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पाताल खण्ड · अध्याय 64

सेना का पुनर्जीवन

अध्याय 63अध्याय-सूचीअध्याय 65

श्लोक 1 (padma.5.64.1)

शेष उवाच। शत्रुघ्नं पतितं वीक्ष्य सुरथः प्रवरो नृपः । प्रययौ मणिना सृष्टे रथे तिष्ठन्महाद्भुते

śeṣa uvāca śatrughnaṁ patitaṁ vīkṣya surathaḥ pravaro nṛpaḥ prayayau maṇinā sṛṣṭe rathe tiṣṭhanmahādbhute

शेष जी ने कहा — शत्रुघ्न को गिरा देखकर श्रेष्ठ राजा सुरथ मणि-निर्मित, अत्यंत अद्भुत रथ पर सवार होकर आगे बढ़े।

श्लोक 2 (padma.5.64.2)

पुष्कलस्तु रणे पूर्वं पातितः स विचारयन् । लवं ययौ तदा योद्धुं महावीरबलोन्नतम्

puṣkalastu raṇe pūrvaṁ pātitaḥ sa vicārayan lavaṁ yayau tadā yoddhuṁ mahāvīrabalonnatam

पुष्कल, जो युद्ध में पहले गिराए गए थे, यह विचार करके तब महावीर-बल से उन्नत लव से युद्ध करने गए।

श्लोक 3 (padma.5.64.3)

सुरथः कुशमासाद्य बाणान्मुंचन्ननेकधा । व्यथयामास समरे महावीरशिरोमणिः

surathaḥ kuśamāsādya bāṇānmuṁcannanekadhā vyathayāmāsa samare mahāvīraśiromaṇiḥ

सुरथ, कुश के पास पहुँचकर, अनेक प्रकार से बाण छोड़ने लगे; उस महावीरशिरोमणि ने उन्हें युद्ध में पीड़ित कर दिया।

श्लोक 4 (padma.5.64.4)

सुरथं विरथं चक्रे बाणैर्दशभिरुच्छिखैः । धनुश्चिच्छेद तरसा सुदृढं गुणपूरितम्

surathaṁ virathaṁ cakre bāṇairdaśabhirucchikhaiḥ dhanuściccheda tarasā sudṛḍhaṁ guṇapūritam

उन्होंने दस प्रज्वलित बाणों से सुरथ को रथहीन कर दिया, और उनके सुदृढ़, प्रत्यंचायुक्त धनुष को शीघ्रता से काट डाला।

श्लोक 5 (padma.5.64.5)

अस्त्रप्रत्यस्त्रसंहारैः क्षैपणैः प्रतिक्षेपणैः । अभवत्तुमुलं युद्धं वीराणां रोमहर्षणम्

astrapratyastrasaṁhāraiḥ kṣaipaṇaiḥ pratikṣepaṇaiḥ abhavattumulaṁ yuddhaṁ vīrāṇāṁ romaharṣaṇam

अस्त्र-प्रत्यस्त्रों के संहार से, प्रहार और प्रत्याघातों से एक ऐसा घमासान युद्ध हुआ, जो वीरों के रोंगटे खड़े कर देने वाला था।

श्लोक 6 (padma.5.64.6)

अत्यंतं समरोद्युक्ते सुरथे दुर्जये नृपे । कुशः संचिंतयामास किंकर्तव्यं रणे मया

atyaṁtaṁ samarodyukte surathe durjaye nṛpe kuśaḥ saṁciṁtayāmāsa kiṁkartavyaṁ raṇe mayā

राजा सुरथ के, जो दुर्जय थे, इस युद्ध में अत्यंत उत्साहपूर्वक लगे रहने पर कुश ने सोचा — अब मुझे इस युद्ध में क्या करना चाहिए?

श्लोक 7 (padma.5.64.7)

विचार्य निशितं घोरं सायकं समुपाददे । हननाय नृपस्यास्य महाबलसमन्वितः

vicārya niśitaṁ ghoraṁ sāyakaṁ samupādade hananāya nṛpasyāsya mahābalasamanvitaḥ

विचार करके, बल से युक्त उन्होंने इस राजा के वध के लिए एक तीक्ष्ण, भयंकर बाण उठाया।

श्लोक 8 (padma.5.64.8)

तमागतं शरं दृष्ट्वा कालानलसमप्रभम् । छेत्तुं मतिं चकाराशु तावल्लग्नो महाशरः

tamāgataṁ śaraṁ dṛṣṭvā kālānalasamaprabham chettuṁ matiṁ cakārāśu tāvallagno mahāśaraḥ

उस आते हुए, प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी बाण को देखकर उन्होंने तुरंत उसे काटने का निश्चय किया; परंतु तब तक वह महान् बाण उनमें आ लगा।

श्लोक 9 (padma.5.64.9)

मुमूर्च्छ समरे वीरो महावीरबलस्ततः । पपात स्यंदनोपस्थे सारथिस्तमुपाहरत्

mumūrccha samare vīro mahāvīrabalastataḥ papāta syaṁdanopasthe sārathistamupāharat

वह महावीर-बल वाला वीर तब युद्ध में मूर्च्छित हो गया; वह अपने रथ पर गिर पड़ा, और उसका सारथि उसे उठा ले गया।

श्लोक 10 (padma.5.64.10)

सुरथे पतिते दृष्ट्वा कुशं जयसमन्वितम् । त्रासयंतं वीरगणानियाय पवनात्मजः

surathe patite dṛṣṭvā kuśaṁ jayasamanvitam trāsayaṁtaṁ vīragaṇāniyāya pavanātmajaḥ

सुरथ को गिरा हुआ, तथा कुश को विजयी और वीर-समूहों को त्रस्त करते हुए देखकर पवनपुत्र आगे बढ़े।

