पाताल खण्ड · अध्याय 63
शत्रुघ्न की मूर्च्छा और कुश की विजय
श्लोक 1 (padma.5.63.1)
शेष उवाच। लवं विमूर्च्छितं दृष्ट्वा बलिवैरिविदारणम् । शत्रुघ्नो जयमापेदे रणमूर्ध्नि महाबलः
śeṣa uvāca lavaṁ vimūrcchitaṁ dṛṣṭvā balivairividāraṇam śatrughno jayamāpede raṇamūrdhni mahābalaḥ
शेष जी ने कहा — बलवान् शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले लव को मूर्च्छित देखकर, महाबली शत्रुघ्न ने युद्ध के अग्रभाग में विजय प्राप्त की।
श्लोक 2 (padma.5.63.2)
लवं बालं रथे स्थाप्य शिरस्त्राणाद्यलंकृतम् । रामप्रतिनिधिं मूर्त्या ततो गंतुमियेष सः
lavaṁ bālaṁ rathe sthāpya śirastrāṇādyalaṁkṛtam rāmapratinidhiṁ mūrtyā tato gaṁtumiyeṣa saḥ
बालक लव को, शिरस्त्राण आदि से अलंकृत, राम की देहमूर्ति के समान, रथ पर बिठाकर वे तब वहाँ से जाने की इच्छा करने लगे।
श्लोक 3 (padma.5.63.3)
स्वमित्रं शत्रुणा ग्रस्तमिति दुःखसमन्विताः । बालामात्रेऽस्य सीतायै त्वरिताः संन्यवेदयन्
svamitraṁ śatruṇā grastamiti duḥkhasamanvitāḥ bālāmātre'sya sītāyai tvaritāḥ saṁnyavedayan
हमारा मित्र शत्रु द्वारा पकड़ लिया गया है — इस प्रकार दुःखयुक्त बालिकाओं ने शीघ्रता से सीता को यह सूचना दी।
श्लोक 4 (padma.5.63.4)
बाला ऊचुः। मातर्जानकि ते पुत्रो बलाद्वाहमपाहरत् । कस्यचिद्भूपवर्यस्य बलयुक्तस्य मानिनः
bālā ūcuḥ mātarjānaki te putro balādvāhamapāharat kasyacidbhūpavaryasya balayuktasya māninaḥ
बालिकाओं ने कहा — माता जानकी! आपके पुत्र ने किसी बलवान्, अभिमानी राजा के अश्व को बलपूर्वक हर लिया।
श्लोक 5 (padma.5.63.5)
ततो युद्धमभूद्घोरं तस्य सैन्येन जानकि । तदा वीरेण पुत्रेण तव सर्वं निपातितम्
tato yuddhamabhūdghoraṁ tasya sainyena jānaki tadā vīreṇa putreṇa tava sarvaṁ nipātitam
तब, हे जानकी! उसकी सेना के साथ भयंकर युद्ध हुआ; तब आपके वीर पुत्र ने सब कुछ गिरा दिया।
श्लोक 6 (padma.5.63.6)
पश्चादपि जयं प्राप्तः सुतस्तव मनोहरः । तं भूपं मूर्छितं कृत्वा जयमाप रणांगणे
paścādapi jayaṁ prāptaḥ sutastava manoharaḥ taṁ bhūpaṁ mūrchitaṁ kṛtvā jayamāpa raṇāṁgaṇe
बाद में भी आपके मनोहर पुत्र ने विजय प्राप्त की; उस राजा को मूर्च्छित करके उन्होंने रणभूमि में विजय प्राप्त की।
श्लोक 7 (padma.5.63.7)
ततो मूर्च्छां विहायैष राजा परमदारुणः । संकुप्य पातयामास तव पुत्रं रणांगणे
tato mūrcchāṁ vihāyaiṣa rājā paramadāruṇaḥ saṁkupya pātayāmāsa tava putraṁ raṇāṁgaṇe
तब वह अत्यंत भयंकर राजा मूर्च्छा त्यागकर, क्रोधित होकर आपके पुत्र को रणभूमि में गिरा दिया।
श्लोक 8 (padma.5.63.8)
अस्माभिर्वारितः पूर्वं मा गृहाण हयोत्तमम् । अस्मान्सर्वांश्च धिक्कृत्य ब्राह्मणान्वेदपारगान्
asmābhirvāritaḥ pūrvaṁ mā gṛhāṇa hayottamam asmānsarvāṁśca dhikkṛtya brāhmaṇānvedapāragān
हमने पहले ही उन्हें रोका था — इस श्रेष्ठ अश्व को मत लो — परंतु उसने हम वेदपारंगत ब्राह्मणों सभी को धिक्कारकर —
श्लोक 9 (padma.5.63.9)
इति वाक्यं शिशूनां सा समाकर्ण्य सुदारुणम् । पपात भूतलोपस्थे दुःखयुक्ता रुरोद ह
iti vākyaṁ śiśūnāṁ sā samākarṇya sudāruṇam papāta bhūtalopasthe duḥkhayuktā ruroda ha
बच्चों का यह अत्यंत भयंकर वचन सुनकर वह भूमि पर गिर पड़ीं, दुःखयुक्त होकर वे रोने लगीं।
श्लोक 10 (padma.5.63.10)
सीतोवाच। कथं नृपो दयाहीनो बालेन सह युध्यति । अधर्मकृतदुर्बुद्धिर्यो मद्बालं न्यपातयत्
sītovāca kathaṁ nṛpo dayāhīno bālena saha yudhyati adharmakṛtadurbuddhiryo madbālaṁ nyapātayat
सीता ने कहा — कैसे दयाहीन राजा एक बालक से युद्ध कर सकता है — वह अधर्मी दुर्बुद्धि, जिसने मेरे बालक को गिरा दिया?
