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कैलास संहिता · अध्याय 1

व्यास-शौनकादि संवाद

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (shiva.kailasa.1.1)

नमः शिवाय साम्बाय सगणाय ससूनवे । प्रधानपुरुषेशाय सर्गस्थितत्यन्तहेतवे

namaḥ śivāya sāmbāya sagaṇāya sasūnave pradhānapuruṣeśāya sargasthitatyantahetave

साम्बा (उमा) सहित, गणों सहित तथा पुत्र सहित शिव को नमस्कार है; जो प्रकृति और पुरुष के स्वामी हैं तथा सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारण हैं।

श्लोक 2 (shiva.kailasa.1.2)

ऋषय ऊचुः । श्रुतोमासंहिता रम्या नानाख्यानसमन्विता । कैलाससंहिताम्ब्रूहि शिवतत्त्वविवर्द्धिनीम्

ṛṣaya ūcuḥ śrutomāsaṁhitā ramyā nānākhyānasamanvitā kailāsasaṁhitāmbrūhi śivatattvavivarddhinīm

ऋषियों ने कहा — हमने आपसे नाना आख्यानों से युक्त वह रम्य उमासंहिता सुनी। अब शिवतत्त्व को बढ़ाने वाली कैलाससंहिता हमें सुनाइए।

श्लोक 3 (shiva.kailasa.1.3)

व्यास उवाच । शृणुत प्रीतितो वत्साः कैलासाख्यां हि संहिताम् । शिवतत्त्वपरान्दिव्यां वक्ष्ये वः स्नेहतः पराम्

vyāsa uvāca śṛṇuta prītito vatsāḥ kailāsākhyāṁ hi saṁhitām śivatattvaparāndivyāṁ vakṣye vaḥ snehataḥ parām

व्यास बोले — हे वत्सो! प्रेमपूर्वक सुनो इस कैलास नामक संहिता को। स्नेहवश मैं तुम्हें यह परम दिव्य, शिवतत्त्वपरायण संहिता सुनाऊँगा।

श्लोक 4 (shiva.kailasa.1.4)

हिमवच्छिखरे पूर्व्वं तपस्यन्तो महौजसः । वाराणसीङ्गन्तुकामा मुनयः कृतसम्विदः

himavacchikhare pūrvvaṁ tapasyanto mahaujasaḥ vārāṇasīṅgantukāmā munayaḥ kṛtasamvidaḥ

पूर्वकाल में हिमालय के शिखर पर तपस्या करते हुए महातेजस्वी मुनि, संकल्प करके वाराणसी जाने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 5 (shiva.kailasa.1.5)

निर्गत्य तस्मात्सम्प्राप्य गिरेः काशीं समाहिताः । स्नातव्यमेवेति तदा ददृशुर्मणिकर्णिकाम्

nirgatya tasmātsamprāpya gireḥ kāśīṁ samāhitāḥ snātavyameveti tadā dadṛśurmaṇikarṇikām

उस पर्वत से चलकर, एकाग्रचित्त होकर काशी पहुँचकर, 'हमें स्नान करना ही चाहिए' — ऐसा सोचकर उन्होंने मणिकर्णिका का दर्शन किया।

श्लोक 6 (shiva.kailasa.1.6)

तत्र स्नात्वा सुसन्तप्य देवादीनथ जाह्नवीम् । दृष्ट्वा स्नात्वा मुनीशास्ते विश्वेशं त्रिदशेश्वरम्

tatra snātvā susantapya devādīnatha jāhnavīm dṛṣṭvā snātvā munīśāste viśveśaṁ tridaśeśvaram

वहाँ स्नान करके, गंगा में देवादि को भलीभाँति तर्पण देकर, उनका दर्शन करके और पुनः स्नान करके, वे मुनीश्वर त्रिदशेश्वर विश्वेश्वर के दर्शन को गए।

श्लोक 7 (shiva.kailasa.1.7)

