam āruroha vimānaṁ sā bhartrā sākaṁ divaṁ yayau

सूर्य के समान उत्कृष्ट, अप्सराओं के गीतों से सुशोभित। वह उस विमान पर चढ़कर अपने पति के साथ स्वर्ग को गई।

श्लोक 96 (padma.5.106.96)

यमः प्राहाथ संपूज्य वनितां तां पतिव्रताम् । अक्षयः स्वर्ग एवेह न च पापं तवास्ति वै

yamaḥ prāhātha saṁpūjya vanitāṁ tāṁ pativratām akṣayaḥ svarga eveha na ca pāpaṁ tavāsti vai

तब यम ने उस पतिव्रता स्त्री की पूजा करके कहा — यहाँ केवल अक्षय स्वर्ग ही तुम्हारे लिए है, और तुम्हें अब कोई पाप नहीं है।

श्लोक 97 (padma.5.106.97)

कोटिद्वयसमास्तत्र नरके हंत पातकम् । मृष्टमेव न संदेहः किंतु पातकमेव च

koṭidvayasamāstatra narake haṁta pātakam mṛṣṭameva na saṁdehaḥ kiṁtu pātakameva ca

वहाँ दो करोड़ वर्षों के बराबर पाप था, वह अवश्य धुल गया, इसमें संदेह नहीं; परंतु एक पाप अभी भी शेष है —

श्लोक 98 (padma.5.106.98)

एकं शिवस्य दीपाज्यभक्षणेन समर्जितम् । न वापि नरके पातः श्वानजन्मशतं भवेत्

ekaṁ śivasya dīpājyabhakṣaṇena samarjitam na vāpi narake pātaḥ śvānajanmaśataṁ bhavet

शिव के दीपक का घी खाने से अर्जित। परंतु उससे नरक में गिरना नहीं होगा, केवल सौ बार कुत्ते का जन्म होगा।

श्लोक 99 (padma.5.106.99)

अव्ययोवाच- अग्निप्रवेशशुद्धानां पुनश्च नरकः कथम् । अग्निप्रवेशात्सर्वेषां पापानां नाशनं भवेत्

avyayovāca- agnipraveśaśuddhānāṁ punaśca narakaḥ katham agnipraveśātsarveṣāṁ pāpānāṁ nāśanaṁ bhavet

अव्यया ने कहा— अग्नि-प्रवेश से शुद्ध हुए को फिर से नरक कैसे हो सकता है? अग्नि-प्रवेश से तो सब पापों का नाश होना चाहिए।

श्लोक 100 (padma.5.106.100)

यम उवाच- शिवद्रव्यापहारस्य पातकं नैव नश्यति । इत्थमाहपुरा शंभुरन्येषां नाशनं भवेत्

yama uvāca- śivadravyāpahārasya pātakaṁ naiva naśyati itthamāhapurā śaṁbhuranyeṣāṁ nāśanaṁ bhavet

यम ने कहा— शिव-द्रव्य के अपहरण का पाप कभी नष्ट नहीं होता। शंभु ने स्वयं पहले ऐसा कहा था; अन्य पापों का नाश तो होता ही है।

श्लोक 101 (padma.5.106.101)

अथ स श्वानतामाप्य शताब्दं स्यात्ततः परम् । दधीचमंदिरं प्राप्तो मृत्योरास्य गतो हि सः

atha sa śvānatāmāpya śatābdaṁ syāttataḥ param dadhīcamaṁdiraṁ prāpto mṛtyorāsya gato hi saḥ

फिर वह सौ वर्ष कुत्ता बनकर रहा, और उसके बाद मृत्यु के मुख में पड़कर दधीचि के आश्रम पहुँचा।

श्लोक 102 (padma.5.106.102)

तस्य भित्तिसमीपे तु भस्मास्ते ह्यभिमंत्रितम् । भस्मनि श्वा पपाताथ ममार च गतो यमम्

tasya bhittisamīpe tu bhasmāste hyabhimaṁtritam bhasmani śvā papātātha mamāra ca gato yamam

उसकी दीवार के पास अभिमंत्रित भस्म रखी थी। उस भस्म पर वह कुत्ता गिर पड़ा, और मरकर यम के पास गया।

श्लोक 103 (padma.5.106.103)

यमः संपूज्यावनतो भवान्पुण्यतमो मुनिः । मद्गेहे भवतः स्थानं न योग्यं गम्यतां बहिः

yamaḥ saṁpūjyāvanato bhavānpuṇyatamo muniḥ madgehe bhavataḥ sthānaṁ na yogyaṁ gamyatāṁ bahiḥ

यम ने विनम्र होकर पूजा करते हुए कहा — आप एक परम पुण्यात्मा मुनि हैं। मेरे घर में आपका स्थान उचित नहीं है, बाहर जाइए।

