वैष्णव खण्ड · अध्याय 130
प्रबोधोत्सव और द्वादशी-तिथि-कृत्य
श्लोक 1 (skanda.2.130.1)
॥ईश्वर उवाच॥ प्रबोधिन्याश्च माहात्म्यं पापघ्नं पुण्यवर्धनम् ॥ मुक्तिदं तत्त्वबुद्धीनां शृणुष्व सुरसत्तम
īśvara uvāca prabodhinyāśca māhātmyaṁ pāpaghnaṁ puṇyavardhanam || muktidaṁ tattvabuddhīnāṁ śṛṇuṣva surasattama
ईश्वर ने कहा - हे सुरश्रेष्ठ! प्रबोधिनी एकादशी की महिमा, जो पाप का नाश करने वाली, पुण्य बढ़ाने वाली और तत्त्वज्ञानियों को मुक्ति देने वाली है, सुनो।
श्लोक 2 (skanda.2.130.2)
तावद्गर्जति सेनानीर्गंगा भागीरथी क्षितौ ॥ यावत्प्रयाति पापघ्नी कार्तिके हरिबोधिनी
tāvadgarjati senānīrgaṁgā bhāgīrathī kṣitau || yāvatprayāti pāpaghnī kārtike haribodhinī
सेनानी (कार्तिकेय) और भागीरथी गंगा पृथ्वी पर तभी तक गर्जन करते हैं, जब तक कार्तिक की पाप-नाशिनी हरिबोधिनी नहीं आ जाती।
श्लोक 3 (skanda.2.130.3)
तावद्गर्जंति तीर्थानि आसमुद्रसरांसि वै ॥ यावत्प्रबोधिनी विष्णोस्तिथिर्नाऽऽयाति कार्तिके
tāvadgarjaṁti tīrthāni āsamudrasarāṁsi vai || yāvatprabodhinī viṣṇostithirnā'āyāti kārtike
सभी तीर्थ और समुद्र-पर्यंत सरोवर तभी तक गर्जन करते हैं, जब तक विष्णु की प्रबोधिनी तिथि कार्तिक में नहीं आ जाती।
श्लोक 4 (skanda.2.130.4)
अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च ॥ एकेनैवोपवासेन प्रबोधिन्या यथाऽभवत्
aśvamedhasahasrāṇi rājasūyaśatāni ca || ekenaivopavāsena prabodhinyā yathā'abhavat
हजारों अश्वमेध और सैकड़ों राजसूय यज्ञों का फल प्रबोधिनी के एक ही उपवास से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.2.130.5)
दुर्लभं चैव दुष्प्राप्यं त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ तदपि प्रार्थितं विप्र ददाति प्रतिबोधिनी
durlabhaṁ caiva duṣprāpyaṁ trailokye sacarācare || tadapi prārthitaṁ vipra dadāti pratibodhinī
चराचर त्रैलोक्य में जो भी दुर्लभ और दुष्प्राप्य है, हे विप्र! प्रतिबोधिनी उसे भी मांगने पर दे देती है।
श्लोक 6 (skanda.2.130.6)
ऐश्वर्यं संततिं ज्ञानं राज्यं च सुखसंपदः ॥ ददात्युपोषिता विप्र हेलया हरिबोधिनी
aiśvaryaṁ saṁtatiṁ jñānaṁ rājyaṁ ca sukhasaṁpadaḥ || dadātyupoṣitā vipra helayā haribodhinī
हे विप्र! उपवास की गई हरिबोधिनी सहज ही ऐश्वर्य, संतान, ज्ञान, राज्य और सुख-संपत्ति प्रदान करती है।
श्लोक 7 (skanda.2.130.7)
मेरुमंदरतुल्यानि पापान्युपार्जितानि च ॥ एकेनैवोपवासेन दहते हरिबोधिनी
merumaṁdaratulyāni pāpānyupārjitāni ca || ekenaivopavāsena dahate haribodhinī
मेरु और मंदराचल पर्वत के समान विशाल उपार्जित पाप भी हरिबोधिनी एक ही उपवास से जला देती है।
श्लोक 8 (skanda.2.130.8)
उपवासं प्रबोधिन्यां यः करोति स्वभावतः ॥ विधिना नरशार्दूल यथोक्तं लभते फलम्
upavāsaṁ prabodhinyāṁ yaḥ karoti svabhāvataḥ || vidhinā naraśārdūla yathoktaṁ labhate phalam
हे नरशार्दूल! जो सहज भाव से भी प्रबोधिनी को विधिपूर्वक उपवास करता है, वह यथोक्त फल प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.2.130.9)
पूर्वजन्मसहस्रेषु पापं यत्समुपार्जितम् ॥ जागरेण प्रबोधिन्यां दह्यते तृलराशिवत्
