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पाताल खण्ड · अध्याय 61

हनुमान का पतन

अध्याय 60अध्याय-सूचीअध्याय 62

श्लोक 1 (padma.5.61.1)

शत्रुघ्न उवाच। जानासि किं महामंत्रिन्को बालो हयमाहरत् । येन मे क्षपितं सर्वं बलं वारिधिसन्निभम्

śatrughna uvāca jānāsi kiṁ mahāmaṁtrinko bālo hayamāharat yena me kṣapitaṁ sarvaṁ balaṁ vāridhisannibham

शत्रुघ्न ने कहा — हे महामंत्रिन्! क्या तुम जानते हो कि वह कौन बालक है जिसने अश्व हर लिया, जिसके द्वारा समुद्र के समान मेरी संपूर्ण सेना नष्ट कर दी गई है?

श्लोक 2 (padma.5.61.2)

सुमतिरुवाच। स्वामिन्नयं मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकेराश्रमो महान् । क्षत्त्रियाणामत्र वासो नास्त्येव परतापन

sumatiruvāca svāminnayaṁ muniśreṣṭha vālmīkerāśramo mahān kṣattriyāṇāmatra vāso nāstyeva paratāpana

सुमति ने कहा — स्वामिन्! यह मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि का महान् आश्रम है; हे शत्रुतापन! यहाँ क्षत्रियों का निवास हो ही नहीं सकता।

श्लोक 3 (padma.5.61.3)

इंद्रो भविष्यति परममर्षी हयमाहरत् । पुरारिर्वान्यथा वाहं तव कः समुपाहरेत्

iṁdro bhaviṣyati paramamarṣī hayamāharat purārirvānyathā vāhaṁ tava kaḥ samupāharet

यह अवश्य ही परम क्रोधी इंद्र होंगे जिन्होंने अश्व हर लिया; अथवा पुरारि (शिव) — अन्यथा तुम्हारे अश्व को इस प्रकार कौन हर सकता है?

श्लोक 4 (padma.5.61.4)

कालजिद्येन नाशं वै प्राप्तः परमदारुणः । तं प्रति श्रीमहाराज गंता कः पुष्कलान्यतः

kālajidyena nāśaṁ vai prāptaḥ paramadāruṇaḥ taṁ prati śrīmahārāja gaṁtā kaḥ puṣkalānyataḥ

जिसके द्वारा वह अत्यंत भयंकर कालजित् मृत्यु को प्राप्त हुआ — हे श्रीमहाराज! उसके विरुद्ध श्रेष्ठों में से कोई भी अन्यत्र जाने वाला कौन है?

श्लोक 5 (padma.5.61.5)

त्वं च वीरैर्भटैः सर्वैराजभिः परिवारितः । तत्र गच्छस्व सैन्येन महता शत्रुकृंतन

tvaṁ ca vīrairbhaṭaiḥ sarvairājabhiḥ parivāritaḥ tatra gacchasva sainyena mahatā śatrukṛṁtana

तुम स्वयं, समस्त वीरों, योद्धाओं तथा राजाओं से घिरे हुए, हे शत्रुकृंतन! वहाँ महासेना के साथ जाओ।

श्लोक 6 (padma.5.61.6)

गत्वा स जीवितं वीरं बद्ध्वा तु कुतुकार्थिने । दर्शयिष्यामि रामाय मतं मे त्विदमादृतम्

gatvā sa jīvitaṁ vīraṁ baddhvā tu kutukārthine darśayiṣyāmi rāmāya mataṁ me tvidamādṛtam

वहाँ जाकर उस वीर को जीवित बाँधो, कौतूहलवश, और उसे राम को दिखाओ — यह मेरा सम्मानित मत है।

श्लोक 7 (padma.5.61.7)

इति वाक्यं समाकर्ण्य वीरान्सर्वान्समादिशत् । सैन्येन महता यात यूयमायामि पृष्ठतः

iti vākyaṁ samākarṇya vīrānsarvānsamādiśat sainyena mahatā yāta yūyamāyāmi pṛṣṭhataḥ

यह वचन सुनकर उन्होंने समस्त वीरों को आज्ञा दी — महासेना के साथ जाओ; मैं तुम्हारे पीछे आता हूँ।

श्लोक 8 (padma.5.61.8)

निर्दिष्टास्ते क्षणाद्वीरा जग्मुर्यत्र लवो बली । धनुर्विस्फारयंस्तत्र सुदृढं गुणपूरितम्

nirdiṣṭāste kṣaṇādvīrā jagmuryatra lavo balī dhanurvisphārayaṁstatra sudṛḍhaṁ guṇapūritam