श्लोक 11 (padma.5.64.11)

समीरसूनुं प्रबलमायांतं वीक्ष्य वानरम् । जहास दर्शयन्दंतान्कोपयन्निव तं क्रुधा

samīrasūnuṁ prabalamāyāṁtaṁ vīkṣya vānaram jahāsa darśayandaṁtānkopayanniva taṁ krudhā

उस बलवान् वानर, पवनपुत्र को आते देखकर उन्होंने दाँत दिखाते हुए हँसा, मानो क्रोधवश उन्हें उकसाते हुए।

श्लोक 12 (padma.5.64.12)

उवाच च हनूमंतमेहि त्वं मम संमुखम् । भेत्स्ये बाणसहस्रेण मृतो यास्यसि यामिनीम्

uvāca ca hanūmaṁtamehi tvaṁ mama saṁmukham bhetsye bāṇasahasreṇa mṛto yāsyasi yāminīm

और उन्होंने हनुमान से कहा — मेरे सम्मुख आओ; मैं तुम्हें सहस्र बाणों से बींध दूँगा — मृत होकर तुम रात्रि को चले जाओगे।

श्लोक 13 (padma.5.64.13)

इत्युक्तो हनुमाञ्ज्ञात्वा रामसूनुं महाबलम् । स्वामिकार्यं प्रकर्तव्यमिति कृत्वा प्रधावितः

ityukto hanumāñjñātvā rāmasūnuṁ mahābalam svāmikāryaṁ prakartavyamiti kṛtvā pradhāvitaḥ

इस प्रकार कहे जाने पर हनुमान ने उसे राम का महाबली पुत्र जानकर, यह सोचकर कि स्वामी का कार्य करना ही है, आगे दौड़ लगाई।

श्लोक 14 (padma.5.64.14)

शालमुत्पाट्य तरसा विशालं शतशाखिनम् । कुशं वक्षसि संलक्ष्य ययौ योद्धुं महाबलः

śālamutpāṭya tarasā viśālaṁ śataśākhinam kuśaṁ vakṣasi saṁlakṣya yayau yoddhuṁ mahābalaḥ

तेजी से सौ शाखाओं वाले विशाल शाल वृक्ष को उखाड़कर, कुश के वक्षस्थल का लक्ष्य साधते हुए वह बलवान् युद्ध करने आगे बढ़ा।

श्लोक 15 (padma.5.64.15)

शालहस्तं समायांतं हनूमंतं महाबलम् । त्रिभिः क्षुरप्रैर्विव्याध हृदि चंद्रोपमैर्बली

śālahastaṁ samāyāṁtaṁ hanūmaṁtaṁ mahābalam tribhiḥ kṣuraprairvivyādha hṛdi caṁdropamairbalī

शाल वृक्ष हाथ में लिए महाबली हनुमान को इस प्रकार आते देखकर उस बलवान् ने चंद्रमा के समान तीन क्षुरप्र बाणों से उसके हृदय को बींध दिया।

श्लोक 16 (padma.5.64.16)

स बाणविद्धस्तरसा कुशेन बलशालिना । शालेन हृदि संजघ्ने दंतान्निष्पिष्य मारुतिः

sa bāṇaviddhastarasā kuśena balaśālinā śālena hṛdi saṁjaghne daṁtānniṣpiṣya mārutiḥ

उस बाण से बिंधकर बलशाली मारुति ने दाँत पीसते हुए तुरंत शाल वृक्ष से कुश के हृदय पर प्रहार किया।

श्लोक 17 (padma.5.64.17)

शालाहतस्तदा बालः किंचिन्नाकंपत स्मयात् । तदा वीराः प्रशंसां तु प्रचक्रुस्तस्य बाल्यतः

śālāhatastadā bālaḥ kiṁcinnākaṁpata smayāt tadā vīrāḥ praśaṁsāṁ tu pracakrustasya bālyataḥ

उस शाल वृक्ष से आहत होकर वह बालक अपने अभिमान के कारण तनिक भी नहीं काँपा; तब वीरों ने उनकी इस बाल्यावस्था के कारण उनकी प्रशंसा की।

श्लोक 18 (padma.5.64.18)

स शालेन हतो वीरः संहारास्त्रं समाददे । संहन्तुं वैरिणं कोपात्कुशः स परमास्त्रवित्

sa śālena hato vīraḥ saṁhārāstraṁ samādade saṁhantuṁ vairiṇaṁ kopātkuśaḥ sa paramāstravit

उस शाल वृक्ष से आहत होकर उस परमास्त्रवेत्ता वीर कुश ने शत्रु के वध के लिए क्रोधवश संहार-अस्त्र उठाया।

श्लोक 19 (padma.5.64.19)

संहारास्त्रं समालोक्य दुर्जयं कुशमोचितम् । दध्यौ रामं स्वमनसा भक्तविघ्नविनाशकम्

saṁhārāstraṁ samālokya durjayaṁ kuśamocitam dadhyau rāmaṁ svamanasā bhaktavighnavināśakam

कुश द्वारा छोड़े गए उस दुर्जय संहार-अस्त्र को देखकर उन्होंने (हनुमान ने) अपने मन में भक्तों के विघ्न-विनाशक राम का ध्यान किया।

श्लोक 20 (padma.5.64.20)

तदा मुक्तं कुशेनाशु तदस्त्रं हृदि मारुतेः । लग्नं महाव्यथाकारि तेन मूर्च्छामितः पुनः

tadā muktaṁ kuśenāśu tadastraṁ hṛdi māruteḥ lagnaṁ mahāvyathākāri tena mūrcchāmitaḥ punaḥ

