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पाताल खण्ड · अध्याय 4

राम का राज्याभिषेक

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (padma.5.4.1)

वात्स्यायन उवाच। भुजगाधीश्वरेशान धराभारधरक्षम । शृण्वेकं संशयं मह्यं कृपया कथयस्व तम्

vātsyāyana uvāca bhujagādhīśvareśāna dharābhāradharakṣama śṛṇvekaṁ saṁśayaṁ mahyaṁ kṛpayā kathayasva tam

वात्स्यायन जी ने कहा — हे भुजगाधीश्वरों के स्वामी, पृथ्वी का भार धारण करने में समर्थ! मेरा एक संशय सुनिए और कृपया उसे कहिए।

श्लोक 2 (padma.5.4.2)

रघुनाथस्य गमनं वनं प्रति यदा ह्यभूत् । तदा प्रभृति देहेन स्थिता शून्येन चेतसा

raghunāthasya gamanaṁ vanaṁ prati yadā hyabhūt tadā prabhṛti dehena sthitā śūnyena cetasā

जब रघुनाथ वन को गए, तब से माता कौसल्या शरीर से यहाँ रहते हुए भी मन से शून्य हो गई थीं —

श्लोक 3 (padma.5.4.3)

तद्विप्रयोगविधुरा कृशदेहातिदुःखिता । सुमुखान्मंत्रिणः श्रुत्वा रघुनाथं समागतम्

tadviprayogavidhurā kṛśadehātiduḥkhitā sumukhānmaṁtriṇaḥ śrutvā raghunāthaṁ samāgatam

उस वियोग से व्याकुल, शरीर से कृश, अत्यंत दुःखी — सुमुख मंत्री से रघुनाथ के आगमन का समाचार सुनकर —

श्लोक 4 (padma.5.4.4)

कथं जहर्ष किमभूत्कीदृशं तत्र चिह्नितम् । रामचंद्रस्य संदेशहर्तारं किमुवाच सा

kathaṁ jaharṣa kimabhūtkīdṛśaṁ tatra cihnitam rāmacaṁdrasya saṁdeśahartāraṁ kimuvāca sā

वे कैसे हर्षित हुईं? क्या हुआ? वहाँ कैसे चिह्न प्रकट हुए? रामचंद्र का संदेश लाने वाले से उन्होंने क्या कहा?

श्लोक 5 (padma.5.4.5)

एतन्मे संशयं छिंधि रघुनाथगुणोदयम् । यथावच्छृण्वते मह्यं कथयस्व प्रसादतः

etanme saṁśayaṁ chiṁdhi raghunāthaguṇodayam yathāvacchṛṇvate mahyaṁ kathayasva prasādataḥ

मेरा यह संशय दूर कीजिए — रघुनाथ के गुणों का यह उदय — मुझे सुनते हुए यथावत् कृपापूर्वक कहिए।

श्लोक 6 (padma.5.4.6)

शेष उवाच । साधुपृष्टं महाभाग द्विजवर्यपुरस्कृत । तन्मे निगदतः साक्षाच्छृणुष्वैकमनाः किल

śeṣa uvāca sādhupṛṣṭaṁ mahābhāga dvijavaryapuraskṛta tanme nigadataḥ sākṣācchṛṇuṣvaikamanāḥ kila

शेष जी ने कहा — हे महाभाग, द्विजश्रेष्ठ! अच्छा पूछा है। एकाग्रचित्त होकर मेरे मुख से यह वृत्तांत साक्षात् सुनिए।

श्लोक 7 (padma.5.4.7)

सा वै तद्वदनांभोज च्युतं रामागमामृतम् । पीत्वा पीत्वा बभूवाहो स्थगितांगेन विह्वला

sā vai tadvadanāṁbhoja cyutaṁ rāmāgamāmṛtam pītvā pītvā babhūvāho sthagitāṁgena vihvalā

वे उस सुमुख के मुखकमल से झरते हुए राम-आगमन के अमृत का बार-बार पान करके, अहो! स्तब्ध शरीर से व्याकुल हो गईं।

श्लोक 8 (padma.5.4.8)

किं मे स्वप्नो विमूढायाः किं वा भ्रमकरं वचः । ममवै मंदभाग्यायाः कथं रामेक्षणं पुनः

kiṁ me svapno vimūḍhāyāḥ kiṁ vā bhramakaraṁ vacaḥ mamavai maṁdabhāgyāyāḥ kathaṁ rāmekṣaṇaṁ punaḥ

"क्या यह मेरे मोहग्रस्त मन का स्वप्न है, या भ्रम उत्पन्न करने वाली वाणी है? भला मंदभागिनी मुझे पुनः राम का दर्शन कैसे हो सकता है?

श्लोक 9 (padma.5.4.9)

बहुना तपसा कृत्वा प्राप्तोऽयं वै सुतः शिशुः । केनचिन्मम पापेन विप्रयोगं गतः पुनः

bahunā tapasā kṛtvā prāpto'yaṁ vai sutaḥ śiśuḥ kenacinmama pāpena viprayogaṁ gataḥ punaḥ

बहुत तप करके यह पुत्र-शिशु प्राप्त हुआ था; मेरे ही किसी पाप से वह पुनः वियोग को प्राप्त हो गया।

श्लोक 10 (padma.5.4.10)

सुमंत्रिन्कुशली रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः । कथं मां स्मरते वीरो वनचारी सुदुःखिताम्

sumaṁtrinkuśalī rāmaḥ sītālakṣmaṇasaṁyutaḥ kathaṁ māṁ smarate vīro vanacārī suduḥkhitām

हे सुमंत्रिन्! क्या राम, सीता और लक्ष्मण सहित कुशल हैं? वन में विचरण करने वाला वह वीर मुझ अत्यंत दुःखी को कैसे स्मरण करता है?"

श्लोक 11 (padma.5.4.11)

इति सा विललापोच्चै रघुनाथस्मृतिं गता । न निवेद निजं किंचित्परकीयं विमोहिता । सुमुखोऽपि तथा दृष्ट्वा दुःखितां मातरं भृशम्

iti sā vilalāpoccai raghunāthasmṛtiṁ gatā na niveda nijaṁ kiṁcitparakīyaṁ vimohitā sumukho'pi tathā dṛṣṭvā duḥkhitāṁ mātaraṁ bhṛśam

इस प्रकार वे ऊँचे स्वर में विलाप करने लगीं, रघुनाथ के स्मरण में लीन, मोहवश अपनी कोई भी बात न कहकर केवल उन्हीं की बात कहती रहीं। सुमुख भी माता को इस प्रकार अत्यंत दुःखी देखकर —

श्लोक 12 (padma.5.4.12)

वीजयामास वासोग्रैः संज्ञामाप च सा पुनः । उवाच जननीं सौम्यं वचोहर्षकरं मुहुः

vījayāmāsa vāsograiḥ saṁjñāmāpa ca sā punaḥ uvāca jananīṁ saumyaṁ vacoharṣakaraṁ muhuḥ

अपने वस्त्र के आँचल से उन्हें हवा करने लगा, और वे पुनः सचेत हुईं; उसने माता से बार-बार सौम्य, हर्षकारी वचन कहे।

श्लोक 13 (padma.5.4.13)

रघुनाथागमस्मार हृष्टां तां व्यदधात्पुनः । मातर्विद्धि गृहं प्राप्तं रघुनाथं सलक्ष्मणम्

raghunāthāgamasmāra hṛṣṭāṁ tāṁ vyadadhātpunaḥ mātarviddhi gṛhaṁ prāptaṁ raghunāthaṁ salakṣmaṇam

रघुनाथ के आगमन का स्मरण कराकर उसने उन्हें पुनः प्रसन्न किया — "हे माता! जान लीजिए, लक्ष्मण सहित रघुनाथ घर पहुँच चुके हैं।

श्लोक 14 (padma.5.4.14)

सीतया सहितं पश्य चाशीर्भिरभियुंक्ष्व च । इति तथ्यं वचः श्रुत्वा सुमुखेन प्रभाषितम्

sītayā sahitaṁ paśya cāśīrbhirabhiyuṁkṣva ca iti tathyaṁ vacaḥ śrutvā sumukhena prabhāṣitam

सीता सहित उन्हें देखिए और आशीर्वाद दीजिए।" सुमुख द्वारा कहे गए इन सत्य वचनों को सुनकर —

श्लोक 15 (padma.5.4.15)

यादृशं हर्षमापेदे तादृशं वेद्म्यहं नहि । उत्थाय चाजिरे प्राप्ता रोमांचिततनूरुहा

yādṛśaṁ harṣamāpede tādṛśaṁ vedmyahaṁ nahi utthāya cājire prāptā romāṁcitatanūruhā

उन्हें जैसा हर्ष हुआ, वैसा मैं वर्णन नहीं कर सकता; वे उठकर आँगन में पहुँचीं, शरीर के रोम-रोम खड़े हो गए।

श्लोक 16 (padma.5.4.16)

हर्षविह्वलितांग्यश्रु मुंचंती राममैक्षत । तावत्स रामो राजेंद्रो नरयानमधिश्रितः

harṣavihvalitāṁgyaśru muṁcaṁtī rāmamaikṣata tāvatsa rāmo rājeṁdro narayānamadhiśritaḥ

हर्ष से विह्वल अंगों वाली, अश्रु बहाती हुई उन्होंने राम को देखा। उसी समय राजेंद्र राम मनुष्यों द्वारा वहन किए जाने वाले वाहन से —

श्लोक 17 (padma.5.4.17)

प्राप्तः स्वमातुर्भवनं कैकेय्याः सुनयः पुरः । कैकेय्यपि त्रपाभारनम्रा रामं पुरःस्थितम्

prāptaḥ svamāturbhavanaṁ kaikeyyāḥ sunayaḥ puraḥ kaikeyyapi trapābhāranamrā rāmaṁ puraḥsthitam

उतरकर अपनी माता के भवन में पहुँचे, जहाँ सुनयना कैकेयी सामने खड़ी थीं। कैकेयी भी लज्जा के भार से झुककर सामने खड़े राम को देखकर —

श्लोक 18 (padma.5.4.18)

नोवाच किंचिन्महतीं चिंतां प्राप्तवती मुहुः । सूर्यवंशध्वजो रामो मातरं वीक्ष्य लज्जिताम्

novāca kiṁcinmahatīṁ ciṁtāṁ prāptavatī muhuḥ sūryavaṁśadhvajo rāmo mātaraṁ vīkṣya lajjitām

कुछ न बोल सकीं, बार-बार महान् चिंता में डूब गईं। सूर्यवंश की ध्वजा राम ने अपनी माता को लज्जित देखकर —

श्लोक 19 (padma.5.4.19)

उवाच सांत्वयंस्तां च वाक्यैर्विनयमिश्रितैः । श्रीराम उवाच। मातर्मया वनं गत्वा सर्वमाचरितं तथा

uvāca sāṁtvayaṁstāṁ ca vākyairvinayamiśritaiḥ śrīrāma uvāca mātarmayā vanaṁ gatvā sarvamācaritaṁ tathā

विनयपूर्ण वचनों से उन्हें सांत्वना दी। श्रीराम ने कहा — "हे माता! मैंने वन में जाकर सब कुछ वैसे ही किया —

श्लोक 20 (padma.5.4.20)

अधुना करवै किं वा त्वदाज्ञातो जनन्यहो । मया न्यूनं कृतं नास्ति कथं मां नेक्ष्यसे पुनः

adhunā karavai kiṁ vā tvadājñāto jananyaho mayā nyūnaṁ kṛtaṁ nāsti kathaṁ māṁ nekṣyase punaḥ

अब आपकी आज्ञा से और क्या करूँ, हे माता? मैंने कुछ भी न्यून नहीं किया, फिर आप मुझे पुनः क्यों नहीं देखतीं?

श्लोक 21 (padma.5.4.21)

आशीर्भिरभिनंद्यैनं भरतं मां च वीक्षय । इति श्रुत्वापि तद्वाक्यं सा नम्रवदनानघ

āśīrbhirabhinaṁdyainaṁ bharataṁ māṁ ca vīkṣaya iti śrutvāpi tadvākyaṁ sā namravadanānagha

आशीर्वाद देकर मुझे और भरत को स्वीकार कीजिए।" यह वचन सुनकर भी वे निष्पाप, मुख झुकाए हुए —

श्लोक 22 (padma.5.4.22)

शनैः शनैः प्रत्युवाच राम गच्छ स्वमालयम् । रामोऽपि श्रुत्वा वचनं जनन्याः पुरुषोत्तमः

śanaiḥ śanaiḥ pratyuvāca rāma gaccha svamālayam rāmo'pi śrutvā vacanaṁ jananyāḥ puruṣottamaḥ

धीरे-धीरे बोलीं — "राम, तुम अपने घर जाओ।" राम ने भी माता का यह वचन सुनकर, वे पुरुषोत्तम —

श्लोक 23 (padma.5.4.23)

