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पाताल खण्ड · अध्याय 34

विद्युन्माली का पराजय

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

श्लोक 1 (padma.5.34.1)

शेष उवाच। रथैः सदश्वैः शोभाढ्यैः सर्वशस्त्रास्त्रपूरितैः । नानारत्नसमायुक्तैर्ययुस्ते राक्षसाधमम्

śeṣa uvāca rathaiḥ sadaśvaiḥ śobhāḍhyaiḥ sarvaśastrāstrapūritaiḥ nānāratnasamāyuktairyayuste rākṣasādhamam

शेष जी ने कहा — उत्तम अश्वों से सुशोभित, समस्त शस्त्रास्त्रों से भरे, नाना रत्नों से युक्त रथों पर सवार होकर वे उस अधम राक्षस की ओर चल पड़े।

श्लोक 2 (padma.5.34.2)

तान्दृष्ट्वा कामगे याने स्थितः प्रोवाच राक्षसः । मेघगंभीरया वाचा तर्जयन्निव भूरिशः

tāndṛṣṭvā kāmage yāne sthitaḥ provāca rākṣasaḥ meghagaṁbhīrayā vācā tarjayanniva bhūriśaḥ

उन्हें देखकर, इच्छानुसार गमन करने वाले अपने यान में खड़े उस राक्षस ने मेघ के समान गंभीर वाणी से मानो बार-बार धमकाते हुए कहा।

श्लोक 3 (padma.5.34.3)

मायां तु सुभटा योद्धुं गच्छंतु निजमंदिरम् । मा त्यजंतु स्वकान्प्राणान्न मोक्ष्ये वाजिनं वरम्

māyāṁ tu subhaṭā yoddhuṁ gacchaṁtu nijamaṁdiram mā tyajaṁtu svakānprāṇānna mokṣye vājinaṁ varam

"यदि वीर योद्धा मुझसे युद्ध करना चाहते हैं तो अपने घर लौट जाएँ; अपने प्राण न गँवाएँ — मैं इस श्रेष्ठ अश्व को नहीं छोड़ूँगा।

श्लोक 4 (padma.5.34.4)

विद्युन्मालीति विख्यातो रावणस्य सुहृत्सखा । मत्सख्युः प्रेतभूतस्य निष्कृतिं कर्तुमेयिवान्

vidyunmālīti vikhyāto rāvaṇasya suhṛtsakhā matsakhyuḥ pretabhūtasya niṣkṛtiṁ kartumeyivān

मैं विद्युन्माली नाम से विख्यात, रावण का प्रिय मित्र-सखा हूँ; मैं अपने उस मित्र के, जो प्रेत हो चुका है, बदले हेतु यहाँ आया हूँ।

श्लोक 5 (padma.5.34.5)

क्वासौ रामो य आहत्य सखायं रावणं गतः । तस्य भ्रातापि कुत्रास्ते सर्वशूरशिरोमणिः

kvāsau rāmo ya āhatya sakhāyaṁ rāvaṇaṁ gataḥ tasya bhrātāpi kutrāste sarvaśūraśiromaṇiḥ

कहाँ है वह राम, जिसने मेरे मित्र रावण को मारकर गति पाई? और कहाँ है उसका भाई भी, वह सर्वशूरशिरोमणि?

श्लोक 6 (padma.5.34.6)

तं हत्वा निष्कृतिं तस्य प्राप्स्ये रामस्य चानुजम् । पिबन्रुधिरमुद्भूतं कंठनालस्य बुद्बुदैः

taṁ hatvā niṣkṛtiṁ tasya prāpsye rāmasya cānujam pibanrudhiramudbhūtaṁ kaṁṭhanālasya budbudaiḥ

राम के उस अनुज का वध करके, उसके कंठ की नाल से बुदबुदाते हुए उठे रक्त को पीते हुए मैं उसका बदला प्राप्त करूँगा।"

श्लोक 7 (padma.5.34.7)

इति वाक्यं समाकर्ण्य योधानां प्रवरोत्तमः । पुष्कलो निजगादैनं वीर्यशौर्यसमन्वितम्

iti vākyaṁ samākarṇya yodhānāṁ pravarottamaḥ puṣkalo nijagādainaṁ vīryaśauryasamanvitam

यह वचन सुनकर योद्धाओं में सर्वश्रेष्ठ, वीर्य-शौर्य से युक्त पुष्कल ने उससे कहा।

श्लोक 8 (padma.5.34.8)

पुष्कल उवाच। विकत्थनं न कुर्वंति संग्रामे सुभटा नराः । पराक्रमं दर्शयंति निजशस्त्रास्त्रवर्षणैः

puṣkala uvāca vikatthanaṁ na kurvaṁti saṁgrāme subhaṭā narāḥ parākramaṁ darśayaṁti nijaśastrāstravarṣaṇaiḥ

पुष्कल ने कहा — "युद्ध में वीर पुरुष डींग नहीं हाँकते; वे अपने शस्त्रास्त्रों की वर्षा से ही अपना पराक्रम दिखाते हैं।

श्लोक 9 (padma.5.34.9)

रावणो निहतो येन ससुहृत्स्वजनैर्वृतः । तस्य वाजिनमाहृत्य कुत्र गंतासि दुर्मद

rāvaṇo nihato yena sasuhṛtsvajanairvṛtaḥ tasya vājinamāhṛtya kutra gaṁtāsi durmada

जिसने रावण को उसके मित्रों और स्वजनों सहित मार डाला था, उसी के अश्व का हरण करके, हे दुर्मद! तू कहाँ जाएगा?

