वैष्णव खण्ड · अध्याय 129
भीष्म-पंचक व्रत की महिमा
श्लोक 1 (skanda.2.129.1)
॥वालखिल्या ऊचुः॥ कार्तिकस्याऽमले पक्षे स्नात्वा सम्यग्यतव्रतः ॥ एकादश्यां तु गृह्णीयाद्व्रतं पंचदिनात्मकम्
vālakhilyā ūcuḥ kārtikasyā'amale pakṣe snātvā samyagyatavrataḥ || ekādaśyāṁ tu gṛhṇīyādvrataṁ paṁcadinātmakam
वालखिल्यों ने कहा - कार्तिक के शुक्ल पक्ष में भलीभाँति स्नान कर, नियमपूर्वक व्रतस्थ होकर, एकादशी को पांच दिनों वाला व्रत ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.2.129.2)
शरपंजरसुप्तेन भीष्मेण तु महात्मना ॥ राजधर्मा मोक्षधर्मा दानधर्मास्ततः परम्
śarapaṁjarasuptena bhīṣmeṇa tu mahātmanā || rājadharmā mokṣadharmā dānadharmāstataḥ param
बाणों की शय्या पर सोए हुए महात्मा भीष्म ने राजधर्म, मोक्षधर्म, और उसके पश्चात दानधर्म का उपदेश दिया -
श्लोक 3 (skanda.2.129.3)
कथिता पांडुदायादैः कृष्णेनाऽपि श्रुतास्तदा ॥ ततः प्रीतेन मनसा वासुदेवेन भाषितम्
kathitā pāṇḍudāyādaiḥ kṛṣṇenā'api śrutāstadā || tataḥ prītena manasā vāsudevena bhāṣitam
पांडु-पुत्रों को यह उपदेश दिया गया, और कृष्ण ने भी उसे सुना। तब प्रसन्न मन से वासुदेव ने कहा -
श्लोक 4 (skanda.2.129.4)
धन्यधन्योऽसि भीष्म त्वं धर्माः संश्रावितास्त्वया ॥ एकादश्यां कार्तिकस्य याचितं च जलं त्वया
dhanyadhanyo'si bhīṣma tvaṁ dharmāḥ saṁśrāvitāstvayā || ekādaśyāṁ kārtikasya yācitaṁ ca jalaṁ tvayā
हे भीष्म! तुम धन्य हो, परम धन्य हो, तुमने ये धर्म सुनाए हैं। कार्तिक की एकादशी को तुमने जल मांगा था -
श्लोक 5 (skanda.2.129.5)
अर्जुनेन समानीतं गांगं बाणस्य वेगतः ॥ तुष्टानि तव गात्राणि तस्मादद्यदिनावधि
arjunena samānītaṁ gāṁgaṁ bāṇasya vegataḥ || tuṣṭāni tava gātrāṇi tasmādadyadināvadhi
और अर्जुन ने बाण के वेग से गंगाजल ला दिया था। तुम्हारे अंग तृप्त हो गए; इसलिए आज के दिन से -
श्लोक 6 (skanda.2.129.6)
पूर्णांतं सर्वलोकास्त्वां तर्पयंत्वर्घ्यदानतः ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मम संतुष्टिकारकम्
pūrṇāṁtaṁ sarvalokāstvāṁ tarpayaṁtvarghyadānataḥ || tasmātsarvaprayatnena mama saṁtuṣṭikārakam
अंत तक सभी लोग अर्घ्य-दान से तुम्हें तृप्त करें। इसलिए सब लोग पूर्ण प्रयत्न से मुझे संतुष्ट करने वाला -
श्लोक 7 (skanda.2.129.7)
एतद्व्रतं प्रकुर्वंतु भीष्मपंचकसंज्ञितम् ॥ कार्तिकस्य व्रतं कृत्वा न कुर्याद्भीष्मपंचकम्
etadvrataṁ prakurvaṁtu bhīṣmapaṁcakasaṁjñitam || kārtikasya vrataṁ kṛtvā na kuryādbhīṣmapaṁcakam
यह भीष्म-पंचक नामक व्रत करें। जो कार्तिक-व्रत तो करता है, किंतु भीष्म-पंचक नहीं करता -
श्लोक 8 (skanda.2.129.8)
समग्रं कार्तिकव्रतं वृथा तस्य भविष्यति ॥ अशक्तश्चेन्नरो भूयादसमर्थश्च कार्तिके
samagraṁ kārtikavrataṁ vṛthā tasya bhaviṣyati || aśaktaścennaro bhūyādasamarthaśca kārtike
उसका संपूर्ण कार्तिक-व्रत व्यर्थ हो जाएगा। यदि मनुष्य कार्तिक के पूरे व्रत में असमर्थ हो -
श्लोक 9 (skanda.2.129.9)
