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वायवीय संहिता · अध्याय 6

शिवतत्त्व-ज्ञान का वर्णन (द्वितीय भाग)

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.6.1)

मुनय ऊचुः । योऽयं पशुरिति प्रोक्तो यश्च पाश उदाहृतः । आभ्यां विलक्षणः कश्चित्कोऽयमस्ति तयोः पतिः

munaya ūcuḥ | yo'yaṁ paśuriti prokto yaśca pāśa udāhṛtaḥ | ābhyāṁ vilakṣaṇaḥ kaścitko'yamasti tayoḥ patiḥ

मुनियों ने कहा — जो यह पशु कहा गया है, और जो पाश कहा गया है — क्या इन दोनों से भिन्न कोई है? उन दोनों का यह पति कौन है?

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.6.2)

वायुरुवाच । अस्ति कश्चिदपर्यन्तरमणीयगुणाश्रयः । पतिर्विश्वस्य निर्माता पशुपाशविमोचनः

vāyuruvāca | asti kaścidaparyantaramaṇīyaguṇāśrayaḥ | patirviśvasya nirmātā paśupāśavimocanaḥ

वायु देव ने कहा — कोई ऐसा है जो असीम, रमणीय गुणों का आश्रय है — विश्व का निर्माता, पशु-पाश से मुक्त करने वाला पति।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.6.3)

अभावे तस्य विश्वस्य सृष्टिरेषा कथं भवेत् । अचेतनत्वादज्ञानादनयोः पशुपाशयोः

abhāve tasya viśvasya sṛṣṭireṣā kathaṁ bhavet | acetanatvādajñānādanayoḥ paśupāśayoḥ

उसके अभाव में यह सृष्टि कैसे हो सकती थी, क्योंकि पशु और पाश दोनों ही क्रमशः अचेतन और अज्ञान-स्वरूप हैं?

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.6.4)

प्रधानपरमाण्वादि यावत्किञ्चिदचेतनम् । तत्कर्तृकं स्वयं दृष्टं बुद्धिमत्कारणं विना

pradhānaparamāṇvādi yāvatkiñcidacetanam | tatkartṛkaṁ svayaṁ dṛṣṭaṁ buddhimatkāraṇaṁ vinā

प्रधान, परमाणु आदि जो भी अचेतन वस्तु है, वह बुद्धिमान कारण के बिना स्वयं कर्ता नहीं हो सकती — यह स्वयं देखा गया है।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.6.5)

जगच्च कर्तृसापेक्षं कार्यं सावयवं यतः । तस्मात्कार्यस्य कर्तृत्वं पत्युर्न पशुपाशयोः

jagacca kartṛsāpekṣaṁ kāryaṁ sāvayavaṁ yataḥ | tasmātkāryasya kartṛtvaṁ patyurna paśupāśayoḥ

और यह जगत, अवयवों से युक्त कार्य होने के कारण, कर्ता की अपेक्षा रखता है; इसलिए इस कार्य का कर्तृत्व पति का है, पशु-पाश का नहीं।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.6.6)

पशोरपि च कर्तृत्वं पत्युः प्रेरणपूर्वकम् । अयथाकरणज्ञानमन्धस्य गमनं यथा

paśorapi ca kartṛtvaṁ patyuḥ preraṇapūrvakam | ayathākaraṇajñānamandhasya gamanaṁ yathā

पशु का कर्तृत्व भी पति की प्रेरणा-पूर्वक ही होता है — जैसे अंधे व्यक्ति का चलना [बिना उचित साधन-ज्ञान के, दूसरे के सहारे ही होता है]।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.6.7)

आत्मानं च पृथङ्मत्वा प्रेरितारं ततः पृथक् । असौ जुष्टस्ततस्तेन ह्यमृतत्वाय कल्पते

ātmānaṁ ca pṛthaṁmatvā preritāraṁ tataḥ pṛthak | asau juṣṭastatastena hyamṛtatvāya kalpate

आत्मा को पृथक् जानकर, और प्रेरक को उससे भी पृथक् जानकर, उससे युक्त हुआ पुरुष अमरत्व के योग्य हो जाता है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.6.8)

पशोः पाशस्य पत्युश्च तत्त्वतोऽस्ति पदं परम् । ब्रह्मवित् तद्विदित्वैव योनिमुक्तो भविष्यति

paśoḥ pāśasya patyuśca tattvato'sti padaṁ param | brahmavit tadviditvaiva yonimukto bhaviṣyati

पशु, पाश और पति का, वास्तव में, एक परम पद है; ब्रह्मवेत्ता उसे जानकर ही जन्म से मुक्त हो जाएगा।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.6.9)

संयुक्तमेतद् द्वितयं क्षरमक्षरमेव च । व्यक्ताव्यक्तं बिभर्तीशो विश्वं विश्वविमोचकः

saṁyuktametad dvitayaṁ kṣaramakṣarameva ca | vyaktāvyaktaṁ bibhartīśo viśvaṁ viśvavimocakaḥ

