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वैष्णव खण्ड · अध्याय 128

कूष्मांड-नवमी और तुलसी-विवाह-विधि

अध्याय 127अध्याय-सूचीअध्याय 129

श्लोक 1 (skanda.2.128.1)

॥वालखिल्या ऊचुः॥ कार्तिके शुक्लनवमी तत्राऽभूद्द्वापरं युगम् ॥ पूर्वाऽपराह्णगा ग्राह्या क्रमाद्दानोपवासयोः

vālakhilyā ūcuḥ kārtike śuklanavamī tatrā'bhūddvāparaṁ yugam || pūrvā'aparāhṇagā grāhyā kramāddānopavāsayoḥ

वालखिल्यों ने कहा - कार्तिक शुक्ल नवमी को द्वापरयुग में यह महिमा हुई। दान और उपवास के लिए क्रमशः पूर्वाह्न और अपराह्न में व्याप्त नवमी ग्रहण करनी चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.2.128.2)

अत्र कूष्मांडकोनाम हतो दैत्यस्तु विष्णुना ॥ तद्रोमभिः समुद्भूता वल्ल्यः कूष्मांडसंभवाः

atra kūṣmāṇḍakonāma hato daityastu viṣṇunā || tadromabhiḥ samudbhūtā vallyaḥ kūṣmāṇḍasaṁbhavāḥ

इसी दिन विष्णु ने कूष्मांडक नामक दैत्य का वध किया था; उसके रोमों से कूष्मांड (पेठा) की बेलें उत्पन्न हुईं।

श्लोक 3 (skanda.2.128.3)

तस्मात्कूष्मांडदानेन फलमाप्नोति निश्चितम् ॥ अस्यामेव नवम्यां तु कुर्यात्कृष्णोत्सवं नरः

tasmātkūṣmāṇḍadānena phalamāpnoti niścitam || asyāmeva navamyāṁ tu kuryātkṛṣṇotsavaṁ naraḥ

इसलिए कूष्मांड-दान से निश्चय ही फल प्राप्त होता है। इसी नवमी को मनुष्य को कृष्ण-उत्सव करना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.2.128.4)

स्वशाखोक्तेन विधिना तुलस्याः करपीडनम् ॥ कन्यादानफलं तस्य जायते नात्र संशयः

svaśākhoktena vidhinā tulasyāḥ karapīḍanam || kanyādānaphalaṁ tasya jāyate nātra saṁśayaḥ

अपनी शाखा में कहे गए विधि के अनुसार तुलसी का करपीड़न (विवाह) करने से निःसंदेह कन्यादान का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.2.128.5)

कार्तिके शुक्लनवमीमवाप्य विजितेंद्रियः ॥ हरिं विधाय सौवर्णं तुलस्या सहितं शुभम्

kārtike śuklanavamīmavāpya vijitendriyaḥ || hariṁ vidhāya sauvarṇaṁ tulasyā sahitaṁ śubham

कार्तिक की शुक्ल नवमी को प्राप्त कर, जितेंद्रिय पुरुष, सोने की शुभ हरि-प्रतिमा तुलसी सहित बनवाकर -

श्लोक 6 (skanda.2.128.6)

पूजयेद्विधिवद्भक्त्या व्रती तत्र दिनत्रयम् ॥ एवं यथोक्तविधिना कुर्याद्वैवाहिकं विधिम्

pūjayedvidhivadbhaktyā vratī tatra dinatrayam || evaṁ yathoktavidhinā kuryādvaivāhikaṁ vidhim

उस व्रती को तीन दिनों तक विधिपूर्वक भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इस प्रकार यथोक्त विधि से विवाह-विधि करनी चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.2.128.7)

ग्राह्यं त्रिरात्रमत्रैव नवम्याद्यनुरोधतः ॥ मध्याह्नव्यापिनी ग्राह्या नवमी पूर्ववेधिता

grāhyaṁ trirātramatraiva navamyādyanurodhataḥ || madhyāhnavyāpinī grāhyā navamī pūrvavedhitā