भीष्मस्य पंचकं कृत्वा कार्तिकस्य फलं लभेत् ॥ सत्यव्रताय शुचये गांगेयाय महात्मने
bhīṣmasya paṁcakaṁ kṛtvā kārtikasya phalaṁ labhet || satyavratāya śucaye gāṁgeyāya mahātmane
तो भीष्म-पंचक करके ही वह कार्तिक का फल प्राप्त कर सकता है। सत्यव्रती, पवित्र, गंगापुत्र, महात्मा -
श्लोक 10 (skanda.2.129.10)
भीष्मायैतद्ददाम्यर्घ्यमाजन्मब्रह्मचारिणे ॥ सव्येनाऽनेन मंत्रेण तर्पणं सार्ववर्णिकम्
bhīṣmāyaitaddadāmyarghyamājanmabrahmacāriṇe || savyenā'anena maṁtreṇa tarpaṇaṁ sārvavarṇikam
भीष्म को, जो जन्म से ब्रह्मचारी हैं, मैं यह अर्घ्य देता हूँ - इस मंत्र से बाएँ हाथ से सभी वर्णों के लोग तर्पण करें।
श्लोक 11 (skanda.2.129.11)
व्रतांगत्वात्पूर्णिमायां प्रदेयः पापपूरुषः ॥ अपुत्रेण प्रकर्तव्यं सर्वथा भीष्मपञ्चकम्
vratāṁgatvātpūrṇimāyāṁ pradeyaḥ pāpapūruṣaḥ || aputreṇa prakartavyaṁ sarvathā bhīṣmapaṁcakam
व्रत के एक अंग के रूप में पूर्णिमा को पापपुरुष का दान करना चाहिए। पुत्रहीन व्यक्ति को सर्वथा भीष्म-पंचक करना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.2.129.12)
यः पुत्रार्थं व्रतं कुर्यात्सस्त्रीको भीष्मपञ्चकम् ॥ प्रदत्त्वा पापपुरुषं वर्षमध्ये सुतं लभेत्
yaḥ putrārthaṁ vrataṁ kuryātsastrīko bhīṣmapaṁcakam || pradattvā pāpapuruṣaṁ varṣamadhye sutaṁ labhet
जो पुत्र की कामना से पत्नी सहित भीष्म-पंचक व्रत करता और पापपुरुष का दान करता है, वह एक वर्ष के भीतर पुत्र प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.2.129.13)
अवश्यमेव कर्तव्यं तस्माद्भीष्मस्य पंचकम् ॥ विष्णुप्रीतिकरं प्रोक्तं मया भीष्मस्य पञ्चकम्
avaśyameva kartavyaṁ tasmādbhīṣmasya paṁcakam || viṣṇuprītikaraṁ proktaṁ mayā bhīṣmasya paṁcakam
इसलिए भीष्म-पंचक अवश्य ही करना चाहिए। मैंने विष्णु को प्रसन्न करने वाला यह भीष्म-पंचक कहा है।
श्लोक 14 (skanda.2.129.14)
॥सूत उवाच॥ शृण्वंतु ऋषयः सर्वे विशेषो भीष्मपञ्चके ॥ कार्तिकेयाय रुद्रेण पुरा प्रोक्तः सविस्तरात्
sūta uvāca śṛṇvaṁtu ṛṣayaḥ sarve viśeṣo bhīṣmapaṁcake || kārtikeyāya rudreṇa purā proktaḥ savistarāt
सूत ने कहा - हे सभी ऋषियो! सुनो, भीष्म-पंचक की विशेष विधि, जो पूर्वकाल में रुद्र ने कार्तिकेय को विस्तारपूर्वक बताई थी।
श्लोक 15 (skanda.2.129.15)
॥ईश्वर उवाच॥ प्रवक्ष्यामि महापुण्यं व्रतं व्रतवतां वर ॥ भीष्मेणैतद्यतः प्राप्तं व्रतं पञ्चदिनात्मकम्
īśvara uvāca pravakṣyāmi mahāpuṇyaṁ vrataṁ vratavatāṁ vara || bhīṣmeṇaitadyataḥ prāptaṁ vrataṁ paṁcadinātmakam
ईश्वर ने कहा - हे व्रतियों में श्रेष्ठ! मैं यह महापुण्यकारी व्रत बताता हूँ, जिसे भीष्म ने प्राप्त किया था - यह पांच दिनों का व्रत है।
श्लोक 16 (skanda.2.129.16)
सकाशाद्वासुदेवस्य तेनोक्तं भीष्मपञ्चकम् ॥ व्रतस्याऽस्य गुणान्वक्तुं कः शक्तः केशवादृते
sakāśādvāsudevasya tenoktaṁ bhīṣmapaṁcakam || vratasyā'asya guṇānvaktuṁ kaḥ śaktaḥ keśavādṛte
वासुदेव से प्राप्त कर उन्होंने ही इसे भीष्म-पंचक कहा। केशव के अतिरिक्त इस व्रत के गुणों को कहने में कौन समर्थ है?