ईश, विश्व का मुक्तिदाता, इस क्षर और अक्षर, व्यक्त और अव्यक्त — इन दोनों संयुक्त तत्त्वों तथा विश्व को धारण करता है।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.6.10)

भोक्ता भोग्यं प्रेरयिता मन्तव्यं त्रिविधं स्मृतम् । नातः परं विजानद्भिर्वेदितव्यं हि किञ्चन

bhoktā bhogyaṁ prerayitā mantavyaṁ trividhaṁ smṛtam | nātaḥ paraṁ vijānadbhirveditavyaṁ hi kiñcana

भोक्ता, भोग्य और प्रेरक — यह त्रिविध मनन करने योग्य कहा गया है; इससे परे जानने वालों को और कुछ जानना शेष नहीं रहता।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.6.11)

तिलेषु वा यथा तैलं दध्नि वा सर्पिरर्पितम् । यथापः स्रोतसि व्याप्ता यथारण्यां हुताशनः

tileṣu vā yathā tailaṁ dadhni vā sarpirarpitam | yathāpaḥ srotasi vyāptā yathāraṇyāṁ hutāśanaḥ

जैसे तिल में तेल, या दही में घृत निहित है, जैसे जल धारा में व्याप्त है, जैसे वन में अग्नि गुप्त रूप से विद्यमान है,

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.6.12)

एवमेव महात्मानमात्मन्यात्मविलक्षणम् । सत्येन तपसा चैव नित्ययुक्तोऽनुपश्यति

evameva mahātmānamātmanyātmavilakṣaṇam | satyena tapasā caiva nityayukto'nupaśyati

वैसे ही, सत्य और तप से नित्य युक्त पुरुष अपने भीतर, अपने से विलक्षण उस महात्मा को देखता है।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.6.13)

य एको जालवानीश ईशानीभिः स्वशक्तिभिः । सर्वांल्लोकानिमान् कृत्वा एक एव स ईशते

ya eko jālavānīśa īśānībhiḥ svaśaktibhiḥ | sarvāṁllokānimān kṛtvā eka eva sa īśate

जो अकेला ही जालवान् ईश, अपनी ईशान शक्तियों से इन सभी लोकों की रचना कर, अकेला ही उन पर शासन करता है।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.6.14)

एक एव सदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन । संसृज्य विश्वभुवनं गोप्ता ते सञ्चुकोच यः

eka eva sadā rudro na dvitīyo'sti kaścana | saṁsṛjya viśvabhuvanaṁ goptā te sañcukoca yaḥ

सदा एक ही रुद्र है, उसका कोई दूसरा नहीं; विश्व-भुवन की रचना कर, उनका रक्षक वही अंत में उन्हें समेट लेता है।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.6.15)

विश्वतश्चक्षुरेवायमुतायं विश्वतोमुखः । तथैव विश्वतोबाहुर्विश्वतः पादसंयुतः

viśvataścakṣurevāyamutāyaṁ viśvatomukhaḥ | tathaiva viśvatobāhurviśvataḥ pādasaṁyutaḥ

यह वही है जिसकी आँखें सब ओर हैं, जिसके मुख सब ओर हैं; वैसे ही जिसकी भुजाएँ सब ओर हैं, जिसके चरण सब ओर व्याप्त हैं।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.6.16)

द्यावाभूमी च जनयन् देव एको महेश्वरः । स एव सर्वदेवानां प्रभवश्चोद्भवस्तथा

dyāvābhūmī ca janayan deva eko maheśvaraḥ | sa eva sarvadevānāṁ prabhavaścodbhavastathā

द्युलोक और भूलोक को उत्पन्न करने वाला वह एक देव महेश्वर है; वही समस्त देवताओं का प्रभव और उद्भव है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.6.17)

हिरण्यगर्भं देवानां प्रथमं जनयेदयम् । विश्वस्मादधिको रुद्रो महर्षिरिति हि श्रुतिः

hiraṇyagarbhaṁ devānāṁ prathamaṁ janayedayam | viśvasmādadhiko rudro maharṣiriti hi śrutiḥ

वह देवताओं में सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ को उत्पन्न करता है; रुद्र सबसे श्रेष्ठ महर्षि है — ऐसी श्रुति है।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.6.18)

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तममृतं ध्रुवम् । आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्संस्थितं प्रभुम्

vedāhametaṁ puruṣaṁ mahāntamamṛtaṁ dhruvam | ādityavarṇaṁ tamasaḥ parastātsaṁsthitaṁ prabhum

मैं इस महान, अमृत, ध्रुव पुरुष को जानता हूँ, जो आदित्य के समान वर्ण वाला, अंधकार से परे स्थित प्रभु है।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.6.19)

अस्मान्नास्ति परं किञ्चिदपरं परमात्मनः । नाणीयोऽस्ति न च ज्यायस्तेन पूर्णमिदं जगत्

asmānnāsti paraṁ kiñcidaparaṁ paramātmanaḥ | nāṇīyo'sti na ca jyāyastena pūrṇamidaṁ jagat

इससे परे परमात्मा से बढ़कर कुछ भी नहीं है; न कोई इससे छोटा है, न बड़ा; उसी से यह जगत परिपूर्ण है।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.6.20)

सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः । सर्वव्यापी च भगवांस्तस्मात्सर्वगतश्शिवः

sarvānanaśirogrīvaḥ sarvabhūtaguhāśayaḥ | sarvavyāpī ca bhagavāṁstasmātsarvagataśśivaḥ

जिसके मुख, सिर और ग्रीवा सब ओर हैं, जो सभी प्राणियों की गुहा में निवास करता है, जो सर्वव्यापी भगवान है — इसलिए शिव सर्वगत हैं।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.6.21)

सर्वतः पाणिपादोऽयं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः । सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति

sarvataḥ pāṇipādo'yaṁ sarvato'kṣiśiromukhaḥ | sarvataḥ śrutimāṁlloke sarvamāvṛtya tiṣṭhati

यह सब ओर हाथ-पैर वाला है, सब ओर आँख-सिर-मुख वाला है, संसार में सब ओर श्रवण-शक्ति वाला है, सब कुछ को आवृत कर स्थित है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.6.22)

सर्वेन्द्रियगुणाभासः सर्वेन्द्रियविवर्जितः । सर्वस्य प्रभुरीशानः सर्वस्य शरणं सुहृत्

sarvendriyaguṇābhāsaḥ sarvendriyavivarjitaḥ | sarvasya prabhurīśānaḥ sarvasya śaraṇaṁ suhṛt

वह सभी इंद्रियों के गुणों से आभासित होता है, फिर भी सभी इंद्रियों से रहित है; वह सबका स्वामी ईशान है, सबका आश्रय और सुहृद है।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.6.23)

अचक्षुरपि यः पश्यत्यकर्णोऽपि शृणोति यः । सर्वं वेत्ति न वेत्तास्य तमाहुः पुरुषं परम्

acakṣurapi yaḥ paśyatyakarṇo'pi śṛṇoti yaḥ | sarvaṁ vetti na vettāsya tamāhuḥ puruṣaṁ param

जो बिना आँखों के भी देखता है, बिना कानों के भी सुनता है, सब कुछ जानता है, किंतु जिसे कोई नहीं जानता — उसे परम पुरुष कहते हैं।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.6.24)

अणोरणीयान्महतो महीयानयमव्ययः । गुहायां निहितश्चापि जन्तोरस्य महेश्वरः

aṇoraṇīyānmahato mahīyānayamavyayaḥ | guhāyāṁ nihitaścāpi jantorasya maheśvaraḥ

अणु से भी अणु, महान से भी महान, यह अविनाशी है; यह महेश्वर इस जीव की गुहा में भी निहित है।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.6.25)

तमक्रतुं क्रतुप्रायं महिमातिशयान्वितम् । धातुः प्रसादादीशानं वीतशोकः प्रपश्यति

tamakratuṁ kratuprāyaṁ mahimātiśayānvitam | dhātuḥ prasādādīśānaṁ vītaśokaḥ prapaśyati

क्रियाहीन, फिर भी मानो क्रियाशील, अतिशय महिमा से युक्त उस ईशान को विधाता की कृपा से शोकरहित पुरुष देख पाता है।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.6.26)

वेदाहमेनमजरं पुराणं सर्वगं विभुम् । निरोधं जन्मनो यस्य वदन्ति ब्रह्मवादिनः

vedāhamenamajaraṁ purāṇaṁ sarvagaṁ vibhum | nirodhaṁ janmano yasya vadanti brahmavādinaḥ

मैं इस अजर, पुरातन, सर्वगत, विभु को जानता हूँ, जिसके [ज्ञान से] जन्म का निरोध होता है — ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.6.27)

एकोऽपि त्रीनिमांल्लोकान् बहुधा शक्तियोगतः । विदधाति विचेत्यन्ते विश्वमादौ महेश्वरः

eko'pi trīnimāṁllokān bahudhā śaktiyogataḥ | vidadhāti vicetyante viśvamādau maheśvaraḥ

एक होते हुए भी, अपनी शक्तियों के योग से अनेक प्रकार से महेश्वर इन तीनों लोकों की रचना करते हैं; अंत में विश्व को [स्वयं में] विलीन कर लेते हैं।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.6.28)

विश्वधात्रीत्यजाख्या च शैवी चित्राकृतिः परा । तामजां लोहितां शुक्लां कृष्णामेकां त्वजः प्रजाम्

viśvadhātrītyajākhyā ca śaivī citrākṛtiḥ parā | tāmajāṁ lohitāṁ śuklāṁ kṛṣṇāmekāṁ tvajaḥ prajām

विश्व की धात्री, अजा नाम वाली, शैवी, विचित्र आकृति वाली परा शक्ति — वह लाल, श्वेत, कृष्ण, एक अजा (अजन्मा प्रकृति) अनेक संतानों को जन्म देती है।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.6.29)

जनित्रीमनुशेतेऽन्योजुषमाणः स्वरूपिणीम् । तामेवाजामजोऽन्यस्तु भक्तभोगां जहाति च

janitrīmanuśete'nyojuṣamāṇaḥ svarūpiṇīm | tāmevājāmajo'nyastu bhaktabhogāṁ jahāti ca