नमस्कृत्याथ सम्पूज्य भक्त्या परमयान्विताः । शतरुद्रादिभिः स्तुत्वा स्तुतिभिर्व्वेदपारगाः

namaskṛtyātha sampūjya bhaktyā paramayānvitāḥ śatarudrādibhiḥ stutvā stutibhirvvedapāragāḥ

फिर परम भक्तिभाव से युक्त होकर, नमस्कार और पूजन करके, वेदपारंगत उन मुनियों ने शतरुद्रिय आदि स्तोत्रों से उनकी स्तुति की।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.1.8)

आत्मानं मेनिरे सर्वे कृतार्था वयमित्युत । शिवप्रीत्या सुपूर्णार्थाश्शिवभक्तिरतास्सदा

ātmānaṁ menire sarve kṛtārthā vayamityuta śivaprītyā supūrṇārthāśśivabhaktiratāssadā

वे सभी अपने को कृतार्थ मानने लगे — 'हम सफल हो गए' ऐसा सोचकर। शिव की कृपा से उनके सभी प्रयोजन पूर्ण हो गए और वे सदा शिवभक्ति में रत रहने लगे।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.1.9)

तस्मिन्नवसरे सूतं पञ्चक्रोशदिदृक्षया । गत्वा समागतं वीक्ष्य मुदा ते तं ववन्दिरे

tasminnavasare sūtaṁ pañcakrośadidṛkṣayā gatvā samāgataṁ vīkṣya mudā te taṁ vavandire

उसी अवसर पर पंचक्रोशी के दर्शन की इच्छा से आए हुए सूत जी को देखकर, वे मुनि हर्षपूर्वक उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम करने लगे।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.1.10)

सोपि विश्वेश्वरं साक्षाद्देवदेवमुमापतिम् । नमस्कृत्याथ तैस्साकम्मुक्तिमण्डपमाविशत्

sopi viśveśvaraṁ sākṣāddevadevamumāpatim namaskṛtyātha taissākammuktimaṇḍapamāviśat

उन्होंने भी साक्षात् विश्वेश्वर, देवदेव, उमापति को नमस्कार करके, तत्पश्चात् उन मुनियों के साथ मुक्तिमण्डप में प्रवेश किया।

श्लोक 11 (shiva.kailasa.1.11)

तत्रासीनम्महात्मानं सूतम्पौराणिकोत्तमम् । अर्घ्यादिभिस्तदा सर्व्वे मुनयस्समुपाचरन्

tatrāsīnammahātmānaṁ sūtampaurāṇikottamam arghyādibhistadā sarvve munayassamupācaran

वहाँ आसीन उन महात्मा सूत जी का, जो पुराणकथकों में श्रेष्ठ थे, समस्त मुनियों ने अर्घ्य आदि से सत्कार किया।

श्लोक 12 (shiva.kailasa.1.12)

ततः सूतः प्रसन्नात्मा मुनीनालोक्य सुव्रतान् । पप्रच्छ कुशलान्तेपि प्रोचुः कुशलमात्मनः

tataḥ sūtaḥ prasannātmā munīnālokya suvratān papraccha kuśalāntepi procuḥ kuśalamātmanaḥ

तब प्रसन्नचित्त सूत जी ने उन सुव्रत मुनियों को देखकर उनका कुशल-क्षेम पूछा; उन्होंने भी अपना कुशल-समाचार कहा।

श्लोक 13 (shiva.kailasa.1.13)

ते तु संहृष्टहृदयं ज्ञात्वा तं वै मुनीश्वराः । प्रणवार्थावगत्यर्थमूचुः प्रास्ताविकं वचः

te tu saṁhṛṣṭahṛdayaṁ jñātvā taṁ vai munīśvarāḥ praṇavārthāvagatyarthamūcuḥ prāstāvikaṁ vacaḥ

तब उन मुनीश्वरों ने उनके हृदय को अत्यंत प्रसन्न जानकर, प्रणव के अर्थ को समझने के लिए प्रस्तावना रूप वचन कहे।

