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पाताल खण्ड · अध्याय 27

चित्रांग-वध

अध्याय 26अध्याय-सूचीअध्याय 28

श्लोक 1 (padma.5.27.1)

शेष उवाच। चित्रांगः क्रौंचकंठस्थो रथस्थो वीरशोभितः । गाहयामास तत्सैन्यं वाराह इव वारिधिम्

śeṣa uvāca citrāṁgaḥ krauṁcakaṁṭhastho rathastho vīraśobhitaḥ gāhayāmāsa tatsainyaṁ vārāha iva vāridhim

शेष जी ने कहा — क्रौंच-व्यूह के गले पर स्थित, रथ पर सुशोभित वीर चित्रांग उस सेना में वराह के समान समुद्र में घुस पड़ा।

श्लोक 2 (padma.5.27.2)

धनुर्विस्फार्य सुदृढं मेघनादनिनादितम् । मुमोच बाणान्निशितान्वैरिकोटिविदाहकान्

dhanurvisphārya sudṛḍhaṁ meghanādanināditam mumoca bāṇānniśitānvairikoṭividāhakān

दृढ़, मेघ के समान गर्जना वाले धनुष को खींचकर उसने करोड़ों शत्रुओं को भस्म करने वाले तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 3 (padma.5.27.3)

तद्बाणभिन्नसर्वांगाः शेरते सुभटा भृशम् । सकिरीटतनुत्राणाः सन्दष्टदशनच्छदाः

tadbāṇabhinnasarvāṁgāḥ śerate subhaṭā bhṛśam sakirīṭatanutrāṇāḥ sandaṣṭadaśanacchadāḥ

उन बाणों से समस्त अंग भिद जाने पर श्रेष्ठ योद्धा, मुकुट-कवच सहित, दाँतों से काटे हुए ओठों वाले, गिरे पड़े रहे।

श्लोक 4 (padma.5.27.4)

एवं प्रवृत्ते संग्रामे ययौ योद्धुं स पुष्कलः । मणिचित्रितमादाय चापं वैरिप्रतापनम्

evaṁ pravṛtte saṁgrāme yayau yoddhuṁ sa puṣkalaḥ maṇicitritamādāya cāpaṁ vairipratāpanam

इस प्रकार युद्ध छिड़ जाने पर पुष्कल भी शत्रु को संतप्त करने वाला मणिजड़ित धनुष लेकर युद्ध करने चला।

श्लोक 5 (padma.5.27.5)

तयोः संगतयोरूपं दृश्यतेऽतिमनोहरम् । पुरा तारकसंग्रामे स्कंदतारकयोर्यथा

tayoḥ saṁgatayorūpaṁ dṛśyate'timanoharam purā tārakasaṁgrāme skaṁdatārakayoryathā

उन दोनों के मिलने का दृश्य अत्यंत मनोहर दिखाई देता था — जैसे पूर्वकाल में तारक-संग्राम में स्कंद और तारक का।

श्लोक 6 (padma.5.27.6)

विस्फारयन्धनुः शीघ्रं सव्यसाची तु पुष्कलः । ताडयामास तं क्षिप्रं शरैः सन्नतपर्वभिः

visphārayandhanuḥ śīghraṁ savyasācī tu puṣkalaḥ tāḍayāmāsa taṁ kṣipraṁ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

शीघ्र धनुष खींचते हुए, दोनों हाथों से बाण चलाने वाले पुष्कल ने सुसज्जित बाणों से उसे शीघ्र आहत किया।

श्लोक 7 (padma.5.27.7)

चित्रांगोऽपि रुषाक्रांतः शरासन इषूञ्छितान् । दधद्व्यमुंचद्बहुशो रणमंडलमूर्धनि

citrāṁgo'pi ruṣākrāṁtaḥ śarāsana iṣūñchitān dadhadvyamuṁcadbahuśo raṇamaṁḍalamūrdhani

