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पाताल खण्ड · अध्याय 105

नारायणपुर की यात्रा और भस्म-महिमा

अध्याय 104अध्याय-सूचीअध्याय 106

श्लोक 1 (padma.5.105.1)

मुनय ऊचुः - अतःपरं महाभागः किं चकार स राघवः । मुनयश्च महात्मानः किमकुर्वंस्ततः परम्

munaya ūcuḥ - ataḥparaṁ mahābhāgaḥ kiṁ cakāra sa rāghavaḥ munayaśca mahātmānaḥ kimakurvaṁstataḥ param

मुनियों ने कहा— हे महाभाग! इसके बाद उस राघव ने और क्या किया? महात्मा मुनियों ने फिर क्या किया?

श्लोक 2 (padma.5.105.2)

सूत उवाच- रामचंद्रे सुखासीने विभीषणे कपीश्वरे । शंभुमूचुर्मुनिवराः कथां पुण्यां वदस्व नः

sūta uvāca- rāmacaṁdre sukhāsīne vibhīṣaṇe kapīśvare śaṁbhumūcurmunivarāḥ kathāṁ puṇyāṁ vadasva naḥ

सूत ने कहा— रामचंद्र के सुखपूर्वक बैठे रहने पर, विभीषण और वानरराज के समक्ष, श्रेष्ठ मुनियों ने शंभु से कहा— हमें पुण्यकथा सुनाइए।

श्लोक 3 (padma.5.105.3)

तेषामाकर्ण्य वचनं पार्वतीमाह शंकरः । इदं कस्यापि विप्रस्य गृहं परमशोभनम्

teṣāmākarṇya vacanaṁ pārvatīmāha śaṁkaraḥ idaṁ kasyāpi viprasya gṛhaṁ paramaśobhanam

उनका वचन सुनकर शंकर ने पार्वती से कहा— यह किसी ब्राह्मण का अत्यंत सुंदर घर है।

श्लोक 4 (padma.5.105.4)

रम्योपवनवापीभिर्वीरुद्भिरुपशोभितम् । कूजन्मधुकरश्रेण्या आहूतकुसुमायुधम्

ramyopavanavāpībhirvīrudbhirupaśobhitam kūjanmadhukaraśreṇyā āhūtakusumāyudham

रमणीय उपवनों और बावड़ियों से, लताओं से सुशोभित, गुंजार करते भ्रमर-पंक्तियों से मानो कामदेव को आमंत्रित करने वाला —

श्लोक 5 (padma.5.105.5)

मध्याह्नसंध्यामारोढुमिव सूर्यः प्रवर्त्तते । छायावापीजलस्नातौ परिधाय सुवाससी

madhyāhnasaṁdhyāmāroḍhumiva sūryaḥ pravarttate chāyāvāpījalasnātau paridhāya suvāsasī

मध्याह्न-संध्या में चढ़ने के लिए मानो सूर्य यहीं प्रवृत्त होता है। छाया-बावड़ी के जल में स्नान करके, सुंदर वस्त्र धारण करके —

श्लोक 6 (padma.5.105.6)

मृगनाभिसमुद्घृष्टघनसारसुचंदनम् । आलिप्य सल्लकीदामदृढधम्मिल्लसंयुतौ

mṛganābhisamudghṛṣṭaghanasārasucaṁdanam ālipya sallakīdāmadṛḍhadhammillasaṁyutau

कस्तूरी से घिसे हुए घने चंदन का लेप लगाकर, सल्लकी की माला और दृढ़ जूड़े से युक्त होकर —

श्लोक 7 (padma.5.105.7)

अनल्पघनसारं तु तांबूलं प्रतिखादितम् । आस्वाद्य माद्यन्मुदितौ यत्र धारागृहे शुभे

analpaghanasāraṁ tu tāṁbūlaṁ pratikhāditam āsvādya mādyanmuditau yatra dhārāgṛhe śubhe

बहुत-सा कपूरयुक्त ताम्बूल चबाकर, उसका स्वाद लेते हुए प्रसन्न होकर, जहाँ शुभ धारागृह में —

श्लोक 8 (padma.5.105.8)

मयूरनादबहुले बहिर्मधुरगीतकैः । शय्यायामास्तृतायां च परस्परसुखस्थितौ

mayūranādabahule bahirmadhuragītakaiḥ śayyāyāmāstṛtāyāṁ ca parasparasukhasthitau

मयूरों की बोली से भरे, बाहर मधुर गीतों से युक्त, बिछी हुई शय्या पर परस्पर सुख में स्थित —

श्लोक 9 (padma.5.105.9)

विशालस्मितरक्तोष्ठमाननं चुंबितं यदि । संसारफलमाघ्रातमावयोस्तु भविष्यति

viśālasmitaraktoṣṭhamānanaṁ cuṁbitaṁ yadi saṁsāraphalamāghrātamāvayostu bhaviṣyati

यदि विशाल मुस्कान वाला, लाल अधरों वाला मुख चूमा जाए, तो हम दोनों को संसार का फल प्राप्त मान लेना चाहिए।

श्लोक 10 (padma.5.105.10)

इतीरितमथ श्रुत्वा कुपिता मुनयस्तु ते । उक्तं वा सुशुभं वाक्यमस्मासु किमिदं त्वया

itīritamatha śrutvā kupitā munayastu te uktaṁ vā suśubhaṁ vākyamasmāsu kimidaṁ tvayā

यह सुनकर वे मुनि क्रोधित हो गए— क्या यह हमारे प्रति कोई शुभ वचन कहा गया?

श्लोक 11 (padma.5.105.11)

विप्रलापः प्रियासक्तेः कृतो नोस्मद्वचः कृतम् । अथ कोपपराच्छंभोराननात्परमाद्भुता

vipralāpaḥ priyāsakteḥ kṛto nosmadvacaḥ kṛtam atha kopaparācchaṁbhorānanātparamādbhutā

यह तो प्रियासक्ति का प्रलाप है, हमारे प्रति कहा गया वचन नहीं है। तब क्रोधवश शंभु के मुख से एक अत्यंत अद्भुत —

श्लोक 12 (padma.5.105.12)

ज्वाला विनिर्गता सापि करालवदनाभवत् । कस्यचित्तु मुनेर्भार्यामाससादाथ सत्वरम्

jvālā vinirgatā sāpi karālavadanābhavat kasyacittu munerbhāryāmāsasādātha satvaram

ज्वाला निकली, जो विकराल मुख वाली हो गई। वह शीघ्र ही किसी मुनि की पत्नी के पास जा पहुँची —

श्लोक 13 (padma.5.105.13)

पलायनपरा चासीद्रामं दृष्ट्वा च बिभ्यती । रामोऽपि ब्राह्मणीं शुद्धां मोचयामीत्यभाषत

palāyanaparā cāsīdrāmaṁ dṛṣṭvā ca bibhyatī rāmo'pi brāhmaṇīṁ śuddhāṁ mocayāmītyabhāṣata

वह भागने लगी, राम को देखकर भयभीत हुई। राम ने भी कहा — मैं इस शुद्ध ब्राह्मणी को मुक्त कराऊँगा।

श्लोक 14 (padma.5.105.14)

जगाम पुष्पकेणैव ब्रुवन्मुक्तिं पुनः पुनः । बाणं च धनुषा योक्तुं न च सस्मार राघवः

jagāma puṣpakeṇaiva bruvanmuktiṁ punaḥ punaḥ bāṇaṁ ca dhanuṣā yoktuṁ na ca sasmāra rāghavaḥ

पुष्पक विमान से ही बार-बार मुक्ति की बात कहते हुए वे चल पड़े, परंतु राघव ने धनुष से बाण जोड़ने का स्मरण नहीं किया।

श्लोक 15 (padma.5.105.15)

शंभुरप्यतिपुण्यानि वनान्यायतनानि च । पुराणि च विचित्राणि दृष्ट्वा रामं न चास्मरत्

śaṁbhurapyatipuṇyāni vanānyāyatanāni ca purāṇi ca vicitrāṇi dṛṣṭvā rāmaṁ na cāsmarat

शंभु भी अत्यंत पुण्यमय वनों, मंदिरों और विचित्र नगरों को देखते हुए राम का स्मरण नहीं कर सके।

श्लोक 16 (padma.5.105.16)

क्षणेन च तदा प्राप्तो लोकालोकं महागिरिम् । दृष्ट्वाथ राघवः शैलं गृहमार्गसमाकुलम्

kṣaṇena ca tadā prāpto lokālokaṁ mahāgirim dṛṣṭvātha rāghavaḥ śailaṁ gṛhamārgasamākulam

तभी क्षणभर में वे लोकालोक नामक महापर्वत पर पहुँच गए। राघव ने उस पर्वत को घरों के मार्गों से भरा देखा —

श्लोक 17 (padma.5.105.17)

विप्रयोषिन्महाभागा क्व गता वदत द्विजाः । इतो गतेति ते प्रोचुस्तमोभागं गिरेरिति

viprayoṣinmahābhāgā kva gatā vadata dvijāḥ ito gateti te procustamobhāgaṁ gireriti

हे द्विजो! वह महाभाग्यशाली ब्राह्मणी कहाँ गई, बताओ। उन्होंने कहा— वह इस पर्वत के अंधकार-भाग की ओर गई है।

श्लोक 18 (padma.5.105.18)

रामो विवर्णवदनः कष्टमित्यभिचिंतयन् । अथ शंभुर्महातेजाः प्रकाशमतुलं ददौ

rāmo vivarṇavadanaḥ kaṣṭamityabhiciṁtayan atha śaṁbhurmahātejāḥ prakāśamatulaṁ dadau

मुख फीका पड़ा राम 'यह कष्ट है' सोचने लगे। तब महातेजस्वी शंभु ने अतुल प्रकाश दिया।

श्लोक 19 (padma.5.105.19)

तत्प्रकाशप्रभावेण रामः कृत्यां ययावनु । तमोमयी महाभूमिः सर्वजंतुविवर्जिता

tatprakāśaprabhāveṇa rāmaḥ kṛtyāṁ yayāvanu tamomayī mahābhūmiḥ sarvajaṁtuvivarjitā

उस प्रकाश के प्रभाव से राम उस कृत्या के पीछे गए। वह अंधकारमयी महाभूमि सब प्राणियों से रहित थी —

श्लोक 20 (padma.5.105.20)

आब्रह्मांडकटाहांता शतयोजनकोटितः । महारजतभूमिश्च तमोमध्ये व्यवस्थिता

ābrahmāṁḍakaṭāhāṁtā śatayojanakoṭitaḥ mahārajatabhūmiśca tamomadhye vyavasthitā

ब्रह्मांड के कटाह तक, सौ करोड़ योजनों तक; और उस अंधकार के बीच एक महारजत (चाँदी) की भूमि स्थित थी।

श्लोक 21 (padma.5.105.21)

तत्र नारायणपुरं सूर्यकोटिसमप्रभम् । स राम मुनिवर्यास्तु तं दृष्ट्वा विस्मयं ययुः

tatra nārāyaṇapuraṁ sūryakoṭisamaprabham sa rāma munivaryāstu taṁ dṛṣṭvā vismayaṁ yayuḥ

वहाँ करोड़ों सूर्यों के समान कांति वाला नारायणपुर था। हे राम! उसे देखकर मुनिवर्य विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 22 (padma.5.105.22)

किमेतदिति चाचिंत्य नः प्रवेशः कथं भवेत् । किमेष प्रलयाग्निः स्यान्मायया परमात्मनः

kimetaditi cāciṁtya naḥ praveśaḥ kathaṁ bhavet kimeṣa pralayāgniḥ syānmāyayā paramātmanaḥ

'यह क्या है?' — यह सोचकर वे चिंतित हुए, हमारा प्रवेश कैसे हो? क्या यह परमात्मा की माया से उत्पन्न प्रलय-अग्नि है?

श्लोक 23 (padma.5.105.23)

किंवा नो मरणं त्वद्य उत श्रेयो भविष्यति । इति चिंताकुलेष्वेव स रामेषु मुनिष्वथ

kiṁvā no maraṇaṁ tvadya uta śreyo bhaviṣyati iti ciṁtākuleṣveva sa rāmeṣu muniṣvatha

या क्या आज हमारी मृत्यु होगी, या कोई कल्याण होगा? इस प्रकार राम सहित मुनि चिंता में व्याकुल हो गए।

श्लोक 24 (padma.5.105.24)

शंभुराह शृणुष्वाद्य राघवैतद्वदामि ते । प्रकल्पिता मया माया त्वत्कृते नैतदद्भुतम्

śaṁbhurāha śṛṇuṣvādya rāghavaitadvadāmi te prakalpitā mayā māyā tvatkṛte naitadadbhutam

शंभु ने कहा— हे राघव! अब सुनो, मैं तुम्हें यह बताता हूँ। यह माया मैंने तुम्हारे लिए ही रची है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

श्लोक 25 (padma.5.105.25)

नारायणीयमेतत्तु परमं धाम भास्वरम् । उष्णशीताद्यविच्छेद्यं ज्ञानगम्यं न चाक्षुषम्

nārāyaṇīyametattu paramaṁ dhāma bhāsvaram uṣṇaśītādyavicchedyaṁ jñānagamyaṁ na cākṣuṣam

यह नारायण का ही यह परम देदीप्यमान धाम है, सर्दी-गर्मी आदि से अछेद्य, ज्ञान से गम्य, नेत्रों से नहीं।

श्लोक 26 (padma.5.105.26)

तत्तु पूजयतश्चोर्ध्वं पश्य ब्रह्मपुरोगमान् । दिक्षु सर्वासु च मुनीन्पश्य पूजयतोऽमलान्

tattu pūjayataścordhvaṁ paśya brahmapurogamān dikṣu sarvāsu ca munīnpaśya pūjayato'malān

इसकी पूजा करते हुए ऊपर ब्रह्मा आदि को देखो; सब दिशाओं में निर्मल मुनियों को पूजा करते हुए देखो।

श्लोक 27 (padma.5.105.27)

चतुरो निगमान्पश्य स्तुवतः परमं पदम् । योगिनः सनकाद्यास्तु योगमास्थाय यत्नतः

caturo nigamānpaśya stuvataḥ paramaṁ padam yoginaḥ sanakādyāstu yogamāsthāya yatnataḥ

चारों वेदों को उस परम पद की स्तुति करते देखो; सनक आदि योगीजन यत्नपूर्वक योग में स्थित होकर —

श्लोक 28 (padma.5.105.28)

ध्यायंति परमं तेजस्तदिदं पश्य राघव । अमुं च रोमशं पश्य प्रदक्षिणनमस्क्रियाः

dhyāyaṁti paramaṁ tejastadidaṁ paśya rāghava amuṁ ca romaśaṁ paśya pradakṣiṇanamaskriyāḥ

उस परम तेज का ध्यान करते हैं — हे राघव! यह देखो। और इस रोमश मुनि को देखो, प्रदक्षिणा और नमस्कार करते हुए —

श्लोक 29 (padma.5.105.29)

कुर्वाणं कोटिकोटीश्च वालखिल्यान्मुनीश्वरान् । लक्ष्म्यादिसर्ववनिता पूज्यमानं परं पदम्

kurvāṇaṁ koṭikoṭīśca vālakhilyānmunīśvarān lakṣmyādisarvavanitā pūjyamānaṁ paraṁ padam

करोड़ों-करोड़ों वालखिल्य मुनीश्वरों को, लक्ष्मी आदि सब देवियों द्वारा पूजित उस परम पद को देखो —

श्लोक 30 (padma.5.105.30)

साकारं च निराकारं ब्रह्म यत्परिकीर्तितम् । अज्ञानिनो न पश्यंति पश्यंति ज्ञानचक्षुषः

sākāraṁ ca nirākāraṁ brahma yatparikīrtitam ajñānino na paśyaṁti paśyaṁti jñānacakṣuṣaḥ

जो साकार और निराकार दोनों रूपों में ब्रह्म कहा गया है। अज्ञानी इसे नहीं देखते, ज्ञान-चक्षु वाले ही इसे देखते हैं।

श्लोक 31 (padma.5.105.31)

शंभुवाक्यादतः सर्वे पूजयामासुरच्युतम् । गिरिकर्णीं च तुलसीं मल्लिकां मारुतं तथा

śaṁbhuvākyādataḥ sarve pūjayāmāsuracyutam girikarṇīṁ ca tulasīṁ mallikāṁ mārutaṁ tathā

शंभु के इस वचन से तब सबने अच्युत की पूजा की — गिरिकर्णी, तुलसी, चमेली और वायु से,