श्लोक 10 (padma.5.34.10)

पतिष्यसि त्वं शत्रुघ्नबाणैः कोदंडनिर्गतैः । त्वामत्स्यंति शिवा भूमौ पतितं प्राणवर्जितम्

patiṣyasi tvaṁ śatrughnabāṇaiḥ kodaṁḍanirgataiḥ tvāmatsyaṁti śivā bhūmau patitaṁ prāṇavarjitam

तू शत्रुघ्न के धनुष से छूटे बाणों से गिरेगा; भूमि पर लाशरूप गिरे हुए तुझे सियार खा जाएँगे।

श्लोक 11 (padma.5.34.11)

मा गर्ज दुष्ट रामस्य सेवके मयि संस्थिते । गर्जंति सुभटा युद्धे शत्रुं जित्वा महोदयात्

mā garja duṣṭa rāmasya sevake mayi saṁsthite garjaṁti subhaṭā yuddhe śatruṁ jitvā mahodayāt

हे दुष्ट! जब मैं, राम का सेवक, यहाँ खड़ा हूँ, तो मत गरज। वीरगण तो शत्रु को महाविजय से जीतकर युद्ध में गरजते हैं।"

श्लोक 12 (padma.5.34.12)

शेष उवाच। एवं ब्रुवंतं तं वीरं पुष्कलं रणदुर्मदम् । जघान शक्त्या सुभृशं हृदि राक्षससत्तमः

śeṣa uvāca evaṁ bruvaṁtaṁ taṁ vīraṁ puṣkalaṁ raṇadurmadam jaghāna śaktyā subhṛśaṁ hṛdi rākṣasasattamaḥ

शेष जी ने कहा — इस प्रकार बोलते हुए युद्धोन्मत्त वीर पुष्कल को उस श्रेष्ठ राक्षस ने अपनी शक्ति से हृदय पर प्रबल आघात किया।

श्लोक 13 (padma.5.34.13)

आयांतीं तां महाशक्तिमायसीं कांचनाश्रितां । चिच्छेद त्रिभिरत्युग्रैः शितैर्बाणैः स पुष्कलः

āyāṁtīṁ tāṁ mahāśaktimāyasīṁ kāṁcanāśritām ciccheda tribhiratyugraiḥ śitairbāṇaiḥ sa puṣkalaḥ

उस उड़कर आते हुए महाशक्ति को, जो लौह-निर्मित और स्वर्ण से सुसज्जित थी, पुष्कल ने तीन अत्यंत उग्र, तीक्ष्ण बाणों से खंडित कर दिया।

श्लोक 14 (padma.5.34.14)

सा त्रिधा ह्यपतद्भूमौ विशिखैर्निष्प्रभीकृता । पतंती विरराजासौ विष्णोः शक्तित्रयीव किम्

sā tridhā hyapatadbhūmau viśikhairniṣprabhīkṛtā pataṁtī virarājāsau viṣṇoḥ śaktitrayīva kim

बाणों से निष्प्रभ होकर वह शक्ति तीन भागों में भूमि पर गिर पड़ी; गिरती हुई वह मानो विष्णु की त्रिविध शक्ति के समान शोभित हो रही थी।

श्लोक 15 (padma.5.34.15)

तां छिन्नां शक्तिकां दृष्ट्वा राक्षसः परतापनः । जग्राह शूलं तरसा त्रिशिखं लोहनिर्मितम्

tāṁ chinnāṁ śaktikāṁ dṛṣṭvā rākṣasaḥ paratāpanaḥ jagrāha śūlaṁ tarasā triśikhaṁ lohanirmitam

अपनी उस कटी हुई शक्ति को देखकर वह शत्रु-तापन राक्षस शीघ्रता से लौह-निर्मित त्रिशूल उठा लाया।

श्लोक 16 (padma.5.34.16)

तीक्ष्णाग्रं ज्वलनप्रख्यं राक्षसेंद्रो व्यमोचयत् । आयांतं तिलशश्चक्रे बाणैः पुष्कलसंज्ञितः

tīkṣṇāgraṁ jvalanaprakhyaṁ rākṣaseṁdro vyamocayat āyāṁtaṁ tilaśaścakre bāṇaiḥ puṣkalasaṁjñitaḥ

राक्षसेंद्र ने उस तीक्ष्ण-अग्र, अग्नि के समान ज्वलंत त्रिशूल को छोड़ा; उड़ते हुए आते उस त्रिशूल को पुष्कल ने अपने बाणों से तिल-तिल के समान खंडित कर दिया।

श्लोक 17 (padma.5.34.17)

छित्त्वा त्रिशूलं तरसा राघवस्य हि सेवकः । पुष्कलश्चाप आधत्त बाणांस्तीक्ष्णान्मनोजवान्

chittvā triśūlaṁ tarasā rāghavasya hi sevakaḥ puṣkalaścāpa ādhatta bāṇāṁstīkṣṇānmanojavān

उस त्रिशूल को शीघ्र काटकर राघव के उस सेवक पुष्कल ने अपने धनुष पर मन के समान वेगवान तीक्ष्ण बाण चढ़ाए।

श्लोक 18 (padma.5.34.18)

ते बाणा हृदि तस्याशु लग्ना रागं बतासृजन् । वैष्णवस्य यथा स्वांते गुणा विष्णोर्मनोहराः

te bāṇā hṛdi tasyāśu lagnā rāgaṁ batāsṛjan vaiṣṇavasya yathā svāṁte guṇā viṣṇormanoharāḥ

वे बाण शीघ्र ही उसके हृदय में लगकर मानो लालिमा उत्पन्न करने लगे — मानो किसी वैष्णव के हृदय में विष्णु के मनोहर गुण रंग भर देते हों।

श्लोक 19 (padma.5.34.19)

तद्बाणवेधदुःखार्तो विद्युन्माली सुदुर्मदः । जग्राह मुद्गरं घोरं पुष्कलं हंतुमुद्यतः

tadbāṇavedhaduḥkhārto vidyunmālī sudurmadaḥ jagrāha mudgaraṁ ghoraṁ puṣkalaṁ haṁtumudyataḥ

उन बाणों के आघात से पीड़ित, अत्यंत उन्मत्त विद्युन्माली ने पुष्कल के वध हेतु उद्यत होकर एक भयंकर मुद्गर उठा लिया।

