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पाताल खण्ड · अध्याय 6

रावण की उत्पत्ति

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (padma.5.6.1)

शेष उवाच। इत्थं स्वागतसंतुष्टं ब्रह्मचर्यतपोनिधिम् । उवाच मतिमान्वीरः सर्वलोकगुरुर्मुनिम्

śeṣa uvāca itthaṁ svāgatasaṁtuṣṭaṁ brahmacaryataponidhim uvāca matimānvīraḥ sarvalokagururmunim

शेष जी ने कहा — इस प्रकार स्वागत से संतुष्ट, ब्रह्मचर्य-तप के निधि उस मुनि से बुद्धिमान् वीर, सर्वलोक-गुरु राम ने कहा —

श्लोक 2 (padma.5.6.2)

स्वागतं ते महाभाग कुंभयोने तपोनिधे । त्वद्दर्शनेन सर्वे वै पाविताः सकुटुंबकाः

svāgataṁ te mahābhāga kuṁbhayone taponidhe tvaddarśanena sarve vai pāvitāḥ sakuṭuṁbakāḥ

"हे महाभाग, कुम्भयोने, तपोनिधे! आपका स्वागत है। आपके दर्शन से हम सब परिवार सहित पवित्र हो गए हैं।

श्लोक 3 (padma.5.6.3)

कच्चिन्मतिस्ते वेदेषु शास्त्रेषु परिवर्तते । त्वत्तपोविघ्नकर्ता वै नास्ति भूमंडले क्वचित्

kaccinmatiste vedeṣu śāstreṣu parivartate tvattapovighnakartā vai nāsti bhūmaṁḍale kvacit

क्या आपकी बुद्धि वेदों और शास्त्रों में सदा रमी रहती है? क्या भूमंडल में कहीं कोई आपके तप में विघ्न डालने वाला है?

श्लोक 4 (padma.5.6.4)

लोपामुद्रा महाभाग या च ते धर्मचारिणी । यस्याः पतिव्रता धर्मात्सर्वं भवति शोभनम्

lopāmudrā mahābhāga yā ca te dharmacāriṇī yasyāḥ pativratā dharmātsarvaṁ bhavati śobhanam

हे महाभाग! आपकी धर्मपत्नी लोपामुद्रा, जिसके पातिव्रत्य-धर्म से सब कुछ शोभायमान होता है, कुशल तो हैं?

श्लोक 5 (padma.5.6.5)

अपि शंस महाभाग धर्ममूर्ते कृपानिधे । अलोलुपस्य किं कार्यं करवाणि मुनीश्वर

api śaṁsa mahābhāga dharmamūrte kṛpānidhe alolupasya kiṁ kāryaṁ karavāṇi munīśvara

हे धर्ममूर्ते, करुणानिधे महाभाग! बताइए, निःस्पृह आपके लिए मैं क्या सेवा करूँ, हे मुनीश्वर?

श्लोक 6 (padma.5.6.6)

त्वत्तपोयोगतः सर्वं भवति स्वेच्छया बहु । तथापि मयि कृत्वैव कृपां शंश मुनीश्वरः

tvattapoyogataḥ sarvaṁ bhavati svecchayā bahu tathāpi mayi kṛtvaiva kṛpāṁ śaṁśa munīśvaraḥ

आपके तप के प्रभाव से सब कुछ अपने आप, इच्छानुसार, प्रचुर मात्रा में प्राप्त होता है; फिर भी मुझ पर कृपा करते हुए बताइए, हे मुनीश्वर।"

श्लोक 7 (padma.5.6.7)

शेष उवाच। इत्युक्तो लोकगुरुणा राजराजेन धीमता । उवाच रामं लोकेशं विनीततरभाषया

śeṣa uvāca ityukto lokaguruṇā rājarājena dhīmatā uvāca rāmaṁ lokeśaṁ vinītatarabhāṣayā

शेष जी ने कहा — इस प्रकार बुद्धिमान् राजराज लोकगुरु राम द्वारा कहे जाने पर, उन्होंने अत्यंत विनम्र वाणी में लोकेश्वर राम से कहा —

श्लोक 8 (padma.5.6.8)

अगस्त्य उवाच। स्वामिंस्तव सुदुर्दर्शं दर्शनं दैवतैरपि । मत्वा समागतं विद्धि राजराज कृपानिधे

agastya uvāca svāmiṁstava sudurdarśaṁ darśanaṁ daivatairapi matvā samāgataṁ viddhi rājarāja kṛpānidhe

अगस्त्य ने कहा — "हे स्वामिन्! जान लीजिए कि आपका दर्शन देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ मानकर ही मैं यहाँ आया हूँ, हे राजराज, करुणानिधे!

