वैष्णव खण्ड · अध्याय 131
व्रत-उद्यापन-विधि
श्लोक 1 (skanda.2.131.1)
॥नारद उवाच॥ व्रतानामपि सर्वेषां ब्रह्मन्नुद्यापनं श्रुतम् ॥ अभावे तूद्यापनस्य फलं नैवाऽऽप्नुयात्क्वचित्
nārada uvāca vratānāmapi sarveṣāṁ brahmannudyāpanaṁ śrutam || abhāve tūdyāpanasya phalaṁ naivā'āpnuyātkvacit
नारद ने कहा - हे ब्रह्मन्! मैंने सुना है कि सभी व्रतों का उद्यापन आवश्यक है। उद्यापन के अभाव में कहीं भी फल प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 2 (skanda.2.131.2)
कृतव्रतफलाप्त्यर्थं कुर्यादुद्यापनं बुधः ॥ अन्यथा निष्फलं याति कृतं व्रतमनुत्तमम्
kṛtavrataphalāptyarthaṁ kuryādudyāpanaṁ budhaḥ || anyathā niṣphalaṁ yāti kṛtaṁ vratamanuttamam
बुद्धिमान व्यक्ति को व्रत के फल की प्राप्ति के लिए उद्यापन करना चाहिए। अन्यथा किया गया उत्तम व्रत भी निष्फल हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.2.131.3)
कार्तिकेऽपि कृतं देव व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥ न तस्योद्यापनाऽभावे व्रतोक्तफलमाप्नुयात्
kārtike'pi kṛtaṁ deva vratānāmuttamaṁ vratam || na tasyodyāpanā'abhāve vratoktaphalamāpnuyāt
हे देव! कार्तिक में किया गया व्रतों में उत्तम व्रत भी, उद्यापन के अभाव में, व्रत का कहा गया फल प्राप्त नहीं करता।
श्लोक 4 (skanda.2.131.4)
तस्मात्कार्तिकमासस्य चोद्यापनविधिं प्रभो ॥ वद मे शिष्यवर्याय प्रपन्नायाऽनुवर्तिने
tasmātkārtikamāsasya codyāpanavidhiṁ prabho || vada me śiṣyavaryāya prapannāyā'anuvartine
इसलिए, हे प्रभो! शरणागत और अनुवर्ती श्रेष्ठ शिष्य मुझे कार्तिक-मास के उद्यापन की विधि बताइए।
श्लोक 5 (skanda.2.131.5)
॥ब्रह्मोवाच॥ अथोर्जोद्यापनं वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशनम् ॥ तच्छृणुष्व महाभक्त्या सविधानं समासतः
brahmovāca athorjodyāpanaṁ vakṣye sarvapāpapraṇāśanam || tacchṛṇuṣva mahābhaktyā savidhānaṁ samāsataḥ
ब्रह्मा ने कहा - अब मैं कार्तिक के उद्यापन को बताता हूँ, जो सभी पापों का नाश करने वाला है। इसे महान भक्ति से, विधिपूर्वक, संक्षेप में सुनो।
श्लोक 6 (skanda.2.131.6)
ऊर्जे शुक्लचतुर्दश्यां कुर्यादुद्यापनं व्रती ॥ व्रतसंपूरणार्थाय विष्णुप्रीत्यर्थहेतवे
ūrje śuklacaturdaśyāṁ kuryādudyāpanaṁ vratī || vratasaṁpūraṇārthāya viṣṇuprītyarthahetave
कार्तिक की शुक्ल चतुर्दशी को व्रती को व्रत की पूर्णता और विष्णु की प्रसन्नता के लिए उद्यापन करना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.2.131.7)
तुलस्या उपरिष्टात्तु कुर्यान्मंडपिकां शुभाम् ॥ कदलीस्तंभसंयुक्तां नानाधातुविचित्रिताम्
tulasyā upariṣṭāttu kuryānmaṁḍapikāṁ śubhām || kadalīstaṁbhasaṁyuktāṁ nānādhātuvicitritām