श्लोक 17 (skanda.2.129.17)
कार्तिके शुक्लपक्षे तु शृणु धर्मं पुरातनम् ॥ वसिष्ठभृगुगर्गाद्यैश्चीर्णं कृतयुगादिषु
kārtike śuklapakṣe tu śṛṇu dharmaṁ purātanam || vasiṣṭhabhṛgugargādyaiścīrṇaṁ kṛtayugādiṣu
कार्तिक के शुक्ल पक्ष में किए जाने वाले इस पुरातन धर्म को सुनो, जिसे वसिष्ठ, भृगु, गर्ग आदि ने सतयुग आदि में आचरित किया।
श्लोक 18 (skanda.2.129.18)
अम्बरीषेण भोगाद्यैश्चीर्णं त्रेतायुगादिषु ॥ ब्राह्मणैर्ब्रह्मचर्येण जपहोमक्रियादिभिः
aṁbarīṣeṇa bhogādyaiścīrṇaṁ tretāyugādiṣu || brāhmaṇairbrahmacaryeṇa japahomakriyādibhiḥ
अंबरीष और भोग आदि राजाओं ने त्रेतायुग आदि में इसका आचरण किया। ब्राह्मणों ने ब्रह्मचर्य, जप, होम आदि क्रियाओं के द्वारा -
श्लोक 19 (skanda.2.129.19)
क्षत्रियैश्च तथा वैश्यैः सत्यशौचपरायणैः ॥ दुष्करं सत्यहीनानामशक्यं बालचेतसाम्
kṣatriyaiśca tathā vaiśyaiḥ satyaśaucaparāyaṇaiḥ || duṣkaraṁ satyahīnānāmaśakyaṁ bālacetasām
और सत्य-शौच में तत्पर क्षत्रियों तथा वैश्यों ने भी इसका आचरण किया। यह असत्यवादियों के लिए दुष्कर और बालबुद्धि वालों के लिए असंभव है।
श्लोक 20 (skanda.2.129.20)
दुष्करं भीष्ममित्याहुर्न शक्यं प्राकृतैर्नरैः ॥ यस्मात्करोति विप्रेंद्र तेन सर्वं कृतं भवेत्
duṣkaraṁ bhīṣmamityāhurna śakyaṁ prākṛtairnaraiḥ || yasmātkaroti vipreṁdra tena sarvaṁ kṛtaṁ bhavet
इसे "भीष्म" (दुष्कर) कहते हैं, क्योंकि यह साधारण मनुष्यों के लिए संभव नहीं है। हे विप्रेंद्र! जो इसे करता है, उसके द्वारा सब कुछ किया हुआ माना जाता है।
श्लोक 21 (skanda.2.129.21)
व्रतं चैतन्महापुण्यं महापातकनाशनम् ॥ अतो नरैः प्रयत्नेन कर्तव्यं भीष्मपञ्चकम्
vrataṁ caitanmahāpuṇyaṁ mahāpātakanāśanam || ato naraiḥ prayatnena kartavyaṁ bhīṣmapaṁcakam
यह व्रत अत्यंत पुण्यकारी और महापाप का नाश करने वाला है। इसलिए मनुष्यों को प्रयत्नपूर्वक भीष्म-पंचक करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.129.22)
कार्तिकस्याऽमले पक्षे स्नात्वा सम्यग्विधानतः ॥ एकादश्यां तु गृह्णीयाद्व्रतं पंचदिनात्मकम्
kārtikasyā'amale pakṣe snātvā samyagvidhānataḥ || ekādaśyāṁ tu gṛhṇīyādvrataṁ paṁcadinātmakam
कार्तिक के शुक्ल पक्ष में विधिपूर्वक भलीभाँति स्नान कर, एकादशी को पांच दिनों वाला व्रत ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.2.129.23)
प्रातः स्नात्वा विशेषेण मध्याह्ने च तथा व्रती ॥ नद्यां निर्झरतोये वा समालभ्य च गोमयम्
prātaḥ snātvā viśeṣeṇa madhyāhne ca tathā vratī || nadyāṁ nirjharatoye vā samālabhya ca gomayam