श्लोक 32 (padma.5.105.32)

नीलोत्पलैरंबुजैश्च कृष्णास्फुटजलैरपि । पूजयंतो महात्मानो महात्मानं जनार्दनम्

nīlotpalairaṁbujaiśca kṛṣṇāsphuṭajalairapi pūjayaṁto mahātmāno mahātmānaṁ janārdanam

नीलकमलों, कमलों और स्वच्छ जल से भी — उन महात्माओं ने महात्मा जनार्दन की पूजा करते हुए —

श्लोक 33 (padma.5.105.33)

नारदं खेऽथ ददृशुर्जटिलं सविपंचिकम् । नारायणपदाघोषं लंबकूर्चोपवीतिनम्

nāradaṁ khe'tha dadṛśurjaṭilaṁ savipaṁcikam nārāyaṇapadāghoṣaṁ laṁbakūrcopavītinam

आकाश में नारद को जटाधारी, वीणा सहित देखा, जो नारायण के नाम का उच्चारण करते हुए, लटकती दाढ़ी और यज्ञोपवीत से युक्त थे।

श्लोक 34 (padma.5.105.34)

स चापि मनसा दध्यौ क एष इति नारदः । स पपात प्रभोः पादे शंभोरानंदनिर्भरः

sa cāpi manasā dadhyau ka eṣa iti nāradaḥ sa papāta prabhoḥ pāde śaṁbhorānaṁdanirbharaḥ

नारद ने भी मन में सोचा — यह कौन है? वे आनंद से भरकर प्रभु शंभु के चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 35 (padma.5.105.35)

शैवीं पंचाक्षरीं विद्यां जजाप मनसा मुनिः । धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि जन्माद्यसफलं मम

śaivīṁ paṁcākṣarīṁ vidyāṁ jajāpa manasā muniḥ dhanyo'smyanugṛhīto'smi janmādyasaphalaṁ mama

उस मुनि ने मन ही मन शैव पंचाक्षरी विद्या का जप किया— मैं धन्य हूँ, अनुगृहीत हूँ, मेरा जन्मादि सफल हुआ।

श्लोक 36 (padma.5.105.36)

ब्रह्मादिवंद्यं चागम्यं ज्ञातवानस्मि ते पदम् । नारदं तमथ प्राह शंभुर्मैवं वदेति हि

brahmādivaṁdyaṁ cāgamyaṁ jñātavānasmi te padam nāradaṁ tamatha prāha śaṁbhurmaivaṁ vadeti hi

ब्रह्मा आदि द्वारा वंदित, अगम्य आपके पद को मैंने जान लिया। तब शंभु ने नारद से कहा — ऐसा मत कहो।

श्लोक 37 (padma.5.105.37)

यथा च मां न जानंति तथा मे कुरु वर्तनम् । गच्छ शीघ्रं हरिं ब्रूहि ममागमनमल्पतः

yathā ca māṁ na jānaṁti tathā me kuru vartanam gaccha śīghraṁ hariṁ brūhi mamāgamanamalpataḥ

जैसे लोग मुझे नहीं जानते, वैसा ही मेरा व्यवहार करो। शीघ्र जाकर हरि से मेरे आगमन के बारे में थोड़ा-सा कह दो।

श्लोक 38 (padma.5.105.38)

अथ स त्वरया गत्वा सर्वं व्यज्ञापयद्धरिम् । अथ सत्वरया विष्णोरादायार्घोदकं शुभम्

atha sa tvarayā gatvā sarvaṁ vyajñāpayaddharim atha satvarayā viṣṇorādāyārghodakaṁ śubham

तब वह शीघ्रता से जाकर हरि को सब कुछ बता आया। तब विष्णु ने शुभ अर्घ्य-जल लेकर शीघ्रता से —

श्लोक 39 (padma.5.105.39)

कमलासहितो योगी कोटिकोटिसमावृतः । निर्ययौ नारदं हस्ते गृहीत्वा गरुडध्वजः

kamalāsahito yogī koṭikoṭisamāvṛtaḥ niryayau nāradaṁ haste gṛhītvā garuḍadhvajaḥ

लक्ष्मी सहित, करोड़ों-करोड़ों से घिरे उस योगी गरुड़ध्वज ने नारद का हाथ पकड़कर बाहर निकले —

श्लोक 40 (padma.5.105.40)

नमोनमो नमोस्त्वस्मै शंकरायेत्युदीरयन् । अर्घपाद्यादिना सर्वान्पूजयामास केशवः

namonamo namostvasmai śaṁkarāyetyudīrayan arghapādyādinā sarvānpūjayāmāsa keśavaḥ

'शंकर को नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार हो' यह कहते हुए केशव ने अर्घ्य-पाद्य आदि से सबकी पूजा की।

श्लोक 41 (padma.5.105.41)

प्रावेशयदमेयात्मा नारायणपुरं शुभम् । गृहराजे ततः स्थित्वा नारायण उवाच ह

prāveśayadameyātmā nārāyaṇapuraṁ śubham gṛharāje tataḥ sthitvā nārāyaṇa uvāca ha

उस अमेय आत्मा ने उन्हें शुभ नारायणपुर में प्रवेश कराया। फिर राजमहल में स्थित होकर नारायण ने कहा —

श्लोक 42 (padma.5.105.42)

कथमेते समायाताः कोऽयं राजा महायशाः । अमानुषप्रवेशोऽयं ब्रह्माद्यैरप्यगोचरः

kathamete samāyātāḥ ko'yaṁ rājā mahāyaśāḥ amānuṣapraveśo'yaṁ brahmādyairapyagocaraḥ

ये कैसे आ पहुँचे? यह महायशस्वी राजा कौन है? यह मनुष्यों का अगम्य प्रवेश-स्थान तो ब्रह्मा आदि के लिए भी अगोचर है।

श्लोक 43 (padma.5.105.43)

शंभुरुवाच- मुनिवेषा यथा प्राप्ता वयमेते नृपस्तथा । तवांशो नृपतिश्चायं रामचंद्रः प्रतापवान्

śaṁbhuruvāca- muniveṣā yathā prāptā vayamete nṛpastathā tavāṁśo nṛpatiścāyaṁ rāmacaṁdraḥ pratāpavān

शंभु ने कहा— जैसे हम मुनि-वेष में आए, वैसे ही यह राजा भी है। यह आपका ही अंश है, प्रतापी राजा रामचंद्र।

श्लोक 44 (padma.5.105.44)

एनां संवीक्षितुं पत्नीं तव केशव कांक्षति । नारायणस्तथेत्युक्त्वा प्रविशेत्याह राघवम्

enāṁ saṁvīkṣituṁ patnīṁ tava keśava kāṁkṣati nārāyaṇastathetyuktvā praviśetyāha rāghavam

यह आपकी पत्नी को देखने की इच्छा रखता है, हे केशव! नारायण ने 'ऐसा ही हो' कहकर राघव को प्रवेश करने को कहा।

श्लोक 45 (padma.5.105.45)

अथ प्रविश्य भवनं लक्ष्मीं वीक्ष्य नमस्य च । विनयावनतो भूत्वा वाचमाह सुचारिणीम्

atha praviśya bhavanaṁ lakṣmīṁ vīkṣya namasya ca vinayāvanato bhūtvā vācamāha sucāriṇīm

तब भवन में प्रवेश करके, लक्ष्मी को देखकर और नमस्कार करके, विनयावनत होकर उसने सुंदर वाणी कही।

श्लोक 46 (padma.5.105.46)

कृतार्थोऽस्मि न संदेहो वद त्वं किं तु मन्यसे । श्रीदेव्युवाच- त्वं युवा कामकृष्टश्च रूपवानसि राघव

kṛtārtho'smi na saṁdeho vada tvaṁ kiṁ tu manyase śrīdevyuvāca- tvaṁ yuvā kāmakṛṣṭaśca rūpavānasi rāghava

मैं कृतार्थ हुआ, इसमें संदेह नहीं; आप कहिए, आप क्या मानती हैं? श्रीदेवी ने कहा— हे राघव! आप युवा, काम से आकृष्ट और रूपवान हैं।

श्लोक 47 (padma.5.105.47)

सीता सा चारुसर्वांगी तव पत्नी तया भवान् । वियुक्तोऽस्ति पुरा चासीदतीव विरहाकुलः

sītā sā cārusarvāṁgī tava patnī tayā bhavān viyukto'sti purā cāsīdatīva virahākulaḥ

वह सुंदर-अंग सीता आपकी पत्नी है; उससे आप पहले वियुक्त हुए थे और अत्यंत विरह से व्याकुल थे।

श्लोक 48 (padma.5.105.48)

ममापि वद सर्वं तदथवा न च लप्स्यसि । सहासान्यथ वाक्यानि यूनां चित्तहराणि च

mamāpi vada sarvaṁ tadathavā na ca lapsyasi sahāsānyatha vākyāni yūnāṁ cittaharāṇi ca

मुझसे भी सब कहिए, अन्यथा आप नहीं पाएँगे — इस प्रकार मुस्कुराते हुए युवाओं के चित्त को हरने वाले वचन कहे।

श्लोक 49 (padma.5.105.49)

श्रुत्वा तु तानि सर्वाणि रामभद्रो यतात्मवान् । निर्गंतुं कांक्षते तत्र आनम्य तन्मुखांबुजम्

śrutvā tu tāni sarvāṇi rāmabhadro yatātmavān nirgaṁtuṁ kāṁkṣate tatra ānamya tanmukhāṁbujam

वे सब सुनकर संयमी रामभद्र वहाँ से निकलना चाहने लगे; उस मुखकमल को प्रणाम करके —

श्लोक 50 (padma.5.105.50)

स्मरबाणेन पद्मेन संपीड्य रघुशेखरम् । अन्वेव निर्ययौ देवी पद्मा पद्मवनप्रिया

smarabāṇena padmena saṁpīḍya raghuśekharam anveva niryayau devī padmā padmavanapriyā

मानो कामदेव के कमल-बाण से रघुशेखर को पीड़ित करके, देवी पद्मा, कमल-वन को प्रिय, उसके पीछे-पीछे निकल पड़ीं।

श्लोक 51 (padma.5.105.51)

एकपत्नीव्रतं ज्ञात्वा रामं ते समुपागमन् । अथवेपितसर्वांगं स्खलत्पदगतिं नृपम्

ekapatnīvrataṁ jñātvā rāmaṁ te samupāgaman athavepitasarvāṁgaṁ skhalatpadagatiṁ nṛpam

एक-पत्नी-व्रत जानकर वे सब राम के पास आ पहुँचे — काँपते हुए सारे अंगों वाले, लड़खड़ाते पैरों वाले राजा को —

श्लोक 52 (padma.5.105.52)

शिवनारायणौ दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतौ । अहोऽस्य द्रढिमाचित्ते मायिनोऽप्य वशात्मनः

śivanārāyaṇau dṛṣṭvā vismayaṁ paramaṁ gatau aho'sya draḍhimācitte māyino'pya vaśātmanaḥ

देखकर शिव और नारायण दोनों परम विस्मय को प्राप्त हुए — आह! इस मायावी के भी वश में न आने वाले चित्त की यह दृढ़ता देखिए।

श्लोक 53 (padma.5.105.53)

धैर्यं पश्येह नियतं तेन रामः सुकीर्तिमान् । सर्वतः शिवमेवास्य नाशिवं विद्यते क्वचित्

dhairyaṁ paśyeha niyataṁ tena rāmaḥ sukīrtimān sarvataḥ śivamevāsya nāśivaṁ vidyate kvacit

यहाँ यह धैर्य निश्चय ही देखिए, जिससे राम सुकीर्तिमान हैं। इसमें सब ओर से मंगल ही मंगल है, कहीं भी अमंगल नहीं है।

श्लोक 54 (padma.5.105.54)

अथ रामो वचः प्राह गच्छेहं भगवन्प्रभो । अनुज्ञातोऽथ हरिणा पुष्पकेण स राघवः

atha rāmo vacaḥ prāha gacchehaṁ bhagavanprabho anujñāto'tha hariṇā puṣpakeṇa sa rāghavaḥ

तब राम ने कहा— हे भगवन् प्रभो! मैं जाता हूँ। तब हरि द्वारा अनुमति दिए जाने पर वह राघव पुष्पक विमान से —

श्लोक 55 (padma.5.105.55)

स मुनिः सहशंभुश्च सहनारायणो ययौ । लोकालोकं गतः शीघ्रं ततः स्वादूदधिं गतः

sa muniḥ sahaśaṁbhuśca sahanārāyaṇo yayau lokālokaṁ gataḥ śīghraṁ tataḥ svādūdadhiṁ gataḥ

वह मुनि (शंभु) नारायण सहित चला। लोकालोक को शीघ्र पार करके फिर स्वादु-सागर को गए।

श्लोक 56 (padma.5.105.56)

ततो द्वीपसमुद्रांश्च जंबूद्वीपं पुनर्गतः । भरद्वाजाश्रमपदे तस्थिवान्गौतमीतटे

tato dvīpasamudrāṁśca jaṁbūdvīpaṁ punargataḥ bharadvājāśramapade tasthivāngautamītaṭe

फिर द्वीपों-समुद्रों को पार करके पुनः जंबूद्वीप को गए, और गौतमी (गोदावरी) के तट पर भरद्वाज के आश्रम-स्थल पर ठहरे।

श्लोक 57 (padma.5.105.57)

अथ स्नात्वा महानद्यां भरद्वाजो मुनीश्वरः । शिष्यैः श्रीमान्परिवृतः पुष्पकं दृष्टवान्मुनिः

atha snātvā mahānadyāṁ bharadvājo munīśvaraḥ śiṣyaiḥ śrīmānparivṛtaḥ puṣpakaṁ dṛṣṭavānmuniḥ

तब महानदी में स्नान करके, मुनीश्वर भरद्वाज, श्रीमान, शिष्यों से घिरे उस मुनि ने पुष्पक विमान देखा।

श्लोक 58 (padma.5.105.58)

तत्र रामं महाबाहुं शिवनारायणावृषीन् । यथावत्पूजयित्वा तु तानुवाच महामुनिः

tatra rāmaṁ mahābāhuṁ śivanārāyaṇāvṛṣīn yathāvatpūjayitvā tu tānuvāca mahāmuniḥ

वहाँ महाबाहु राम, शिव और नारायण तथा ऋषियों को यथोचित पूजा करके, उस महामुनि ने उनसे कहा।

श्लोक 59 (padma.5.105.59)

ममाश्रमपदे यूयं भोक्तुमर्हथ सत्तमाः । रामस्तु मन्वाक्येन तथेत्याह कथंचन

mamāśramapade yūyaṁ bhoktumarhatha sattamāḥ rāmastu manvākyena tathetyāha kathaṁcana

हे सत्तमो! आप मेरे आश्रम-स्थल में भोजन करने योग्य हैं। राम ने भी मान्य वचन से किसी प्रकार 'हाँ' कहा।

श्लोक 60 (padma.5.105.60)

अथ स्नात्वा महानद्यां कृत्वा देवादितर्पणम् । भोक्तुकामं तदा रामं वसिष्ठो वाक्यमुक्तवान्

atha snātvā mahānadyāṁ kṛtvā devāditarpaṇam bhoktukāmaṁ tadā rāmaṁ vasiṣṭho vākyamuktavān

फिर महानदी में स्नान करके, देवताओं आदि का तर्पण करके, भोजन की इच्छा रखते हुए राम से वसिष्ठ ने यह वचन कहा।

श्लोक 61 (padma.5.105.61)

धर्मत्यागो भवेद्राम न श्राद्धं क्रियते यदि । श्रीराम उवाच- अमायां ग्रहणे तीर्थे व्यतीपातेऽथ संक्रमे

dharmatyāgo bhavedrāma na śrāddhaṁ kriyate yadi śrīrāma uvāca- amāyāṁ grahaṇe tīrthe vyatīpāte'tha saṁkrame

हे राम! यदि श्राद्ध नहीं किया जाए तो धर्म-त्याग होता है। श्रीराम ने कहा— अमावस्या पर, ग्रहण पर, तीर्थ पर, व्यतीपात पर, संक्रांति पर —

श्लोक 62 (padma.5.105.62)

व्यतीतं यदि चेच्छ्राद्धं भगवन्क्रियते पुनः । नित्यश्राद्धं पुनर्नैव कुर्यादिति वचस्तव

vyatītaṁ yadi cecchrāddhaṁ bhagavankriyate punaḥ nityaśrāddhaṁ punarnaiva kuryāditi vacastava