श्लोक 14 (shiva.kailasa.1.14)

मुनय ऊचुः । व्यासशिष्य महाभाग सूत पौराणिकोत्तम । धन्यस्त्वं शिवभक्तो हि सर्वविज्ञान सागरः

munaya ūcuḥ vyāsaśiṣya mahābhāga sūta paurāṇikottama dhanyastvaṁ śivabhakto hi sarvavijñāna sāgaraḥ

मुनियों ने कहा — हे व्यास-शिष्य! हे महाभाग सूत! हे पुराणकथकों में श्रेष्ठ! तुम धन्य हो, शिवभक्त हो और समस्त विज्ञान के सागर हो।

श्लोक 15 (shiva.kailasa.1.15)

भवन्तमेव भगवान्व्यासस्सर्वजगद्गुरुः । अभिषिच्य पुराणानां गुरुत्वे समयोजयत्

bhavantameva bhagavānvyāsassarvajagadguruḥ abhiṣicya purāṇānāṁ gurutve samayojayat

स्वयं समस्त जगत् के गुरु भगवान् व्यास ने आपका अभिषेक करके ही आपको पुराणों के गुरुत्व-पद पर नियुक्त किया।

श्लोक 16 (shiva.kailasa.1.16)

तस्मात्पौराणिकी विद्या भवतो हृदि संस्थिता । पुराणानि च सर्वाणि वेदार्थम्प्रवदन्ति हि

tasmātpaurāṇikī vidyā bhavato hṛdi saṁsthitā purāṇāni ca sarvāṇi vedārthampravadanti hi

इसलिए पौराणिक विद्या आपके हृदय में सुस्थिर है; और समस्त पुराण वेद के अर्थ का ही प्रतिपादन करते हैं।

श्लोक 17 (shiva.kailasa.1.17)

वेदाः प्रणवसम्भूताः प्रणवार्थो महेश्वरः । अतो महेश्वरस्थानं त्वयि धिष्ण्यम्प्रतिष्ठितम्

vedāḥ praṇavasambhūtāḥ praṇavārtho maheśvaraḥ ato maheśvarasthānaṁ tvayi dhiṣṇyampratiṣṭhitam

वेद प्रणव से उत्पन्न हुए हैं और प्रणव का अर्थ महेश्वर हैं; अतः महेश्वर का स्थान-रूप धिष्ण्य आप में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 18 (shiva.kailasa.1.18)

त्वन्मुखाब्जपरिस्यन्दन्मकरंदे मनोहरम् । प्रणवार्थामृतं पीत्वा भविष्यामो गतज्वराः

tvanmukhābjaparisyandanmakaraṁde manoharam praṇavārthāmṛtaṁ pītvā bhaviṣyāmo gatajvarāḥ

आपके मुखकमल से झरते हुए मनोहर मकरंद-रूप प्रणवार्थामृत का पान करके हम संतापरहित हो जाएँगे।

श्लोक 19 (shiva.kailasa.1.19)

विशेषतो गुरुस्त्वं हि नान्योऽस्माकं महामते । परं भावं महेशस्य परया कृपया वद

viśeṣato gurustvaṁ hi nānyo ’smākaṁ mahāmate paraṁ bhāvaṁ maheśasya parayā kṛpayā vada

हे महामते! विशेष रूप से आप ही हमारे गुरु हैं, अन्य कोई नहीं; परम कृपा करके महेश के परम स्वरूप को हमें बताइए।

श्लोक 20 (shiva.kailasa.1.20)

इति तेषां वचः श्रुत्वा सूतो व्यासप्रियस्सुधीः । गणेशं षण्मुखं साक्षान्महेशानं महेश्वरीम्

iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā sūto vyāsapriyassudhīḥ gaṇeśaṁ ṣaṇmukhaṁ sākṣānmaheśānaṁ maheśvarīm

