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कैलास संहिता · अध्याय 2

देवी-देव संवाद में देवी के प्रश्न

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

श्लोक 1 (shiva.kailasa.2.1)

व्यास उवाच । साधु पृष्टमिदं विप्रा भवद्भिर्भाग्यवत्तमैः । दुर्लभं हि शिवज्ञानं प्रणवार्थप्रकाशकम्

vyāsa uvāca sādhu pṛṣṭamidaṁ viprā bhavadbhirbhāgyavattamaiḥ durlabhaṁ hi śivajñānaṁ praṇavārthaprakāśakam

व्यास बोले — हे विप्रो! तुम अत्यंत भाग्यशाली हो, तुमने यह उत्तम प्रश्न पूछा है; क्योंकि प्रणव के अर्थ को प्रकाशित करने वाला शिवज्ञान अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 2 (shiva.kailasa.2.2)

येषां प्रसन्नो भगवान्साक्षाच्छूलवरायुधः । तेषामेव शिवज्ञानं प्रणवार्थप्रकाशकम

yeṣāṁ prasanno bhagavānsākṣācchūlavarāyudhaḥ teṣāmeva śivajñānaṁ praṇavārthaprakāśakama

जिन पर साक्षात् त्रिशूलधारी भगवान् प्रसन्न होते हैं, उन्हीं को प्रणव के अर्थ को प्रकाशित करने वाला शिवज्ञान प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (shiva.kailasa.2.3)

जायते न हि सन्देहो नेतरेषामिति श्रुतिः । शिवभक्तिविहीनानामिति तत्त्वार्थनिश्चयः

jāyate na hi sandeho netareṣāmiti śrutiḥ śivabhaktivihīnānāmiti tattvārthaniścayaḥ

इसमें कोई संदेह नहीं है — ऐसा श्रुति कहती है — कि जो शिवभक्ति से रहित हैं, उन्हें यह प्राप्त नहीं होता; यही तत्त्वार्थ का निश्चय है।

श्लोक 4 (shiva.kailasa.2.4)

दीर्घसत्रेण युष्माभिर्भगवानम्बिकापतिः । उपासित इतीदं मे दृष्टमद्य विनिश्चितम्

dīrghasatreṇa yuṣmābhirbhagavānambikāpatiḥ upāsita itīdaṁ me dṛṣṭamadya viniścitam

इस दीर्घ सत्र के द्वारा तुमने भगवान् अम्बिकापति की उपासना की है — यह मुझे आज स्पष्ट रूप से ज्ञात और निश्चित हो गया है।

श्लोक 5 (shiva.kailasa.2.5)

तस्माद्वक्ष्यामि युष्माकमितिहासम्पुरातनम् । उमामहेशसम्वादरूपमद्भुतमास्तिकाः

tasmādvakṣyāmi yuṣmākamitihāsampurātanam umāmaheśasamvādarūpamadbhutamāstikāḥ

अतः हे आस्तिको! मैं तुम्हें एक पुरातन इतिहास सुनाऊँगा, जो उमा और महेश के संवाद के रूप में अद्भुत है।

श्लोक 6 (shiva.kailasa.2.6)

पुराखिलजगन्माता सती दाक्षायणी तनुम् । शिवनिन्दाप्रसङ्गेन त्यक्त्वा च जनकाध्वरे

purākhilajaganmātā satī dākṣāyaṇī tanum śivanindāprasaṅgena tyaktvā ca janakādhvare

पूर्वकाल में समस्त जगत् की माता, दक्ष की पुत्री सती ने, अपने पिता के यज्ञ में शिव की निन्दा के प्रसंग से अपना शरीर त्यागकर,

श्लोक 7 (shiva.kailasa.2.7)

ततः प्रभावात्सा देवी सुताऽभूद्धिमवद्गिरेः । शिवार्थमतपत्सा वै नारदस्योपदेशतः

tataḥ prabhāvātsā devī sutā ’bhūddhimavadgireḥ śivārthamatapatsā vai nāradasyopadeśataḥ

तत्पश्चात् अपने प्रभाव से वह देवी हिमाचल की पुत्री बनीं। नारद के उपदेश से ही उन्होंने शिव की प्राप्ति के लिए तपस्या की।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.2.8)

तस्मिन्भूधरवर्य्ये तु स्वयंवरविधानतः । देवेशे च कृतोद्वाहे पार्वती सुखमाप सा

tasminbhūdharavaryye tu svayaṁvaravidhānataḥ deveśe ca kṛtodvāhe pārvatī sukhamāpa sā