यहाँ नवमी से आरंभ करके तीन रात्रियाँ ग्रहण करनी चाहिए। मध्याह्न-व्यापिनी नवमी ही ग्रहण करनी चाहिए, जो पूर्व-तिथि से युक्त हो।

श्लोक 8 (skanda.2.128.8)

धात्र्यश्वत्थौ य एकत्र पालयित्वा समुद्वहेत् ॥ न नश्यते तस्य पुण्यं कल्पकोटिशतैरपि

dhātryaśvatthau ya ekatra pālayitvā samudvahet || na naśyate tasya puṇyaṁ kalpakoṭiśatairapi

जो आँवले और पीपल के वृक्ष को एक साथ पालकर उनका विवाह कराता है, उसका पुण्य करोड़ों कल्पों में भी नष्ट नहीं होता।

श्लोक 9 (skanda.2.128.9)

कनकस्य सुता पूर्वमेकादश्यां किशोरिका ॥ चकार भक्तितः सायं तुलस्युद्वाहजं विधिम्

kanakasya sutā pūrvamekādaśyāṁ kiśorikā || cakāra bhaktitaḥ sāyaṁ tulasyudvāhajaṁ vidhim

पूर्वकाल में कनक की पुत्री, एक किशोरी ने एकादशी को सायंकाल भक्तिपूर्वक तुलसी-विवाह की विधि की थी।

श्लोक 10 (skanda.2.128.10)

तेन वैधव्यदोषेण निर्मुक्ताऽऽसीत्सुलोचना ॥ तस्मात्सायं प्रकर्तव्यस्तुलस्तुद्वाहजो विधिः

tena vaidhavyadoṣeṇa nirmuktā'āsītsulocanā || tasmātsāyaṁ prakartavyastulastudvāhajo vidhiḥ

उस विधि के कारण वह सुलोचना विधवापन के दोष से मुक्त हो गई। इसलिए सायंकाल में ही तुलसी-विवाह की विधि करनी चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.2.128.11)

अवश्यमेव कर्तव्यः प्रतिवर्षं तु वैष्णवैः ॥ विधिं तस्य प्रवक्ष्यामि यथा सांगा क्रिया भवेत्

avaśyameva kartavyaḥ prativarṣaṁ tu vaiṣṇavaiḥ || vidhiṁ tasya pravakṣyāmi yathā sāṁgā kriyā bhavet

वैष्णवों को प्रतिवर्ष अवश्य ही यह करना चाहिए। अब मैं इसकी विधि बताता हूँ, जिससे यह क्रिया अंगों सहित पूर्ण हो।

श्लोक 12 (skanda.2.128.12)

विष्णोस्तु प्रतिमां कुर्यात्पलस्य स्वर्णजां शुभाम् ॥ तदर्द्धार्द्धं तदर्द्धार्द्धं यथाशक्त्या प्रकल्पयेत्

viṣṇostu pratimāṁ kuryātpalasya svarṇajāṁ śubhām || tadardhārdhaṁ tadardhārdhaṁ yathāśaktyā prakalpayet

विष्णु की एक पल भर सोने की शुभ प्रतिमा बनवानी चाहिए; अथवा यथाशक्ति उसका आधा, या उसका भी आधा भाग बनवाए।

श्लोक 13 (skanda.2.128.13)

प्राणप्रतिष्ठां कृत्वैव तुलसीविष्णुरूपयोः ॥ तत उत्थापयेद्देवं पूर्वोक्तैश्च स्तवादिभिः

prāṇapratiṣṭhāṁ kṛtvaiva tulasīviṣṇurūpayoḥ || tata utthāpayeddevaṁ pūrvoktaiśca stavādibhiḥ

तुलसी और विष्णु दोनों रूपों की प्राणप्रतिष्ठा करके, फिर पूर्वोक्त स्तोत्रों आदि से देव को जगाना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.128.14)

उपचारैः षोडशभिः पूजयेत्पुरुषोक्तिभिः ॥ देशकालौ ततः स्मृत्वा गणेशं तत्र पूजयेत्

upacāraiḥ ṣoḍaśabhiḥ pūjayetpuruṣoktibhiḥ || deśakālau tataḥ smṛtvā gaṇeśaṁ tatra pūjayet