यदि नित्य श्राद्ध पहले ही किया जा चुका हो, हे भगवन्! तो क्या वह फिर से किया जाए? आपका यह वचन है कि नित्य श्राद्ध पुनः न किया जाए।

श्लोक 63 (padma.5.105.63)

यथा ममैव मातॄणां मरणे समुपस्थिते । अशौचे च समायाते नित्यश्राद्धं न वै कृतम्

yathā mamaiva mātṝṇāṁ maraṇe samupasthite aśauce ca samāyāte nityaśrāddhaṁ na vai kṛtam

जैसे मेरी ही माताओं की मृत्यु होने पर और अशौच आने पर, मैंने नित्य-श्राद्ध नहीं किया —

श्लोक 64 (padma.5.105.64)

व्यतीपातादिकालेषु कृतं तु वचनात्तव । वसिष्ठ उवाच- एते हि मुनयः सर्वे तथा शंभुरयं द्विजः

vyatīpātādikāleṣu kṛtaṁ tu vacanāttava vasiṣṭha uvāca- ete hi munayaḥ sarve tathā śaṁbhurayaṁ dvijaḥ

व्यतीपात आदि कालों में आपके वचन के अनुसार ही किया। वसिष्ठ ने कहा— ये सभी मुनि और यह ब्राह्मण शंभु उपस्थित हैं —

श्लोक 65 (padma.5.105.65)

एतन्मुखादशेषेण निर्णयस्तु भविष्यति । सह सर्वे विनिश्चित्य मुनयः शंभुमब्रुवन्

etanmukhādaśeṣeṇa nirṇayastu bhaviṣyati saha sarve viniścitya munayaḥ śaṁbhumabruvan

इन्हीं के मुख से संपूर्ण निर्णय होगा। सब मुनियों ने साथ मिलकर निश्चय करके शंभु से कहा —

श्लोक 66 (padma.5.105.66)

वदास्माकमशेषं त्वं द्विजवर्य महानसि । शंभुरुवाच- त्यक्तव्यं यच्च वै श्राद्धं पुनः कर्तव्यमेव च

vadāsmākamaśeṣaṁ tvaṁ dvijavarya mahānasi śaṁbhuruvāca- tyaktavyaṁ yacca vai śrāddhaṁ punaḥ kartavyameva ca

आप हमें संपूर्ण बताइए, आप श्रेष्ठ द्विजों में महान हैं। शंभु ने कहा— जो श्राद्ध त्यागने योग्य है और जो पुनः करने ही योग्य है —

श्लोक 67 (padma.5.105.67)

सूतके समनुप्राप्ते विघ्नेषु च वदाम्यहम् । मासिकान्युदकुंभानि श्राद्धानि सकलानिच

sūtake samanuprāpte vighneṣu ca vadāmyaham māsikānyudakuṁbhāni śrāddhāni sakalānica

सूतक आ जाने पर और विघ्न आने पर, मैं कहता हूँ — मासिक जल-घट श्राद्ध और सब पूर्ण श्राद्ध —

श्लोक 68 (padma.5.105.68)

प्रतिसांवत्सरं श्राद्धं सूतकानंतरं विदुः । त्यक्तान्यन्यानि यावंति सूतके विघ्नसंभवे

pratisāṁvatsaraṁ śrāddhaṁ sūtakānaṁtaraṁ viduḥ tyaktānyanyāni yāvaṁti sūtake vighnasaṁbhave

वार्षिक श्राद्ध सूतक के बाद जानना चाहिए। सूतक में विघ्न आने पर जितने भी त्यागे गए हों —

श्लोक 69 (padma.5.105.69)

अनंतरं हि कार्याणि सर्वाणीति न संशयः । मासिकानि समस्तानि श्राद्धं प्रात्यब्दिकं तथा

anaṁtaraṁ hi kāryāṇi sarvāṇīti na saṁśayaḥ māsikāni samastāni śrāddhaṁ prātyabdikaṁ tathā

वे सब बाद में ही करने चाहिए, इसमें संदेह नहीं। सब मासिक श्राद्ध और वार्षिक श्राद्ध भी —

श्लोक 70 (padma.5.105.70)

सूतकानंतरं कार्यं विघ्नेऽन्यस्मिन्यतोन्यथा । एकादश्यां कृष्णपक्षे कर्तव्यं शुभमिच्छता

sūtakānaṁtaraṁ kāryaṁ vighne'nyasminyatonyathā ekādaśyāṁ kṛṣṇapakṣe kartavyaṁ śubhamicchatā

सूतक के बाद ही करने चाहिए; अन्य विघ्न में यह नियम अन्यथा है। कृष्ण पक्ष की एकादशी को शुभ चाहने वाले को करना चाहिए —

श्लोक 71 (padma.5.105.71)

तत्र व्यतिक्रमे हेतावमायां क्रियते तु तत् । यथोत्तरदिनेष्वेव कर्तव्यं यद्यविघ्नतः

tatra vyatikrame hetāvamāyāṁ kriyate tu tat yathottaradineṣveva kartavyaṁ yadyavighnataḥ

वहाँ व्यतिक्रम होने पर वह अमावस्या को किया जाता है। जैसे अगले दिनों में ही करना चाहिए, यदि कोई विघ्न न हो।

श्लोक 72 (padma.5.105.72)

कृष्णपक्षे त्वमायां तु कर्तव्यं राम नो कृतम् । मृताहस्य यदा मासो न ज्ञायेत कथंचन

kṛṣṇapakṣe tvamāyāṁ tu kartavyaṁ rāma no kṛtam mṛtāhasya yadā māso na jñāyeta kathaṁcana

हे राम! कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर जो नहीं किया गया — जब मृत व्यक्ति के दिन का मास किसी प्रकार भी ज्ञात न हो —

श्लोक 73 (padma.5.105.73)

मार्गशीर्षेऽथवा माघे श्राद्धं तद्दिवसे स्मृतम् । यदा तु वासराज्ञानं मासस्य ज्ञानमेव च

mārgaśīrṣe'thavā māghe śrāddhaṁ taddivase smṛtam yadā tu vāsarājñānaṁ māsasya jñānameva ca

मार्गशीर्ष या माघ में, उसी दिन श्राद्ध स्मरण किया गया है। जब दिन का ज्ञान न हो, पर मास का ज्ञान हो —

श्लोक 74 (padma.5.105.74)

अमायामेव तन्मासे श्राद्धं सांवत्सरं भवेत् । दिनमासापरिज्ञाने प्रोषितस्य मृतस्य च

amāyāmeva tanmāse śrāddhaṁ sāṁvatsaraṁ bhavet dinamāsāparijñāne proṣitasya mṛtasya ca

उसी मास की अमावस्या को वार्षिक श्राद्ध होता है। जब दिन और मास दोनों का ज्ञान न हो, और मृतक बाहर मरा हो —

श्लोक 75 (padma.5.105.75)

तत्तिथ्यां तद्दिनं ग्राह्यं तत्र ज्ञानं यदा भवेत् । आश्विनामा च मार्गामा माघामा च दिनत्रयम्

tattithyāṁ taddinaṁ grāhyaṁ tatra jñānaṁ yadā bhavet āśvināmā ca mārgāmā māghāmā ca dinatrayam

उस तिथि पर, उस दिन को ग्रहण करना चाहिए, जब भी वह ज्ञात हो। आश्विन की अमावस्या, मार्गशीर्ष की अमावस्या और माघ की अमावस्या — इन तीन दिनों में से —

श्लोक 76 (padma.5.105.76)

तत्र वान्यतमं ग्राह्यं दिनमासाप्रतीतितः । वृद्धिसप्तमसीमंत प्रेतश्राद्धानुमासिकम्

tatra vānyatamaṁ grāhyaṁ dinamāsāpratītitaḥ vṛddhisaptamasīmaṁta pretaśrāddhānumāsikam

वहाँ दिन-मास के अनुमान से इनमें से कोई एक ग्रहण करना चाहिए। वृद्धि-श्राद्ध, सप्तम-मास सीमंत, प्रेत-श्राद्ध और मासिक श्राद्ध —

श्लोक 77 (padma.5.105.77)

नित्योदकुंभश्राद्धं च मासे स्युरधिकेऽपि च । ग्रहणे पुत्रजन्मादौ कर्मण्यपि च शांतिके

nityodakuṁbhaśrāddhaṁ ca māse syuradhike'pi ca grahaṇe putrajanmādau karmaṇyapi ca śāṁtike

नित्य जल-घट श्राद्ध — ये अधिक मास में भी होते हैं। ग्रहण, पुत्र-जन्म आदि, कर्म और शांति-कर्म में भी —

श्लोक 78 (padma.5.105.78)

संकल्पिते च सर्वस्मिन्नधिमासो न दुष्यति । रोगी यदा मनुष्यः स्याच्छ्राद्धकर्मण्युपस्थिते

saṁkalpite ca sarvasminnadhimāso na duṣyati rogī yadā manuṣyaḥ syācchrāddhakarmaṇyupasthite

संकल्पित सब कार्यों में अधिक मास दोषकारक नहीं होता। जब कोई मनुष्य श्राद्ध-कर्म के समय रोगी हो —

श्लोक 79 (padma.5.105.79)

भार्यां वा भ्रातरं वापि शिष्यं वापि नियोजयेत् । तस्याभावे न हानिः स्यात्कर्मणः श्राद्धसंज्ञिनः

bhāryāṁ vā bhrātaraṁ vāpi śiṣyaṁ vāpi niyojayet tasyābhāve na hāniḥ syātkarmaṇaḥ śrāddhasaṁjñinaḥ

वह पत्नी को, या भाई को, या शिष्य को नियुक्त करे। उसके अभाव में श्राद्ध नामक कर्म की कोई हानि नहीं होती।

श्लोक 80 (padma.5.105.80)

नित्यश्राद्धे यथाशक्ति भोक्तारं तु नियोजयेत् । अमावास्या मासिकं च मृताह व्यतिरेकि यत्

nityaśrāddhe yathāśakti bhoktāraṁ tu niyojayet amāvāsyā māsikaṁ ca mṛtāha vyatireki yat

नित्य-श्राद्ध में सामर्थ्य अनुसार भोक्ता नियुक्त करे। अमावस्या का, मासिक का और मृत्यु-तिथि से भिन्न जो हो —

श्लोक 81 (padma.5.105.81)

स्वयं कर्मण्यशक्तश्चेत्सुतं विप्रं नियोजयेत् । राजकार्यनियुक्तस्य दासग्रहणवर्तिनः

svayaṁ karmaṇyaśaktaścetsutaṁ vipraṁ niyojayet rājakāryaniyuktasya dāsagrahaṇavartinaḥ

यदि स्वयं कर्म में असमर्थ हो तो पुत्र या ब्राह्मण को नियुक्त करे। राजकार्य में नियुक्त होने पर, बंधक-ग्रहण में लगे होने पर —

श्लोक 82 (padma.5.105.82)

व्यसनेषु समस्तेषु श्राद्धं विप्रेण कारयेत् । प्रातःकाले तु न श्राद्धं प्रकुर्वंति द्विजोत्तमाः

vyasaneṣu samasteṣu śrāddhaṁ vipreṇa kārayet prātaḥkāle tu na śrāddhaṁ prakurvaṁti dvijottamāḥ

सब प्रकार के संकटों में ब्राह्मण से श्राद्ध करवाना चाहिए। प्रातःकाल में श्रेष्ठ द्विज श्राद्ध नहीं करते।

श्लोक 83 (padma.5.105.83)

नैमित्तिकेषु श्राद्धेषु न कालनियमः स्मृतः

naimittikeṣu śrāddheṣu na kālaniyamaḥ smṛtaḥ

नैमित्तिक श्राद्धों में समय का कोई नियम नहीं कहा गया है।

श्लोक 84 (padma.5.105.84)

गृहादिव्यतिरिक्तस्य प्रक्रमः कुतुपः स्मृतः । कुतुपादथवाप्यर्वागासन्नकुतुपो भवेत्

gṛhādivyatiriktasya prakramaḥ kutupaḥ smṛtaḥ kutupādathavāpyarvāgāsannakutupo bhavet

घर आदि से भिन्न स्थान में 'कुतुप' नामक समय आरंभ माना गया है। कुतुप के पहले या उसके निकट भी हो सकता है —

श्लोक 85 (padma.5.105.85)

मासेमासे यथाश्राद्धेऽपराह्णस्पृग्विधीयते । अपराह्णव्यापिनी स्यादुभयत्र यदा त्वमा

māsemāse yathāśrāddhe'parāhṇaspṛgvidhīyate aparāhṇavyāpinī syādubhayatra yadā tvamā

प्रत्येक मास के श्राद्ध में अपराह्न-स्पर्श विहित है। जब अमावस्या दोनों ओर अपराह्न-व्यापिनी हो —

श्लोक 86 (padma.5.105.86)

क्षये पूर्वा तु कर्तव्या वृद्धौ साम्ये परा स्मृता । अमावास्या तु या हि स्यादपराह्णद्वये समा

kṣaye pūrvā tu kartavyā vṛddhau sāmye parā smṛtā amāvāsyā tu yā hi syādaparāhṇadvaye samā

क्षय होने पर पहली तिथि लेनी चाहिए, वृद्धि में समता होने पर दूसरी कही गई है। जो अमावस्या दोनों अपराह्नों में समान हो —

श्लोक 87 (padma.5.105.87)

क्षये पूर्वा परा वृद्धौ साम्येऽपि च परा भवेत् । क्षीणस्तु चंद्रमा यत्र तत्र श्राद्धं तु पार्वणम्

kṣaye pūrvā parā vṛddhau sāmye'pi ca parā bhavet kṣīṇastu caṁdramā yatra tatra śrāddhaṁ tu pārvaṇam

क्षय में पहली, वृद्धि में दूसरी, और समता में भी दूसरी ही होती है। जहाँ चंद्रमा क्षीण हो, वहाँ श्राद्ध पार्वण होता है।

श्लोक 88 (padma.5.105.88)

अमाष्टभागे सूक्ष्मोऽसौ भूताष्टांशे स नास्ति चेत् । मध्याह्नव्यापिनी सा स्यादेकोद्दिष्टे तिथिर्भवेत्

amāṣṭabhāge sūkṣmo'sau bhūtāṣṭāṁśe sa nāsti cet madhyāhnavyāpinī sā syādekoddiṣṭe tithirbhavet

अमावस्या के आठवें भाग में यह सूक्ष्म होता है; यदि आठवें भाग में न हो, तो — मध्याह्न-व्यापिनी तिथि हो तो एकोद्दिष्ट श्राद्ध होता है।

श्लोक 89 (padma.5.105.89)

सायाह्नव्यापिनी या स्यात्पार्वणे सा तिथिर्भवेत् । अल्पापराह्णगा यामा ग्राह्या श्राद्धादिके भवेत्

sāyāhnavyāpinī yā syātpārvaṇe sā tithirbhavet alpāparāhṇagā yāmā grāhyā śrāddhādike bhavet

जो तिथि सायाह्न-व्यापिनी हो, वह पार्वण के लिए तिथि होती है। थोड़ी-सी अपराह्न में जाने वाली तिथि श्राद्ध आदि में ग्रहण करने योग्य होती है।

श्लोक 90 (padma.5.105.90)

मृताहे त्रिमुहूर्ता च सायंकाले तिथिर्भवेत् । परेह्यस्तंगता यत्र त्रिमुहूर्तं तु पूर्ववत्

mṛtāhe trimuhūrtā ca sāyaṁkāle tithirbhavet parehyastaṁgatā yatra trimuhūrtaṁ tu pūrvavat

मृत्यु-तिथि पर सायंकाल में तीन मुहूर्त की तिथि होती है। अगले दिन जहाँ वह अस्त हो जाए, वहाँ भी तीन मुहूर्त पूर्ववत् —

श्लोक 91 (padma.5.105.91)

तत्रापरेद्युः श्राद्धं स्याज्ज्येष्ठपुत्रस्य नाशनम् । अमाश्राद्धं यथा कुर्यान्मृताहे समुपस्थिते

tatrāparedyuḥ śrāddhaṁ syājjyeṣṭhaputrasya nāśanam amāśrāddhaṁ yathā kuryānmṛtāhe samupasthite

वहाँ अगले दिन श्राद्ध करने से ज्येष्ठ पुत्र का नाश होता है। जैसे अमावस्या-श्राद्ध किया जाता है, वैसे मृत्यु-तिथि आने पर —

श्लोक 92 (padma.5.105.92)