क्रोध से भरे चित्रांग ने भी धनुष पर तीक्ष्ण बाण धारण करके युद्धभूमि के अग्रभाग में बार-बार उन्हें छोड़ा।

श्लोक 8 (padma.5.27.8)

नादानं न च संधानं न मोचनमथापि वा । दृष्टं तावेव संदृष्टौ कुंडलीकृतचापिनौ

nādānaṁ na ca saṁdhānaṁ na mocanamathāpi vā dṛṣṭaṁ tāveva saṁdṛṣṭau kuṁḍalīkṛtacāpinau

न चढ़ाना, न संधान, न छोड़ना ही दिखाई देता था — दोनों केवल वृत्ताकार मुड़े धनुष वाले ही दिखाई देते थे।

श्लोक 9 (padma.5.27.9)

तदासौ पुष्कलः क्रुद्धः शराणां शतकेन तम् । विव्याध वक्षःस्थलके महायोद्धारमुद्भटम्

tadāsau puṣkalaḥ kruddhaḥ śarāṇāṁ śatakena tam vivyādha vakṣaḥsthalake mahāyoddhāramudbhaṭam

तब क्रुद्ध पुष्कल ने उस उग्र महायोद्धा को वक्षस्थल पर सौ बाणों से बींध दिया।

श्लोक 10 (padma.5.27.10)

चित्रांगस्ताञ्शरान्सर्वांश्चिच्छेद तिलशः क्षणात् । ताडयामास चांगेषु पुष्कलं शितसायकैः

citrāṁgastāñśarānsarvāṁściccheda tilaśaḥ kṣaṇāt tāḍayāmāsa cāṁgeṣu puṣkalaṁ śitasāyakaiḥ

चित्रांग ने उन सभी बाणों को क्षणभर में तिल-तिल कर काट डाला, तथा तीक्ष्ण बाणों से पुष्कल के अंगों पर प्रहार किया।

श्लोक 11 (padma.5.27.11)

पुष्कलस्तद्रथं दिव्यं भ्रामकास्त्रेण शोभिना । नभसि भ्रामयामास तदद्भुतमिवाभवत्

puṣkalastadrathaṁ divyaṁ bhrāmakāstreṇa śobhinā nabhasi bhrāmayāmāsa tadadbhutamivābhavat

पुष्कल ने शोभायमान भ्रामक अस्त्र से उस दिव्य रथ को आकाश में घुमा दिया — यह मानो अद्भुत ही हुआ।

श्लोक 12 (padma.5.27.12)

भ्रांत्वा मुहूर्तमात्रं तु सरथो हयसंयुतः । स्थितिर्लेभेतिकष्टेन संधृतो रणमंडले

bhrāṁtvā muhūrtamātraṁ tu saratho hayasaṁyutaḥ sthitirlebhetikaṣṭena saṁdhṛto raṇamaṁḍale

क्षणभर घूमकर घोड़ों सहित वह रथ बड़ी कठिनाई से युद्धभूमि में पुनः स्थिरता को प्राप्त हुआ।

श्लोक 13 (padma.5.27.13)

स चास्य विक्रमं दृष्ट्वा चित्रांगः कुपितो भृशम् । उवाच पुष्कलं धीमान्सर्वास्त्रेषु विशारदः

sa cāsya vikramaṁ dṛṣṭvā citrāṁgaḥ kupito bhṛśam uvāca puṣkalaṁ dhīmānsarvāstreṣu viśāradaḥ

उसका यह पराक्रम देखकर अत्यंत क्रुद्ध, बुद्धिमान्, समस्त अस्त्रों में निपुण चित्रांग ने पुष्कल से कहा —

श्लोक 14 (padma.5.27.14)

चित्रांग उवाच। त्वया साधुकृतं कर्म सुभटैर्युधिसंमतम् । मद्रथो वाजिसंयुक्तो भ्रामितो नभसि क्षणम्

citrāṁga uvāca tvayā sādhukṛtaṁ karma subhaṭairyudhisaṁmatam madratho vājisaṁyukto bhrāmito nabhasi kṣaṇam