कोई अन्य [जीव] उस जन्मदात्री, अपने स्वरूप में रमण करने वाली को भोगता हुआ शयन करता है; किंतु दूसरा अजन्मा [जीव], उसी अजा को भोगकर, त्याग देता है।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.6.30)

द्वौ सुपर्णौ च सयुजौ समानं वृक्षमास्थितौ । एकोऽत्ति पिप्पलं स्वादु परोऽनश्नन् प्रपश्यति

dvau suparṇau ca sayujau samānaṁ vṛkṣamāsthitau | eko'tti pippalaṁ svādu paro'naśnan prapaśyati

दो मित्र-पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं; उनमें एक स्वादिष्ट फल खाता है, दूसरा बिना खाए ही देखता रहता है।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.6.31)

वृक्षेऽस्मिन् पुरुषो मग्नो गुह्यमानश्च शोचति । जुष्टमन्यं यदा पश्येदीशं परमकारणम्

vṛkṣe'smin puruṣo magno guhyamānaśca śocati | juṣṭamanyaṁ yadā paśyedīśaṁ paramakāraṇam

इस वृक्ष में डूबा हुआ पुरुष मोहग्रस्त होकर शोक करता है; परंतु जब वह उस दूसरे, प्रिय, परम कारण ईश को देखता है,

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.6.32)

तदास्य महिमानं च वीतशोकः सुखी भवेत् । छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो यद्भूतं भव्यमेव च

tadāsya mahimānaṁ ca vītaśokaḥ sukhī bhavet | chandāṁsi yajñāḥ kratavo yadbhūtaṁ bhavyameva ca

तब उसकी महिमा देखकर शोकरहित होकर सुखी हो जाता है। छंद, यज्ञ, क्रतु, जो हो चुका और जो होने वाला है —

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.6.33)

मायी विश्वं सृजत्यस्मिन्निविष्टो मायया परः । मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्

māyī viśvaṁ sṛjatyasminniviṣṭo māyayā paraḥ | māyāṁ tu prakṛtiṁ vidyānmāyinaṁ tu maheśvaram

मायावान [ईश्वर] इसमें प्रविष्ट होकर, माया से परे रहते हुए, विश्व की रचना करता है; माया को प्रकृति जानो, और मायावान् को महेश्वर जानो।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.6.34)

तस्यास्त्ववयवैरेव व्याप्तं सर्वमिदं जगत् । सूक्ष्मातिसूक्ष्ममीशानं कललस्यापि मध्यतः

tasyāstvavayavaireva vyāptaṁ sarvamidaṁ jagat | sūkṣmātisūkṣmamīśānaṁ kalalasyāpi madhyataḥ

उसी के अवयवों से यह संपूर्ण जगत व्याप्त है; वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म ईशान, गर्भस्थ कलल के मध्य में भी विद्यमान है।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.6.35)

स्रष्टारमपि विश्वस्य चेष्टितारं च तस्य तु । शिवमेवेश्वरं ज्ञात्वा शान्तिमत्यन्तमृच्छति

sraṣṭāramapi viśvasya ceṣṭitāraṁ ca tasya tu | śivameveśvaraṁ jñātvā śāntimatyantamṛcchati

विश्व के स्रष्टा और उसके संचालक, उस शिव ईश्वर को जानकर पुरुष अत्यंत शांति प्राप्त करता है।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.6.36)

स एव कालो गोप्ता च विश्वस्याधिपतिः प्रभुः । तं विश्वाधिपतिं ज्ञात्वा मृत्युपाशात्प्रमुच्यते

sa eva kālo goptā ca viśvasyādhipatiḥ prabhuḥ | taṁ viśvādhipatiṁ jñātvā mṛtyupāśātpramucyate

वही काल है, वही रक्षक है, वही विश्व का अधिपति प्रभु है; उस विश्वाधिपति को जानकर मनुष्य मृत्यु के पाश से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.6.37)

घृतात्परं मण्डमिव सूक्ष्मं ज्ञात्वा स्थितं प्रभुम् । सर्वभूतेषु गूढं च सर्वपापैः प्रमुच्यते

ghṛtātparaṁ maṇḍamiva sūkṣmaṁ jñātvā sthitaṁ prabhum | sarvabhūteṣu gūḍhaṁ ca sarvapāpaiḥ pramucyate

घृत से भी परे मंड के समान सूक्ष्म, सभी प्राणियों में गुप्त रूप से स्थित उस प्रभु को जानकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.6.38)

एष एव परो देवो विश्वकर्मा महेश्वरः । हृदये सन्निविष्टं तं ज्ञात्वैवामृतमश्नुते

eṣa eva paro devo viśvakarmā maheśvaraḥ | hṛdaye sanniviṣṭaṁ taṁ jñātvaivāmṛtamaśnute

वही परम देव, विश्वकर्मा महेश्वर है; हृदय में स्थित उन्हें जानकर ही मनुष्य अमृत को प्राप्त करता है।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.6.39)