तब कुश द्वारा शीघ्रता से छोड़ा गया वह अस्त्र मारुति के हृदय में जा लगा, अत्यंत पीड़ा उत्पन्न करते हुए; उससे वे पुनः मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 21 (padma.5.64.21)

मूर्च्छां प्राप्तं तु तं दृष्ट्वा प्लवंगं बलसंयुतः । विव्याध सायकैस्तीक्ष्णैः सैन्यं तत्सकलं महत्

mūrcchāṁ prāptaṁ tu taṁ dṛṣṭvā plavaṁgaṁ balasaṁyutaḥ vivyādha sāyakaistīkṣṇaiḥ sainyaṁ tatsakalaṁ mahat

उस बलशाली वानर को इस प्रकार मूर्च्छित गिरा देखकर उन्होंने (कुश ने) उस संपूर्ण विशाल सेना को तीक्ष्ण बाणों से बींध दिया।

श्लोक 22 (padma.5.64.22)

तस्य बाणायुतैर्भग्नं बलं सर्वं रणांगणे । पलायनपरं जातं चतुरंगसमन्वितम्

tasya bāṇāyutairbhagnaṁ balaṁ sarvaṁ raṇāṁgaṇe palāyanaparaṁ jātaṁ caturaṁgasamanvitam

उनके दस सहस्र बाणों से चतुरंगिणी वह संपूर्ण सेना उस रणभूमि में टूट गई, और भागने लगी।

श्लोक 23 (padma.5.64.23)

तदा कपिपतिः कोपात्सुग्रीवो रक्षको महान् । अभ्यधावन्नगान्नैकानुत्पाट्य कुशमुद्भटम्

tadā kapipatiḥ kopātsugrīvo rakṣako mahān abhyadhāvannagānnaikānutpāṭya kuśamudbhaṭam

तब वानरराज महान् रक्षक सुग्रीव क्रोधवश अनेक पर्वत उखाड़कर उद्धत कुश की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 24 (padma.5.64.24)

कुशः सर्वान्प्रचिच्छेद लीलया प्रहसन्नगान् । पुनरप्यागतान्वृक्षांश्चिच्छेद तरसा बली

kuśaḥ sarvānpraciccheda līlayā prahasannagān punarapyāgatānvṛkṣāṁściccheda tarasā balī

कुश ने लीलामात्र में हँसते हुए उन सभी पर्वतों को काट डाला; और पुनः जो भी वृक्ष आए, उन सभी को भी उस बलवान् ने शीघ्रता से काट डाला।

श्लोक 25 (padma.5.64.25)

अनेकबाणव्यथितः सुग्रीवः समरांगणे । जग्राह पर्वतं घोरं कुशमस्तकमध्यतः

anekabāṇavyathitaḥ sugrīvaḥ samarāṁgaṇe jagrāha parvataṁ ghoraṁ kuśamastakamadhyataḥ

उस रणभूमि में अनेक बाणों से पीड़ित होकर सुग्रीव ने एक भयंकर पर्वत उठाया, कुश के सिर का लक्ष्य साधते हुए।

श्लोक 26 (padma.5.64.26)

कुशस्तं नगमायांतं वीक्ष्य बाणैरनेकधा । निष्पिपेष चकाराशु महारुद्रांगयोग्यताम्

kuśastaṁ nagamāyāṁtaṁ vīkṣya bāṇairanekadhā niṣpipeṣa cakārāśu mahārudrāṁgayogyatām

उस आते हुए पर्वत को देखकर कुश ने अनेक बाणों से उसे शीघ्रता से चूर्ण कर दिया, मानो वह महारुद्र के शरीर पर लगाने योग्य ही रह गया हो।

श्लोक 27 (padma.5.64.27)

सुग्रीवस्तन्महत्कर्म दृष्ट्वा बालेन निर्मितम् । जयाशाप्रतिनिर्वृत्तो बभूव समरांगणे

sugrīvastanmahatkarma dṛṣṭvā bālena nirmitam jayāśāpratinirvṛtto babhūva samarāṁgaṇe

सुग्रीव उस बालक द्वारा किए गए इस महान् कार्य को देखकर, उस रणभूमि में विजय की आशा से विमुख हो उठे।

श्लोक 28 (padma.5.64.28)

रणमध्ये दुराक्रांतं कुशं लांगूलताडकम् । अत्यमर्षीरुषाक्रांतस्तं हंतुं नगमाददे

raṇamadhye durākrāṁtaṁ kuśaṁ lāṁgūlatāḍakam atyamarṣīruṣākrāṁtastaṁ haṁtuṁ nagamādade

युद्ध के मध्य दुर्दम्य, पूँछ के प्रहारों से भी अजेय कुश को देखकर, अत्यंत असहनशील क्रोध से आक्रांत होकर उन्होंने उसे मारने के लिए पर्वत उठाया।

श्लोक 29 (padma.5.64.29)

आत्मानं हंतुमुद्युक्तं वीक्ष्य सुग्रीवमादरात् । ताडयामास बहुभिः सायकैः शितपर्वभिः

ātmānaṁ haṁtumudyuktaṁ vīkṣya sugrīvamādarāt tāḍayāmāsa bahubhiḥ sāyakaiḥ śitaparvabhiḥ

सुग्रीव को इस प्रकार अपने वध पर उद्यत देखकर उन्होंने (कुश ने) आदरपूर्वक ही उस पर अनेक तीक्ष्ण, सुसंधित बाणों से प्रहार किया।

श्लोक 30 (padma.5.64.30)

स ताडितो बहुविधैः शरैः पीडासमन्वितः । कुशं हंतुं समारब्धो ययौ शालं समाददे

sa tāḍito bahuvidhaiḥ śaraiḥ pīḍāsamanvitaḥ kuśaṁ haṁtuṁ samārabdho yayau śālaṁ samādade