pūrvajanmasahasreṣu pāpaṁ yatsamupārjitam || jāgareṇa prabodhinyāṁ dahyate tṛlarāśivat
हजारों पूर्वजन्मों में उपार्जित पाप प्रबोधिनी के जागरण से तिनकों के ढेर के समान जल जाता है।
श्लोक 10 (skanda.2.130.10)
शृणु षण्मुख वक्ष्यामि जागरस्य च लक्षणम् ॥ तस्य विज्ञानमात्रेण दुर्लभो न जनार्दनः
śṛṇu ṣaṇmukha vakṣyāmi jāgarasya ca lakṣaṇam || tasya vijñānamātreṇa durlabho na janārdanaḥ
हे षण्मुख! सुनो, मैं जागरण के लक्षण बताता हूँ। इसे भलीभाँति जान लेने मात्र से जनार्दन दुर्लभ नहीं रह जाते।
श्लोक 11 (skanda.2.130.11)
गीतं वाद्यं च नृत्यं च पुराणपठनं तथा ॥ धूपं दीपं च नैवेद्यं पुष्पगंधाऽनुलेपनम्
gītaṁ vādyaṁ ca nṛtyaṁ ca purāṇapaṭhanaṁ tathā || dhūpaṁ dīpaṁ ca naivedyaṁ puṣpagaṁdhā'anulepanam
गीत, वाद्य, नृत्य, पुराण-पाठ, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, गंध और अनुलेपन -
श्लोक 12 (skanda.2.130.12)
फलमर्घ्यं च श्रद्धा च दानमिंद्रियसंयमम् ॥ सत्याऽन्वितं विनिंदं च मुदा युक्तं क्रियान्वितम्
phalamarghyaṁ ca śraddhā ca dānamiṁdriyasaṁyamam || satyā'nvitaṁ vinindaṁ ca mudā yuktaṁ kriyānvitam
फल, अर्घ्य, श्रद्धा, दान, इंद्रिय-संयम, सत्य से युक्त, निंदा से रहित, हर्ष से युक्त, क्रिया से युक्त -
श्लोक 13 (skanda.2.130.13)
साश्चर्यं चैव प्रोत्साहमालस्यादिविवर्जितम् ॥ प्रदक्षिणादिसंयुक्तं नमस्कारपुरःसरम्
sāścaryaṁ caiva protsāhamālasyādivivarjitam || pradakṣiṇādisaṁyuktaṁ namaskārapuraḥsaram
आश्चर्य और उत्साह से युक्त, आलस्य आदि से रहित, प्रदक्षिणा आदि से युक्त, नमस्कार-पूर्वक -
श्लोक 14 (skanda.2.130.14)
नीराजनसमायुक्तमनिर्विण्णेन चेतसा ॥ यामेयामे महाभाग कुर्वन्नीराजनं हरेः
nīrājanasamāyuktamanirviṇṇena cetasā || yāmeyāme mahābhāga kurvannīrājanaṁ hareḥ
आरती से युक्त, अखिन्न मन से - हे महाभाग! प्रत्येक प्रहर में हरि की आरती करते हुए -
श्लोक 15 (skanda.2.130.15)
एतैर्गुणैः समायुक्तं कुर्याज्जागरणं विभोः ॥ एकाग्रमनसा यस्तु न पुनर्जायते भुवि
etairguṇaiḥ samāyuktaṁ kuryājjāgaraṇaṁ vibhoḥ || ekāgramanasā yastu na punarjāyate bhuvi
इन गुणों से युक्त होकर प्रभु का जागरण करना चाहिए। जो एकाग्रचित्त होकर ऐसा करता है, वह इस पृथ्वी पर पुनः जन्म नहीं लेता।
श्लोक 16 (skanda.2.130.16)
य एवं कुरुते भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः ॥ जागरं वासरे विष्णोर्लीयते परमात्मनि
ya evaṁ kurute bhaktyā vittaśāṭhyavivarjitaḥ || jāgaraṁ vāsare viṣṇorlīyate paramātmani
जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक, धन के प्रति कपट से रहित होकर विष्णु के दिन जागरण करता है, वह परमात्मा में लीन हो जाता है।
श्लोक 17 (skanda.2.130.17)
पुरुषसूक्तेन यो नित्यं कार्तिकेऽथार्चयेद्धरिम् ॥ वर्षकोटिसहस्राणि पूजितस्तेन केशवः
puruṣasūktena yo nityaṁ kārtike'thārcayeddharim || varṣakoṭisahasrāṇi pūjitastena keśavaḥ
जो पुरुष-सूक्त से नित्य कार्तिक में हरि की पूजा करता है, उसके द्वारा केशव करोड़ों वर्षों तक पूजित हो जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.130.18)