श्लोक 9 (padma.5.6.9)

हतस्त्वया रावणाख्यस्त्वसुरो लोककंटकः । दिष्ट्याद्य देवाः सुखिनो दिष्ट्या राजा बिभीषणः

hatastvayā rāvaṇākhyastvasuro lokakaṁṭakaḥ diṣṭyādya devāḥ sukhino diṣṭyā rājā bibhīṣaṇaḥ

आपने रावण नामक जगत्-कंटक असुर का वध किया है; आज सचमुच देवगण सुखी हैं, सचमुच विभीषण राजा हुए हैं!

श्लोक 10 (padma.5.6.10)

राम त्वद्दर्शनान्मेऽद्य गतं वै दुष्कृतं किल । संपूर्णो मे मनःकोश आनंदेन सुरोत्तम

rāma tvaddarśanānme'dya gataṁ vai duṣkṛtaṁ kila saṁpūrṇo me manaḥkośa ānaṁdena surottama

हे राम! आज आपके दर्शन से मेरा पाप निश्चय ही दूर हो गया; हे सुरोत्तम! मेरे मन का कोश आनंद से परिपूर्ण हो गया है।"

श्लोक 11 (padma.5.6.11)

इत्युक्त्वा स बभूवाशु तूष्णीं कुंभसमुद्भवः । रामसंदर्शनाह्लादविह्वलीकृतमानसः

ityuktvā sa babhūvāśu tūṣṇīṁ kuṁbhasamudbhavaḥ rāmasaṁdarśanāhlādavihvalīkṛtamānasaḥ

यह कहकर कुम्भ से उत्पन्न वे मुनि शीघ्र ही मौन हो गए, राम के दर्शन के आनंद से जिनका मन विह्वल हो उठा था।

श्लोक 12 (padma.5.6.12)

रामः पप्रच्छ तं भूयो मुनिं ज्ञानविशारदम् । लोकातीतं भवद्भावि सर्वं जानासि सर्वतः

rāmaḥ papraccha taṁ bhūyo muniṁ jñānaviśāradam lokātītaṁ bhavadbhāvi sarvaṁ jānāsi sarvataḥ

राम ने ज्ञान में निपुण उस मुनि से पुनः पूछा — "आप लोकातीत, भूत और भविष्य सभी कुछ सब प्रकार से जानते हैं।

श्लोक 13 (padma.5.6.13)

मुने कथय मे सर्वं पृच्छतो हि सुविस्तरम् । कोऽसौ मया हतो यो हि रावणो विबुधार्दनः

mune kathaya me sarvaṁ pṛcchato hi suvistaram ko'sau mayā hato yo hi rāvaṇo vibudhārdanaḥ

हे मुने! मुझे पूछते हुए सब कुछ विस्तार से बताइए — मैंने जिस रावण का वध किया, जो देवताओं को सताने वाला था, वह कौन था?

श्लोक 14 (padma.5.6.14)

कुंभकर्णोऽपि कस्त्वेष का जातिर्वै दुरात्मनः । देवो दैत्यः पिशाचो वा राक्षसो वा महामुने

kuṁbhakarṇo'pi kastveṣa kā jātirvai durātmanaḥ devo daityaḥ piśāco vā rākṣaso vā mahāmune

और यह कुम्भकर्ण भी कौन था? उस दुरात्मा की जाति क्या थी? हे महामुने! वह देव था, दैत्य था, पिशाच था, या राक्षस था?