उन अनेक प्रकार के बाणों से आहत, पीड़ा से युक्त होकर भी वे कुश का वध करने के लिए उद्यत हुए, और शाल वृक्ष उठा लिया।

श्लोक 31 (padma.5.64.31)

तदापि च कुशो वीरो वारुणास्त्रं समाददे । बबंध तं च पाशेन दृढेन स लवाग्रजः

tadāpi ca kuśo vīro vāruṇāstraṁ samādade babaṁdha taṁ ca pāśena dṛḍhena sa lavāgrajaḥ

तब कुश, वह वीर, उसके विरुद्ध भी वारुणास्त्र उठाया, और लव के उस अग्रज ने उसे दृढ़ पाश से बाँध दिया।

श्लोक 32 (padma.5.64.32)

स बद्धः पाशकैः स्निग्धैः कुशेन बलशालिना । पपात रणमध्ये वै महावीरैरलंकृते

sa baddhaḥ pāśakaiḥ snigdhaiḥ kuśena balaśālinā papāta raṇamadhye vai mahāvīrairalaṁkṛte

बलशाली कुश द्वारा उन दृढ़ बंधनों से बँधकर, वह महावीरों से सुशोभित उस युद्ध के मध्य गिर पड़ा।

श्लोक 33 (padma.5.64.33)

सुग्रीवं पतितं दृष्ट्वा वीराः सर्वत्र दुद्रुवुः । जयमाप लवभ्राता महावीरशिरोमणिः

sugrīvaṁ patitaṁ dṛṣṭvā vīrāḥ sarvatra dudruvuḥ jayamāpa lavabhrātā mahāvīraśiromaṇiḥ

सुग्रीव को गिरा देखकर वीर चारों ओर भाग खड़े हुए; लव के उस भाई, महावीरशिरोमणि, ने विजय प्राप्त की।

श्लोक 34 (padma.5.64.34)

तावल्लवो भटाञ्जित्वा पुष्कलं चांगदं तथा । प्रतापाग्र्यं वीरमणिं तथान्यानपि भूभुजः

tāvallavo bhaṭāñjitvā puṣkalaṁ cāṁgadaṁ tathā pratāpāgryaṁ vīramaṇiṁ tathānyānapi bhūbhujaḥ

इतने में लव ने योद्धाओं को जीत लिया — पुष्कल तथा अंगद, प्रतापाग्र्य, वीरमणि तथा अन्य भी राजाओं को —

श्लोक 35 (padma.5.64.35)

जयं प्राप्य रणे वीरो लवो भ्रातरमागमत् । संग्रामे जयकर्तारं वैरिकोटिनिपातकम्

jayaṁ prāpya raṇe vīro lavo bhrātaramāgamat saṁgrāme jayakartāraṁ vairikoṭinipātakam

— युद्ध में विजय प्राप्त करके वह वीर अपने भाई के पास आया, जो युद्ध में विजयी, करोड़ों शत्रुओं के संहारक थे।

श्लोक 36 (padma.5.64.36)

परस्परं प्रहृषितौ परिरंभं प्रकुर्वतः । जयं प्राप्तौ तदा वार्तां मुने चक्रतुरुन्मदौ

parasparaṁ prahṛṣitau pariraṁbhaṁ prakurvataḥ jayaṁ prāptau tadā vārtāṁ mune cakraturunmadau

दोनों परस्पर हर्षित होकर एक-दूसरे का आलिंगन करते हुए, विजय प्राप्त करके, हे मुने! तब उन्मत्त आनंद से भरकर परस्पर बातें करने लगे।

श्लोक 37 (padma.5.64.37)

लव उवाच। भ्रातस्तव प्रसादेन निस्तीर्णो रणतोयधिः । इदानीं वीररणकं शोधयावः सुशोभितम्

lava uvāca bhrātastava prasādena nistīrṇo raṇatoyadhiḥ idānīṁ vīraraṇakaṁ śodhayāvaḥ suśobhitam

लव ने कहा — हे भ्राता! आपकी कृपा से मैंने इस युद्ध-सागर को पार किया; अब आइए हम इस सुशोभित रणभूमि को वीरों से रहित करें।

श्लोक 38 (padma.5.64.38)

इत्युक्त्वा त्वरितं वीरो जग्मतुस्तौ कुशीलवौ । राज्ञो मौलिमणिं चित्रं जग्राह कनकाचितम्

ityuktvā tvaritaṁ vīro jagmatustau kuśīlavau rājño maulimaṇiṁ citraṁ jagrāha kanakācitam

यह कहकर वे दोनों वीर, कुश और लव, शीघ्रता से गए, और राजा के स्वर्णजड़ित, अद्भुत मौलि-रत्न को ले लिया।

श्लोक 39 (padma.5.64.39)

पुष्कलस्य लवो वीरो जग्राह मुकुटं शुभम् । अंगदे च महानर्घ्ये शत्रुघ्नस्यापरस्य च

puṣkalasya lavo vīro jagrāha mukuṭaṁ śubham aṁgade ca mahānarghye śatrughnasyāparasya ca

वीर लव ने पुष्कल का शुभ मुकुट लिया, तथा अंगद और उस दूसरे, शत्रुघ्न, के अत्यंत बहुमूल्य अंगद (भुजबंद) —

श्लोक 40 (padma.5.64.40)

गृहीत्वा शस्त्रसंघातं हनूमंतं कपीश्वरम् । सुग्रीवं सविधे गत्वा उभावपि बबंधतुः

gṛhītvā śastrasaṁghātaṁ hanūmaṁtaṁ kapīśvaram sugrīvaṁ savidhe gatvā ubhāvapi babaṁdhatuḥ