श्लोक 104 (padma.5.106.104)

अथ गत्वा बहिस्तस्थौ सारमेयो यमोदितः । संतापावस्थितं तं च नारदो दृष्टवानमुम्

atha gatvā bahistasthau sārameyo yamoditaḥ saṁtāpāvasthitaṁ taṁ ca nārado dṛṣṭavānamum

तब वह श्वान यम के कहने पर बाहर जाकर ठहर गया। संताप में स्थित उसे नारद ने देखा।

श्लोक 105 (padma.5.106.105)

पप्रच्छ च किमर्थं त्वमिह तिष्ठसि दीप्तिमान् । शिवभस्मस्थितमृतं शैवं जाने महामते

papraccha ca kimarthaṁ tvamiha tiṣṭhasi dīptimān śivabhasmasthitamṛtaṁ śaivaṁ jāne mahāmate

उन्होंने पूछा — देदीप्यमान होते हुए भी तुम यहाँ क्यों ठहरे हो? यम ने कहा— मैं जानता हूँ, हे महामते! यह शिवभक्त, शिव-भस्म पर ही मरा है।

श्लोक 106 (padma.5.106.106)

शैवानां पापिनां चापि साहसेन तनुत्यजाम् । यमलोको न चास्तीति शिवाज्ञा शिवनोदिता

śaivānāṁ pāpināṁ cāpi sāhasena tanutyajām yamaloko na cāstīti śivājñā śivanoditā

शैवों के लिए, यहाँ तक कि पापियों के लिए भी, जो साहसपूर्वक शरीर त्यागते हैं, यमलोक नहीं होता — यह शिव की ही आज्ञा है, शिव द्वारा कही गई।

श्लोक 107 (padma.5.106.107)

दधीच उवाच- इत्थमाभाष्य तं श्वानं कैलासमगमन्मुनिः । दंडवत्प्रणिपत्येशं व्यज्ञापयदथो हरम्

dadhīca uvāca- itthamābhāṣya taṁ śvānaṁ kailāsamagamanmuniḥ daṁḍavatpraṇipatyeśaṁ vyajñāpayadatho haram

दधीचि ने कहा— इस प्रकार उस कुत्ते से बात करके मुनि कैलास गए, और दंडवत प्रणाम करके शिव को यह सूचित किया।

श्लोक 108 (padma.5.106.108)

देव कश्चिद्यमपुराद्बहिरास्ते स कुक्कुरः । भस्मन्येव मृतस्तद्वद्भवलोकं स चार्हति

deva kaścidyamapurādbahirāste sa kukkuraḥ bhasmanyeva mṛtastadvadbhavalokaṁ sa cārhati

हे देव! यमपुरी के बाहर एक कुत्ता ठहरा हुआ है, जो भस्म पर ही मरा है; उसी प्रकार वह आपके लोक के योग्य है।

श्लोक 109 (padma.5.106.109)

अथ मुख्यगणाविष्टो वीरभद्रः शिवेरितः । आनयामास तं श्वानं दिव्यरूपधरं तदा

atha mukhyagaṇāviṣṭo vīrabhadraḥ śiveritaḥ ānayāmāsa taṁ śvānaṁ divyarūpadharaṁ tadā

तब शिव द्वारा भेजे गए मुख्यगण वीरभद्र उस कुत्ते को दिव्य रूप धारण कराकर ले आए।

श्लोक 110 (padma.5.106.110)

महेशपादप्रणतं देवायाथ व्यजिज्ञपत् । आह माहेश्वरो देवं गणमेनं कुरुष्व मे

maheśapādapraṇataṁ devāyātha vyajijñapat āha māheśvaro devaṁ gaṇamenaṁ kuruṣva me

महेश के चरणों में झुकाकर उन्होंने देव को सूचित किया। दधीचि ने देव से कहा— इसे अपना गण बना लीजिए।

श्लोक 111 (padma.5.106.111)

तथेति च शिवः प्राह गणः श्वानमुखोऽभवत् । दधीच उवाच-। अतुल्यं भस्ममाहात्म्यं मयोक्तं ते शुचिस्मिते

tatheti ca śivaḥ prāha gaṇaḥ śvānamukho'bhavat dadhīca uvāca- atulyaṁ bhasmamāhātmyaṁ mayoktaṁ te śucismite

शिव ने 'ऐसा ही हो' कहा, और वह श्वान-मुख गण बन गया। दधीचि ने कहा— हे शुचिस्मिते! मैंने तुम्हें भस्म की यह अतुल महिमा बताई।

श्लोक 112 (padma.5.106.112)

इतः परं हि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि सुव्रते

itaḥ paraṁ hi kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi suvrate

इससे आगे और क्या सुनना चाहती हो, हे सुव्रते?

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