मध्याह्नव्यापिनी तत्र ह्य द्विजस्य विधीयते । राम उवाच- श्राद्धक्रममशेषेण मर्त्यकर्मक्रमं तथा

madhyāhnavyāpinī tatra hya dvijasya vidhīyate rāma uvāca- śrāddhakramamaśeṣeṇa martyakarmakramaṁ tathā

वहाँ द्विज के लिए मध्याह्न-व्यापिनी तिथि ही विहित है। राम ने कहा— श्राद्ध का संपूर्ण क्रम और मनुष्यों के कर्मों का क्रम भी —

श्लोक 93 (padma.5.105.93)

प्रासंगिकानां धर्माणां निर्णयं वक्तुमर्हसि । शंभुरुवाच- श्राद्धस्य दिवसे प्राप्ते पूर्वेद्युर्नियमान्वितः

prāsaṁgikānāṁ dharmāṇāṁ nirṇayaṁ vaktumarhasi śaṁbhuruvāca- śrāddhasya divase prāpte pūrvedyurniyamānvitaḥ

तथा प्रासंगिक धर्मों का निर्णय भी आप बताने योग्य हैं। शंभु ने कहा— श्राद्ध का दिन आने पर, पहले ही दिन नियमपूर्वक —

श्लोक 94 (padma.5.105.94)

निमंत्रयीत विप्रेंद्रान्विप्रलक्षणसंयुतान् । एकभुक्तं ब्रह्मचर्यमंत्यजाद्यैरभाषणम्

nimaṁtrayīta vipreṁdrānvipralakṣaṇasaṁyutān ekabhuktaṁ brahmacaryamaṁtyajādyairabhāṣaṇam

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, जिनमें ब्राह्मण के लक्षण हों, निमंत्रित करे। एक बार भोजन, ब्रह्मचर्य, नीच जनों से बातचीत न करना —

श्लोक 95 (padma.5.105.95)

दंतधावनमभ्यंग नखकेशनिकृंतनम् । कर्ता कुर्वीत पूर्वेद्युस्त्यक्त्वा चैव परेऽहनि

daṁtadhāvanamabhyaṁga nakhakeśanikṛṁtanam kartā kurvīta pūrvedyustyaktvā caiva pare'hani

दाँत साफ करना, तेल-मालिश, नाख़ून-केश काटना — यजमान इन्हें पहले दिन ही करे, अगले दिन छोड़ दे।

श्लोक 96 (padma.5.105.96)

गृह्णीतनियमानुक्तान्सर्वमेतत्परित्यजेत् । त्रिकालं चैव पूजा चेत्प्रातर्देवं यजेत्स्वकम्

gṛhṇītaniyamānuktānsarvametatparityajet trikālaṁ caiva pūjā cetprātardevaṁ yajetsvakam

कहे गए नियमों को ग्रहण करे, इन सबको छोड़ दे। तीनों काल में पूजा हो तो प्रातः अपने देवता की पूजा करे —

श्लोक 97 (padma.5.105.97)

अरुणोदयवेलायां करोति यदि पूजनम् । अधःशायी तथा भूतः प्रातरुत्थाय कर्मवित्

aruṇodayavelāyāṁ karoti yadi pūjanam adhaḥśāyī tathā bhūtaḥ prātarutthāya karmavit

यदि अरुणोदय के समय पूजा करता है, तो वह मानो अधःशायी ही रहा, कर्मज्ञ को प्रातः उठकर —

श्लोक 98 (padma.5.105.98)

प्रातस्त्यमपि यत्कर्म तत्कृत्वा स्नानपूर्वकम् । ऋणत्रयविनिर्मुक्तो यास्यति ब्रह्मतत्परम्

prātastyamapi yatkarma tatkṛtvā snānapūrvakam ṛṇatrayavinirmukto yāsyati brahmatatparam

प्रातःकाल का ही कर्म स्नानपूर्वक करके, तीनों ऋणों से मुक्त होकर वह ब्रह्म-तत्पर हो जाता है।

श्लोक 99 (padma.5.105.99)

सूर्यस्योदयवेलायां शिवपूजां करोति यः । सूर्येणसम तेजस्वी शिवलोके महीयते

sūryasyodayavelāyāṁ śivapūjāṁ karoti yaḥ sūryeṇasama tejasvī śivaloke mahīyate

सूर्योदय के समय जो शिव-पूजा करता है, वह सूर्य के समान तेजस्वी होकर शिवलोक में महिमा को प्राप्त करता है।

श्लोक 100 (padma.5.105.100)

उदिते भास्करे पश्चाद्धटिकांतरपूजनम् । रुद्रेणसम तेजस्वी शिवलोके महीयते

udite bhāskare paścāddhaṭikāṁtarapūjanam rudreṇasama tejasvī śivaloke mahīyate

सूर्योदय के बाद, एक घटिका बाद पूजा करने वाला रुद्र के समान तेजस्वी होकर शिवलोक में महिमा को प्राप्त करता है।

श्लोक 101 (padma.5.105.101)

तृतीयघटिकायां तु शिवपूजां समाचरेत् । कुबेरसम तेजस्वी शिवलोके महीयते

tṛtīyaghaṭikāyāṁ tu śivapūjāṁ samācaret kuberasama tejasvī śivaloke mahīyate

तीसरी घटिका में शिव-पूजा करने वाला कुबेर के समान तेजस्वी होकर शिवलोक में महिमा को प्राप्त करता है।

श्लोक 102 (padma.5.105.102)

तृतीयघटिकायां तु शिवपूजां समाचरेत् । कुबेरसम तेजस्वी शिवलोके महीयते

tṛtīyaghaṭikāyāṁ tu śivapūjāṁ samācaret kuberasama tejasvī śivaloke mahīyate

तीसरी घटिका में शिव-पूजा करने वाला कुबेर के समान तेजस्वी होकर शिवलोक में महिमा को प्राप्त करता है।

श्लोक 103 (padma.5.105.103)

चतुर्थीपंचमीषष्ठीसप्तमी घटिकासु यः । शिवं पूजयते भक्त्या शिवलोके मरुत्समः

caturthīpaṁcamīṣaṣṭhīsaptamī ghaṭikāsu yaḥ śivaṁ pūjayate bhaktyā śivaloke marutsamaḥ

जो चौथी, पाँचवीं, छठी और सातवीं घटिका में भक्तिपूर्वक शिव की पूजा करता है, वह शिवलोक में मरुतों के समान होता है।

श्लोक 104 (padma.5.105.104)

तत्काल एव क्रियते पूजा यत्कालनोदिता । यथा प्रतिज्ञमथवा गृहीत नियमो यजेत्

tatkāla eva kriyate pūjā yatkālanoditā yathā pratijñamathavā gṛhīta niyamo yajet

जिस काल में जो कहा गया, उसी काल में पूजा करनी चाहिए; या प्रतिज्ञा के अनुसार, या ग्रहण किए गए नियम के अनुसार पूजा करे।

श्लोक 105 (padma.5.105.105)

उपचारेषु शक्त्या वै नियमं परिपालयेत् । नियमातिक्रमे वापि यागश्च स्याद्विभोर्यदि

upacāreṣu śaktyā vai niyamaṁ paripālayet niyamātikrame vāpi yāgaśca syādvibhoryadi

उपचारों में सामर्थ्य के अनुसार ही नियम का पालन करे। यदि नियम का उल्लंघन हो भी जाए, तो भी वह प्रभु का ही यजन बना रहता है।

श्लोक 106 (padma.5.105.106)

श्रीराम उवाच- क्व पूजा देवदेवस्य शंकरस्यामितौजसः । स्मरणात्पापनाशस्य स्मरणान्मोक्षदस्य च

śrīrāma uvāca- kva pūjā devadevasya śaṁkarasyāmitaujasaḥ smaraṇātpāpanāśasya smaraṇānmokṣadasya ca

श्रीराम ने कहा— अमित तेजस्वी देवाधिदेव शंकर की पूजा कहाँ है — जिनका स्मरण मात्र पाप का नाश और मोक्ष देने वाला है?

श्लोक 107 (padma.5.105.107)

शिवस्य शिवरूपस्य शिवतत्त्वार्थवेदिनः । सोमस्य सोमभूषस्य सोमनेत्रस्य राजितुः

śivasya śivarūpasya śivatattvārthavedinaḥ somasya somabhūṣasya somanetrasya rājituḥ

शिव-स्वरूप, शिव-तत्त्वार्थ के ज्ञाता शिव की; सोम-भूषण, सोम-नेत्र, शोभायमान सोम की —

श्लोक 108 (padma.5.105.108)

वेदमूर्तेरमूर्तेश्च वेदसारस्य वेदिनः । वेदवेदांगवित्तस्य वेद्यावेद्यस्य योगिनः

vedamūrteramūrteśca vedasārasya vedinaḥ vedavedāṁgavittasya vedyāvedyasya yoginaḥ

वेद-मूर्ति और अमूर्त, वेद-सार के ज्ञाता की; वेद-वेदांग के ज्ञाता, ज्ञेय और अज्ञेय दोनों वाले योगी की —

श्लोक 109 (padma.5.105.109)

गोक्षीरसमदेहस्य गोक्षीरस्नानमोदिनः । गोपालिनस्त्रिनेत्रस्य त्रयीनेत्रस्य मायिनः

gokṣīrasamadehasya gokṣīrasnānamodinaḥ gopālinastrinetrasya trayīnetrasya māyinaḥ

गोक्षीर-सम देह वाले, गोक्षीर-स्नान से आनंदित; गोपालक, त्रिनेत्र, वेद-त्रयी के नेत्र वाले मायावी की — यह पूजा कहाँ है?

श्लोक 110 (padma.5.105.110)

प्रश्नमध्ये तथा रामं शिवज्ञानमथादिशत् । स्थाणुभूतइवासीनो नासाग्रन्यस्तलोचनः

praśnamadhye tathā rāmaṁ śivajñānamathādiśat sthāṇubhūtaivāsīno nāsāgranyastalocanaḥ

प्रश्न के बीच में ही राम को शिव-ज्ञान का उपदेश दिया गया। वे स्थाणु के समान स्थिर बैठे, नासाग्र पर नेत्र टिकाए —

श्लोक 111 (padma.5.105.111)

आनंदनिष्यंदविलोचनाश्रु प्रवाहसंस्पृष्टकपोलदेशः । दधार देवं गिरिशं हृदंबुजे गोक्षीरसुस्निग्धसुचारुगात्रम्

ānaṁdaniṣyaṁdavilocanāśru pravāhasaṁspṛṣṭakapoladeśaḥ dadhāra devaṁ giriśaṁ hṛdaṁbuje gokṣīrasusnigdhasucārugātram

आनंद-अश्रुओं की धारा से स्पर्शित गालों वाले — उन्होंने हृदय-कमल में गोक्षीर के समान स्निग्ध, सुंदर अंगों वाले गिरीश देव को धारण किया।

श्लोक 112 (padma.5.105.112)

प्रतिबिंबमथो गात्रे रामस्य समदृश्यत । दृष्ट्वैव बिंबितं शंभुं चतुर्बाहुं त्रिलोचनम्

pratibiṁbamatho gātre rāmasya samadṛśyata dṛṣṭvaiva biṁbitaṁ śaṁbhuṁ caturbāhuṁ trilocanam

तब राम के शरीर में उनका प्रतिबिंब दिखाई देने लगा। उस प्रतिबिंबित, चतुर्भुज, त्रिनेत्र शंभु को देखकर ही —

श्लोक 113 (padma.5.105.113)

विस्मयं परमं याताः सर्वे मुनिहरीश्वराः । शंभोर्वक्षःस्थितं रामं दृष्ट्वा दीप्ताकृतिं शुभम्

vismayaṁ paramaṁ yātāḥ sarve muniharīśvarāḥ śaṁbhorvakṣaḥsthitaṁ rāmaṁ dṛṣṭvā dīptākṛtiṁ śubham

सब मुनि और वानरराज परम विस्मय को प्राप्त हुए। शंभु के वक्षस्थल पर स्थित राम को, देदीप्यमान शुभ आकृति में देखकर —

श्लोक 114 (padma.5.105.114)

तूष्णीं बभूवुर्यामार्द्धमथ राममुदैक्षत । स्वप्रश्नमनुसंधाय प्राह सर्वं वदेति च

tūṣṇīṁ babhūvuryāmārddhamatha rāmamudaikṣata svapraśnamanusaṁdhāya prāha sarvaṁ vadeti ca

वे आधे प्रहर तक मौन रहे, फिर राम को देखते रहे। अपने प्रश्न का अनुसंधान करते हुए उन्होंने कहा — सब बताइए।

श्लोक 115 (padma.5.105.115)

शंभुरुवाच- अचले या सदा पूजा चले वापि यथेच्छया । लिंगसंपूजनं मुख्यमलाभे प्रतिमादिषु

śaṁbhuruvāca- acale yā sadā pūjā cale vāpi yathecchayā liṁgasaṁpūjanaṁ mukhyamalābhe pratimādiṣu

शंभु ने कहा— स्थिर (अचल प्रतिमा) में जो सदा पूजा होती है, या चल (उत्सव-मूर्ति) में इच्छानुसार; लिंग-पूजन ही मुख्य है, न मिलने पर प्रतिमा आदि में —

श्लोक 116 (padma.5.105.116)

अधिकारविशेषेण तत्रतत्रापि पूजनम् । विगुणं सगुणं वापि सफलं लिंगपूजनम्

adhikāraviśeṣeṇa tatratatrāpi pūjanam viguṇaṁ saguṇaṁ vāpi saphalaṁ liṁgapūjanam

अधिकार-विशेष से वहाँ-वहाँ भी पूजा होती है। लिंग-पूजा विगुण (निर्गुण) या सगुण दोनों प्रकार से सफल होती है।

श्लोक 117 (padma.5.105.117)

प्रतिमादिकृतापूजा विगुणा सफला नहि । अचले वा चले वापि पूजा लिंगे प्रशस्यते

pratimādikṛtāpūjā viguṇā saphalā nahi acale vā cale vāpi pūjā liṁge praśasyate

प्रतिमा आदि से की गई पूजा विगुण होने पर सफल नहीं होती। स्थिर हो या चल, लिंग की पूजा ही श्रेष्ठ मानी जाती है।

श्लोक 118 (padma.5.105.118)

चलस्य पूजनं वक्ष्ये स्थापनोद्वासने तथा । ते उभेन विजानाति कश्चिन्मुनिरपि क्वचित्

calasya pūjanaṁ vakṣye sthāpanodvāsane tathā te ubhena vijānāti kaścinmunirapi kvacit

अब मैं चल-पूजन की स्थापना और उद्वासन-विधि बताऊँगा। इन दोनों को कोई विरला मुनि ही कहीं-कहीं जानता है।

श्लोक 119 (padma.5.105.119)

स्थापयंति हृदब्जे वै गोपयंति यजंति च । उद्वासयंति देवेशं शंकरं योगिनः सदा

sthāpayaṁti hṛdabje vai gopayaṁti yajaṁti ca udvāsayaṁti deveśaṁ śaṁkaraṁ yoginaḥ sadā

योगीजन सदा देवेश शंकर को हृदय-कमल में स्थापित करते हैं, गोपन करते हैं, यजन करते हैं और उद्वासित करते हैं।

श्लोक 120 (padma.5.105.120)

क्रिया चातीव होतॄणां वह्नौ देवं त्रियंबकम् । पूजकानामशेषाणां शिवलिंगे महेश्वरम्

kriyā cātīva hotṝṇāṁ vahnau devaṁ triyaṁbakam pūjakānāmaśeṣāṇāṁ śivaliṁge maheśvaram

होताओं की क्रिया अत्यंत अग्नि में त्र्यंबक देव के प्रति होती है; समस्त पूजकों की क्रिया शिवलिंग में महेश्वर के प्रति होती है।

श्लोक 121 (padma.5.105.121)

लिंगस्य स्थापनं पूजा उद्वासनमथैव च । धारणं शंकरस्यैव लिंगमेव महेश्वरम्

liṁgasya sthāpanaṁ pūjā udvāsanamathaiva ca dhāraṇaṁ śaṁkarasyaiva liṁgameva maheśvaram

लिंग की स्थापना, पूजा और उद्वासन भी — तथा शंकर का धारण भी — लिंग ही महेश्वर है।

श्लोक 122 (padma.5.105.122)

सज्जिकं परमोत्कृष्टं स्वर्णं चैव विनिर्मितम् । राजतैर्वा दलैः कार्यं राजतैर्वैणवैस्तु यत्

sajjikaṁ paramotkṛṣṭaṁ svarṇaṁ caiva vinirmitam rājatairvā dalaiḥ kāryaṁ rājatairvaiṇavaistu yat