श्लोक 11 (padma.5.63.11)
लव वीरभवान्कुत्र वर्ततेऽति बलान्वितः । कथं त्वं निष्कृपस्याहो राज्ञोऽहार्षीद्धयोत्तमम्
lava vīrabhavānkutra vartate'ti balānvitaḥ kathaṁ tvaṁ niṣkṛpasyāho rājño'hārṣīddhayottamam
हे लव! हे वीर! तुम कहाँ हो, इतने बलवान् होते हुए? हाय! उस दयाहीन राजा ने तुम्हारा श्रेष्ठ अश्व कैसे हर लिया?
श्लोक 12 (padma.5.63.12)
त्वं बालस्ते दुराक्रांताः सर्वशस्त्रविशारदाः । रथस्था विरथस्त्वं वै कथं युद्धं समं भवेत्
tvaṁ bālaste durākrāṁtāḥ sarvaśastraviśāradāḥ rathasthā virathastvaṁ vai kathaṁ yuddhaṁ samaṁ bhavet
तुम बालक हो, समस्त शस्त्रों में निपुण उन प्रबल लोगों द्वारा आक्रांत; तुम पैदल, वे रथस्थ — युद्ध समान कैसे हो सकता था?
श्लोक 13 (padma.5.63.13)
ताताहं तु त्वया सार्द्धं रामत्यागासुखं जहौ । इदानीं रहिता युष्मत्कथं जीवामि कानने
tātāhaṁ tu tvayā sārddhaṁ rāmatyāgāsukhaṁ jahau idānīṁ rahitā yuṣmatkathaṁ jīvāmi kānane
हे तात! मैंने राम के त्याग का दुःख तुम्हारे लिए ही सहा था; अब तुमसे रहित होकर मैं इस वन में कैसे जीऊँगी?
श्लोक 14 (padma.5.63.14)
एहि मां मुंच यज्ञाश्वं गच्छत्वेष महीपतिः । मद्दुःखं नाभिजानासि मम दुःखप्रमार्जकः
ehi māṁ muṁca yajñāśvaṁ gacchatveṣa mahīpatiḥ madduḥkhaṁ nābhijānāsi mama duḥkhapramārjakaḥ
आओ, यज्ञीय अश्व को छोड़ दो — यह राजा जाने दे; तुम मेरा दुःख नहीं जानते, हे मेरे दुःख हरने वाले!
श्लोक 15 (padma.5.63.15)
कुशो यद्यभविष्यत्स रणे वीरशिरोमणिः । अमोचयिष्यदधुना भवंतं भूपपार्श्वतः
kuśo yadyabhaviṣyatsa raṇe vīraśiromaṇiḥ amocayiṣyadadhunā bhavaṁtaṁ bhūpapārśvataḥ
यदि कुश, वह वीरशिरोमणि, वहाँ होता, तो वह अभी तुम्हें उस राजा के पास से मुक्त करा देता।
श्लोक 16 (padma.5.63.16)
सोऽपि मद्दैवतो नास्ति समीपे किं करोम्यतः । दैवमेव ममाप्यत्र कारणं दुःखसंभवे
so'pi maddaivato nāsti samīpe kiṁ karomyataḥ daivameva mamāpyatra kāraṇaṁ duḥkhasaṁbhave
वह भी अभी मेरे समीप नहीं है, मेरे अपने देवता — यहाँ मैं क्या करूँ? इसमें भी भाग्य ही मेरे दुःख का कारण है।
श्लोक 17 (padma.5.63.17)
एवमादि बहुश्रीमत्येषा वै विललाप ह । पादांगुष्ठेन लिखती भूमिं नेत्रद्वयाश्रुभिः
evamādi bahuśrīmatyeṣā vai vilalāpa ha pādāṁguṣṭhena likhatī bhūmiṁ netradvayāśrubhiḥ
यह और अनेक अन्य कहते हुए, वह महाभागिनी विलाप करने लगीं, अपने पैर के अंगूठे से भूमि पर रेखाएँ खींचते हुए, दोनों नेत्रों से आँसू बहाते हुए।
श्लोक 18 (padma.5.63.18)
बालान्प्रति जगादासौ पृथुकः स च भूपतिः । कथं मत्सुतमापात्य रणे कुत्र गमिष्यति
bālānprati jagādāsau pṛthukaḥ sa ca bhūpatiḥ kathaṁ matsutamāpātya raṇe kutra gamiṣyati
उन्होंने उस विशाल-वक्ष वाले राजा के विषय में कहा — मेरे पुत्र को गिराकर वह इस युद्ध में कहाँ जाएगा?