इस प्रकार निर्देशित होकर वे वीर तुरंत वहाँ गए जहाँ बलवान् लव थे, अपने सुदृढ़, प्रत्यंचायुक्त धनुष को खींचते हुए।

श्लोक 9 (padma.5.61.9)

आयातं तन्महद्दृष्ट्वा बलं वीरप्रपूरितम् । न किंचिन्मनसा बिभ्येलवेन बलशालिना

āyātaṁ tanmahaddṛṣṭvā balaṁ vīraprapūritam na kiṁcinmanasā bibhyelavena balaśālinā

उस वीरों से भरी विशाल सेना को आते देखकर बलशाली लव अपने मन में तनिक भी भयभीत न हुए।

श्लोक 10 (padma.5.61.10)

लवः सिंह इवोत्तस्थौ मृगान्मत्वाऽखिलान्भटान् । धनुर्विस्फारयन्रोषाच्छरान्मुंचन्सहस्रशः

lavaḥ siṁha ivottasthau mṛgānmatvā'khilānbhaṭān dhanurvisphārayanroṣāccharānmuṁcansahasraśaḥ

लव सिंह के समान उठ खड़े हुए, सभी योद्धाओं को मृग मानते हुए, क्रोधवश धनुष खींचकर सहस्रों बाण छोड़ने लगे।

श्लोक 11 (padma.5.61.11)

ते शरैः पीड्यमानास्तु महारोषेण पूरिताः । वीरं बालं मन्यमानाः संमुखं प्राद्रवंस्तदा

te śaraiḥ pīḍyamānāstu mahāroṣeṇa pūritāḥ vīraṁ bālaṁ manyamānāḥ saṁmukhaṁ prādravaṁstadā

उन बाणों से पीड़ित होकर, महाक्रोध से भरकर, उसे एक साधारण बालक-वीर मानते हुए, वे तब उनके सम्मुख दौड़ पड़े।

श्लोक 12 (padma.5.61.12)

वीरान्सहस्रशो दृष्ट्वा भ्रमिभिः पर्यवस्थितान् । लवो जवेन संधाय शरान्रोषप्रपूरितः

vīrānsahasraśo dṛṣṭvā bhramibhiḥ paryavasthitān lavo javena saṁdhāya śarānroṣaprapūritaḥ

हजारों वीरों को घूमती हुई व्यूह-रचनाओं में स्थित देखकर, क्रोध से भरे लव ने शीघ्रता से अपने बाण चढ़ाए —

श्लोक 13 (padma.5.61.13)

भ्रमिराद्या सहस्रेण द्वितीयायुतसंख्यया । तृतीयायुतयुग्मेन तुरीयायुतपंचभिः

bhramirādyā sahasreṇa dvitīyāyutasaṁkhyayā tṛtīyāyutayugmena turīyāyutapaṁcabhiḥ

— पहला घेरा एक सहस्र का, दूसरा दस सहस्र का, तीसरा बीस सहस्र का, चौथा पचास सहस्र का —

श्लोक 14 (padma.5.61.14)

पंचमी लक्षयोधानां षष्ठी योधायुताधिकैः । सप्तमी लक्षयुग्मेन सप्तभिर्भ्रमिभिर्वृतः

paṁcamī lakṣayodhānāṁ ṣaṣṭhī yodhāyutādhikaiḥ saptamī lakṣayugmena saptabhirbhramibhirvṛtaḥ

— पाँचवाँ एक लाख योद्धाओं का, छठा दस लाख से अधिक का, सातवाँ दो लाख का — इन सातों घेरों से घिरे होकर —

श्लोक 15 (padma.5.61.15)

मध्ये लवो भ्रमिव्याप्तः स चरन्वह्निवत्तदा । दाहयामास सर्वान्वै सैनिकान्भ्रमिकारकान्

madhye lavo bhramivyāptaḥ sa caranvahnivattadā dāhayāmāsa sarvānvai sainikānbhramikārakān

— लव उनके मध्य, उन व्यूहों से घिरे हुए, तब अग्नि के समान विचरण करते हुए, उन व्यूह-रचने वाले समस्त सैनिकों को भस्म करने लगे।

श्लोक 16 (padma.5.61.16)