व्रती को विशेष रूप से प्रातःकाल और मध्याह्न में नदी या झरने के जल में स्नान करना चाहिए, और गोबर का लेप लगाकर -
श्लोक 24 (skanda.2.129.24)
यवव्रीहितिलैः सम्यक्पितॄन्संतर्पयेत्क्रमात् ॥ स्नात्वा मौनं नरः कृत्वा धौतवासा दृढव्रतः
yavavrīhitilaiḥ samyakpitṝnsaṁtarpayetkramāt || snātvā maunaṁ naraḥ kṛtvā dhautavāsā dṛḍhavrataḥ
जौ, चावल और तिल से क्रमशः पितरों का भलीभाँति तर्पण करे। स्नान कर, मौन धारण कर, धुले वस्त्र पहनकर, दृढ़-व्रती होकर -
श्लोक 25 (skanda.2.129.25)
भीष्मायोदकदानं च अर्घ्यं चैव प्रयत्नतः ॥ पूजा भीष्मस्य कर्तव्या दानं दद्यात्प्रयत्नतः
bhīṣmāyodakadānaṁ ca arghyaṁ caiva prayatnataḥ || pūjā bhīṣmasya kartavyā dānaṁ dadyātprayatnataḥ
भीष्म को जल-दान और अर्घ्य पूरे प्रयत्न से देना चाहिए। भीष्म की पूजा करनी चाहिए, और पूरे प्रयत्न से दान देना चाहिए।
श्लोक 26 (skanda.2.129.26)
पंचरत्नं विशेषेण दत्त्वा विप्राय यत्नतः ॥ वासुदेवोऽपि संपूज्यो लक्ष्मीयुक्तः सदा प्रभुः
paṁcaratnaṁ viśeṣeṇa dattvā viprāya yatnataḥ || vāsudevo'pi saṁpūjyo lakṣmīyuktaḥ sadā prabhuḥ
विशेष रूप से पंच-रत्न ब्राह्मण को यत्नपूर्वक देकर, लक्ष्मी सहित सदा-विराजमान प्रभु वासुदेव की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.2.129.27)
पञ्चके पूजयित्वा तु कोटिजन्मानि तुष्यति ॥ यत्किंचिद्ददते मर्त्यः पंचधातुप्रकल्पितम्
paṁcake pūjayitvā tu koṭijanmāni tuṣyati || yatkiṁcidadate martyaḥ paṁcadhātuprakalpitam
इन पांच दिनों में पूजा करने से विष्णु करोड़ों जन्मों तक संतुष्ट रहते हैं। मनुष्य जो कुछ भी पंचधातु से बनी वस्तु दान करता है -
श्लोक 28 (skanda.2.129.28)
संवत्सरव्रतानां स लभते सकलं फलम् ॥ कृत्वा तूदकदानं तु तथाऽर्घ्यस्य च दापनम्
saṁvatsaravratānāṁ sa labhate sakalaṁ phalam || kṛtvā tūdakadānaṁ tu tathā'arghyasya ca dāpanam
उसे वर्ष भर के व्रतों का संपूर्ण फल प्राप्त होता है। जल-दान और अर्घ्य-दान करके -
श्लोक 29 (skanda.2.129.29)
मन्त्रेणानेन यः कुर्यान्मुक्तिभागी भवेन्नरः ॥ वैयाघ्रपादगोत्राय सांकृत्य प्रवराय च
mantreṇānena yaḥ kuryānmuktibhāgī bhavennaraḥ || vaiyāghrapādagotrāya sāṁkṛtya pravarāya ca
जो इस मंत्र से यह करता है, वह मुक्ति का भागी होता है - मंत्र इस प्रकार है - व्याघ्रपाद गोत्र वाले, सांकृत्य प्रवर वाले -
श्लोक 30 (skanda.2.129.30)
अनपत्याय भीष्माय उदकं भीष्मवर्मणे ॥ वसूनामवताराय शंतनोरात्मजाय च
anapatyāya bhīṣmāya udakaṁ bhīṣmavarmaṇe || vasūnāmavatārāya śaṁtanorātmajāya ca
संतानहीन भीष्म को, भीष्मवर्मा को जल अर्पित करता हूँ, वसुओं के अवतार, शंतनु के पुत्र -
श्लोक 31 (skanda.2.129.31)