श्लोक 19 (padma.5.63.19)
इति वाक्यं वदत्येषा जानकी पतिदेवता । तावत्कुशस्तु संप्राप्त उज्जयिन्या महर्षिभिः
iti vākyaṁ vadatyeṣā jānakī patidevatā tāvatkuśastu saṁprāpta ujjayinyā maharṣibhiḥ
पतिव्रता जानकी जब यह वचन कह रही थीं, तब कुश महर्षियों सहित उज्जयिनी से वापस आ पहुँचे।
श्लोक 20 (padma.5.63.20)
माघासितचतुर्दश्यां महाकालं समर्च्य च । प्राप्य भूरिवरांस्तस्मादागमन्मातृसन्निधौ
māghāsitacaturdaśyāṁ mahākālaṁ samarcya ca prāpya bhūrivarāṁstasmādāgamanmātṛsannidhau
माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को महाकाल की पूजा करके, वहाँ से प्रचुर वरदान प्राप्त करके, वे अपनी माता के समीप आए।
श्लोक 21 (padma.5.63.21)
जानकीं विह्वलां दृष्ट्वा नेत्रोद्भूताश्रु विक्लवाम् । शोकविह्वलदीनांगीं बभाषे यावदुत्सुकः
jānakīṁ vihvalāṁ dṛṣṭvā netrodbhūtāśru viklavām śokavihvaladīnāṁgīṁ babhāṣe yāvadutsukaḥ
जानकी को व्याकुल, नेत्रों से आँसू बहाती, शोक से विह्वल अंगों वाली देखकर उन्होंने उत्सुकतापूर्वक उनसे कहा, जब वे बोल ही रही थीं —
श्लोक 22 (padma.5.63.22)
तदा स्वबाहुरवदत्स्फुरद्युद्धाभिशंसनः । हृदये चरणोत्साहो बभूवातिरथस्य हि
tadā svabāhuravadatsphuradyuddhābhiśaṁsanaḥ hṛdaye caraṇotsāho babhūvātirathasya hi
तब उनकी अपनी भुजा फड़कने लगी, जो युद्ध का संकेत दे रही थी; उस महारथी के हृदय में आगे बढ़ने का उत्साह उत्पन्न हुआ।
श्लोक 23 (padma.5.63.23)
स प्रत्युवाच जननीं दीनगद्गदभाषिणीम् । मातस्तव गतं दुःखं मयि पुत्र उपस्थिते
sa pratyuvāca jananīṁ dīnagadgadabhāṣiṇīm mātastava gataṁ duḥkhaṁ mayi putra upasthite
उन्होंने दीन, गद्गद वाणी में बोलती हुई माता को उत्तर दिया — हे माता! आपका दुःख दूर हो गया, अब आपका पुत्र आ पहुँचा है।
श्लोक 24 (padma.5.63.24)
मयि जीवति ते नेत्रादश्रूणि भुवि नो पतन् । प्रसूमुवाचाश्रुखिन्नां दीनगद्गदभाषिणीम्
mayi jīvati te netrādaśrūṇi bhuvi no patan prasūmuvācāśrukhinnāṁ dīnagadgadabhāṣiṇīm
मेरे जीवित रहते आपके नेत्रों से भूमि पर आँसू नहीं गिरेंगे। उन्होंने अपनी माता से, जो आँसुओं से खिन्न थीं, दीन-गद्गद वाणी में बोलती हुई से पूछा —
श्लोक 25 (padma.5.63.25)
कुशो दुःखमितः सद्यो दुःखितां धीरमानसः । मम भ्राता लवः कुत्र वर्तते वैरिमर्दनः
kuśo duḥkhamitaḥ sadyo duḥkhitāṁ dhīramānasaḥ mama bhrātā lavaḥ kutra vartate vairimardanaḥ
— कुश ने, धीर-मन, अपनी माता को इस तात्कालिक दुःख से दुःखी देखकर पूछा — मेरा भाई लव, शत्रुओं का संहारक, कहाँ है?
श्लोक 26 (padma.5.63.26)
सदा मामागतं ज्ञात्वा प्रहर्षन्सन्निधावियात् । न दृश्यते कथं वीरः कुत्र रंतुं गतो बली
sadā māmāgataṁ jñātvā praharṣansannidhāviyāt na dṛśyate kathaṁ vīraḥ kutra raṁtuṁ gato balī
सदा यह जानकर कि मैं आ गया हूँ, वह प्रसन्न होकर मेरे पास दौड़ आता है; वह वीर क्यों नहीं दिखाई देता? वह बलवान् कहाँ क्रीड़ा करने गया है?
श्लोक 27 (padma.5.63.27)
केन वा सह बालत्वाद्गतो मां वै निरीक्षितुम् । किं त्वं रोदिषि मे मातर्लवः कुत्र स वर्तते
kena vā saha bālatvādgato māṁ vai nirīkṣitum kiṁ tvaṁ rodiṣi me mātarlavaḥ kutra sa vartate
वह अभी बालक होते हुए किसके साथ मुझे ढूँढ़ने गया है? हे माता! आप क्यों रो रही हैं? वह लव अब कहाँ है?
श्लोक 28 (padma.5.63.28)
तन्मे कथय सर्वं यत्तव दुःखस्य कारणम् । तच्छ्रुत्वा पुत्रवाक्यं सा दुःखिता कुशमब्रवीत्
tanme kathaya sarvaṁ yattava duḥkhasya kāraṇam tacchrutvā putravākyaṁ sā duḥkhitā kuśamabravīt
मुझे यह सब बताइए, आपके दुःख का कारण। अपने पुत्र का यह वचन सुनकर वह दुःखित माता कुश से बोलीं —
श्लोक 29 (padma.5.63.29)
लवो धृतो नृपेणात्र केनचिद्धयरक्षिणा । बबंध बालको मेत्र हयं यागक्रियोचितम्
lavo dhṛto nṛpeṇātra kenaciddhayarakṣiṇā babaṁdha bālako metra hayaṁ yāgakriyocitam
यहाँ किसी राजा ने, जो अश्व-रक्षक था, लव को पकड़ लिया; मेरे उस बालक ने यज्ञ-क्रिया के योग्य अश्व को बाँध लिया था।
श्लोक 30 (padma.5.63.30)
तद्रक्षकान्बहूञ्जिग्ये एकोऽनेकान्रिपून्बली । राजा तं मूर्च्छितं कृत्वा बबंध रणमूर्धनि
tadrakṣakānbahūñjigye eko'nekānripūnbalī rājā taṁ mūrcchitaṁ kṛtvā babaṁdha raṇamūrdhani