तुलसी के ऊपर एक शुभ छोटा मंडप बनाना चाहिए, जो केले के स्तंभों से युक्त और विभिन्न धातुओं से अलंकृत हो।
श्लोक 8 (skanda.2.131.8)
दीपमाला चतुर्दिक्षु कार्या तत्र सुशोभना ॥ सुतोरणाश्चतुर्द्वारः पुष्पचामरशोभिताः
dīpamālā caturdikṣu kāryā tatra suśobhanā || sutoraṇāścaturdvāraḥ puṣpacāmaraśobhitāḥ
वहाँ चारों दिशाओं में सुंदर दीप-मालाएँ लगानी चाहिए, चार द्वारों पर सुंदर तोरण, फूल और चामरों से सुशोभित।
श्लोक 9 (skanda.2.131.9)
द्वारेषु द्वारपालाश्च पूजयेन्मृन्मयान्पृथक् ॥ जयश्च विजयश्चैव चण्डश्चैव प्रचंडकः
dvāreṣu dvārapālāśca pūjayenmṛnmayānpṛthak || jayaśca vijayaścaiva caṇḍaścaiva pracaṁḍakaḥ
द्वारों पर मिट्टी की बनी अलग-अलग द्वारपालों की मूर्तियों की पूजा करे - जय, विजय, चंड और प्रचंड।
श्लोक 10 (skanda.2.131.10)
नन्दश्चैव सुनंदश्च कुमुदः कुमुदाक्षकः ॥ एतांश्चतुर्षु द्वारेषु पूजयेद्भक्तिसंयुतः
nandaścaiva sunaṁdaśca kumudaḥ kumudākṣakaḥ || etāṁścaturṣu dvāreṣu pūjayedbhaktisaṁyutaḥ
नंद, सुनंद, कुमुद और कुमुदाक्ष - इन्हें चारों द्वारों पर भक्तिपूर्वक पूजे।
श्लोक 11 (skanda.2.131.11)
तुलसीमूलदेशे तु सर्वतोभद्रसंज्ञितम् ॥ चतुर्भिर्वर्णकैः सम्यक्छोभाढ्यं समलंकृतम्
tulasīmūladeśe tu sarvatobhadrasaṁjñitam || caturbhirvarṇakaiḥ samyakchobhāḍhyaṁ samalaṁkṛtam
तुलसी के मूल-स्थान पर "सर्वतोभद्र" नामक मंडल चार रंगों से भलीभाँति सुशोभित और अलंकृत बनाना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.2.131.12)
तस्योपरिष्टात्कलशं पूर्णरत्नसमन्वितम् ॥ तत्र संपूजयेद्देवं शंखचक्रगदाधरम्
tasyopariṣṭātkalaśaṁ pūrṇaratnasamanvitam || tatra saṁpūjayeddevaṁ śaṁkhacakragadādharam
उसके ऊपर रत्नों से भरा हुआ कलश रखे। वहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देव की पूजा करे।
श्लोक 13 (skanda.2.131.13)
कौशेयपीतवसनं लक्ष्म्या युक्तं प्रपूजयेत् ॥ इन्द्रादिलोकपालांश्च मंडपे पूजयेद्व्रती
kauśeyapītavasanaṁ lakṣmyā yuktaṁ prapūjayet || indrādilokapālāṁśca maṁḍape pūjayedvratī
पीले रेशमी वस्त्र वाले, लक्ष्मी सहित देव की पूजा करे। मंडप में व्रती को इंद्र आदि लोकपालों की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.131.14)
तस्यामुपवसेद्भक्त्या शांतः प्रणतमानसः ॥ रात्रौ जागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादिमंगलैः
tasyāmupavasedbhaktyā śāṁtaḥ praṇatamānasaḥ || rātrau jāgaraṇaṁ kuryādgītavādyādimaṁgalaiḥ
उस दिन शांतचित्त और विनम्र होकर भक्तिपूर्वक उपवास करे। रात्रि में गीत-वाद्य आदि मंगल कार्यों से जागरण करे।
श्लोक 15 (skanda.2.131.15)
गीतं कुर्वंति ये भक्त्या जागरे चक्रपाणिनः ॥ जन्मांतरशतोद्भूतैस्ते मुक्ताः पापसंचयैः
gītaṁ kurvaṁti ye bhaktyā jāgare cakrapāṇinaḥ || janmāṁtaraśatodbhūtaiste muktāḥ pāpasaṁcayaiḥ
जो भक्तिपूर्वक चक्रपाणि के जागरण में गीत गाते हैं, वे सैकड़ों जन्मों में संचित पापों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.131.16)
ततस्तु पूर्णिमायां तु सपत्नीकान्द्विजोत्तमान् ॥ त्रिंशन्मितानथैकं वा ब्राह्मणांश्च निमंत्रयेत्
tatastu pūrṇimāyāṁ tu sapatnīkāndvijottamān || triṁśanmitānathaikaṁ vā brāhmaṇāṁśca nimaṁtrayet
फिर पूर्णिमा को पत्नियों सहित तीस श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, अथवा एक ब्राह्मण को ही निमंत्रित करे।
श्लोक 17 (skanda.2.131.17)
प्रातःस्नानं ततः कृत्वा देवपूजां तथैव च ॥ स्थंडिले च ततः कृत्वा समाधायाऽग्निमत्र हि
prātaḥsnānaṁ tataḥ kṛtvā devapūjāṁ tathaiva ca || sthaṁḍile ca tataḥ kṛtvā samādhāyā'agnimatra hi
फिर प्रातःकाल स्नान और देव-पूजा कर, वेदी पर अग्नि स्थापित कर -
श्लोक 18 (skanda.2.131.18)
अतो देवेति मंत्रेण जुहुयात्तिलपायसम् ॥ प्रीत्यर्थं देवदेवस्य देवानां च पृथक्पृथक्
ato deveti maṁtreṇa juhuyāttilapāyasam || prītyarthaṁ devadevasya devānāṁ ca pṛthakpṛthak
"अतो देव" मंत्र से तिल-खीर की आहुति दे, देवाधिदेव और अन्य देवताओं की प्रसन्नता के लिए अलग-अलग।
श्लोक 19 (skanda.2.131.19)
होमशेषं समाप्याथ ब्राह्मणान्पूज्य भक्तितः ॥ ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या प्रदद्याद्दक्षिणां नरः
homaśeṣaṁ samāpyātha brāhmaṇānpūjya bhaktitaḥ || brāhmaṇebhyo yathāśaktyā pradadyāddakṣiṇāṁ naraḥ
होम की शेष विधि पूर्ण कर, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा कर, यथाशक्ति उन्हें दक्षिणा दे।
श्लोक 20 (skanda.2.131.20)
ततो गां कपिलां तत्र पूजयेद्विधिवद्व्रती ॥ सवत्सां गां तथा दद्याद्विप्राय च कुटुम्बिने
tato gāṁ kapilāṁ tatra pūjayedvidhivadvratī || savatsāṁ gāṁ tathā dadyādviprāya ca kuṭumbine
फिर व्रती को वहाँ विधिपूर्वक कपिला गाय की पूजा करनी चाहिए, और बछड़े सहित गाय किसी गृहस्थ ब्राह्मण को देनी चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.2.131.21)
गुरुं व्रतोपदेष्टारं वस्त्रालंकारभूषणैः ॥ सपत्नीकं समभ्यर्च्य तांश्च विप्रान्क्षमापयेत्
guruṁ vratopadeṣṭāraṁ vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ || sapatnīkaṁ samabhyarcya tāṁśca viprānkṣamāpayet
व्रत का उपदेश देने वाले गुरु को पत्नी सहित वस्त्र, आभूषण आदि से पूजकर, उन ब्राह्मणों से क्षमा माँगे।
श्लोक 22 (skanda.2.131.22)
युष्मत्प्रसादाद्देवेशः प्रसन्नोऽस्तु सदा मम ॥ व्रतादस्माच्च यत्पापं सप्तजन्मकृतं मया
yuṣmatprasādāddeveśaḥ prasanno'stu sadā mama || vratādasmācca yatpāpaṁ saptajanmakṛtaṁ mayā
कहे - आपकी कृपा से देवेश सदा मुझ पर प्रसन्न रहें। इस व्रत से मेरे सात जन्मों में किया गया जो भी पाप है -
श्लोक 23 (skanda.2.131.23)
तत्सर्वं नाशमायातु स्थिरा मे चाऽस्तु संततिः ॥ मनोरथास्तु सफलाः संतु भक्तिर्हरौ भवेत्
tatsarvaṁ nāśamāyātu sthirā me cā'astu saṁtatiḥ || manorathāstu saphalāḥ saṁtu bhaktirharau bhavet
वह सब इस व्रत से नष्ट हो जाए, और मेरी संतान स्थिर रहे। मेरे मनोरथ सफल हों, और हरि में मेरी भक्ति बनी रहे।
श्लोक 24 (skanda.2.131.24)
सतां समागमो भूयान्मम जन्मनिजन्मनि ॥ इति क्षमाप्य तान्विप्रान्प्रसाद्य च विसर्जयेत्
satāṁ samāgamo bhūyānmama janmanijanmani || iti kṣamāpya tānviprānprasādya ca visarjayet
जन्म-जन्म में सज्जनों का समागम मुझे प्राप्त हो" - इस प्रकार उन ब्राह्मणों से क्षमा माँगकर और उन्हें प्रसन्न कर विदा करे।
श्लोक 25 (skanda.2.131.25)
प्रतिमां तां गुरोर्दद्यात्सवस्त्रां मुनिपुंगव ॥ ततः सुहृद्गुरुयुतः स्वयं भुंजीत भक्तिमान्
pratimāṁ tāṁ gurordadyātsavastrāṁ munipuṁgava || tataḥ suhṛdguruyutaḥ svayaṁ bhuṁjīta bhaktimān
हे मुनिश्रेष्ठ! उस मूर्ति को वस्त्रसहित गुरु को दे। फिर भक्तिमान व्यक्ति स्वयं मित्रों और गुरु सहित भोजन करे।
श्लोक 26 (skanda.2.131.26)
द्वादश्यां प्रतिबुद्धोऽसौ त्रयोदश्यां युतः सुरैः ॥ दृष्टोर्च्चितश्चतुर्दश्यां तस्मात्पूज्यस्तिथाविह
dvādaśyāṁ pratibuddho'sau trayodaśyāṁ yutaḥ suraiḥ || dṛṣṭorccitaścaturdaśyāṁ tasmātpūjyastithāviha
द्वादशी को वे विष्णु जागते हैं, त्रयोदशी को देवताओं सहित रहते हैं, चतुर्दशी को दर्शन-पूजित होते हैं; इसलिए यहाँ यह तिथि पूज्य है।
श्लोक 27 (skanda.2.131.27)
पूजयेद्देवदेवेशं सौवर्णं गुर्वनुज्ञया ॥ पराऽत्र पौर्णमास्यां तु यात्रा स्यात्पुष्करस्य तु
pūjayeddevadeveśaṁ sauvarṇaṁ gurvanujñayā || parā'atra paurṇamāsyāṁ tu yātrā syātpuṣkarasya tu
गुरु की अनुमति से देवाधिदेव के सोने के रूप की पूजा करे। यहाँ पूर्णिमा को पुष्कर की यात्रा उत्तम मानी गई है।
श्लोक 28 (skanda.2.131.28)
वरान्दत्त्वा यतो विष्णुर्मत्स्यरूपोऽभवत्ततः ॥ तस्यां दत्तं हुतं जप्तं तदक्षय्यफलं भवेत्
varāndattvā yato viṣṇurmatsyarūpo'bhavattataḥ || tasyāṁ dattaṁ hutaṁ japtaṁ tadakṣayyaphalaṁ bhavet
क्योंकि वहीं वरदान देकर विष्णु मत्स्य-रूप को प्राप्त हुए थे; इसलिए उस दिन दिया गया दान, किया गया हवन और जप अक्षय फल देने वाला होता है।
श्लोक 29 (skanda.2.131.29)
कार्तिके मासि कर्तव्यो विधिरेष हि नारद ॥ एवं यः कुरुते सम्यक्कार्तिकस्य व्रतं नरः
kārtike māsi kartavyo vidhireṣa hi nārada || evaṁ yaḥ kurute samyakkārtikasya vrataṁ naraḥ
हे नारद! कार्तिक मास में यही विधि करनी चाहिए। इस प्रकार जो मनुष्य भलीभाँति कार्तिक-व्रत करता है -
श्लोक 30 (skanda.2.131.30)
यत्फलं तदवाप्नोति व्रतं कृत्वा तु कार्तिके ॥ ते धन्यास्ते सदा पूज्यास्तेषां वै सफलोदयः
yatphalaṁ tadavāpnoti vrataṁ kṛtvā tu kārtike || te dhanyāste sadā pūjyāsteṣāṁ vai saphalodayaḥ
कार्तिक में व्रत करके वह उस फल को प्राप्त करता है। वे धन्य हैं, वे सदा पूजनीय हैं, उनका जीवन सफल है।
श्लोक 31 (skanda.2.131.31)
विष्णुभक्तिरता ये स्युः कार्तिके व्रतचारिणः ॥ देहस्थितानि पापानि विलयं यांति तत्क्षणात्
viṣṇubhaktiratā ye syuḥ kārtike vratacāriṇaḥ || dehasthitāni pāpāni vilayaṁ yāṁti tatkṣaṇāt
जो कार्तिक में व्रतचारी होकर विष्णु-भक्ति में रत रहते हैं, उनके शरीर में स्थित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.131.32)
क्व यामोऽद्य भवत्येष यदूर्जव्रतकृन्नरः ॥ इति सर्वाणि पापानि रटन्तीह पुनःपुनः
kva yāmo'dya bhavatyeṣa yadūrjavratakṛnnaraḥ || iti sarvāṇi pāpāni raṭaṁtīha punaḥpunaḥ
"आज हम कहाँ जाएँ, क्योंकि यह मनुष्य कार्तिक-व्रती है" - इस प्रकार सभी पाप बार-बार यहाँ रटते रहते हैं और भाग जाते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.131.33)
तस्मात्कार्तिकमासस्य सदृशं नहि विद्यते ॥ सर्वपापस्य दहने अग्नेः सदृश उच्यते
tasmātkārtikamāsasya sadṛśaṁ nahi vidyate || sarvapāpasya dahane agneḥ sadṛśa ucyate
इसलिए कार्तिक मास के समान कुछ भी नहीं है। सभी पापों को जलाने में यह अग्नि के समान कहा गया है।
श्लोक 34 (skanda.2.131.34)
ऊर्जोद्यापनमाहात्म्यं शृणुयाच्छ्रद्धयाऽन्वितः ॥ श्रावयेद्वा पुमान्यस्तु विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्
ūrjodyāpanamāhātmyaṁ śṛṇuyācchraddhayā'anvitaḥ || śrāvayedvā pumānyastu viṣṇusāyujyamāpnuyāt
जो श्रद्धापूर्वक कार्तिक-उद्यापन की इस महिमा को सुनता है, या सुनाता है, वह पुरुष विष्णु के सायुज्य को प्राप्त होता है।
श्लोक 35 (skanda.2.131.35)
॥नारद उवाच॥ ऊर्जे व्रतोद्यापनादावशक्तः सिद्धिभाक्कथम् ॥ कथं विमुच्यते जंतुर्दुःखसंसारसागरात्
nārada uvāca ūrje vratodyāpanādāvaśaktaḥ siddhibhākkatham || kathaṁ vimucyate jaṁturduḥkhasaṁsārasāgarāt
नारद ने कहा - कार्तिक-व्रत के उद्यापन आदि में असमर्थ व्यक्ति सिद्धि का भागी कैसे बनेगा? जीव इस दुःखमय संसार-सागर से कैसे मुक्त होगा?
श्लोक 36 (skanda.2.131.36)
॥ब्रह्मोवाच॥ शृणुयादूर्जमाहात्म्यं नियमेन शुचिः पुमान् ॥ उद्यापनफलं प्राप्य विष्णुलोके वसेच्च सः
brahmovāca śṛṇuyādūrjamāhātmyaṁ niyamena śuciḥ pumān || udyāpanaphalaṁ prāpya viṣṇuloke vasecca saḥ
ब्रह्मा ने कहा - जो पवित्र मनुष्य नियमपूर्वक कार्तिक की महिमा सुनता है, वह उद्यापन के फल को प्राप्त कर विष्णु-लोक में निवास करता है।