Skip to main content

पाताल खण्ड · अध्याय 62

लव की मूर्च्छा

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (padma.5.62.1)

शेष उवाच। मूर्च्छितं मारुतिं श्रुत्वा शत्रुघ्नः शोकमाययौ । किंकर्तव्यं मया संख्ये बालकोऽयं महाबलः

śeṣa uvāca mūrcchitaṁ mārutiṁ śrutvā śatrughnaḥ śokamāyayau kiṁkartavyaṁ mayā saṁkhye bālako'yaṁ mahābalaḥ

शेष जी ने कहा — मारुति को मूर्च्छित सुनकर शत्रुघ्न शोक को प्राप्त हुए — इस अत्यंत बलवान् बालक के विरुद्ध युद्ध में मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 2 (padma.5.62.2)

स्वयं रथे हेममये तिष्ठन्वीरवरैः सह । योद्धुं प्रागाल्लवो यत्र विचित्ररणकोविदः

svayaṁ rathe hemamaye tiṣṭhanvīravaraiḥ saha yoddhuṁ prāgāllavo yatra vicitraraṇakovidaḥ

स्वयं स्वर्णरथ पर सवार होकर, अपने श्रेष्ठ वीरों सहित, वे वहाँ युद्ध करने के लिए बढ़े जहाँ विचित्र युद्ध में कुशल लव थे।

श्लोक 3 (padma.5.62.3)

लवं ददर्श शिशुतां प्राप्तं राममिव क्षितौ । धनुर्बाणकरं वीरान्क्षिपंतं रणमूर्धनि

lavaṁ dadarśa śiśutāṁ prāptaṁ rāmamiva kṣitau dhanurbāṇakaraṁ vīrānkṣipaṁtaṁ raṇamūrdhani

उन्होंने लव को देखा, अभी बालक ही, पृथ्वी पर राम के समान, धनुष-बाण हाथ में लिए, युद्ध के अग्रभाग में वीरों को गिराते हुए।

श्लोक 4 (padma.5.62.4)

विचारयामास तदा कोऽयं रामस्वरूपधृक् । नीलोत्पलदलश्यामं वपुर्बिभ्रन्मनोहरम्

vicārayāmāsa tadā ko'yaṁ rāmasvarūpadhṛk nīlotpaladalaśyāmaṁ vapurbibhranmanoharam

वे तब विचार करने लगे — यह कौन है, जो राम का ही रूप धारण किए हुए है, नीलकमल की पंखुड़ी के समान श्याम, मनोहर देह धारण करने वाला?

श्लोक 5 (padma.5.62.5)

एष वै देहतनुजा सुतो भवति नान्यथा । अस्मान्विजित्य समरे यास्यते मृगराडिव

eṣa vai dehatanujā suto bhavati nānyathā asmānvijitya samare yāsyate mṛgarāḍiva

यह अवश्य ही उन्हीं का शरीर-पुत्र होगा — अन्य कोई नहीं; हमें युद्ध में जीतकर वह मृगराज के समान चला जाएगा।

श्लोक 6 (padma.5.62.6)

अस्माकं नो जयो भाव्यः शक्त्या विरहितात्मनाम् । अशक्ताः किं करिष्यामः समरे रणकोविदाः

asmākaṁ no jayo bhāvyaḥ śaktyā virahitātmanām aśaktāḥ kiṁ kariṣyāmaḥ samare raṇakovidāḥ

बलहीन हुए हम लोगों की विजय नहीं हो सकती; युद्धकुशल होते हुए भी हम असमर्थ होकर क्या करेंगे?