उसने अकेले ही, बलवान् होकर, उसके अनेक रक्षकों को जीता, अनेक शत्रुओं के विरुद्ध; राजा ने उसे मूर्च्छित करके युद्ध के अग्रभाग में बाँध लिया।
श्लोक 31 (padma.5.63.31)
बालका इति मामूचुः सहगंतार एव हि । ततोऽहं दुःखिता जाता निशम्य लवमाधृतम्
bālakā iti māmūcuḥ sahagaṁtāra eva hi tato'haṁ duḥkhitā jātā niśamya lavamādhṛtam
उसके साथ गए बालकों ने मुझे यह बताया; तब लव को पकड़ा हुआ सुनकर मैं दुःखित हो उठी।
श्लोक 32 (padma.5.63.32)
त्वं मोचय बलात्तस्मात्काले प्राप्तो नृपोत्तमात् । निशम्य मातुर्वचनं कुशः कोपसमन्वितः । जगाद तां दशन्नोष्ठं दंतैर्दंतान्विनिष्पिषन्
tvaṁ mocaya balāttasmātkāle prāpto nṛpottamāt niśamya māturvacanaṁ kuśaḥ kopasamanvitaḥ jagāda tāṁ daśannoṣṭhaṁ daṁtairdaṁtānviniṣpiṣan
तुम ठीक इसी समय आ गए हो — उस श्रेष्ठ राजा से उसे बलपूर्वक मुक्त कराओ। माता का यह वचन सुनकर कुश क्रोध से युक्त होकर —
श्लोक 33 (padma.5.63.33)
कुश उवाच। मातर्जानीहि तं मुक्तं लवं पाशस्य बंधनात् । इदानीं हन्मि तं बाणैः समग्रबलवाहनम्
kuśa uvāca mātarjānīhi taṁ muktaṁ lavaṁ pāśasya baṁdhanāt idānīṁ hanmi taṁ bāṇaiḥ samagrabalavāhanam
— अपने होंठों को दाँतों से दबाते हुए, दाँतों को दाँतों से पीसते हुए, माता से यह कहा। कुश ने कहा — माता! जानिए कि लव उस बंधन के पाश से मुक्त हो गया है —
श्लोक 34 (padma.5.63.34)
यदि देवोऽमरो वापि यदि शर्वः समागतः । तथापि मोचये तस्माद्बाणैर्निशितपर्वभिः
yadi devo'maro vāpi yadi śarvaḥ samāgataḥ tathāpi mocaye tasmādbāṇairniśitaparvabhiḥ
— अभी मैं उसे अपनी संपूर्ण सेना और वाहनों सहित बाणों से मार डालूँगा। चाहे वह कोई देव हो, अमर हो, या स्वयं शर्व ही आया हो —
श्लोक 35 (padma.5.63.35)
मा रोदिषि मातरिह वीराणां रणमूर्छितम् । कीर्तयेऽत्र भवत्येव पलायनमकीर्तये
mā rodiṣi mātariha vīrāṇāṁ raṇamūrchitam kīrtaye'tra bhavatyeva palāyanamakīrtaye
— तब भी मैं तीक्ष्ण, सुसंधित बाणों से उसे मुक्त कराऊँगा। हे माता! यहाँ मत रोइए — रणभूमि में वीरों की मूर्च्छा कीर्ति लाती है, भागना अपकीर्ति।
श्लोक 36 (padma.5.63.36)
देहि मे कवचं दिव्यं धनुर्गुणसमन्वितम् । शिरस्त्राणं च मे मातः करवालं तथाशितम्
dehi me kavacaṁ divyaṁ dhanurguṇasamanvitam śirastrāṇaṁ ca me mātaḥ karavālaṁ tathāśitam
मुझे मेरा दिव्य कवच दीजिए, धनुष-प्रत्यंचा सहित; हे माता! मुझे मेरा शिरस्त्राण और तेज़ तलवार भी दीजिए।
श्लोक 37 (padma.5.63.37)
इदानीं यामि समरे पातयामि बलं महत् । मोचयामि भ्रातरं स्वं रणमध्याद्विमूर्छितम्
idānīṁ yāmi samare pātayāmi balaṁ mahat mocayāmi bhrātaraṁ svaṁ raṇamadhyādvimūrchitam
अब मैं युद्ध में जाता हूँ; मैं उस विशाल सेना को गिरा दूँगा; अपने भाई को, जो युद्ध के मध्य मूर्च्छित पड़ा है, मुक्त कराऊँगा।
श्लोक 38 (padma.5.63.38)
न मोचयाम्यद्य पुत्रं तव मातर्महारणात् । तदा तौ मे भवत्पादौ संरुष्टौ भवतां क्षितौ
na mocayāmyadya putraṁ tava mātarmahāraṇāt tadā tau me bhavatpādau saṁruṣṭau bhavatāṁ kṣitau
हे माता! यदि मैं आज आपके पुत्र को उस महायुद्ध से मुक्त नहीं कराता, तो पृथ्वी पर आपके दोनों चरण मुझ पर क्रुद्ध हों।
श्लोक 39 (padma.5.63.39)
शेष उवाच। इति वाक्येन संतुष्टा जानकी शुभलक्षणा । सर्वं प्रादादस्त्रवृंदं जयाशीर्भिर्नियुज्यतम्
śeṣa uvāca iti vākyena saṁtuṣṭā jānakī śubhalakṣaṇā sarvaṁ prādādastravṛṁdaṁ jayāśīrbhirniyujyatam
शेष जी ने कहा — इस वचन से संतुष्ट होकर शुभलक्षणा जानकी ने उन्हें विजय के आशीर्वाद के साथ समस्त अस्त्र-समूह दे दिया।
श्लोक 40 (padma.5.63.40)
प्रयाहि पुत्र संग्रामं लवं मोचय मूर्च्छितम् । इत्याज्ञप्तः कुशः संख्ये कवची कुंडली बली
prayāhi putra saṁgrāmaṁ lavaṁ mocaya mūrcchitam ityājñaptaḥ kuśaḥ saṁkhye kavacī kuṁḍalī balī
जाओ, हे पुत्र, युद्ध में; लव को मूर्च्छा से मुक्त कराओ। इस प्रकार आज्ञा पाकर कुश, कवचधारी, कुंडलधारी, बलवान् —
श्लोक 41 (padma.5.63.41)
मुकुटी करवाली च चर्मधारी धनुर्धरः । अक्षयाविषुधी कृत्वा स्कंधयोः सिंहवीर्ययोः
mukuṭī karavālī ca carmadhārī dhanurdharaḥ akṣayāviṣudhī kṛtvā skaṁdhayoḥ siṁhavīryayoḥ
