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पाताल खण्ड · अध्याय 25

सुबाहु की सेना का समागम

अध्याय 24अध्याय-सूचीअध्याय 26

श्लोक 1 (padma.5.25.1)

शेष उवाच। अथ वीक्ष्य भटान्निजान्नृपो रुधिरौघेण परिप्लुतांगकान् । सुखमाप न वै शुशोच तान्परिपप्रच्छ सुतस्य चेष्टितम्

śeṣa uvāca atha vīkṣya bhaṭānnijānnṛpo rudhiraugheṇa pariplutāṁgakān sukhamāpa na vai śuśoca tānparipapraccha sutasya ceṣṭitam

शेष जी ने कहा — तब रक्त की धाराओं से भीगे अंगों वाले अपने योद्धाओं को देखकर राजा को कोई सुख नहीं मिला; बिना शोक प्रकट किए उन्होंने पुत्र का हाल पूछा।

श्लोक 2 (padma.5.25.2)

गदताखिलकर्म तस्य वै स कथं चाहरदश्ववर्यकम् । कथयंतु पुनः कियद्बलं बत वीराः कति योद्धुमागताः

gadatākhilakarma tasya vai sa kathaṁ cāharadaśvavaryakam kathayaṁtu punaḥ kiyadbalaṁ bata vīrāḥ kati yoddhumāgatāḥ

'उसका सारा कर्म मुझे बताओ — उसने वह श्रेष्ठ घोड़ा कैसे प्राप्त किया? यह भी बताओ, कितनी सेना, कितने वीर युद्ध करने आए थे?

श्लोक 3 (padma.5.25.3)

अथ शत्रुबलोन्मुखः कथं मम वीरो दमनो रणं व्यधात् । विजयं च विधाय दुर्जयं किल वीरं बत कोऽप्यशातयत्

atha śatrubalonmukhaḥ kathaṁ mama vīro damano raṇaṁ vyadhāt vijayaṁ ca vidhāya durjayaṁ kila vīraṁ bata ko'pyaśātayat

फिर शत्रु-सेना के सामने मेरे वीर दमन ने कैसे युद्ध किया? और दुर्जय विजय प्राप्त करके भी, अहो! उस वीर को किसने पराजित किया?'

श्लोक 4 (padma.5.25.4)

इत्याकर्ण्य वचो राज्ञः प्रत्यूचुस्तेऽस्य सेवकाः । क्षतजेन परिक्लिन्न गात्रवस्त्रादिधारिणः

ityākarṇya vaco rājñaḥ pratyūcuste'sya sevakāḥ kṣatajena pariklinna gātravastrādidhāriṇaḥ

राजा का यह वचन सुनकर उसके वे सेवक, जिनके अंग और वस्त्र रक्त से भीगे हुए थे, उत्तर देने लगे —

श्लोक 5 (padma.5.25.5)

राजन्नश्वं समालोक्य पत्रचिह्नाद्यलंकृतम् । ग्राहयामास गर्वेण तृणीकृत्य रघूत्तमम्

rājannaśvaṁ samālokya patracihnādyalaṁkṛtam grāhayāmāsa garveṇa tṛṇīkṛtya raghūttamam

'हे राजन्! पत्र-चिह्न आदि से अलंकृत घोड़े को देखकर उन्होंने रघुश्रेष्ठ को तिनके के समान मानकर गर्व से उसे पकड़वा लिया।

श्लोक 6 (padma.5.25.6)

ततो हयानुगः प्राप्तः स्वल्पसैन्यसमावृतः । तेन साकमभूद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्

tato hayānugaḥ prāptaḥ svalpasainyasamāvṛtaḥ tena sākamabhūdyuddhaṁ tumulaṁ romaharṣaṇam

तब घोड़े का अनुसरण करने वाला एक, अल्प सेना से घिरा हुआ पहुँचा; उसके साथ भीषण, रोमांचकारी युद्ध हुआ।

श्लोक 7 (padma.5.25.7)