श्लोक 20 (padma.5.34.20)

मुद्गरः प्रहितस्तेन विद्युन्माल्यभिधेन हि । हृदि लग्नोसृजच्छीघ्रं कश्मलं तदकारयत्

mudgaraḥ prahitastena vidyunmālyabhidhena hi hṛdi lagnosṛjacchīghraṁ kaśmalaṁ tadakārayat

उस विद्युन्माली नामक द्वारा फेंका गया वह मुद्गर उसके हृदय में लगा और शीघ्र ही उसे मूर्च्छित कर दिया।

श्लोक 21 (padma.5.34.21)

मुद्गरप्रहतो वीरः कंपमानः सवेपथुः । पपात स्यंदनोपस्थे पुष्कलः शत्रुतापनः

mudgaraprahato vīraḥ kaṁpamānaḥ savepathuḥ papāta syaṁdanopasthe puṣkalaḥ śatrutāpanaḥ

मुद्गर से आहत, काँपता हुआ, थरथराता हुआ वह शत्रुतापन वीर पुष्कल रथ के तल पर गिर पड़ा।

श्लोक 22 (padma.5.34.22)

उग्रदंष्ट्रोऽथ तद्भ्राता लक्ष्मीनिधिमयोधयत् । शस्त्रास्त्रैर्बहुधा मुक्तैर्वीरप्राणहृतिंकरैः

ugradaṁṣṭro'tha tadbhrātā lakṣmīnidhimayodhayat śastrāstrairbahudhā muktairvīraprāṇahṛtiṁkaraiḥ

तब उग्रदंष्ट्र, उसके भाई ने, लक्ष्मीनिधि से नाना प्रकार के, वीरों के प्राण हरने वाले शस्त्रास्त्रों से युद्ध किया।

श्लोक 23 (padma.5.34.23)

पुष्कलस्तत्क्षणात्प्राप्य संज्ञां राक्षसमब्रवीत् । धन्योसि राक्षसश्रेष्ठ महीयांस्ते पराक्रमः

puṣkalastatkṣaṇātprāpya saṁjñāṁ rākṣasamabravīt dhanyosi rākṣasaśreṣṭha mahīyāṁste parākramaḥ

पुष्कल ने उसी क्षण चेतना पाकर उस राक्षस से कहा — "तू धन्य है, हे राक्षसश्रेष्ठ! तेरा पराक्रम महान् है।

श्लोक 24 (padma.5.34.24)

पश्येदानीं ममाप्युच्चैः प्रतिज्ञां शूरमानिताम् । विमानात्पातयाम्यद्य भूमौ त्वां शितसायकैः

paśyedānīṁ mamāpyuccaiḥ pratijñāṁ śūramānitām vimānātpātayāmyadya bhūmau tvāṁ śitasāyakaiḥ

अब मेरी भी शूरवीरों द्वारा सम्मानित उच्च प्रतिज्ञा देख; आज मैं तुझे तीक्ष्ण बाणों से विमान से गिराकर भूमि पर लाऊँगा।"

श्लोक 25 (padma.5.34.25)

इत्युक्त्वा निशितं बाणं समगृह्णाद्दुरासदम् । ज्वलंतमग्नितेजस्कं महौदार्यसमन्वितम्

ityuktvā niśitaṁ bāṇaṁ samagṛhṇāddurāsadam jvalaṁtamagnitejaskaṁ mahaudāryasamanvitam

ऐसा कहकर उसने एक तीक्ष्ण बाण उठाया, जो दुर्धर्ष, अग्नि के तेज से प्रज्वलित तथा महान् गरिमा से युक्त था।

श्लोक 26 (padma.5.34.26)

स यावत्तत्प्रतीकर्तुं विधत्ते स्वपराक्रमम् । तावद्धृदिगतोऽत्युग्रस्तीक्ष्णधारः ससायकः

sa yāvattatpratīkartuṁ vidhatte svaparākramam tāvaddhṛdigato'tyugrastīkṣṇadhāraḥ sasāyakaḥ

जब तक वह अपने पराक्रम से उसका प्रतिकार करने का उपाय सोचता, तब तक ही एक अत्यंत उग्र, तीक्ष्णधार बाण उसके हृदय में जा लगा।

श्लोक 27 (padma.5.34.27)

तेन बाणेन विभ्रांतो भ्रमच्चित्तः स राक्षसः । पपात कामगोपस्थाद्भूमौ विगतचेतनः

tena bāṇena vibhrāṁto bhramaccittaḥ sa rākṣasaḥ papāta kāmagopasthādbhūmau vigatacetanaḥ

उस बाण से विभ्रांत, चित्त-भ्रमित वह राक्षस अपने इच्छानुसार गमन करने वाले यान से भूमि पर बेसुध होकर गिर पड़ा।

श्लोक 28 (padma.5.34.28)

उग्रदंष्ट्रेण वै दृष्टः पतमानो निजाग्रजः । गृहीत्वा तं विमानांतर्निनाय रिपुशंकितः

ugradaṁṣṭreṇa vai dṛṣṭaḥ patamāno nijāgrajaḥ gṛhītvā taṁ vimānāṁtarninaya ripuśaṁkitaḥ

उग्रदंष्ट्र ने अपने बड़े भाई को गिरते देखकर, शत्रु से आशंकित होकर उसे उठाकर विमान के भीतर पहुँचाया।

श्लोक 29 (padma.5.34.29)

प्राह चारिं महारोषात्पुष्कलं बलिनां वरम् । मद्भ्रातरं पातयित्वा कुत्र यास्यसि दुर्मते

prāha cāriṁ mahāroṣātpuṣkalaṁ balināṁ varam madbhrātaraṁ pātayitvā kutra yāsyasi durmate

उसने अत्यंत क्रोध से बलवानों में श्रेष्ठ शत्रु पुष्कल से कहा — "हे दुर्मते! मेरे भाई को गिराकर तू कहाँ जाएगा?