श्लोक 7 (padma.5.62.7)

इत्येवं स विचार्याथ बालकं तु वचोऽब्रवीत् । रणे कुतुककर्तारं वीरकोटिनिपातकम्

ityevaṁ sa vicāryātha bālakaṁ tu vaco'bravīt raṇe kutukakartāraṁ vīrakoṭinipātakam

इस प्रकार विचार करके उन्होंने तब उस बालक से, जो युद्ध में अद्भुत कार्य करता हुआ करोड़ों वीरों को गिरा रहा था, यह वचन कहा —

श्लोक 8 (padma.5.62.8)

कस्त्वं बाल रणेऽस्माकं वीरान्पातयसि क्षितौ । न जानीषे बलं राज्ञो रामस्य दनुजार्दिनः

kastvaṁ bāla raṇe'smākaṁ vīrānpātayasi kṣitau na jānīṣe balaṁ rājño rāmasya danujārdinaḥ

हे बालक! तुम कौन हो, जो युद्ध में हमारे वीरों को पृथ्वी पर गिरा रहे हो? क्या तुम राक्षसों के संहारक राजा राम के बल को नहीं जानते?

श्लोक 9 (padma.5.62.9)

का ते माता पिता कस्ते सुभाग्यो जयमाप्तवान् । नाम किं विश्रुतं लोके जानीयां ते महाबल

kā te mātā pitā kaste subhāgyo jayamāptavān nāma kiṁ viśrutaṁ loke jānīyāṁ te mahābala

तुम्हारी माता कौन है, पिता कौन है, कौन वह सौभाग्यशाली है जिसने तुम्हारे रूप में विजय प्राप्त की है? हे महाबल! मुझे तुम्हारा लोकविख्यात नाम बताओ।

श्लोक 10 (padma.5.62.10)

मुञ्च वाहः कथं बद्धः शिशुत्वात्तत्क्षमामि ते । आयाहि रामं वीक्षस्व दास्यते बहुलं तव

muñca vāhaḥ kathaṁ baddhaḥ śiśutvāttatkṣamāmi te āyāhi rāmaṁ vīkṣasva dāsyate bahulaṁ tava

अश्व को छोड़ दो — यह कैसे बाँधा गया? तुम्हारे बालपन के कारण मैं तुम्हें इसके लिए क्षमा करता हूँ। आओ, राम को देखो — तुम्हें बहुत कुछ दिया जाएगा।

श्लोक 11 (padma.5.62.11)

इत्युक्तो बालको वीरो वचः शत्रुघ्नमावदत् । किं ते नाम्नाथ पित्रा वा कुलेन वयसा तथा

ityukto bālako vīro vacaḥ śatrughnamāvadat kiṁ te nāmnātha pitrā vā kulena vayasā tathā

इस प्रकार कहे जाने पर उस बालक-वीर ने शत्रुघ्न से यह वचन कहा — तुम्हारा नाम क्या है, तुम्हारे पिता का, तुम्हारे कुल का और तुम्हारी आयु का भी क्या है?

श्लोक 12 (padma.5.62.12)

युध्यस्व समरे वीर चेत्त्वं बलयुतो भवेः । कुशं वीरं नमस्कृत्य पादयोर्याहि नान्यथा

yudhyasva samare vīra cettvaṁ balayuto bhaveḥ kuśaṁ vīraṁ namaskṛtya pādayoryāhi nānyathā

हे वीर! यदि तुम सचमुच बलवान् हो तो इस युद्ध में लड़ो; अन्यथा वीर कुश को नमस्कार करके उनके चरणों में जाओ — अन्य कोई मार्ग नहीं है।

श्लोक 13 (padma.5.62.13)

भ्राता रामस्य वीरो भूर्नावयोर्बलिनां वरः । वाहं विमोचय बलाच्छक्तिस्ते विद्यते यदि

bhrātā rāmasya vīro bhūrnāvayorbalināṁ varaḥ vāhaṁ vimocaya balācchaktiste vidyate yadi

तुम रामवीर के भाई कहलाते हो, बलवानों में श्रेष्ठ — यदि तुममें शक्ति है तो बलपूर्वक अश्व को मुक्त कराओ।

श्लोक 14 (padma.5.62.14)

इत्युक्त्वा शरसंधानं कृत्वा प्राहरदुद्भटः । हृदये मस्तके चैव भुजयो रणमंडले

ityuktvā śarasaṁdhānaṁ kṛtvā prāharadudbhaṭaḥ hṛdaye mastake caiva bhujayo raṇamaṁḍale

यह कहकर उस उद्धत ने बाण चढ़ाकर रणभूमि में उसके वक्षस्थल, मस्तक तथा दोनों भुजाओं पर प्रहार किया।

श्लोक 15 (padma.5.62.15)

तदा प्रकुपितो राजा धनुः सज्यमथाकरोत् । नादयन्मेघगंभीरं त्रासयन्निव बालकम्

tadā prakupito rājā dhanuḥ sajyamathākarot nādayanmeghagaṁbhīraṁ trāsayanniva bālakam

तब क्रुद्ध राजा ने अपना धनुष प्रत्यंचाबद्ध किया, मेघ के समान गंभीर गर्जना करते हुए, मानो उस बालक को भयभीत करते हुए।

श्लोक 16 (padma.5.62.16)

बाणानपरिसंख्यातान्मुमोच बलिनां वरः । बालो बलेन चिच्छेद सर्वांस्तान्सायकव्रजान्

bāṇānaparisaṁkhyātānmumoca balināṁ varaḥ bālo balena ciccheda sarvāṁstānsāyakavrajān

बलवानों में श्रेष्ठ उस राजा ने असंख्य बाण छोड़े; उस बालक ने अपने बल से उन सभी बाणों के समूह को काट डाला।

श्लोक 17 (padma.5.62.17)

लवस्यानेकधा मुक्तैर्बाणैर्व्याप्तं महीतलम् । व्यतीपाते प्रदत्तस्य दानस्येवाक्षयं गताः

lavasyānekadhā muktairbāṇairvyāptaṁ mahītalam vyatīpāte pradattasya dānasyevākṣayaṁ gatāḥ

लव द्वारा छोड़े गए अनेक बाणों से संपूर्ण पृथ्वी भर गई — अक्षय, मानो व्यतीपात-काल में दिए गए दान के समान।

श्लोक 18 (padma.5.62.18)

ते बाणा व्योमसकलं व्याप्नुवँल्लवसंधिताः । सूर्यमंडलमासाद्य प्रवर्तंते समंततः

te bāṇā vyomasakalaṁ vyāpnuva~llavasaṁdhitāḥ sūryamaṁḍalamāsādya pravartaṁte samaṁtataḥ

लव द्वारा संधानित वे बाण संपूर्ण आकाश को व्याप्त करते हुए, सूर्यमंडल तक पहुँचकर चारों ओर विचरण करने लगे।

श्लोक 19 (padma.5.62.19)

मारुतो नाविशद्यत्र बाणपंजरगोचरे । मनुष्याणां तु का वार्ता क्षणजीवितशंसिनाम्

māruto nāviśadyatra bāṇapaṁjaragocare manuṣyāṇāṁ tu kā vārtā kṣaṇajīvitaśaṁsinām

उस बाण-पिंजर से भरे क्षेत्र में वायु भी प्रवेश नहीं कर सकती थी; फिर उन मनुष्यों की तो बात ही क्या, जिनका जीवन क्षणभर का ही कहा जाता है?

श्लोक 20 (padma.5.62.20)

तद्बाणान्विस्तृतान्दृष्ट्वा शत्रुघ्नो विस्मयं गतः । अच्छिनच्छतसाहस्रं बाणमोचनकोविदः

tadbāṇānvistṛtāndṛṣṭvā śatrughno vismayaṁ gataḥ acchinacchatasāhasraṁ bāṇamocanakovidaḥ

उन बाणों को इस प्रकार फैला हुआ देखकर, विस्मित होकर, बाण-मोक्ष में कुशल शत्रुघ्न ने उनमें से एक लाख को काट डाला।

श्लोक 21 (padma.5.62.21)

ताञ्छिन्नान्सायकान्सर्वान्स्वीयान्दृष्ट्वा कुशानुजः । धनुश्चिच्छेद तरसा शत्रुघ्नस्य महीपतेः

tāñchinnānsāyakānsarvānsvīyāndṛṣṭvā kuśānujaḥ dhanuściccheda tarasā śatrughnasya mahīpateḥ

अपने सभी बाणों को इस प्रकार कटा देखकर कुश के अनुज ने शीघ्रता से राजा शत्रुघ्न के धनुष को काट डाला।

श्लोक 22 (padma.5.62.22)

सोऽन्यद्धनुरुपादाय यावन्मुंचति सायकान् । तावद्बभंज सरथं सायकैः शितपर्वभिः

so'nyaddhanurupādāya yāvanmuṁcati sāyakān tāvadbabhaṁja sarathaṁ sāyakaiḥ śitaparvabhiḥ

जब तक उन्होंने दूसरा धनुष लेकर बाण छोड़े, तब तक उन्होंने तीक्ष्ण, सुसंधित बाणों से उनके रथ को भी तोड़ डाला।

श्लोक 23 (padma.5.62.23)

करस्थमच्छिनच्चापं सुदृढं गुणपूरितम् । तत्कर्मापूजयन्वीरा रणमंडलवर्तिनः

karasthamacchinaccāpaṁ sudṛḍhaṁ guṇapūritam tatkarmāpūjayanvīrā raṇamaṁḍalavartinaḥ

हाथ में स्थित, सुदृढ़ और प्रत्यंचायुक्त धनुष को उन्होंने काट डाला; रणभूमि में खड़े वीरों ने इस कार्य की प्रशंसा की।

श्लोक 24 (padma.5.62.24)

सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । अन्यं रथं समास्थाय ययौ योद्धुं लवं बलात्

sacchinnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ anyaṁ rathaṁ samāsthāya yayau yoddhuṁ lavaṁ balāt

धनुष के टूटने पर, रथहीन, घोड़े और सारथि के मारे जाने पर, वे दूसरा रथ चढ़कर बलपूर्वक लव से युद्ध करने गए।

श्लोक 25 (padma.5.62.25)

अनेकबाणनिर्भिन्नः स्रवद्रक्तकलेवरः । पुष्पितः किंशुक इव शुशुभे रणमध्यगः

anekabāṇanirbhinnaḥ sravadraktakalevaraḥ puṣpitaḥ kiṁśuka iva śuśubhe raṇamadhyagaḥ

अनेक बाणों से बिंधकर, रक्त बहाते हुए शरीर के साथ, वे युद्ध के मध्य पुष्पित किंशुक वृक्ष के समान शोभायमान हो रहे थे।

श्लोक 26 (padma.5.62.26)

शत्रुघ्नबाणप्रहतः परं कोपमुपागमत् । बाणसंधानचतुरः कुंडलीकृत चापवान्

śatrughnabāṇaprahataḥ paraṁ kopamupāgamat bāṇasaṁdhānacaturaḥ kuṁḍalīkṛta cāpavān

शत्रुघ्न के बाणों से आहत होकर वे परम क्रोध को प्राप्त हुए; बाण-संधान में चतुर उन्होंने अपने धनुष को वृत्ताकार मोड़ा।

श्लोक 27 (padma.5.62.27)

विशीर्णकवचं देहं शिरोमुकुटवर्जितम् । स्रवद्रक्तपरिप्लुष्टं शत्रुघ्नस्य चकार सः

viśīrṇakavacaṁ dehaṁ śiromukuṭavarjitam sravadraktaparipluṣṭaṁ śatrughnasya cakāra saḥ

उन्होंने शत्रुघ्न के शरीर को, जिसका कवच छिन्न-भिन्न हो गया था, जिसके सिर से मुकुट गिर गया था, रक्त से लथपथ कर दिया।

श्लोक 28 (padma.5.62.28)

तदा रामानुजः क्रुद्धो दशबाणाञ्छिताग्रकान् । मुमोच प्राणसंहारकारकान्कुपितो भृशम्

tadā rāmānujaḥ kruddho daśabāṇāñchitāgrakān mumoca prāṇasaṁhārakārakānkupito bhṛśam

तब राम के अनुज ने क्रुद्ध होकर तीक्ष्ण अग्रभाग वाले, प्राणहारी दस बाण छोड़े, अत्यंत क्रोध से युक्त होकर।

श्लोक 29 (padma.5.62.29)

स तांस्तांस्तिलशः कृत्वा बाणैर्निशितपर्वभिः । ताडयामास हृदये शत्रुघ्नस्याष्टभिः शरैः

sa tāṁstāṁstilaśaḥ kṛtvā bāṇairniśitaparvabhiḥ tāḍayāmāsa hṛdaye śatrughnasyāṣṭabhiḥ śaraiḥ

अपने तीक्ष्ण, सुसंधित बाणों से उन सभी को खंड-खंड करके उन्होंने शत्रुघ्न के वक्षस्थल पर आठ बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 30 (padma.5.62.30)

अत्यंतं बाणपीडार्तो लवं बलिनमुत्स्मरन् । दुःसहं मन्यमानस्तं शरान्मुंचन्नभूत्तदा

atyaṁtaṁ bāṇapīḍārto lavaṁ balinamutsmaran duḥsahaṁ manyamānastaṁ śarānmuṁcannabhūttadā

उन बाणों की पीड़ा से अत्यंत आतुर होकर, बलवान् लव का स्मरण करते हुए, उसे असह्य मानते हुए, वे तब अपने बाण छोड़ने लगे।

श्लोक 31 (padma.5.62.31)

तदा लवेन तीक्ष्णेन हृदि भिन्नो विशालके । अर्धचंद्रसमानेन तीक्ष्णपर्वसुशोभिना

tadā lavena tīkṣṇena hṛdi bhinno viśālake ardhacaṁdrasamānena tīkṣṇaparvasuśobhinā

तब लव के तीक्ष्ण, अर्धचंद्र के समान आकार वाले, अपने तीक्ष्ण पर्व से सुशोभित बाण से विशाल वक्षस्थल में बिंधकर —

श्लोक 32 (padma.5.62.32)

स विद्धो हृदि बाणेन पीडां प्राप्तः सुदारुणाम् । पपात स्यंदनोपस्थे धनुःपाणिः सुशोभितः

sa viddho hṛdi bāṇena pīḍāṁ prāptaḥ sudāruṇām papāta syaṁdanopasthe dhanuḥpāṇiḥ suśobhitaḥ

— उस बाण से हृदय में बिंधकर वे अत्यंत भयंकर पीड़ा को प्राप्त हुए, और धनुष हाथ में लिए हुए, शोभायमान होते हुए भी, रथ पर गिर पड़े।

श्लोक 33 (padma.5.62.33)

शत्रुघ्नं मूर्छितं दृष्ट्वा नृपाश्च सुरथादयः । दुद्रुवुर्लवमुद्युक्ता जयप्राप्त्यै रणे तदा

śatrughnaṁ mūrchitaṁ dṛṣṭvā nṛpāśca surathādayaḥ dudruvurlavamudyuktā jayaprāptyai raṇe tadā

शत्रुघ्न को मूर्च्छित देखकर सुरथ आदि राजा, विजय प्राप्त करने के लिए उत्सुक होकर, तब युद्ध में लव पर टूट पड़े।

श्लोक 34 (padma.5.62.34)

सुरथो विमलो वीरो राजा वीरमणिस्तथा । सुमदो रिपुतापाद्याः परिवव्रुश्च संयुगे

suratho vimalo vīro rājā vīramaṇistathā sumado riputāpādyāḥ parivavruśca saṁyuge

सुरथ, वीर विमल, राजा वीरमणि, सुमद, रिपुताप आदि उस युद्ध में उन्हें घेर लिया।

श्लोक 35 (padma.5.62.35)

केचित्क्षुरप्रैर्मुसलैः केचिद्बाणैः सुदारुणैः । प्रासैः परशुभिः केचित्सर्वतः प्राहरन्नृपाः

kecitkṣuraprairmusalaiḥ kecidbāṇaiḥ sudāruṇaiḥ prāsaiḥ paraśubhiḥ kecitsarvataḥ prāharannṛpāḥ

कुछ ने क्षुरप्र बाणों और मुसलों से, कुछ ने अत्यंत भयंकर बाणों से, कुछ ने भालों और फरसों से — उन राजाओं ने चारों ओर से उन पर प्रहार किया।

श्लोक 36 (padma.5.62.36)

तानधर्मेण युद्धोत्कान्दृष्ट्वा वीरशिरोमणिः । दशभिर्दशभिर्बाणैस्ताडयामास संयुगे

tānadharmeṇa yuddhotkāndṛṣṭvā vīraśiromaṇiḥ daśabhirdaśabhirbāṇaistāḍayāmāsa saṁyuge

उन्हें अधर्मपूर्वक युद्ध के लिए उत्सुक देखकर उस वीरशिरोमणि ने उस युद्ध में उन सबको दस-दस बाणों से मारा।

श्लोक 37 (padma.5.62.37)

ते बाणवर्षविहता रणमध्ये सुकोपनाः । केचित्पलायिताः केचिन्मुमुहुर्युद्धमंडले

te bāṇavarṣavihatā raṇamadhye sukopanāḥ kecitpalāyitāḥ kecinmumuhuryuddhamaṁḍale

उस बाणवृष्टि से आहत होकर, युद्ध के मध्य अत्यंत क्रुद्ध हुए वे कुछ भाग गए, कुछ युद्धभूमि में मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 38 (padma.5.62.38)

तावत्स राजा शत्रुघ्नो मूर्च्छां संत्यज्य संगरे । लवं प्रायान्महावीरं योद्धुं बलसमन्वितः

tāvatsa rājā śatrughno mūrcchāṁ saṁtyajya saṁgare lavaṁ prāyānmahāvīraṁ yoddhuṁ balasamanvitaḥ

इतने में राजा शत्रुघ्न ने युद्ध में अपनी मूर्च्छा त्यागकर, अपने संपूर्ण बल सहित महावीर लव से युद्ध करने के लिए प्रस्थान किया।

श्लोक 39 (padma.5.62.39)

आगत्य तं लवं प्राह धन्योसि शिशुसन्निभः । न बालस्त्वं सुरः कश्चिच्छलितुं मां समागतः

āgatya taṁ lavaṁ prāha dhanyosi śiśusannibhaḥ na bālastvaṁ suraḥ kaścicchalituṁ māṁ samāgataḥ

वहाँ आकर उन्होंने लव से कहा — धन्य हो तुम, यद्यपि तुम बालक के समान दिखते हो; तुम साधारण बालक नहीं हो — कोई देवता मुझे छलने आया है।

श्लोक 40 (padma.5.62.40)

केनापि नहि वीरेण पातितो रणमंडले । त्वयाहं प्रापितो मूर्च्छां समक्षं मम पश्यतः

kenāpi nahi vīreṇa pātito raṇamaṁḍale tvayāhaṁ prāpito mūrcchāṁ samakṣaṁ mama paśyataḥ

पहले किसी भी वीर द्वारा मैं युद्धभूमि में कभी नहीं गिराया गया था; तुम्हारे द्वारा ही, अपनी ही आँखों के सामने, मुझे मूर्च्छा प्राप्त हुई है।

श्लोक 41 (padma.5.62.41)

इदानीं पश्य मे वीर्यं त्वां संख्ये पातयाम्यहम् । सहस्व बाणमेकं त्वं मापलायस्व बालक

idānīṁ paśya me vīryaṁ tvāṁ saṁkhye pātayāmyaham sahasva bāṇamekaṁ tvaṁ māpalāyasva bālaka

अब मेरा पराक्रम देखो — मैं तुम्हें इस युद्ध में गिरा दूँगा। मेरा एक बाण सहन करो, और मत भागो, हे बालक।

श्लोक 42 (padma.5.62.42)

इत्युक्त्वा समरे बालं शरमेकं समाददे । यमवक्त्रसमं घोरं लवणो येन घातितः

ityuktvā samare bālaṁ śaramekaṁ samādade yamavaktrasamaṁ ghoraṁ lavaṇo yena ghātitaḥ

यह कहकर उस युद्ध में उन्होंने उस बालक के विरुद्ध एक बाण उठाया, यम के मुख के समान भयंकर, जिससे लवण मारा गया था।

श्लोक 43 (padma.5.62.43)

संधाय बाणं जाज्वल्यं हृदि भेत्तुं मनो दधत् । लवं वीरसहस्राणां वह्निवत्सर्वदाहकम्

saṁdhāya bāṇaṁ jājvalyaṁ hṛdi bhettuṁ mano dadhat lavaṁ vīrasahasrāṇāṁ vahnivatsarvadāhakam

उस प्रज्वलित बाण को चढ़ाकर, उसके हृदय को बींधने का निश्चय करते हुए, वह हजारों वीरों को भस्म करने वाली अग्नि के समान —

श्लोक 44 (padma.5.62.44)

तं बाणं प्रज्वलंतं स द्योतयंतं दिशो दश । दृष्ट्वा सस्मार बलिनं कुशं वैरिनिपातिनम्

taṁ bāṇaṁ prajvalaṁtaṁ sa dyotayaṁtaṁ diśo daśa dṛṣṭvā sasmāra balinaṁ kuśaṁ vairinipātinam

उस दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए प्रज्वलित बाण को देखकर उसने (लव ने) शत्रु-संहारक बलवान् कुश का स्मरण किया।

श्लोक 45 (padma.5.62.45)

यद्यस्मिन्समये वीरो भ्राता स्याद्बलवान्मम । तदा शत्रुघ्नवशता न मे स्याद्भयमुल्बणम्

yadyasminsamaye vīro bhrātā syādbalavānmama tadā śatrughnavaśatā na me syādbhayamulbaṇam

यदि इस समय मेरा बलवान् भाई, वह वीर, मेरे साथ होता, तो शत्रुघ्न के वश में होने पर भी मुझे कोई बड़ा भय न होता।

श्लोक 46 (padma.5.62.46)

एवं तर्कयतस्तस्य लवस्य च महात्मनः । हृदि लग्नो महाबाणो घोरः कालानलोपमः

evaṁ tarkayatastasya lavasya ca mahātmanaḥ hṛdi lagno mahābāṇo ghoraḥ kālānalopamaḥ

जब महात्मा लव इस प्रकार विचार कर रहे थे, तभी वह महान्, भयंकर, प्रलयाग्नि के समान बाण उनके हृदय में जा लगा।

श्लोक 47 (padma.5.62.47)

मूर्च्छां प्राप तदा वीरो भूपसायकसंहतः । संगरे सर्ववीराणां शिरोभिः समलंकृते

mūrcchāṁ prāpa tadā vīro bhūpasāyakasaṁhataḥ saṁgare sarvavīrāṇāṁ śirobhiḥ samalaṁkṛte

तब उस राजा के ही बाण से आहत होकर वह वीर, समस्त वीरों के सिरों से अलंकृत उस युद्ध में, मूर्च्छित हो गए।

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63