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वायवीय संहिता · अध्याय 21

देवताओं का दण्ड

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.21.1)

वायुरुवाच । ततस्त्रिदशमुख्यास्ते विष्णुशक्रपुरोगमाः । सर्वे भयपरित्रस्ता दुद्रुवुर्भयविह्वलाः

vāyuruvāca | tatastridaśamukhyāste viṣṇuśakrapurogamāḥ | sarve bhayaparitrastā dudruvurbhayavihvalāḥ

वायु ने कहा — तत्पश्चात् विष्णु और इन्द्र के नेतृत्व में वे सभी प्रमुख देवगण भय से त्रस्त होकर, भय से व्याकुल हो भागने लगे।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.21.2)

निजैरदूषितैरङ्गैर्दृष्ट्वा देवानुपद्रुतान् । दण्ड्यानदण्डितान् मत्वा चुकोप गणपुङ्गवः

nijairadūṣitairaṅgairdṛṣṭvā devānupadrutān | daṇḍyānadaṇḍitān matvā cukopa gaṇapuṅgavaḥ

दण्डनीय होते हुए भी अदण्डित देवताओं को अपने ही अंगों से अछूता देखकर, वह गणश्रेष्ठ क्रुद्ध हो उठा।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.21.3)

ततस्त्रिशूलमादाय शर्वशक्तिनिबर्हणम् । ऊर्ध्वदृष्टिर्महाबाहुर्मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन्

tatastriśūlamādāya śarvaśaktinibarhaṇam | ūrdhvadṛṣṭirmahābāhurmukhājjvālāḥ samutsṛjan

तत्पश्चात् शर्व के शक्ति के समान संहारक त्रिशूल को धारण कर, ऊर्ध्वदृष्टि वाला वह महाबाहु अपने मुख से ज्वालाएँ फेंकता हुआ —

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.21.4)

अमरानपि दुद्राव द्विरदानिव केसरी । तानभिद्रवतस्तस्य गमनं सुमनोहरम्

amarānapi dudrāva dviradāniva kesarī | tānabhidravatastasya gamanaṁ sumanoharam

— देवताओं की ओर भी उसी प्रकार दौड़ा, जैसे सिंह हाथियों की ओर दौड़ता है; उनकी ओर दौड़ते हुए उसकी गति अत्यन्त मनोहर थी।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.21.5)

वारणस्येव मत्तस्य जगाम प्रेक्षणीयताम् । ततस्तत्क्षोभयामास महत्सुरबलं बली

vāraṇasyeva mattasya jagāma prekṣaṇīyatām | tatastatkṣobhayāmāsa mahatsurabalaṁ balī

वह मतवाले हाथी के समान दर्शनीय हो गया। तत्पश्चात् उस बलशाली ने देवताओं की विशाल सेना को क्षुब्ध कर दिया।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.21.6)

महासरोवरं यद्वन्मत्तो वारणयूथपः । विकुर्वन्बहुधा वर्णान्नीलपाण्डुरलोहितान्

mahāsarovaraṁ yadvanmatto vāraṇayūthapaḥ | vikurvanbahudhā varṇānnīlapāṇḍuralohitān

जैसे मतवाला गजराज विशाल सरोवर को मथ डालता है, वैसे ही उसने देवसेना को मथ डाला; वह नील, पाण्डुर और लाल — नाना प्रकार के रंगों को धारण करता हुआ,

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.21.7)

बिभ्रद् व्याघ्राजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् । छिन्दन् भिन्दन्नुदन् क्लिन्दन्दारयन्प्रमथन्नपि

bibhrad vyāghrājinaṁ vāso hemapravaratārakam | chindan bhindannudan klindandārayanpramathannapi

सुवर्ण के श्रेष्ठ तारकों से सुशोभित व्याघ्रचर्म का वस्त्र धारण किए हुए, काटता, भेदता, उखाड़ता, भिगोता, चीरता और मथता हुआ —

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.21.8)

व्यचरद्देवसङ्घेषु भद्रोऽग्निरिव कक्षगः । यत्र तत्र महावेगाच्चरन्तं शूलधारिणम्

vyacaraddevasaṅgheṣu bhadro'gniriva kakṣagaḥ | yatra tatra mahāvegāccarantaṁ śūladhāriṇam

— भद्र, वन में लगी हुई अग्नि के समान, देवसमूहों के मध्य विचरण करने लगा; वह त्रिशूलधारी इधर-उधर महावेग से संचरित होता था।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.21.9)

तमेकं त्रिदशाः सर्वे सहस्रमिव मेनिरे । भद्रकाली च सङ्क्रुद्धा युद्धवृद्धमदोद्धता

tamekaṁ tridaśāḥ sarve sahasramiva menire | bhadrakālī ca saṅkruddhā yuddhavṛddhamadoddhatā

उस एक को ही सभी देवताओं ने मानो सहस्र रूपों में देखा। और भद्रकाली भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर, युद्ध से बढ़ते हुए मद से उद्धत होकर —

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.21.10)

मुक्तज्वालेन शूलेन निर्बिभेद रणे सुरान् । स तया रुरुचे भद्रो रुद्रकोपसमुद्भवः

muktajvālena śūlena nirbibheda raṇe surān | sa tayā ruruce bhadro rudrakopasamudbhavaḥ

— ज्वालाएँ फेंकते हुए त्रिशूल से युद्ध में देवताओं को बींध डालने लगी। रुद्र के क्रोध से उत्पन्न वह भद्र उसके साथ शोभित हुआ।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.21.11)

प्रभयेव युगान्ताग्निश्चलया धूमधूम्रया । भद्रकाली तदा युद्धे विद्रुतत्रिदशा बभौ

prabhayeva yugāntāgniścalayā dhūmadhūmrayā | bhadrakālī tadā yuddhe vidrutatridaśā babhau

उस समय भद्रकाली, धूम्रवर्णी चंचल कान्ति से युक्त, युगान्तकालीन अग्नि की प्रभा के समान, देवताओं को भगाती हुई युद्ध में शोभित हुई।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.21.12)

कल्पे शेषानलज्वाला दग्धाविश्वजगद्यथा । तदा सवाजिनं सूर्यं रुद्रान् रुद्रगणाग्रणीः

kalpe śeṣānalajvālā dagdhāviśvajagadyathā | tadā savājinaṁ sūryaṁ rudrān rudragaṇāgraṇīḥ

जैसे कल्पान्त में शेषनाग की अग्निज्वाला सम्पूर्ण विश्व को भस्म कर देती है। तब रुद्रगणों के अग्रणी उस भद्र ने अश्व सहित सूर्य को, तथा रुद्रों को —

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.21.13)

भद्रो मूर्ध्नि जघानाशु वामपादेन लीलया । असिभिः पावकं भद्रः पट्टिशैस्तु यमं यमीम्

bhadro mūrdhni jaghānāśu vāmapādena līlayā | asibhiḥ pāvakaṁ bhadraḥ paṭṭiśaistu yamaṁ yamīm

— क्रीड़ामात्र में अपने बाएँ पैर से तुरन्त सिर पर प्रहार किया। भद्र ने तलवारों से अग्नि को, और पट्टिशों से यम और यमी को —

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.21.14)

रुद्रान् दृढेन शूलेन मुद्गरैर्वरुणं दृढैः । परिघैर्निरृतिं वायुं टङ्कैष्टङ्कधरः स्वयम्

rudrān dṛḍhena śūlena mudgarairvaruṇaṁ dṛḍhaiḥ | parighairnirṛtiṁ vāyuṁ ṭaṅkaiṣṭaṅkadharaḥ svayam

— दृढ़ त्रिशूल से रुद्रों को, दृढ़ मुद्गरों से वरुण को, गदाओं से निर्ऋति को, तथा स्वयं टंक धारण किए हुए, टंकों से वायु को —

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.21.15)

निर्बिभेद रणे वीरो लीलयैव गणेश्वरः । सर्वान्देवगणान्सद्यो मुनीन् शम्भोर्विरोधिनः

nirbibheda raṇe vīro līlayaiva gaṇeśvaraḥ | sarvāndevagaṇānsadyo munīn śambhorvirodhinaḥ

— उस वीर गणेश्वर ने युद्ध में क्रीड़ामात्र से ही, शम्भु के समस्त विरोधी देवगणों और मुनियों को छेद डाला।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.21.16)

ततो देवः सरस्वत्या नासिकाग्रं सुशोभनम् । चिच्छेद करजाग्रेण देवमातुस्तथैव च

tato devaḥ sarasvatyā nāsikāgraṁ suśobhanam | ciccheda karajāgreṇa devamātustathaiva ca

तत्पश्चात् उस देव ने सरस्वती की सुन्दर नासिका के अग्रभाग को, तथा देवमाता (अदिति) की भी नासिका को अपने नखाग्र से काट डाला।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.21.17)

चिच्छेद च कुठारेण बाहुदण्डं विभावसोः । अग्रतो द्व्यङ्गुलां जिह्वामात्तहव्यां लुलाव च

ciccheda ca kuṭhāreṇa bāhudaṇḍaṁ vibhāvasoḥ | agrato dvyaṅgulāṁ jihvāmāttahavyāṁ lulāva ca

उसने कुठार से विभावसु (अग्नि) की भुजा को काट डाला, और हविष्य ग्रहण करने वाली उसकी दो अंगुल की जिह्वा को भी अगले भाग से नोच डाला।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.21.18)

स्वाहादेव्यास्तथा देवो दक्षिणं नासिकापुटम् । चकर्त करजाग्रेण वामं च स्तनचूचुकम्

svāhādevyāstathā devo dakṣiṇaṁ nāsikāpuṭam | cakarta karajāgreṇa vāmaṁ ca stanacūcukam

उस देव ने देवी स्वाहा की दाहिनी नासिका को, और उसके बाएँ स्तन के अग्रभाग को भी अपने नखाग्र से काट डाला।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.21.19)

भगस्य विपुले नेत्रे शतपत्रसमप्रभे । प्रसह्योत्पाटयामास भद्रः परमवेगवान्

bhagasya vipule netre śatapatrasamaprabhe | prasahyotpāṭayāmāsa bhadraḥ paramavegavān

अत्यन्त वेगवान् भद्र ने कमल के समान कान्तिमान् भग की दोनों विशाल आँखों को बलपूर्वक उखाड़ फेंका।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.21.20)

पूष्णो दशनरेखां च दीप्तां मुक्तावलीमिव । जघान धनुषः कोट्या स तेनास्पष्टवागभूत्

pūṣṇo daśanarekhāṁ ca dīptāṁ muktāvalīmiva | jaghāna dhanuṣaḥ koṭyā sa tenāspaṣṭavāgabhūt

उसने पूषा के दाँतों की, मोतियों की माला के समान चमकती हुई, पंक्ति को धनुष के अगले सिरे से तोड़ डाला, जिससे वह अस्पष्ट वाणी वाला हो गया।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.21.21)

ततश्चन्द्रमसं देवः पादाङ्गुष्ठेन लीलया । क्षणं कृमिवदाक्रम्य घर्षयामास भूतले

tataścandramasaṁ devaḥ pādāṅguṣṭhena līlayā | kṣaṇaṁ kṛmivadākramya gharṣayāmāsa bhūtale

तत्पश्चात् उस देव ने चन्द्रमा को अपने पैर के अंगूठे से क्रीड़ामात्र में, कीड़े के समान क्षणभर के लिए दबाकर, धरती पर रगड़ डाला।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.21.22)

शिरश्चिच्छेद दक्षस्य भद्रः परमकोपतः । क्रोशन्त्यामेव वैरिण्यां भद्रकाल्यै ददौ च तत्

śiraściccheda dakṣasya bhadraḥ paramakopataḥ | krośantyāmeva vairiṇyāṁ bhadrakālyai dadau ca tat

अत्यन्त क्रोधित भद्र ने दक्ष का सिर काट डाला, और उसकी शत्रु उसे चीत्कार करते हुए ही उस सिर को भद्रकाली को दे दिया।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.21.23)

तत्प्रहृष्टा समादाय शिरस्तालफलोपमम् । सा देवी कन्दुकक्रीडां चकार समराङ्गणे

tatprahṛṣṭā samādāya śirastālaphalopamam | sā devī kandukakrīḍāṁ cakāra samarāṅgaṇe

उसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके, ताड़फल के समान उस सिर से, वह देवी युद्धभूमि में गेंद-क्रीड़ा करने लगी।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.21.24)

ततो दक्षस्य यज्ञस्त्री कुशीला भर्तृभिर्यथा । पादाभ्यां चैव हस्ताभ्यां हन्यते स्म गणेश्वरैः

tato dakṣasya yajñastrī kuśīlā bhartṛbhiryathā | pādābhyāṁ caiva hastābhyāṁ hanyate sma gaṇeśvaraiḥ

तत्पश्चात्, जैसे कुलटा स्त्री अपने पतियों द्वारा पीटी जाती है, वैसे ही दक्ष की यज्ञ-स्त्री (यज्ञमूर्ति) को गणेश्वरों ने हाथों और पैरों से पीटा।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.21.25)

अरिष्टनेमिनं सोमं धर्मं चैव प्रजापतिम् । बहुपुत्रं चाङ्गिरसं कृशाश्वं काश्यपं तथा

ariṣṭaneminaṁ somaṁ dharmaṁ caiva prajāpatim | bahuputraṁ cāṅgirasaṁ kṛśāśvaṁ kāśyapaṁ tathā

अरिष्टनेमि, सोम, प्रजापति धर्म, बहुपुत्र, अंगिरा, कृशाश्व, तथा कश्यप —

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.21.26)

गले प्रगृह्य बलिनो गणपाः सिंहविक्रमाः । भर्त्सयन्तो भृशं वाग्भिर्निजघ्नुर्मूर्ध्नि मुष्टिभिः

gale pragṛhya balino gaṇapāḥ siṁhavikramāḥ | bhartsayanto bhṛśaṁ vāgbhirnijaghnurmūrdhni muṣṭibhiḥ

— इन सबको सिंह के समान पराक्रमी बलशाली गणपतियों ने गले से पकड़कर, कठोर वचनों से धमकाते हुए, मुष्टिप्रहार से सिर पर मारा।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.21.27)

धर्षिता भूतवेतालैर्दाराः सुतपरिग्रहाः । यथा कलियुगे जारैर्बलेन कुलयोषितः

dharṣitā bhūtavetālairdārāḥ sutaparigrahāḥ | yathā kaliyuge jārairbalena kulayoṣitaḥ

भूत-वेतालों ने उनकी पत्नियों तथा पुत्र-वधुओं के साथ बलात्कार किया, जैसे कलियुग में जार पुरुष बलपूर्वक कुलीन स्त्रियों के साथ करते हैं।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.21.28)

तच्च विध्वस्तकलशं भग्नयूपं गतोत्सवम् । प्रदीपितमहाशालं प्रभिन्नद्वारतोरणम्

tacca vidhvastakalaśaṁ bhagnayūpaṁ gatotsavam | pradīpitamahāśālaṁ prabhinnadvāratoraṇam

उस यज्ञ-मण्डप के कलश ध्वस्त हो गए, यूप टूट गए, उत्सव समाप्त हो गया; उसका विशाल भवन आग की लपटों में घिर गया, द्वार और तोरण टूट गए।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.21.29)

उत्पाटितसुरानीकं हन्यमानतपोधनम् । प्रशान्तब्रह्मनिर्घोषं प्रक्षीणजनसञ्चयम्

utpāṭitasurānīkaṁ hanyamānatapodhanam | praśāntabrahmanirghoṣaṁ prakṣīṇajanasañcayam

देवताओं की सेना उखड़ गई, तपस्वी मारे जा रहे थे, वेद-घोष शान्त हो गया, जनसमूह क्षीण हो गया।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.21.30)

क्रन्दमानातुरस्त्रीकं हताशेषपरिच्छदम् । शून्यारण्यनिभं जज्ञे यज्ञवाटं तदार्दितम्

krandamānāturastrīkaṁ hatāśeṣaparicchadam | śūnyāraṇyanibhaṁ jajñe yajñavāṭaṁ tadārditam

स्त्रियाँ पीड़ित होकर विलाप कर रही थीं, समस्त सामग्री नष्ट हो चुकी थी; वह पीड़ित यज्ञ-मण्डप एक सूने वन के समान हो गया।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.21.31)

शूलवेगप्ररुग्णाश्च भिन्नबाहूरुवक्षसः । विनिकृत्तोत्तमाङ्गाश्च पेतुरुर्व्यां सुरोत्तमाः

śūlavegaprarugṇāśca bhinnabāhūruvakṣasaḥ | vinikṛttottamāṅgāśca petururvyāṁ surottamāḥ

त्रिशूल के वेग से चूर-चूर, भुजा-जंघा-वक्षस्थल टूटे हुए, तथा कटे हुए सिरों वाले वे श्रेष्ठ देवगण पृथ्वी पर गिर पड़े।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.21.32)

हतेषु तेषु देवेषु पतितेषु सहस्रशः । प्रविवेश गणेशानः क्षणादाहवनीयकम्

hateṣu teṣu deveṣu patiteṣu sahasraśaḥ | praviveśa gaṇeśānaḥ kṣaṇādāhavanīyakam

उन सहस्रों देवताओं के मारे जाकर गिर जाने पर, वह गणेश्वर क्षणभर में आहवनीय अग्निकुण्ड में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.21.33)

प्रविष्टमथ तं दृष्ट्वा भद्रं कालाग्निसन्निभम् । दुद्राव मरणाद्भीतो यज्ञो मृगवपुर्धरः

praviṣṭamatha taṁ dṛṣṭvā bhadraṁ kālāgnisannibham | dudrāva maraṇādbhīto yajño mṛgavapurdharaḥ

कालाग्नि के समान उस भद्र को अग्निकुण्ड में प्रविष्ट होते देखकर, मृगरूपधारी यज्ञ मृत्यु से भयभीत होकर भाग गया।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.21.34)

स विस्फार्य महच्चापं दृढज्याघोषणभीषणम् । भद्रस्तमभिदुद्राव विक्षिपन्नेव सायकान्

sa visphārya mahaccāpaṁ dṛḍhajyāghoṣaṇabhīṣaṇam | bhadrastamabhidudrāva vikṣipanneva sāyakān

उस भद्र ने अपने विशाल धनुष को, जिसकी दृढ़ प्रत्यंचा की टंकार भयंकर थी, खींचकर, बाणों की वर्षा करता हुआ उसके पीछे दौड़ लगाई।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.21.35)

आकर्णपूर्णमाकृष्टं धनुरम्बुदसन्निभम् । नादयामास च ज्यां द्यां खं च भूमिं च सर्वशः

ākarṇapūrṇamākṛṣṭaṁ dhanurambudasannibham | nādayāmāsa ca jyāṁ dyāṁ khaṁ ca bhūmiṁ ca sarvaśaḥ

मेघ के समान गर्जनशील उस धनुष को कान तक खींचकर, उसने अपनी प्रत्यंचा की टंकार से आकाश, अन्तरिक्ष और पृथ्वी को सब ओर गुंजायमान कर दिया।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.21.36)

तमुपश्रुत्य सन्नादं हतोऽस्मीत्येव विह्वलम् । शरेणार्धेन वक्रेण स वीरोऽध्वरपूरुषम्

tamupaśrutya sannādaṁ hato'smītyeva vihvalam | śareṇārdhena vakreṇa sa vīro'dhvarapūruṣam

उस टंकार को सुनकर "मैं मारा गया" — ऐसा सोचकर व्याकुल हुए यज्ञपुरुष को, उस वीर ने अपने अर्धचन्द्राकार बाण से —

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.21.37)

महाभयस्खलत्पादं वेपन्तं विगतत्विषम् । मृगरूपेण धावन्तं विशिरस्कं तदाकरोत्

mahābhayaskhalatpādaṁ vepantaṁ vigatatviṣam | mṛgarūpeṇa dhāvantaṁ viśiraskaṁ tadākarot

— महाभय से लड़खड़ाते चरणों वाले, काँपते हुए, कान्तिहीन, मृगरूप में भागते हुए उस यज्ञपुरुष को शिरहीन कर दिया।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.21.38)

तमीदृशमवज्ञातं दृष्ट्वा वै सूर्यसम्भवम् । विष्णुः परमसङ्क्रुद्धो युद्धायाभवदुद्यतः

tamīdṛśamavajñātaṁ dṛṣṭvā vai sūryasambhavam | viṣṇuḥ paramasaṅkruddho yuddhāyābhavadudyataḥ

सूर्यवंश में उत्पन्न उस यज्ञपुरुष को इस प्रकार अपमानित होते देखकर विष्णु अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए उद्यत हुए।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.21.39)

तमुवाह महावेगात्स्कन्धेन नतसन्धिना । सर्वेषां वयसां राजा गरुडः पन्नगाशनः

tamuvāha mahāvegātskandhena natasandhinā | sarveṣāṁ vayasāṁ rājā garuḍaḥ pannagāśanaḥ

सभी पक्षियों के राजा, सर्पभक्षी गरुड़ ने अपने झुके हुए कन्धे पर, महावेग से उन्हें धारण किया।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.21.40)

देवाश्च हतशिष्टा ये देवराजपुरोगमाः । प्रचक्रुस्तस्य साहाय्यं प्राणांस्त्यक्तुमिवोद्यताः

devāśca hataśiṣṭā ye devarājapurogamāḥ | pracakrustasya sāhāyyaṁ prāṇāṁstyaktumivodyatāḥ

जो देवगण मारे जाने से बचे रह गए थे, वे इन्द्र के नेतृत्व में, अपने प्राणों को त्यागने के लिए मानो उद्यत होकर, उसकी सहायता करने लगे।

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.21.41)

विष्णुना सहितान् देवान् मृगेन्द्रः क्रोष्टुकानिव । दृष्ट्वा जहास भूतेन्द्रो मृगेन्द्र इव विव्यथः

viṣṇunā sahitān devān mṛgendraḥ kroṣṭukāniva | dṛṣṭvā jahāsa bhūtendro mṛgendra iva vivyathaḥ

विष्णु सहित उन देवताओं को, जैसे सिंह सियारों को देखकर हँसता है, वैसे ही भूतगणों के अधिपति (वीरभद्र) ने देखकर उपहास किया; और वे, यद्यपि स्वयं सिंह के समान थे, फिर भी व्यथित हो उठे।

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