तं मूर्च्छितं ततः कृत्वा तव पुत्रः स्वसायकैः । यावत्तिष्ठत्यथायातः शत्रुघ्नः स्वबलैर्वृतः

taṁ mūrcchitaṁ tataḥ kṛtvā tava putraḥ svasāyakaiḥ yāvattiṣṭhatyathāyātaḥ śatrughnaḥ svabalairvṛtaḥ

उसे अपने बाणों से मूर्च्छित करके आपके पुत्र खड़े ही थे कि शत्रुघ्न अपनी सेना सहित वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 8 (padma.5.25.8)

ततो युद्धं महदभूच्छस्त्रास्त्रपरिबृंहितम् । बहुशो जयमापेदे तव पुत्रो महाबलः

tato yuddhaṁ mahadabhūcchastrāstraparibṛṁhitam bahuśo jayamāpede tava putro mahābalaḥ

तब शस्त्रास्त्रों से भरा हुआ महान् युद्ध हुआ; आपके महाबली पुत्र ने अनेक बार विजय प्राप्त की।

श्लोक 9 (padma.5.25.9)

इदानीं तेन मुक्त्वास्त्रं शत्रुघ्नभ्रातृसूनुना । मूर्च्छितः प्रधने राजन्कृतो वीरः सुतस्तव

idānīṁ tena muktvāstraṁ śatrughnabhrātṛsūnunā mūrcchitaḥ pradhane rājankṛto vīraḥ sutastava

किंतु अब शत्रुघ्न के भाई के उस पुत्र द्वारा अस्त्र छोड़े जाने पर, हे राजन्! आपका वीर पुत्र युद्धभूमि में मूर्च्छित कर दिया गया।'

श्लोक 10 (padma.5.25.10)

इति वाक्यं समाकर्ण्य रोषशोकसमन्वितः । स्थगितांग इवासीत्स समुद्र इव पर्वणि

iti vākyaṁ samākarṇya roṣaśokasamanvitaḥ sthagitāṁga ivāsītsa samudra iva parvaṇi

यह वचन सुनकर क्रोध और शोक से भरे वे राजा मानो अंगों से स्तब्ध हो गए, जैसे पूर्णिमा पर समुद्र।

श्लोक 11 (padma.5.25.11)

उवाच सेनाधिपतिं रोषप्रस्फुरिताधरः । दन्तैर्दताँल्लिहन्नोष्ठं जिह्वया शोककर्शितः

uvāca senādhipatiṁ roṣaprasphuritādharaḥ dantairdatā~llihannoṣṭhaṁ jihvayā śokakarśitaḥ

क्रोध से काँपते होंठों वाले, दाँतों से काटे होंठ को जिह्वा से चाटते हुए, शोक से क्षीण उन्होंने सेनापति से कहा —

श्लोक 12 (padma.5.25.12)

सेनापते कुरुष्वारान्मम सेनां तु सज्जिताम् । योत्स्ये रामस्य सुभटैर्ममपुत्रोपघातकैः

senāpate kuruṣvārānmama senāṁ tu sajjitām yotsye rāmasya subhaṭairmamaputropaghātakaiḥ

'हे सेनापते! शीघ्र मेरी सेना को तैयार करो; मैं राम के उन श्रेष्ठ योद्धाओं से युद्ध करूँगा, जिन्होंने मेरे पुत्र पर आघात किया है।

श्लोक 13 (padma.5.25.13)

अद्याहं मम पुत्रस्य दुःखदं निशितैः शरैः । पातयिष्ये यदि ह्येनं रक्षितापि महेश्वरः

adyāhaṁ mama putrasya duḥkhadaṁ niśitaiḥ śaraiḥ pātayiṣye yadi hyenaṁ rakṣitāpi maheśvaraḥ

आज मैं तीक्ष्ण बाणों से उस मेरे पुत्र को दुःख देने वाले को गिरा दूँगा, चाहे स्वयं महेश्वर भी उसकी रक्षा क्यों न करें!'