श्लोक 15 (padma.5.6.15)

सर्वमाख्याहि सर्वज्ञ सर्वं जानासि विस्तरात् । अतः कथय मे सर्वं कृपां कृत्वा ममोपरि

sarvamākhyāhi sarvajña sarvaṁ jānāsi vistarāt ataḥ kathaya me sarvaṁ kṛpāṁ kṛtvā mamopari

हे सर्वज्ञ! सब कुछ बताइए, आप सब कुछ विस्तार से जानते हैं। अतः मुझ पर कृपा करके सब कुछ कहिए।"

श्लोक 16 (padma.5.6.16)

इति श्रुत्वा ततो वाक्यं कुंभजन्मा तपोनिधिः । यत्पृष्टं रघुराजेन प्रवक्तुं तत्प्रचक्रमे

iti śrutvā tato vākyaṁ kuṁbhajanmā taponidhiḥ yatpṛṣṭaṁ raghurājena pravaktuṁ tatpracakrame

यह वचन सुनकर कुम्भ से उत्पन्न वे तपोनिधि रघुराज द्वारा पूछी गई बात कहने लगे —

श्लोक 17 (padma.5.6.17)

राजन्सृष्टिकरो ब्रह्मा पुलस्त्यस्तत्सुतोऽभवत् । ततस्तु विश्रवा जज्ञे वेदविद्याविशारदः

rājansṛṣṭikaro brahmā pulastyastatsuto'bhavat tatastu viśravā jajñe vedavidyāviśāradaḥ

"हे राजन्! सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य हुए; उनसे वेदविद्या में निपुण विश्रवा उत्पन्न हुए।

श्लोक 18 (padma.5.6.18)

तस्य पत्नीद्वयं जातं पातिव्रत्यचरित्रभृत् । एका मंदाकिनी नाम्नी द्वितीया कैकसी स्मृता

tasya patnīdvayaṁ jātaṁ pātivratyacaritrabhṛt ekā maṁdākinī nāmnī dvitīyā kaikasī smṛtā

उनकी दो पत्नियाँ हुईं, दोनों पातिव्रत्य-धर्म से युक्त — एक का नाम मंदाकिनी, दूसरी कैकसी कही जाती थी।

श्लोक 19 (padma.5.6.19)

पूर्वस्यां धनदो जज्ञे लोकपालविलासभृत् । योऽसौ शिवप्रसादेन लंकावासमचीकरत्

pūrvasyāṁ dhanado jajñe lokapālavilāsabhṛt yo'sau śivaprasādena laṁkāvāsamacīkarat

पहली से लोकपाल के वैभव से युक्त धनद (कुबेर) उत्पन्न हुए, जिन्होंने शिव की कृपा से लंका में निवास बनाया।

श्लोक 20 (padma.5.6.20)

विद्युन्मालिसुतायां तु पुत्रत्रयमभून्महत् । रावणः कुंभकर्णश्च तथा पुण्यो बिभीषणः

vidyunmālisutāyāṁ tu putratrayamabhūnmahat rāvaṇaḥ kuṁbhakarṇaśca tathā puṇyo bibhīṣaṇaḥ

विद्युन्माली की पुत्री कैकसी से तीन महान् पुत्र उत्पन्न हुए — रावण, कुम्भकर्ण तथा पुण्यशाली विभीषण।

श्लोक 21 (padma.5.6.21)

राक्षस्युदरजन्मत्वात्संध्यासमयसंभवात् । द्वयोरधर्मनिपुणा मतिरासीन्महामते

rākṣasyudarajanmatvātsaṁdhyāsamayasaṁbhavāt dvayoradharmanipuṇā matirāsīnmahāmate

हे महामते! राक्षसी के गर्भ से जन्म तथा संध्या-काल में गर्भाधान होने के कारण, उन दोनों की बुद्धि अधर्म में निपुण थी।

श्लोक 22 (padma.5.6.22)

एकदा तु विमानेन पुष्पकेण सुशोभिना । कांचनीयोपकल्पेन किंकिणीजालमालिना

ekadā tu vimānena puṣpakeṇa suśobhinā kāṁcanīyopakalpena kiṁkiṇījālamālinā

एक बार सुशोभित, स्वर्णमय, घंटियों की मालाओं से युक्त पुष्पक विमान पर —

श्लोक 23 (padma.5.6.23)