यदा समस्तं न दिवा न रात्रिर्न सदप्यसत् । केवलश्शिव एवैको यतः प्रज्ञा पुरातनी

yadā samastaṁ na divā na rātrirna sadapyasat | kevalaśśiva evaiko yataḥ prajñā purātanī

जब न दिन था, न रात्रि, न सत् था, न असत् — तब केवल एक शिव ही था, जिससे पुरातन प्रज्ञा उत्पन्न हुई।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.6.40)

नैनमूर्ध्वं न तिर्यक्च न मध्यं पर्यजिग्रहत् । न तस्य प्रतिमा चास्ति यस्य नाम महद्यशः

nainamūrdhvaṁ na tiryakca na madhyaṁ paryajigrahat | na tasya pratimā cāsti yasya nāma mahadyaśaḥ

उसे न ऊपर, न आड़े, न मध्य में किसी ने ग्रहण किया; जिसका नाम महायश है, उसकी कोई प्रतिमा (उपमा) भी नहीं है।

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.6.41)

अजातमिममेवैकं बुद्ध्वा जन्मनि भीरवः । रुद्रस्यास्य प्रपद्यन्ते रक्षार्थं दक्षिणं सुखम्

ajātamimamevaikaṁ buddhvā janmani bhīravaḥ | rudrasyāsya prapadyante rakṣārthaṁ dakṣiṇaṁ sukham

इस अजन्मा को अकेला जानकर, जन्म से भयभीत लोग रक्षा के लिए इस रुद्र के दक्षिण (कल्याणकारी) सुखद रूप की शरण लेते हैं।

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.6.42)

द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते समुदाहृते । विद्याविद्ये समाख्याते निहिते यत्र गूढवत्

dve akṣare brahmapare tvanante samudāhṛte | vidyāvidye samākhyāte nihite yatra gūḍhavat

ब्रह्म से परे दो अक्षर, अनंत कहे गए हैं — विद्या और अविद्या, जो उसमें गुप्त रूप से निहित हैं।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.6.43)

क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं विद्येति परिगीयते । ते उभे ईशते यस्तु सोऽन्यः खलु महेश्वरः

kṣaraṁ tvavidyā hyamṛtaṁ vidyeti parigīyate | te ubhe īśate yastu so'nyaḥ khalu maheśvaraḥ

क्षर को अविद्या कहा गया है, अमृत को विद्या कहा जाता है; जो इन दोनों पर शासन करता है, वह अन्य, निश्चय ही महेश्वर है।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.6.44)

एकैकं बहुधा जालं विकुर्वन्नेकवच्च यः । सर्वाधिपत्यं कुरुते सृष्ट्वा सर्वान् प्रतापवान्

ekaikaṁ bahudhā jālaṁ vikurvannekavacca yaḥ | sarvādhipatyaṁ kurute sṛṣṭvā sarvān pratāpavān

जो एक-एक [तत्त्व] को अनेक प्रकार से बदलते हुए, स्वयं एक रहकर भी, सबकी रचना कर, प्रतापी होकर सर्वाधिपत्य करता है,

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.6.45)

दिश ऊर्ध्वमधस्तिर्यक् भासयन् भ्राजते स्वयम् । यो निःस्वभावादप्येको वरेण्यस्त्वधितिष्ठति

diśa ūrdhvamadhastiryak bhāsayan bhrājate svayam | yo niḥsvabhāvādapyeko vareṇyastvadhitiṣṭhati

दिशाओं को ऊपर, नीचे, आड़े प्रकाशित करते हुए स्वयं ही चमकता है; जो निःस्वभाव से भी अकेला वरणीय होकर अधिष्ठित रहता है,

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.6.46)

स्वभावं वाचकान् सर्वान् वाच्यांश्च परिणामयन् । गुणांश्च भोग्यभोक्तृत्वे तद्विश्वमधितिष्ठति

svabhāvaṁ vācakān sarvān vācyāṁśca pariṇāmayan | guṇāṁśca bhogyabhoktṛtve tadviśvamadhitiṣṭhati

स्वभाव, समस्त वाचक शब्दों और वाच्य पदार्थों को, तथा गुणों को भोग्य-भोक्तापन में परिणत करते हुए, वह उस विश्व पर अधिष्ठित रहता है।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.6.47)

तं वै गुह्योपनिषदि गूढं ब्रह्म परात्परम् । ब्रह्मयोनिं जगत्पूर्वं विदुर्देवा महर्षयः

taṁ vai guhyopaniṣadi gūḍhaṁ brahma parātparam | brahmayoniṁ jagatpūrvaṁ vidurdevā maharṣayaḥ

गुह्य उपनिषद् में गूढ़ उस परात्पर ब्रह्म को, जो जगत का पूर्व कारण और ब्रह्मा की योनि है, देवता और महर्षि जानते हैं।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.6.48)

भावग्राह्यमनीहाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम्

bhāvagrāhyamanīhākhyaṁ bhāvābhāvakaraṁ śivam | kalāsargakaraṁ devaṁ ye viduste jahustanum