— और समस्त शस्त्र-समूह लेकर, कपीश्वर हनुमान तथा सुग्रीव के समीप जाकर, उन्होंने दोनों को बाँध लिया।

श्लोक 41 (padma.5.64.41)

पुच्छे वायुसुतस्यायं गृहीत्वा तु कुशानुजः । भ्रातरं प्रत्युवाचेदं नेष्यामि स्वकमंदिरम्

pucche vāyusutasyāyaṁ gṛhītvā tu kuśānujaḥ bhrātaraṁ pratyuvācedaṁ neṣyāmi svakamaṁdiram

कुश के अनुज ने पवनपुत्र की पूँछ पकड़कर अपने भाई से यह कहा — मैं इसे अपने ही निवास में ले चलूँगा —

श्लोक 42 (padma.5.64.42)

आवयोर्जननी प्रीत्यै गृहीत्वा पुच्छके त्वहम् । क्रीडार्थमृषिपुत्राणां कौतुकार्थं ममैव च

āvayorjananī prītyai gṛhītvā pucchake tvaham krīḍārthamṛṣiputrāṇāṁ kautukārthaṁ mamaiva ca

— अपनी माता की प्रसन्नता के लिए, पूँछ पकड़कर; ऋषि-पुत्रों की क्रीड़ा के लिए, तथा मेरे अपने कौतूहल के लिए भी।

श्लोक 43 (padma.5.64.43)

एतच्छ्रुत्वा ततो वाक्यमुवाच च कुशो लवम् । अहमेनं ग्रहीष्यामि वानरं बलिनं दृढम्

etacchrutvā tato vākyamuvāca ca kuśo lavam ahamenaṁ grahīṣyāmi vānaraṁ balinaṁ dṛḍham

यह सुनकर कुश ने तब लव से यह वचन कहा — मैं इस बलशाली, दृढ़ वानर को स्वयं ले लूँगा।

श्लोक 44 (padma.5.64.44)

इत्येवं भाषमाणौ तौ बद्ध्वा तौ बलिनां वरौ । पुच्छयोर्बलिनौ धृत्वा जग्मतुः स्वाश्रमं प्रति

ityevaṁ bhāṣamāṇau tau baddhvā tau balināṁ varau pucchayorbalinau dhṛtvā jagmatuḥ svāśramaṁ prati

इस प्रकार कहते हुए वे दोनों बलवानों में श्रेष्ठ, उन दोनों को बाँधकर, दोनों बलवानों को पूँछ से पकड़े हुए, अपने आश्रम की ओर चल पड़े।

श्लोक 45 (padma.5.64.45)

स्वाश्रमाय प्रगच्छंतौ वीक्ष्य तौ कपिसत्तमौ । कंपमानौ जगदतुरन्योन्यं भीतया गिरा

svāśramāya pragacchaṁtau vīkṣya tau kapisattamau kaṁpamānau jagadaturanyonyaṁ bhītayā girā

उन दोनों वानरश्रेष्ठों को इस प्रकार आश्रम की ओर जाते देखकर, काँपते हुए, वे भयभीत वाणी में परस्पर कहने लगे —

श्लोक 46 (padma.5.64.46)

हनूमान्कपिराजानं प्रत्युवाच भयार्द्रधीः । एतौ रामसुतावस्मान्नेष्यतः स्वाश्रमं प्रति

hanūmānkapirājānaṁ pratyuvāca bhayārdradhīḥ etau rāmasutāvasmānneṣyataḥ svāśramaṁ prati

भयार्द्र बुद्धि वाले हनुमान ने वानरराज से कहा — ये दोनों राम के पुत्र हमें अपने आश्रम की ओर ले जा रहे हैं।

श्लोक 47 (padma.5.64.47)

मया पूर्वं कृतं कर्म जानकीं प्रतिगच्छता । तत्र मे जानकी देवी संमुखाभून्मनोहरा

mayā pūrvaṁ kṛtaṁ karma jānakīṁ pratigacchatā tatra me jānakī devī saṁmukhābhūnmanoharā

पहले, जब मैं जानकी की खोज में गया था, उस कार्य को करते हुए, वहाँ मेरे सम्मुख जानकी देवी, वे मनोहर, आई थीं —

श्लोक 48 (padma.5.64.48)

सा मां द्रक्ष्यति वैदेही बद्धं पाशेन वैरिणा । तदा हसिष्यति वरा त्रपा मेऽत्र भविष्यति

sā māṁ drakṣyati vaidehī baddhaṁ pāśena vairiṇā tadā hasiṣyati varā trapā me'tra bhaviṣyati

— वह वैदेही अब मुझे शत्रु के पाश से बँधा हुआ देखेंगी; वह श्रेष्ठ स्त्री हँसेंगी, और मुझे यहाँ लज्जा होगी।

श्लोक 49 (padma.5.64.49)

मया किमत्र कर्तव्यं प्राणत्यागो भविष्यति । महद्दुःखं चापतितं स रामः किं करिष्यति

mayā kimatra kartavyaṁ prāṇatyāgo bhaviṣyati mahadduḥkhaṁ cāpatitaṁ sa rāmaḥ kiṁ kariṣyati

यहाँ मुझे क्या करना चाहिए? मेरे प्राणों का त्याग ही होगा; यह मुझ पर पड़ा हुआ महान् दुःख है — राम क्या करेंगे?