सोलह उपचारों से, पुरुष-सूक्त के मंत्रों से पूजा करे। फिर देश-काल का स्मरण कर वहाँ गणेश की पूजा करे।

श्लोक 15 (skanda.2.128.15)

पुण्याहं वाचयित्वाथ नांदीश्राद्धं समाचरेत् ॥ वेदवाद्यादिनिर्घोषैर्विष्णुमूर्तिं समानयेत्

puṇyāhaṁ vācayitvātha nāṁdīśrāddhaṁ samācaret || vedavādyādinirghoṣairviṣṇumūrtiṁ samānayet

पुण्याह-वाचन कराकर नांदी-श्राद्ध करे। वेद-पाठ और वाद्यों की ध्वनि के साथ विष्णु की मूर्ति को लाए।

श्लोक 16 (skanda.2.128.16)

तुलसीनिकटे सा तु स्थाप्या चांऽतर्हिता पटैः ॥ आगच्छ भगवन्देव अर्चयिष्यामि केशव

tulasīnikaṭe sā tu sthāpyā cā'antarhitā paṭaiḥ || āgaccha bhagavandeva arcayiṣyāmi keśava

उसे वस्त्रों से पर्दा कर तुलसी के निकट स्थापित करना चाहिए, कहते हुए - हे भगवन्! हे देव! पधारिए, हे केशव! मैं आपकी पूजा करूँगा।

श्लोक 17 (skanda.2.128.17)

तुभ्यं दास्यामि तुलसीं सर्वकामप्रदो भव ॥ दद्यात्त्रिवारमर्घ्यं च पाद्यं विष्टरमेव च

tubhyaṁ dāsyāmi tulasīṁ sarvakāmaprado bhava || dadyāttrivāramarghyaṁ ca pādyaṁ viṣṭarameva ca

मैं तुम्हें तुलसी अर्पित करता हूँ; तुम सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले बनो। तीन बार अर्घ्य, पाद्य और आसन अर्पित करे।

श्लोक 18 (skanda.2.128.18)

तत आचमनीयं च त्रिरुक्त्वा च प्रदापयेत् ॥ ततो दधि घृतं क्षीरं कांस्यपात्रपुटीकृतम्

tata ācamanīyaṁ ca triruktvā ca pradāpayet || tato dadhi ghṛtaṁ kṣīraṁ kāṁsyapātrapuṭīkṛtam

फिर आचमनीय जल भी तीन बार कहते हुए अर्पित करे। फिर कांसे के पात्र में रखे दही, घी और दूध -

श्लोक 19 (skanda.2.128.19)

मधुपर्कं गृहाण त्वं वासुदेव नमोस्तु ते ॥ हरिद्रालेपानाभ्यंगकार्यं सर्वं विधाय च

madhuparkaṁ gṛhāṇa tvaṁ vāsudeva namostu te || haridrālepanābhyaṁgakāryaṁ sarvaṁ vidhāya ca

अर्पित करते हुए कहे - हे वासुदेव! यह मधुपर्क ग्रहण करो, तुम्हें नमस्कार है। हल्दी-लेपन और अभ्यंग का समस्त कार्य पूर्ण करके -

श्लोक 20 (skanda.2.128.20)

गोधूलिसमये पूज्यौ तुलसीकेशवौ पुनः ॥ पृथक्पृथक्तथा कार्यौ संमुखौ मंगलं पठेत्

godhūlisamaye pūjyau tulasīkeśavau punaḥ || pṛthakpṛthaktathā kāryau saṁmukhau maṁgalaṁ paṭhet

गोधूलि के समय तुलसी और केशव दोनों की पुनः पूजा करनी चाहिए, दोनों को अलग-अलग परंतु आमने-सामने रखकर मंगल-पाठ करे।

श्लोक 21 (skanda.2.128.21)

ईषद्दृश्ये भास्करे तु संकल्पं तु समुच्चरेत् ॥ स्वगोत्रप्रवरानुक्त्वा तथा त्रिपुरुषादिकम्

