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वायवीय संहिता · अध्याय 22

दक्षयज्ञ का विध्वंस

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.22.1)

वायुरुवाच तस्मिन्नवसरे व्योम्नि समाविरभवद्रथः । सहस्रसूर्यसङ्काशश्चारुचीरवृषध्वजः

vāyuruvāca tasminnavasare vyomni samāvirabhavadrathaḥ | sahasrasūryasaṅkāśaścārucīravṛṣadhvajaḥ

वायु ने कहा — उसी अवसर पर आकाश में एक रथ प्रकट हुआ, जो सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी था, सुन्दर वस्त्रों तथा वृषभ-ध्वजा से युक्त था।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.22.2)

अश्वरत्नद्वयोदारो रथचक्रचतुष्टयः । सञ्चितानेकदिव्यास्त्रशस्त्ररत्नपरिष्कृतः

aśvaratnadvayodāro rathacakracatuṣṭayaḥ | sañcitānekadivyāstraśastraratnapariṣkṛtaḥ

वह दो उत्कृष्ट अश्वरत्नों से युक्त, चार पहियों वाला, तथा अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और रत्नों से सुसज्जित था।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.22.3)

तस्यापि रथवर्यस्यासीत्स एव हि सारथिः । यश्चैव त्रैपुरे युद्धे पूर्वं शार्वरथे स्थितः

tasyāpi rathavaryasyāsītsa eva hi sārathiḥ | yaścaiva traipure yuddhe pūrvaṁ śārvarathe sthitaḥ

उस श्रेष्ठ रथ का भी वही सारथि था, जो पूर्वकाल में त्रिपुर-युद्ध में शर्व के रथ पर स्थित था।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.22.4)

स तं रथवरं ब्रह्मा शासनादेव शूलिनः । हरेः समीपमानीय कृताञ्जलिरभाषत

sa taṁ rathavaraṁ brahmā śāsanādeva śūlinaḥ | hareḥ samīpamānīya kṛtāñjalirabhāṣata

त्रिशूलधारी की आज्ञा से ही ब्रह्मा उस श्रेष्ठ रथ को हरि (वीरभद्र) के समीप ले आए, और हाथ जोड़कर यह कहा —

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.22.5)

भगवन् भद्र भद्राङ्ग भगवानिन्दुभूषणः । आज्ञापयति वीरस्त्वां रथमारोढुमव्ययः

bhagavan bhadra bhadrāṅga bhagavānindubhūṣaṇaḥ | ājñāpayati vīrastvāṁ rathamāroḍhumavyayaḥ

हे भगवन् भद्र! हे शुभ अंगों वाले! अविनाशी, चन्द्रभूषण भगवान् उस वीर को इस रथ पर आरूढ़ होने की आज्ञा देते हैं।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.22.6)

रैभ्याश्रमसमीपस्थस्त्र्यम्बकोऽम्बिकया सह । सम्पश्यते महाबाहो दुस्सहं ते पराक्रमम्

raibhyāśramasamīpasthastryambako'mbikayā saha | sampaśyate mahābāho dussahaṁ te parākramam

हे महाबाहो! रैभ्य के आश्रम के समीप स्थित त्र्यम्बक अम्बिका के साथ तुम्हारे इस असह्य पराक्रम को देख रहे हैं।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.22.7)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स वीरो गणकुञ्जरः । आरुरोह रथं दिव्यमनुगृह्य पितामहम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā sa vīro gaṇakuñjaraḥ | āruroha rathaṁ divyamanugṛhya pitāmaham

उसका वह वचन सुनकर, गणों में गजराज के समान श्रेष्ठ उस वीर ने पितामह को अनुगृहीत करते हुए उस दिव्य रथ पर आरोहण किया।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.22.8)

तथा रथवरे तस्मिन् स्थिते ब्रह्मणि सारथौ । भद्रस्य ववृधे लक्ष्मी रुद्रस्येव पुरद्विषः

tathā rathavare tasmin sthite brahmaṇi sārathau | bhadrasya vavṛdhe lakṣmī rudrasyeva puradviṣaḥ

उस श्रेष्ठ रथ पर ब्रह्मा के सारथि होकर स्थित होने पर, भद्र की शोभा, त्रिपुरनाशक रुद्र की शोभा के समान, बढ़ गई।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.22.9)

ततः शङ्खवरं दीप्तं पूर्णचन्द्रसमप्रभम् । प्रदध्मौ वदने कृत्वा भानुकम्पो महाबलः

tataḥ śaṅkhavaraṁ dīptaṁ pūrṇacandrasamaprabham | pradadhmau vadane kṛtvā bhānukampo mahābalaḥ

तत्पश्चात् महाबली भानुकम्प ने पूर्णचन्द्र के समान कान्तिमान् उस श्रेष्ठ, देदीप्यमान शंख को मुख में लगाकर बजाया।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.22.10)

तस्य शङ्खस्य तं नादं भिन्नसागरसन्निभम् । श्रुत्वा भयेन देवानां जज्वाल जठरानलः

tasya śaṅkhasya taṁ nādaṁ bhinnasāgarasannibham | śrutvā bhayena devānāṁ jajvāla jaṭharānalaḥ