श्लोक 30 (padma.5.34.30)

मां वै युधि विनिर्जित्य गंतासि जयमुत्तमम् । स्थिते मयि तव स्वांते जयाशा विनिवर्त्य ताम्

māṁ vai yudhi vinirjitya gaṁtāsi jayamuttamam sthite mayi tava svāṁte jayāśā vinivartya tām

मुझे युद्ध में जीतकर ही तू उत्तम विजय पाएगा। जब तक मैं खड़ा हूँ, तेरे हृदय की उस विजय-आशा को मैं लौटा दूँगा।"

श्लोक 31 (padma.5.34.31)

एवं ब्रुवंतं तरसा जघान दशभिः शरैः । हृदये तस्य दुष्टस्य रोषपूरितलोचनः

evaṁ bruvaṁtaṁ tarasā jaghāna daśabhiḥ śaraiḥ hṛdaye tasya duṣṭasya roṣapūritalocanaḥ

इस प्रकार कहते हुए उस दुष्ट के हृदय पर, क्रोध से भरे नेत्रों वाले पुष्कल ने शीघ्रता से दस बाणों का प्रहार किया।

श्लोक 32 (padma.5.34.32)

स ताडितो दशशरैः पुष्कलेन महात्मना । चुक्रोध हृदि दुर्बुद्धिस्तं हंतुमुपचक्रमे

sa tāḍito daśaśaraiḥ puṣkalena mahātmanā cukrodha hṛdi durbuddhistaṁ haṁtumupacakrame

महात्मा पुष्कल के उन दस बाणों से आहत होकर वह दुर्बुद्धि हृदय से क्रोधित हो उठा और उसका वध करने के लिए उद्यत हुआ।

श्लोक 33 (padma.5.34.33)

दंतान्निष्पिष्य सक्रोधो मुष्टिमुद्यम्य चाहनत् । व्यनदद्वज्रनिर्घातपातशंकां सृजन्हृदि

daṁtānniṣpiṣya sakrodho muṣṭimudyamya cāhanat vyanadadvajranirghātapātaśaṁkāṁ sṛjanhṛdi

क्रोध से दाँत पीसकर, मुट्ठी उठाकर उसने प्रहार किया, तथा वज्रपात की आशंका उत्पन्न करते हुए भीषण गर्जना की।

श्लोक 34 (padma.5.34.34)

मुष्टिनाभिहतो वीरः पुष्कलः परमास्त्रवित् । नाकंपत विनिष्पेषं वांछंस्तस्य दुरात्मनः

muṣṭinābhihato vīraḥ puṣkalaḥ paramāstravit nākaṁpata viniṣpeṣaṁ vāṁchaṁstasya durātmanaḥ

उस मुष्टि-प्रहार से आहत होकर भी परमास्त्रवेत्ता वीर पुष्कल तनिक भी न काँपे, बल्कि उस दुरात्मा के सर्वनाश की ही कामना करने लगे।

श्लोक 35 (padma.5.34.35)

वत्सदंतान्महातीक्ष्णान्मुमोच हृदि सायकान् । तैर्बाणैर्व्यथितो दैत्यस्त्रिशूलं तु समाददे

vatsadaṁtānmahātīkṣṇānmumoca hṛdi sāyakān tairbāṇairvyathito daityastriśūlaṁ tu samādade

उसने बछड़े के दाँत के समान अत्यंत तीक्ष्ण बाण उसके हृदय में छोड़े; उन बाणों से पीड़ित होकर दैत्य ने त्रिशूल उठा लिया।

श्लोक 36 (padma.5.34.36)

जाज्वल्यमानं त्रिशिखं ज्वालामालातिभीषणम् । लग्नं हृदि महावीर पुष्कलस्य तु दारुणम्

jājvalyamānaṁ triśikhaṁ jvālāmālātibhīṣaṇam lagnaṁ hṛdi mahāvīra puṣkalasya tu dāruṇam

वह ज्वलंत त्रिशूल, अपनी ज्वालाओं की माला से अत्यंत भयंकर, महावीर पुष्कल के हृदय में भीषणता से जा लगा।

श्लोक 37 (padma.5.34.37)

मूर्च्छितस्तेन शूलेन निहतो धन्विसत्तमः । कश्मलं परमं प्राप्तः पपात स्यंदनोपरि

mūrcchitastena śūlena nihato dhanvisattamaḥ kaśmalaṁ paramaṁ prāptaḥ papāta syaṁdanopari

उस त्रिशूल से आहत होकर वह श्रेष्ठ धनुर्धर मूर्च्छित हो गया; परम मोह को प्राप्त होकर वह रथ के ऊपर गिर पड़ा।

श्लोक 38 (padma.5.34.38)

मूर्च्छां प्राप्तं तमाज्ञाय हनूमान्पवनात्मजः । कोपव्याकुलितस्वांतो बभाषे तं तु राक्षसम्

mūrcchāṁ prāptaṁ tamājñāya hanūmānpavanātmajaḥ kopavyākulitasvāṁto babhāṣe taṁ tu rākṣasam

उसे मूर्च्छित हुआ जानकर पवनपुत्र हनुमान का हृदय क्रोध से व्याकुल हो उठा, और उन्होंने उस राक्षस से कहा।

श्लोक 39 (padma.5.34.39)

कुत्र गच्छसि दुर्बुद्धे मयि योद्धरि संस्थिते । त्वां हन्मि चरणाघातैर्वाजिहर्तारमागतम्

kutra gacchasi durbuddhe mayi yoddhari saṁsthite tvāṁ hanmi caraṇāghātairvājihartāramāgatam

"हे दुर्बुद्धे! जब मैं योद्धारूप में खड़ा हूँ, तो तू कहाँ जाएगा? हे अश्व-हर्ता! मैं तुझे अपने चरण-प्रहारों से मार डालूँगा।"

श्लोक 40 (padma.5.34.40)