īṣaddṛśye bhāskare tu saṁkalpaṁ tu samuccaret || svagotrapravarānuktvā tathā tripuruṣādikam

सूर्य के हल्के से दिखते ही संकल्प का उच्चारण करे, अपने गोत्र और प्रवर का नाम लेकर, तथा तीन पुरुषों के नाम सहित -

श्लोक 22 (skanda.2.128.22)

अनादिमध्यनिधन त्रैलोक्यप्रतिपालक ॥ इमां गृहाण तुलसीं विवाहविधिनेश्वर

anādimadhyanidhana trailokyapratipālaka || imāṁ gṛhāṇa tulasīṁ vivāhavidhineśvara

कहते हुए - हे अनादि-मध्य-अंत रहित! हे त्रैलोक्य के पालनकर्ता! हे ईश्वर! इस तुलसी को विवाह-विधि से ग्रहण करो।

श्लोक 23 (skanda.2.128.23)

पार्वतीबीजसंभूतां वृंदाभस्मनि संस्थिताम् ॥ अनादिमध्यनिधनां वल्लभां ते ददाम्यहम्

pārvatībījasaṁbhūtāṁ vṛṁdābhasmani saṁsthitām || anādimadhyanidhanāṁ vallabhāṁ te dadāmyaham

पार्वती के बीज से उत्पन्न, वृंदा की भस्म में स्थित, आदि-मध्य-अंत रहित इस प्रिया को मैं तुम्हें अर्पित करता हूँ।

श्लोक 24 (skanda.2.128.24)

पयोघटैश्च सेवाभिः कन्यावद्वर्धिता मया ॥ त्वत्प्रियां तुलसीं तुभ्यं ददामि त्वं गृहाण भोः

payoghaṭaiśca sevābhiḥ kanyāvadvardhitā mayā || tvatpriyāṁ tulasīṁ tubhyaṁ dadāmi tvaṁ gṛhāṇa bhoḥ

जिसे मैंने दूध के घड़ों और सेवाओं से एक कन्या के समान पाला-पोसा है, वह तुम्हारी प्रिया तुलसी मैं तुम्हें देता हूँ; हे प्रभो! तुम इसे ग्रहण करो।

श्लोक 25 (skanda.2.128.25)

एवं दत्त्वा च तुलसीं पश्चात्तौ पूजयेत्ततः ॥ रात्रौ जागरणं कुर्याद्विवाहोत्सवपूर्वकम्

evaṁ dattvā ca tulasīṁ paścāttau pūjayettataḥ || rātrau jāgaraṇaṁ kuryādvivāhotsavapūrvakam

इस प्रकार तुलसी अर्पित कर, फिर दोनों की पूजा करे। रात्रि में विवाहोत्सवपूर्वक जागरण करे।

श्लोक 26 (skanda.2.128.26)

ततः प्रभातसमये तुलसीं विष्णुमर्चयेत् ॥ वह्निसंस्थापनं कृत्वा द्वादशाक्षरविद्यया

tataḥ prabhātasamaye tulasīṁ viṣṇumarcayet || vahnisaṁsthāpanaṁ kṛtvā dvādaśākṣaravidyayā

फिर प्रातःकाल तुलसी और विष्णु की पूजा करे। द्वादशाक्षर मंत्र से अग्नि-स्थापना कर -

श्लोक 27 (skanda.2.128.27)

पायसाऽऽज्यक्षौद्रतिलैर्जुह्यादष्टोत्तरंशतम् ॥ ततः स्विष्टकृतं हुत्वा दद्यात्पूर्णाहुतिं ततः

pāyasā'ājyakṣaudratilairjuhyādaṣṭottaraṁśatam || tataḥ sviṣṭakṛtaṁ hutvā dadyātpūrṇāhutiṁ tataḥ

खीर, घी, शहद और तिल से एक सौ आठ आहुतियाँ दे। फिर स्विष्टकृत् की आहुति देकर पूर्णाहुति दे।

श्लोक 28 (skanda.2.128.28)