श्लोक 50 (padma.5.64.50)

सुग्रीवस्तद्वचः श्रुत्वा ममाप्येवं महाकपे । नेष्यते यदि मामेवं निधनं तु भविष्यति

sugrīvastadvacaḥ śrutvā mamāpyevaṁ mahākape neṣyate yadi māmevaṁ nidhanaṁ tu bhaviṣyati

उसका यह वचन सुनकर सुग्रीव ने कहा — हे महाकपि! मेरे लिए भी वैसा ही है; यदि मुझे भी इस प्रकार ले जाया जाता है, तो मेरे लिए भी मृत्यु ही होगी।

श्लोक 51 (padma.5.64.51)

एवं कथयतोरेव ह्यन्योन्यं भयभीतयोः । कुशो लवश्च भवनं मातुः प्रापतुरोजसा

evaṁ kathayatoreva hyanyonyaṁ bhayabhītayoḥ kuśo lavaśca bhavanaṁ mātuḥ prāpaturojasā

इस प्रकार परस्पर बोलते हुए, दोनों भयभीत, कुश और लव अपनी पूरी शक्ति से माता के निवास पर जा पहुँचे।

श्लोक 52 (padma.5.64.52)

तावायातौ समीक्ष्यैव जहर्ष जननी तयोः । अन्योन्यं परमप्रीत्या परिरेभे निजौ सुतौ

tāvāyātau samīkṣyaiva jaharṣa jananī tayoḥ anyonyaṁ paramaprītyā parirebhe nijau sutau

उन्हें आया हुआ देखकर उनकी माता हर्षित हुईं; परम प्रेम से उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को बारी-बारी से गले लगाया।

श्लोक 53 (padma.5.64.53)

ताभ्यां पुच्छगृहीतौ तौ वानरौ वीक्ष्य जानकी । हनूमंतं च सुग्रीवं सर्ववीरं कपीश्वरम्

tābhyāṁ pucchagṛhītau tau vānarau vīkṣya jānakī hanūmaṁtaṁ ca sugrīvaṁ sarvavīraṁ kapīśvaram

अपने पुत्रों द्वारा पूँछ से पकड़े गए उन दोनों वानरों को — हनुमान तथा सुग्रीव, समस्त वानरों के श्रेष्ठ स्वामी को — देखकर जानकी —

श्लोक 54 (padma.5.64.54)

जहास पाशबद्धौ तौ वीक्षमाणा वरांगना । उवाच च विमोक्षार्थं वदंती वचनं वरम्

jahāsa pāśabaddhau tau vīkṣamāṇā varāṁganā uvāca ca vimokṣārthaṁ vadaṁtī vacanaṁ varam

— वह श्रेष्ठ स्त्री, उन्हें पाश से बँधा हुआ देखते हुए, हँस पड़ीं, और उनकी मुक्ति के लिए यह उत्तम वचन कहने लगीं —

श्लोक 55 (padma.5.64.55)

पुत्रौ प्रमुंचतं कीशौ महावीरौ महाबलौ । ईक्षंतौ मां यदि स्फीतौ प्राणत्यागं करिष्यतः

putrau pramuṁcataṁ kīśau mahāvīrau mahābalau īkṣaṁtau māṁ yadi sphītau prāṇatyāgaṁ kariṣyataḥ

इन वानरों को छोड़ दो, हे पुत्रो, ये दोनों महावीर और बलवान् हैं; यदि ये दोनों प्रतिष्ठित मुझे इस प्रकार देखते रहेंगे, तो अपने प्राण त्याग देंगे।

श्लोक 56 (padma.5.64.56)

अयं वै हनुमान्वीरो यो ददाह दनोः पुरीम् । अयमप्यृक्षराजो हि सर्ववानरभूमिपः

ayaṁ vai hanumānvīro yo dadāha danoḥ purīm ayamapyṛkṣarājo hi sarvavānarabhūmipaḥ

यह तो वीर हनुमान हैं, जिन्होंने दानव की नगरी जला दी थी; और यह भी ऋक्षराज हैं — नहीं, समस्त वानरों के भूपति हैं।

श्लोक 57 (padma.5.64.57)

किमर्थं विधृतौ कुत्र किं वा कृतमनादरात् । पुच्छे युवाभ्यां विधृतौ स महान्विस्मयोऽस्ति मे

kimarthaṁ vidhṛtau kutra kiṁ vā kṛtamanādarāt pucche yuvābhyāṁ vidhṛtau sa mahānvismayo'sti me

तुमने इन्हें इस प्रकार क्यों और कहाँ पकड़ा है? अथवा अनादरवश तुमने क्या किया है? कि तुम दोनों ने इन्हें पूँछ से पकड़ रखा है, यह मेरे लिए बड़ा आश्चर्य है।

श्लोक 58 (padma.5.64.58)

इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं वीक्ष्यतां पुत्रकौ तदा । ऊचतुर्विनयश्रेष्ठौ महाबलसमन्वितौ

iti māturvacaḥ ślakṣṇaṁ vīkṣyatāṁ putrakau tadā ūcaturvinayaśreṣṭhau mahābalasamanvitau

माता का यह कोमल वचन सुनकर, महाबल से युक्त, विनय में श्रेष्ठ वे दोनों पुत्र कहने लगे —

श्लोक 59 (padma.5.64.59)

मातः कश्चन भूपालो रामो दाशरथिर्बली । तेन मुक्तो हयः स्वर्णभालपत्रः सुशोभितः

mātaḥ kaścana bhūpālo rāmo dāśarathirbalī tena mukto hayaḥ svarṇabhālapatraḥ suśobhitaḥ

हे माता! कोई राजा, बलवान् दशरथ-पुत्र राम — उन्होंने ही इस अश्व को, जिसके भाल पर स्वर्णपत्र है, अत्यंत सुशोभित, छोड़ा था।

श्लोक 60 (padma.5.64.60)

तत्रैवं लिखितं मातरेकवीराप्रसूर्मम । ये क्षत्रियास्ते गृह्णन्तु नोचेत्पादतलार्चकाः

tatraivaṁ likhitaṁ mātarekavīrāprasūrmama ye kṣatriyāste gṛhṇantu nocetpādatalārcakāḥ