श्लोक 14 (padma.5.25.14)

सेनापतिरिदं वाक्यं प्रोक्तं सुभुजभूपतेः । निशम्य च तथा कृत्वा सज्जीभूतो भवत्स्वयम्

senāpatiridaṁ vākyaṁ proktaṁ subhujabhūpateḥ niśamya ca tathā kṛtvā sajjībhūto bhavatsvayam

उस महाबाहु राजा का यह वचन सुनकर सेनापति ने वैसा ही करके स्वयं भी तैयार हो गया,

श्लोक 15 (padma.5.25.15)

राज्ञे निवेदयामास ससज्जां चतुरंगिणीम् । सेनां कालबलप्रख्यां हतदुर्जनकोटिकाम्

rājñe nivedayāmāsa sasajjāṁ caturaṁgiṇīm senāṁ kālabalaprakhyāṁ hatadurjanakoṭikām

और राजा से निवेदन किया कि उनकी काल-बल के समान, करोड़ों दुर्जनों को मार गिराने वाली चतुरंगिणी सेना तैयार है।

श्लोक 16 (padma.5.25.16)

श्रुत्वा सेनापतेर्वाक्यं सुबाहुः परवीरहा । निर्जगाम ततो यत्र शत्रुघ्नः स्वसुतार्दनः

śrutvā senāpatervākyaṁ subāhuḥ paravīrahā nirjagāma tato yatra śatrughnaḥ svasutārdanaḥ

सेनापति का यह वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहारक सुबाहु वहाँ चल पड़ा, जहाँ अपने पुत्र को पीड़ित करने वाला शत्रुघ्न था।

श्लोक 17 (padma.5.25.17)

कुंजरैश्च मदोन्मत्तैर्हयैश्चापि मनोजवैः । रथैश्च सर्वशस्त्रास्त्रपूरितै रिपुजेतृभिः

kuṁjaraiśca madonmattairhayaiścāpi manojavaiḥ rathaiśca sarvaśastrāstrapūritai ripujetṛbhiḥ

मद से उन्मत्त हाथियों, मन के समान वेगवान् घोड़ों, तथा सभी शस्त्रास्त्रों से भरे, शत्रुओं को जीतने वाले रथों से युक्त,

श्लोक 18 (padma.5.25.18)

भूश्चकंपे तदा तत्र सैन्यभारेण भूरिणा । संमर्दः सुमहानासीत्तत्र सैन्ये विसर्पति

bhūścakaṁpe tadā tatra sainyabhāreṇa bhūriṇā saṁmardaḥ sumahānāsīttatra sainye visarpati

उस समय वहाँ सेना के प्रचुर भार से पृथ्वी काँप उठी; चलती हुई उस सेना में महान् कोलाहल मच गया।

श्लोक 19 (padma.5.25.19)

राजानं निर्गतं दृष्ट्वा रथेन कनकांगिना । शत्रुघ्नबलमुद्युक्तं सर्ववैरिप्रहारकम्

rājānaṁ nirgataṁ dṛṣṭvā rathena kanakāṁginā śatrughnabalamudyuktaṁ sarvavairiprahārakam

स्वर्णांग रथ पर सवार राजा को निकलते हुए, तथा समस्त शत्रुओं का संहार करने वाली शत्रुघ्न की तत्पर सेना को देखकर —

श्लोक 20 (padma.5.25.20)

सुकेतुस्तस्य वै भ्राता गदायुद्धविशारदः । रथेनाश्वा जगामायं सर्वशस्त्रास्त्रपूरितः

suketustasya vai bhrātā gadāyuddhaviśāradaḥ rathenāśvā jagāmāyaṁ sarvaśastrāstrapūritaḥ

गदा-युद्ध में निपुण उसका भाई सुकेतु सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रों से भरे रथ द्वारा वहाँ गया।

श्लोक 21 (padma.5.25.21)

चित्रांगस्तु सुतो राज्ञः सर्वयुद्धविचक्षणः । जगाम स्वरथेनाशु शत्रुघ्नबलमुन्मदम्

citrāṁgastu suto rājñaḥ sarvayuddhavicakṣaṇaḥ jagāma svarathenāśu śatrughnabalamunmadam

समस्त युद्धों में निपुण राजा का पुत्र चित्रांग भी अपने रथ द्वारा शीघ्र शत्रुघ्न की उन्मत्त सेना की ओर गया।

श्लोक 22 (padma.5.25.22)