आचार्यं च समभ्यर्च्य होमशेषं समापयेत् ॥ चतुरो वार्षिकान्मासान्नियमो येन यः कृतः

ācāryaṁ ca samabhyarcya homaśeṣaṁ samāpayet || caturo vārṣikānmāsānniyamo yena yaḥ kṛtaḥ

आचार्य की पूजा कर होम की शेष विधि पूर्ण करे। जिस-जिस ने चातुर्मास्य के चार महीनों में जो-जो नियम रखा हो -

श्लोक 29 (skanda.2.128.29)

कथयित्वा द्विजेभ्यस्तत्तथाऽन्यत्परिपूरयेत् ॥ इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो

kathayitvā dvijebhyastattathā'anyatparipūrayet || idaṁ vrataṁ mayā deva kṛtaṁ prītyai tava prabho

उसे ब्राह्मणों को बताकर, या अन्य किसी विधि से उसे पूर्ण करे। कहे - हे देव! हे प्रभो! तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैंने यह व्रत किया है।

श्लोक 30 (skanda.2.128.30)

न्यूनं संपूर्णतां यातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥ रेवतीतुर्यचरणे द्वादशीसंयुते नरः

nyūnaṁ saṁpūrṇatāṁ yātu tvatprasādājjanārdana || revatīturyacaraṇe dvādaśīsaṁyute naraḥ

हे जनार्दन! तुम्हारी कृपा से इसकी न्यूनता पूर्णता को प्राप्त हो। रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण में द्वादशी से युक्त होने पर मनुष्य -

श्लोक 31 (skanda.2.128.31)

न कुर्यात्पारणं कुर्वन्व्रतं निष्फलतां नयेत् ॥ ततो येषां पदार्थानां वर्जनं तु कृतं भवेत्

na kuryātpāraṇaṁ kurvanvrataṁ niṣphalatāṁ nayet || tato yeṣāṁ padārthānāṁ varjanaṁ tu kṛtaṁ bhavet

पारण न करे; यदि करे तो व्रत निष्फल हो जाता है। फिर जिन-जिन पदार्थों का त्याग किया गया था -

श्लोक 32 (skanda.2.128.32)

चातुर्मास्येऽथवा चोर्जे ब्राह्मणेभ्यः समर्पयेत् ॥ ततः सर्वं समश्नीयाद्यद्यत्त्यक्तं व्रते स्थितः

cāturmāsye'thavā corje brāhmaṇebhyaḥ samarpayet || tataḥ sarvaṁ samaśnīyādyadyattyaktaṁ vrate sthitaḥ

चातुर्मास्य में या कार्तिक-मास में उन्हें ब्राह्मणों को अर्पित करे। फिर व्रत में जो-जो त्यागा गया था, उन सबको खाए।

श्लोक 33 (skanda.2.128.33)

दंपतिभ्यां सहैवाऽत्र भोक्तव्यं च द्विजैः सह ॥ ततो भुक्त्युत्तरं यानि गलितानि दलानि च

daṁpatibhyāṁ sahaivā'atra bhoktavyaṁ ca dvijaiḥ saha || tato bhuktyuttaraṁ yāni galitāni dalāni ca

यहाँ पति-पत्नी दोनों को ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करना चाहिए। फिर भोजन के बाद जो पत्ते (तुलसी-दल) गिरे हुए हों -

श्लोक 34 (skanda.2.128.34)

तानि भुक्त्वा तुलस्याश्च स्वयं पापैः प्रमुच्यते ॥ इक्षुदण्डं तथा धात्रीफलं कोलिफलं तथा

tāni bhuktvā tulasyāśca svayaṁ pāpaiḥ pramucyate || ikṣudaṇḍaṁ tathā dhātrīphalaṁ koliphalaṁ tathā

उन तुलसी-पत्तों को खाकर मनुष्य स्वयं पापों से मुक्त हो जाता है। इसी प्रकार गन्ना, आँवले का फल और बेर का फल -

श्लोक 35 (skanda.2.128.35)