यथोक्तेन विधानेन पंचरात्रोदितेन वै ॥ कार्तिके त्वर्चयेन्नित्यं मुक्तिभागी भवेन्नरः
yathoktena vidhānena paṁcarātroditena vai || kārtike tvarcayennityaṁ muktibhāgī bhavennaraḥ
यथोक्त विधि से, पंचरात्र-शास्त्र में कहे अनुसार, जो कार्तिक में नित्य पूजा करता है, वह मनुष्य मुक्ति का भागी होता है।
श्लोक 19 (skanda.2.130.19)
नमो नारायणायेति कार्तिके योर्चयेद्धरिम् ॥ स मुक्तो नारकैर्दुःखैः पदं गच्छत्यनामयम्
namo nārāyaṇāyeti kārtike yorcayeddharim || sa mukto nārakairduḥkhaiḥ padaṁ gacchatyanāmayam
"नमो नारायणाय" कहते हुए जो कार्तिक में हरि की पूजा करता है, वह नरक के दुःखों से मुक्त होकर निरामय पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (skanda.2.130.20)
हरेर्नामसहस्रं च गजराजस्य मोक्षणम् ॥ कार्तिके पठते यस्तु पुनर्जन्म न विंदति
harernāmasahasraṁ ca gajarājasya mokṣaṇam || kārtike paṭhate yastu punarjanma na viṁdati
जो कार्तिक में हरि के सहस्र नामों का तथा गजराज-मोक्ष का पाठ करता है, वह पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 21 (skanda.2.130.21)
युगकोटिसहस्राणि मन्वंतरशतानि च ॥ द्वादश्यां कार्तिके मासि जागरी वसते दिवि
yugakoṭisahasrāṇi manvaṁtaraśatāni ca || dvādaśyāṁ kārtike māsi jāgarī vasate divi
कार्तिक मास की द्वादशी को जागरण करने वाला करोड़ों युगों और सैकड़ों मन्वंतरों तक स्वर्ग में निवास करता है।
श्लोक 22 (skanda.2.130.22)
कुले तस्य च ये जाताः शतशोथ सहस्रशः ॥ प्राप्नुवंति पदं विष्णोस्तस्मात्कुर्वीत जागरम्
kule tasya ca ye jātāḥ śataśotha sahasraśaḥ || prāpnuvaṁti padaṁ viṣṇostasmātkurvīta jāgaram
उसके कुल में जन्मे सैकड़ों-हजारों लोग भी विष्णु के पद को प्राप्त होते हैं; इसलिए जागरण करना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.2.130.23)
कार्तिके पश्चिमे यामे स्तवं गानं करोति यः ॥ श्वेतद्वीपे तु वसते पितृभिः सह सुव्रत
kārtike paścime yāme stavaṁ gānaṁ karoti yaḥ || śvetadvīpe tu vasate pitṛbhiḥ saha suvrata
हे सुव्रत! जो कार्तिक में रात्रि के अंतिम प्रहर में स्तवन-गान करता है, वह पितरों सहित श्वेतद्वीप में निवास करता है।
श्लोक 24 (skanda.2.130.24)
नैवेद्यदानं हरये कार्तिके दिनसंक्षये ॥ युगानि वसते स्वर्गे तावंति मुनिसत्तमाः
naivedyadānaṁ haraye kārtike dinasaṁkṣaye || yugāni vasate svarge tāvaṁti munisattamāḥ
हे मुनिश्रेष्ठों! कार्तिक में दिन के अंत में हरि को नैवेद्य अर्पित करने वाला उतने ही युगों तक स्वर्ग में निवास करता है।
श्लोक 25 (skanda.2.130.25)
अक्षयं मुनिशार्दूल मालतीकमलार्चनम् ॥ अर्चयेद्देवदेवेशं स याति परमं पदम्
akṣayaṁ muniśārdūla mālatīkamalārcanam || arcayeddevadeveśaṁ sa yāti paramaṁ padam
हे मुनिश्रेष्ठ! मालती और कमल से पूजा अक्षय फल देने वाली है; जो देवाधिदेव की पूजा करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 26 (skanda.2.130.26)
कार्तिके शुक्लपक्षे तु कृत्वा ह्येकादशीं नरः ॥ प्रातर्दत्त्वा शुभान्कुंभान्स याति मम मंदिरम्
kārtike śuklapakṣe tu kṛtvā hyekādaśīṁ naraḥ || prātardattvā śubhānkuṁbhānsa yāti mama maṁdiram