हे माता! वहाँ यह लिखा था — जो भी क्षत्रिय एक ही वीर-माता से उत्पन्न हैं, वे ही इसे ग्रहण करें; अन्यथा वे मेरे चरणतल के पुजारी बनें।

श्लोक 61 (padma.5.64.61)

तदा मया विचारो वै कृतः स्वांते पतिव्रते । भवती क्षत्रिया किं न वीरसूः किं न वा भवेत्

tadā mayā vicāro vai kṛtaḥ svāṁte pativrate bhavatī kṣatriyā kiṁ na vīrasūḥ kiṁ na vā bhavet

तब मैंने अपने मन में विचार किया, हे पतिव्रते — क्या तुम क्षत्रिय-कन्या नहीं हो? क्या तुम वीर-माता नहीं हो, या नहीं हो?

श्लोक 62 (padma.5.64.62)

धार्ष्ट्यं तद्वीक्ष्य भूपस्य गृहीतोऽश्वो मया बलात् । जितं कुशेन वीरेण सैन्यं तत्पातितं रणे

dhārṣṭyaṁ tadvīkṣya bhūpasya gṛhīto'śvo mayā balāt jitaṁ kuśena vīreṇa sainyaṁ tatpātitaṁ raṇe

राजा की उस धृष्टता को देखकर मैंने बलपूर्वक अश्व को ग्रहण किया; उस सेना को वीर कुश ने जीता, और युद्ध में गिरा दिया।

श्लोक 63 (padma.5.64.63)

मुकुटोऽयं भूमिपतेर्जानीहि पतिदेवते । अयमप्यन्यवीरस्य पुष्कलस्य महात्मनः

mukuṭo'yaṁ bhūmipaterjānīhi patidevate ayamapyanyavīrasya puṣkalasya mahātmanaḥ

हे पतिव्रते! जानिए, यह मुकुट उस भूपति का है; यह दूसरा भी अन्य वीर, महात्मा पुष्कल का है।

श्लोक 64 (padma.5.64.64)

जानीहि मुकुटं त्वन्यं मणिमुक्ताविराजितम् । अश्वोऽयं मे मनोहारी कामयानो हि भूपतेः

jānīhi mukuṭaṁ tvanyaṁ maṇimuktāvirājitam aśvo'yaṁ me manohārī kāmayāno hi bhūpateḥ

यह दूसरा मुकुट भी जानिए, मणि-मोतियों से सुशोभित; यह मनोहर अश्व उस राजा का इच्छानुगामी वाहन है —

श्लोक 65 (padma.5.64.65)

आरोहणाय मद्भ्रातुर्जानीहि बलिनो वरे । इमौ कीशौ मया रंतुमानीतौ बलिनां वरौ

ārohaṇāya madbhrāturjānīhi balino vare imau kīśau mayā raṁtumānītau balināṁ varau

— मेरे भाई के आरोहण के लिए, हे बलिनां वरे! इन दोनों वानरों को, बलवानों में श्रेष्ठ, मैं अपनी क्रीड़ा के लिए लाया हूँ —

श्लोक 66 (padma.5.64.66)

कौतुकार्थं तवैवैतौ संग्रामे युद्धकारकौ । इति वाक्यं समाकर्ण्य जानकी पतिदेवता

kautukārthaṁ tavaivaitau saṁgrāme yuddhakārakau iti vākyaṁ samākarṇya jānakī patidevatā

— आपके ही कौतूहल के लिए, ये दोनों, उस युद्ध के योद्धा हैं। यह वचन सुनकर पतिव्रता जानकी —

श्लोक 67 (padma.5.64.67)

जगाद पुत्रौ तौ वीरौ मोचयेथां पुनः पुनः । सीतोवाच। युवाभ्यामनयः सृष्टो हृतो रामहयो महान्

jagāda putrau tau vīrau mocayethāṁ punaḥ punaḥ sītovāca yuvābhyāmanayaḥ sṛṣṭo hṛto rāmahayo mahān

— उन दोनों वीर पुत्रों से बार-बार कहने लगीं — इन्हें छोड़ दो। सीता ने कहा — तुम दोनों ने यह अन्याय किया है — राम के महान् अश्व को हर लिया है।

श्लोक 68 (padma.5.64.68)

अनेके पातिता वीरा इमौ बद्धौ कपीश्वरौ । पितुस्तव हयो वीरो यागार्थं मोचितोऽमुना

aneke pātitā vīrā imau baddhau kapīśvarau pitustava hayo vīro yāgārthaṁ mocito'munā

अनेक वीर गिरा दिए गए हैं; ये दोनों कपीश्वर बँधे हुए हैं; तुम्हारे पिता का यह वीर अश्व, यज्ञ के लिए इस बलवान् द्वारा मुक्त किया गया —

श्लोक 69 (padma.5.64.69)

तस्यापि हृतवंतौ किं वाजिनं मखसत्तमे । मुंचतं प्लवगावेतौ मुंचतं वाजिनां वरम्

tasyāpi hṛtavaṁtau kiṁ vājinaṁ makhasattame muṁcataṁ plavagāvetau muṁcataṁ vājināṁ varam

— क्या तुम दोनों ने उसे भी उस श्रेष्ठ यज्ञ में हर लिया है? इन वानरों को छोड़ो, इस श्रेष्ठ अश्व को छोड़ो।

श्लोक 70 (padma.5.64.70)

क्षाम्यतां भूपतेर्भ्राता शत्रुघ्नः परकोपनः । जनन्यास्तद्वचः श्रुत्वा ऊचतुस्तां बलान्वितौ

kṣāmyatāṁ bhūpaterbhrātā śatrughnaḥ parakopanaḥ jananyāstadvacaḥ śrutvā ūcatustāṁ balānvitau