सज्जिका (धारण-लिंग) परम उत्कृष्ट स्वर्ण से बना होना चाहिए, या चाँदी के पत्तरों से, या चाँदी और बाँस से बना हुआ —

श्लोक 123 (padma.5.105.123)

लतासूत्रैरथो वापि रचितं दारुणाथवा । वस्त्रेण वाथ रचितं मृदाविरचितं भवेत्

latāsūtrairatho vāpi racitaṁ dāruṇāthavā vastreṇa vātha racitaṁ mṛdāviracitaṁ bhavet

या लता-सूत्रों से, या लकड़ी से रचा हुआ; या वस्त्र से बना, या मिट्टी से बना हो सकता है।

श्लोक 124 (padma.5.105.124)

तत्र संवेष्ट्य वस्त्रेण सुगंधेन समन्विते । धौतवस्त्रयुगे शुद्धे मृद्वासन समन्विते

tatra saṁveṣṭya vastreṇa sugaṁdhena samanvite dhautavastrayuge śuddhe mṛdvāsana samanvite

उसे सुगंधित वस्त्र से लपेटकर, दो धुले हुए शुद्ध वस्त्रों और मृदु आसन से युक्त करके —

श्लोक 125 (padma.5.105.125)

शीतोष्णरहिते पादचतुष्टयसमन्विते । प्रावृतिच्छेदनोपेते क्रिमिकीटविवर्जिते

śītoṣṇarahite pādacatuṣṭayasamanvite prāvṛticchedanopete krimikīṭavivarjite

सर्दी-गर्मी से रहित, चार पैरों वाले, ढक्कन-सहित काटे गए, कीड़े-मकोड़ों से रहित —

श्लोक 126 (padma.5.105.126)

धौतेन मृदुवस्त्रेण सर्वतो वेष्ट्य तं शिवम् । विन्यस्य सज्जिकामध्ये प्रावृत्य च पुनर्विभुम्

dhautena mṛduvastreṇa sarvato veṣṭya taṁ śivam vinyasya sajjikāmadhye prāvṛtya ca punarvibhum

धुले मुलायम वस्त्र से उस शिव को सब ओर से लपेटकर, सज्जिका के मध्य में रखकर, फिर प्रभु को लपेटकर —

श्लोक 127 (padma.5.105.127)

एषा हि सज्जिका राम देवस्याग्रेति कीर्तिता । तस्य च स्थापनं पाठो रहस्ये च महेशितुः

eṣā hi sajjikā rāma devasyāgreti kīrtitā tasya ca sthāpanaṁ pāṭho rahasye ca maheśituḥ

हे राम! यही 'सज्जिका' देव के समक्ष कही गई है। उसकी स्थापना का पाठ और महेश्वर का रहस्य भी —

श्लोक 128 (padma.5.105.128)

अथवा भित्तिमूले स्याद्देववेद्यामथापि वा । सुरक्षिते तथा देशे रक्षकं च नियोजयेत्

athavā bhittimūle syāddevavedyāmathāpi vā surakṣite tathā deśe rakṣakaṁ ca niyojayet

अथवा भित्ति के मूल में, या देव-वेदी पर भी हो सकती है; सुरक्षित स्थान में रक्षक को भी नियुक्त करना चाहिए।

श्लोक 129 (padma.5.105.129)

प्राणादेरविनाभावं कुर्वीत नियमैः सह । एतद्धि राजसं प्रोक्तं स्थापनं परमात्मनः

prāṇāderavinābhāvaṁ kurvīta niyamaiḥ saha etaddhi rājasaṁ proktaṁ sthāpanaṁ paramātmanaḥ

नियमों सहित प्राण आदि का उसके साथ अविनाभाव संबंध बनाए रखना चाहिए। यह परमात्मा की राजसी स्थापना कही गई है।

श्लोक 130 (padma.5.105.130)

सात्विकं स्वसमीपस्थं धारणं तामसं पुनः । धारणं गात्रसंस्पर्शमशेषदेहगोपनम्

sātvikaṁ svasamīpasthaṁ dhāraṇaṁ tāmasaṁ punaḥ dhāraṇaṁ gātrasaṁsparśamaśeṣadehagopanam

सात्त्विक स्थापना अपने निकट रखने वाली है, और तामसिक फिर शरीर पर धारण करने वाली है। धारण का अर्थ है शरीर के स्पर्श से पूरे देह पर छिपाना।

श्लोक 131 (padma.5.105.131)

मस्तके धारणं मुख्यं ब्रह्मणा च तथा कृतम् । विन्यस्य मुकुटस्यांते धारणं शुभमुच्यते

mastake dhāraṇaṁ mukhyaṁ brahmaṇā ca tathā kṛtam vinyasya mukuṭasyāṁte dhāraṇaṁ śubhamucyate

मस्तक पर धारण करना मुख्य है, जैसा ब्रह्मा ने भी किया; मुकुट के अंत में रखकर धारण करना शुभ कहा जाता है।

श्लोक 132 (padma.5.105.132)

ललाटे धारणं शस्तं यथा लक्ष्म्या धृतं शुभम् । बाणेन च धृतं मूर्ध्नि दक्षिणोरसि वा पुनः

lalāṭe dhāraṇaṁ śastaṁ yathā lakṣmyā dhṛtaṁ śubham bāṇena ca dhṛtaṁ mūrdhni dakṣiṇorasi vā punaḥ

ललाट पर धारण करना श्रेष्ठ है, जैसे लक्ष्मी ने शुभ रूप से धारण किया; बाण ने इसे सिर पर, या दाहिने वक्षस्थल पर धारण किया —

श्लोक 133 (padma.5.105.133)

कर्णे च हरकर्णेन मुनिना परमर्षिणा । विनिर्भिद्य तथा गात्रं लोहस्थानं प्रकल्प्य च

karṇe ca harakarṇena muninā paramarṣiṇā vinirbhidya tathā gātraṁ lohasthānaṁ prakalpya ca

कान में, हर के कान के अनुसार, परम ऋषि मुनि ने; शरीर को भेदकर, लोहे का स्थान बनाकर —

श्लोक 134 (padma.5.105.134)

धारयंति तथा लिंगं राक्षसाः केचिदुत्तमाः । अनिकेतन मर्त्यानामशक्तानां शिरोधृतिः

dhārayaṁti tathā liṁgaṁ rākṣasāḥ keciduttamāḥ aniketana martyānāmaśaktānāṁ śirodhṛtiḥ

वैसे ही कुछ उत्तम राक्षस भी लिंग धारण करते हैं। अनिकेत (गृहरहित) असमर्थ मनुष्यों के लिए सिर पर धारण करना —

श्लोक 135 (padma.5.105.135)

अधमाधममाख्यातं नीवीबंधादिधारणम् । तेषु तूच्छिष्टसंप्राप्तौ मस्तके धारणं भवेत्

adhamādhamamākhyātaṁ nīvībaṁdhādidhāraṇam teṣu tūcchiṣṭasaṁprāptau mastake dhāraṇaṁ bhavet

अधम में भी अधम कहा गया है, और नीवी-बंध आदि में धारण करना उससे भी नीचा। उनमें जब जूठन प्राप्त होने की स्थिति आ जाए, तब सिर पर धारण करना होता है।

श्लोक 136 (padma.5.105.136)

अधमाधमवृत्तीनां सदा वै लिंगधारणम् । पापिनामपि चाश्चर्यं यमलोके न विद्यते

adhamādhamavṛttīnāṁ sadā vai liṁgadhāraṇam pāpināmapi cāścaryaṁ yamaloke na vidyate

अधम-अधम वृत्ति वालों के लिए सदा लिंग-धारण ही उचित है; पापियों के लिए भी यह आश्चर्य है कि यमलोक उनके लिए विद्यमान नहीं रहता।

श्लोक 137 (padma.5.105.137)

श्रीराम उवाच- चित्रगुप्तेन लिखिता ललाटे या लिपिर्दृढा । तया तु लिप्या नियतं नरकं कथमन्यथा

śrīrāma uvāca- citraguptena likhitā lalāṭe yā lipirdṛḍhā tayā tu lipyā niyataṁ narakaṁ kathamanyathā

श्रीराम ने कहा— चित्रगुप्त द्वारा ललाट पर लिखी गई जो दृढ़ लिपि है, उसी लिपि से निश्चित रूप से नरक होता है — अन्यथा कैसे?

श्लोक 138 (padma.5.105.138)

करोति पूजनं शंभोः पापं नाशयते कथम् । शंभुरुवाच- पापं नाशयते कृत्स्नमपि जन्मशतार्जितम्

karoti pūjanaṁ śaṁbhoḥ pāpaṁ nāśayate katham śaṁbhuruvāca- pāpaṁ nāśayate kṛtsnamapi janmaśatārjitam

शंभु की पूजा करने से वह पाप कैसे नष्ट हो जाता है? शंभु ने कहा— सौ जन्मों में अर्जित संपूर्ण पाप भी वह नष्ट कर देता है —

श्लोक 139 (padma.5.105.139)

भर्त्सनात्सर्वपापानां स्मरणाच्च महेशितुः । भस्मेति पदमाख्यातं तस्य धारणमुत्तमम्

bhartsanātsarvapāpānāṁ smaraṇācca maheśituḥ bhasmeti padamākhyātaṁ tasya dhāraṇamuttamam

सब पापों की भर्त्सना और महेश्वर के स्मरण मात्र से। 'भस्म' यह पद कहा गया है, इसका धारण उत्तम है —

श्लोक 140 (padma.5.105.140)

यथाविधि ललाटे वै वह्निवीर्यप्रधारणात् । नाशयेल्लिखितां यामीं पटस्थामिव हव्यभुक्

yathāvidhi lalāṭe vai vahnivīryapradhāraṇāt nāśayellikhitāṁ yāmīṁ paṭasthāmiva havyabhuk

विधिपूर्वक ललाट पर, अग्नि के तेज को धारण करने से, वह लिखी हुई यम-लिपि को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे अग्नि पत्र पर लिखे को।

श्लोक 141 (padma.5.105.141)

कर्णोपरिकृतं पापं नष्टं स्यान्मुखधारणे । कंठे च धारणात्कंठभोगादिकृतपातकम्

karṇoparikṛtaṁ pāpaṁ naṣṭaṁ syānmukhadhāraṇe kaṁṭhe ca dhāraṇātkaṁṭhabhogādikṛtapātakam

कान के ऊपर किया गया पाप कान पर धारण से नष्ट होता है, मुख पर धारण से मुख का पाप नष्ट होता है; कंठ पर धारण से कंठ-भोग आदि से किया गया पाप नष्ट होता है।

श्लोक 142 (padma.5.105.142)

बाह्वोर्बाहुकृतं पापं वक्षसि मनसा कृतम् । नाभ्यां शिश्नकृतं पापं पृष्ठे गुदकृतं तथा

bāhvorbāhukṛtaṁ pāpaṁ vakṣasi manasā kṛtam nābhyāṁ śiśnakṛtaṁ pāpaṁ pṛṣṭhe gudakṛtaṁ tathā

भुजाओं पर भुजाओं से किया पाप, वक्षस्थल पर मन से किया पाप; नाभि पर लिंग से किया पाप, पीठ पर गुदा से किया पाप —

श्लोक 143 (padma.5.105.143)

पार्श्वयोर्धारणाद्राम परस्त्र्यालिंगनादिजम् । तद्भस्मधारणं शस्तं सर्वत्रैव त्रिपुंड्रकम्

pārśvayordhāraṇādrāma parastryāliṁganādijam tadbhasmadhāraṇaṁ śastaṁ sarvatraiva tripuṁḍrakam

पार्श्वों पर धारण से, हे राम! परस्त्री-आलिंगन आदि से किया पाप नष्ट होता है। सर्वत्र त्रिपुंड्र के रूप में उसी भस्म का धारण श्रेष्ठ है।

श्लोक 144 (padma.5.105.144)

ब्रह्मविष्णुमहेशानां त्रय्यग्नीनां च धारणम् । गुप्त्यै लोकत्रयाणां च धारणं तेन वै कृतम्

brahmaviṣṇumaheśānāṁ trayyagnīnāṁ ca dhāraṇam guptyai lokatrayāṇāṁ ca dhāraṇaṁ tena vai kṛtam

ब्रह्मा-विष्णु-महेश और तीनों अग्नियों का धारण — तीनों लोकों की रक्षा के लिए ही उन्होंने इसे इस प्रकार बनाया।

श्लोक 145 (padma.5.105.145)

धृतं पंचदशस्थाने शुद्धं भस्माभिमंत्रितम् । कोष्ठयुग्मे बाहुयुग्मे कोष्ठोपरि युगे तथा

dhṛtaṁ paṁcadaśasthāne śuddhaṁ bhasmābhimaṁtritam koṣṭhayugme bāhuyugme koṣṭhopari yuge tathā

शुद्ध, अभिमंत्रित भस्म पंद्रह स्थानों पर धारण किया जाता है — दोनों कुक्षियों पर, दोनों भुजाओं पर, दोनों कुक्षियों के ऊपर भी —

श्लोक 146 (padma.5.105.146)

धारणं सर्वदेहानां पूजायै धर्मसंमतम् । भस्माशना भस्मशय्या भस्मोद्धूलितविग्रहाः

dhāraṇaṁ sarvadehānāṁ pūjāyai dharmasaṁmatam bhasmāśanā bhasmaśayyā bhasmoddhūlitavigrahāḥ

धर्मानुसार सम्मत यह सब शरीरों पर पूजा के लिए धारण किया जाता है। भस्म-भोजी, भस्म-शय्या वाले, भस्म से उबटन किए शरीर वाले —

श्लोक 147 (padma.5.105.147)

भस्मस्नानाः सदापापैर्मुच्यंते नात्र संशयः । आदौ ब्राह्मणदीक्षायां त्रियायुषमिति स्मृतम्

bhasmasnānāḥ sadāpāpairmucyaṁte nātra saṁśayaḥ ādau brāhmaṇadīkṣāyāṁ triyāyuṣamiti smṛtam

भस्म-स्नान करने वाले सदा पापों से मुक्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं। ब्राह्मण की दीक्षा के आरंभ में इसे 'त्रि-आयुष' कहा गया है।

श्लोक 148 (padma.5.105.148)

प्रसवे च मनुष्याणां भूतावेशेऽपि रक्षकम् । सर्पादिविषहान्यर्थं सर्वेषां साधनं त्विदम्

prasave ca manuṣyāṇāṁ bhūtāveśe'pi rakṣakam sarpādiviṣahānyarthaṁ sarveṣāṁ sādhanaṁ tvidam

मनुष्यों के प्रसव के समय, भूत-आवेश में भी यह रक्षक है; सर्प आदि के विष को दूर करने के लिए भी यह सबका साधन है।

श्लोक 149 (padma.5.105.149)

अपि वा वैष्णवो मर्त्य अथवापीतरो जनः । भस्मस्नायी भस्मयुक्तः कर्मस्वधिकरोति वै

api vā vaiṣṇavo martya athavāpītaro janaḥ bhasmasnāyī bhasmayuktaḥ karmasvadhikaroti vai

चाहे वैष्णव मनुष्य हो या अन्य कोई जन, भस्म से स्नान किया हुआ, भस्म-युक्त व्यक्ति ही कर्मों में अधिकार रखता है।

श्लोक 150 (padma.5.105.150)

श्रीराम उवाच- भस्ममाहात्म्यमादौ मे भस्मायुष्यं हि कस्य वै । कथं हि रक्षते ह्येतत्सर्वमेतद्वदस्व मे

śrīrāma uvāca- bhasmamāhātmyamādau me bhasmāyuṣyaṁ hi kasya vai kathaṁ hi rakṣate hyetatsarvametadvadasva me

श्रीराम ने कहा— पहले मुझे भस्म की महिमा बताइए — भस्म किसकी आयु है, यह कैसे रक्षा करता है, यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 151 (padma.5.105.151)

शंभुरुवाच- आयुष्यवर्द्धने हेतुस्त्रिविधस्यापि देहिनः । पापघ्नं शीतमुष्णं च स्पर्शाच्छिवपदप्रदम्

śaṁbhuruvāca- āyuṣyavarddhane hetustrividhasyāpi dehinaḥ pāpaghnaṁ śītamuṣṇaṁ ca sparśācchivapadapradam