जो कार्तिक के शुक्ल पक्ष में एकादशी करके प्रातःकाल शुभ कलश दान करता है, वह मेरे धाम को जाता है।
श्लोक 27 (skanda.2.130.27)
अत्रैव तु प्रकर्तव्यः प्रबोधस्तु हरेः खग ॥ हतः शंखासुरो दैत्यो नभसः शुक्लपक्षके
atraiva tu prakartavyaḥ prabodhastu hareḥ khaga || hataḥ śaṁkhāsuro daityo nabhasaḥ śuklapakṣake
हे खग (गरुड़)! यहीं इसी दिन हरि का प्रबोधन करना चाहिए, क्योंकि आश्विन के शुक्ल पक्ष में शंखासुर दैत्य मारा गया था।
श्लोक 28 (skanda.2.130.28)
एकादश्यां ततो विष्णुश्चातुर्मास्ये प्रसुप्तवान् ॥ क्षीरांभोधौ जागृतोऽसावेकादश्यां तु कार्तिके
ekādaśyāṁ tato viṣṇuścāturmāsye prasuptavān || kṣīrāṁbhodhau jāgṛto'sāvekādaśyāṁ tu kārtike
तब से विष्णु एकादशी को चातुर्मास्य के लिए क्षीरसागर में सो गए थे, और कार्तिक की एकादशी को ही वे जागृत हुए।
श्लोक 29 (skanda.2.130.29)
अतः प्रबोधनं कार्यमेकादश्यां तु वैष्णवैः ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद उत्तिष्ठ गरुडध्वज ॥ उत्तिष्ठ कमलाकांत त्रैलोक्यं मंगलं कुरु
ataḥ prabodhanaṁ kāryamekādaśyāṁ tu vaiṣṇavaiḥ uttiṣṭhottiṣṭha govinda uttiṣṭha garuḍadhvaja || uttiṣṭha kamalākāṁta trailokyaṁ maṁgalaṁ kuru
इसलिए वैष्णवों को एकादशी को उनका प्रबोधन करना चाहिए - "उठो, उठो हे गोविंद! उठो हे गरुड़ध्वज! उठो हे कमलाकांत! तीनों लोकों का मंगल करो।"
श्लोक 30 (skanda.2.130.30)
इत्युक्त्वा शंखभेर्यादि प्रातःकाले तु वादयेत् ॥ वीणावेणुमृदंगादि नृत्यगीतादि कारयेत्
ityuktvā śaṁkhabheryādi prātaḥkāle tu vādayet || vīṇāveṇumṛdaṁgādi nṛtyagītādi kārayet
ऐसा कहकर प्रातःकाल शंख-भेरी आदि बजाए। वीणा, वेणु, मृदंग आदि बजाते हुए नृत्य-गीत कराए।
श्लोक 31 (skanda.2.130.31)
उत्थापयित्वा देवेशं पूजां तस्य विधाय च ॥ सायंकाले प्रकर्तव्यस्तुलस्युद्वाहजो विधिः
utthāpayitvā deveśaṁ pūjāṁ tasya vidhāya ca || sāyaṁkāle prakartavyastulasyudvāhajo vidhiḥ
देवेश को जगाकर उनकी पूजा करनी चाहिए, और सायंकाल में तुलसी-विवाह की विधि करनी चाहिए।
श्लोक 32 (skanda.2.130.32)
सर्वदैकादशी पुण्या विशेषात्कार्तिकी स्मृता ॥ यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च
sarvadaikādaśī puṇyā viśeṣātkārtikī smṛtā || yāni kāni ca pāpāni brahmahatyādikāni ca
सभी एकादशियाँ पुण्यदायक हैं, किंतु कार्तिकी विशेष रूप से मानी गई है। ब्रह्महत्या आदि जो भी पाप हैं -
श्लोक 33 (skanda.2.130.33)
अन्नमाश्रित्य तिष्ठंति संप्राप्ते हरिवासरे ॥ स केवलमघं भुंक्ते यो भुंक्ते हरिवासरे
annamāśritya tiṣṭhaṁti saṁprāpte harivāsare || sa kevalamaghaṁ bhuṁkte yo bhuṁkte harivāsare
वे सब अन्न में स्थित होकर हरि-दिवस के आने पर ठहरे रहते हैं। जो हरि-दिवस को भोजन करता है, वह केवल पाप ही भोगता है।
श्लोक 34 (skanda.2.130.34)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कुर्यादेकादशीव्रतम् ॥ न कुर्याद्यदि मोहेन उपवासं नराधमः
tasmātsarvaprayatnena kuryādekādaśīvratam || na kuryādyadi mohena upavāsaṁ narādhamaḥ