चित्रांग ने कहा — 'तुमने युद्ध में योद्धाओं द्वारा सम्मत श्रेष्ठ कर्म किया है — मेरे रथ को घोड़ों सहित क्षणभर आकाश में घुमा दिया।

श्लोक 15 (padma.5.27.15)

पराक्रमं समीक्षस्व ममापि सुभटेरितम् । आकाशचारी तु भवान्भवत्वमरपूजितः

parākramaṁ samīkṣasva mamāpi subhaṭeritam ākāśacārī tu bhavānbhavatvamarapūjitaḥ

अब एक श्रेष्ठ योद्धा द्वारा भेजा गया मेरा भी पराक्रम देखो — तुम भी आकाशचारी हो जाओ, देवताओं द्वारा पूजित!'

श्लोक 16 (padma.5.27.16)

इत्युक्त्वा स मुमोचास्त्रं रणे परमदारुणम् । धनुषा परमास्त्रज्ञः सर्वधर्मविदुत्तमः

ityuktvā sa mumocāstraṁ raṇe paramadāruṇam dhanuṣā paramāstrajñaḥ sarvadharmaviduttamaḥ

यह कहकर वह परम अस्त्र-ज्ञाता, समस्त धर्मों में श्रेष्ठ, युद्ध में धनुष से अत्यंत भयंकर अस्त्र छोड़ने लगा।

श्लोक 17 (padma.5.27.17)

तेन बाणेन संविद्धः खे बभ्राम पतंगवत् । सरथः सहयः संख्ये सध्वजश्च ससारथिः

tena bāṇena saṁviddhaḥ khe babhrāma pataṁgavat sarathaḥ sahayaḥ saṁkhye sadhvajaśca sasārathiḥ

उस बाण से बिंध जाने पर वह रथ, घोड़े, ध्वज तथा सारथि सहित उस युद्ध में पतंगे के समान आकाश में घूमने लगा।

श्लोक 18 (padma.5.27.18)

भ्रांत्वा सरथवर्यस्तु नभसि त्वरयान्वितः । यावत्स्थितिं न लभते तावन्मुक्तोऽपरः शरः

bhrāṁtvā sarathavaryastu nabhasi tvarayānvitaḥ yāvatsthitiṁ na labhate tāvanmukto'paraḥ śaraḥ

वह श्रेष्ठ रथ शीघ्रता से घूमते हुए, जब तक आकाश में स्थिरता न पा सका, तभी दूसरा बाण छोड़ दिया गया।

श्लोक 19 (padma.5.27.19)

पुनश्च परिबभ्राम रथः सूतसमन्वितः । तत्कर्मवीक्ष्य पुत्रस्य राज्ञो विस्मयमाप सः

punaśca paribabhrāma rathaḥ sūtasamanvitaḥ tatkarmavīkṣya putrasya rājño vismayamāpa saḥ

फिर से वह रथ सारथि सहित घूमने लगा। अपने पुत्र का यह कर्म देखकर राजा विस्मय को प्राप्त हुए।

श्लोक 20 (padma.5.27.20)

कथंचित्स्थितिमप्याप पुष्कलः परवीरहा । रथं जघान बाणैश्च ससूतहयमस्य च

kathaṁcitsthitimapyāpa puṣkalaḥ paravīrahā rathaṁ jaghāna bāṇaiśca sasūtahayamasya ca

शत्रुवीरों का संहारक पुष्कल किसी प्रकार पुनः स्थिरता को प्राप्त हुआ, तथा उसने बाणों से उसका रथ, सारथि और घोड़ों सहित नष्ट कर दिया।

श्लोक 21 (padma.5.27.21)