उनके ऐसे वचन सुनकर, व्यास के प्रिय बुद्धिमान् सूत जी ने साक्षात् गणेश, षण्मुख, महेश तथा महेश्वरी को,

श्लोक 21 (shiva.kailasa.1.21)

शिलादतनयं देवं नन्दीशं सुयशापतिम् । सनत्कुमारं व्यासं च प्रणिपत्येदमब्रवीत्

śilādatanayaṁ devaṁ nandīśaṁ suyaśāpatim sanatkumāraṁ vyāsaṁ ca praṇipatyedamabravīt

शिलाद के पुत्र देव नन्दीश को, जो सुयश के स्वामी हैं, तथा सनत्कुमार और व्यास को प्रणाम करके यह कहा।

श्लोक 22 (shiva.kailasa.1.22)

सूत उवाच । साधुसाधु महाभागा मुनयः क्षीणकल्मषाः । मतिर्दृढतरा जाता दुर्लभा सापि दुष्कृताम्

sūta uvāca sādhusādhu mahābhāgā munayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ matirdṛḍhatarā jātā durlabhā sāpi duṣkṛtām

सूत जी बोले — साधु, साधु! हे पापरहित महाभाग मुनियो! तुम्हारी बुद्धि अत्यंत दृढ़ हो गई है, जो दुष्कर्मियों के लिए दुर्लभ है।

श्लोक 23 (shiva.kailasa.1.23)

पाराशर्येण गुरुणा नैमिषारण्यवासिनाम् । मुनीनामुपदिष्टं यद्वक्ष्ये तन्मुनिपुंगवाः

pārāśaryeṇa guruṇā naimiṣāraṇyavāsinām munīnāmupadiṣṭaṁ yadvakṣye tanmunipuṁgavāḥ

हे मुनिपुंगवो! गुरु पाराशर्य (व्यास) द्वारा नैमिषारण्यवासी मुनियों को जो उपदेश दिया गया था, वही मैं तुम्हें सुनाऊँगा।

श्लोक 24 (shiva.kailasa.1.24)

यस्य श्रवणमात्रेण शिवभक्तिर्भवेन्नृणाम् । सावधाना भवन्तोद्य शृण्वन्तु परया मुदा

yasya śravaṇamātreṇa śivabhaktirbhavennṛṇām sāvadhānā bhavantodya śṛṇvantu parayā mudā

जिसके श्रवणमात्र से मनुष्यों में शिवभक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसे आज तुम सावधान होकर परम आनंद के साथ सुनो।

श्लोक 25 (shiva.kailasa.1.25)

स्वारोचिषेन्तरे पूर्वं तपस्यंतो दृढव्रताः । ऋषयो नैमिषारण्ये सर्वसिद्धनिषेविते

svārociṣentare pūrvaṁ tapasyaṁto dṛḍhavratāḥ ṛṣayo naimiṣāraṇye sarvasiddhaniṣevite

पूर्वकाल में स्वारोचिष मन्वंतर में, समस्त सिद्धों से सेवित नैमिषारण्य में दृढ़व्रत मुनि तपस्या करते हुए,

श्लोक 26 (shiva.kailasa.1.26)

दीर्घसत्रं वितन्वन्तो रुद्रमध्वरनायकम् । प्रीणयन्तः परं भावमैश्वर्य्यं ज्ञातुमिच्छवः

dīrghasatraṁ vitanvanto rudramadhvaranāyakam prīṇayantaḥ paraṁ bhāvamaiśvaryyaṁ jñātumicchavaḥ

दीर्घ सत्र का विस्तार करते हुए, यज्ञ के अधिनायक रुद्र को प्रसन्न करते हुए, उनके परम भाव और ऐश्वर्य को जानने की इच्छा रखते हुए,

श्लोक 27 (shiva.kailasa.1.27)