काचित्खङ्गैः शरैः काचित्काचित्प्रासैश्च कुंतलैः । पट्टिशैः परिघैः सर्वा भ्रमिर्भग्ना महात्मना

kācitkhaṅgaiḥ śaraiḥ kācitkācitprāsaiśca kuṁtalaiḥ paṭṭiśaiḥ parighaiḥ sarvā bhramirbhagnā mahātmanā

किसी घेरे को उन्होंने खड्गों से, किसी को बाणों से, किसी को भालों और बरछों से, सभी को पट्टिश और परिघों से — उस महात्मा ने सभी व्यूह तोड़ डाले।

श्लोक 17 (padma.5.61.17)

सप्तभिर्भ्रमिभिर्मुक्तो रराज स कुशानुजः । मेघवृंदविनिर्मुक्तः शशीव शरदागमे

saptabhirbhramibhirmukto rarāja sa kuśānujaḥ meghavṛṁdavinirmuktaḥ śaśīva śaradāgame

सातों व्यूहों से मुक्त होकर कुश के अनुज इस प्रकार शोभायमान हुए, जैसे शरद्ऋतु के आगमन पर मेघसमूह से मुक्त चंद्रमा।

श्लोक 18 (padma.5.61.18)

प्राहरत्सर्वथा योधान्भिंदन्गजकरान्बहून् । छिंदञ्छिरांसि वीराणां चक्रभ्रूणि महांति च

prāharatsarvathā yodhānbhiṁdangajakarānbahūn chiṁdañchirāṁsi vīrāṇāṁ cakrabhrūṇi mahāṁti ca

सर्वप्रकार से योद्धाओं पर प्रहार करते हुए, अनेक हाथियों की सूँड़ों को बींधते हुए, वीरों के सिरों तथा रथ-चक्रों की महान् नाभियों को काटते हुए —

श्लोक 19 (padma.5.61.19)

अनेके पतिता वीरा लवबाणप्रपीडिताः । मुमुहुः समरेऽथान्ये नष्टा अन्ये सुकातराः

aneke patitā vīrā lavabāṇaprapīḍitāḥ mumuhuḥ samare'thānye naṣṭā anye sukātarāḥ

— अनेक वीर लव के बाणों से पीड़ित होकर गिर पड़े; कुछ युद्ध में मूर्च्छित हो गए, कुछ भाग गए, कुछ अत्यंत भयभीत हो उठे।

श्लोक 20 (padma.5.61.20)

पलायनपरं सैन्यं लवबाणप्रपीडितम् । वीक्ष्य वीरो रणे योद्धुं प्रायात्पुष्कलसंज्ञकः

palāyanaparaṁ sainyaṁ lavabāṇaprapīḍitam vīkṣya vīro raṇe yoddhuṁ prāyātpuṣkalasaṁjñakaḥ

सेना को भागते और लव के बाणों से पीड़ित देखकर पुष्कल नामक वीर उस युद्ध में लड़ने के लिए आगे बढ़े।

श्लोक 21 (padma.5.61.21)

तिष्ठतिष्ठेति च वदन्रोषपूरितलोचनः । रथे सुहयशोभाढ्ये तिष्ठन्प्रायाल्लवं बली

tiṣṭhatiṣṭheti ca vadanroṣapūritalocanaḥ rathe suhayaśobhāḍhye tiṣṭhanprāyāllavaṁ balī

ठहरो, ठहरो! कहते हुए, क्रोध से भरे नेत्रों वाले, उत्तम अश्वों से सुशोभित रथ पर खड़े वह बलवान् लव की ओर बढ़े।

श्लोक 22 (padma.5.61.22)

स लवं प्रत्युवाचाथ पुष्कलः परमास्त्रवित् । तिष्ठ दत्ते मया संख्ये रथे सुहयशोभिते

sa lavaṁ pratyuvācātha puṣkalaḥ paramāstravit tiṣṭha datte mayā saṁkhye rathe suhayaśobhite

तब परमास्त्रवेत्ता पुष्कल ने लव से कहा — ठहरो — मैं तुम्हें उत्तम अश्वों से सुशोभित इस रथ पर द्वंद्वयुद्ध का स्थान देता हूँ।

श्लोक 23 (padma.5.61.23)

पदातिना त्वया युद्धं करोमि किमथाहवे । तस्मात्तिष्ठ रथे पश्चाद्युद्ध्येऽहं भवता सह । एतद्वाक्यं निशम्यासौ लवः पुष्कलमब्रवीत्

padātinā tvayā yuddhaṁ karomi kimathāhave tasmāttiṣṭha rathe paścādyuddhye'haṁ bhavatā saha etadvākyaṁ niśamyāsau lavaḥ puṣkalamabravīt

पैदल तुमसे युद्ध में लड़ने से क्या लाभ? इसलिए इस रथ पर खड़े हो जाओ; उसके पश्चात् मैं तुमसे युद्ध करूँगा। यह वचन सुनकर लव ने पुष्कल से कहा —

श्लोक 24 (padma.5.61.24)

त्वया दत्ते रथे स्थित्वा युद्धं कुर्यामहं रणे । तदा मे पापमेव स्याज्जयः संदिग्ध एव हि

tvayā datte rathe sthitvā yuddhaṁ kuryāmahaṁ raṇe tadā me pāpameva syājjayaḥ saṁdigdha eva hi

तुम्हारे द्वारा दिए गए रथ पर खड़े होकर यदि मैं इस युद्ध में लड़ूँ, तो वह मेरे लिए पाप ही होगा — मेरी विजय संदिग्ध ही रहेगी।

श्लोक 25 (padma.5.61.25)

न वयं ब्राह्मणा वीर प्रतिग्रहपरायणाः । वयं तु क्षत्रिया नित्यं दानकर्मक्रियारताः

na vayaṁ brāhmaṇā vīra pratigrahaparāyaṇāḥ vayaṁ tu kṣatriyā nityaṁ dānakarmakriyāratāḥ

हे वीर! हम ब्राह्मण नहीं हैं, जो दान ग्रहण करने में तत्पर हों; हम तो सदा दान-कर्म में रत क्षत्रिय हैं।

श्लोक 26 (padma.5.61.26)

इदानीं त्वद्रथं कोपाद्भनज्मि प्रत्यहं भवान् । पादचारी भवत्येव पश्चाद्युद्धं करिष्यति

idānīṁ tvadrathaṁ kopādbhanajmi pratyahaṁ bhavān pādacārī bhavatyeva paścādyuddhaṁ kariṣyati

अब मैं क्रोधवश तुम्हारे रथ को प्रतिदिन तोड़ दूँगा; तुम स्वयं पैदल हो जाओगे, तब हम पश्चात् युद्ध करेंगे।

श्लोक 27 (padma.5.61.27)

पुष्कलो वाक्यमाकर्ण्य धर्मधैर्यसमन्वितम् । विसिस्माय चिरं चित्ते धनुः सज्यमथाकरोत्

puṣkalo vākyamākarṇya dharmadhairyasamanvitam visismāya ciraṁ citte dhanuḥ sajyamathākarot

धर्म-धैर्य से युक्त यह वचन सुनकर पुष्कल हृदय में दीर्घकाल तक विस्मित रहे; उन्होंने तब अपना धनुष प्रत्यंचाबद्ध किया।

श्लोक 28 (padma.5.61.28)

तमात्तधनुषं दृष्ट्वा लवः कोपसमन्वितः । चापं चिच्छेद पाणिस्थं शरसंधानमाचरन्

tamāttadhanuṣaṁ dṛṣṭvā lavaḥ kopasamanvitaḥ cāpaṁ ciccheda pāṇisthaṁ śarasaṁdhānamācaran

उन्हें धनुष हाथ में लिए देखकर, क्रोध से भरे लव ने बाण चढ़ाने से पहले ही उनके हाथ में स्थित धनुष को काट डाला।

श्लोक 29 (padma.5.61.29)

स यावत्स गुणं चापं कुरुते तावदुद्धतः । रथभंगं चकारास्य समरे प्रहसन्बली

sa yāvatsa guṇaṁ cāpaṁ kurute tāvaduddhataḥ rathabhaṁgaṁ cakārāsya samare prahasanbalī

जब तक वह अपने धनुष को प्रत्यंचाबद्ध कर रहे थे, तब तक उद्धत, बलवान् लव ने युद्ध में हँसते हुए उनके रथ को तोड़ डाला।

श्लोक 30 (padma.5.61.30)

भग्नं रथं स्वकं वीक्ष्य धनुश्छिन्नं महात्मना । महावीरं मन्यमानः पदातिः प्राद्रवद्रणे

bhagnaṁ rathaṁ svakaṁ vīkṣya dhanuśchinnaṁ mahātmanā mahāvīraṁ manyamānaḥ padātiḥ prādravadraṇe

अपने रथ को टूटा हुआ तथा धनुष को उस महात्मा द्वारा कटा हुआ देखकर, उसे महावीर मानते हुए वे पैदल ही युद्ध में दौड़ पड़े।

श्लोक 31 (padma.5.61.31)

उभौ धनुर्धरौ वीरावुभावपि शरोद्धतौ । उभौ क्षतजविप्लुष्टौ छिन्नसन्नाहितावुभौ

ubhau dhanurdharau vīrāvubhāvapi śaroddhatau ubhau kṣatajavipluṣṭau chinnasannāhitāvubhau

दोनों धनुर्धारी वीर, दोनों बाणों से उद्धत, दोनों रक्त से लथपथ, दोनों के कवच कटे हुए —

श्लोक 32 (padma.5.61.32)

परस्परं बाणघातविशीर्णावपुलक्षितौ । जयाकांक्षां प्रकुर्वंतौ परस्परवधैषिणौ

parasparaṁ bāṇaghātaviśīrṇāvapulakṣitau jayākāṁkṣāṁ prakurvaṁtau parasparavadhaiṣiṇau

— दोनों के शरीर परस्पर बाण-प्रहारों से चिह्नित, दोनों विजय की कामना करते हुए, दोनों परस्पर वध की इच्छा रखते हुए —

श्लोक 33 (padma.5.61.33)

जयंतकार्तिकेयौ वा पुरारिः पुरभिद्यथा । एवं परस्परं युद्धं प्रकुर्वाणौ रणांगणे

jayaṁtakārtikeyau vā purāriḥ purabhidyathā evaṁ parasparaṁ yuddhaṁ prakurvāṇau raṇāṁgaṇe

— मानो जयंत और कार्तिकेय हों, अथवा पुरारि और त्रिपुरभेदक हों। इस प्रकार उस रणभूमि में परस्पर युद्ध करते हुए —

श्लोक 34 (padma.5.61.34)

पुष्कलः प्रत्युवाचाथ बालं शूरशिरोमणे । त्वादृशो न मया दृष्टः कश्चिद्वीरशिरोमणिः

puṣkalaḥ pratyuvācātha bālaṁ śūraśiromaṇe tvādṛśo na mayā dṛṣṭaḥ kaścidvīraśiromaṇiḥ

पुष्कल ने तब उस बालक से कहा — हे वीरशिरोमणे! मैंने तुम्हारे जैसा वीरशिरोमणि कभी नहीं देखा।

श्लोक 35 (padma.5.61.35)

शिरस्ते पातयाम्यद्य बाणैः शितसुपर्वभिः । मा पलायस्व समरे प्राणान्रक्षस्व संयतः

śiraste pātayāmyadya bāṇaiḥ śitasuparvabhiḥ mā palāyasva samare prāṇānrakṣasva saṁyataḥ

अब मैं तीक्ष्ण, सुसंधित बाणों से तुम्हारा सिर गिरा दूँगा; युद्ध से मत भागो — सावधान होकर अपने प्राणों की रक्षा करो।

श्लोक 36 (padma.5.61.36)

एवमुक्त्वा लवं वीरं चकार शरपंजरे । पुष्कलस्य शरा भूमौ नभसि व्याप्य संस्थिताः

evamuktvā lavaṁ vīraṁ cakāra śarapaṁjare puṣkalasya śarā bhūmau nabhasi vyāpya saṁsthitāḥ

यह कहकर उन्होंने वीर लव को बाणों के पिंजरे में बाँध दिया; पुष्कल के बाण आकाश और भूमि को व्याप्त करते हुए फैल गए।

श्लोक 37 (padma.5.61.37)

शरपंजरमध्यस्थो लवः पुष्कलमब्रवीत् । महत्कर्म कृतं वीर यन्मां बाणैरपीडयत्

śarapaṁjaramadhyastho lavaḥ puṣkalamabravīt mahatkarma kṛtaṁ vīra yanmāṁ bāṇairapīḍayat

उस बाण-पिंजर के मध्य खड़े होकर लव ने पुष्कल से कहा — हे वीर! तुमने बड़ा भारी कार्य किया, जो मुझे अपने बाणों से पीड़ित किया।

श्लोक 38 (padma.5.61.38)

इत्युक्त्वा बाणसंघातं प्रच्छिद्य वचनं पुनः । जगाद पुष्कलं वीरः शरसंधानकोविदः

ityuktvā bāṇasaṁghātaṁ pracchidya vacanaṁ punaḥ jagāda puṣkalaṁ vīraḥ śarasaṁdhānakovidaḥ

यह कहकर, उस बाण-समूह को छिन्न-भिन्न करके, बाण-संधान में कुशल उस वीर ने पुष्कल से पुनः कहा —

श्लोक 39 (padma.5.61.39)

पालयात्मानमाजिस्थं मच्छराघातपीडितः । पतिष्यसि महीपृष्ठे रुधिरेण परिप्लुतः

pālayātmānamājisthaṁ maccharāghātapīḍitaḥ patiṣyasi mahīpṛṣṭhe rudhireṇa pariplutaḥ

युद्ध में खड़े होकर, मेरे बाणों के आघात से पीड़ित होकर अपनी रक्षा करो; तुम रक्त से लथपथ होकर पृथ्वीतल पर गिरोगे।

श्लोक 40 (padma.5.61.40)

एवमुक्तं समाकर्ण्य पुष्कलः कोपसंयुतः । रणे संयोधयामास लवं वीरं महाबलम्

evamuktaṁ samākarṇya puṣkalaḥ kopasaṁyutaḥ raṇe saṁyodhayāmāsa lavaṁ vīraṁ mahābalam

यह कहा गया सुनकर पुष्कल क्रोध से युक्त होकर उस बलवान् वीर लव से युद्ध करने लगे।

श्लोक 41 (padma.5.61.41)

लवः प्रकुपितो बाणं तीक्ष्णं वैरिविदारणम् । जग्राह लवतः कोशादाशीविषमिव क्रुधा

lavaḥ prakupito bāṇaṁ tīkṣṇaṁ vairividāraṇam jagrāha lavataḥ kośādāśīviṣamiva krudhā

क्रुद्ध लव ने अपने ही तूणीर से, शत्रु को विदीर्ण करने वाला तीक्ष्ण बाण, क्रोधवश विषैले सर्प के समान उठाया।

श्लोक 42 (padma.5.61.42)

जाज्वल्यमानः सशरश्चापमुक्तो लवस्य च । हृदयं भेत्तुमुद्युक्तश्छिन्नो भारतिनाशु सः

jājvalyamānaḥ saśaraścāpamukto lavasya ca hṛdayaṁ bhettumudyuktaśchinno bhāratināśu saḥ

प्रज्वलित, बाण से युक्त, लव के धनुष से छूटा हुआ, उसके हृदय को बींधने के लिए उद्यत वह बाण भारति द्वारा तुरंत काट दिया गया।

श्लोक 43 (padma.5.61.43)

छिन्ने भारतिना संख्ये शरेण प्राणहारिणा । अत्यंतं कुपितो घोरं शरमन्यं समाददे

chinne bhāratinā saṁkhye śareṇa prāṇahāriṇā atyaṁtaṁ kupito ghoraṁ śaramanyaṁ samādade

प्राणहारी वह बाण भारति द्वारा युद्ध में काट दिए जाने पर, अत्यंत क्रुद्ध होकर उसने एक और भयंकर बाण उठाया।

श्लोक 44 (padma.5.61.44)

आकर्णाकृष्टचापेन स मुक्तो निशितः शरः । बिभेद हृदयं तस्य पुष्कलस्य महारणे

ākarṇākṛṣṭacāpena sa mukto niśitaḥ śaraḥ bibheda hṛdayaṁ tasya puṣkalasya mahāraṇe

कान तक खींचे गए धनुष से छूटा हुआ वह तीक्ष्ण बाण उस महायुद्ध में पुष्कल के हृदय को बींध गया।

श्लोक 45 (padma.5.61.45)

भिन्नो वक्षसि वीरेण सायकेनाशुगामिना । पपात धरणीपृष्ठे महाशूरशिरोमणिः

bhinno vakṣasi vīreṇa sāyakenāśugāminā papāta dharaṇīpṛṣṭhe mahāśūraśiromaṇiḥ

उस वीर के तीव्रगामी बाण से वक्षस्थल में बिंधकर वह महाशूरशिरोमणि पृथ्वीतल पर गिर पड़ा।

श्लोक 46 (padma.5.61.46)

पतितं तं समालोक्य पुष्कलं पवनात्मजः । गृहीत्वा राघवभ्रात्रे ददौ मूर्च्छासमन्वितम्

patitaṁ taṁ samālokya puṣkalaṁ pavanātmajaḥ gṛhītvā rāghavabhrātre dadau mūrcchāsamanvitam

उसे गिरा हुआ देखकर पवनपुत्र ने पुष्कल को उठाकर, मूर्च्छित अवस्था में, राघव के भाई को दे दिया।

श्लोक 47 (padma.5.61.47)

मूर्च्छितं तं समालोक्य शोकविह्वलमानसः । हनूमंतं लवं हंतुं निदिदेश क्रुधान्वितः

mūrcchitaṁ taṁ samālokya śokavihvalamānasaḥ hanūmaṁtaṁ lavaṁ haṁtuṁ nidideśa krudhānvitaḥ

उसे इस प्रकार मूर्च्छित देखकर, शोक से अभिभूत मन वाले उन्होंने क्रोध से युक्त होकर हनुमान को लव के वध की आज्ञा दी।

श्लोक 48 (padma.5.61.48)

हनूमान्क्रोधसंप्लुष्टो लवं संख्ये महाबलम् । विजेतुं तरसा प्रागाद्वृक्षमुद्यम्य शाल्मलिम्

hanūmānkrodhasaṁpluṣṭo lavaṁ saṁkhye mahābalam vijetuṁ tarasā prāgādvṛkṣamudyamya śālmalim

क्रोध से प्रज्वलित हनुमान शीघ्रता से महावीर लव को जीतने के लिए एक शाल्मलि वृक्ष उखाड़कर आगे बढ़े।

श्लोक 49 (padma.5.61.49)

वृक्षेण हतवान्मूर्ध्नि लवस्य हनुमान्बली । तमापतंतं तरसा चिच्छेद शतधा लवः

vṛkṣeṇa hatavānmūrdhni lavasya hanumānbalī tamāpataṁtaṁ tarasā ciccheda śatadhā lavaḥ

बलवान् हनुमान ने उस वृक्ष से लव के सिर पर प्रहार किया; उस आते हुए वृक्ष को लव ने शीघ्रता से सौ टुकड़ों में काट डाला।

श्लोक 50 (padma.5.61.50)

छिन्ने नगे पुनः कोपाद्वृक्षानुत्पाट्य मूलतः । ताडयामास हृदये मस्तके च महाबलः

chinne nage punaḥ kopādvṛkṣānutpāṭya mūlataḥ tāḍayāmāsa hṛdaye mastake ca mahābalaḥ

उस वृक्ष के कट जाने पर पुनः क्रोधवश उन्होंने जड़ से वृक्षों को उखाड़कर उस बलवान् के हृदय और सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 51 (padma.5.61.51)

यान्यान्वृक्षान्समाहृत्याताडयत्पवनात्मजः । तांस्तांश्चिच्छेद तरसा बलवान्नतपर्वभिः

yānyānvṛkṣānsamāhṛtyātāḍayatpavanātmajaḥ tāṁstāṁściccheda tarasā balavānnataparvabhiḥ

पवनसुत जिन-जिन वृक्षों को लाकर प्रहार करते, उन-उन सभी को वह बलवान् अपने सुसंधित बाणों से शीघ्रता से काट डालता।

श्लोक 52 (padma.5.61.52)

तदा शिलाः समुत्पाट्य गंडशैलोपमाः कपिः । पातयामास शिरसि क्षिप्रवेगेन मारुतिः

tadā śilāḥ samutpāṭya gaṁḍaśailopamāḥ kapiḥ pātayāmāsa śirasi kṣipravegena mārutiḥ

तब बड़ी-बड़ी शिलाएँ, गंडशैलों के समान, उखाड़कर वानर मारुति ने उन्हें शीघ्र वेग से उसके सिर पर गिराया।

श्लोक 53 (padma.5.61.53)

स आहतः शिलासंघैः संख्ये कोदंडमुन्नयन् । बाणैस्ताश्चूर्णयामास यंत्रिकाभिर्यथा कणाः

sa āhataḥ śilāsaṁghaiḥ saṁkhye kodaṁḍamunnayan bāṇaistāścūrṇayāmāsa yaṁtrikābhiryathā kaṇāḥ

उन शिलाओं के समूहों से आहत होकर, युद्ध में अपना धनुष उठाते हुए, उसने उन्हें अपने बाणों से यंत्र द्वारा अन्न के समान चूर्ण कर डाला।

श्लोक 54 (padma.5.61.54)

तदात्यंतं प्रकुपितो मारुतिः पुच्छवेष्टनम् । चकार समरोपांते लवस्य बलिनः कृती

tadātyaṁtaṁ prakupito mārutiḥ pucchaveṣṭanam cakāra samaropāṁte lavasya balinaḥ kṛtī

तब अत्यंत क्रुद्ध होकर चतुर हनुमान ने युद्ध के छोर पर बलवान् लव को अपनी पूँछ से लपेट लिया।

श्लोक 55 (padma.5.61.55)

स्वं पुच्छेन समाविद्धं वीक्ष्य स्वांबां हृदि स्मरन् । मुष्टिना ताडयामास लांगूलं मारुतेर्बली

svaṁ pucchena samāviddhaṁ vīkṣya svāṁbāṁ hṛdi smaran muṣṭinā tāḍayāmāsa lāṁgūlaṁ māruterbalī

स्वयं को उस पूँछ से इस प्रकार लिपटा देखकर, हृदय में अपनी माता का स्मरण करते हुए, उस बलवान् ने मारुति की पूँछ पर मुष्टि से प्रहार किया।

श्लोक 56 (padma.5.61.56)

तन्मुष्टिघातव्यथितो मारुतिस्तममूमुचत् । स मुक्तः पुच्छतो युद्धे शरान्मुंचन्नभूद्बली

tanmuṣṭighātavyathito mārutistamamūmucat sa muktaḥ pucchato yuddhe śarānmuṁcannabhūdbalī

उस मुष्टि-प्रहार से पीड़ित होकर मारुति ने उसे छोड़ दिया; उस पूँछ से मुक्त होकर वह युद्ध में बाण छोड़ते हुए पुनः बलवान् हो उठा।

श्लोक 57 (padma.5.61.57)

दुर्वारशरघातेन संपीडिततनुः कपिः । बाणवर्षं मन्यमानो दुःसहं समरे बहु

durvāraśaraghātena saṁpīḍitatanuḥ kapiḥ bāṇavarṣaṁ manyamāno duḥsahaṁ samare bahu

अवरोधरहित बाणों के आघात से पीड़ित शरीर वाले उस वानर ने, उस महायुद्ध में उस बाणवृष्टि को असह्य मानते हुए —

श्लोक 58 (padma.5.61.58)

किंकर्तव्यमितोऽस्माभिः पलाय्य यदि गम्यते । तदा मे स्वामिनो लज्जा ताडयेद्बालकोऽत्र माम्

kiṁkartavyamito'smābhiḥ palāyya yadi gamyate tadā me svāmino lajjā tāḍayedbālako'tra mām

— यह सोचा — अब हमें क्या करना चाहिए? यदि हम भाग जाएँ, तो यह बालक यहाँ मेरे स्वामी को अपमानित करेगा।

श्लोक 59 (padma.5.61.59)

ब्रह्मदत्तवरत्वात्तु मूर्च्छा न मरणं नहि । दुःसहा बाणपीडात्र किं कर्तव्यं मयाधुना

brahmadattavaratvāttu mūrcchā na maraṇaṁ nahi duḥsahā bāṇapīḍātra kiṁ kartavyaṁ mayādhunā

फिर भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वर के कारण मुझे केवल मूर्च्छा ही हो सकती है, मृत्यु नहीं; इन बाणों की पीड़ा असह्य है — अब मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 60 (padma.5.61.60)

शत्रुघ्नः समरे गत्वा जयं प्राप्नोतु बालकात् । अहं तावज्जयाकांक्षी शये कपटमूर्च्छया

śatrughnaḥ samare gatvā jayaṁ prāpnotu bālakāt ahaṁ tāvajjayākāṁkṣī śaye kapaṭamūrcchayā

शत्रुघ्न युद्ध में जाकर इस बालक पर विजय प्राप्त करें; मैं उनकी विजय की कामना करते हुए अभी कपट-मूर्च्छा से लेट जाता हूँ।

श्लोक 61 (padma.5.61.61)

इत्येवं मानसे कृत्वा पपात रणमंडले । पश्यतां सर्ववीराणां कपटेन विमूर्च्छितः

ityevaṁ mānase kṛtvā papāta raṇamaṁḍale paśyatāṁ sarvavīrāṇāṁ kapaṭena vimūrcchitaḥ

मन में ऐसा निश्चय करके, वह छल से मूर्च्छित होकर, समस्त वीरों के देखते हुए रणभूमि में गिर पड़ा।

श्लोक 62 (padma.5.61.62)

तं मूर्च्छितं समाज्ञाय हनूमंतं महाबलम् । जघान सर्वान्नृपतीञ्छरमोक्षविचक्षणः

taṁ mūrcchitaṁ samājñāya hanūmaṁtaṁ mahābalam jaghāna sarvānnṛpatīñcharamokṣavicakṣaṇaḥ

उसे इस प्रकार मूर्च्छित जानकर, बाण-मोक्ष में निपुण बलवान् लव ने समस्त राजाओं का वध कर दिया।

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