— मुकुटधारी, तलवारधारी, ढालधारी, धनुर्धारी, अपने सिंह-सम बलशाली कंधों पर दोनों अक्षय तूणीर लिए हुए —
श्लोक 42 (padma.5.63.42)
जगाम तरसा नत्वा मातृपादौ रथाग्रणीः । वेगेन यावद्युद्धाय गच्छति क्षिप्रमाहवे
jagāma tarasā natvā mātṛpādau rathāgraṇīḥ vegena yāvadyuddhāya gacchati kṣipramāhave
— अपनी माता के चरणों में प्रणाम करके शीघ्रता से चल पड़े, वे रथियों में श्रेष्ठ; जैसे वे वेगपूर्वक शीघ्र उस युद्ध की ओर जा रहे थे —
श्लोक 43 (padma.5.63.43)
तावद्ददर्श स्वलवं वैरिवृंदनिपातकम् । आयांतं तं कुशं वीरा ददृशुः सुमहाभटाः
tāvaddadarśa svalavaṁ vairivṛṁdanipātakam āyāṁtaṁ taṁ kuśaṁ vīrā dadṛśuḥ sumahābhaṭāḥ
— तभी उन्होंने अपने लव को देखा, शत्रु-समूहों के संहारक; और महान् योद्धाओं ने उस आते हुए कुश को देखा —
श्लोक 44 (padma.5.63.44)
कृतांतमिव संहर्तुं सर्वं विश्वमुपस्थितम् । लवो महाबलं दृष्ट्वा कुशं भ्रातरमागतम्
kṛtāṁtamiva saṁhartuṁ sarvaṁ viśvamupasthitam lavo mahābalaṁ dṛṣṭvā kuśaṁ bhrātaramāgatam
— मानो संपूर्ण विश्व का संहार करने वाला कृतांत ही उपस्थित हो। लव ने बलवान् कुश को, अपने भाई को, आया हुआ देखकर —
श्लोक 45 (padma.5.63.45)
अत्यंतं वह्निवद्युद्धे दिदीपे वायुना समम् । रथादुन्मुच्य चात्मानं युद्धाय स विनिर्गतः
atyaṁtaṁ vahnivadyuddhe didīpe vāyunā samam rathādunmucya cātmānaṁ yuddhāya sa vinirgataḥ
— उस युद्ध में अत्यंत अग्नि के समान, वायु के साथ, प्रज्वलित हो उठे; रथ से अपने को मुक्त करके वे युद्ध के लिए बाहर निकले।
श्लोक 46 (padma.5.63.46)
कुशः सर्वान्रणस्थान्वै वीरान्पूर्वदिशि क्षिपत् । पश्चिमायां दिशि लवः कोपात्सर्वान्समैरयत्
kuśaḥ sarvānraṇasthānvai vīrānpūrvadiśi kṣipat paścimāyāṁ diśi lavaḥ kopātsarvānsamairayat
कुश ने युद्ध में खड़े समस्त वीरों को पूर्व दिशा की ओर फेंक दिया; लव ने क्रोधवश अन्य सबको पश्चिम दिशा की ओर खदेड़ दिया।
श्लोक 47 (padma.5.63.47)
कुशबाणव्यथाव्याप्ता लवसायकपीडिताः । सैन्ये जना मुने सर्वे उत्कल्लोलांबुधिभ्रमाः
kuśabāṇavyathāvyāptā lavasāyakapīḍitāḥ sainye janā mune sarve utkallolāṁbudhibhramāḥ
हे मुने! उस सेना के सभी लोग, कुश के बाणों से पीड़ित और लव के बाणों से व्यथित, उमड़ते हुए तरंग-सागर के समान हो गए।
श्लोक 48 (padma.5.63.48)
कुशेन च लवेनाथ शरव्रातैः प्रपीडितम् । न शर्म लेभे सकलं सैन्यं वीरप्रपूरितम्
kuśena ca lavenātha śaravrātaiḥ prapīḍitam na śarma lebhe sakalaṁ sainyaṁ vīraprapūritam
कुश और लव दोनों द्वारा बाणों के समूहों से पीड़ित होकर, वीरों से भरी वह संपूर्ण सेना कहीं भी शांति नहीं पा सकी।
श्लोक 49 (padma.5.63.49)
इतस्ततः प्रभग्नं तद्बलं त्रस्तं पुनः पुनः । न कुत्रचिद्रणे स्थित्वा युद्धमैच्छद्बलान्वितः
itastataḥ prabhagnaṁ tadbalaṁ trastaṁ punaḥ punaḥ na kutracidraṇe sthitvā yuddhamaicchadbalānvitaḥ
वह सेना, इधर-उधर टूटी हुई, बार-बार त्रस्त होकर, बल से युक्त होते हुए भी, युद्ध में कहीं भी टिककर लड़ नहीं सकी।
श्लोक 50 (padma.5.63.50)
एतस्मिन्समये राजा शत्रुघ्नः परतापनः । कुशं वीरं ययौ योद्धुं तादृशं लवसन्निभम्
etasminsamaye rājā śatrughnaḥ paratāpanaḥ kuśaṁ vīraṁ yayau yoddhuṁ tādṛśaṁ lavasannibham
इसी समय शत्रुतापन राजा शत्रुघ्न, लव के समान उस वीर कुश से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े।
श्लोक 51 (padma.5.63.51)
कुशं दृष्ट्वा बलाक्रांतं राममूर्तिसमप्रभम् । रथे तिष्ठन्हेममये जगाद परवीरहा
kuśaṁ dṛṣṭvā balākrāṁtaṁ rāmamūrtisamaprabham rathe tiṣṭhanhemamaye jagāda paravīrahā
शत्रुवीरों के संहारक ने बल से युक्त, राम की मूर्ति के समान तेजस्वी कुश को स्वर्णरथ पर खड़ा देखकर कहा —
श्लोक 52 (padma.5.63.52)
शत्रुघ्न उवाच। कोऽसि त्वं सन्निभो भ्रात्रा लवेन सुमहाबलः । किं नामासि महावीर कस्ते तातः क्व ते प्रसूः
śatrughna uvāca ko'si tvaṁ sannibho bhrātrā lavena sumahābalaḥ kiṁ nāmāsi mahāvīra kaste tātaḥ kva te prasūḥ
शत्रुघ्न ने कहा — अपने भाई महाबली लव के समान तुम कौन हो? हे महावीर! तुम्हारा नाम क्या है? तुम्हारे पिता कौन हैं, और तुम्हारी माता कहाँ हैं?