निवसन्ति स्म ते सर्वे व्यासदर्शनकांक्षिणः । शिवभक्तिरता नित्यं भस्मरुद्राक्षधारिणः

nivasanti sma te sarve vyāsadarśanakāṁkṣiṇaḥ śivabhaktiratā nityaṁ bhasmarudrākṣadhāriṇaḥ

वे सभी व्यास के दर्शन की अभिलाषा रखते हुए, सदा शिवभक्ति में लीन, भस्म और रुद्राक्ष धारण किए हुए वहाँ निवास करते थे।

श्लोक 28 (shiva.kailasa.1.28)

तेषां भावं समालोक्य भगवान्बादरायणः । प्रादुर्बभूव सर्वात्मा पराशरतपःफलम्

teṣāṁ bhāvaṁ samālokya bhagavānbādarāyaṇaḥ prādurbabhūva sarvātmā parāśaratapaḥphalam

उनके भाव को देखकर, सबकी आत्मा-स्वरूप, पराशर की तपस्या के फल-स्वरूप भगवान् बादरायण वहाँ प्रकट हो गए।

श्लोक 29 (shiva.kailasa.1.29)

तं दृष्ट्वा मुनयस्सर्वे प्रहृष्टवदनेक्षणाः । अभ्युत्थानादिभिस्सर्वैरुपचारैरुपाचरन्

taṁ dṛṣṭvā munayassarve prahṛṣṭavadanekṣaṇāḥ abhyutthānādibhissarvairupacārairupācaran

उन्हें देखकर सभी मुनि प्रफुल्लित मुख और नेत्र वाले होकर, खड़े होने आदि सभी उपचारों से उनका सत्कार करने लगे।

श्लोक 30 (shiva.kailasa.1.30)

सत्कृत्य प्रददुस्तस्मै सौवर्णं विष्टरं शुभम् । सुखोपविष्टः स तदा तस्मिन्सौवर्णविष्टरे । प्राह गंभीरया वाचा पाराशर्य्यो महामुनिः

satkṛtya pradadustasmai sauvarṇaṁ viṣṭaraṁ śubham sukhopaviṣṭaḥ sa tadā tasminsauvarṇaviṣṭare prāha gaṁbhīrayā vācā pārāśaryyo mahāmuniḥ

सत्कारपूर्वक उन्हें एक शुभ स्वर्णासन प्रदान किया। उस स्वर्णासन पर सुखपूर्वक बैठे हुए महामुनि पाराशर्य ने गंभीर वाणी में कहा।

श्लोक 31 (shiva.kailasa.1.31)

व्यास उवाच । कुशलं किं नु युष्माकम्प्रब्रूतास्मिन्महामखे । अर्चितं किं नु युष्माभिस्सम्यगध्वरनायकः

vyāsa uvāca kuśalaṁ kiṁ nu yuṣmākamprabrūtāsminmahāmakhe arcitaṁ kiṁ nu yuṣmābhissamyagadhvaranāyakaḥ

व्यास बोले — इस महायज्ञ में तुम्हारा कुशल तो है न? क्या तुमने अध्वरनायक (रुद्र) की भलीभाँति पूजा की है?

श्लोक 32 (shiva.kailasa.1.32)

किमर्थमत्र युष्माभिरध्वरे परमेश्वरः । स्वर्चितो भक्तिभावेन साम्बस्संसारमोचकः

kimarthamatra yuṣmābhiradhvare parameśvaraḥ svarcito bhaktibhāvena sāmbassaṁsāramocakaḥ

किस प्रयोजन से तुमने इस यज्ञ में भक्तिभाव से संसार से मुक्त करने वाले साम्ब परमेश्वर की भलीभाँति पूजा की है?