भूपति के भाई शत्रुतापन शत्रुघ्न को क्षमा करो। माता का यह वचन सुनकर बलशाली वे दोनों उनसे कहने लगे —

श्लोक 71 (padma.5.64.71)

क्षात्रधर्मेण तं भूपं जितवंतौ बलान्वितम् । नास्माकमनयोर्भावि क्षात्रधर्मेण युध्यताम्

kṣātradharmeṇa taṁ bhūpaṁ jitavaṁtau balānvitam nāsmākamanayorbhāvi kṣātradharmeṇa yudhyatām

क्षात्रधर्म से ही हमने उस बलवान् राजा को जीता है; क्षात्रधर्म से युद्ध करते हुए हम दोनों के लिए यह उचित नहीं है।

श्लोक 72 (padma.5.64.72)

वाल्मीकिना पुरा प्रोक्तमस्माकं पठतां पुरः

vālmīkinā purā proktamasmākaṁ paṭhatāṁ puraḥ

यह पहले वाल्मीकि द्वारा हमें बताया गया था, हमारे समक्ष पढ़ा गया —

श्लोक 73 (padma.5.64.73)

कण्वस्याश्रमकेवाहं धृत्वा यागक्रियोचितम् । तस्मात्सुतः स्वपित्रापि युध्येद्भ्रात्रापि चानुजः

kaṇvasyāśramakevāhaṁ dhṛtvā yāgakriyocitam tasmātsutaḥ svapitrāpi yudhyedbhrātrāpi cānujaḥ

— कण्व के आश्रम में, यज्ञ-क्रिया के योग्य वस्तु धारण करके, पुत्र अपने पिता से भी युद्ध करे, और अनुज अपने ही भ्राता से।

श्लोक 74 (padma.5.64.74)

गुरुणा शिष्य एवापि तस्मान्नो पापसंभवः । त्वदाज्ञातो ऽधुना चावां दास्यावो हयमुत्तमम्

guruṇā śiṣya evāpi tasmānno pāpasaṁbhavaḥ tvadājñāto 'dhunā cāvāṁ dāsyāvo hayamuttamam

— शिष्य अपने ही गुरु से भी युद्ध करे; इसलिए इसमें हमारे लिए कोई पाप नहीं है। अब आपकी आज्ञा से हम इस श्रेष्ठ अश्व को दे देंगे।

श्लोक 75 (padma.5.64.75)

मोक्ष्यावः कीशावेतौ हि करिष्यावो वचस्तव । इत्युक्त्वा मातरं वीरौ गतौ रणे कपीश्वरौ

mokṣyāvaḥ kīśāvetau hi kariṣyāvo vacastava ityuktvā mātaraṁ vīrau gatau raṇe kapīśvarau

हम इन दोनों वानरों को मुक्त कर देंगे; हम वही करेंगे जो आप कहें। माता से यह कहकर वे दोनों वीर वानरराजों के पास युद्धभूमि में गए —

श्लोक 76 (padma.5.64.76)

अमुंचतां हयं चापि हयमेधक्रियोचितम् । सीतादेवी स्वपुत्राभ्यां श्रुत्वा सैन्यं निपातितम्

amuṁcatāṁ hayaṁ cāpi hayamedhakriyocitam sītādevī svaputrābhyāṁ śrutvā sainyaṁ nipātitam

— और यज्ञ-योग्य उस अश्व को मुक्त कर दिया। सीता देवी ने अपने दोनों पुत्रों से सेना के गिराए जाने की बात सुनकर —

श्लोक 77 (padma.5.64.77)

श्रीरामं मनसा ध्यात्वा भानुमैक्षत साक्षिणम् । यद्यहं मनसा वाचा कर्मणा रघुनायकम्

śrīrāmaṁ manasā dhyātvā bhānumaikṣata sākṣiṇam yadyahaṁ manasā vācā karmaṇā raghunāyakam

— मन में श्रीराम का ध्यान करके, साक्षी के रूप में सूर्य की ओर देखा — यदि मैं मन, वचन और कर्म से रघुनायक की ही आराधना करती हूँ —

श्लोक 78 (padma.5.64.78)

भजामि नान्यं मनसा तर्हि जीवेदयं नृपः । सैन्यं चापि महत्सर्वं यन्नाशितमिदं बलात्

bhajāmi nānyaṁ manasā tarhi jīvedayaṁ nṛpaḥ sainyaṁ cāpi mahatsarvaṁ yannāśitamidaṁ balāt

— और मन से किसी अन्य को नहीं भजती — तो यह राजा जीवित हो जाए; तथा यह संपूर्ण महान् सेना, जो बलपूर्वक नष्ट कर दी गई है —

श्लोक 79 (padma.5.64.79)

पुत्राभ्यां तत्तु जीवेत मत्सत्याज्जगतांपते । इति यावद्वचो ब्रूते जानकीपतिदेवता

putrābhyāṁ tattu jīveta matsatyājjagatāṁpate iti yāvadvaco brūte jānakīpatidevatā

— मेरे पुत्रों के द्वारा, मेरे ही सत्य के बल से, पुनः जीवित हो जाए, हे जगत्पते! जब तक पतिव्रता जानकी यह वचन कह रही थीं —

श्लोक 80 (padma.5.64.80)

तावद्बलं च तत्सर्वं जीवितं रणमूर्द्धनि

tāvadbalaṁ ca tatsarvaṁ jīvitaṁ raṇamūrddhani

— तब तक वह संपूर्ण सेना, युद्ध के अग्रभाग में, जीवित हो उठी।

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