तस्यानुजो विचित्राख्यो विचित्ररणकोविदः । ययौ रथेन हैमेन भ्रातृदुःखेन पीडितः

tasyānujo vicitrākhyo vicitraraṇakovidaḥ yayau rathena haimena bhrātṛduḥkhena pīḍitaḥ

विचित्र युद्ध में कुशल उसका छोटा भाई विचित्र नामधारी, भाई के दुःख से पीड़ित होकर स्वर्ण-रथ द्वारा गया।

श्लोक 23 (padma.5.25.23)

अन्ये शूरा महेष्वासाः सर्वशस्त्रास्त्रकोविदाः । ययुर्नृपसमादिष्टाः प्रधनं वीरपूरितम्

anye śūrā maheṣvāsāḥ sarvaśastrāstrakovidāḥ yayurnṛpasamādiṣṭāḥ pradhanaṁ vīrapūritam

अन्य शूरवीर, महाधनुर्धर, समस्त शस्त्रास्त्रों में निपुण, राजा की आज्ञा से वीरों से भरे उस युद्धस्थल में गए।

श्लोक 24 (padma.5.25.24)

राजा सुबाहुः संरोषादागतः प्रधनांगणे । विलोकयामास सुतं मूर्च्छितं शरपीडितम्

rājā subāhuḥ saṁroṣādāgataḥ pradhanāṁgaṇe vilokayāmāsa sutaṁ mūrcchitaṁ śarapīḍitam

राजा सुबाहु क्रोध से युद्धभूमि में पहुँचकर अपने बाणों से पीड़ित, मूर्च्छित पुत्र को देखने लगे,

श्लोक 25 (padma.5.25.25)

रथोपस्थस्थितं मूढं स्वसुतं दमनाभिधम् । वीक्ष्य दुःखं मुहुः प्राप वीजयामास पल्लवैः

rathopasthasthitaṁ mūḍhaṁ svasutaṁ damanābhidham vīkṣya duḥkhaṁ muhuḥ prāpa vījayāmāsa pallavaiḥ

रथ के आसन पर पड़े, मूढ़ अपने पुत्र दमन को देखकर बार-बार दुःखी होते हुए उन्होंने उसे पत्तों से हवा की।

श्लोक 26 (padma.5.25.26)

जलेन सिक्तः संस्पृष्टो राज्ञा कोमलपाणिना । संज्ञामाप शनैर्वीरो दमनः परमास्त्रवित्

jalena siktaḥ saṁspṛṣṭo rājñā komalapāṇinā saṁjñāmāpa śanairvīro damanaḥ paramāstravit

राजा के कोमल हाथ से स्पर्शित, जल से सिंचित होकर, वीर, परम अस्त्र-ज्ञाता दमन को धीरे-धीरे चेतना प्राप्त हुई।

श्लोक 27 (padma.5.25.27)

उत्थितः क्व धनुर्मेऽस्ति क्व पुष्कल इतो गतः । संसज्य समरं त्यक्त्वा मद्बाणव्रणपीडितः

utthitaḥ kva dhanurme'sti kva puṣkala ito gataḥ saṁsajya samaraṁ tyaktvā madbāṇavraṇapīḍitaḥ

उठते हुए उन्होंने कहा — 'मेरा धनुष कहाँ है? पुष्कल यहाँ से कहाँ गया, मेरे बाण के घाव से पीड़ित होकर युद्ध छोड़कर?'

श्लोक 28 (padma.5.25.28)

इति वाक्यं समाकर्ण्य सुबाहुः पुत्रभाषितम् । परमं हर्षमापेदे परिरभ्य सुतं स्वकम्

iti vākyaṁ samākarṇya subāhuḥ putrabhāṣitam paramaṁ harṣamāpede parirabhya sutaṁ svakam

पुत्र के मुख से यह वचन सुनकर सुबाहु को परम हर्ष हुआ, और उन्होंने अपने पुत्र को आलिंगन किया।

श्लोक 29 (padma.5.25.29)

दमनो वीक्ष्य जनकं नृपं नम्रशिरोधरः । पपात पादयोर्भक्त्या क्षतदेहोऽस्त्रराजिभिः

damano vīkṣya janakaṁ nṛpaṁ namraśirodharaḥ papāta pādayorbhaktyā kṣatadeho'strarājibhiḥ