उस शंख की, मानो समुद्र फट रहा हो, ऐसी उस ध्वनि को सुनकर देवताओं की उदराग्नि भय से प्रज्वलित हो उठी।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.22.11)

यक्षविद्याधराहीन्द्रैः सिद्धैर्युद्धदिदृक्षुभिः । क्षणेन निबिडीभूताः साकाशविवरा दिशः

yakṣavidyādharāhīndraiḥ siddhairyuddhadidṛkṣubhiḥ | kṣaṇena nibiḍībhūtāḥ sākāśavivarā diśaḥ

युद्ध देखने के इच्छुक यक्षों, विद्याधरों, नागराजों और सिद्धों से, आकाश के छिद्र सहित सभी दिशाएँ क्षणभर में सघन हो गईं।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.22.12)

ततः शार्ङ्गेण चापाङ्कात्स नारायणनीरदः । महता बाणवर्षेण तुतोद गणगोवृषम्

tataḥ śārṅgeṇa cāpāṅkātsa nārāyaṇanīradaḥ | mahatā bāṇavarṣeṇa tutoda gaṇagovṛṣam

तत्पश्चात् मेघ के समान वह नारायण अपने शार्ङ्ग धनुष से बाणों की महावर्षा करते हुए, गणों में श्रेष्ठ वृषभ को पीड़ित करने लगे।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.22.13)

तं दृष्ट्वा विष्णुमायान्तं शतधा बाणवर्षिणम् । स चाददे धनुर्जैत्रं भद्रो बाणसहस्रमुक्

taṁ dṛṣṭvā viṣṇumāyāntaṁ śatadhā bāṇavarṣiṇam | sa cādade dhanurjaitraṁ bhadro bāṇasahasramuk

सैकड़ों प्रकार से बाणों की वर्षा करते हुए आते हुए विष्णु को देखकर, सहस्रों बाण छोड़ने वाले भद्र ने भी अपना विजयशील धनुष उठा लिया।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.22.14)

समादाय च तद्दिव्यं धनुः समरभैरवम् । शनैर्विस्फारयामास मेरुं धनुरिवेश्वरः

samādāya ca taddivyaṁ dhanuḥ samarabhairavam | śanairvisphārayāmāsa meruṁ dhanuriveśvaraḥ

उस दिव्य, युद्ध में भयंकर धनुष को लेकर, उसने उसे धीरे-धीरे इस प्रकार खींचा, जैसे ईश्वर मेरु पर्वत को धनुष के समान खींचते हैं।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.22.15)

तस्य विस्फार्य्यमाणस्य धनुषोऽभून्महास्वनः । तेन स्वनेन महता पृथिवीं समकम्पयत्

tasya visphāryyamāṇasya dhanuṣo'bhūnmahāsvanaḥ | tena svanena mahatā pṛthivīṁ samakampayat

उसके खींचे जाते हुए धनुष से एक महान् नाद उत्पन्न हुआ, जिस महान् ध्वनि से पृथ्वी काँप उठी।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.22.16)

ततः शरवरं घोरं दीप्तमाशीविषोपमम् । जग्राह गणपः श्रीमान्स्वयमुग्रपराक्रमः

tataḥ śaravaraṁ ghoraṁ dīptamāśīviṣopamam | jagrāha gaṇapaḥ śrīmānsvayamugraparākramaḥ

तत्पश्चात् उग्र पराक्रमी श्रीमान् गणपति ने स्वयं भयंकर, देदीप्यमान, विषधर सर्प के समान श्रेष्ठ बाण को हाथ में ले लिया।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.22.17)

बाणोद्धारे भुजो ह्यस्य तूणीवदनसङ्गतः । प्रत्यदृश्यत वल्मीकं विवेक्षुरिव पन्नगः

bāṇoddhāre bhujo hyasya tūṇīvadanasaṅgataḥ | pratyadṛśyata valmīkaṁ vivekṣuriva pannagaḥ

बाण निकालते समय उसकी भुजा, तरकश के मुख से जुड़ी हुई, ऐसे दिखाई पड़ी मानो सर्प बाँबी में प्रवेश करना चाहता हो।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.22.18)

समुद्धृतः करे तस्य तत्क्षणं रुरुचे शरः । महाभुजङ्गसन्दष्टो यथा बालभुजङ्गमः

samuddhṛtaḥ kare tasya tatkṣaṇaṁ ruruce śaraḥ | mahābhujaṅgasandaṣṭo yathā bālabhujaṅgamaḥ

उसके हाथ में उठाया गया वह बाण उसी क्षण ऐसे शोभित हुआ, जैसे कोई विशाल सर्प द्वारा डँसा गया छोटा सर्प।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.22.19)

शरेण घनतीव्रेण भद्रो रुद्रपराक्रमः । विव्याध कुपितो गाढं ललाटे विष्णुमव्ययम्

śareṇa ghanatīvreṇa bhadro rudraparākramaḥ | vivyādha kupito gāḍhaṁ lalāṭe viṣṇumavyayam

रुद्र के समान पराक्रमी क्रुद्ध भद्र ने उस सघन, तीक्ष्ण बाण से अविनाशी विष्णु के ललाट पर गहरा प्रहार किया।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.22.20)

ललाटेऽभिहतो विष्णुः पूर्वमेवावमानितः । चुकोप गणपेन्द्राय मृगेन्द्रायेव गोवृषः

lalāṭe'bhihato viṣṇuḥ pūrvamevāvamānitaḥ | cukopa gaṇapendrāya mṛgendrāyeva govṛṣaḥ

पहले ही अपमानित हो चुके, अब ललाट पर आहत हुए विष्णु उस गणेश्वर पर उसी प्रकार क्रुद्ध हो उठे, जैसे बैल सिंह पर क्रुद्ध होता है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.22.21)

ततस्त्वशनिकल्पेन क्रूरास्येन महेषुणा । विव्याध गणराजस्य भुजे भुजगसन्निभे

tatastvaśanikalpena krūrāsyena maheṣuṇā | vivyādha gaṇarājasya bhuje bhujagasannibhe

तत्पश्चात् वज्र के समान, क्रूर मुख वाले महान् बाण से उन्होंने गणराज की, सर्प के समान, भुजा में प्रहार किया।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.22.22)

सोऽपि तस्य भुजे भूयः सूर्यायुतसमप्रभम् । विससर्ज शरं वेगाद्वीरभद्रो महाबलः

so'pi tasya bhuje bhūyaḥ sūryāyutasamaprabham | visasarja śaraṁ vegādvīrabhadro mahābalaḥ

महाबली वीरभद्र ने भी उनकी भुजा पर पुनः दस हजार सूर्यों के समान तेजस्वी बाण वेगपूर्वक छोड़ा।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.22.23)

स च विष्णुः पुनर्भद्रं भद्रो विष्णुं तथा पुनः । स च तं च स तं विप्राः शरैस्तावनुजघ्नतुः

sa ca viṣṇuḥ punarbhadraṁ bhadro viṣṇuṁ tathā punaḥ | sa ca taṁ ca sa taṁ viprāḥ śaraistāvanujaghnatuḥ

हे विप्रो! विष्णु ने फिर भद्र पर, और भद्र ने फिर विष्णु पर, इस प्रकार वे दोनों बारी-बारी से बाणों से एक-दूसरे पर प्रहार करते रहे।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.22.24)

तयोः परस्परं वेगाच्छरानाशु विमुञ्चतोः । द्वयोः समभवद्युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम्

tayoḥ parasparaṁ vegāccharānāśu vimuñcatoḥ | dvayoḥ samabhavadyuddhaṁ tumulaṁ romaharṣaṇam

उन दोनों के बीच, वेगपूर्वक शीघ्रता से बाण छोड़ते हुए, एक अत्यन्त भीषण, रोमांचकारी युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.22.25)

तद्दृष्ट्वा तुमुलं युद्धं तयोरेव परस्परम् । हाहाकारो महानासीदाकाशे खेचरेरितः

taddṛṣṭvā tumulaṁ yuddhaṁ tayoreva parasparam | hāhākāro mahānāsīdākāśe khecareritaḥ

उन दोनों के उस भीषण युद्ध को देखकर, आकाश में विचरण करने वालों में एक महान् हाहाकार मच गया।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.22.26)

ततस्त्वनलतुण्डेन शरेणादित्यवर्चसा । विव्याध सुदृढं भद्रं विष्णोर्महति वक्षसि

tatastvanalatuṇḍena śareṇādityavarcasā | vivyādha sudṛḍhaṁ bhadraṁ viṣṇormahati vakṣasi

तत्पश्चात् विष्णु ने सूर्य के समान तेजस्वी, अग्निमुख बाण से दृढ़ भद्र के विशाल वक्षस्थल पर गहरा प्रहार किया।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.22.27)

स तु तीव्रप्रपातेन शरेण दृढमाहतः । महतीं रुजमासाद्य निपपात विमोहितः

sa tu tīvraprapātena śareṇa dṛḍhamāhataḥ | mahatīṁ rujamāsādya nipapāta vimohitaḥ

उस तीव्र वेग से गिरने वाले बाण से गहरा आहत होकर, वह अत्यन्त पीड़ा से मूर्च्छित होकर गिर पड़ा।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.22.28)

पुनः क्षणादिवोत्थाय लब्धसंज्ञस्तदा हरिः । सर्वाण्यपि च दिव्यास्त्राण्यथैनं प्रत्यवासृजत्

punaḥ kṣaṇādivotthāya labdhasaṁjñastadā hariḥ | sarvāṇyapi ca divyāstrāṇyathainaṁ pratyavāsṛjat

क्षणभर में ही पुनः उठकर, चेतना प्राप्त करके, विष्णु ने अपने समस्त दिव्य अस्त्रों को उसके विरुद्ध छोड़ दिया।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.22.29)

स च विष्णुर्धनुर्मुक्तान्सर्वान् शर्वचमूपतिः । सहसा वारयामास घोरैः प्रतिशरैः शरान्

sa ca viṣṇurdhanurmuktānsarvān śarvacamūpatiḥ | sahasā vārayāmāsa ghoraiḥ pratiśaraiḥ śarān

शर्व की सेना के अधिपति उस भद्र ने विष्णु के धनुष से छूटे हुए सभी बाणों को तुरन्त, भयंकर प्रतिबाणों से रोक दिया।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.22.30)

ततो विष्णुः स्वनामाङ्कं बाणमव्याहतं क्वचित् । ससर्ज क्रोधरक्ताक्षः तमुद्दिश्य गणेश्वरम् । तं बाणं बाणवर्येण भद्रो भद्राह्वयेण तु

tato viṣṇuḥ svanāmāṅkaṁ bāṇamavyāhataṁ kvacit | sasarja krodharaktākṣaḥ tamuddiśya gaṇeśvaram | taṁ bāṇaṁ bāṇavaryeṇa bhadro bhadrāhvayeṇa tu

तत्पश्चात्, क्रोध से रक्त-नेत्र हुए विष्णु ने अपने नाम से अंकित, अजेय बाण को उस गणेश्वर की ओर लक्ष्य करके छोड़ा। भद्र ने उस बाण को अपने "भद्र" नामक श्रेष्ठ बाण से —

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.22.31)

अप्राप्तमेव भगवान् चिच्छेद शतधा पथि । अथैकेनेषुणा शार्ङ्गं द्वाभ्यां पक्षौ गरुत्मतः

aprāptameva bhagavān ciccheda śatadhā pathi | athaikeneṣuṇā śārṅgaṁ dvābhyāṁ pakṣau garutmataḥ

— उस भगवान् ने उसे मार्ग में ही, पहुँचने से पहले, सौ टुकड़ों में काट डाला। तत्पश्चात् एक ही बाण से शार्ङ्ग धनुष को, और दो बाणों से गरुड़ के दोनों पंखों को —

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.22.32)

निमेषादेव चिच्छेद तदद्भुतमिवाभवत् । ततो योगबलाद्विष्णुर्देहाद्देवान् सुदारुणान्

nimeṣādeva ciccheda tadadbhutamivābhavat | tato yogabalādviṣṇurdehāddevān sudāruṇān

— पलक झपकते ही काट डाला, जो एक विचित्र आश्चर्य के समान प्रतीत हुआ। तत्पश्चात् विष्णु ने अपने योगबल से अपने शरीर से अत्यन्त भयंकर देवताओं को —

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.22.33)

शङ्खचक्रगदाहस्तान् विससर्ज सहस्रशः । सर्वांस्तान्क्षणमात्रेण त्रैपुरानिव शङ्करः

śaṅkhacakragadāhastān visasarja sahasraśaḥ | sarvāṁstānkṣaṇamātreṇa traipurāniva śaṅkaraḥ

— शंख, चक्र और गदा हाथों में लिए हुए, सहस्रों की संख्या में उत्पन्न किया। उस महाबाहु ने उन सबको उसी प्रकार क्षणमात्र में अपने नेत्र से उत्पन्न अग्नि से भस्म कर दिया, जैसे शंकर ने त्रिपुरवासियों को भस्म किया था।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.22.34)

निर्ददाह महाबाहुर्नेत्रसृष्टेन वह्निना । ततः क्रुद्धतरो विष्णुश्चक्रमुद्यम्य सत्वरः

nirdadāha mahābāhurnetrasṛṣṭena vahninā | tataḥ kruddhataro viṣṇuścakramudyamya satvaraḥ

तत्पश्चात् अत्यन्त क्रुद्ध हुए विष्णु ने शीघ्रतापूर्वक अपने चक्र को उठाकर —

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.22.35)

तस्मिन्वीरे समुत्स्रष्टुं तदानीमुद्यतोऽभवत् । तं दृष्ट्वा चक्रमुद्यम्य पुरतः समुपस्थितम्

tasminvīre samutsraṣṭuṁ tadānīmudyato'bhavat | taṁ dṛṣṭvā cakramudyamya purataḥ samupasthitam

— उस वीर पर उसे उसी समय छोड़ने के लिए तत्पर हो गए। उस चक्र को उठाए हुए, सामने उपस्थित विष्णु को देखकर,

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.22.36)

स्मयन्निव गणेशानो व्यष्टम्भयदयत्नतः । स्तम्भिताङ्गस्तु तच्चक्रं घोरमप्रतिमं क्वचित्

smayanniva gaṇeśāno vyaṣṭambhayadayatnataḥ | stambhitāṅgastu taccakraṁ ghoramapratimaṁ kvacit

गणेश्वर ने मानो मुसकराते हुए, बिना किसी प्रयास के, उस चक्र सहित उनके शरीर को स्तम्भित कर दिया। वह भयंकर, अनुपम चक्र भी —

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.22.37)

इच्छन्नपि समुत्स्रष्टुं न विष्णुरभवत्क्षमः । श्वसन्निवैकमुद्धृत्य बाहुं चक्रसमन्वितम्

icchannapi samutsraṣṭuṁ na viṣṇurabhavatkṣamaḥ | śvasannivaikamuddhṛtya bāhuṁ cakrasamanvitam

— इच्छा होते हुए भी विष्णु उसे छोड़ने में समर्थ न हो सके। चक्र सहित अपनी एक भुजा को उठाकर, जैसे साँस लेते हुए,

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.22.38)

अतिष्ठदलसो भूत्वा पाषाणामिव निश्चलः । विशरीरो यथा जीवो विशृङ्गो वा यथा वृषः

atiṣṭhadalaso bhūtvā pāṣāṇāmiva niścalaḥ | viśarīro yathā jīvo viśṛṅgo vā yathā vṛṣaḥ

वह निष्प्राण होकर, पत्थर के समान अचल खड़े रहे — जैसे शरीरहीन जीव, या जैसे सींगरहित वृषभ।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.22.39)

विदंष्ट्रश्च यथा सिंहस्तथा विष्णुरवस्थितः । तं दृष्ट्वा दुर्दशापन्नं विष्णुमिन्द्रादयः सुराः । समुन्नद्धा गणेन्द्रेण मृगेन्द्रेणेव गोवृषाः

vidaṁṣṭraśca yathā siṁhastathā viṣṇuravasthitaḥ | taṁ dṛṣṭvā durdaśāpannaṁ viṣṇumindrādayaḥ surāḥ | samunnaddhā gaṇendreṇa mṛgendreṇeva govṛṣāḥ

जैसे दाढ़-रहित सिंह हो, वैसे ही विष्णु खड़े रहे। उस दुर्दशा को प्राप्त विष्णु को देखकर, गणेश्वर से उत्तेजित हुए इन्द्रादि देवगण, जैसे सिंह से उत्तेजित बैल हों —

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.22.40)

प्रगृहीतायुधा यौद्धुं क्रुद्धाः समुपतस्थिरे । तान्दृष्ट्वा समरे भद्रः क्षुद्रानिव हरिर्मृगान्

pragṛhītāyudhā yauddhuṁ kruddhāḥ samupatasthire | tāndṛṣṭvā samare bhadraḥ kṣudrāniva harirmṛgān

— अपने शस्त्र उठाकर, क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए उपस्थित हुए। युद्धभूमि में उन्हें देखकर, भद्र ने, जैसे सिंह तुच्छ मृगों को देखता है,

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.22.41)

साक्षाद् रुद्रतनुर्वीरो वरवीरगणावृतः । अट्टहासेन घोरेण व्यष्टम्भयदनिन्दितः

sākṣād rudratanurvīro varavīragaṇāvṛtaḥ | aṭṭahāsena ghoreṇa vyaṣṭambhayadaninditaḥ

— साक्षात् रुद्र-स्वरूप, श्रेष्ठ वीरगणों से घिरा हुआ वह निष्कलंक वीर, अपने भयंकर अट्टहास से उन्हें स्तम्भित कर दिया।

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.22.42)

तथा शतमखस्यापि सवज्रो दक्षिणः करः । सिसृक्षोरेव उद्वज्रश्चित्रीकृत इवाभवत्

tathā śatamakhasyāpi savajro dakṣiṇaḥ karaḥ | sisṛkṣoreva udvajraścitrīkṛta ivābhavat

इसी प्रकार इन्द्र का भी वज्र सहित दायाँ हाथ, वज्र को उठाकर फेंकने के इच्छुक होते हुए भी, मानो चित्र में अंकित हो गया।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.22.43)

अन्येषामपि सर्वेषां सरक्ता अपि बाहवः । अलसानामिवारम्भास्तादृशाः प्रतियान्त्युत

anyeṣāmapi sarveṣāṁ saraktā api bāhavaḥ | alasānāmivārambhāstādṛśāḥ pratiyāntyuta

अन्य सभी देवताओं की भुजाएँ भी, रक्तवर्ण होते हुए भी, आलसी लोगों के आरम्भ किए गए कार्यों के समान, वैसे ही ठहरी रह गईं।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.22.44)

एवं भगवता तेन व्याहताशेषवैभवात् । अमराः समरे तस्य पुरतः स्थातुमक्षमाः

evaṁ bhagavatā tena vyāhatāśeṣavaibhavāt | amarāḥ samare tasya purataḥ sthātumakṣamāḥ

इस प्रकार उस भगवान् द्वारा उनका सम्पूर्ण ऐश्वर्य कुण्ठित हो जाने से, देवगण युद्ध में उसके सामने खड़े रहने में भी असमर्थ हो गए।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.22.45)

स्तब्धैरवयवैरेव दुद्रुवुर्भयविह्वलाः । स्थितिं च चक्रिरे युद्धे वीरतेजोऽभयाकुलाः

stabdhairavayavaireva dudruvurbhayavihvalāḥ | sthitiṁ ca cakrire yuddhe vīratejo'bhayākulāḥ

अपने स्तम्भित अंगों के साथ ही वे भयविह्वल होकर भागने लगे, और उस वीर के तेज से भयाकुल होकर ही युद्धस्थल में रुके रह गए।

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.22.46)

विद्रुतांस्त्रिदशान्वीरान्वीरभद्रो महाभुजः । विव्याध निशितैर्बाणैएर्मेघो वर्षैरिवाचलान्

vidrutāṁstridaśānvīrānvīrabhadro mahābhujaḥ | vivyādha niśitairbāṇaiermegho varṣairivācalān

महाभुज वीरभद्र ने भागते हुए उन देव-वीरों को तीक्ष्ण बाणों से उसी प्रकार बींध डाला, जैसे मेघ अपनी वर्षा-धाराओं से पर्वतों को बींध देता है।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.22.47)

बहवस्तस्य वीरस्य बाहवः परिघोपमाः । शस्त्रैश्चकाशिरे दीप्तैः साग्निज्वाला इवोरगाः

bahavastasya vīrasya bāhavaḥ parighopamāḥ | śastraiścakāśire dīptaiḥ sāgnijvālā ivoragāḥ

उस वीर की परिघ के समान अनेक भुजाएँ, प्रज्वलित शस्त्रों से युक्त होकर, ज्वालाओं से घिरे हुए सर्पों के समान चमक उठीं।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.22.48)

अस्त्रशस्त्राण्यनेकानि स वीरो विसृजन्बभौ । विसृजन्सर्वभूतानि यथादौ विश्वसम्भवः

astraśastrāṇyanekāni sa vīro visṛjanbabhau | visṛjansarvabhūtāni yathādau viśvasambhavaḥ

उन अनेक अस्त्र-शस्त्रों को छोड़ते हुए वह वीर ऐसे शोभित हुआ, जैसे सृष्टि के आरम्भ में विश्व-स्रष्टा समस्त प्राणियों की रचना करते हुए शोभित होते हैं।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.22.49)

यथा रश्मिभिरादित्यः प्रच्छादयति मेदिनीम् । तथा वीरः क्षणादेव शरैः प्राच्छादयद्दिशः

yathā raśmibhirādityaḥ pracchādayati medinīm | tathā vīraḥ kṣaṇādeva śaraiḥ prācchādayaddiśaḥ

जैसे सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी को आच्छादित कर देता है, वैसे ही उस वीर ने क्षणभर में अपने बाणों से समस्त दिशाओं को आच्छादित कर दिया।

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.22.50)

खमण्डले गणेन्द्रस्य शराः कनकभूषिताः । उत्पतन्तस्तडिद्रूपैरुपमानपदं ययुः

khamaṇḍale gaṇendrasya śarāḥ kanakabhūṣitāḥ | utpatantastaḍidrūpairupamānapadaṁ yayuḥ

आकाशमण्डल में उड़ते हुए उस गणेश्वर के स्वर्णभूषित बाण बिजलियों के समान प्रतीत होने लगे।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.22.51)

महान्तस्ते सुरगणान् मण्डूकानिव डुण्डुभाः । प्राणैर्वियोजयामासुः पपुश्च रुधिरासवम्

mahāntaste suragaṇān maṇḍūkāniva ḍuṇḍubhāḥ | prāṇairviyojayāmāsuḥ papuśca rudhirāsavam

वे विशाल बाण देवताओं के समूहों को, जैसे बड़े साँप मेंढकों को निगल जाते हैं, प्राणों से वियुक्त करने लगे, और रक्त-रूपी सुरा पान करने लगे।

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.22.52)

निकृत्तबाहवः केचित्केचिल्लूनवराननाः । पार्श्वे विदारिताः केचिन्निपेतुरमरा भुवि

nikṛttabāhavaḥ kecitkecillūnavarānanāḥ | pārśve vidāritāḥ kecinnipeturamarā bhuvi

कुछ देवता कटी हुई भुजाओं के साथ, कुछ कटे हुए श्रेष्ठ मुखों के साथ, और कुछ पार्श्व में चीरे जाकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.22.53)

विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्बहुभिश्छिन्नसन्धिभिः । विवृत्तनयनाः केचिन्निपेतुर्भूतले मृताः । गां प्रवेष्टुमिवेच्छन्तः खं गन्तुमिव लिप्सवः

viśikhonmathitairgātrairbahubhiśchinnasandhibhiḥ | vivṛttanayanāḥ kecinnipeturbhūtale mṛtāḥ | gāṁ praveṣṭumivecchantaḥ khaṁ gantumiva lipsavaḥ

बाणों से मथे हुए, अनेक जोड़ों से कटे हुए शरीरों के साथ, विस्फारित नेत्रों वाले कुछ देवता, मानो पृथ्वी में प्रवेश करने की इच्छा करते हुए, या मानो आकाश में जाना चाहते हुए, मृत होकर धरती पर गिर पड़े।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.22.54)

अलब्धात्मनिरोधानां व्यलीयन्तः परस्परम् । भूमौ केचित्प्रविविशुः पर्वतानां गुहाः परे

alabdhātmanirodhānāṁ vyalīyantaḥ parasparam | bhūmau kecitpraviviśuḥ parvatānāṁ guhāḥ pare

जो अपने-आप को रोक नहीं पा रहे थे, वे परस्पर एक-दूसरे में विलीन होते जाते थे; कुछ धरती में समा गए, कुछ पर्वतों की गुफाओं में जा घुसे।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.22.55)

अपरे जग्मुराकाशं परे च विविशुर्जलम् । तथा सञ्छिन्नसर्वाङ्गैः स वीरस्त्रिदशैर्बभौ

apare jagmurākāśaṁ pare ca viviśurjalam | tathā sañchinnasarvāṅgaiḥ sa vīrastridaśairbabhau

कुछ आकाश की ओर भाग गए, कुछ जल में जा घुसे; इस प्रकार वह वीर, समस्त अंगों से कटे हुए देवताओं से घिरा हुआ शोभित हुआ।

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.22.56)

परिग्रस्तः प्रजावर्गो भगवानिव भैरवः । दग्धत्रिपुरसंव्यूहस्त्रिपुरारिर्यथाऽभवत्

parigrastaḥ prajāvargo bhagavāniva bhairavaḥ | dagdhatripurasaṁvyūhastripurāriryathā'bhavat

उस प्रजासमूह को इस प्रकार ग्रस लेने वाला वह भगवान् साक्षात् भैरव के समान हो गया, जैसे त्रिपुर के सम्पूर्ण व्यूह को भस्म करने वाले त्रिपुरारि हो गए थे।

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.22.57)

एवं देवबलं सर्वं दीनं बीभत्सदर्शनम् । गणेश्वरसमुत्पन्नं कृपणं वपुराददे

evaṁ devabalaṁ sarvaṁ dīnaṁ bībhatsadarśanam | gaṇeśvarasamutpannaṁ kṛpaṇaṁ vapurādade

इस प्रकार गणेश्वर के हाथों से उत्पन्न होने पर, देवताओं की सम्पूर्ण सेना दीन, वीभत्स-दर्शन, तथा दयनीय रूप को प्राप्त हो गई।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.22.58)

तदा त्रिदशवीराणामसृक्सलिलवाहिनी । प्रावर्तत नदी घोरा प्राणिनां भयशंसिनी

tadā tridaśavīrāṇāmasṛksalilavāhinī | prāvartata nadī ghorā prāṇināṁ bhayaśaṁsinī

तब देव-वीरों के रक्त-जल से बहने वाली एक भयंकर नदी बह चली, जो प्राणियों में भय उत्पन्न करने वाली थी।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.22.59)

रुधिरेण परिक्लिन्ना यज्ञभूमिस्तदा बभौ । रक्तार्द्रवसना श्यामा हतशुम्भेव कैशिकी

rudhireṇa pariklinnā yajñabhūmistadā babhau | raktārdravasanā śyāmā hataśumbheva kaiśikī

रक्त से सराबोर यज्ञभूमि उस समय ऐसे शोभित हुई, जैसे रक्त से भीगे वस्त्रों वाली, श्यामवर्णा कैशिकी शुम्भ के मारे जाने पर शोभित हुई थी।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.22.60)

तस्मिन्महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे । भयेनेव परित्रस्ता प्रचचाल वसुन्धरा

tasminmahati saṁvṛtte samare bhṛśadāruṇe | bhayeneva paritrastā pracacāla vasundharā

उस महान्, अत्यन्त भीषण युद्ध के छिड़ जाने पर, पृथ्वी मानो भय से त्रस्त होकर काँप उठी।

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.22.61)

महोर्मिकलिलावर्तश्चुक्षुभे च महोदधिः । पेतुश्चोल्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः

mahormikalilāvartaścukṣubhe ca mahodadhiḥ | petuścolkā mahotpātāḥ śākhāśca mumucurdrumāḥ

विशाल तरंगों और भँवरों से भरा महासागर क्षुब्ध हो उठा, महान् उत्पातों के रूप में उल्काएँ गिरने लगीं, और वृक्षों ने अपनी शाखाएँ त्याग दीं।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.22.62)

अप्रसन्ना दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ । अहो विधिविपर्यासस्त्वश्वमेधोऽयमध्वरः । यजमानः स्वयं दक्षौ ब्रह्मपुत्रप्रजापतिः

aprasannā diśaḥ sarvāḥ pavanaścāśivo vavau | aho vidhiviparyāsastvaśvamedho'yamadhvaraḥ | yajamānaḥ svayaṁ dakṣau brahmaputraprajāpatiḥ

सभी दिशाएँ अशुभ हो गईं, और अशुभ वायु बहने लगी। "अहो! कैसा विधि का विपर्यास है — यह अश्वमेध यज्ञ है, यजमान स्वयं ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष हैं,

श्लोक 63 (shiva.vayaviya.22.63)

धर्मादयः सदस्याश्च रक्षतो गरुडध्वजः । भागांश्च प्रतिगृह्णन्ति साक्षादिन्द्रादयः सुराः

dharmādayaḥ sadasyāśca rakṣato garuḍadhvajaḥ | bhāgāṁśca pratigṛhṇanti sākṣādindrādayaḥ surāḥ

धर्म आदि इसके सभासद हैं, गरुड़ध्वज स्वयं इसकी रक्षा करने वाले हैं, और साक्षात् इन्द्र आदि देवगण इसके भाग ग्रहण करने वाले हैं —

श्लोक 64 (shiva.vayaviya.22.64)

तथापि यजमानस्य यज्ञस्य च सहर्त्विजः । सद्य एव शिरश्छेदः साधु सम्पद्यते फलम्

tathāpi yajamānasya yajñasya ca sahartvijaḥ | sadya eva śiraśchedaḥ sādhu sampadyate phalam

फिर भी यजमान का, यज्ञ का, और ऋत्विजों सहित सबका शिरश्छेद ही तत्काल इसका उचित फल बन गया!"

श्लोक 65 (shiva.vayaviya.22.65)

तस्मान्नावेदनिर्दिष्टं न चेश्वरबहिष्कृतम् । नासत्परिगृहीतं च कर्म कुर्यात्कदाचन

tasmānnāvedanirdiṣṭaṁ na ceśvarabahiṣkṛtam | nāsatparigṛhītaṁ ca karma kuryātkadācana

इसलिए मनुष्य को कभी भी ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए, जो वेद-निर्दिष्ट न हो, जो ईश्वर से बहिष्कृत हो, अथवा जो असज्जनों द्वारा अनुमोदित हो।

श्लोक 66 (shiva.vayaviya.22.66)

कृत्वापि सुमहत्पुण्यमिष्ट्वा यज्ञशतैरपि । न तत्फलमवाप्नोति भक्तिहीनो महेश्वरे

kṛtvāpi sumahatpuṇyamiṣṭvā yajñaśatairapi | na tatphalamavāpnoti bhaktihīno maheśvare

महान् पुण्य करके, सैकड़ों यज्ञों का अनुष्ठान करके भी, जो महेश्वर के प्रति भक्तिहीन है, वह उनका फल प्राप्त नहीं करता।

श्लोक 67 (shiva.vayaviya.22.67)

कृत्वापि सुमहत्पापं भक्त्या यजति यः शिवम् । मुच्यते पातकैः सर्वैर्नात्र कार्या विचारणा

kṛtvāpi sumahatpāpaṁ bhaktyā yajati yaḥ śivam | mucyate pātakaiḥ sarvairnātra kāryā vicāraṇā

महान् पाप करके भी जो भक्तिपूर्वक शिव का यजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 68 (shiva.vayaviya.22.68)

बहुनात्र किमुक्तेन वृथा दानं वृथा तपः । वृथा यज्ञो वृथा होमः शिवनिन्दारतस्य तु

bahunātra kimuktena vṛthā dānaṁ vṛthā tapaḥ | vṛthā yajño vṛthā homaḥ śivanindāratasya tu

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? शिव की निन्दा में रत व्यक्ति का दान व्यर्थ है, तप व्यर्थ है, यज्ञ व्यर्थ है, और होम भी व्यर्थ है।

श्लोक 69 (shiva.vayaviya.22.69)

ततः सनारायणकाः सरुद्राः सलोकपालाः समरे सुरौघाः । गणेन्द्रचापच्युतबाणविद्धाः प्रदुद्रुवुर्गाढरुजाभिभूताः

tataḥ sanārāyaṇakāḥ sarudrāḥ salokapālāḥ samare suraughāḥ | gaṇendracāpacyutabāṇaviddhāḥ pradudruvurgāḍharujābhibhūtāḥ

तत्पश्चात् नारायण सहित, रुद्रों सहित, लोकपालों सहित देवताओं के समूह, गणेश्वर के धनुष से छूटे हुए बाणों से बिंधकर, गहरी पीड़ा से अभिभूत होकर युद्धभूमि से भाग खड़े हुए।

श्लोक 70 (shiva.vayaviya.22.70)

चेलुः क्वचित्केचन शीर्णकेशाः सेदुः क्वचित्केचन दीर्घगात्राः । पेतुः क्वचित्केचन भिन्नवक्त्रा नेशुः क्वचित्केचन देववीराः

celuḥ kvacitkecana śīrṇakeśāḥ seduḥ kvacitkecana dīrghagātrāḥ | petuḥ kvacitkecana bhinnavaktrā neśuḥ kvacitkecana devavīrāḥ

कहीं कुछ देव-वीर बिखरे केशों के साथ डगमगाते थे, कहीं कुछ अपने लम्बे शरीरों को घसीटते हुए बैठ जाते थे, कहीं कुछ फटे मुखों के साथ गिर पड़ते थे, तो कहीं कुछ नष्ट हो जाते थे।

श्लोक 71 (shiva.vayaviya.22.71)

केचिच्च तत्र त्रिदशा विपन्ना विस्रस्तवस्त्राभरणास्त्रशस्त्राः । निपेतुरुद्भासितदीनमुद्रा मदं च दर्पं च बलं च हित्वा

kecicca tatra tridaśā vipannā visrastavastrābharaṇāstraśastrāḥ | nipeturudbhāsitadīnamudrā madaṁ ca darpaṁ ca balaṁ ca hitvā

वहाँ कुछ देवगण, वस्त्र, आभूषण और अस्त्र-शस्त्र गिराते हुए, अपने मद, दर्प और बल को त्यागकर, दीनता प्रकट करते हुए विपत्तिग्रस्त होकर गिर पड़े।

श्लोक 72 (shiva.vayaviya.22.72)

सस्मुत्पथप्रस्थितमप्रधृष्यो विक्षिप्य दक्षाध्वरमक्षतास्त्रैः । बभौ गणेशः स गणेश्वराणां मध्ये स्थितः सिंह इवर्षभाणाम्

sasmutpathaprasthitamapradhṛṣyo vikṣipya dakṣādhvaramakṣatāstraiḥ | babhau gaṇeśaḥ sa gaṇeśvarāṇāṁ madhye sthitaḥ siṁha ivarṣabhāṇām

दक्ष के यज्ञ को अपने अक्षत अस्त्रों से नष्ट करके, उस अजेय गणेश्वर ने आकाश-मार्ग की ओर प्रस्थान किया; वह गणेश्वरों के मध्य स्थित होकर ऐसा शोभित हुआ, जैसे सिंह वृषभों के मध्य शोभित होता है।

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