एवमुक्त्वा महादैत्याञ्जघान परसैनिकान् । विमानस्थान्नखाग्रेण दारयन्नभसि स्थितः

evamuktvā mahādaityāñjaghāna parasainikān vimānasthānnakhāgreṇa dārayannabhasi sthitaḥ

ऐसा कहकर आकाश में स्थित होकर उन्होंने महादैत्यों, शत्रु-सैनिकों को अपने नखाग्रों से चीरते हुए मार डाला।

श्लोक 41 (padma.5.34.41)

लांगूलेनाहताः केचित्केचित्पादतला हताः । बाहुभ्यां दारिताः केचित्पवनस्य तनूभुवा

lāṁgūlenāhatāḥ kecitkecitpādatalā hatāḥ bāhubhyāṁ dāritāḥ kecitpavanasya tanūbhuvā

पवनपुत्र द्वारा कई राक्षस पूँछ से आहत हुए, कई पैर के तलवे से मारे गए, कई भुजाओं से चीर दिए गए।

श्लोक 42 (padma.5.34.42)

नश्यंति केचिन्निहताः केचिन्मूर्च्छंति संहताः । पलायंते पदाघातभयपीडाहतास्ततः

naśyaṁti kecinnihatāḥ kecinmūrcchaṁti saṁhatāḥ palāyaṁte padāghātabhayapīḍāhatāstataḥ

कुछ राक्षस मारे जाकर नष्ट हो गए, कुछ आहत होकर मूर्च्छित हो गए, कुछ पद-प्रहार के भय और पीड़ा से आहत होकर भाग खड़े हुए।

श्लोक 43 (padma.5.34.43)

अनेके निहतास्तत्र राक्षसाश्चातिदारुणाः । छिन्ना भिन्ना द्विधा जाताः पवनस्य सुतेन वै

aneke nihatāstatra rākṣasāścātidāruṇāḥ chinnā bhinnā dvidhā jātāḥ pavanasya sutena vai

वहाँ अनेक अत्यंत भयंकर राक्षस पवनपुत्र द्वारा मारे गए, काटे गए, बींधे गए और दो भागों में विभक्त हो गए।

श्लोक 44 (padma.5.34.44)

कामगंतुविमानं तद्भिन्नप्राकारतोरणम् । हाहा कुर्वद्भिरसुरैः समंतात्परिवारितम्

kāmagaṁtuvimānaṁ tadbhinnaprākāratoraṇam hāhā kurvadbhirasuraiḥ samaṁtātparivāritam

वह इच्छानुसार गमन करने वाला विमान, जिसके प्राकार और तोरण खंडित हो चुके थे, चारों ओर से हाहाकार करते हुए असुरों से घिरा हुआ था।

श्लोक 45 (padma.5.34.45)

हनूमति महाशूरे क्षणं भूमौ क्षणं दिवि । इतस्ततः प्रदृश्येत कामयानं दुरासदम्

hanūmati mahāśūre kṣaṇaṁ bhūmau kṣaṇaṁ divi itastataḥ pradṛśyeta kāmayānaṁ durāsadam

महाशूर हनुमान क्षणभर पृथ्वी पर और क्षणभर आकाश में — इस प्रकार वह दुर्धर्ष इच्छायान इधर-उधर दिखाई पड़ता था।

श्लोक 46 (padma.5.34.46)

यत्रयत्र विमानं तत्तत्रतत्र समीरजः । प्रहरन्नेव दृश्येत कामरूपधरः कपिः

yatrayatra vimānaṁ tattatratatra samīrajaḥ praharanneva dṛśyeta kāmarūpadharaḥ kapiḥ

जहाँ-जहाँ वह विमान जाता, वहाँ-वहाँ ही इच्छानुसार रूप धारण करने वाले वानर पवनपुत्र प्रहार करते हुए दिखाई पड़ते थे।

श्लोक 47 (padma.5.34.47)

एवं तदाकुलीभूते विमानस्थे महाजने । उग्रदंष्ट्रस्तु दैत्येंद्रो हनूमंतमुपेयिवान्

evaṁ tadākulībhūte vimānasthe mahājane ugradaṁṣṭrastu daityeṁdro hanūmaṁtamupeyivān

इस प्रकार जब विमानस्थ महाजन-समूह व्याकुल हो गया, तब दैत्येंद्र उग्रदंष्ट्र हनुमान के पास आया।

श्लोक 48 (padma.5.34.48)

कपे त्वया महत्कर्म कृतं यद्भटपातनम् । क्षणं तिष्ठसि चेत्कुर्वे तव प्राणवियोजनम्

kape tvayā mahatkarma kṛtaṁ yadbhaṭapātanam kṣaṇaṁ tiṣṭhasi cetkurve tava prāṇaviyojanam

"हे वानर! तूने योद्धाओं को गिराकर महान् कार्य किया है; यदि तू क्षणभर और खड़ा रहे, तो मैं तेरे प्राणों को तेरे शरीर से अलग कर दूँगा।"

श्लोक 49 (padma.5.34.49)

एवमुक्त्वा हनूमंतं प्रजघान स दुर्मतिः । त्रिशूलेन सुतीक्ष्णेन ज्वलत्पावककांतिना

evamuktvā hanūmaṁtaṁ prajaghāna sa durmatiḥ triśūlena sutīkṣṇena jvalatpāvakakāṁtinā

ऐसा कहकर उस दुर्बुद्धि ने अत्यंत तीक्ष्ण, प्रज्वलित अग्नि के समान कांतिमान त्रिशूल से हनुमान पर प्रहार किया।

श्लोक 50 (padma.5.34.50)

तदागतं त्रिशूलं च मुखे जग्राह वीर्यवान् । चूर्णयामास सकलं सर्वलोहविनिर्मितम्

tadāgataṁ triśūlaṁ ca mukhe jagrāha vīryavān cūrṇayāmāsa sakalaṁ sarvalohavinirmitam