उस श्रेष्ठ पर्वत पर स्वयंवर विधि से देवेश के साथ विवाह होने पर पार्वती को सुख की प्राप्ति हुई।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.2.9)

तथैकस्मिन्महादेवी समये पतिना सह । सूपविष्टा महाशैले गौरी देवमभाषत

tathaikasminmahādevī samaye patinā saha sūpaviṣṭā mahāśaile gaurī devamabhāṣata

तत्पश्चात् एक समय महादेवी गौरी अपने पति के साथ महान पर्वत पर सुखपूर्वक बैठी हुई, देव से बोलीं।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.2.10)

महादेव्युवाच । भगवन्परमेशान पञ्चकृत्यविधायक । सर्वज्ञ भक्तिसुलभ परमामृतविग्रह

mahādevyuvāca bhagavanparameśāna pañcakṛtyavidhāyaka sarvajña bhaktisulabha paramāmṛtavigraha

महादेवी बोलीं — हे भगवन्! हे परमेशान! हे पंचकृत्य (सृष्टि आदि पाँच कार्यों) के विधायक! हे सर्वज्ञ! हे भक्ति से सुलभ! हे परम अमृतमय स्वरूप!

श्लोक 11 (shiva.kailasa.2.11)

दाक्षायणीन्तनुं त्यक्त्वा तव निन्दाप्रसंगतः । आसमद्य महेशान पुत्री हिमवतो गिरेः

dākṣāyaṇīntanuṁ tyaktvā tava nindāprasaṁgataḥ āsamadya maheśāna putrī himavato gireḥ

हे महेश! आपकी निन्दा के प्रसंग से दाक्षायणी शरीर त्यागकर, अब मैं हिमवान पर्वत की पुत्री हो गई हूँ।

श्लोक 12 (shiva.kailasa.2.12)

कृपया परमेशान मंत्रदीक्षाविधानतः । मां विशुद्धात्मतत्त्वस्थां कुरु नित्यं महेश्वर

kṛpayā parameśāna maṁtradīkṣāvidhānataḥ māṁ viśuddhātmatattvasthāṁ kuru nityaṁ maheśvara

हे परमेशान! कृपापूर्वक मंत्रदीक्षा-विधि द्वारा मुझे, हे महेश्वर, सदा विशुद्ध आत्मतत्त्व में स्थित कीजिए।

श्लोक 13 (shiva.kailasa.2.13)

इति सम्प्रार्थितो देव्या देवः शीतांशु भूषणः । प्रत्युवाच ततो देवीं प्रहृष्टेनान्तरात्मना

iti samprārthito devyā devaḥ śītāṁśu bhūṣaṇaḥ pratyuvāca tato devīṁ prahṛṣṭenāntarātmanā

देवी द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, चंद्रभूषण देव ने प्रसन्न अंतःकरण से देवी को उत्तर दिया।

श्लोक 14 (shiva.kailasa.2.14)

महादेव उवाच । धन्या त्वं देवदेवशि यदि जातेदृशी मतिः । कैलास शिखरं गत्वा करिष्ये त्वां च तादृशीम्

mahādeva uvāca dhanyā tvaṁ devadevaśi yadi jātedṛśī matiḥ kailāsa śikharaṁ gatvā kariṣye tvāṁ ca tādṛśīm

महादेव बोले — हे देवदेवेशि! तुम धन्य हो, क्योंकि तुम्हारे मन में ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई है। कैलास शिखर पर चलकर मैं तुम्हें वैसा ही बनाऊँगा।

श्लोक 15 (shiva.kailasa.2.15)

ततो हिमवतो गत्वा कैलासम्भूधरेश्वरम् । जगौ दीक्षाविधानेन प्रणवादीन्मनून् क्रमात्

tato himavato gatvā kailāsambhūdhareśvaram jagau dīkṣāvidhānena praṇavādīnmanūn kramāt

तत्पश्चात् हिमालय से पर्वतों के स्वामी कैलास पर जाकर, उन्होंने दीक्षाविधि द्वारा प्रणव आदि मंत्रों को क्रमशः कहा।

श्लोक 16 (shiva.kailasa.2.16)