श्लोक 33 (shiva.kailasa.1.33)

युष्मत्प्रवृत्तिर्मे भाति शुश्रूषा पूर्वमेव हि । परभावे महेशस्य मुक्तिहेतोश्शिवस्य च

yuṣmatpravṛttirme bhāti śuśrūṣā pūrvameva hi parabhāve maheśasya muktihetośśivasya ca

मुझे लगता है कि तुम्हारी प्रवृत्ति पहले से ही महेश के परम भाव को तथा मुक्ति के हेतु शिव को सुनने की जिज्ञासा से युक्त है।

श्लोक 34 (shiva.kailasa.1.34)

एवमुक्ता मुनीन्द्रेण व्यासेनामिततेजसा । मुनयो नैमिषारण्यवासिनः परमौजसः

evamuktā munīndreṇa vyāsenāmitatejasā munayo naimiṣāraṇyavāsinaḥ paramaujasaḥ

अमित तेजस्वी मुनीन्द्र व्यास द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, परम ओजस्वी नैमिषारण्यवासी वे मुनि,

श्लोक 35 (shiva.kailasa.1.35)

प्रणिपत्य महात्मानं पाराशशर्य्यं महामुनिम् । शिवानुरागसंहृष्टमानसं च तमब्रुवन्

praṇipatya mahātmānaṁ pārāśaśaryyaṁ mahāmunim śivānurāgasaṁhṛṣṭamānasaṁ ca tamabruvan

उन महात्मा, महामुनि पाराशर्य को प्रणाम करके, जिनका मन शिव के प्रति अनुराग से हर्षित था, उनसे कहने लगे।

श्लोक 36 (shiva.kailasa.1.36)

मुनय ऊचुः । भगवन्मुनिशार्दूल साक्षान्नारायणांशज । कृपानिधे महाप्राज्ञ सर्वविद्याधिप प्रभो

munaya ūcuḥ bhagavanmuniśārdūla sākṣānnārāyaṇāṁśaja kṛpānidhe mahāprājña sarvavidyādhipa prabho

मुनियों ने कहा — हे भगवन्! हे मुनिशार्दूल! हे साक्षात् नारायण के अंशज! हे कृपानिधे! हे महाप्राज्ञ! हे समस्त विद्याओं के अधिपति प्रभो!

श्लोक 37 (shiva.kailasa.1.37)

त्वं हि सर्वजगद्भर्तुर्महा देवस्य वेधसः । साम्बस्य सगणस्यास्य प्रसादानां निधिस्स्वयम्

tvaṁ hi sarvajagadbharturmahā devasya vedhasaḥ sāmbasya sagaṇasyāsya prasādānāṁ nidhissvayam

आप स्वयं ही समस्त जगत् के पालक, विधाता महादेव, गणों सहित साम्ब की कृपाओं के निधान हैं।

श्लोक 38 (shiva.kailasa.1.38)

त्वत्पादाब्जरसास्वादमधुपायितमानसाः । कृतार्था वयमद्यैव भवत्पादाब्जदर्शनात्

tvatpādābjarasāsvādamadhupāyitamānasāḥ kṛtārthā vayamadyaiva bhavatpādābjadarśanāt

आपके चरणकमल के रस का आस्वादन करने वाले भ्रमर के समान हुए हमारे मन, आज आपके चरणकमल के दर्शन से ही कृतार्थ हो गए।

श्लोक 39 (shiva.kailasa.1.39)

त्वदीयचरणाम्भोजदर्शनं खलु पापिनाम् । दुर्लभं लब्धमस्माभिस्त्वस्मात्सुकृतिनो वयम्

tvadīyacaraṇāmbhojadarśanaṁ khalu pāpinām durlabhaṁ labdhamasmābhistvasmātsukṛtino vayam

आपके चरणकमल का दर्शन पापियों के लिए अत्यंत दुर्लभ है; हमें वह प्राप्त हुआ है, अतः हम पुण्यवान हैं।

श्लोक 40 (shiva.kailasa.1.40)

अस्मिन्देशे महाभाग नैमिषारण्यसंज्ञके । दीर्घसत्रान्वितास्सर्वे प्रणवार्थप्रकाशकाः

asmindeśe mahābhāga naimiṣāraṇyasaṁjñake dīrghasatrānvitāssarve praṇavārthaprakāśakāḥ