इसलिए पूरे प्रयत्न से एकादशी-व्रत करना चाहिए। यदि कोई अधम मनुष्य मोहवश उपवास न करे -
श्लोक 35 (skanda.2.130.35)
नरके नियतं वासः पितृभिः सह तस्य वै ॥ सूतके मृतके वाऽपि नोपवासं त्यजेद्बुधः
narake niyataṁ vāsaḥ pitṛbhiḥ saha tasya vai || sūtake mṛtake vā'api nopavāsaṁ tyajedbudhaḥ
तो निश्चय ही उसका पितरों सहित नरक में निवास होता है। सूतक या मृतक-अशौच में भी बुद्धिमान व्यक्ति उपवास न त्यागे।
श्लोक 36 (skanda.2.130.36)
दशमीवेधसंयुक्ता त्याज्या चैकादशी व्रते ॥ गांधार्याऽपि पुरा तस्यामुपवासः कृतो गुह
daśamīvedhasaṁyuktā tyājyā caikādaśī vrate || gāṁdhāryā'api purā tasyāmupavāsaḥ kṛto guha
हे गुह! व्रत में दशमी से युक्त एकादशी को त्यागना चाहिए। पूर्वकाल में गांधारी ने भी उसी दोषयुक्त एकादशी में उपवास किया था।
श्लोक 37 (skanda.2.130.37)
तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां वधजां त्यजेत् ॥ एकादशीमुपवसेत्स्नानदानपुरःसरम्
tasyāḥ putraśataṁ naṣṭaṁ tasmāttāṁ vadhajāṁ tyajet || ekādaśīmupavaset snānadānapuraḥsaram
उसके सौ पुत्र नष्ट हो गए; इसलिए उस दोषयुक्त एकादशी को त्याग देना चाहिए। स्नान और दान-पूर्वक एकादशी का उपवास करना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.2.130.38)
रुक्मांगदोऽपि राजर्षिर्मोहिन्याः संगमेन च ॥ इह लोके सुखं भुक्त्वा चांऽते विष्णुपुरं ययौ
rukmāṁgado'pi rājarṣirmohinyāḥ saṁgamena ca || iha loke sukhaṁ bhuktvā cā'aṁte viṣṇupuraṁ yayau
राजर्षि रुक्मांगद भी मोहिनी के संग से इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णु-लोक को गए।
श्लोक 39 (skanda.2.130.39)
द्वादशी पुण्यदा प्रोक्ता सर्वाऽघौघविनाशिनी ॥ किं दानैः कि तपोभिश्च किमु पोष्यैर्व्रतैश्च किम्
dvādaśī puṇyadā proktā sarvā'aghaughavināśinī || kiṁ dānaiḥ ki tapobhiśca kimu poṣyairvrataiśca kim
द्वादशी पुण्यदायिनी और समस्त पापों की राशि का नाश करने वाली कही गई है। दान से क्या, तप से क्या, पोषण करने योग्य व्रतों से भी क्या -
श्लोक 40 (skanda.2.130.40)
किमिष्टैश्चैव पुत्रैश्च द्वादशी येन सेविता ॥ गंगायां चैव दुर्भिक्षे प्रत्यहं कोटिभोजनात्
kimiṣṭaiścaiva putraiśca dvādaśī yena sevitā || gaṁgāyāṁ caiva durbhikṣe pratyahaṁ koṭibhojanāt
और क्या उपयोग प्रिय पुत्रों का भी, जिसने द्वादशी का सेवन किया है। गंगा में, अकाल के समय, प्रतिदिन करोड़ों को भोजन कराने से -
श्लोक 41 (skanda.2.130.41)
यत्फलं तदवाप्नोति द्वादश्यामेकभोजनात् ॥ यद्दत्तं चार्हते दानं द्वादश्यां तु सिते शुभे
yatphalaṁ tadavāpnoti dvādaśyāmekabhojanāt || yaddattaṁ cārhate dānaṁ dvādaśyāṁ tu site śubhe
वह फल द्वादशी को एक बार भोजन करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। शुभ शुक्ल-पक्ष की द्वादशी को योग्य पात्र को जो दान दिया जाता है -
श्लोक 42 (skanda.2.130.42)
सिक्थेसिक्थे च वैकस्य कतिब्राह्मणभोजनम् ॥ तदहं नैव जानामि महिमानं हि सुव्रत
sikthesikthe ca vaikasya katibrāhmaṇabhojanam || tadahaṁ naiva jānāmi mahimānaṁ hi suvrata
उसके प्रत्येक कण के फलस्वरूप कितने ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिलता है, इसे मैं भी नहीं जानता, हे सुव्रत! ऐसी इसकी महिमा है।