उक्त्वा मंत्रांश्च तान्देवीं कृत्वा शुद्धात्मनि स्थिताम् । सार्द्धं देव्या महादेवो देवोद्यानं गतोऽभवत्

uktvā maṁtrāṁśca tāndevīṁ kṛtvā śuddhātmani sthitām sārddhaṁ devyā mahādevo devodyānaṁ gato ’bhavat

उन मंत्रों को कहकर और देवी को शुद्ध आत्मा में स्थित करके, महादेव देवी के साथ देवताओं के उद्यान में गए।

श्लोक 17 (shiva.kailasa.2.17)

ततः सुमालिनीमुख्यैर्दैव्याः प्रियसखीजनैः । समाहृतैः प्रफुल्लैस्तैः पुष्पैः कल्पतरूद्भवैः

tataḥ sumālinīmukhyairdaivyāḥ priyasakhījanaiḥ samāhṛtaiḥ praphullaistaiḥ puṣpaiḥ kalpatarūdbhavaiḥ

तत्पश्चात् सुमालिनी आदि देवी की प्रिय सखियों द्वारा एकत्रित किए गए, कल्पवृक्षों से उत्पन्न उन प्रफुल्ल पुष्पों से,

श्लोक 18 (shiva.kailasa.2.18)

अलंकृत्य महादेवीं स्वांकमारोप्य शंकरः । प्रहृष्टवदनस्तस्थौ विलोक्य च तदाननम्

alaṁkṛtya mahādevīṁ svāṁkamāropya śaṁkaraḥ prahṛṣṭavadanastasthau vilokya ca tadānanam

महादेवी को अलंकृत करके और अपनी गोद में बिठाकर, शंकर प्रसन्न मुख से उनके मुख को निहारते हुए बैठे रहे।

श्लोक 19 (shiva.kailasa.2.19)

ततः प्रियकथा जाताः पार्वतीपरमेशयोः । हिताय सर्वलोकानां साक्षाच्छ्रुत्यर्थं सम्मिता

tataḥ priyakathā jātāḥ pārvatīparameśayoḥ hitāya sarvalokānāṁ sākṣācchrutyarthaṁ sammitā

तत्पश्चात् पार्वती और परमेश्वर के बीच प्रिय वार्ताएँ हुईं, जो साक्षात् श्रुति के अर्थ के अनुरूप, समस्त लोकों के हित के लिए थीं।

श्लोक 20 (shiva.kailasa.2.20)

तदा सर्वजगन्माता भर्तुरंकं समाश्रिता । विलोक्य वदनं भर्तुरिदमाहः तपोधनाः

tadā sarvajaganmātā bharturaṁkaṁ samāśritā vilokya vadanaṁ bharturidamāhaḥ tapodhanāḥ

हे तपोधनो! तब समस्त जगत् की माता, पति की गोद का आश्रय लिए हुए, पति के मुख को देखकर यह बोलीं।

श्लोक 21 (shiva.kailasa.2.21)

श्रीदेव्युवाच । उपदिष्टास्त्वया देव मंत्रास्सप्रणवा मताः । तत्रादौ श्रोतुमिच्छामि प्रणवार्थं विनिश्चितम्

śrīdevyuvāca upadiṣṭāstvayā deva maṁtrāssapraṇavā matāḥ tatrādau śrotumicchāmi praṇavārthaṁ viniścitam

श्रीदेवी बोलीं — हे देव! आपने मुझे प्रणवयुक्त मंत्रों का उपदेश दिया है, जिन्हें मैंने ग्रहण किया। उनमें सबसे पहले मैं प्रणव के निश्चित अर्थ को सुनना चाहती हूँ।

श्लोक 22 (shiva.kailasa.2.22)

कथम्प्रणव उत्पन्नः कथं प्रणव उच्यते । मात्राः कति समाख्याताः कथं वेदादिरुच्यते

kathampraṇava utpannaḥ kathaṁ praṇava ucyate mātrāḥ kati samākhyātāḥ kathaṁ vedādirucyate

प्रणव कैसे उत्पन्न हुआ और वह कैसे कहा जाता है? उसकी कितनी मात्राएँ बताई गई हैं और उसे वेद का आदि क्यों कहा जाता है?

श्लोक 23 (shiva.kailasa.2.23)

देवताः कति च प्रोक्ताः कथं वेदादिभावना । क्रियाः कतिविधाः प्रोक्ता व्याप्यव्यापकता कथम्

devatāḥ kati ca proktāḥ kathaṁ vedādibhāvanā kriyāḥ katividhāḥ proktā vyāpyavyāpakatā katham

उसके कितने देवता बताए गए हैं और वेद के आदि होने की भावना क्या है? कितने प्रकार की क्रियाएँ कही गई हैं और व्याप्य-व्यापकता (व्याप्त और व्यापक का संबंध) कैसा है?