अर्घ्यं ददामि भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे ॥इत्यर्घ्यमंत्रः॥ अनेन विधिना यस्तु पंचकं तु समापयेत्
arghyaṁ dadāmi bhīṣmāya ājanmabrahmacāriṇe ityarghyamantraḥ anena vidhinā yastu paṁcakaṁ tu samāpayet
भीष्म को, जो जन्म से ब्रह्मचारी हैं, मैं यह अर्घ्य देता हूँ" - यह अर्घ्य-मंत्र है। जो इस विधि से पांच दिनों का व्रत पूर्ण करता है -
श्लोक 32 (skanda.2.129.32)
अश्वमेधसमं पुण्यं प्राप्नोत्यत्र न संशयः ॥ पंचाऽहमपि कर्तव्यं नियमं च प्रयत्नतः
aśvamedhasamaṁ puṇyaṁ prāpnotyatra na saṁśayaḥ || paṁcā'ahamapi kartavyaṁ niyamaṁ ca prayatnataḥ
निःसंदेह अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त करता है। पांचों दिन ही यह नियम प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.2.129.33)
नियमेन विना यत्र न भाव्यं वरवर्णिना ॥ उत्तरायणहीनाय भीष्माय प्रददौ हरिः
niyamena vinā yatra na bhāvyaṁ varavarṇinā || uttarāyaṇahīnāya bhīṣmāya pradadau hariḥ
नियम के बिना श्रेष्ठ वर्ण वाले को यह फल नहीं मिलता। उत्तरायण से रहित अवस्था में पड़े भीष्म को हरि ने -
श्लोक 34 (skanda.2.129.34)
उत्तरायणहीनेऽपि शुद्धलग्नं सुतोषितः ॥ ततः संपूजयेद्देवं सर्वपापहरं हरिम्
uttarāyaṇahīne'pi śuddhalagnaṁ sutoṣitaḥ || tataḥ saṁpūjayeddevaṁ sarvapāpaharaṁ harim
उत्तरायण के बिना भी शुद्ध लग्न प्रदान किया, प्रसन्न होकर। फिर सभी पापों को हरने वाले देव हरि की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 35 (skanda.2.129.35)
अनंतरं प्रयत्नेन कर्तव्यं भीष्मपंचकम् ॥ स्नापयेत जलैर्भक्त्या मधुक्षीरघृतेन च
anaṁtaraṁ prayatnena kartavyaṁ bhīṣmapaṁcakam || snāpayeta jalairbhaktyā madhukṣīraghṛtena ca
इसके बाद प्रयत्नपूर्वक भीष्म-पंचक करना चाहिए। भक्तिपूर्वक जल, शहद, दूध और घी से स्नान कराए -
श्लोक 36 (skanda.2.129.36)
तथैव पंचगव्येन गन्धचंदनवारिणा ॥ चन्दनेन सुगन्धेन कुमकुमेनाऽथ केशवम्
tathaiva paṁcagavyena gandhacaṁdanavāriṇā || candanena sugandhena kumkumenā'atha keśavam
तथा पंचगव्य, सुगंधित चंदन-मिश्रित जल से भी। सुगंधित चंदन और कुमकुम से केशव को -
श्लोक 37 (skanda.2.129.37)
कर्पूरोशीरमिश्रेण लेपयेद्गरुडध्वजम् ॥ अर्चयेद्रुचिरैः पुष्पैर्गंधधूपसमन्वितैः
karpūrośīramiśreṇa lepayedgaruḍadhvajam || arcayedruciraiḥ puṣpairgaṁdhadhūpasamanvitaiḥ
कपूर और उशीर मिश्रित लेप से गरुड़ध्वज को लेपन करे। सुंदर फूलों से, गंध और धूप के साथ पूजा करे।
श्लोक 38 (skanda.2.129.38)
गुग्गुलुं घृतसंयुक्तं ददेत्कृष्णाय भक्तिमान् ॥ दीपकं तु दिवा रात्रौ दद्यात्पंच दिनानि तु