नमस्कृत्य ययौ गेहं सुमित्रायाः कृपानिधिः । सुमित्रा पुत्रसहितं रामं दृष्ट्वा महामनाः

namaskṛtya yayau gehaṁ sumitrāyāḥ kṛpānidhiḥ sumitrā putrasahitaṁ rāmaṁ dṛṣṭvā mahāmanāḥ

नमस्कार करके सुमित्रा के घर गए, वे करुणानिधि। महामना सुमित्रा ने पुत्र सहित राम को देखकर —

श्लोक 24 (padma.5.4.24)

चिरंजीव चिरंजीव ह्याशीर्भिरिति चाभ्यधात् । मातुश्च रामभद्रोऽपि चरणौ प्रणिपत्य च

ciraṁjīva ciraṁjīva hyāśīrbhiriti cābhyadhāt mātuśca rāmabhadro'pi caraṇau praṇipatya ca

"चिरंजीवी रहो, चिरंजीवी रहो" कहकर आशीर्वाद दिया। रामभद्र ने भी माता के चरणों में प्रणाम करके —

श्लोक 25 (padma.5.4.25)

परिष्वज्य मुदायुक्तो जगाद वचनं पुनः । रत्नगर्भे मम भ्रात्रा केनापि न कृतं तथा

pariṣvajya mudāyukto jagāda vacanaṁ punaḥ ratnagarbhe mama bhrātrā kenāpi na kṛtaṁ tathā

हर्षपूर्वक आलिंगन करके पुनः वचन कहा — "हे रत्नगर्भे! मेरे किसी अन्य भाई ने वैसा नहीं किया —

श्लोक 26 (padma.5.4.26)

यथायमकरोद्धीमान्ममदुःखापनोदनम्

yathāyamakaroddhīmānmamaduḥkhāpanodanam

जैसा इस बुद्धिमान् ने मेरे दुःख को दूर करने के लिए किया है।

श्लोक 27 (padma.5.4.27)

रावणेन हृता सीता मया यत्प्राप्यते पुनः । मातस्तत्सर्वमाविद्धि लक्ष्मणस्य विचेष्टितम्

rāvaṇena hṛtā sītā mayā yatprāpyate punaḥ mātastatsarvamāviddhi lakṣmaṇasya viceṣṭitam

रावण द्वारा हरी गई सीता को मैंने जो पुनः प्राप्त किया, हे माता! उसे सब लक्ष्मण की ही चेष्टा जानिए।"

श्लोक 28 (padma.5.4.28)

दत्तामाशिषमागृह्य शिरसायं सुमित्रया । निजमातुश्च भवनं प्रययौ विबुधैर्वृतः

dattāmāśiṣamāgṛhya śirasāyaṁ sumitrayā nijamātuśca bhavanaṁ prayayau vibudhairvṛtaḥ

सुमित्रा द्वारा दिया गया आशीर्वाद सिर पर धारण करके, वे विद्वानों से घिरे हुए अपनी माता के भवन को गए।

श्लोक 29 (padma.5.4.29)

मातरं वीक्ष्य हृषितां निजदर्शनलालसाम् । स्वयानादवरुह्याशु चरणावग्रहीद्धरिः

mātaraṁ vīkṣya hṛṣitāṁ nijadarśanalālasām svayānādavaruhyāśu caraṇāvagrahīddhariḥ

अपने दर्शन के लिए उत्सुक, हर्षित माता को देखकर हरि (राम) शीघ्र अपने वाहन से उतरकर उनके चरण पकड़ लिए।

श्लोक 30 (padma.5.4.30)

माता तद्दर्शनोत्कंठा विह्वलीकृतमानसा । परिष्वज्य परिष्वज्य रामं मुदमवाप सा

mātā taddarśanotkaṁṭhā vihvalīkṛtamānasā pariṣvajya pariṣvajya rāmaṁ mudamavāpa sā

उनके दर्शन की उत्कण्ठा से जिनका मन व्याकुल हो रहा था, वह माता बार-बार राम का आलिंगन करके हर्ष को प्राप्त हुईं।

श्लोक 31 (padma.5.4.31)

शरीरे रोमहर्षोऽभूद्गद्गदा वागभूत्तदा । हर्षाश्रूणि तु सोष्णानि प्रवाहं प्रापुरापदात्

śarīre romaharṣo'bhūdgadgadā vāgabhūttadā harṣāśrūṇi tu soṣṇāni pravāhaṁ prāpurāpadāt