सभग्नस्यंदनो वीरः पुनरन्यं समाश्रितः । सोऽपि भग्नः शरैराशु पुष्कलेन रणांगणे

sabhagnasyaṁdano vīraḥ punaranyaṁ samāśritaḥ so'pi bhagnaḥ śarairāśu puṣkalena raṇāṁgaṇe

रथ टूट जाने पर वह वीर दूसरे पर आरूढ़ हुआ; वह भी शीघ्र ही पुष्कल के बाणों से युद्धभूमि में टूट गया।

श्लोक 22 (padma.5.27.22)

पुनरन्यं समास्थाय यावदायाति संमुखम् । तावद्बभंज निशितैः सायकैस्तद्रथं पुनः

punaranyaṁ samāsthāya yāvadāyāti saṁmukham tāvadbabhaṁja niśitaiḥ sāyakaistadrathaṁ punaḥ

तीसरे पर आरूढ़ होकर जैसे ही वह सामने आया, उसने तीक्ष्ण बाणों से उस रथ को भी तोड़ डाला।

श्लोक 23 (padma.5.27.23)

एवं दश रथा भग्ना नृपतेरात्मजस्य हि । पुष्कलेन तु वीरेण महासंयुगशालिना

evaṁ daśa rathā bhagnā nṛpaterātmajasya hi puṣkalena tu vīreṇa mahāsaṁyugaśālinā

इस प्रकार महासंग्राम में निपुण वीर पुष्कल द्वारा राजा के पुत्र के दस रथ तोड़ डाले गए।

श्लोक 24 (padma.5.27.24)

तदा चित्रांगकः संख्ये रथे स्थित्वा विचित्रिते । आजगाम ह वेगेन पुष्कलं प्रति योधितुम्

tadā citrāṁgakaḥ saṁkhye rathe sthitvā vicitrite ājagāma ha vegena puṣkalaṁ prati yodhitum

तब चित्रांग विचित्र रथ पर युद्ध में स्थित होकर पुष्कल से लड़ने के लिए शीघ्रता से आया।

श्लोक 25 (padma.5.27.25)

पुष्कलं पंचभिर्बाणैस्ताडयामास संयुगे । तैर्बाणैर्निहतोऽत्यतं विव्यथे भरतात्मजः

puṣkalaṁ paṁcabhirbāṇaistāḍayāmāsa saṁyuge tairbāṇairnihato'tyataṁ vivyathe bharatātmajaḥ

उसने उस युद्ध में पुष्कल पर पाँच बाणों से प्रहार किया; उन बाणों से आहत होकर भरत-पुत्र अत्यंत व्यथित हुआ।

श्लोक 26 (padma.5.27.26)

सक्रुद्धश्चापमुद्यम्य बाणान्दश शितान्महान् । मुमोच हृदये तस्य स्वर्णपुंखसुशोभितान्

sakruddhaścāpamudyamya bāṇāndaśa śitānmahān mumoca hṛdaye tasya svarṇapuṁkhasuśobhitān

क्रुद्ध होकर धनुष उठाकर उसने स्वर्ण-पंखों से सुशोभित दस महान्, तीक्ष्ण बाण उसके हृदय पर छोड़े।

श्लोक 27 (padma.5.27.27)

ते बाणाः पपुरेतस्य रुधिरं बहुदारुणाः । पीत्वा पेतुः क्षितौ कूटसाक्षिणः पूर्वजा इव

te bāṇāḥ papuretasya rudhiraṁ bahudāruṇāḥ pītvā petuḥ kṣitau kūṭasākṣiṇaḥ pūrvajā iva

वे अत्यंत भयंकर बाण उसका रक्त पीकर भूमि पर गिर पड़े, मानो झूठी गवाही देने वाले पूर्वज ही पतित हुए हों।

श्लोक 28 (padma.5.27.28)