श्लोक 53 (padma.5.63.53)
कथं वने द्विजैर्जुष्टे तिष्ठसि त्वं नरर्षभ । सर्वं शंस यथायुध्ये त्वया सह महाबल
kathaṁ vane dvijairjuṣṭe tiṣṭhasi tvaṁ nararṣabha sarvaṁ śaṁsa yathāyudhye tvayā saha mahābala
हे नरर्षभ! तुम ब्राह्मणों से सेवित वन में कैसे रहते हो? हे महाबल! मुझे यह सब बताओ, जिससे मैं तुमसे युद्ध कर सकूँ।
श्लोक 54 (padma.5.63.54)
इति वाक्यं समाकर्ण्य कुशः प्रोवाच भूमिपम् । मेघगंभीरया वाचा नादयन्रणमंडलम्
iti vākyaṁ samākarṇya kuśaḥ provāca bhūmipam meghagaṁbhīrayā vācā nādayanraṇamaṁḍalam
यह वचन सुनकर कुश ने मेघ के समान गंभीर वाणी से रणभूमि को गुँजाते हुए राजा से कहा —
श्लोक 55 (padma.5.63.55)
केवलं सुषुवे सीता पतिव्रतपरायणा । वने वसावो वाल्मीकेश्चरणार्चनतत्परौ
kevalaṁ suṣuve sītā pativrataparāyaṇā vane vasāvo vālmīkeścaraṇārcanatatparau
सीता ने ही, पूर्णतः पतिव्रता होकर, हमें जन्म दिया; हम दोनों वाल्मीकि के चरणों की सेवा में तत्पर होकर वन में निवास करते हैं।
श्लोक 56 (padma.5.63.56)
मातृसेवासमुद्युक्तौ सर्वविद्याविशारदौ । कुशो लव इति प्रख्यामागतौ भूपतेऽनघ
mātṛsevāsamudyuktau sarvavidyāviśāradau kuśo lava iti prakhyāmāgatau bhūpate'nagha
माता की सेवा में तत्पर, समस्त विद्याओं में निपुण, हे अनघ राजन्! हम कुश और लव के नाम से विख्यात हुए हैं।
श्लोक 57 (padma.5.63.57)
कस्त्वं वीरो रणश्लाघी किमर्थं हयसत्तमः । मुक्तोऽस्ति समरे त्वद्य जेतासि बलसंयुतः
kastvaṁ vīro raṇaślāghī kimarthaṁ hayasattamaḥ mukto'sti samare tvadya jetāsi balasaṁyutaḥ
तुम कौन वीर हो, युद्ध में शेखी बघारने वाले — यह श्रेष्ठ अश्व आज यहाँ क्यों छोड़ा गया है? क्या तुम बल से युक्त होकर विजय पाओगे?