शंभु ने कहा— यह तीनों प्रकार के प्राणियों की आयु-वृद्धि का कारण है; यह पापनाशक, शीत में और ताप में, स्पर्श मात्र से शिव-पद देने वाला है।

श्लोक 152 (padma.5.105.152)

अत्र ते कीर्तयिष्यामि चेतिहासं पुरातनम् । आसीद्वासिष्ठवंश्यस्तु धनंजय इति द्विजः

atra te kīrtayiṣyāmi cetihāsaṁ purātanam āsīdvāsiṣṭhavaṁśyastu dhanaṁjaya iti dvijaḥ

इस विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। वसिष्ठ के वंश में धनंजय नामक एक ब्राह्मण था।

श्लोक 153 (padma.5.105.153)

तस्य भार्याशतं चासीद्रूपलावण्यसंयुतम् । तासामेका तु सुषुवे शामाकाकरुणं मुने

tasya bhāryāśataṁ cāsīdrūpalāvaṇyasaṁyutam tāsāmekā tu suṣuve śāmākākaruṇaṁ mune

उसकी सौ पत्नियाँ थीं, रूप-लावण्य से युक्त। हे मुने! उनमें से एक ने शामाक (एक तुच्छ अन्न) की भाँति दुर्भाग्यशाली एक पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 154 (padma.5.105.154)

भार्याणां संख्यया राम सुताश्चासंस्तपस्विनः । पित्रा विभागस्तेषां च विषमः परिकल्पितः

bhāryāṇāṁ saṁkhyayā rāma sutāścāsaṁstapasvinaḥ pitrā vibhāgasteṣāṁ ca viṣamaḥ parikalpitaḥ

हे राम! पत्नियों की संख्या के अनुसार ही उसके तपस्वी पुत्र भी थे। पिता ने उनके बीच धन का बँटवारा असमान रूप से किया —

श्लोक 155 (padma.5.105.155)

भ्रातॄणां च तदा ह्येव वैरबंधो महानभूत् । नराणामेकजातीनां वैरं नियतमेव तु

bhrātṝṇāṁ ca tadā hyeva vairabaṁdho mahānabhūt narāṇāmekajātīnāṁ vairaṁ niyatameva tu

और तभी भाइयों में महान वैर उत्पन्न हो गया। एक ही जाति के मनुष्यों में वैर सुनिश्चित ही होता है।

श्लोक 156 (padma.5.105.156)

अथासौ करुणो गत्वा भवनाशिनिका तटे । नानामुनिगणैः सार्द्धं नरसिंहदिदृक्षया

athāsau karuṇo gatvā bhavanāśinikā taṭe nānāmunigaṇaiḥ sārddhaṁ narasiṁhadidṛkṣayā

तब वह करुण नामक पुत्र भवनाशिनी नदी के तट पर, अनेक मुनि-समूहों के साथ नृसिंह के दर्शन की इच्छा से गया।

श्लोक 157 (padma.5.105.157)

नृसिंहदर्शनार्थं तु ब्राह्मणेन तु केनचित् । उत्कृष्टफलितंवीरमानीतं रूपगंधवत्

nṛsiṁhadarśanārthaṁ tu brāhmaṇena tu kenacit utkṛṣṭaphalitaṁvīramānītaṁ rūpagaṁdhavat

नृसिंह-दर्शन के लिए किसी ब्राह्मण द्वारा उत्तम, सुगंधित, वीर्यवान फल लाया गया।

श्लोक 158 (padma.5.105.158)

करुणस्तु तदादाय व्यजिघ्रत्फलमुत्तमम् । तत्रस्थिता द्विजगणाः शापेन तमयोजयन्

karuṇastu tadādāya vyajighratphalamuttamam tatrasthitā dvijagaṇāḥ śāpena tamayojayan

करुण ने वह उत्तम फल लेकर उसे सूँघा। वहाँ उपस्थित ब्राह्मणों ने शाप देकर उसे इस प्रकार जोड़ दिया —

श्लोक 159 (padma.5.105.159)

मक्षिका भव पापात्मन्वर्षाणां शतमप्यतः । शापावसानं भविता दधीचेन महात्मना

makṣikā bhava pāpātmanvarṣāṇāṁ śatamapyataḥ śāpāvasānaṁ bhavitā dadhīcena mahātmanā

'हे पापात्मा! तुम मक्खी बन जाओ, सौ वर्षों तक।' शाप का अंत महात्मा दधीचि द्वारा होगा।

श्लोक 160 (padma.5.105.160)

अथ मक्षिकतां प्राप्तो भार्यामिदमभाषत । मक्षिकात्वमहं प्राप्तो मां शुभे पालयस्व भोः

atha makṣikatāṁ prāpto bhāryāmidamabhāṣata makṣikātvamahaṁ prāpto māṁ śubhe pālayasva bhoḥ

तब मक्खी बनकर उसने अपनी पत्नी से यह कहा — मैं मक्खी बन गया हूँ; हे शुभे! मुझे संभालो।

श्लोक 161 (padma.5.105.161)

इत्युक्त्वा स तथा भूतो बभ्राम च ततस्ततः । अथैवंविधमाज्ञाय ज्ञातयः पापनिश्चयाः

ityuktvā sa tathā bhūto babhrāma ca tatastataḥ athaivaṁvidhamājñāya jñātayaḥ pāpaniścayāḥ

यह कहकर वह वैसे ही उड़ता-फिरता रहा। इस प्रकार जानकर उसके पापी-निश्चयी संबंधियों ने —

श्लोक 162 (padma.5.105.162)

तद्वधे यत्नमास्थाय तैलमध्ये ह्यपातयन् । मृतं पतिमथादाय दुःखिता सा कृशोदरी

tadvadhe yatnamāsthāya tailamadhye hyapātayan mṛtaṁ patimathādāya duḥkhitā sā kṛśodarī

उसके वध का प्रयत्न करके उसे तेल में गिरा दिया। मृत पति को लेकर वह दुबली स्त्री —

श्लोक 163 (padma.5.105.163)

तद्दुःखशमनार्थाय प्राह देवीत्वरुंधती । अमुं संजीवयाम्यद्य भस्मनैव शुचिस्मिते

tadduḥkhaśamanārthāya prāha devītvaruṁdhatī amuṁ saṁjīvayāmyadya bhasmanaiva śucismite

उस दुःख को शांत करने के लिए अरुंधती देवी से बोली। हे शुचिस्मिते! मैं आज इसे भस्म से ही जीवित कर दूँगी।

श्लोक 164 (padma.5.105.164)

अथाग्निहोत्रजं भस्म अरुंधत्यै न्यवेदयत् । मृत्युंजयेन मंत्रेण मृतजंतौ तथाक्षिपत्

athāgnihotrajaṁ bhasma aruṁdhatyai nyavedayat mṛtyuṁjayena maṁtreṇa mṛtajaṁtau tathākṣipat

तब उसने अरुंधती को अग्निहोत्र से उत्पन्न भस्म भेंट किया। मृत्युंजय मंत्र से उसने उसे उस मृत प्राणी पर छिड़का —

श्लोक 165 (padma.5.105.165)

मंदवायुं तथा चक्रे व्यजनेन शुचिस्मिता । उदतिष्ठत्ततो जंतुर्भस्मनोऽस्य प्रभावतः

maṁdavāyuṁ tathā cakre vyajanena śucismitā udatiṣṭhattato jaṁturbhasmano'sya prabhāvataḥ

शुचिस्मिता ने पंखे से धीमी हवा भी की। तब उस भस्म के प्रभाव से वह प्राणी उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 166 (padma.5.105.166)

ततो वर्षशते पूर्णे ज्ञातिरेको ह्यमारयत् । मृते भर्तरि सा साध्वी दुःखिता च शुचिस्मिता

tato varṣaśate pūrṇe jñātireko hyamārayat mṛte bhartari sā sādhvī duḥkhitā ca śucismitā

फिर सौ वर्ष पूर्ण होने पर उसके किसी संबंधी ने उसे मार डाला। पति के मरने पर वह साध्वी, शुचिस्मिता, दुःखी हुई —

श्लोक 167 (padma.5.105.167)

दधीचं नाम विप्रेंद्रं महामाहेश्वरं मुनिम् । जगाम शरणं साध्वी प्राह विप्रस्तपोधनः

dadhīcaṁ nāma vipreṁdraṁ mahāmāheśvaraṁ munim jagāma śaraṇaṁ sādhvī prāha viprastapodhanaḥ

वह साध्वी महामाहेश्वर मुनि, विप्रेंद्र दधीचि नामक की शरण गई। तपोधन ब्राह्मण ने कहा —

श्लोक 168 (padma.5.105.168)

त्रियायुषा विहीनं तु जमदग्निं तपोनिधिम् । भस्मैव जीवयामास कश्यपं च तथाविधम्

triyāyuṣā vihīnaṁ tu jamadagniṁ taponidhim bhasmaiva jīvayāmāsa kaśyapaṁ ca tathāvidham

जैसे त्रि-आयुष से रहित तपोनिधि जमदग्नि को, और वैसे ही कश्यप को —

श्लोक 169 (padma.5.105.169)

देवानपि तथाभूतान्मामप्येतादृशं पुरा । तस्मात्तु भस्मना जंतुं जीवयामि तवानघे

devānapi tathābhūtānmāmapyetādṛśaṁ purā tasmāttu bhasmanā jaṁtuṁ jīvayāmi tavānaghe

देवताओं को भी, और मुझे भी पहले वैसा ही, भस्म ने ही जीवित किया — उसी प्रकार, हे निष्पाप! मैं भस्म से ही तुम्हारे प्राणी को जीवित करता हूँ।

श्लोक 170 (padma.5.105.170)

इत्येवमुक्त्वा भगवान्दधीचो महेश्वरं वै शरणं जगाम । भस्माभिमंत्र्याथ करे गृहीत्वा संजीवयामास धवं सुसाध्व्याः

ityevamuktvā bhagavāndadhīco maheśvaraṁ vai śaraṇaṁ jagāma bhasmābhimaṁtryātha kare gṛhītvā saṁjīvayāmāsa dhavaṁ susādhvyāḥ

यह कहकर भगवान दधीचि महेश्वर की शरण गए; भस्म को अभिमंत्रित करके हाथ में लेकर उन्होंने उस साध्वी के पति को जीवित कर दिया।

श्लोक 171 (padma.5.105.171)

महेशस्य करस्पर्शाद्विशापः करुणोऽभवत् । स्वरूपं च ततो गत्वा स्वमाश्रमपदं ययौ

maheśasya karasparśādviśāpaḥ karuṇo'bhavat svarūpaṁ ca tato gatvā svamāśramapadaṁ yayau

महेश के हाथ के स्पर्श से करुण का शाप दूर हो गया। फिर वह अपने असली रूप में जाकर अपने आश्रम-स्थल को चला गया।

श्लोक 172 (padma.5.105.172)

दधीचमपि सा साध्वी गृहमानीय भोजने । प्रार्थयामास विप्रर्षिं भुक्तवानथ स द्विजः

dadhīcamapi sā sādhvī gṛhamānīya bhojane prārthayāmāsa viprarṣiṁ bhuktavānatha sa dvijaḥ

वह साध्वी दधीचि को भी घर लाकर भोजन के लिए प्रार्थना करने लगी। उस विप्रर्षि ने भोजन किया।

श्लोक 173 (padma.5.105.173)

भुक्तवत्यथ विप्रेंद्रे कोटिशिष्याः समागताः । अथ देवाः समायाता भस्मोद्धूलितविग्रहाः

bhuktavatyatha vipreṁdre koṭiśiṣyāḥ samāgatāḥ atha devāḥ samāyātā bhasmoddhūlitavigrahāḥ

उस विप्रेंद्र के भोजन कर लेने पर करोड़ों शिष्य वहाँ आ पहुँचे। फिर देवता भी, भस्म से उबटन किए शरीर वाले, आ पहुँचे।

श्लोक 174 (padma.5.105.174)

नमस्कृत्य दधीचं तु पप्रच्छुः शिवकांक्षया । देवा ऊचुः - अस्माकं तु पुरा ज्ञानं नष्टमासीन्महामते

namaskṛtya dadhīcaṁ tu papracchuḥ śivakāṁkṣayā devā ūcuḥ - asmākaṁ tu purā jñānaṁ naṣṭamāsīnmahāmate

दधीचि को नमस्कार करके, शिव की कामना से, उन्होंने पूछा। देवताओं ने कहा— हे महामते! पहले हमारा ज्ञान नष्ट हो गया था।

श्लोक 175 (padma.5.105.175)

गौतमस्य तु भार्यां वै दृष्ट्वा कामातुरा वयम् । तथा च धर्षिता देवी विवाहकृतमंगला

gautamasya tu bhāryāṁ vai dṛṣṭvā kāmāturā vayam tathā ca dharṣitā devī vivāhakṛtamaṁgalā

गौतम की पत्नी को देखकर हम काम-आतुर हो गए थे, और उस विवाहित, मंगल-मूर्ति देवी का उल्लंघन किया।

श्लोक 176 (padma.5.105.176)

तां वै कामयमानानां नष्टं ज्ञानमभूच्च नः । ततः सर्वे वयं भूता गता दुर्वाससं मुनिम्

tāṁ vai kāmayamānānāṁ naṣṭaṁ jñānamabhūcca naḥ tataḥ sarve vayaṁ bhūtā gatā durvāsasaṁ munim

उसकी कामना करते हुए हमारा ज्ञान नष्ट हो गया। तब हम सब वैसे ही भ्रमित होकर दुर्वासा मुनि के पास गए।

श्लोक 177 (padma.5.105.177)

स उवाचाधुना सर्वमपनेष्यामि वोमलम् । शतरुद्रियमंत्रेण मंत्रितं शंभुना स्वयम्

sa uvācādhunā sarvamapaneṣyāmi vomalam śatarudriyamaṁtreṇa maṁtritaṁ śaṁbhunā svayam

उन्होंने कहा— अब मैं तुम सबकी मलिनता दूर कर दूँगा। शतरुद्रिय मंत्र से स्वयं शंभु द्वारा अभिमंत्रित —

श्लोक 178 (padma.5.105.178)

ममापि दत्तं तेनैव ब्रह्महत्यादिशांतये । इत्येवमुक्त्वा दुर्वासा दत्तवान्भस्मचोत्तमम्

mamāpi dattaṁ tenaiva brahmahatyādiśāṁtaye ityevamuktvā durvāsā dattavānbhasmacottamam

मुझे भी उन्हीं के द्वारा ब्रह्महत्या आदि की शांति के लिए दिया गया था। यह कहकर दुर्वासा ने वह उत्तम भस्म दिया।

श्लोक 179 (padma.5.105.179)

अथ तद्वचनात्सर्वे वयं विकृतचेतनाः । शतरुद्रियमंत्रेण भस्मोद्धूलितविग्रहाः

atha tadvacanātsarve vayaṁ vikṛtacetanāḥ śatarudriyamaṁtreṇa bhasmoddhūlitavigrahāḥ

तब उनके वचन से हम सब, विकृत-चेतन, शतरुद्रिय मंत्र से भस्म-उबटन किए शरीर वाले होकर —

श्लोक 180 (padma.5.105.180)

निर्धूतपातकाः सर्वे संवृत्तास्तत्क्षणेन हि । आश्चर्यमेतज्जानीमो भस्मसामर्थ्यमीदृशम्

nirdhūtapātakāḥ sarve saṁvṛttāstatkṣaṇena hi āścaryametajjānīmo bhasmasāmarthyamīdṛśam

उसी क्षण सब पापों से धुले हुए, शुद्ध हो गए। यह हम भस्म की ऐसी सामर्थ्य का आश्चर्य जानते हैं।

श्लोक 181 (padma.5.105.181)

दधीच उवाच- शैवस्य भस्मनः शक्तिं संक्षेपेण वदामि वः । विस्तरेण न शक्येत वक्तुं वर्षशतैरपि

dadhīca uvāca- śaivasya bhasmanaḥ śaktiṁ saṁkṣepeṇa vadāmi vaḥ vistareṇa na śakyeta vaktuṁ varṣaśatairapi

दधीचि ने कहा— शैव भस्म की शक्ति को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ; उसे विस्तार से तो सौ वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।

श्लोक 182 (padma.5.105.182)

अत्र वः कीर्तयिष्यामि पुरावृत्तं तु देवयोः । हरिशंकरयोः सर्वे ब्रह्महत्यादिनाशनम्

atra vaḥ kīrtayiṣyāmi purāvṛttaṁ tu devayoḥ hariśaṁkarayoḥ sarve brahmahatyādināśanam