पिता राजा को देखकर, गर्दन झुकाए हुए, अस्त्रों की पंक्तियों से घायल शरीर वाले दमन भक्तिपूर्वक उनके चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 30 (padma.5.25.30)

स्वसुतं रथसंस्थं तु विधाय नृपतिः पुनः । जगाद सेनाधिपतिं रणकर्मविशारदः

svasutaṁ rathasaṁsthaṁ tu vidhāya nṛpatiḥ punaḥ jagāda senādhipatiṁ raṇakarmaviśāradaḥ

अपने पुत्र को पुनः रथ पर बिठाकर, युद्ध-कर्म में निपुण राजा ने सेनापति से कहा —

श्लोक 31 (padma.5.25.31)

व्यूहं रचय संग्रामे क्रौंचाख्यं रिपुदुर्जयम् । यमाविश्य जये सैन्यं शत्रुघ्नस्य महीपतेः

vyūhaṁ racaya saṁgrāme krauṁcākhyaṁ ripudurjayam yamāviśya jaye sainyaṁ śatrughnasya mahīpateḥ

'युद्ध में शत्रुओं के लिए दुर्जय क्रौंच नामक व्यूह की रचना करो, जिसमें प्रवेश करके शत्रुघ्न राजा की विजय के लिए तत्पर सेना —'

श्लोक 32 (padma.5.25.32)

तद्वाक्यमाकर्ण्य सुबाहुभूपतेः । क्रौंचाख्यसद्व्यूहविशेषमादधात् । यन्नो विशंते सहसा रिपोर्गणा । महाबलाः शस्त्रसमूहधारिणः

tadvākyamākarṇya subāhubhūpateḥ krauṁcākhyasadvyūhaviśeṣamādadhāt yanno viśaṁte sahasā riporgaṇā mahābalāḥ śastrasamūhadhāriṇaḥ

राजा सुबाहु का यह वचन सुनकर उसने वह श्रेष्ठ क्रौंच-व्यूह-विशेष रचा, जिसमें शत्रु के महाबली, शस्त्र-समूह धारण करने वाले गण भी अचानक प्रवेश नहीं कर सकते थे।

श्लोक 33 (padma.5.25.33)

मुखे सुकेतुस्तस्यासीद्गले चित्रांगसंज्ञकः । पक्षयो राजपुत्रौ द्वौ पुच्छे राजा प्रतिष्ठितः

mukhe suketustasyāsīdgale citrāṁgasaṁjñakaḥ pakṣayo rājaputrau dvau pucche rājā pratiṣṭhitaḥ

उसके मुख पर सुकेतु था, गले पर चित्रांग नामधारी, दोनों पंखों पर दोनों राजकुमार, पूँछ पर स्वयं राजा स्थित थे।

श्लोक 34 (padma.5.25.34)

मध्ये सैन्यं महत्तस्य चतुरंगैस्तु शोभितम् । कृत्वा न्यवेदयद्राज्ञे क्रौंचव्यूहं विचित्रितम्

madhye sainyaṁ mahattasya caturaṁgaistu śobhitam kṛtvā nyavedayadrājñe krauṁcavyūhaṁ vicitritam

मध्य में चतुरंगिणी सेना से सुशोभित उसकी विशाल सेना थी; इस विचित्र क्रौंच-व्यूह को बनाकर उसने राजा को निवेदित किया।

श्लोक 35 (padma.5.25.35)

राजा दृष्ट्वा सुसन्नद्धं क्रौंचव्यूहं सुनिर्मितम् । रणाय स्वमतिं चक्रे शत्रुघ्नकटके स्थितैः

rājā dṛṣṭvā susannaddhaṁ krauṁcavyūhaṁ sunirmitam raṇāya svamatiṁ cakre śatrughnakaṭake sthitaiḥ

अच्छी तरह सुसज्जित, सुनिर्मित क्रौंच-व्यूह को देखकर राजा ने शत्रुघ्न की छावनी में स्थित लोगों से युद्ध का निश्चय किया।

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