श्लोक 58 (padma.5.63.58)
युध्यस्व त्वं मया सार्द्धं यदि वीरोऽसि भूमिप । इदानीं पातयिष्यामि भवंतं रणमूर्धनि
yudhyasva tvaṁ mayā sārddhaṁ yadi vīro'si bhūmipa idānīṁ pātayiṣyāmi bhavaṁtaṁ raṇamūrdhani
हे भूमिप! यदि तुम सचमुच वीर हो तो मुझसे युद्ध करो; अब मैं तुम्हें युद्ध के अग्रभाग में गिरा दूँगा।
श्लोक 59 (padma.5.63.59)
शत्रुघ्नस्तं सुतं ज्ञात्वा सीताया रामसंभवम् । विसिष्माय स्वयं चित्ते कोपाद्धनुरुपाददत्
śatrughnastaṁ sutaṁ jñātvā sītāyā rāmasaṁbhavam visiṣmāya svayaṁ citte kopāddhanurupādadat
शत्रुघ्न ने उसे सीता का, राम से उत्पन्न, वह पुत्र जानकर स्वयं हृदय में विस्मित हो उठे, और क्रोधवश धनुष उठाया।
श्लोक 60 (padma.5.63.60)
तमात्तधनुषं दृष्ट्वा कुशः कोपसमन्वितः । विस्फारयामास धनुः स्वीयं सुदृढमुत्तमम्
tamāttadhanuṣaṁ dṛṣṭvā kuśaḥ kopasamanvitaḥ visphārayāmāsa dhanuḥ svīyaṁ sudṛḍhamuttamam
उन्हें धनुष हाथ में लिए देखकर, क्रोध से युक्त कुश ने अपने सुदृढ़, उत्तम धनुष को खींचा।
श्लोक 61 (padma.5.63.61)
मुमोच बाणान्निशिताञ्छत्रुघ्नः सर्वशस्त्रवित् । तांश्चिच्छेद कुशः सर्वांल्लीलया प्रहसन्रणे
mumoca bāṇānniśitāñchatrughnaḥ sarvaśastravit tāṁściccheda kuśaḥ sarvāṁllīlayā prahasanraṇe
समस्त शस्त्रों में निपुण शत्रुघ्न ने तीक्ष्ण बाण छोड़े; कुश ने हँसते हुए, लीलामात्र में, युद्ध में उन सभी को काट डाला।
श्लोक 62 (padma.5.63.62)
बाणाश्च शतसाहस्राः कुशस्य च नृपस्य च । भुवनं व्याप्नुवन्सर्वं तच्चित्रमभवन्मुने
bāṇāśca śatasāhasrāḥ kuśasya ca nṛpasya ca bhuvanaṁ vyāpnuvansarvaṁ taccitramabhavanmune
कुश के तथा राजा के सैकड़ों-हजारों बाणों से संपूर्ण जगत् व्याप्त हो गया — हे मुने! वह एक अद्भुत दृश्य बन गया।
श्लोक 63 (padma.5.63.63)
अग्न्यस्त्रेण कुशः सर्वान्ददाह तरसा बली । शमयामास तं भूपः पर्जन्यास्त्रेण वीर्यवान्
agnyastreṇa kuśaḥ sarvāndadāha tarasā balī śamayāmāsa taṁ bhūpaḥ parjanyāstreṇa vīryavān
बलवान् कुश ने अग्नि-अस्त्र से उन सभी को शीघ्रता से जला डाला; शक्तिशाली राजा ने उसे पर्जन्यास्त्र से शांत किया।
श्लोक 64 (padma.5.63.64)
शमयामास तं भूपो वायव्येनातिविक्रमः । तदा वायुरभूत्तीव्रः सर्वतो रणमंडले । पर्वतास्त्रेण तं वायुं क्षोभयंतं समावृणोत्
śamayāmāsa taṁ bhūpo vāyavyenātivikramaḥ tadā vāyurabhūttīvraḥ sarvato raṇamaṁḍale parvatāstreṇa taṁ vāyuṁ kṣobhayaṁtaṁ samāvṛṇot
अत्यंत पराक्रमी राजा ने उसे वायव्यास्त्र से शांत किया; तब रणभूमि में सर्वत्र प्रचंड वायु उठी; उसने पर्वतास्त्र से उस क्षुब्ध करने वाली वायु को रोक दिया।
श्लोक 65 (padma.5.63.65)
वज्रास्त्रेण नृपः संख्ये चिच्छेद सनगोपलान् । तदा नारायणास्त्रं स मुमोच कुश उद्भटः । नारायणं तदा भूपं नाशकत्परिबाधितुम्
vajrāstreṇa nṛpaḥ saṁkhye ciccheda sanagopalān tadā nārāyaṇāstraṁ sa mumoca kuśa udbhaṭaḥ nārāyaṇaṁ tadā bhūpaṁ nāśakatparibādhitum
राजा ने उस युद्ध में वज्रास्त्र से पर्वतों को उनके शिखरों सहित काट डाला; तब उद्धत कुश ने नारायणास्त्र छोड़ा; राजा को तब नारायणास्त्र भी बाधित न कर सका।
श्लोक 66 (padma.5.63.66)
तदा प्रकुपितोऽत्यतं कुशः कोपपरायणः । उवाच भूपं शत्रुघ्नं महाबलपराक्रमम्
tadā prakupito'tyataṁ kuśaḥ kopaparāyaṇaḥ uvāca bhūpaṁ śatrughnaṁ mahābalaparākramam
तब अत्यंत क्रुद्ध, क्रोध से युक्त कुश ने बलपराक्रमी राजा शत्रुघ्न से कहा —
श्लोक 67 (padma.5.63.67)
जानामि त्वां महावीरं संग्रामे जयकारिणम् । यत्त्वां नारायणास्त्रं मे न बबाधे भयानकम्
jānāmi tvāṁ mahāvīraṁ saṁgrāme jayakāriṇam yattvāṁ nārāyaṇāstraṁ me na babādhe bhayānakam
मैं जानता हूँ कि तुम महावीर हो, युद्ध में विजय लाने वाले, कि मेरा भयंकर नारायणास्त्र तुम्हें बाधित न कर सका।
श्लोक 68 (padma.5.63.68)
इदानीं पातयाम्यद्य भूमौ त्वां नृपते शरैः । त्रिभिश्चेन्नकरोम्येतत्प्रतिज्ञां तर्हि मे शृणु
idānīṁ pātayāmyadya bhūmau tvāṁ nṛpate śaraiḥ tribhiścennakaromyetatpratijñāṁ tarhi me śṛṇu