भुक्त्वा तु भोजनस्यांऽते तस्योच्छिष्टं विनश्यति ॥ एषु त्रिषु न भुक्तं चेदेकैकमपि येन तु

bhuktvā tu bhojanasyāṁte tasyocchiṣṭaṁ vinaśyati || eṣu triṣu na bhuktaṁ cedekaikamapi yena tu

इन्हें भोजन के अंत में खाने से भोजन का जूठापन नष्ट हो जाता है। इन तीनों में से यदि एक भी वस्तु किसी ने न खाई हो -

श्लोक 36 (skanda.2.128.36)

ज्ञेय उच्छिष्ट आवर्षं नरोऽसौ नाऽत्र संशयः ॥ ततः सायं पुनः पूज्याविक्षुदण्डैश्च शोभितौ

jñeya ucchiṣṭa āvarṣaṁ naro'sau nā'atra saṁśayaḥ || tataḥ sāyaṁ punaḥ pūjyāvikṣudaṇḍaiśca śobhitau

तो निःसंदेह वह मनुष्य वर्षभर के लिए जूठा माना जाता है। फिर सायंकाल में गन्ने के डंडों से सुशोभित मंडप में दोनों की पुनः पूजा करे।

श्लोक 37 (skanda.2.128.37)

तुलसीवासुदेवौ च कृतकृत्यो भवेत्ततः ॥ ततो विसर्जनं कृत्वा दत्त्वा दायादिकं हरेः

tulasīvāsudevau ca kṛtakṛtyo bhavettataḥ || tato visarjanaṁ kṛtvā dattvā dāyādikaṁ hareḥ

इस प्रकार तुलसी और वासुदेव की पूजा कर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। फिर विसर्जन करके, हरि को स्त्रीधन आदि कन्यादान की सामग्री अर्पित कर -

श्लोक 38 (skanda.2.128.38)

वैकुण्ठं गच्छ भगवँस्तुलसीसहितः प्रभो ॥ मत्कृतं पूजनं गृह्य संतुष्टो भव सर्वदा

vaikuṇṭhaṁ gaccha bhagavaṁstulasīsahitaḥ prabho || matkṛtaṁ pūjanaṁ gṛhya saṁtuṣṭo bhava sarvadā

कहे - हे भगवन्! हे प्रभो! तुलसी सहित वैकुण्ठ को जाओ; मेरे द्वारा किए गए पूजन को स्वीकार कर सदा संतुष्ट रहो।

श्लोक 39 (skanda.2.128.39)

गच्छगच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर ॥ यत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ जनार्दन

gacchagaccha suraśreṣṭha svasthāne parameśvara || yatra brahmādayo devāstatra gaccha janārdana

हे देवश्रेष्ठ! हे परमेश्वर! अपने स्थान को जाओ, जाओ; हे जनार्दन! जहाँ ब्रह्मा आदि देवता हैं, वहाँ जाओ।

श्लोक 40 (skanda.2.128.40)

एवं विसृज्य देवेशमाचार्याय प्रदापयेत् ॥ मूर्त्यादिकं सर्वमेव कृतकृत्यो भवेन्नरः

evaṁ visṛjya deveśamācāryāya pradāpayet || mūrtyādikaṁ sarvameva kṛtakṛtyo bhavennaraḥ

इस प्रकार देवेश को विदा कर मूर्ति आदि सब कुछ आचार्य को अर्पित कर दे; इस प्रकार मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 41 (skanda.2.128.41)

प्रतिवर्षं तु यः कुर्यात्तुलसीकरपीडनम् ॥ भक्तिमान्धनधान्यैः स युक्तो भवति निश्चितम् ॥ इहलोके परत्राऽपि विपुलं च यशो लभेत्

prativarṣaṁ tu yaḥ kuryāttulasīkarapīḍanam || bhaktimāndhanadhānyaiḥ sa yukto bhavati niścitam || ihaloke paratrā'api vipulaṁ ca yaśo labhet

जो प्रतिवर्ष भक्तिपूर्वक तुलसी-विवाह करता है, वह निश्चय ही धन-धान्य से युक्त होता है, और इस लोक तथा परलोक दोनों में विपुल यश प्राप्त करता है।

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