तदा चित्रांगकः क्रुद्धो भल्लान्पंच समाददे । मुमोच भाले पुत्रस्य भरतस्य महौजसः

tadā citrāṁgakaḥ kruddho bhallānpaṁca samādade mumoca bhāle putrasya bharatasya mahaujasaḥ

तब क्रुद्ध चित्रांग ने पाँच भल्ल बाण उठाए और उन्हें महातेजस्वी भरत-पुत्र के ललाट पर छोड़ा।

श्लोक 29 (padma.5.27.29)

तैर्भल्लैराहतः क्रुद्धः शरासनवरे शरम् । दधत्प्रतिज्ञामकरोच्चित्रांगनिधनं प्रति

tairbhallairāhataḥ kruddhaḥ śarāsanavare śaram dadhatpratijñāmakaroccitrāṁganidhanaṁ prati

उन भल्लों से आहत, क्रुद्ध होकर उसने श्रेष्ठ धनुष पर बाण चढ़ाते हुए चित्रांग के वध की प्रतिज्ञा की —

श्लोक 30 (padma.5.27.30)

शृणु वीर मम क्षिप्रं प्रतिज्ञां त्वद्वधाश्रिताम् । तज्ज्ञात्वा सावधानेन योद्धव्यं च त्वयात्र हि

śṛṇu vīra mama kṣipraṁ pratijñāṁ tvadvadhāśritām tajjñātvā sāvadhānena yoddhavyaṁ ca tvayātra hi

'हे वीर! मेरी तुम्हारे वध से संबंधित प्रतिज्ञा शीघ्र सुनो; इसे जानकर सावधानी से यहाँ युद्ध करना।

श्लोक 31 (padma.5.27.31)

बाणेनानेन चेत्त्वां वै न कुर्यां प्राणवर्जितम् । सतीं संदूष्य वनितां शीलाचारसुशोभिताम्

bāṇenānena cettvāṁ vai na kuryāṁ prāṇavarjitam satīṁ saṁdūṣya vanitāṁ śīlācārasuśobhitām

यदि मैं इस बाण से तुम्हें प्राणरहित न करूँ, तो सतीत्व और सदाचार से सुशोभित सती स्त्री को दूषित करने वाले का,

श्लोक 32 (padma.5.27.32)

यो लोकः प्राप्यते लोकैर्यमस्य वशवर्तिभिः । स लोको मम वै भूयात्सत्यं मम प्रतिश्रुतम्

yo lokaḥ prāpyate lokairyamasya vaśavartibhiḥ sa loko mama vai bhūyātsatyaṁ mama pratiśrutam

यम के वश में रहने वाले जिन लोकों को यमवश्य लोग प्राप्त करते हैं, वही लोक मुझे प्राप्त हो — यह मेरी प्रतिज्ञा सत्य है।'

श्लोक 33 (padma.5.27.33)

इति श्रेष्ठं वचः श्रुत्वा जहास परवीरहा । उवाच मतिमान्वीरः पुष्कलं वचनं शुभम्

iti śreṣṭhaṁ vacaḥ śrutvā jahāsa paravīrahā uvāca matimānvīraḥ puṣkalaṁ vacanaṁ śubham

यह श्रेष्ठ वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहारक चित्रांग हँसा, और बुद्धिमान् वीर ने पुष्कल से यह शुभ वचन कहा —

श्लोक 34 (padma.5.27.34)

मृत्युर्वै प्राणिनां भाव्यः सर्वत्रैव च सर्वदा । तस्मान्मे निधने दुःखं नास्ति शूरशिरोमणे

mṛtyurvai prāṇināṁ bhāvyaḥ sarvatraiva ca sarvadā tasmānme nidhane duḥkhaṁ nāsti śūraśiromaṇe

'हे शूरशिरोमणे! मृत्यु तो प्राणियों को सर्वत्र और सदा ही प्राप्त होने वाली है; इसलिए मुझे अपनी मृत्यु का कोई दुःख नहीं है।

श्लोक 35 (padma.5.27.35)

प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वीरत्वशालिना । सा सत्यैव पुनर्मेऽद्य श्रूयतां व्याहृतं महत्

pratijñā yā kṛtā vīra tvayā vīratvaśālinā sā satyaiva punarme'dya śrūyatāṁ vyāhṛtaṁ mahat

हे वीर! तुमने वीरत्व से युक्त होकर जो प्रतिज्ञा की है, वह सत्य ही हो; अब सुनो, मेरी भी महान् घोषणा।

श्लोक 36 (padma.5.27.36)

त्वद्बाणं मद्वधोद्युक्तं न च्छिंद्यां यदि चेदहम् । तदा प्रतिज्ञां शृणु मे सर्ववीराभिमानिनः

tvadbāṇaṁ madvadhodyuktaṁ na cchiṁdyāṁ yadi cedaham tadā pratijñāṁ śṛṇu me sarvavīrābhimāninaḥ

यदि मैं मेरे वध में तत्पर तुम्हारे बाण को न काटूँ, तो सुनो सभी वीरता का अभिमान रखने वाले मेरी प्रतिज्ञा —

श्लोक 37 (padma.5.27.37)

तीर्थं जिगमिषोर्यो वै कुर्यात्स्वांतविखंडनम् । एकादशीव्रतादन्यज्जानाति व्रतमुच्चकैः

tīrthaṁ jigamiṣoryo vai kuryātsvāṁtavikhaṁḍanam ekādaśīvratādanyajjānāti vratamuccakaiḥ

तीर्थ जाने की इच्छा रखने वाला जो अपने संकल्प को तोड़ दे, जो एकादशी व्रत से बड़ा कोई अन्य व्रत जानता हो,

श्लोक 38 (padma.5.27.38)

तस्य पापं ममैवास्तु प्रतिज्ञापरिघातिनः । इति वाक्यमुदीर्यैव तूष्णींभूतो धनुर्दधे

tasya pāpaṁ mamaivāstu pratijñāparighātinaḥ iti vākyamudīryaiva tūṣṇīṁbhūto dhanurdadhe

उस अपने ही व्रत को तोड़ने वाले का पाप मुझे ही लगे।' यह वचन कहकर, मौन होकर उसने धनुष धारण किया।

श्लोक 39 (padma.5.27.39)

तदानेन निषंगात्स्वादुद्धृत्य सायकं वरम् । कथयामास विशदं वाक्यं शत्रुवधावहम्

tadānena niṣaṁgātsvāduddhṛtya sāyakaṁ varam kathayāmāsa viśadaṁ vākyaṁ śatruvadhāvaham

तब उसने अपने ही तूणीर से श्रेष्ठ बाण निकालकर शत्रु-वध लाने वाला यह स्पष्ट वचन कहा —

श्लोक 40 (padma.5.27.40)

पुष्कल उवाच। यदि रामांघ्रियुगुलं निष्कापट्येन चेतसा । उपासितं मया तर्हि मम वाक्यमृतं भवेत्

puṣkala uvāca yadi rāmāṁghriyugulaṁ niṣkāpaṭyena cetasā upāsitaṁ mayā tarhi mama vākyamṛtaṁ bhavet

पुष्कल ने कहा — 'यदि मैंने राम के चरण-युगल की निष्कपट हृदय से उपासना की है, तो मेरा वचन सत्य हो।

श्लोक 41 (padma.5.27.41)

यदि स्वमहिलां भुक्त्वा नान्यां जानामिचेतसा । तेन सत्येन मे वाक्यं सत्यं भवतु संगरे

yadi svamahilāṁ bhuktvā nānyāṁ jānāmicetasā tena satyena me vākyaṁ satyaṁ bhavatu saṁgare

यदि अपनी ही पत्नी को भोगकर मैं हृदय से किसी अन्य को नहीं जानता, तो उस सत्य से इस युद्ध में मेरा वचन सत्य हो।'

श्लोक 42 (padma.5.27.42)

इति वाक्यमुदीर्याशु बाणं धनुषि संधितम् । कालानलोपमं वीरशिरश्छेदनमाक्षिपत्

iti vākyamudīryāśu bāṇaṁ dhanuṣi saṁdhitam kālānalopamaṁ vīraśiraśchedanamākṣipat

यह वचन कहकर उसने शीघ्र धनुष पर चढ़ाए हुए, कालाग्नि के समान, वीर के सिर को काटने वाले बाण को छोड़ दिया।

श्लोक 43 (padma.5.27.43)

तं बाणं मुक्तमालोक्य स तु राजसुतो बली । बाणं शरासने धत्त तीक्ष्णं कालानलोपमम्

taṁ bāṇaṁ muktamālokya sa tu rājasuto balī bāṇaṁ śarāsane dhatta tīkṣṇaṁ kālānalopamam

उस छोड़े गए बाण को देखकर वह बलशाली राजपुत्र भी अपने धनुष पर कालाग्नि के समान तीक्ष्ण बाण चढ़ाने लगा।

श्लोक 44 (padma.5.27.44)

तेन बाणेन संछिन्नो बाणः स्ववधउद्यतः । हाहाकारो महानासीच्छिन्ने तस्मिञ्छरे तदा

tena bāṇena saṁchinno bāṇaḥ svavadhaudyataḥ hāhākāro mahānāsīcchinne tasmiñchare tadā

उस बाण से अपने वध में तत्पर बाण कट गया; उस बाण के कटते ही महान् हाहाकार मच गया।

श्लोक 45 (padma.5.27.45)

परार्धं पतितं भूमौ पूर्वार्धं फलसंयुतम् । शिरोधरां चकर्ताशु पद्मनालमिव क्षणात्

parārdhaṁ patitaṁ bhūmau pūrvārdhaṁ phalasaṁyutam śirodharāṁ cakartāśu padmanālamiva kṣaṇāt

उसका पिछला आधा भाग भूमि पर गिरा, अगला आधा भाग फल सहित, कमल-नाल के समान, शीघ्र ही उसकी गर्दन काट गया।

श्लोक 46 (padma.5.27.46)

तदा भूमौ पतंतं तु दृष्ट्वा तत्तस्यसैनिकाः । हाहाकृत्वा भृशं सर्वे पलायनपरागताः

tadā bhūmau pataṁtaṁ tu dṛṣṭvā tattasyasainikāḥ hāhākṛtvā bhṛśaṁ sarve palāyanaparāgatāḥ

तब उसे भूमि पर गिरता देखकर उसके सभी सैनिक हाहाकार करके भाग खड़े हुए।

श्लोक 47 (padma.5.27.47)

पृथ्व्यां तन्मस्तकं श्रेष्ठं सकिरीटं सकुंडलम् । शुशुभेऽतीव पतितं चंद्रबिंबं दिवो यथा

pṛthvyāṁ tanmastakaṁ śreṣṭhaṁ sakirīṭaṁ sakuṁḍalam śuśubhe'tīva patitaṁ caṁdrabiṁbaṁ divo yathā

पृथ्वी पर मुकुट-कुंडलों सहित वह श्रेष्ठ सिर, आकाश से गिरे चंद्रबिंब के समान, अत्यंत सुशोभित हो रहा था।

श्लोक 48 (padma.5.27.48)

तं वीक्ष्य पतितं वीरः पुष्कलो भरतात्मजः । व्यगाहत व्यूहमिमं सर्ववीरैकशोभितम्

taṁ vīkṣya patitaṁ vīraḥ puṣkalo bharatātmajaḥ vyagāhata vyūhamimaṁ sarvavīraikaśobhitam

उसे गिरा हुआ देखकर वीर भरत-पुत्र पुष्कल समस्त वीरों से सुशोभित उस व्यूह में और गहरा घुस गया।

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