हे महाभाग! नैमिषारण्य नामक इस देश में दीर्घ सत्र में लगे हुए, प्रणव के अर्थ को प्रकाशित करने वाले हम सब,

श्लोक 41 (shiva.kailasa.1.41)

श्रोतव्यः परमेशान इति कृत्वा विनिश्चिताः । परस्परं चिन्तयन्तः परं भावं महेशितु

śrotavyaḥ parameśāna iti kṛtvā viniścitāḥ parasparaṁ cintayantaḥ paraṁ bhāvaṁ maheśitu

'परमेश के विषय में सुनना चाहिए' — ऐसा निश्चय करके, आपस में महेश के परम भाव पर विचार करते रहे।

श्लोक 42 (shiva.kailasa.1.42)

अज्ञातवन्त एवैते वयं तस्माद्भवान्प्रभो । छेत्तुमर्हति तान्सर्वान्संशयानल्पचेतसाम्

ajñātavanta evaite vayaṁ tasmādbhavānprabho chettumarhati tānsarvānsaṁśayānalpacetasām

हम इस विषय में अज्ञानी ही हैं; अतः हे प्रभो! आप ही अल्पबुद्धि हम लोगों के इन सभी संशयों को दूर करने में समर्थ हैं।

श्लोक 43 (shiva.kailasa.1.43)

त्वदन्यः संशयस्यास्यच्छेत्ता न हि जगत्त्रये । तस्मादपारगंभीरव्यामोहाब्धौ निमज्जतः

tvadanyaḥ saṁśayasyāsyacchettā na hi jagattraye tasmādapāragaṁbhīravyāmohābdhau nimajjataḥ

इस संशय को छेदने वाला आपके अतिरिक्त तीनों लोकों में कोई नहीं है; अतः अपार और गंभीर मोह के सागर में डूबते हुए,

श्लोक 44 (shiva.kailasa.1.44)

तारयस्व शिवज्ञानपोतेनास्मान्दयानिधे । शिवसद्भक्तितत्त्वार्थं ज्ञातुं श्रद्धालवो वयम्

tārayasva śivajñānapotenāsmāndayānidhe śivasadbhaktitattvārthaṁ jñātuṁ śraddhālavo vayam

हे दयानिधे! हमें शिवज्ञान की नौका से पार कीजिए। हम शिव की सद्भक्ति के तत्त्वार्थ को जानने के लिए श्रद्धालु हैं।

श्लोक 45 (shiva.kailasa.1.45)

एवमभ्यर्थितस्तत्र मुनिभिर्वेदपारगैः । सर्ववेदार्थविन्मुख्यः शुकतातो महामुनिः । वेदान्तसारसर्वस्वं प्रणवं परमेश्वरम्

evamabhyarthitastatra munibhirvedapāragaiḥ sarvavedārthavinmukhyaḥ śukatāto mahāmuniḥ vedāntasārasarvasvaṁ praṇavaṁ parameśvaram

वहाँ वेदपारंगत मुनियों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, समस्त वेदों के अर्थ के ज्ञाता, शुकदेव के पिता, महामुनि व्यास ने वेदान्त के सार-स्वरूप, परमेश्वर-रूप प्रणव का

श्लोक 46 (shiva.kailasa.1.46)

ध्यात्वा हृत्कर्णिकामध्ये साम्बं संसारमोचकम् । प्रहृष्टमानसो भूत्वा व्याजहार महामुनि

dhyātvā hṛtkarṇikāmadhye sāmbaṁ saṁsāramocakam prahṛṣṭamānaso bhūtvā vyājahāra mahāmuni

अपने हृदयकमल की कर्णिका में संसार से मुक्त करने वाले साम्ब का ध्यान करके और हर्षितचित्त होकर उस महामुनि ने कहना आरंभ किया।

अध्याय-सूचीअध्याय 2