उस पराक्रमी हनुमान ने उस आते हुए त्रिशूल को अपने मुख में ही पकड़ लिया और पूर्णतः लौह-निर्मित उस त्रिशूल को चूर-चूर कर दिया।

श्लोक 51 (padma.5.34.51)

चूर्णयित्वा त्रिशूलं तदायसं दैत्यमोचितम् । जघान तं चपेटाभिर्बह्वीभिर्हनुमान्बली

cūrṇayitvā triśūlaṁ tadāyasaṁ daityamocitam jaghāna taṁ capeṭābhirbahvībhirhanumānbalī

उस दैत्य द्वारा फेंके गए लौह-त्रिशूल को चूर-चूर करके बलवान हनुमान ने उसे अनेक थप्पड़ों से पीट डाला।

श्लोक 52 (padma.5.34.52)

स आहतः कपीन्द्रेण चपेटाभिरितस्ततः । व्यथितो व्यसृजन्मायां सर्वलोकभयंकरीम्

sa āhataḥ kapīndreṇa capeṭābhiritastataḥ vyathito vyasṛjanmāyāṁ sarvalokabhayaṁkarīm

वानरेंद्र के थप्पड़ों से इधर-उधर आहत होकर, व्यथित होकर उसने समस्त लोकों को भयभीत कर देने वाली माया छोड़ दी।

श्लोक 53 (padma.5.34.53)

तदा तमोभवत्तीव्रं यत्र को वा न लक्ष्यते । यत्र स्वीयो न पारक्यो विदामास जनान्बहून्

tadā tamobhavattīvraṁ yatra ko vā na lakṣyate yatra svīyo na pārakyo vidāmāsa janānbahūn

तब घोर अंधकार छा गया, जिसमें कोई भी दिखाई नहीं देता था, जिसमें अनेक लोग अपने और पराए को नहीं पहचान पा रहे थे।

श्लोक 54 (padma.5.34.54)

शिलाः पर्वतशृंगाभाः पतंति सुभटोपरि । ताभिर्हतास्तु ते सर्वे व्याकुला अथ जज्ञिरे

śilāḥ parvataśṛṁgābhāḥ pataṁti subhaṭopari tābhirhatāstu te sarve vyākulā atha jajñire

पर्वत-शिखरों के समान विशाल शिलाएँ वीर योद्धाओं पर गिरने लगीं; उनसे आहत होकर वे सभी व्याकुल हो गए।

श्लोक 55 (padma.5.34.55)

विद्युतो विलसंत्यत्र गर्जंति जलदा घनम् । वर्षंति पूयरुधिरं मुंचंति समलं जलम्

vidyuto vilasaṁtyatra garjaṁti jaladā ghanam varṣaṁti pūyarudhiraṁ muṁcaṁti samalaṁ jalam

वहाँ बिजलियाँ चमकने लगीं, बादल गहनता से गरजने लगे, पीब और रक्त की वर्षा होने लगी, तथा मलिन जल बरसने लगा।

श्लोक 56 (padma.5.34.56)

आकाशात्पतमानानि कबंधानि बहूनि च । दृश्यंते छिन्नशीर्षाणि सकुंडलयुतानि च

ākāśātpatamānāni kabaṁdhāni bahūni ca dṛśyaṁte chinnaśīrṣāṇi sakuṁḍalayutāni ca

आकाश से गिरते हुए अनेक धड़ दिखाई पड़ने लगे, तथा कुंडलों सहित कटे हुए सिर भी दिखाई देने लगे।

श्लोक 57 (padma.5.34.57)

नग्ना विरूपाः सुभृशं कीर्णकेशाः सुदुर्मुखाः । दृश्यंते सर्वतो दैत्या दारुणा भयकारिणः

nagnā virūpāḥ subhṛśaṁ kīrṇakeśāḥ sudurmukhāḥ dṛśyaṁte sarvato daityā dāruṇā bhayakāriṇaḥ

नग्न, अत्यंत विरूप, बिखरे केशों वाले, अत्यंत कुरूप मुख वाले, भयंकर तथा भय उत्पन्न करने वाले दैत्य सर्वत्र दिखाई पड़ने लगे।

श्लोक 58 (padma.5.34.58)

तदा व्याकुलिता लोकाः परस्परभयाकुलाः । पलायनपरा जाता महोत्पातममंसत

tadā vyākulitā lokāḥ parasparabhayākulāḥ palāyanaparā jātā mahotpātamamaṁsata

तब सब लोग व्याकुल हो गए, एक-दूसरे से भयभीत होकर भागने लगे, तथा इसे एक महान् उत्पात मानने लगे।

श्लोक 59 (padma.5.34.59)

तदा शत्रुघ्न आयातो रथे स्थित्वा महायशाः । श्रीरामस्मरणं कृत्वा चापे संधाय सायकान्

tadā śatrughna āyāto rathe sthitvā mahāyaśāḥ śrīrāmasmaraṇaṁ kṛtvā cāpe saṁdhāya sāyakān

तब महायशस्वी शत्रुघ्न रथ में खड़े होकर वहाँ आए; श्रीराम का स्मरण करके उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाए।

श्लोक 60 (padma.5.34.60)

तां मायां स विधूयाथ मोहनास्त्रेण वीर्यवान् । शरधाराः किरन्व्योम्नि ववर्ष समरेसुरम्

tāṁ māyāṁ sa vidhūyātha mohanāstreṇa vīryavān śaradhārāḥ kiranvyomni vavarṣa samaresuram

उस पराक्रमी शत्रुघ्न ने मोहन अस्त्र से उस माया को नष्ट किया, तथा आकाश में बाणों की धाराएँ बिखेरते हुए युद्ध में उस असुर पर वर्षा की।

श्लोक 61 (padma.5.34.61)

तदादिशः प्रसेदुस्ता रविस्त्वपरिवेषवान् । मेघा यथागतं याता विद्युतः शांतिमागताः

tadādiśaḥ prasedustā ravistvapariveṣavān meghā yathāgataṁ yātā vidyutaḥ śāṁtimāgatāḥ