श्लोक 43 (skanda.2.130.43)
शालिग्रामशिलादानं यः कुर्याद्द्वादशीदिने ॥ सप्तद्वीपवतीं भूमिं गंगायां च रविग्रहे ॥ दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं लभते नरः
śāligrāmaśilādānaṁ yaḥ kuryāddvādaśīdine || saptadvīpavatīṁ bhūmiṁ gaṁgāyāṁ ca ravigrahe || dattvā yatphalamāpnoti tatphalaṁ labhate naraḥ
जो द्वादशी के दिन शालग्राम-शिला का दान करता है, वह उस फल को प्राप्त करता है जो सप्तद्वीपवती पृथ्वी को गंगा-तट पर सूर्य-ग्रहण के समय दान करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 44 (skanda.2.130.44)
पंचामृतैस्तु यो विष्णुं भक्त्या संस्नापयेद्द्विज ॥ स सर्वकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते
paṁcāmṛtaistu yo viṣṇuṁ bhaktyā saṁsnāpayeddvija || sa sarvakulamuddhṛtya viṣṇuloke mahīyate
हे द्विज! जो पंचामृत से भक्तिपूर्वक विष्णु को स्नान कराता है, वह अपने संपूर्ण कुल का उद्धार कर विष्णु-लोक में महिमामंडित होता है।
श्लोक 45 (skanda.2.130.45)
शुक्ले कार्तिकमासस्य द्वादश्यां परमोत्सवे ॥ प्रातरारभ्य यः कुर्यात्स्नानदानादिकं तथा ॥ स तु मोक्षमवाप्नोति नाऽत्र कार्या विचारणा
śukle kārtikamāsasya dvādaśyāṁ paramotsave || prātārabhya yaḥ kuryātsnānadānādikaṁ tathā || sa tu mokṣamavāpnoti nā'atra kāryā vicāraṇā
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के परम उत्सव पर, जो प्रातःकाल से आरंभ कर स्नान-दान आदि करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 46 (skanda.2.130.46)
द्वादश्यां कार्तिके मासि स्नानसंध्यादिकर्म च ॥ कृत्वा दामोदरं पूज्य भक्तिश्रद्धासमन्वितः
dvādaśyāṁ kārtike māsi snānasaṁdhyādikarma ca || kṛtvā dāmodaraṁ pūjya bhaktiśraddhāsamanvitaḥ
कार्तिक मास की द्वादशी को स्नान-संध्या आदि कर्म कर, भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर दामोदर की पूजा करके -
श्लोक 47 (skanda.2.130.47)
यस्तस्यां सूपनैवेद्यं न ददाति नराधमः ॥ नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम
yastasyāṁ sūpanaivedyaṁ na dadāti narādhamaḥ || narake niyataṁ vāso bhavatītyanuśuśruma
जो अधम मनुष्य उस दिन दाल का नैवेद्य नहीं देता, हमने सुना है कि उसका नरक में निश्चित निवास होता है।
श्लोक 48 (skanda.2.130.48)
तस्मात्सूपस्य नैवेद्यं द्वादश्यां कार्तिके शुभे ॥ दद्याद्भक्तियुतो ब्रह्मंश्चान्यथा नरकं व्रजेत्
tasmātsūpasya naivedyaṁ dvādaśyāṁ kārtike śubhe || dadyādbhaktiyuto brahmaṁścānyathā narakaṁ vrajet
इसलिए, हे ब्रह्मन्! शुभ कार्तिक की द्वादशी को भक्तिपूर्वक दाल का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए, अन्यथा नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 49 (skanda.2.130.49)
यस्तस्यां दंपतीनां तु भोजनं कुरुते नरः ॥ न तस्य फलविश्रांतिर्मया वक्तुं तु शक्यते
yastasyāṁ daṁpatīnāṁ tu bhojanaṁ kurute naraḥ || na tasya phalaviśrāntirmayā vaktuṁ tu śakyate
जो मनुष्य उस दिन दंपतियों को भोजन कराता है, उसके फल की सीमा मैं भी नहीं बता सकता।