श्लोक 24 (shiva.kailasa.2.24)

ब्रह्माणि पंच मंत्रेऽस्मिन्कथं तिष्ठंत्यनुक्रमात् । कलाः कति समाख्याताः प्रपंचात्मकता कथम्

brahmāṇi paṁca maṁtre ’sminkathaṁ tiṣṭhaṁtyanukramāt kalāḥ kati samākhyātāḥ prapaṁcātmakatā katham

इस मंत्र में पाँच ब्रह्म (शिव के पाँच रूप) क्रमशः कैसे स्थित हैं? उसकी कितनी कलाएँ बताई गई हैं और प्रपंचात्मकता (जगत्-रूपता) कैसी है?

श्लोक 25 (shiva.kailasa.2.25)

वाच्यवाचकसम्बन्धस्थानानि च कथं शिव । कोऽत्राधिकारी विज्ञेयो विषयः क उदाहृतः

vācyavācakasambandhasthānāni ca kathaṁ śiva ko ’trādhikārī vijñeyo viṣayaḥ ka udāhṛtaḥ

हे शिव! वाच्य और वाचक के संबंध तथा स्थान कैसे हैं? यहाँ अधिकारी किसे जानना चाहिए और विषय क्या बताया गया है?

श्लोक 26 (shiva.kailasa.2.26)

सम्बन्धः कोत्र विज्ञेयः किंप्रयोजनमुच्यते । उपासकस्तु किंरूपः किं वा स्थानमुपासनम्

sambandhaḥ kotra vijñeyaḥ kiṁprayojanamucyate upāsakastu kiṁrūpaḥ kiṁ vā sthānamupāsanam

यहाँ कौन-सा संबंध जानना चाहिए और क्या प्रयोजन कहा गया है? उपासक का स्वरूप क्या है और उपासना का स्थान क्या है?

श्लोक 27 (shiva.kailasa.2.27)

उपास्यं वस्तु किंरूपं किं वा फलमुपासितुः । अनुष्ठान विधिः कोवा पूजास्थानं च किं प्रभो

upāsyaṁ vastu kiṁrūpaṁ kiṁ vā phalamupāsituḥ anuṣṭhāna vidhiḥ kovā pūjāsthānaṁ ca kiṁ prabho

उपास्य वस्तु का स्वरूप क्या है और उपासक को क्या फल मिलता है? अनुष्ठान की विधि क्या है और हे प्रभो! पूजा का स्थान क्या है?

श्लोक 28 (shiva.kailasa.2.28)

पूजायां मण्डलं किं वा किं वा ऋष्यादिकं हर । न्यासजातविधिः को वा को वा पूजाविधिक्रमः

pūjāyāṁ maṇḍalaṁ kiṁ vā kiṁ vā ṛṣyādikaṁ hara nyāsajātavidhiḥ ko vā ko vā pūjāvidhikramaḥ

हे हर! पूजा में मण्डल क्या है और ऋष्यादि (मंत्र के ऋषि आदि) क्या हैं? न्यास-विधि क्या है और पूजा-विधि का क्रम क्या है?

श्लोक 29 (shiva.kailasa.2.29)

एतत्सर्वं महेशान समाचक्ष्व विशेषतः । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यद्यस्ति मयि ते कृपा

etatsarvaṁ maheśāna samācakṣva viśeṣataḥ śrotumicchāmi tattvena yadyasti mayi te kṛpā

हे महेशान! यह सब कुछ मुझे विशेष रूप से बताइए। मैं इसे तत्त्वतः सुनना चाहती हूँ, यदि आपकी मुझ पर कृपा है।

श्लोक 30 (shiva.kailasa.2.30)

इति देव्या समापृष्टो भगवानिन्दुभूषणः । सम्प्रशस्य महेशानीं वक्तुं समुपचक्रमे

iti devyā samāpṛṣṭo bhagavānindubhūṣaṇaḥ sampraśasya maheśānīṁ vaktuṁ samupacakrame

देवी द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, चन्द्रभूषण भगवान् ने महेश्वरी की प्रशंसा करके कहना आरंभ किया।

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