शरीर में रोमांच हो आया, वाणी गद्गद हो गई, और हर्ष के गरम आँसू निरंतर प्रवाह के रूप में बहने लगे।

श्लोक 32 (padma.5.4.32)

जननीं वीक्ष्य विनयी ताटंकद्वयवर्जिताम् । कराकल्प पदाकल्परहितां बिभ्रतीं तनुम्

jananīṁ vīkṣya vinayī tāṭaṁkadvayavarjitām karākalpa padākalparahitāṁ bibhratīṁ tanum

विनम्र राम ने माता को दोनों कुंडलों से रहित, हाथों और पैरों के आभूषणों से रहित शरीर धारण किए देखकर —

श्लोक 33 (padma.5.4.33)

किंचित्स्वदर्शनाद्धृष्टां कृशांगीं तां स शोकभाक् । दुःखस्य समयो नायमिति मत्वा जगाद ताम्

kiṁcitsvadarśanāddhṛṣṭāṁ kṛśāṁgīṁ tāṁ sa śokabhāk duḥkhasya samayo nāyamiti matvā jagāda tām

उनके दर्शन से कुछ प्रसन्न हुई किंतु कृशकाय उस माता को, स्वयं भी शोक से युक्त होकर, यह अभी शोक का समय नहीं — ऐसा सोचकर उनसे कहा —

श्लोक 34 (padma.5.4.34)

श्रीराम उवाच। मातर्मया त्वच्चरणौ चिरकालं न सेवितौ । ततः क्षमस्वापराधं भाग्यहीनस्य वै मम

śrīrāma uvāca mātarmayā tvaccaraṇau cirakālaṁ na sevitau tataḥ kṣamasvāparādhaṁ bhāgyahīnasya vai mama

श्रीराम ने कहा — "हे माता! मैंने चिरकाल तक आपके चरणों की सेवा नहीं की; इसलिए भाग्यहीन मेरे इस अपराध को क्षमा कीजिए।

श्लोक 35 (padma.5.4.35)

ये पुत्रा मातापित्रोर्न शुश्रूषायां समुत्सुकाः । ते मंतव्याः परा मातः कीटका रेतसो भवाः

ye putrā mātāpitrorna śuśrūṣāyāṁ samutsukāḥ te maṁtavyāḥ parā mātaḥ kīṭakā retaso bhavāḥ

जो पुत्र माता-पिता की सेवा में उत्सुक नहीं होते, हे माता! उन्हें केवल वीर्य से उत्पन्न कीड़े ही समझना चाहिए।

श्लोक 36 (padma.5.4.36)

किं कुर्वे जनकाज्ञातो गतो वै दंडकं वनम् । तत्रापि त्वत्कृपापांगात्तीर्णोऽस्मि दुःखसागरम्

kiṁ kurve janakājñāto gato vai daṁḍakaṁ vanam tatrāpi tvatkṛpāpāṁgāttīrṇo'smi duḥkhasāgaram

पिता की आज्ञा से मैं दण्डक वन को गया, वहाँ भी क्या करता — किन्तु वहाँ भी आपकी कृपादृष्टि से ही मैं दुःख-सागर से पार हुआ।

श्लोक 37 (padma.5.4.37)

रावणेन हृता सीता लंकायां गमिता पुनः । त्वत्कृपातो मया लब्धा तं हत्वा राक्षसेश्वरम्

rāvaṇena hṛtā sītā laṁkāyāṁ gamitā punaḥ tvatkṛpāto mayā labdhā taṁ hatvā rākṣaseśvaram

रावण द्वारा हरी जाकर लंका ले जाई गई सीता को, आपकी ही कृपा से उस राक्षसराज को मारकर मैंने पुनः प्राप्त किया।

श्लोक 38 (padma.5.4.38)

सीतेयं त्वच्चरणयोः पतिता वै पतिव्रता । संभावयाशु चकितां त्वत्पादार्पितमानसाम्

sīteyaṁ tvaccaraṇayoḥ patitā vai pativratā saṁbhāvayāśu cakitāṁ tvatpādārpitamānasām

यह पतिव्रता सीता आपके चरणों में गिरी हुई है; भयभीत, आपके चरणों में मन अर्पित करने वाली इसे शीघ्र स्वीकार कीजिए।"

श्लोक 39 (padma.5.4.39)

इति श्रुत्वा तु तद्वाक्यं पादयोः पतितां स्नुषाम् । आशीर्भिरभियुज्यैनां बभाषे तां पतिव्रताम्

iti śrutvā tu tadvākyaṁ pādayoḥ patitāṁ snuṣām āśīrbhirabhiyujyaināṁ babhāṣe tāṁ pativratām

यह वचन सुनकर, चरणों में गिरी हुई अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद देते हुए उस पतिव्रता से माता ने कहा —

श्लोक 40 (padma.5.4.40)

सीते स्वपतिना सार्द्धं चिरं विलस भामिनि । पुत्रौ प्रसूय च कुलं स्वकं पावय पावने

sīte svapatinā sārddhaṁ ciraṁ vilasa bhāmini putrau prasūya ca kulaṁ svakaṁ pāvaya pāvane

"हे सीते, तेजस्विनी! अपने पति के साथ चिरकाल तक सुशोभित रहो; दो पुत्रों को जन्म देकर, हे पवित्रे, अपने कुल को पावन करो।

श्लोक 41 (padma.5.4.41)

त्वत्सदृश्यः पतिपराः पतिदुःखसुखानुगाः । भवंति दुःखभागिन्यो न हि सत्यं जगत्त्रये

tvatsadṛśyaḥ patiparāḥ patiduḥkhasukhānugāḥ bhavaṁti duḥkhabhāginyo na hi satyaṁ jagattraye

तुम्हारे समान पतिपरायणा, पति के दुःख-सुख का अनुसरण करने वाली स्त्रियाँ तीनों लोकों में सचमुच दुःख की भागी कभी नहीं होतीं।

श्लोक 42 (padma.5.4.42)

विदेहपुत्रि स्वकुलं त्वया पावितमात्मना । रामपादाब्जयुगलमनुयांत्या महावनम्

videhaputri svakulaṁ tvayā pāvitamātmanā rāmapādābjayugalamanuyāṁtyā mahāvanam

हे विदेहनन्दिनी! महावन में राम के चरणकमल-युगल का अनुसरण करके तुमने स्वयं अपने कुल को पवित्र किया है।

श्लोक 43 (padma.5.4.43)

किं चित्रं यत्पुमांसस्तु वैरिकोटिप्रभंजनाः । येषां गेहे सती भार्या स्वपतिप्रियवाञ्छिका

kiṁ citraṁ yatpumāṁsastu vairikoṭiprabhaṁjanāḥ yeṣāṁ gehe satī bhāryā svapatipriyavāñchikā

यह कोई आश्चर्य नहीं कि जिन पुरुषों के घर में केवल अपने पति का हित चाहने वाली सती पत्नी होती है, वे करोड़ों शत्रुओं का नाश करने वाले होते हैं।"

श्लोक 44 (padma.5.4.44)

इत्युक्त्वा रघुनाथस्य भार्यामंचितलोचनाम् । तूष्णीं बभूव हृषिता प्रहृष्टस्वतनूरुहा

ityuktvā raghunāthasya bhāryāmaṁcitalocanām tūṣṇīṁ babhūva hṛṣitā prahṛṣṭasvatanūruhā

यह कहकर, रघुनाथ की पत्नी के विशाल नेत्रों को देखते हुए वे हर्षित, रोमांचित शरीर से मौन हो गईं।

श्लोक 45 (padma.5.4.45)

अथ भ्रातास्य भरतः पित्रा दत्तं निजं महत् । राज्यं निवेदयामास रामचंद्राय धीमते

atha bhrātāsya bharataḥ pitrā dattaṁ nijaṁ mahat rājyaṁ nivedayāmāsa rāmacaṁdrāya dhīmate

तत्पश्चात् उनके भाई भरत ने पिता द्वारा दिया गया अपना विशाल राज्य बुद्धिमान् रामचंद्र को समर्पित किया।

श्लोक 46 (padma.5.4.46)

मंत्रिणस्ते प्रहृष्टांगा दैवज्ञान्मंत्रकोविदान् । आहूय सुमुहूर्तंते पप्रच्छुः परमादरात्

maṁtriṇaste prahṛṣṭāṁgā daivajñānmaṁtrakovidān āhūya sumuhūrtaṁte papracchuḥ paramādarāt

हर्षित मंत्रियों ने मंत्र-विद्या में निपुण दैवज्ञों को बुलाकर परम आदर से शुभ मुहूर्त के विषय में पूछा।

श्लोक 47 (padma.5.4.47)

शुभे मुहूर्ते सुदिने शुभनक्षत्रसंयुते । अभिषेकं महाराज्ये कारयामासुरुद्यताः

śubhe muhūrte sudine śubhanakṣatrasaṁyute abhiṣekaṁ mahārājye kārayāmāsurudyatāḥ

शुभ मुहूर्त में, शुभ नक्षत्र से युक्त शुभ दिन में, उन्होंने महाराज्य के अभिषेक का कार्य आरंभ कर दिया।

श्लोक 48 (padma.5.4.48)

सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं व्याघ्रचर्मणि सुंदरे । लिखित्वोपरि राजेंद्रो महाराजोधितस्थिवान्

saptadvīpavatīṁ pṛthvīṁ vyāghracarmaṇi suṁdare likhitvopari rājeṁdro mahārājodhitasthivān

सुंदर व्याघ्रचर्म पर सप्तद्वीपों वाली पृथ्वी का चित्र अंकित कराकर, महाराजाधिराज उस पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 49 (padma.5.4.49)

तद्दिनादेव साधूनां मनांसि प्रमुदं ययुः । दुष्टानां चेतसो ग्लानिरभवत्परतापिनाम्

taddinādeva sādhūnāṁ manāṁsi pramudaṁ yayuḥ duṣṭānāṁ cetaso glānirabhavatparatāpinām

उस दिन से साधु पुरुषों के मन हर्ष से भर गए, तथा दूसरों को सताने वाले दुष्टों के चित्त म्लान हो गए।

श्लोक 50 (padma.5.4.50)

स्त्रियस्तु पतिभक्त्या च पतिव्रतपरायणाः । मनसापि कदा पापं नाचरंति जना मुने

striyastu patibhaktyā ca pativrataparāyaṇāḥ manasāpi kadā pāpaṁ nācaraṁti janā mune

हे मुने! पति-भक्ति और पतिव्रत-धर्म में तत्पर स्त्रियाँ मन से भी कभी पाप का आचरण नहीं करतीं।

श्लोक 51 (padma.5.4.51)

दैत्यादेवास्तथा नागा यक्षासुरमहोरगाः । सर्वे न्यायपथे स्थित्वा रामाज्ञां शिरसा दधुः

daityādevāstathā nāgā yakṣāsuramahoragāḥ sarve nyāyapathe sthitvā rāmājñāṁ śirasā dadhuḥ

दैत्य, देव, नाग, यक्ष, असुर तथा महानाग — सभी न्याय के मार्ग पर स्थित होकर राम की आज्ञा को शिरोधार्य करने लगे।

श्लोक 52 (padma.5.4.52)

परोपकरणेयुक्ताः स्वधर्मसुखनिर्वृताः । विद्याविनोदगमिता दिनरात्रिक्षणाः शुभाः

paropakaraṇeyuktāḥ svadharmasukhanirvṛtāḥ vidyāvinodagamitā dinarātrikṣaṇāḥ śubhāḥ

सब लोग परोपकार में तत्पर, अपने-अपने धर्म के सुख से संतुष्ट रहते; उनके दिन-रात के शुभ क्षण विद्या और विनोद में बीतते।

श्लोक 53 (padma.5.4.53)

वातोऽपि मार्गसंस्थानां बलान्नाहरते महान् । वासांस्यपि तु सूक्ष्माणि तत्र चौरकथा नहि

vāto'pi mārgasaṁsthānāṁ balānnāharate mahān vāsāṁsyapi tu sūkṣmāṇi tatra caurakathā nahi

मार्ग में चलने वालों का सामान वायु भी बलपूर्वक नहीं हरती थी; सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्त्र भी सुरक्षित रहते — वहाँ चोरी की चर्चा तक न थी।

श्लोक 54 (padma.5.4.54)

धनदो ह्यर्थिनां रामः कारुण्यश्च कृपानिधिः । भ्रातृभिः सहितो नित्यं गुरुदेवस्तुतिं व्यधात्

dhanado hyarthināṁ rāmaḥ kāruṇyaśca kṛpānidhiḥ bhrātṛbhiḥ sahito nityaṁ gurudevastutiṁ vyadhāt

याचकों को धन देने वाले, करुणाशील, करुणानिधि राम अपने भाइयों सहित नित्य गुरु और देवताओं की स्तुति किया करते थे।

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