श्लोक 50 (skanda.2.130.50)
धात्रीच्छायां गतो यस्तु द्वादश्यां पूजयेद्धरिम् ॥ तत्रैव भोजनं यस्तु ब्राह्मणानां तु कारयेत्
dhātrīcchāyāṁ gato yastu dvādaśyāṁ pūjayeddharim || tatraiva bhojanaṁ yastu brāhmaṇānāṁ tu kārayet
जो द्वादशी को आँवले के वृक्ष की छाया में जाकर हरि की पूजा करता है, और वहीं ब्राह्मणों को भोजन कराता है -
श्लोक 51 (skanda.2.130.51)
स्वयं च तत्र भुंक्ते यः सूपभक्ष्यादिकं तथा ॥ न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि
svayaṁ ca tatra bhuṁkte yaḥ sūpabhakṣyādikaṁ tathā || na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi
और स्वयं भी वहीं दाल-भात आदि खाता है, उसका पुनरागमन करोड़ों कल्पों में भी नहीं होता।
श्लोक 52 (skanda.2.130.52)
एवं प्रातर्विधायाऽथ पूजां दामोदरस्य हि ॥ रात्रौ पुनः प्रकर्तव्यं पूजाकर्म हरेर्द्विज
evaṁ prātarvidhāyā'atha pūjāṁ dāmodarasya hi || rātrau punaḥ prakartavyaṁ pūjākarma harerdvija
हे द्विज! इस प्रकार प्रातःकाल दामोदर की पूजा कर, रात्रि में पुनः हरि की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 53 (skanda.2.130.53)
तुलसीसन्निधौ कृत्वा पताकाध्वजशोभितम् ॥ पुष्पमालासमाकीर्णं नानारत्नोपशोभितम्
tulasīsannidhau kṛtvā patākādhvajaśobhitam || puṣpamālāsamākīrṇaṁ nānāratnopaśobhitam
तुलसी के निकट पताका और ध्वज से सुशोभित, फूलों की मालाओं से भरपूर, विभिन्न रत्नों से अलंकृत -
श्लोक 54 (skanda.2.130.54)
मुक्तादामभिराच्छन्नं कृत्वा मंडपमुत्तमम् ॥ पूजयेद्विष्णुमव्यग्रस्तद्गतैकाग्रमानसः
muktādāmabhirācchannaṁ kṛtvā maṁḍapamuttamam || pūjayedviṣṇumavyagrastadgataikāgramānasaḥ
मोतियों की झालरों से आच्छादित एक उत्तम मंडप बनाकर, स्थिर और एकाग्रचित्त होकर विष्णु की पूजा करे।
श्लोक 55 (skanda.2.130.55)
पंचरात्रोक्तमार्गेण गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ नवनीतं दधिक्षीरं तथैव च घनं घृतम्
paṁcarātroktamārgeṇa gaṁdhapuṣpākṣatādibhiḥ || navanītaṁ dadhikṣīraṁ tathaiva ca ghanaṁ ghṛtam
पंचरात्र-शास्त्र में कहे गए मार्ग से गंध, पुष्प, अक्षत आदि से, तथा मक्खन, दही, दूध और गाढ़े घी से -
श्लोक 56 (skanda.2.130.56)
विविधैः खाद्यनैवेद्यैर्जलेन च सुगंधिना ॥ युक्तं निवेदयेद्विष्णोस्तांबूलं सलवंगकम्
vividhaiḥ khādyanaivedyairjalena ca sugaṁdhinā || yuktaṁ nivedayedviṣṇostāṁbūlaṁ salavaṁgakam
विभिन्न खाद्य-नैवेद्यों से, तथा सुगंधित जल से युक्त, और लौंग सहित पान भी विष्णु को अर्पित करे।
श्लोक 57 (skanda.2.130.57)
पुष्पाणि च विचित्राणि सुगन्धीनि बहूनि च ॥ प्रोक्षयित्वा च विधिवदर्पयित्वा दलैः शुभैः
puṣpāṇi ca vicitrāṇi sugandhīni bahūni ca || prokṣayitvā ca vidhivadarpayitvā dalaiḥ śubhaiḥ
विविध, सुगंधित और अनेक फूलों को विधिपूर्वक शुद्ध कर, शुभ पत्तों सहित अर्पित करे।
श्लोक 58 (skanda.2.130.58)
तुलस्याश्चापि धात्र्याश्च फलैश्चाऽपि प्रपूजयेत् ॥ नीराजनं ततः कृत्वा मंत्रपुष्पं समर्पयेत्
tulasyāścāpi dhātryāśca phalaiścā'api prapūjayet || nīrājanaṁ tataḥ kṛtvā maṁtrapuṣpaṁ samarpayet