तब दिशाएँ स्वच्छ हो गईं, सूर्य आभामंडल रहित हो गया, बादल जिस प्रकार आए थे उसी प्रकार लौट गए, तथा बिजलियाँ शांत हो गईं।

श्लोक 62 (padma.5.34.62)

तदा विमानं पुरतो दृश्यते राक्षसैर्युतम् । छिंधि भिंधीति भाषाभिर्व्याकुलं सुतरां महत्

tadā vimānaṁ purato dṛśyate rākṣasairyutam chiṁdhi bhiṁdhīti bhāṣābhirvyākulaṁ sutarāṁ mahat

तब वह विशाल विमान, राक्षसों से भरा हुआ, "काटो! बींधो!" की पुकारों से अत्यंत व्याकुल, आगे दिखाई पड़ने लगा।

श्लोक 63 (padma.5.34.63)

बाणाश्च शतसाहस्राः स्वर्णपुंखैश्च शोभिताः । पेतुर्विमाने नभसि स्थिते कामगमे मुहुः

bāṇāśca śatasāhasrāḥ svarṇapuṁkhaiśca śobhitāḥ peturvimāne nabhasi sthite kāmagame muhuḥ

सैकड़ों-हज़ारों स्वर्ण-पुंखों से सुशोभित बाण आकाश में स्थित उस इच्छागामी विमान पर बार-बार गिरने लगे।

श्लोक 64 (padma.5.34.64)

तदा भग्नं विमानं हि दृश्यते न तदुच्चकैः । स्वपुरी खण्डमेकत्र भग्नांगमिव भूतले

tadā bhagnaṁ vimānaṁ hi dṛśyate na taduccakaiḥ svapurī khaṇḍamekatra bhagnāṁgamiva bhūtale

तब वह विमान चूर-चूर होकर ऊँचाई पर दिखाई नहीं पड़ता था; वह मानो कोई खंडित अंगों वाली नगरी बनकर भूतल पर टुकड़ों में बिखर गया।

श्लोक 65 (padma.5.34.65)

तदा प्रकुपितो दैत्यो बाणान्धनुषि संदधे । तैर्बाणैर्विकिरन्रामभ्रातरं चाभिगर्जितः

tadā prakupito daityo bāṇāndhanuṣi saṁdadhe tairbāṇairvikiranrāmabhrātaraṁ cābhigarjitaḥ

तब क्रुद्ध हुए दैत्य ने धनुष पर बाण चढ़ाए और उन्हें बिखेरते हुए राम के भाई के विरुद्ध गरज उठा।

श्लोक 66 (padma.5.34.66)

ते बाणाः शतशस्तस्य लग्ना वपुषि भूरिशः । शोभामापुः शोणितौघान्वहंतस्तीक्ष्णवक्त्रिणः

te bāṇāḥ śataśastasya lagnā vapuṣi bhūriśaḥ śobhāmāpuḥ śoṇitaughānvahaṁtastīkṣṇavaktriṇaḥ

वे सैकड़ों तीक्ष्ण-अग्र बाण उनके शरीर में अत्यधिक लगकर, रक्त-प्रवाह को बहाते हुए मानो एक विचित्र शोभा को प्राप्त हुए।

श्लोक 67 (padma.5.34.67)

शत्रुघ्नः परया शक्त्या संयुक्तो वायुदैवतम् । अस्त्रं धनुषि चाधत्त राक्षसानां प्रकम्पनम्

śatrughnaḥ parayā śaktyā saṁyukto vāyudaivatam astraṁ dhanuṣi cādhatta rākṣasānāṁ prakampanam

परम शक्ति से युक्त शत्रुघ्न ने राक्षसों को कंपा देने वाला, वायु-देवता युक्त अस्त्र धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 68 (padma.5.34.68)

तेनास्त्रेण विमानात्खात्पतन्तो मुक्तमूर्धजाः । दृश्यंते भूतवेतालसंघा इव नभश्चराः

tenāstreṇa vimānātkhātpatanto muktamūrdhajāḥ dṛśyaṁte bhūtavetālasaṁghā iva nabhaścarāḥ

उस अस्त्र से आकाश स्थित विमान से गिरते हुए, बिखरे केशों वाले वे मानो भूत-वेतालों के समूह के समान आकाशचारी दिखाई पड़ने लगे।

श्लोक 69 (padma.5.34.69)

तदस्त्रं रघुनाथस्य भ्रात्रा मुक्तं विलोक्य सः । अस्त्रं च पाशुपत्यं स चापे धाद्दनुजात्मजः

tadastraṁ raghunāthasya bhrātrā muktaṁ vilokya saḥ astraṁ ca pāśupatyaṁ sa cāpe dhāddanujātmajaḥ

रघुनाथ के भाई द्वारा छोड़े गए उस अस्त्र को देखकर उस दानवपुत्र ने अपने धनुष पर पाशुपत अस्त्र चढ़ाया।

श्लोक 70 (padma.5.34.70)

ततः प्रवृत्ता वेताला भूताः प्रेतनिशाचराः । कपालकर्तरीयुक्ताः पिबन्तः शोणितं बहु

tataḥ pravṛttā vetālā bhūtāḥ pretaniśācarāḥ kapālakartarīyuktāḥ pibantaḥ śoṇitaṁ bahu

तब वेताल, भूत, प्रेत और निशाचर, कपाल तथा कैंची लिए हुए, प्रचुर रक्त पीते हुए प्रकट होने लगे।

श्लोक 71 (padma.5.34.71)

ते वै शत्रुघ्नवीराणां रुधिराणि पपुर्मुदा । जीवतामपि दुर्वाराः कर्तरीपाणिशोभिताः

te vai śatrughnavīrāṇāṁ rudhirāṇi papurmudā jīvatāmapi durvārāḥ kartarīpāṇiśobhitāḥ

वे दुर्निवार्य, हाथों में कैंची लिए वे शत्रुघ्न के जीवित वीरों का भी रक्त हर्षपूर्वक पीने लगे।

श्लोक 72 (padma.5.34.72)

तदस्त्रं व्याप्नुवद्दृष्ट्वा सर्ववीरप्रभंजनम् । मुमोच तन्निरासाय चास्त्रं नारायणाभिधम्

tadastraṁ vyāpnuvaddṛṣṭvā sarvavīraprabhaṁjanam mumoca tannirāsāya cāstraṁ nārāyaṇābhidham

सभी वीरों का संहार करते हुए उस फैलते अस्त्र को देखकर उन्होंने उसके निवारण हेतु नारायणास्त्र छोड़ा।

श्लोक 73 (padma.5.34.73)

नारायणास्त्रं तान्सर्वान्वारयामास तत्क्षणात् । ते सर्वे विलयं प्रापुर्निशाचरप्रणोदिताः

nārāyaṇāstraṁ tānsarvānvārayāmāsa tatkṣaṇāt te sarve vilayaṁ prāpurniśācarapraṇoditāḥ

नारायणास्त्र ने उन सबको उसी क्षण रोक दिया; निशाचर द्वारा भेजे गए वे सब विलीन हो गए।

श्लोक 74 (padma.5.34.74)

तदा क्रुद्धो निशाचारी विद्युन्माली समाददे । त्रिशूलं निशितं घोरं शत्रुघ्नं हंतुमुल्बणम्

tadā kruddho niśācārī vidyunmālī samādade triśūlaṁ niśitaṁ ghoraṁ śatrughnaṁ haṁtumulbaṇam

तब क्रुद्ध हुए निशाचर विद्युन्माली ने शत्रुघ्न के वध हेतु एक तीक्ष्ण, घोर, भयानक त्रिशूल उठाया।

श्लोक 75 (padma.5.34.75)

शूलहस्तं समायांतं विद्युन्मालिनमाहवे । सायकैः प्राहरत्तस्य भुजे त्वर्धशशिप्रभैः

śūlahastaṁ samāyāṁtaṁ vidyunmālinamāhave sāyakaiḥ prāharattasya bhuje tvardhaśaśiprabhaiḥ

त्रिशूल हाथ में लिए युद्ध में आते हुए विद्युन्माली की भुजा पर शत्रुघ्न ने अर्धचंद्राकार बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 76 (padma.5.34.76)

तैर्बाणैश्छिन्नहस्तः स शिरसा हंतुमुद्यतः । हतोसि याहि शत्रुघ्न कस्त्वां त्राता भविष्यति

tairbāṇaiśchinnahastaḥ sa śirasā haṁtumudyataḥ hatosi yāhi śatrughna kastvāṁ trātā bhaviṣyati

उन बाणों से भुजा कट जाने पर वह अपने सिर से ही प्रहार करने को उद्यत हुआ और बोला — "हे शत्रुघ्न! तू मारा गया, जा; अब तेरा रक्षक कौन होगा?"

श्लोक 77 (padma.5.34.77)

इति ब्रुवाणं तरसा चिच्छेद शितसायकैः । मस्तकं तस्य बलिनः शूरस्य सह कुंडलम्

iti bruvāṇaṁ tarasā ciccheda śitasāyakaiḥ mastakaṁ tasya balinaḥ śūrasya saha kuṁḍalam

ऐसा कहते हुए उस बलवान शूरवीर के सिर को, कुंडलों सहित, शत्रुघ्न ने तीक्ष्ण बाणों से शीघ्रता से काट डाला।

श्लोक 78 (padma.5.34.78)

तं छिन्नशिरसं दृष्ट्वा उग्रदंष्ट्रः प्रतापवान् । मुष्टिना हंतुमारेभे शत्रुघ्नं शूरसेवितम्

taṁ chinnaśirasaṁ dṛṣṭvā ugradaṁṣṭraḥ pratāpavān muṣṭinā haṁtumārebhe śatrughnaṁ śūrasevitam

उसे सिर-कटा देखकर प्रतापी उग्रदंष्ट्र ने वीरों द्वारा सेवित शत्रुघ्न पर मुष्टि-प्रहार करना आरंभ किया।

श्लोक 79 (padma.5.34.79)

शत्रुघ्नस्तु क्षुरप्रेण सायकेनाच्छिनच्छिरः । प्रधावतो रणे वीरान्सर्वशस्त्रास्त्रकोविदान्

śatrughnastu kṣurapreṇa sāyakenācchinacchiraḥ pradhāvato raṇe vīrānsarvaśastrāstrakovidān

शत्रुघ्न ने रणभूमि में समस्त शस्त्रास्त्रों में निपुण वीरों की ओर दौड़ते हुए उस उग्रदंष्ट्र का सिर एक क्षुरप्र बाण से काट डाला।

श्लोक 80 (padma.5.34.80)

हतशेषा ययुः सर्वे राक्षसा नाथवर्जिताः । शत्रुघ्नं प्रणिपत्याथ ददुर्वाजिनमाहृतम्

hataśeṣā yayuḥ sarve rākṣasā nāthavarjitāḥ śatrughnaṁ praṇipatyātha dadurvājinamāhṛtam

शेष बचे सभी राक्षस, अपने स्वामी से विहीन होकर, शत्रुघ्न के चरणों में गिरकर उस हरे हुए अश्व को लौटा दिया।

श्लोक 81 (padma.5.34.81)

ततो वीणानिनादाश्च शंखनादाः समंततः । श्रूयंते शूरवीराणां जयनादा मनोहराः

tato vīṇāninādāśca śaṁkhanādāḥ samaṁtataḥ śrūyaṁte śūravīrāṇāṁ jayanādā manoharāḥ

तब चारों ओर वीणा की झंकार और शंख की ध्वनियाँ सुनाई देने लगीं, तथा शूरवीरों के मनोहर जय-घोष गूँजने लगे।

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