इस विषय में मैं तुम्हें हरि और शंकर, दोनों देवताओं का प्राचीन वृत्तांत सुनाऊँगा — जो ब्रह्महत्या आदि का नाशक है।

श्लोक 183 (padma.5.105.183)

पुरा चैकार्णवे घोरे ब्रह्मणः प्रलये सति । महाविष्णुस्तु भगवाञ्छेते स्म प्रलयांभसि

purā caikārṇave ghore brahmaṇaḥ pralaye sati mahāviṣṇustu bhagavāñchete sma pralayāṁbhasi

प्राचीनकाल में भयंकर एकार्णव (जलप्रलय) में, ब्रह्मा के प्रलय होने पर, भगवान महाविष्णु प्रलय-जल में शयन कर रहे थे।

श्लोक 184 (padma.5.105.184)

तस्य पार्श्वद्वयं प्राप्य ब्रह्मांडानां शतद्वयम् । विंशतिः पादयोः पार्श्वे विंशतिर्मस्तकांतरे

tasya pārśvadvayaṁ prāpya brahmāṁḍānāṁ śatadvayam viṁśatiḥ pādayoḥ pārśve viṁśatirmastakāṁtare

उनके दोनों पार्श्वों में दो सौ ब्रह्मांड समाए हुए थे; बीस पैरों के पास और बीस मस्तक के भीतर —

श्लोक 185 (padma.5.105.185)

नासामौक्तिकभावेन ब्रह्मांडमदधात्प्रभुः । तन्नाभिमंडले केचिल्लोमशाद्या मुनीश्वराः

nāsāmauktikabhāvena brahmāṁḍamadadhātprabhuḥ tannābhimaṁḍale kecillomaśādyā munīśvarāḥ

प्रभु ने नासिका में मोती के समान एक ब्रह्मांड धारण किया। उसकी नाभि के मंडल में लोमश आदि कुछ मुनीश्वर —

श्लोक 186 (padma.5.105.186)

तपस्तपंतः सुमहदीश्वरं पर्युपासते । अथ विष्णुर्महातेजाश्चिंतामाप सिसृक्षया

tapastapaṁtaḥ sumahadīśvaraṁ paryupāsate atha viṣṇurmahātejāściṁtāmāpa sisṛkṣayā

महान तप करते हुए उस ईश्वर की उपासना कर रहे थे। तब महातेजस्वी विष्णु को सृष्टि की इच्छा से चिंता उत्पन्न हुई।

श्लोक 187 (padma.5.105.187)

ध्यानयोगपरो भूत्वा न किंचित्पर्यपश्यत । अथ दुःखेन महता रुरोदोच्चैः पुनः पुनः

dhyānayogaparo bhūtvā na kiṁcitparyapaśyata atha duḥkhena mahatā rurodoccaiḥ punaḥ punaḥ

ध्यान-योग में लीन होकर भी उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। तब वे अत्यंत दुःख से बार-बार ऊँचे स्वर में रो पड़े।

श्लोक 188 (padma.5.105.188)

एतस्मिन्नंतरे दीप्तिः काचिल्लोकविलक्षणा । दृष्ट्वा च हरिणा भीत्या लोचने च निमीलिते

etasminnaṁtare dīptiḥ kācillokavilakṣaṇā dṛṣṭvā ca hariṇā bhītyā locane ca nimīlite

इसी बीच लोक से भिन्न कोई एक दीप्ति प्रकट हुई। उसे देखकर हरि ने भय से अपने दोनों नेत्र मूँद लिए।

श्लोक 189 (padma.5.105.189)

आगम्यमानो गोक्षीरसमतेजाः स गात्रवान् । संग्रथ्य कोटिब्रह्मांडदामयुग्मं करद्वये

āgamyamāno gokṣīrasamatejāḥ sa gātravān saṁgrathya koṭibrahmāṁḍadāmayugmaṁ karadvaye

गोक्षीर के समान तेजस्वी, विशाल-देह वाला वह आता हुआ दिखाई दिया — दोनों हाथों में करोड़ों ब्रह्मांडों की माला बाँधे हुए —

श्लोक 190 (padma.5.105.190)

दधानमुरसा धामकोटिब्रह्मांडकल्पितम् । ब्रह्मांडमेकं निपतदुत्पतच्च करद्वये

dadhānamurasā dhāmakoṭibrahmāṁḍakalpitam brahmāṁḍamekaṁ nipatadutpatacca karadvaye

और वक्षस्थल पर करोड़ों ब्रह्मांडों से रचित तेज धारण किए हुए — एक ब्रह्मांड उसके दोनों हाथों में गिरता-उठता हुआ —

श्लोक 191 (padma.5.105.191)

सर्वाभरणसंयुक्तं तथाभूतं तमव्ययम् । विष्णुस्तुष्टाव चादृष्ट्वा दर्शनाय च तस्य वै

sarvābharaṇasaṁyuktaṁ tathābhūtaṁ tamavyayam viṣṇustuṣṭāva cādṛṣṭvā darśanāya ca tasya vai

सब आभूषणों से युक्त, वैसा ही अव्यय रूप देखकर, बिना उसे साक्षात् देखे भी, विष्णु ने उसके दर्शन के लिए स्तुति की।

श्लोक 192 (padma.5.105.192)

विष्णुरुवाच- नमस्ते देवदेवेश नमस्ते शाश्वताव्यय । न जानेऽहं भवंतं भोस्त्वं च वेत्सि नमोनमः

viṣṇuruvāca- namaste devadeveśa namaste śāśvatāvyaya na jāne'haṁ bhavaṁtaṁ bhostvaṁ ca vetsi namonamaḥ

विष्णु ने कहा— हे देवाधिदेव! हे देवेश! आपको नमस्कार, हे शाश्वत-अव्यय! आपको नमस्कार। मैं आपको नहीं जानता, हे प्रभो! आप ही जानते हैं; आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 193 (padma.5.105.193)

जानामि न च ते भावं दुर्निरीक्ष्या च ते द्युतिः । माणिक्यकुंडलं हेमदामजालविभूषितम्

jānāmi na ca te bhāvaṁ durnirīkṣyā ca te dyutiḥ māṇikyakuṁḍalaṁ hemadāmajālavibhūṣitam

मैं आपके भाव को नहीं जानता, आपकी दीप्ति देखी नहीं जा सकती। माणिक्य के कुंडल, स्वर्ण-माला-जाल से विभूषित —

श्लोक 194 (padma.5.105.194)

रत्नांगुलीयं सुभगं बाहुकोष्ठविभूषणम् । तनुरक्तोत्तमाकीर्ण दीप्तायतविलोचनम्

ratnāṁgulīyaṁ subhagaṁ bāhukoṣṭhavibhūṣaṇam tanuraktottamākīrṇa dīptāyatavilocanam

रत्न-जड़ित अंगूठी, भुजाओं और कुक्षियों के आभूषणों से सुशोभित; लाल तन के बीच फैले, देदीप्यमान, विशाल नेत्रों वाले —

श्लोक 195 (padma.5.105.195)

बाणलोचनसंकाशं भाललोचनमव्ययम् । कंदर्पकार्मुकभ्रांतिजनक भ्रुवमीश्वरम्

bāṇalocanasaṁkāśaṁ bhālalocanamavyayam kaṁdarpakārmukabhrāṁtijanaka bhruvamīśvaram

बाण जैसे नेत्रों वाले, अविनाशी, ललाट-नेत्र वाले; कामदेव के धनुष का भ्रम उत्पन्न करने वाली भौंहों वाले ईश्वर —

श्लोक 196 (padma.5.105.196)

स्निग्धाधोन्नतचार्वंग नासमच्छकपोलकम् । मंदस्मितं प्रसन्नास्यं विभुं बालेंदुदर्शनम्

snigdhādhonnatacārvaṁga nāsamacchakapolakam maṁdasmitaṁ prasannāsyaṁ vibhuṁ bāleṁdudarśanam

स्निग्ध, नीचे-ऊपर उठे सुंदर अंगों वाले, निर्मल गालों वाली नासिका वाले; मंद-हास्य से युक्त प्रसन्न मुख वाले, बाल-चंद्र जैसे दर्शन वाले प्रभु —

श्लोक 197 (padma.5.105.197)

विज्ञानरक्तवसनं वेदकल्पितभूषणम् । शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि चक्षुर्मे दीयतां विभो

vijñānaraktavasanaṁ vedakalpitabhūṣaṇam śaraṇaṁ tvāṁ prapanno'smi cakṣurme dīyatāṁ vibho

विज्ञान-रंजित वस्त्र वाले, वेद-रचित आभूषण वाले — मैं आपकी शरण में आया हूँ; हे प्रभो! मुझे दृष्टि दीजिए।

श्लोक 198 (padma.5.105.198)

दीनांधकृपणाज्ञाननष्टस्य शरणं भव । अथ दिव्यं ददौ चक्षुः स्वात्मदर्शनशक्तिमत्

dīnāṁdhakṛpaṇājñānanaṣṭasya śaraṇaṁ bhava atha divyaṁ dadau cakṣuḥ svātmadarśanaśaktimat

दीन, अंध, दरिद्र, अज्ञान से नष्ट हुए मेरे लिए शरण बनिए। तब उसने दिव्य, स्वयं को देखने की शक्ति वाला नेत्र प्रदान किया।

श्लोक 199 (padma.5.105.199)

अथ दृष्ट्वा हरिः शंभुं त्रिनेत्रं पुरतः स्थितम् । को भवानित्युवाचाथ न जाने त्वां महायशः

atha dṛṣṭvā hariḥ śaṁbhuṁ trinetraṁ purataḥ sthitam ko bhavānityuvācātha na jāne tvāṁ mahāyaśaḥ

तब सामने खड़े त्रिनेत्र शंभु को देखकर हरि ने कहा — आप कौन हैं? हे महायशस्वी! मैं आपको नहीं जानता।

श्लोक 200 (padma.5.105.200)

प्रणामं केवलं कर्तुं शक्तोऽस्मि न हि वेदितुम् । सदाशिव उवाच- तव ज्ञानं प्रदास्यामि कुरु स्नानं च वारुणम्

praṇāmaṁ kevalaṁ kartuṁ śakto'smi na hi veditum sadāśiva uvāca- tava jñānaṁ pradāsyāmi kuru snānaṁ ca vāruṇam

मैं केवल प्रणाम करने में समर्थ हूँ, जानने में नहीं। सदाशिव ने कहा— मैं तुम्हें ज्ञान दूँगा, पहले वारुण (जल-) स्नान करो।

श्लोक 201 (padma.5.105.201)

भस्मस्नानं ततः पश्चात्ततो ज्ञानं वदाम्यहम् । श्रीभगवानुवाच- मत्स्नानयोग्यं सलिलं न चतिष्ठति कुत्रचित्

bhasmasnānaṁ tataḥ paścāttato jñānaṁ vadāmyaham śrībhagavānuvāca- matsnānayogyaṁ salilaṁ na catiṣṭhati kutracit

उसके बाद भस्म-स्नान करो, फिर मैं तुम्हें ज्ञान दूँगा। श्रीभगवान (विष्णु) ने कहा — मेरे स्नान योग्य जल कहीं भी नहीं ठहरता।

श्लोक 202 (padma.5.105.202)

इत्युक्तोथ निषण्णस्तु ब्रह्मांडासक्तविग्रहः । ऊरुदघ्नजले स्नातुं न योग्यमभवद्धरेः

ityuktotha niṣaṇṇastu brahmāṁḍāsaktavigrahaḥ ūrudaghnajale snātuṁ na yogyamabhavaddhareḥ

यह कहे जाने पर, ब्रह्मांड में समाया हुआ विशाल शरीर वाला वह बैठ गया; हरि के लिए घुटने-भर जल में स्नान करना भी योग्य नहीं रहा।

श्लोक 203 (padma.5.105.203)

शंभुर्जहास स्नानाय जलमत्यधिकं त्वहो । दधीच उवाच- अथ देवः शिवो विष्णुं भालाक्षेण व्यलोकयत्

śaṁbhurjahāsa snānāya jalamatyadhikaṁ tvaho dadhīca uvāca- atha devaḥ śivo viṣṇuṁ bhālākṣeṇa vyalokayat

शंभु हँस पड़े — स्नान के लिए इतना अधिक जल! हे आश्चर्य! दधीचि ने कहा— तब देव शिव ने अपने भाल-नेत्र से विष्णु को देखा —

श्लोक 204 (padma.5.105.204)

विलीनसूक्ष्मावयवं वामाक्षेण व्यलोकयत् । ततः सूक्ष्मतनुर्विष्णुः शीतदेहश्च शंभुना

vilīnasūkṣmāvayavaṁ vāmākṣeṇa vyalokayat tataḥ sūkṣmatanurviṣṇuḥ śītadehaśca śaṁbhunā

जिससे उनके अंग सूक्ष्म होकर विलीन हो गए; और अपने वाम-नेत्र से देखा — तब विष्णु का शरीर सूक्ष्म और शीतल हो गया।

श्लोक 205 (padma.5.105.205)

उक्तश्च स्नाहि भो विष्णो ह्रद एष विकल्पितः । ततो ह्रदे हरिः स्नातुं हरांके कल्पिते तदा

uktaśca snāhi bho viṣṇo hrada eṣa vikalpitaḥ tato hrade hariḥ snātuṁ harāṁke kalpite tadā

शंभु ने कहा — हे विष्णु! स्नान करो, यह सरोवर तुम्हारे लिए ही रचा गया है। तब हरि उस शिव द्वारा रचे गए सरोवर में स्नान के लिए —

श्लोक 206 (padma.5.105.206)

प्रवेष्टुं न शशाकाथ गंभीरे तद्ध्रदस्य तु । हरिराह च नो पंथा ह्रदस्यास्य प्रवेशने

praveṣṭuṁ na śaśākātha gaṁbhīre taddhradasya tu harirāha ca no paṁthā hradasyāsya praveśane

प्रवेश नहीं कर सके, क्योंकि वह उस सरोवर से भी अधिक गहरा हो गया। हरि ने कहा — इस सरोवर में प्रवेश का कोई मार्ग नहीं है —

श्लोक 207 (padma.5.105.207)

मार्गो मे दीयतां देव तमथो शंभुरब्रवीत् । कोटियोजनगंभीरं जलमेतन्महत्पुरा

mārgo me dīyatāṁ deva tamatho śaṁbhurabravīt koṭiyojanagaṁbhīraṁ jalametanmahatpurā

हे देव! मुझे मार्ग दीजिए। तब शंभु ने कहा — पहले यह जल करोड़ों योजन गहरा था —

श्लोक 208 (padma.5.105.208)

निविष्टस्यैव भवत ऊरुदघ्नं जलं विभो । इदानीं तिष्ठतश्चापि न प्रवेशो ह्रदे कथम्

niviṣṭasyaiva bhavata ūrudaghnaṁ jalaṁ vibho idānīṁ tiṣṭhataścāpi na praveśo hrade katham

हे प्रभो! उसमें प्रवेश करने पर तुम्हारे लिए केवल घुटने-भर जल था। अब खड़े रहने पर भी सरोवर में प्रवेश कैसे नहीं होता?