अब, हे राजन्! आज ही मैं तुम्हें तीन बाणों से भूमि पर गिरा दूँगा; यदि मैं ऐसा न करूँ, तो मेरी यह प्रतिज्ञा सुनो —
श्लोक 69 (padma.5.63.69)
यो मनुष्यवपुः प्राप्य दुर्लभं पुण्यकोटिभिः । तन्नाद्रियेत संमोहात्तस्य मेस्त्वत्र पातकम्
yo manuṣyavapuḥ prāpya durlabhaṁ puṇyakoṭibhiḥ tannādriyeta saṁmohāttasya mestvatra pātakam
— जो कोई, करोड़ों पुण्यों से भी दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त करके, मोहवश उसका आदर न करे — उसी का पाप यहाँ मुझे लगे।
श्लोक 70 (padma.5.63.70)
सावधानो भवानत्र भवतु प्रधनांगणे । पातयामि क्षितौ सद्य इत्युक्त्वा स्वशरासने
sāvadhāno bhavānatra bhavatu pradhanāṁgaṇe pātayāmi kṣitau sadya ityuktvā svaśarāsane
अब यहाँ रणभूमि में सावधान हो जाओ; मैं अभी तुम्हें भूमि पर गिरा दूँगा। यह कहकर उन्होंने अपने धनुष पर —
श्लोक 71 (padma.5.63.71)
शरं संरोपयामास घोरं कालानलप्रभम् । लक्षीकृत्य रिपोर्वक्षो विपुलं कठिनं महत्
śaraṁ saṁropayāmāsa ghoraṁ kālānalaprabham lakṣīkṛtya riporvakṣo vipulaṁ kaṭhinaṁ mahat
— प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी एक भयंकर बाण चढ़ाया, शत्रु के विशाल, कठोर, महान् वक्षस्थल का लक्ष्य साधते हुए।
श्लोक 72 (padma.5.63.72)
तं संधितं शरं दृष्ट्वा शत्रुघ्नः कोपमूर्च्छितः । मुमोच बाणान्निशितान्कुशत्वग्भेदकारकान्
taṁ saṁdhitaṁ śaraṁ dṛṣṭvā śatrughnaḥ kopamūrcchitaḥ mumoca bāṇānniśitānkuśatvagbhedakārakān
उस चढ़ाए गए बाण को देखकर, क्रोध से अभिभूत शत्रुघ्न ने कुश की त्वचा को भेदने में समर्थ तीक्ष्ण बाण छोड़े।
श्लोक 73 (padma.5.63.73)
स बाणो हृदयं तस्य भेत्तुं तत्प्रचचाल वै । घोररूपो वह्निसमआशीविषवदुच्छ्वसन्
sa bāṇo hṛdayaṁ tasya bhettuṁ tatpracacāla vai ghorarūpo vahnisamaāśīviṣavaducchvasan
वह बाण, उसके हृदय को बींधने के लिए, कंपित होकर आगे बढ़ा, भयंकर रूप वाला, अग्नि के समान, विषैले सर्प के समान फुफकारता हुआ।
श्लोक 74 (padma.5.63.74)
स बाणो नृपवर्येण रामं स्मृत्वाशुलक्षितः । चिच्छेद कुशमुक्तं स सायकं शितपर्वकम्
sa bāṇo nṛpavaryeṇa rāmaṁ smṛtvāśulakṣitaḥ ciccheda kuśamuktaṁ sa sāyakaṁ śitaparvakam
श्रेष्ठ राजा द्वारा राम का स्मरण करके शीघ्रता से लक्ष्य साधे गए उस बाण ने कुश द्वारा छोड़े गए तीक्ष्ण, सुसंधित बाण को काट डाला।
श्लोक 75 (padma.5.63.75)
तदात्यंतं प्रकुपितः कुशो बाणस्य कृंतनात् । अपरं सायकं चापे दधार शितपर्वकम्
tadātyaṁtaṁ prakupitaḥ kuśo bāṇasya kṛṁtanāt aparaṁ sāyakaṁ cāpe dadhāra śitaparvakam
तब अपने बाण के कट जाने पर अत्यंत क्रुद्ध होकर कुश ने अपने धनुष पर दूसरा तीक्ष्ण, सुसंधित बाण चढ़ाया।
श्लोक 76 (padma.5.63.76)
स यावत्तदुरो भेत्तुं करोति च बलोद्धुरः । तं तावदच्छिनत्तस्य शरं कालानलप्रभम्
sa yāvattaduro bhettuṁ karoti ca baloddhuraḥ taṁ tāvadacchinattasya śaraṁ kālānalaprabham
जब तक वह उद्धत, बलवान् उसके वक्षस्थल को बींधने का प्रयत्न कर रहा था, तब तक उसने (शत्रुघ्न ने) प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी उस बाण को काट डाला।
श्लोक 77 (padma.5.63.77)
तदा कुशो मातृपादौ स्मृत्वा रोषसमन्वितः । तृतीयं चापके स्वीये दधार शरमद्भुतम्
tadā kuśo mātṛpādau smṛtvā roṣasamanvitaḥ tṛtīyaṁ cāpake svīye dadhāra śaramadbhutam
तब कुश ने अपनी माता के चरणों का स्मरण करके, क्रोध से युक्त होकर, अपने धनुष पर तीसरा अद्भुत बाण चढ़ाया।
श्लोक 78 (padma.5.63.78)
शत्रुघ्नस्तमपि क्षिप्रं च्छेत्तुं बाणं समाददे । तावद्विद्धः शरेणासौ पपात धरणीतले
śatrughnastamapi kṣipraṁ cchettuṁ bāṇaṁ samādade tāvadviddhaḥ śareṇāsau papāta dharaṇītale
शत्रुघ्न ने भी उसे काटने के लिए शीघ्रता से एक बाण उठाया; परंतु तब तक उस बाण से बिंधकर वे पृथ्वीतल पर गिर पड़े।
श्लोक 79 (padma.5.63.79)
हाहाकारो महानासीच्छत्रुघ्ने विनिपातिते । जयमापकुशस्तत्र स्वबाहुबलदर्पितः
hāhākāro mahānāsīcchatrughne vinipātite jayamāpakuśastatra svabāhubaladarpitaḥ
शत्रुघ्न के गिरने पर महान् हाहाकार मच गया; अपनी भुजाओं के बल पर गर्वित कुश ने वहाँ विजय प्राप्त की।