guggulaṁ ghṛtasaṁyuktaṁ dadetkṛṣṇāya bhaktimān || dīpakaṁ tu divā rātrau dadyātpaṁca dināni tu
भक्तिमान व्यक्ति घी मिश्रित गुग्गुल कृष्ण को अर्पित करे। पांचों दिन दिन और रात दीपक अर्पित करे।
श्लोक 39 (skanda.2.129.39)
नैवेद्यं देवदेवस्य परमान्नं निवेदयेत् ॥ एवमभ्यर्चयेद्देवं संस्मृत्य च प्रणम्य च
naivedyaṁ devadevasya paramānnaṁ nivedayet || evamabhyarcayeddevaṁ saṁsmṛtya ca praṇamya ca
देवाधिदेव को नैवेद्य के रूप में परमान्न अर्पित करे। इस प्रकार स्मरण और प्रणाम करते हुए देव की पूजा करे।
श्लोक 40 (skanda.2.129.40)
ॐ नमो वासुदेवायेति जपेदष्टोत्तरं शतम् ॥ जुहुयाच्च घृताभ्यक्तैस्तिलव्रीहियवादिभिः
oṁ namo vāsudevāyeti japedaṣṭottaraṁ śatam || juhuyācca ghṛtābhyaktaistilavrīhiyavādibhiḥ
"ॐ नमो वासुदेवाय" - इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करे। घी से सने तिल, चावल, जौ आदि से हवन करे।
श्लोक 41 (skanda.2.129.41)
षडक्षरेण मन्त्रेण स्वाहाकाराऽन्वितेन च ॥ उपास्य पश्चिमां संध्यां प्रणम्य गरुडध्वजम्
ṣaḍakṣareṇa mantreṇa svāhākārā'anvitena ca || upāsya paścimāṁ saṁdhyāṁ praṇamya garuḍadhvajam
छह अक्षरों वाले मंत्र से, स्वाहा के साथ हवन करे। सायं-संध्या की उपासना कर, गरुड़ध्वज को प्रणाम कर -
श्लोक 42 (skanda.2.129.42)
जपित्वा पूर्ववन्मन्त्रं क्षितिशायी भवेत्सदा ॥ सर्वमेतद्विधानं तु कार्यं पञ्च दिनानि तु
japitvā pūrvavanmantraṁ kṣitiśāyī bhavetsadā || sarvametadvidhānaṁ tu kāryaṁ paṁca dināni tu
पहले की भाँति मंत्र-जप कर सदा भूमि पर शयन करे। यह सारी विधि पांचों दिन करनी चाहिए।
श्लोक 43 (skanda.2.129.43)
विशेषोऽत्र व्रते ह्यस्मिन्यदन्यूनं शृणुष्व तत् ॥ प्रथमेऽह्नि हरेः पादौ पूजयेत्कमलैर्व्रती
viśeṣo'tra vrate hyasminyadanyūnaṁ śṛṇuṣva tat || prathame'hni hareḥ pādau pūjayetkamalairvratī
इस व्रत में जो विशेष बात है, अब उसे बिना कमी के सुनो। पहले दिन व्रती को हरि के चरणों की पूजा कमलों से करनी चाहिए।
श्लोक 44 (skanda.2.129.44)
द्वितीये बिल्वपत्रेण जानुदेशं समर्चयेत् ॥ ततोऽनुपूजयेच्छीर्षं मालत्या चक्रपाणिनः
dvitīye bilvapatreṇa jānudeśaṁ samarcayet || tato'nupūjayecchīrṣaṁ mālatyā cakrapāṇinaḥ
दूसरे दिन बिल्व-पत्र से घुटनों के भाग की पूजा करे। फिर मालती के फूलों से चक्रपाणि के सिर की पूजा करे।
श्लोक 45 (skanda.2.129.45)
कार्तिक्यां देवदेवस्य भक्त्या तद्गतमानसः ॥ अर्चित्वा तं हृषीकेशमेकादश्यां समासतः
kārtikyāṁ devadevasya bhaktyā tadgatamānasaḥ || arcitvā taṁ hṛṣīkeśamekādaśyāṁ samāsataḥ