आरुह्य पितरौ द्रष्टुं प्रायाच्छोभासमन्वितः । स्वगणैः संस्तुतो भूत्वा नानारत्नविभूषणैः

āruhya pitarau draṣṭuṁ prāyācchobhāsamanvitaḥ svagaṇaiḥ saṁstuto bhūtvā nānāratnavibhūṣaṇaiḥ

सवार होकर, अनेक रत्नाभूषणों से युक्त अपने गणों द्वारा स्तुत होते हुए, शोभा से युक्त वे (कुबेर) माता-पिता को देखने चले।

श्लोक 24 (padma.5.6.24)

आगत्य पित्रोश्चरणे पतित्वा चिरमात्मजः । हर्षविह्वलितात्मा च रोमांचिततनूरुहः

āgatya pitroścaraṇe patitvā ciramātmajaḥ harṣavihvalitātmā ca romāṁcitatanūruhaḥ

आकर वह पुत्र माता-पिता के चरणों में चिरकाल तक गिरा रहा, हर्ष से विह्वल मन, रोमांचित शरीर वाला —

श्लोक 25 (padma.5.6.25)

उवाच मेऽद्य सुदिनं महाभाग्यफलोदयः । यन्मे युष्मत्पदौ दृष्टौ महापुण्यददर्शनौ

uvāca me'dya sudinaṁ mahābhāgyaphalodayaḥ yanme yuṣmatpadau dṛṣṭau mahāpuṇyadadarśanau

और बोला — 'आज मेरे लिए महान् सौभाग्य का फल उदय होने वाला यह शुभ दिन है, कि मैंने आपके महापुण्यदायक चरणों के दर्शन किए।'

श्लोक 26 (padma.5.6.26)

इत्यादिभिः स्तुतिपदैः स्तुत्वागान्मंदिरं स्वकम् । पितरावपि संहृष्टौ पुत्रस्नेहाद्बभूवतुः

ityādibhiḥ stutipadaiḥ stutvāgānmaṁdiraṁ svakam pitarāvapi saṁhṛṣṭau putrasnehādbabhūvatuḥ

इस प्रकार स्तुति के वचनों से स्तुति करके वह अपने भवन को गया; माता-पिता भी पुत्र-स्नेह से अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 27 (padma.5.6.27)

तं दृष्ट्वा रावणो धीमाञ्जगाद निजमातरम् । कोऽयं पुमान्सुरो वाथ यक्षो वाथ नरोत्तमः

taṁ dṛṣṭvā rāvaṇo dhīmāñjagāda nijamātaram ko'yaṁ pumānsuro vātha yakṣo vātha narottamaḥ

उसे देखकर बुद्धिमान् रावण ने अपनी माता से कहा — 'यह कौन पुरुष था — देव, यक्ष, अथवा नरश्रेष्ठ —

श्लोक 28 (padma.5.6.28)

योऽसौ मम पितुःपादौ सन्निषेव्य गतः पुनः । महाभाग्यनिधिः स्वीयैर्गणैः सुपरिवारितः

yo'sau mama pituḥpādau sanniṣevya gataḥ punaḥ mahābhāgyanidhiḥ svīyairgaṇaiḥ suparivāritaḥ

जो मेरे पिता के चरणों की सेवा करके अपने गणों से सुपरिवृत, महाभाग्य का भण्डार बनकर पुनः चला गया?

श्लोक 29 (padma.5.6.29)

केनेदं तपसा लब्धं विमानं वायुवेगधृक् । उद्यानारामलीलादि विलासस्थानमुत्तमम्

kenedaṁ tapasā labdhaṁ vimānaṁ vāyuvegadhṛk udyānārāmalīlādi vilāsasthānamuttamam

किस तप से इसने वायु के समान वेगवान् यह विमान, तथा उद्यान-आराम-लीला आदि से युक्त यह उत्तम विलास-स्थान प्राप्त किया?'

श्लोक 30 (padma.5.6.30)

शेष उवाच। इति वाक्यं समाकर्ण्य जननी रोषविक्लवा । उवाच पुत्रं विमनाः किंचिन्नेत्रविकारिणी

śeṣa uvāca iti vākyaṁ samākarṇya jananī roṣaviklavā uvāca putraṁ vimanāḥ kiṁcinnetravikāriṇī

शेष जी ने कहा — यह वचन सुनकर क्रोध से व्याकुल, खिन्नमना, कुछ नेत्र बदलती हुई माता ने पुत्र से कहा —

श्लोक 31 (padma.5.6.31)

रे पुत्र शृणु मद्वाक्यं बहुशिक्षासमन्वितम् । एतस्य जन्मकर्मादि विचारचतुराधिकम्

re putra śṛṇu madvākyaṁ bahuśikṣāsamanvitam etasya janmakarmādi vicāracaturādhikam

'रे पुत्र! मेरी बहुत सी शिक्षाओं से युक्त बात सुन — इसके जन्म-कर्म आदि का विचार अत्यंत गहन है।

श्लोक 32 (padma.5.6.32)

सपत्न्या मम कुक्षिस्थं विधानं समुपस्थितम् । येन स्वमातुर्विमलं कुलमुज्ज्वलितं महत्

sapatnyā mama kukṣisthaṁ vidhānaṁ samupasthitam yena svamāturvimalaṁ kulamujjvalitaṁ mahat

जब वह मेरी सौत के गर्भ में था, तभी वह विधान सामने आया जिससे उसकी माता का निर्मल, महान् कुल उज्ज्वल हो गया।

श्लोक 33 (padma.5.6.33)

त्वं तु मत्कुक्षिजः कीटः पापः स्वोदरपूरकः । यथा खरः स्वकं भारं जानाति न च तद्गुणम्

tvaṁ tu matkukṣijaḥ kīṭaḥ pāpaḥ svodarapūrakaḥ yathā kharaḥ svakaṁ bhāraṁ jānāti na ca tadguṇam

किन्तु तू मेरे गर्भ से उत्पन्न पापी कीड़ा है, केवल अपना पेट भरने वाला; जैसे गधा अपना बोझ ही जानता है, उसका गुण नहीं जानता,

श्लोक 34 (padma.5.6.34)

तथा त्वं लक्ष्यसेऽज्ञानी शयनासनभोगवान् । सुप्तो गतः क्वचिद्भ्रष्ट इत्येव तव संभवः

tathā tvaṁ lakṣyase'jñānī śayanāsanabhogavān supto gataḥ kvacidbhraṣṭa ityeva tava saṁbhavaḥ

वैसे ही तू भी अज्ञानी, केवल शयन-आसन-भोग में लीन दिखाई देता है — कभी सोया, कभी कहीं गया, कभी भ्रष्ट — बस यही तेरा जीवन है।

श्लोक 35 (padma.5.6.35)

अनेन तपसा लब्धं शिवसंतोषकारिणा । लंकावासो मनोवेगं विमानं राज्यसंपदः

anena tapasā labdhaṁ śivasaṁtoṣakāriṇā laṁkāvāso manovegaṁ vimānaṁ rājyasaṁpadaḥ

शिव को संतुष्ट करने वाले उस तप से ही उसने लंका-निवास, मनोवेगी विमान तथा राज्य-सम्पदा प्राप्त की।

श्लोक 36 (padma.5.6.36)

सुधन्या जननी त्वस्य सुभाग्या सुमहोदया । यस्याः पुत्रो निजगुणैर्लब्धवान्महतां पदम्

sudhanyā jananī tvasya subhāgyā sumahodayā yasyāḥ putro nijaguṇairlabdhavānmahatāṁ padam

धन्य है उसकी माता, सुभाग्यशालिनी, महान् उदयवाली, जिसके पुत्र ने अपने ही गुणों से महापुरुषों का पद प्राप्त किया।'

श्लोक 37 (padma.5.6.37)