जो शिव को भाव से ग्राह्य, निःस्पृह (इच्छारहित) नाम वाला, भाव-अभाव का कर्ता, कला द्वारा सृष्टि करने वाला देव जानते हैं, वे शरीर (जन्म-बंधन) को त्याग देते हैं।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.6.49)

स्वभावमेके मन्यन्ते कालमेके विमोहिताः । देवस्य महिमा ह्येष येनेदं भ्राम्यते जगत्

svabhāvameke manyante kālameke vimohitāḥ | devasya mahimā hyeṣa yenedaṁ bhrāmyate jagat

कोई इसे स्वभाव मानते हैं, कोई मोहित होकर काल मानते हैं; किंतु यह देव की ही महिमा है, जिससे यह जगत घूमता है।

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.6.50)

येनेदमावृतं नित्यं कालकालात्मना यतः । तेनेरितमिदं कर्म भूतैः सह विवर्तते

yenedamāvṛtaṁ nityaṁ kālakālātmanā yataḥ | teneritamidaṁ karma bhūtaiḥ saha vivartate

जिसके द्वारा यह नित्य आवृत है, क्योंकि वही काल का भी काल-स्वरूप है — उसी से प्रेरित यह कर्म प्राणियों सहित परिवर्तित होता है।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.6.51)

तत्कर्म भूयशः कृत्वा विनिवर्त्य च भूयशः । तत्त्वस्य सह सत्त्वेन योगं चापि समेत्य वै

tatkarma bhūyaśaḥ kṛtvā vinivartya ca bhūyaśaḥ | tattvasya saha sattvena yogaṁ cāpi sametya vai

उस कर्म को बार-बार करके और बार-बार उससे निवृत्त होकर, सत्त्व सहित तत्त्व के साथ योग को प्राप्त कर,

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.6.52)

अष्टाभिश्च त्रिभिश्चैव द्वाभ्यां चैकेन वा पुनः । कालेनात्मगुणैश्चापि कृत्स्नमेव जगत् स्वयम्

aṣṭābhiśca tribhiścaiva dvābhyāṁ caikena vā punaḥ | kālenātmaguṇaiścāpi kṛtsnameva jagat svayam

आठ, तीन, दो, या फिर एक [साधन] द्वारा, काल और आत्मगुणों से भी, यह संपूर्ण जगत स्वयं —

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.6.53)

गुणैरारभ्य कर्माणि स्वभावादीनि योजयेत् । तेषामभावे नाशः स्यात्कृतस्यापि च कर्मणः

guṇairārabhya karmāṇi svabhāvādīni yojayet | teṣāmabhāve nāśaḥ syātkṛtasyāpi ca karmaṇaḥ

गुणों से आरंभ कर कर्मों को स्वभाव आदि से युक्त करता है; उनके अभाव में किए हुए कर्म का भी नाश हो जाता।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.6.54)

कर्मक्षये पुनश्चान्यत्ततो याति स तत्त्वतः । स एवादिः स्वयं योगनिमित्तं भोक्तृभोगयोः

karmakṣaye punaścānyattato yāti sa tattvataḥ | sa evādiḥ svayaṁ yoganimittaṁ bhoktṛbhogayoḥ

कर्म का क्षय होने पर [जीव] पुनः अन्य [अवस्था] को वास्तव में प्राप्त होता है; वही स्वयं आदि है, भोक्ता और भोग्य के योग का कारण।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.6.55)

परस्त्रिकालादकलः स एव परमेश्वरः । सर्ववित् त्रिगुणाधीशो ब्रह्म साक्षात् परात्परः

parastrikālādakalaḥ sa eva parameśvaraḥ | sarvavit triguṇādhīśo brahma sākṣāt parātparaḥ

तीनों कालों से परे, कलारहित, वही परमेश्वर है; सर्वज्ञ, त्रिगुणों का अधीश्वर, साक्षात् ब्रह्म, परात्पर।

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.6.56)

तं विश्वरूपमभवं भवमीड्यं प्रजापतिम् । देवदेवं जगत्पूज्यं स्वचित्तस्थमुपास्महे

taṁ viśvarūpamabhavaṁ bhavamīḍyaṁ prajāpatim | devadevaṁ jagatpūjyaṁ svacittasthamupāsmahe

उस विश्वरूप, जन्मरहित, स्तुत्य भव, प्रजापति, देवदेव, जगत्पूज्य, अपने चित्त में स्थित उन्हें हम उपासते हैं।

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.6.57)

कालादिभिः परो यस्मात् प्रपञ्चः परिवर्तते । धर्मावहं पापनुदं भोगेशं विश्वधाम च

kālādibhiḥ paro yasmāt prapañcaḥ parivartate | dharmāvahaṁ pāpanudaṁ bhogeśaṁ viśvadhāma ca

काल आदि से परे, जिनके कारण यह प्रपंच परिवर्तित होता है, धर्म को लाने वाले, पाप को दूर करने वाले, भोग के स्वामी, विश्व के धाम।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.6.58)

तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेश्वरेश्वरम्

tamīśvarāṇāṁ paramaṁ maheśvaraṁ taṁ devatānāṁ paramaṁ ca daivatam | patiṁ patīnāṁ paramaṁ parastād vidāma devaṁ bhuvaneśvareśvaram

ईश्वरों के परम महेश्वर, देवताओं के परम देवता, स्वामियों के परम स्वामी, सर्वोपरि उस देव, भुवनेश्वरों के ईश्वर को हम जानें।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.6.59)

न तस्य विद्येत कार्यं कारणं च न विद्यते । न तत्समोऽधिकश्चापि क्वचिज्जगति दृश्यते

na tasya vidyeta kāryaṁ kāraṇaṁ ca na vidyate | na tatsamo'dhikaścāpi kvacijjagati dṛśyate

उसका न कोई कार्य है, न कोई कारण है; न उसके समान, न उससे अधिक, कहीं भी जगत में दिखाई देता है।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.6.60)

परास्य विविधा शक्तिः श्रुतौ स्वाभाविकी श्रुता । ज्ञानं बलं क्रियां चैव याभ्यो विश्वमिदं कृतम्

parāsya vividhā śaktiḥ śrutau svābhāvikī śrutā | jñānaṁ balaṁ kriyāṁ caiva yābhyo viśvamidaṁ kṛtam

उसकी परा, विविध, स्वाभाविक शक्ति श्रुति में सुनी गई है — ज्ञान, बल और क्रिया, जिनसे यह विश्व रचा गया है।

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.6.61)

न तस्यास्ति पतिः कश्चिन्नैव लिङ्गं न चेशिता । कारणं कारणानां च स तेषामधिपाधिपः

na tasyāsti patiḥ kaścinnaiva liṁgaṁ na ceśitā | kāraṇaṁ kāraṇānāṁ ca sa teṣāmadhipādhipaḥ

उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई चिह्न (लिंग) है, न कोई शासक है; वह कारणों का कारण है, उन सबका भी अधिपतियों का अधिपति है।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.6.62)

न चास्य जनिता कश्चिन्न च जन्म कुतश्चन । न जन्महेतवस्तद्वन्मलमायादिसंज्ञकाः

na cāsya janitā kaścinna ca janma kutaścana | na janmahetavastadvanmalamāyādisaṁjñakāḥ

उसका कोई जनक नहीं है, न उसका जन्म कहीं से होता है; न ही मल-माया आदि नाम वाले जन्म के कारण उसके लिए हैं।

श्लोक 63 (shiva.vayaviya.6.63)

स एकः सर्वभूतेषु गूढो व्याप्तश्च विश्वतः । सर्वभूतान्तरात्मा च धर्माध्यक्षः स कथ्यते

sa ekaḥ sarvabhūteṣu gūḍho vyāptaśca viśvataḥ | sarvabhūtāntarātmā ca dharmādhyakṣaḥ sa kathyate

वह अकेला ही सभी प्राणियों में गुप्त, तथा विश्व में सर्वत्र व्याप्त है; वही सभी प्राणियों की अंतरात्मा है, वह धर्म का अध्यक्ष कहलाता है।

श्लोक 64 (shiva.vayaviya.6.64)

सर्वभूताधिवासश्च साक्षी चेता च निर्गुणः । एको वशी निष्क्रियाणां बहूनां विवशात्मनाम्

sarvabhūtādhivāsaśca sākṣī cetā ca nirguṇaḥ | eko vaśī niṣkriyāṇāṁ bahūnāṁ vivaśātmanām

सभी प्राणियों का निवास-स्थान, साक्षी, चेता, निर्गुण; वह अकेला ही अनेक निष्क्रिय किंतु विवश आत्मा वालों का नियंता है।

श्लोक 65 (shiva.vayaviya.6.65)

नित्यानामप्यसौ नित्यश्चेतनानां च चेतनः । एको बहूनां चाकामः कामानीशः प्रयच्छति

nityānāmapyasau nityaścetanānāṁ ca cetanaḥ | eko bahūnāṁ cākāmaḥ kāmānīśaḥ prayacchati

नित्यों में भी वह नित्य है, चेतनों में चेतन है; अकेला, इच्छारहित होकर भी, अनेकों की इच्छाओं को स्वामी होकर पूर्ण करता है।

श्लोक 66 (shiva.vayaviya.6.66)

साङ्ख्ययोगाधिगम्यं यत् कारणं जगतां पतिम् । ज्ञात्वा देवं पशुः पाशैः सर्वैरेव विमुच्यते

sāṁkhyayogādhigamyaṁ yat kāraṇaṁ jagatāṁ patim | jñātvā devaṁ paśuḥ pāśaiḥ sarvaireva vimucyate

सांख्य और योग से जानने योग्य उस कारण, जगत के पति देव को जानकर, पशु सभी पाशों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 67 (shiva.vayaviya.6.67)

विश्वकृद् विश्ववित् स्वात्मयोनिज्ञः कालकृद् गुणी । प्रधानः क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः पाशमोचकः

viśvakṛd viśvavit svātmayonijñaḥ kālakṛd guṇī | pradhānaḥ kṣetrajñapatirguṇeśaḥ pāśamocakaḥ

विश्वकर्ता, विश्ववेत्ता, अपनी उत्पत्ति का ज्ञाता, कालकर्ता, गुणी; प्रधान, क्षेत्रज्ञ का स्वामी, गुणों का ईश, पाश से मुक्त करने वाला।

श्लोक 68 (shiva.vayaviya.6.68)

ब्रह्माणं विदधे पूर्वं वेदांश्चोपादिशत्स्वयम् । यो देवस्तमहं बुद्ध्वा स्वात्मबुद्धिप्रसादतः

brahmāṇaṁ vidadhe pūrvaṁ vedāṁścopādiśatsvayam | yo devastamahaṁ buddhvā svātmabuddhiprasādataḥ

जिस देव ने पूर्वकाल में ब्रह्मा की रचना की और स्वयं वेदों का उपदेश दिया, उन्हें जानकर मैं अपनी आत्म-बुद्धि की कृपा से,

श्लोक 69 (shiva.vayaviya.6.69)

मुमुक्षुरस्मात् संसारात् प्रपद्ये शरणं शिवम् । निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्

mumukṣurasmāt saṁsārāt prapadye śaraṇaṁ śivam | niṣkalaṁ niṣkriyaṁ śāntaṁ niravadyaṁ nirañjanam

इस संसार से मुक्ति चाहने वाला होकर, कल्याणकारी शिव की शरण लेता हूँ — जो निष्कल, निष्क्रिय, शांत, निरवद्य और निरंजन हैं,

श्लोक 70 (shiva.vayaviya.6.70)

अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्

amṛtasya paraṁ setuṁ dagdhendhanamivānalam

अमृत का परम सेतु, जले हुए ईंधन के समान [शांत] अग्नि के समान।

श्लोक 71 (shiva.vayaviya.6.71)

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा शिवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति

yadā carmavadākāśaṁ veṣṭayiṣyanti mānavāḥ | tadā śivamavijñāya duḥkhasyānto bhaviṣyati

जब मनुष्य आकाश को चमड़े की भाँति लपेट देंगे [अर्थात् जो असंभव है], तभी शिव को बिना जाने दुःख का अंत होगा [अर्थात् कभी नहीं]।

श्लोक 72 (shiva.vayaviya.6.72)

तपःप्रभावाद्देवस्य प्रसादाच्च महर्षयः । आत्माश्रमोचितज्ञानं पवित्रं पापनाशनम्

tapaḥprabhāvāddevasya prasādācca maharṣayaḥ | ātmāśramocitajñānaṁ pavitraṁ pāpanāśanam

तप के प्रभाव और देव की कृपा से महर्षियों ने आत्म-आश्रम के अनुरूप, पवित्र, पाप-नाशक ज्ञान प्राप्त किया,

श्लोक 73 (shiva.vayaviya.6.73)

वेदान्ते परमं गुह्यं पुरा कल्पप्रचोदितम् । ब्रह्मणो वदनाल्लब्धं मयेदं भाग्यगौरवात्

vedānte paramaṁ guhyaṁ purā kalpapracoditam | brahmaṇo vadanāllabdhaṁ mayedaṁ bhāgyagauravāt

जो वेदांत का परम गुह्य है, पूर्वकाल में इस कल्प के लिए प्रेरित हुआ था; यह मैंने भाग्य के प्रताप से ब्रह्मा जी के मुख से प्राप्त किया।

श्लोक 74 (shiva.vayaviya.6.74)

नाप्रशान्ताय दातव्यमेतज्ज्ञानमनुत्तमम् । न पुत्रायासुवृत्ताय नाशिष्याय च सर्वथा

nāpraśāntāya dātavyametajjñānamanuttamam | na putrāyāsuvṛttāya nāśiṣyāya ca sarvathā

यह अनुपम ज्ञान अशांत को नहीं देना चाहिए, न दुराचारी पुत्र को, न किसी भी प्रकार अशिष्य को।

श्लोक 75 (shiva.vayaviya.6.75)

यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः

yasya deve parābhaktiryathā deve tathā gurau | tasyaite kathitā hyarthāḥ prakāśante mahātmanaḥ

जिसकी देव में परा भक्ति है, और जैसे देव में वैसे ही गुरु में — उसी महात्मा के लिए ये कहे गए अर्थ प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 76 (shiva.vayaviya.6.76)

अतश्च सङ्क्षेपमिदं शृणुध्वं शिवः परस्तात्प्रकृतेश्च पुंसः । स सर्गकाले च करोति सर्वं संहारकाले पुनराददाति

ataśca saṁkṣepamidaṁ śṛṇudhvaṁ śivaḥ parastātprakṛteśca puṁsaḥ | sa sargakāle ca karoti sarvaṁ saṁhārakāle punarādadāti

अतः यह संक्षेप सुनो — शिव प्रकृति और पुरुष दोनों से परे हैं; वे ही सृष्टि के समय सब कुछ करते हैं, और संहार के समय पुनः सब कुछ समेट लेते हैं।

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