कार्तिकी पूर्णिमा को देवाधिदेव की भक्तिपूर्वक, उन्हीं में मन लगाकर पूजा करे। इस प्रकार एकादशी को संक्षेप में हृषीकेश की पूजा कर -
श्लोक 46 (skanda.2.129.46)
निःप्राश्य गोमयं सम्यगेकादश्यामुपावसेत् ॥ गोमूत्रं मन्त्रवद्भूमौ द्वादश्यां प्राशयेद्व्रती
niḥprāśya gomayaṁ samyagekādaśyāmupāvaset || gomūtraṁ maṁtravadbhūmau dvādaśyāṁ prāśayedvratī
गोबर का सेवन कर एकादशी को भलीभाँति उपवास करे। द्वादशी को व्रती मंत्रपूर्वक भूमि पर गोमूत्र का सेवन करे।
श्लोक 47 (skanda.2.129.47)
क्षीरं चैव त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तथा दधि ॥ संप्राश्य कायशुद्ध्यर्थं लंघयित्वा चतुर्दिनम्
kṣīraṁ caiva trayodaśyāṁ caturdaśyāṁ tathā dadhi || saṁprāśya kāyaśuddhyarthaṁ laṁghayitvā caturdinam
तेरहवें दिन दूध, और चौदहवें दिन दही का सेवन करे। शरीर की शुद्धि के लिए इन्हें ग्रहण कर, चार दिनों तक भोजन का त्याग करते हुए -
श्लोक 48 (skanda.2.129.48)
पंचमे दिवसे स्नात्वा विधिवत्पूज्य केशवम् ॥ भोजयेद्ब्राह्मणान्भक्त्या तेभ्यो दद्याच्च दक्षिणाम्
paṁcame divase snātvā vidhivatpūjya keśavam || bhojayedbrāhmaṇānbhaktyā tebhyo dadyācca dakṣiṇām
पांचवें दिन स्नान कर, विधिपूर्वक केशव की पूजा कर, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराए और उन्हें दक्षिणा दे।
श्लोक 49 (skanda.2.129.49)
पापबुद्धिं परित्यज्य ब्रह्मचर्येण धीमता ॥ मद्यं मांसं परित्याज्यं मैथुनं पापकारणम्
pāpabuddhiṁ parityajya brahmacaryeṇa dhīmatā || madyaṁ māṁsaṁ parityājyaṁ maithunaṁ pāpakāraṇam
पापबुद्धि को त्यागकर, बुद्धिमान व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, मद्य, मांस और पापकारक मैथुन का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 50 (skanda.2.129.50)
शाकाहारेण मुन्यन्नैः कृष्णार्चनपरो नरः ॥ ततो नक्तं समश्नीयात्पंचगव्यपुरःसरम्
śākāhāreṇa munyannaiḥ kṛṣṇārcanaparo naraḥ || tato naktaṁ samaśnīyātpaṁcagavyapuraḥsaram
कृष्ण की पूजा में तत्पर मनुष्य को शाकाहार और मुनियों के अन्न से रहना चाहिए। फिर पंचगव्य से पहले रात्रि में एक बार भोजन करे।
श्लोक 51 (skanda.2.129.51)
एवं सम्यक्समाप्यं स्याद्यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥ मद्यपो यः पिबेन्मद्यं जन्मनो मरणांऽतिकम्
evaṁ samyaksamāpyaṁ syādyathoktaṁ phalamāpnuyāt || madyapo yaḥ pibenmadyaṁ janmano maraṇāṁtikam
इस प्रकार भलीभाँति व्रत समाप्त कर, कहा गया फल प्राप्त करे। जो मद्यपायी जन्म से मृत्यु तक मद्य पीता रहा हो -
श्लोक 52 (skanda.2.129.52)
एतद्भीष्मव्रतं कृत्वा प्राप्नोति परमं पदम् ॥ स्त्रीभिर्वा भर्तृवाक्येन कर्तव्यं धर्मवर्धनम्