श्लोक 209 (padma.5.105.209)

अष्टांगुलप्रमाणोऽयमूरुस्तस्मिन्ह्रदे च मे । पश्यामि प्रविश त्वं च पादस्पर्शं ददामि ते

aṣṭāṁgulapramāṇo'yamūrustasminhrade ca me paśyāmi praviśa tvaṁ ca pādasparśaṁ dadāmi te

यह मेरा घुटना केवल आठ अंगुल का प्रमाण है, और इसी सरोवर में है। देखो, तुम प्रवेश करो, मैं तुम्हें चरण-स्पर्श देता हूँ।

श्लोक 210 (padma.5.105.210)

वाक्यमेकं तु सोपानं वेदं मद्वाक्यनिस्सृतम् । हरिरुवाच- शब्दारोहणसामर्थ्यं कस्यापीह न विद्यते

vākyamekaṁ tu sopānaṁ vedaṁ madvākyanissṛtam hariruvāca- śabdārohaṇasāmarthyaṁ kasyāpīha na vidyate

एक वचन ही सोपान है, वेद ही मेरे वचन से निकला है। हरि ने कहा — यहाँ किसी में भी शब्द पर चढ़ने की सामर्थ्य नहीं है।

श्लोक 211 (padma.5.105.211)

मूर्तस्य ग्रहणं शक्यं ग्रहणं वा कथं श्रुतेः । शंभुरुवाच- पुंसः शक्तिर्न वस्तूनां धारणारोहणादिषु

mūrtasya grahaṇaṁ śakyaṁ grahaṇaṁ vā kathaṁ śruteḥ śaṁbhuruvāca- puṁsaḥ śaktirna vastūnāṁ dhāraṇārohaṇādiṣu

मूर्त वस्तु का ग्रहण संभव है, पर श्रुति का ग्रहण कैसे हो? शंभु ने कहा — पुरुष की शक्ति वस्तुओं को धारण करने और उन पर चढ़ने में नहीं होती।

श्लोक 212 (padma.5.105.212)

गृहाणेमं महावेदं जग्राह हरिरप्यथ । नम्रकरश्चाशक्तेर्हि पतन्निव जनार्द्दनः

gṛhāṇemaṁ mahāvedaṁ jagrāha harirapyatha namrakaraścāśakterhi patanniva janārddanaḥ

इस महान वेद को ग्रहण करो — तब हरि ने भी उसे ग्रहण किया, विनम्र हाथों वाला, असमर्थतावश जैसे गिरता हुआ जनार्दन —

श्लोक 213 (padma.5.105.213)

न च शक्यं मया धर्तुमिति प्राह शिवं हरिः । शिवः प्रहस्य निपती पात्यतीव महाह्रदे

na ca śakyaṁ mayā dhartumiti prāha śivaṁ hariḥ śivaḥ prahasya nipatī pātyatīva mahāhrade

मैं इसे धारण करने में समर्थ नहीं हूँ — यह हरि ने शिव से कहा। शिव हँसकर, उन्हें गिराते हुए, महासरोवर में और भी गिरा दिया।

श्लोक 214 (padma.5.105.214)

तत्सोपानमथारुह्य स्नातुमर्हसि केशव । दधीच उवाच- वेदे सोपानभूते हि ऊरुदघ्नोपलब्धिनि

tatsopānamathāruhya snātumarhasi keśava dadhīca uvāca- vede sopānabhūte hi ūrudaghnopalabdhini

उस सोपान पर चढ़कर, हे केशव! तुम स्नान करने योग्य हो। दधीचि ने कहा— वेद ही सोपान बना, जिससे घुटने-भर जल की प्राप्ति हुई।

श्लोक 215 (padma.5.105.215)

तत्र स्नात्वा स विधिना बहिरुत्तीर्य चोक्तवान् । स्नातोऽस्मि किमतः कार्यं शंभुराह हरिं ततः

tatra snātvā sa vidhinā bahiruttīrya coktavān snāto'smi kimataḥ kāryaṁ śaṁbhurāha hariṁ tataḥ

वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, बाहर निकलकर उसने कहा — मैं स्नान कर चुका, अब क्या करना है? तब शंभु ने हरि से कहा —

श्लोक 216 (padma.5.105.216)

ध्यायसे हृदये किं त्वं न च किंचिद्वदस्व मे । हरिर्न किंचिदित्याह तमथो शंभुरुक्तवान्

dhyāyase hṛdaye kiṁ tvaṁ na ca kiṁcidvadasva me harirna kiṁcidityāha tamatho śaṁbhuruktavān

तुम अपने हृदय में क्या ध्यान करते हो? कुछ भी हो, मुझे बताओ। हरि ने कहा — कुछ नहीं। तब शंभु ने कहा —

श्लोक 217 (padma.5.105.217)

भस्मस्नानेन संशुद्धो वेत्स्यसे परमं शुभम् । दीक्षितस्य हि तच्छस्तं तद्रक्षां करवाण्यहम्

bhasmasnānena saṁśuddho vetsyase paramaṁ śubham dīkṣitasya hi tacchastaṁ tadrakṣāṁ karavāṇyaham

भस्म-स्नान से शुद्ध होकर तुम परम कल्याण को जानोगे। दीक्षित के लिए यही उत्तम कहा गया है; मैं उसकी रक्षा करता हूँ।

श्लोक 218 (padma.5.105.218)

दधीच उवाच- स्ववक्षः स्थितभस्मैकं नखेनादाय शंकरः । प्रणवेनाभिमंत्र्याथ गायत्र्या ब्रह्मभूतया

dadhīca uvāca- svavakṣaḥ sthitabhasmaikaṁ nakhenādāya śaṁkaraḥ praṇavenābhimaṁtryātha gāyatryā brahmabhūtayā

दधीचि ने कहा— अपने ही वक्षस्थल पर स्थित भस्म को नाखून से लेकर, शंकर ने उसे प्रणव से और ब्रह्मस्वरूपा गायत्री से अभिमंत्रित करके —

श्लोक 219 (padma.5.105.219)

अंगुलिभ्यामुपादाय शिवः पंचाक्षरेण वै । हरिमस्तकगात्रेषु सर्वेष्वपि समाक्षिपत्

aṁgulibhyāmupādāya śivaḥ paṁcākṣareṇa vai harimastakagātreṣu sarveṣvapi samākṣipat

दोनों अंगुलियों से उठाकर, शिव ने पंचाक्षर मंत्र से हरि के मस्तक और सारे शरीर के अंगों पर छिड़क दिया।

श्लोक 220 (padma.5.105.220)

शांतदृष्ट्या निरीक्ष्याथ जीवेत्याह हरिं हरः । ध्यायस्व किं ते हृदये स च ध्यानपरोऽभवत्

śāṁtadṛṣṭyā nirīkṣyātha jīvetyāha hariṁ haraḥ dhyāyasva kiṁ te hṛdaye sa ca dhyānaparo'bhavat

शांत दृष्टि से देखकर हर ने हरि से कहा — जीवित हो जाओ; अपने हृदय में क्या ध्यान करते हो? और वह ध्यान में लीन हो गए।

श्लोक 221 (padma.5.105.221)

अपश्यद्धृदये दीपं दीर्घाकारमतिप्रभम् । हरिराह शिवं साक्षाद्दीपो दृष्टो मयेति च

apaśyaddhṛdaye dīpaṁ dīrghākāramatiprabham harirāha śivaṁ sākṣāddīpo dṛṣṭo mayeti ca

उन्होंने हृदय में एक दीर्घ आकार का, अत्यंत प्रकाशमान दीपक देखा। हरि ने शिव से साक्षात् कहा — मैंने एक दीपक देखा है।

श्लोक 222 (padma.5.105.222)

शिवः प्राह न ते ज्ञानं परिपक्वमथो हरे । भस्म भक्षय ते ज्ञानं समग्रं संभविष्यति

śivaḥ prāha na te jñānaṁ paripakvamatho hare bhasma bhakṣaya te jñānaṁ samagraṁ saṁbhaviṣyati

शिव ने कहा — हे हरे! तुम्हारा ज्ञान अभी पूर्ण परिपक्व नहीं हुआ है। भस्म भक्षण करो, तुम्हारा ज्ञान संपूर्ण हो जाएगा।

श्लोक 223 (padma.5.105.223)

हरिरुवाच- भक्षयिष्ये शुभं भस्म स्नातोऽहं भस्मना पुरा । दृष्ट्वेश्वरं भक्तिगम्यं भस्माभक्षयदच्युतः

hariruvāca- bhakṣayiṣye śubhaṁ bhasma snāto'haṁ bhasmanā purā dṛṣṭveśvaraṁ bhaktigamyaṁ bhasmābhakṣayadacyutaḥ

हरि ने कहा — मैं यह शुभ भस्म खाऊँगा, पहले मैं इससे स्नान भी कर चुका हूँ। साक्षात् भक्तिगम्य ईश्वर को देखकर अच्युत ने भस्म खा लिया।

श्लोक 224 (padma.5.105.224)

तत्राश्चर्यमतीवासीत्पक्वबिंबसमद्युतिः । वासुदेवः शुद्धमुक्ताफलवर्णोऽभवत्क्षणात्

tatrāścaryamatīvāsītpakvabiṁbasamadyutiḥ vāsudevaḥ śuddhamuktāphalavarṇo'bhavatkṣaṇāt

वहाँ एक अत्यंत आश्चर्यजनक बात हुई — पके हुए बिंब-फल के समान कांति वाले, वासुदेव क्षणभर में शुद्ध मोती के रंग के हो गए।

श्लोक 225 (padma.5.105.225)

ततःप्रभृति शुक्लोऽसौ वासुदेवः प्रसन्नवान् । पुनर्ध्यानपरो भूत्वा दीपमध्ये च पूरुषम्

tataḥprabhṛti śuklo'sau vāsudevaḥ prasannavān punardhyānaparo bhūtvā dīpamadhye ca pūruṣam

तब से वह वासुदेव श्वेत और प्रसन्न हो गए। फिर ध्यान में लीन होकर उन्होंने दीपक के भीतर एक पुरुष को देखा —

श्लोक 226 (padma.5.105.226)

शुद्धस्फटिकसंकाशं त्रिनेत्रं द्विभुजं शिवम् । वरदं दक्षिणे हस्ते वामे चाभयदं विभुम्

śuddhasphaṭikasaṁkāśaṁ trinetraṁ dvibhujaṁ śivam varadaṁ dakṣiṇe haste vāme cābhayadaṁ vibhum

शुद्ध स्फटिक के समान, त्रिनेत्र, द्विभुज शिव को — दाहिने हाथ में वरद-मुद्रा, बाएँ में अभय-मुद्रा धारण किए हुए प्रभु को —

श्लोक 227 (padma.5.105.227)

पंचवर्षीयवपुषं शरच्चंद्रायुतद्युतिम् । माणिक्यकुंडलं हेम दामजालविभूषितम्

paṁcavarṣīyavapuṣaṁ śaraccaṁdrāyutadyutim māṇikyakuṁḍalaṁ hema dāmajālavibhūṣitam

पाँच वर्ष के बालक जैसी देह वाले, शरद्-चंद्रों के समूह जैसी कांति वाले; माणिक्य के कुंडल, स्वर्ण-माला-जाल से विभूषित —

श्लोक 228 (padma.5.105.228)

रत्नांगुलीयसुभगं बाहुकोष्ठसुभूषणम् । तनुरक्तोष्ठमाकर्ण दीर्घायतविलोचनम्

ratnāṁgulīyasubhagaṁ bāhukoṣṭhasubhūṣaṇam tanuraktoṣṭhamākarṇa dīrghāyatavilocanam

रत्न-जड़ित सुंदर अंगूठी, भुजाओं-कुक्षियों के आभूषणों से युक्त; लाल अधरों तक फैले, दीर्घ-विशाल नेत्रों वाले —

श्लोक 229 (padma.5.105.229)

बाणलोचनसंकाशं भाललोचनमव्ययम् । कंदर्पकार्मुकभ्रांतिजनकभ्रुवमीश्वरम्

bāṇalocanasaṁkāśaṁ bhālalocanamavyayam kaṁdarpakārmukabhrāṁtijanakabhruvamīśvaram

बाण जैसे नेत्रों वाले, अविनाशी, भाल-नेत्र वाले; कामदेव के धनुष का भ्रम उत्पन्न करने वाली भौंहों वाले ईश्वर —

श्लोक 230 (padma.5.105.230)

स्निग्धोन्नत सुचार्वंग नासमच्छकपोलकम् । मंदस्मितं प्रसन्नास्यं बालेंदुदर्शनं विभुम्

snigdhonnata sucārvaṁga nāsamacchakapolakam maṁdasmitaṁ prasannāsyaṁ bāleṁdudarśanaṁ vibhum

स्निग्ध, उन्नत, सुंदर अंगों वाले, निर्मल गालों वाली नासिका वाले; मंद-हास्य से युक्त प्रसन्न मुख, बाल-चंद्र जैसे दर्शन वाले प्रभु —

श्लोक 231 (padma.5.105.231)

विज्ञानरक्तवसनं वेदकल्पितनूपुरम् । वामांगुलीयमध्यस्थमतिप्रणवमव्ययम्

vijñānaraktavasanaṁ vedakalpitanūpuram vāmāṁgulīyamadhyasthamatipraṇavamavyayam

विज्ञान-रंजित वस्त्र, वेद-रचित नूपुर वाले; बाईं अंगुली में अंगूठी के मध्य स्थित, अत्यंत प्रणव-स्वरूप, अविनाशी उसे —

श्लोक 232 (padma.5.105.232)

दृष्टवानथ तं विष्णुः कृतकृत्योऽभवत्तदा । अथाह शंभुर्भो विष्णो हृदि दृष्टं त्वया किमु

dṛṣṭavānatha taṁ viṣṇuḥ kṛtakṛtyo'bhavattadā athāha śaṁbhurbho viṣṇo hṛdi dṛṣṭaṁ tvayā kimu

विष्णु ने देखा, तब वे कृतकृत्य हो गए। तब शंभु ने कहा — हे विष्णु! हृदय में तुमने क्या देखा है?

श्लोक 233 (padma.5.105.233)

हरिराह पुरा दृष्टः पुरुषः शांतविग्रहः । इत्युदीर्य महाविष्णुः शिवपादे पपात ह

harirāha purā dṛṣṭaḥ puruṣaḥ śāṁtavigrahaḥ ityudīrya mahāviṣṇuḥ śivapāde papāta ha

हरि ने कहा — मैंने पहले एक शांत आकृति वाले पुरुष को देखा। यह कहकर महाविष्णु शिव के चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 234 (padma.5.105.234)

हरिरुवाच- न शक्तिं भस्मनो जाने प्रभावं वा कुतस्तव । नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु त्वामेव शरणं गतः

hariruvāca- na śaktiṁ bhasmano jāne prabhāvaṁ vā kutastava namaste'stu namaste'stu tvāmeva śaraṇaṁ gataḥ

हरि ने कहा — मैं भस्म की शक्ति नहीं जानता, न ही आपके प्रभाव को। आपको नमस्कार, आपको नमस्कार; मैं आपकी ही शरण में आया हूँ।

श्लोक 235 (padma.5.105.235)

सदाशिव उवाच- वरं वृणु महाभाग मनसा यं त्वमिच्छसि । शिववाचमथाकर्ण्य हरिर्वव्रे वरोत्तमम्

sadāśiva uvāca- varaṁ vṛṇu mahābhāga manasā yaṁ tvamicchasi śivavācamathākarṇya harirvavre varottamam

सदाशिव ने कहा— हे महाभाग! मन से जो वर चाहते हो, माँगो। शिव के इस वचन को सुनकर हरि ने उत्तम वर माँगा।

श्लोक 236 (padma.5.105.236)

हरिरुवाच- त्वत्पादयुगले शंभो भक्तिरस्तु सदा मम । अथ दत्वा वरं शंभुरिदमाह वचो हरिम्

hariruvāca- tvatpādayugale śaṁbho bhaktirastu sadā mama atha datvā varaṁ śaṁbhuridamāha vaco harim

हरि ने कहा — हे शंभो! आपके चरण-युगल में मेरी सदा भक्ति बनी रहे। तब वर देकर शंभु ने हरि से यह वचन कहा —

श्लोक 237 (padma.5.105.237)

भस्मधारणसंपन्नो मम भक्तो भविष्यसि । दधीच उवाच- इत्थमुक्तं महाज्ञानं भस्मसंभवमादितः

bhasmadhāraṇasaṁpanno mama bhakto bhaviṣyasi dadhīca uvāca- itthamuktaṁ mahājñānaṁ bhasmasaṁbhavamāditaḥ

भस्म-धारण से संपन्न होकर तुम मेरे भक्त बनोगे। दधीचि ने कहा— इस प्रकार आरंभ से भस्म से उत्पन्न यह महाज्ञान —

श्लोक 238 (padma.5.105.238)

तस्माद्यूयं सुराः सर्वे धारयध्वं तदादरात् । विस्मयोत्फुल्लनयना देवाश्चासंस्तदस्त्विति

tasmādyūyaṁ surāḥ sarve dhārayadhvaṁ tadādarāt vismayotphullanayanā devāścāsaṁstadastviti

इसलिए तुम सब देवगण भी इसे आदरपूर्वक धारण करो। विस्मय से खिले नेत्रों वाले देवताओं ने 'ऐसा ही हो' कहा।

श्लोक 239 (padma.5.105.239)

य इदं शृणुयान्नित्यं पुण्याख्यानमनुत्तमम् । विमुक्तः सर्वपापेभ्यो यात्यसौ शांकरं पदम्

ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ puṇyākhyānamanuttamam vimuktaḥ sarvapāpebhyo yātyasau śāṁkaraṁ padam

जो कोई भी इस अनुपम पुण्य-कथा को नित्य सुनता है, वह सब पापों से मुक्त होकर शांकर पद को प्राप्त होता है।

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