इति क्रुधा भाषितमार्तया तया मात्रा स्वयाऽकर्ण्य दुरात्मसत्तमः । रोषं विधायात्मगतं पुनर्वचो जगाद तां निश्चयभृत्तपः प्रति

iti krudhā bhāṣitamārtayā tayā mātrā svayā'karṇya durātmasattamaḥ roṣaṁ vidhāyātmagataṁ punarvaco jagāda tāṁ niścayabhṛttapaḥ prati

अपनी माता द्वारा दुःखपूर्वक क्रोध से कहे गए ये वचन सुनकर, वह दुरात्माओं में श्रेष्ठ, भीतर के क्रोध को दबाकर, तप के प्रति दृढ़-निश्चयी होकर पुनः उससे बोला —

श्लोक 38 (padma.5.6.38)

रावण उवाच। जनन्याकर्णय वचो मम गर्वसमन्वितम् । रत्नगर्भा त्वमेवासि यस्याः पुत्रास्त्रयो वयम्

rāvaṇa uvāca jananyākarṇaya vaco mama garvasamanvitam ratnagarbhā tvamevāsi yasyāḥ putrāstrayo vayam

रावण ने कहा — "हे माता! मेरे इस गर्वयुक्त वचन को सुनो — तुम्हीं रत्नगर्भा हो, जिसके हम तीनों पुत्र हैं।

श्लोक 39 (padma.5.6.39)

कोऽसौ कीटः स धनदः क्व तपः स्वल्पकं पुनः । कालं का किंतु तद्राज्यं स्वल्पसेवकसंयुतम्

ko'sau kīṭaḥ sa dhanadaḥ kva tapaḥ svalpakaṁ punaḥ kālaṁ kā kiṁtu tadrājyaṁ svalpasevakasaṁyutam

वह कीड़ा कौन, वह धनद कौन? कहाँ उसका तुच्छ तप, कितने अल्प काल का? और उसका राज्य भी क्या, जो थोड़े से सेवकों वाला है?

श्लोक 40 (padma.5.6.40)

मातः शृणु ममोत्साहात्प्रतिज्ञां करुणान्विते । न केनापि कृतां कर्त्रा महाभाग्ये हि कैकसि

mātaḥ śṛṇu mamotsāhātpratijñāṁ karuṇānvite na kenāpi kṛtāṁ kartrā mahābhāgye hi kaikasi

हे करुणामयी माता कैकसी! मेरे उत्साह से भरी इस प्रतिज्ञा को सुनो — जिसे किसी अन्य ने कभी नहीं किया, हे महाभाग्यशालिनी!

श्लोक 41 (padma.5.6.41)

यद्यहं भुवनं सर्वं वशेन स्थापयामि वै । तपोभिर्दुष्कृतैः कृत्वा ब्रह्मसंतोषकारकैः

yadyahaṁ bhuvanaṁ sarvaṁ vaśena sthāpayāmi vai tapobhirduṣkṛtaiḥ kṛtvā brahmasaṁtoṣakārakaiḥ

यदि मैं ब्रह्मा को संतुष्ट करने वाले कठोर तपों से समस्त भुवन को अपने वश में स्थापित न कर लूँ —

श्लोक 42 (padma.5.6.42)

अन्नोदके सदा त्यक्त्वा निद्रां क्रीडां तथा पुनः । चेत्तदा पितृलोकस्य घातात्पापं भवेन्मम

annodake sadā tyaktvā nidrāṁ krīḍāṁ tathā punaḥ cettadā pitṛlokasya ghātātpāpaṁ bhavenmama

अन्न-जल, निद्रा तथा क्रीड़ा को सदा के लिए त्यागकर — तो मुझे अपने पितरों की हत्या का पाप लगे।"

श्लोक 43 (padma.5.6.43)

कुंभकर्णोऽपि कृतवान्विभीषणसमन्वितः । रावणेन सहभ्रात्रेत्युक्त्वागाद्गिरिकाननम्

kuṁbhakarṇo'pi kṛtavānvibhīṣaṇasamanvitaḥ rāvaṇena sahabhrātretyuktvāgādgirikānanam

"हम भाई रावण के साथ ही यह करेंगे" — यह कहकर कुम्भकर्ण ने भी विभीषण सहित पर्वत के वन की ओर प्रस्थान किया।

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