etadbhīṣmavrataṁ kṛtvā prāpnoti paramaṁ padam || strībhirvā bhartṛvākyena kartavyaṁ dharmavardhanam
यह भीष्म-व्रत करके परम पद को प्राप्त करता है। स्त्रियों को भी अपने पति के वचन से यह धर्म-वर्धक व्रत करना चाहिए।
श्लोक 53 (skanda.2.129.53)
विधवाभिश्च कर्तव्यं मोक्षसौख्याऽतिवृद्धये ॥ अयोध्यायां पुरा कश्चिदतिथिर्नाम वै नृपः
vidhavābhiśca kartavyaṁ mokṣasaukhyā'ativṛddhaye || ayodhyāyāṁ purā kaściditathirnāma vai nṛpaḥ
विधवाओं को भी मोक्ष और सुख की अत्यधिक वृद्धि के लिए यह करना चाहिए। पूर्वकाल में अयोध्या में अतिथि नामक एक राजा था।
श्लोक 54 (skanda.2.129.54)
वसिष्ठवचनात्कृत्वा व्रतमेतत्सुदुर्लभम् ॥ भुक्त्वेह निखिलान्भोगानंते विष्णुपुरं ययौ
vasiṣṭhavacanātkṛtvā vratametatsudurlabham || bhuktveha nikhilānbhogānaṁte viṣṇupuraṁ yayau
वसिष्ठ के वचन से इस अत्यंत दुर्लभ व्रत को करके, यहाँ समस्त भोगों को भोगकर, अंत में वह विष्णु-लोक को गया।
श्लोक 55 (skanda.2.129.55)
इत्थं कुर्याद्व्रतं नित्यं पञ्चकं भीष्मसंज्ञितम् ॥ नियमेनोपवासेन पञ्चगव्येन वा पुनः ॥ पयोमूलफलाऽऽहारैर्हविष्यैर्व्रततत्परः
itthaṁ kuryādvrataṁ nityaṁ paṁcakaṁ bhīṣmasaṁjñitam || niyamenopavāsena paṁcagavyena vā punaḥ || payomūlaphalā'āhāraiḥ haviṣyairvratatatparaḥ
इस प्रकार भीष्म नामक पांच दिनों वाला व्रत नित्य करना चाहिए, नियमपूर्वक उपवास से, या फिर पंचगव्य से, अथवा दूध, कंद-मूल-फल के आहार से, हविष्यान्न से, व्रत में तत्पर होकर।
श्लोक 56 (skanda.2.129.56)
पौर्णमासीदिने प्राप्ते पूजां कृत्वा तु पूर्ववत् ॥ ब्राह्मणान्भोजयेद्भक्त्या गां च दद्यात्सवत्सकाम्
paurṇamāsīdine prāpte pūjāṁ kṛtvā tu pūrvavat || brāhmaṇānbhojayedbhaktyā gāṁ ca dadyātsavatsakām
पूर्णिमा के दिन आने पर पहले की भाँति पूजा कर, भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराए और बछड़े सहित गाय का दान दे।
श्लोक 57 (skanda.2.129.57)
यद्भीष्मपञ्चकमिति प्रथितं पृथिव्यामेकादशीप्रभृति पंचदशीनिरुद्धम् ॥ उक्तं न भोजनपरस्य तदा निषेधस्तस्मिन्व्रते शुभफलं प्रददाति विष्णुः
yadbhīṣmapaṁcakamiti prathitaṁ pṛthivyāmekādaśīprabhṛti paṁcadaśīniruddham || uktaṁ na bhojanaparasya tadā niṣedhastasminvrate śubhaphalaṁ pradadāti viṣṇuḥ
यह जो भीष्म-पंचक इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध है, एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक निर्धारित है। इसमें भोजन में लगे व्यक्ति के लिए निषेध नहीं कहा गया है; इस व्रत में विष्णु शुभ फल प्रदान करते हैं।