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पाताल खण्ड · अध्याय 3

नगर-प्रवेश

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

श्लोक 1 (padma.5.3.1)

शेष उवाच। दृष्ट्वा रामो राजधानीं निजलोकनिवासिनीम् । जहर्ष मतिमान्वीरश्चिरदर्शनलालसः

śeṣa uvāca dṛṣṭvā rāmo rājadhānīṁ nijalokanivāsinīm jaharṣa matimānvīraściradarśanalālasaḥ

शेष जी ने कहा — अपने ही लोगों के निवास-स्थान उस राजधानी को देखकर, चिरकाल से उसके दर्शन के लिए लालायित, बुद्धिमान् वीर राम अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 2 (padma.5.3.2)

भरतोऽपि स्वकं मित्रं सुमुखं नगरं प्रति । प्रेषयामास सचिवं नगरोत्सवसिद्धये

bharato'pi svakaṁ mitraṁ sumukhaṁ nagaraṁ prati preṣayāmāsa sacivaṁ nagarotsavasiddhaye

भरत ने भी नगर के उत्सव की सिद्धि हेतु अपने प्रिय मित्र मंत्री सुमुख को नगर की ओर भेजा।

श्लोक 3 (padma.5.3.3)

भरत उवाच। कुर्वंतु लोकास्त्वरितं रघुनाथागमोत्सवम् । मंदिरे मंदिरे रम्यं कृतकौतुकचित्रकम्

bharata uvāca kurvaṁtu lokāstvaritaṁ raghunāthāgamotsavam maṁdire maṁdire ramyaṁ kṛtakautukacitrakam

भरत ने कहा — लोग शीघ्र रघुनाथ के आगमन का उत्सव मनाएँ, घर-घर सुंदर एवं कौतुक-चित्रों से सुसज्जित करें।

श्लोक 4 (padma.5.3.4)

विपांसुका राजमार्गाश्चंदनद्रवसिंचिताः । प्रसूनभरसंकॢप्ता हृष्टपुष्टजनावृताः

vipāṁsukā rājamārgāścaṁdanadravasiṁcitāḥ prasūnabharasaṁkḷptā hṛṣṭapuṣṭajanāvṛtāḥ

राजमार्ग धूल-रहित, चंदन के जल से सिंचित, फूलों से भरपूर तथा हृष्ट-पुष्ट लोगों से आवृत हों।

श्लोक 5 (padma.5.3.5)

विचित्रवर्णध्वजभा चित्रिताखिलस्वांगणाः । मेघागमे धनुरिव पश्यंत्वेव वलीमुखाः

vicitravarṇadhvajabhā citritākhilasvāṁgaṇāḥ meghāgame dhanuriva paśyaṁtveva valīmukhāḥ

नाना रंगों की पताकाओं से सुशोभित, समस्त आँगन चित्रित हों, जिन्हें देखकर वानर मानो मेघों के आगमन पर इंद्रधनुष देख रहे हों।

श्लोक 6 (padma.5.3.6)

प्रतिगेहं तु लोकानां कारयंत्वगरूक्षणम् । यद्धूमं वीक्ष्य शिखिनो नृत्यं कुर्वंतु लीलया

pratigehaṁ tu lokānāṁ kārayaṁtvagarūkṣaṇam yaddhūmaṁ vīkṣya śikhino nṛtyaṁ kurvaṁtu līlayā

घर-घर लोग अगर की धूनी दें, जिसका धुआँ देखकर मयूर लीलापूर्वक नृत्य करने लगें।

श्लोक 7 (padma.5.3.7)

हस्तिनो मम शैलाभानाधोरणसुयंत्रितान् । विचित्रयंतु बहुशो गैरिकाद्युपधातुभिः

hastino mama śailābhānādhoraṇasuyaṁtritān vicitrayaṁtu bahuśo gairikādyupadhātubhiḥ

पर्वत के समान मेरे हाथी, महावतों द्वारा सुनियंत्रित, गेरू आदि उपधातुओं से बहुविध सजाए जाएँ।

श्लोक 8 (padma.5.3.8)

वाजिनश्चित्रिता भूयः सुशोभंतु मनोजवाः । यद्वेगवीक्षणादेव गर्वं त्यजति स्वर्हयः

vājinaścitritā bhūyaḥ suśobhaṁtu manojavāḥ yadvegavīkṣaṇādeva garvaṁ tyajati svarhayaḥ

मन के समान वेगवान् घोड़े और भी सजाकर सुशोभित किए जाएँ, जिनके वेग को देखकर स्वर्ग के घोड़े भी अपना गर्व त्याग दें।

श्लोक 9 (padma.5.3.9)

कन्याः सहस्रशो रम्याः सर्वाभरणभूषिताः । गजोपरि समारूढा मुक्ताभिर्विकिरंतु च

kanyāḥ sahasraśo ramyāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ gajopari samārūḍhā muktābhirvikiraṁtu ca

सर्वाभूषणों से सजी सहस्रों सुंदर कन्याएँ हाथियों पर सवार होकर मोती बिखेरें।

श्लोक 10 (padma.5.3.10)

ब्राह्मण्यः पात्रहस्ताश्च दूर्वाहारिद्रसंयुताः । सुवासिन्यो महाराजं रामं नीराजयंतु ताः

brāhmaṇyaḥ pātrahastāśca dūrvāhāridrasaṁyutāḥ suvāsinyo mahārājaṁ rāmaṁ nīrājayaṁtu tāḥ

पात्र हाथ में लिए हुए, दूर्वा और हल्दी से युक्त ब्राह्मणियाँ तथा सुहागिनें महाराज राम की आरती उतारें।

श्लोक 11 (padma.5.3.11)

कौसल्यापुत्रसंयोगसंदेश विधुरा सती । हर्षं प्राप्नोतु सुकृशा तदीक्षणसुलालसा

kausalyāputrasaṁyogasaṁdeśa vidhurā satī harṣaṁ prāpnotu sukṛśā tadīkṣaṇasulālasā

पुत्र-मिलन के संदेश से व्याकुल, अत्यंत कृशकाय, उनके दर्शन की अभिलाषिणी सती कौसल्या हर्ष को प्राप्त हों।

श्लोक 12 (padma.5.3.12)

इत्येवमादिरचनाः पुरशोभाविधायिकाः । करोतु जनता हृष्टा रामस्यागमनं प्रति

ityevamādiracanāḥ puraśobhāvidhāyikāḥ karotu janatā hṛṣṭā rāmasyāgamanaṁ prati

इस प्रकार की और भी नगर-शोभा बढ़ाने वाली व्यवस्थाएँ हर्षित प्रजा राम के आगमन के निमित्त करे।

श्लोक 13 (padma.5.3.13)

शेष उवाच। इति श्रुत्वा ततो वाक्यं सुमुखो मंत्रवित्तमः । प्रययौ नगरीं कर्तुं कृतकौतुकतोरणाम्

śeṣa uvāca iti śrutvā tato vākyaṁ sumukho maṁtravittamaḥ prayayau nagarīṁ kartuṁ kṛtakautukatoraṇām

शेष जी ने कहा — यह वचन सुनकर मंत्रविद्या में निपुण सुमुख नगरी को कौतुक-तोरणों से सजाने के लिए चल पड़े।

श्लोक 14 (padma.5.3.14)

गत्वाथ नगरीं तां वै मंत्री तु सुमुखाभिधः । ख्यापयामास लोकानां रामागममहोत्सवम्

gatvātha nagarīṁ tāṁ vai maṁtrī tu sumukhābhidhaḥ khyāpayāmāsa lokānāṁ rāmāgamamahotsavam

उस नगरी में जाकर सुमुख नामक मंत्री ने लोगों में राम के आगमन के महोत्सव की घोषणा की।

श्लोक 15 (padma.5.3.15)

लोकाः श्रुत्वा पुरीं प्राप्तं रघुनाथं सुहर्षिताः । पूर्वं तदीय विरहत्यक्तभोगसुखादयः

lokāḥ śrutvā purīṁ prāptaṁ raghunāthaṁ suharṣitāḥ pūrvaṁ tadīya virahatyaktabhogasukhādayaḥ

रघुनाथ के नगर में पहुँचने का समाचार सुनकर लोग अत्यंत हर्षित हुए — वे लोग जो उनके वियोग में पहले ही सुख-भोग त्याग चुके थे।

श्लोक 16 (padma.5.3.16)

ब्राह्मणा वेदसंपन्नाः पवित्रा दर्भपाणयः । धौतोत्तरीयवलिता जग्मुः श्रीरघुनायकम्

brāhmaṇā vedasaṁpannāḥ pavitrā darbhapāṇayaḥ dhautottarīyavalitā jagmuḥ śrīraghunāyakam

वेदसम्पन्न, पवित्र, हाथों में दर्भ लिए, धुले हुए उत्तरीय वस्त्र पहने ब्राह्मण श्रीरघुनाथ के पास गए।

श्लोक 17 (padma.5.3.17)

क्षत्रिया ये शूरतमा धनुर्बाणधरा वराः । संग्रामे बहुशो वीरा जेतारो ययुरप्यमुम्

kṣatriyā ye śūratamā dhanurbāṇadharā varāḥ saṁgrāme bahuśo vīrā jetāro yayurapyamum

जो क्षत्रिय अत्यंत शूरवीर, धनुष-बाण धारण करने वाले श्रेष्ठ, संग्राम में अनेक बार विजयी वीर थे, वे भी उनके पास गए।

श्लोक 18 (padma.5.3.18)

वैश्या धनसमृद्धाश्च मुद्राशोभितपाणयः । शुभ्रवस्त्रपरीधाना अभिजग्मुर्नरेश्वरम्

vaiśyā dhanasamṛddhāśca mudrāśobhitapāṇayaḥ śubhravastraparīdhānā abhijagmurnareśvaram

धन-सम्पन्न, हाथों में मुद्राओं से सुशोभित, शुभ्र वस्त्र धारण किए वैश्य भी उन नरेश्वर के सम्मुख गए।

श्लोक 19 (padma.5.3.19)

शूद्रा द्विजेषु ये भक्ताः स्वीयाचारसुनिष्ठिताः । वेदाचाररता ये वै तेऽपिजग्मुः पुरीपतिम्

śūdrā dvijeṣu ye bhaktāḥ svīyācārasuniṣṭhitāḥ vedācāraratā ye vai te'pijagmuḥ purīpatim

द्विजों के भक्त, अपने-अपने आचार में सुस्थिर, वेदाचार में रत जो शूद्र थे, वे भी उस नगरी के स्वामी के पास गए।

श्लोक 20 (padma.5.3.20)

ये ये वृत्तिकरा लोकाः स्वे स्वे कर्मण्यधिष्ठिताः । स्वकं वस्तु समादाय ययुः श्रीरामभूपतिम्

ye ye vṛttikarā lokāḥ sve sve karmaṇyadhiṣṭhitāḥ svakaṁ vastu samādāya yayuḥ śrīrāmabhūpatim

अपने-अपने कर्म में स्थित जो-जो जीविकोपार्जक लोग थे, वे अपनी-अपनी वस्तुएँ लेकर श्रीराम महाराज के पास गए।

श्लोक 21 (padma.5.3.21)

इत्थं भूपतिसंदेशात्प्रमोदाप्लवसंयुताः । नाना कौतुकसंयुक्ता आजग्मुर्मनुजेश्वरम्

itthaṁ bhūpatisaṁdeśātpramodāplavasaṁyutāḥ nānā kautukasaṁyuktā ājagmurmanujeśvaram

इस प्रकार राजा के संदेश से हर्ष में डूबे, नाना कौतुकों से युक्त लोग उस नरेश्वर के पास आए।

श्लोक 22 (padma.5.3.22)

शेष उवाच। रघुनाथोऽपि सकलैर्दैवतैः स्वस्वयानगैः । परीतः प्रविवेशोच्चैः पुरीं रचितमोहनाम्

śeṣa uvāca raghunātho'pi sakalairdaivataiḥ svasvayānagaiḥ parītaḥ praviveśoccaiḥ purīṁ racitamohanām

शेष जी ने कहा — रघुनाथ भी अपने-अपने वाहनों पर सवार समस्त देवताओं से घिरे हुए, मोहक रूप से सजी उस नगरी में महान् वैभव से प्रविष्ट हुए।

श्लोक 23 (padma.5.3.23)

प्लवंगाः प्लवनैर्युक्ता आकाशपथचारिणः । स्वस्वशोभापरीतांगाश्चानुजग्मुः पुरोत्तमम्

plavaṁgāḥ plavanairyuktā ākāśapathacāriṇaḥ svasvaśobhāparītāṁgāścānujagmuḥ purottamam

आकाश-मार्ग में विचरण करने वाले, कुशल छलाँग लगाने वाले वानर, अपनी-अपनी शोभा से युक्त शरीरों सहित उस श्रेष्ठ नगरी की ओर पीछे-पीछे चले।

श्लोक 24 (padma.5.3.24)

पुष्पकादवरुह्याशु नरयानमथारुहत् । सीतया सहितो रामः परिवारसमावृतः

puṣpakādavaruhyāśu narayānamathāruhat sītayā sahito rāmaḥ parivārasamāvṛtaḥ

पुष्पक विमान से शीघ्र उतरकर सीता सहित राम परिवार से घिरे हुए मनुष्यों द्वारा वहन किए जाने वाले वाहन पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 25 (padma.5.3.25)

अयोध्यां प्रविवेशाथ कृतकौतुकतोरणाम् । हृष्टपुष्टजनाकीर्णामुत्सवैः परीभूषिताम्

ayodhyāṁ praviveśātha kṛtakautukatoraṇām hṛṣṭapuṣṭajanākīrṇāmutsavaiḥ parībhūṣitām

तब उन्होंने कौतुक-तोरणों से सजी, हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरी, उत्सवों से विभूषित अयोध्या में प्रवेश किया।

श्लोक 26 (padma.5.3.26)

वीणापणवभेर्यादिवादित्रैराहतैर्भृशम् । शोभमानः स्तूयमानः सूतमागधबंदिभिः

vīṇāpaṇavabheryādivāditrairāhatairbhṛśam śobhamānaḥ stūyamānaḥ sūtamāgadhabaṁdibhiḥ

वीणा, पणव, भेरी आदि वाद्यों की तीव्र ध्वनि से सुशोभित, सूत-मागध-बंदीजनों द्वारा स्तुति किए जाते हुए राम —

श्लोक 27 (padma.5.3.27)

जय राघवरामेति जय सूर्यकुलांगद । जय दाशरथे देव जयताल्लोकनायकः

jaya rāghavarāmeti jaya sūryakulāṁgada jaya dāśarathe deva jayatāllokanāyakaḥ

'जय राघव राम! जय सूर्यवंश के आभूषण! जय हे दशरथनन्दन देव! जय हो लोकनायक की!'

श्लोक 28 (padma.5.3.28)

इति शृण्वञ्छुभां वाचं पौराणां हर्षितांगिनाम् । रामदर्शनसंजात पुलकोद्भेद शोभिनाम्

iti śṛṇvañchubhāṁ vācaṁ paurāṇāṁ harṣitāṁginām rāmadarśanasaṁjāta pulakodbheda śobhinām

इस प्रकार नगरवासियों की यह शुभ वाणी सुनते हुए, जिनके शरीर राम-दर्शन से उत्पन्न रोमांच से हर्षित होकर सुशोभित हो रहे थे —

श्लोक 29 (padma.5.3.29)

प्रविवेश वरं मार्गं रथ्याचत्वरभूषितम् । चंदनोदकसंसिक्तं पुष्पपल्लवसंयुतम्

praviveśa varaṁ mārgaṁ rathyācatvarabhūṣitam caṁdanodakasaṁsiktaṁ puṣpapallavasaṁyutam

वे गलियों और चौराहों से सुसज्जित, चंदन-जल से सिंचित, फूल-पत्तों से युक्त उस श्रेष्ठ मार्ग में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 30 (padma.5.3.30)

तदा पौरांगनाः काश्चिद्गवाक्षबिलमाश्रिताः । रघुनाथस्वरूपेक्षा जातकामा अथाब्रुवन्

tadā paurāṁganāḥ kāścidgavākṣabilamāśritāḥ raghunāthasvarūpekṣā jātakāmā athābruvan

तब झरोखों में बैठी कुछ नगर-स्त्रियाँ रघुनाथ के स्वरूप को देखकर, उत्कण्ठा से भरकर यह कहने लगीं —

श्लोक 31 (padma.5.3.31)

पौरांगना ऊचुः। धन्या अभूवन्बत भिल्लकन्या वनेषु या राममुखारविंदम् । स्वलोचनेंदीवरकैरथापिबन्स्वभाग्यसंजातमहोदया इमाः

paurāṁganā ūcuḥ dhanyā abhūvanbata bhillakanyā vaneṣu yā rāmamukhāraviṁdam svalocaneṁdīvarakairathāpibansvabhāgyasaṁjātamahodayā imāḥ

नगर-स्त्रियों ने कहा — धन्य हैं वे भीलकन्याएँ, जिन्होंने वन में अपने कमल-सदृश नीले नेत्रों से राम के मुखकमल का पान किया — अपने भाग्य से ही उन्हें यह महान् सौभाग्य प्राप्त हुआ!

श्लोक 32 (padma.5.3.32)

धन्यं मुखं पश्यत वीरधाम्नः श्रीरामदेवस्य सरोजनेत्रम् । यद्दर्शनं धातृमुखाः सुरा अपि प्रापुर्महद्भाग्ययुता वयंत्वहो

dhanyaṁ mukhaṁ paśyata vīradhāmnaḥ śrīrāmadevasya sarojanetram yaddarśanaṁ dhātṛmukhāḥ surā api prāpurmahadbhāgyayutā vayaṁtvaho

देखो वीरधाम श्रीराम के इस धन्य कमल-नेत्र मुख को! जिसके दर्शन को ब्रह्मादि देवता भी महान् भाग्य मानते हैं, आज हम भी वही महाभाग्य पा रही हैं!

श्लोक 33 (padma.5.3.33)

एतन्मुखं पश्यत चारुहासं किरीटसंशोभिनिजोत्तमांगम् । बंधूकधिक्कारलसच्छविप्रदं दंतच्छदं बिभ्रतमुच्चनासम्

etanmukhaṁ paśyata cāruhāsaṁ kirīṭasaṁśobhinijottamāṁgam baṁdhūkadhikkāralasacchavipradaṁ daṁtacchadaṁ bibhratamuccanāsam

देखो, इस मुख को — मनोहर मुस्कान वाले, मुकुट से सुशोभित मस्तक वाले, बंधूक पुष्प की शोभा को भी तिरस्कृत करने वाले होंठों वाले, उन्नत नासिका धारण करने वाले!

श्लोक 34 (padma.5.3.34)

इति गदितवतीस्ताः स्नेहभारेण रामा नलिनदलसदृक्षैर्नेत्रपातैर्निरीक्ष्य । निखिलगुरुरनूनप्रेमभारं नृलोकं जननिगृहमियेष प्रोषितांगेन हृष्टः

iti gaditavatīstāḥ snehabhāreṇa rāmā nalinadalasadṛkṣairnetrapātairnirīkṣya nikhilagururanūnapremabhāraṁ nṛlokaṁ jananigṛhamiyeṣa proṣitāṁgena hṛṣṭaḥ

इस प्रकार कहने वाली उन स्त्रियों को स्नेहभार से कमल-दल के समान चितवन से देखकर, समस्त जगत् के गुरु राम, अपार प्रेम से भरे मनुष्य-लोक को देखते हुए, चिरकाल से बाहर रहे शरीर के साथ हर्षपूर्वक अपनी माता के घर की ओर चले।

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