तुलसी और आँवले के फलों से भी पूजा करे। फिर आरती करके मंत्र-पुष्प अर्पित करे।
श्लोक 59 (skanda.2.130.59)
अभिषेकं विना सर्वपूजां कृत्वा विधानतः ॥ विष्णोः पूजां समाप्याऽथ ब्राह्मणानां प्रपूजनम्
abhiṣekaṁ vinā sarvapūjāṁ kṛtvā vidhānataḥ || viṣṇoḥ pūjāṁ samāpyā'atha brāhmaṇānāṁ prapūjanam
अभिषेक के बिना विधिपूर्वक संपूर्ण पूजा कर, विष्णु-पूजा समाप्त कर, फिर ब्राह्मणों का पूजन करे।
श्लोक 60 (skanda.2.130.60)
कुर्याद्भक्तियुतो विप्र दद्याच्चैव फलादिकम् ॥ तांबूलं च ततो दत्त्वा दक्षिणां शक्तितोऽर्पयेत्
kuryādbhaktiyuto vipra dadyāccaiva phalādikam || tāṁbūlaṁ ca tato dattvā dakṣiṇāṁ śaktito'rpayet
भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को फल आदि दे। फिर पान देकर यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित करे।
श्लोक 61 (skanda.2.130.61)
ततो वृद्धान्पितॄन्मातॄन् पूजयित्वा विधानतः ॥ ततः स्वयं स्वभार्याभिर्नैवेद्यं भक्षयेत्सुधीः
tato vṛddhānpitṝnmātṝn pūjayitvā vidhānataḥ || tataḥ svayaṁ svabhāryābhirnaivedyaṁ bhakṣayetsudhīḥ
फिर वृद्ध पितरों और माताओं की विधिपूर्वक पूजा कर, तब बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं अपनी पत्नियों सहित नैवेद्य ग्रहण करे।
श्लोक 62 (skanda.2.130.62)
इत्येवं तु विधानेन यः कुर्याद्द्वादशीव्रतम् ॥ न तस्य लोकाः क्षीयंते कल्पकोटिशतैरपि
ityevaṁ tu vidhānena yaḥ kuryāddvādaśīvratam || na tasya lokāḥ kṣīyaṁte kalpakoṭiśatairapi
इस प्रकार विधिपूर्वक जो द्वादशी-व्रत करता है, उसके प्राप्त लोक करोड़ों कल्पों में भी क्षीण नहीं होते।
श्लोक 63 (skanda.2.130.63)
पुत्रपौत्रैः परिवृतो भुक्त्वा भोगान्मनोहरान् ॥ भोगांते च व्रजेन्मोक्षमतीतकुलसप्तकैः
putrapautraiḥ parivṛto bhuktvā bhogānmanoharān || bhogāṁte ca vrajenmokṣamatītakulasaptakaiḥ
वह पुत्र-पौत्रों से घिरा हुआ मनोहर भोगों को भोगकर, भोगों के अंत में अपने पूर्व सात कुलों सहित मोक्ष को प्राप्त होता है।
श्लोक 64 (skanda.2.130.64)
तस्मान्नारद माहात्म्यं द्वादश्याः कार्तिकस्य च ॥ न मया शक्यते वक्तुं किमन्यैर्मनुजैरपि
tasmānnārada māhātmyaṁ dvādaśyāḥ kārtikasya ca || na mayā śakyate vaktuṁ kimanyairmanujairapi
इसलिए, हे नारद! कार्तिक की द्वादशी की महिमा मैं भी नहीं कह सकता; अन्य मनुष्यों की तो बात ही क्या।
श्लोक 65 (skanda.2.130.65)
द्वादश्या ह्युत्तमं पुण्यं माहात्म्यं यः पठेन्नरः ॥ शृणुयाद्वा मुनिश्रेष्ठ स याति परमां गतिम्
dvādaśyā hyuttamaṁ puṇyaṁ māhātmyaṁ yaḥ paṭhennaraḥ || śṛṇuyādvā muniśreṣṭha sa yāti paramāṁ gatim
हे मुनिश्रेष्ठ! जो मनुष्य द्वादशी के इस उत्तम पुण्यमय माहात्म्य को पढ़ता है या सुनता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 66 (skanda.2.130.66)
राजर्षिरम्बरीषोऽपि चकारैतद्व्रतं शुभम् ॥ यथाविधि तपोनिष्ठस्तेन मोक्षमवाप्तवान्
rājarṣirambarīṣo'pi cakāraitadvrataṁ śubham || yathāvidhi taponiṣṭhastena mokṣamavāptavān
राजर्षि अंबरीष ने भी इस शुभ व्रत को विधिपूर्वक तप में तत्पर होकर किया, और उसी से उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया।