Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 133

अंतिम तीन तिथियों की महिमा और पुराण-श्रवण-महिमा

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134

श्लोक 1 (skanda.2.133.1)

॥ब्रह्मोवाच॥ यास्तिस्रस्तिथयः पुण्या अंतिके शुक्लपक्षके ॥ कार्तिके मासि विप्रेंद्र पूर्णिमांताः शुभवहाः

brahmovāca yāstisrastithayaḥ puṇyā aṁtike śuklapakṣake || kārtike māsi vipreṁdra pūrṇimāṁtāḥ śubhavahāḥ

ब्रह्मा ने कहा - हे विप्रेंद्र! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के अंत में जो तीन पुण्य तिथियाँ हैं, जो पूर्णिमा तक शुभ फल देने वाली हैं -

श्लोक 2 (skanda.2.133.2)

अंतिपुष्करिणी संज्ञा सर्वपापक्षयावहा ॥ कार्त्तिके मासि संपूर्णं यो वै स्नानं करोति ह

aṁtipuṣkariṇī saṁjñā sarvapāpakṣayāvahā || kārttike māsi saṁpūrṇaṁ yo vai snānaṁ karoti ha

वे "अंतिपुष्करिणी" नाम से जानी जाती हैं, जो सभी पापों का क्षय करने वाली हैं। जो कार्तिक मास में संपूर्ण स्नान करता है -

श्लोक 3 (skanda.2.133.3)

तिथिष्वेतासु सः स्नानात्पूर्णमेव फलं लभेत् ॥ सर्वे वेदास्त्रयोदश्यां गत्वा जन्तून्पुनंति हि

tithiṣvetāsu saḥ snānātpūrṇameva phalaṁ labhet || sarve vedāstrayodaśyāṁ gatvā jaṁtūnpunaṁti hi

इन तिथियों में स्नान से उसे पूर्ण फल ही प्राप्त होता है। त्रयोदशी को समस्त वेद उन तीर्थों में जाकर प्राणियों को पवित्र करते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.133.4)

चतुर्दश्यां सयज्ञाश्च देवा जंतून्पुनंति हि ॥ पूर्णिमायां सुतीर्थानि विष्णुना संस्थितानि हि

caturdaśyāṁ sayajñāśca devā jaṁtūnpunaṁti hi || pūrṇimāyāṁ sutīrthāni viṣṇunā saṁsthitāni hi

चतुर्दशी को यज्ञों सहित देवता प्राणियों को पवित्र करते हैं। पूर्णिमा को विष्णु द्वारा स्थापित सुंदर तीर्थ उपस्थित होते हैं।

श्लोक 5 (skanda.2.133.5)

ब्रह्मघ्नान्वा सुरापान्वा सर्वाञ्जंतून्पुनंति हि ॥ उष्णोदकेन यः स्नायात्कार्त्तिक्यादिदिनत्रये

brahmaghnānvā surāpānvā sarvāñjaṁtūnpunaṁti hi || uṣṇodakena yaḥ snāyātkārttikyādidinatraye

वे ब्रह्महत्यारों, सुरापियों तथा सभी प्राणियों को पवित्र करते हैं। जो कार्तिकी से प्रारंभ होने वाले तीन दिनों में गरम पानी से स्नान करता है -

श्लोक 6 (skanda.2.133.6)

रौरवं नरकं याति यावदिंद्राश्चतुर्दश ॥ आमासनियमाशक्तः कुर्यादेतद्दिनत्रये

rauravaṁ narakaṁ yāti yāvadiṁdrāścaturdaśa || āmāsaniyamāśaktaḥ kuryādetaddinatraye

वह चौदह इंद्रों तक रौरव नरक को जाता है। जो कठोर नियम रखने में असमर्थ हो, वह इन तीन दिनों में कम से कम इतना करे -

श्लोक 7 (skanda.2.133.7)

तेन पूर्णफलं प्राप्य मोदते विष्णुमंदिरे ॥ यो वै देवान्पितॄन्विष्णुं गुरुमुद्दिश्य मानवः

tena pūrṇaphalaṁ prāpya modate viṣṇumaṁdire || yo vai devānpitṝnviṣṇuṁ gurumuddiśya mānavaḥ

उससे वह पूर्ण फल प्राप्त कर विष्णु-लोक में आनंदित होता है। जो मनुष्य देवताओं, पितरों, विष्णु और गुरु के उद्देश्य से -

श्लोक 8 (skanda.2.133.8)

न स्नानादि करोत्यद्धा स याति नरकं ध्रुवम् ॥ कुटुंबभोजन यस्तु गृहस्थस्तु दिनत्रये

na snānādi karotyaddhā sa yāti narakaṁ dhruvam || kuṭuṁbabhojana yastu gṛhasthastu dinatraye

भलीभाँति स्नान आदि नहीं करता, वह निश्चय ही नरक को जाता है। जो गृहस्थ इन तीन दिनों में अपने परिवार को भोजन कराता है -

श्लोक 9 (skanda.2.133.9)

सर्वान्पितॄन्समुद्धृत्य स याति परमं पदम् ॥ गीतापाठं तु यः कुर्यादंतिमे च दिनत्रये

sarvānpitṝnsamuddhṛtya sa yāti paramaṁ padam || gītāpāṭhaṁ tu yaḥ kuryādaṁtime ca dinatraye

वह अपने सभी पितरों का उद्धार कर परम पद को प्राप्त करता है। जो अंतिम तीन दिनों में गीता का पाठ करता है -

श्लोक 10 (skanda.2.133.10)

दिनेदिनेऽश्वमेधानां फलमेति न संशयः ॥ सहस्रनामपठनं यः कुर्यात्तु दिनत्रये

dinedine'śvamedhānāṁ phalameti na saṁśayaḥ || sahasranāmapaṭhanaṁ yaḥ kuryāttu dinatraye

प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञों का फल पाता है, इसमें संदेह नहीं। जो इन तीन दिनों में सहस्रनाम का पाठ करता है -

श्लोक 11 (skanda.2.133.11)

न पापैर्लिप्यते क्वाऽपि पद्मपत्रमिवांऽभसा ॥ देवत्वं मनुजैः कैश्चित्कैश्चित्सिद्धत्वमेव च

na pāpairlipyate kvā'api padmapatramivāṁbhasā || devatvaṁ manujaiḥ kaiścitkaiścitsiddhatvameva ca

वह कहीं भी पापों से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्र जल से लिप्त नहीं होता। कुछ मनुष्यों को देवत्व, कुछ को सिद्धत्व -

श्लोक 12 (skanda.2.133.12)

तस्य पुण्यफलं वक्तुं कः शक्तो दिवि वा भुवि ॥ यो वै भागवतं शास्त्रं शृणोति च दिनत्रयम्

tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ kaḥ śakto divi vā bhuvi || yo vai bhāgavataṁ śāstraṁ śṛṇoti ca dinatrayam

उसके पुण्य-फल को स्वर्ग या पृथ्वी में कौन कह सकता है? जो इन तीन दिनों में भागवत शास्त्र सुनता है -

श्लोक 13 (skanda.2.133.13)

कैश्चित्प्राप्तो ब्रह्मभावो दिनत्रयनिषेवणात् ॥ ब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा

kaiścitprāpto brahmabhāvo dinatrayaniṣevaṇāt || brahmajñānena vā muktiḥ prayāgamaraṇena vā

कुछ ने तीन दिनों की इस सेवा से ब्रह्म-भाव प्राप्त किया है। ब्रह्मज्ञान से, या प्रयाग में मरण से -

श्लोक 14 (skanda.2.133.14)

अथ वा कार्त्तिके मासि दिनत्रयनिषेवणात् ॥ कार्त्तिके हरिपूजां तु यः करोति दिनत्रये

atha vā kārttike māsi dinatrayaniṣevaṇāt || kārttike haripūjāṁ tu yaḥ karoti dinatraye

अथवा कार्तिक मास में इन तीन दिनों की सेवा से मुक्ति मिलती है। जो कार्तिक में इन तीन दिनों में हरि की पूजा करता है -

श्लोक 15 (skanda.2.133.15)

न तस्य पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि ॥ कार्त्तिके मासि विप्रेंद्र सर्वमंत्यदिनत्रये

na tasya punarāvṛttiḥ kalpakoṭiśatairapi || kārttike māsi vipreṁdra sarvamaṁtyadinatraye

उसका पुनरागमन करोड़ों कल्पों में भी नहीं होता। हे विप्रेंद्र! कार्तिक मास में सब कुछ इन अंतिम तीन दिनों में समाहित है -

श्लोक 16 (skanda.2.133.16)

पुण्यं तत्राऽपि वैशेष्यं राकायां वर्ततेऽनघ ॥ प्रातःकाले समुत्थाय शौचं स्नानादिकं चरेत्

puṇyaṁ tatrā'api vaiśeṣyaṁ rākāyāṁ vartate'nagha || prātaḥkāle samutthāya śaucaṁ snānādikaṁ caret

हे निष्पाप! उनमें भी पूर्णिमा को विशेष पुण्य होता है। प्रातःकाल उठकर शौच, स्नान आदि करे।

श्लोक 17 (skanda.2.133.17)

समाप्य सर्वकर्माणि विष्णुपूजां समाचरेत् ॥ उद्याने वा गृहे वाऽपि कार्त्तिक्यां विष्णुतत्परः

samāpya sarvakarmāṇi viṣṇupūjāṁ samācaret || udyāne vā gṛhe vā'api kārttikyāṁ viṣṇutatparaḥ

सभी कर्म पूर्ण कर विष्णु-पूजा करे। कार्तिकी को उद्यान में या घर में, विष्णु-भक्त -

श्लोक 18 (skanda.2.133.18)

मंडपं तत्र कुर्वीत कदलीस्तंभमंडितम् ॥ चूतपल्लवसंवीतमिक्षुदंडैः सुमंडितम्

maṁḍapaṁ tatra kurvīta kadalīstaṁbhamaṁḍitam || cūtapallavasaṁvītamikṣudaṁḍaiḥ sumaṁḍitam

वहाँ केले के स्तंभों से सुशोभित, आम के पल्लवों से घिरा हुआ, गन्ने के डंडों से सुसज्जित एक मंडप बनाए।

श्लोक 19 (skanda.2.133.19)

चित्रवस्त्रैः स्वलंकृत्य तत्र देवं प्रपूजयेत् ॥ चूतपल्लवपुष्पाढ्यैः फलाद्यैः पूजयेद्धरिम्

citravastraiḥ svalaṁkṛtya tatra devaṁ prapūjayet || cūtapallavapuṣpāḍhyaiḥ phalādyaiḥ pūjayeddharim

चित्र-विचित्र वस्त्रों से सजाकर वहाँ देव की पूजा करे। आम के पल्लवों और फूलों से भरपूर फलों आदि से हरि की पूजा करे।

श्लोक 20 (skanda.2.133.20)

शृणुयादूर्जमाहात्म्यं नियमेन शुचिः पुमान् ॥ संपूर्णमथ वाऽध्यायमेकश्लोकमथाऽपि वा

śṛṇuyādūrjamāhātmyaṁ niyamena śuciḥ pumān || saṁpūrṇamatha vā'adhyāyamekaślokamathā'api vā

पवित्र मनुष्य नियमपूर्वक कार्तिक-महात्म्य को सुने - संपूर्ण, अथवा एक अध्याय, अथवा एक श्लोक भी।

श्लोक 21 (skanda.2.133.21)

मुहूर्तं वाऽपि शृणुयात्कथां पुण्यां दिनेदिने ॥ यदि प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तः स्यात्तु मानवः

muhūrtaṁ vā'api śṛṇuyātkathāṁ puṇyāṁ dinedine || yadi pratidinaṁ śrotumaśaktaḥ syāttu mānavaḥ

अथवा एक मुहूर्त तक भी इस पुण्य कथा को प्रतिदिन सुने। यदि मनुष्य प्रतिदिन सुनने में असमर्थ हो -

श्लोक 22 (skanda.2.133.22)

पुण्यमासेऽथवा पुण्यतिथौ संशृणुयादपि ॥ तेन पुण्यप्रभावेन पापान्मुक्तो भवेन्नरः

puṇyamāse'thavā puṇyatithau saṁśṛṇuyādapi || tena puṇyaprabhāvena pāpānmukto bhavennaraḥ

तो पुण्य मास में या पुण्य तिथि को ही सुन ले। उस पुण्य-प्रभाव से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.2.133.23)

पुराणज्ञः शुचिर्दक्षः शांतो विगतमत्सरः ॥ साधुः कारुणिको वाग्ग्मी वदेत्पुण्यां कथां सुधीः

purāṇajñaḥ śucirdakṣaḥ śāṁto vigatamatsaraḥ || sādhuḥ kāruṇiko vāggmī vadetpuṇyāṁ kathāṁ sudhīḥ

पुराण का ज्ञाता, पवित्र, कुशल, शांत, ईर्ष्या से रहित, साधु, करुणामय, वाक्पटु, बुद्धिमान व्यक्ति ही इस पुण्य कथा को कहे।

श्लोक 24 (skanda.2.133.24)

व्यासासनं समारूढो यदा पौराणिको भवेत् ॥ आसमाप्तेः प्रसंगस्य नमस्कुर्यान्न कस्यचित्

vyāsāsanaṁ samārūḍho yadā paurāṇiko bhavet || āsamāpteḥ prasaṁgasya namaskuryānna kasyacit

जब कथावाचक व्यास-आसन पर आरूढ़ हो, तो कथा-प्रसंग की समाप्ति तक किसी को भी नमस्कार न करे।

श्लोक 25 (skanda.2.133.25)

न दुर्जनसमाकीर्णे न शूद्रश्वापदावृते ॥ देशे न द्यूतसदने वदेत्पुण्यकथां सुधीः

na durjanasamākīrṇe na śūdraśvāpadāvṛte || deśe na dyūtasadane vadetpuṇyakathāṁ sudhīḥ

बुद्धिमान व्यक्ति को दुर्जनों से भरे हुए स्थान में, शूद्रों-श्वापदों से घिरे हुए स्थान में, या जुआघर में यह पुण्य कथा नहीं कहनी चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.2.133.26)

श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नाऽन्यकार्येषु लालसा ॥ वाग्यताः शुचयो दक्षाः श्रोतारः पुण्यभागिनः

śraddhābhaktisamāyuktā nā'anyakāryeṣu lālasā || vāgyatāḥ śucayo dakṣāḥ śrotāraḥ puṇyabhāginaḥ

श्रद्धा और भक्ति से युक्त, अन्य कार्यों में आसक्ति से रहित, वाणी का संयम रखने वाले, पवित्र और कुशल श्रोता ही पुण्य के भागी होते हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.133.27)

अभक्ता ये कथां पुण्यां शृण्वंति मनुजाऽधमाः ॥ तेषां पुण्यफलं नाऽस्ति दुःखं स्याजन्मजन्मनि

abhaktā ye kathāṁ puṇyāṁ śṛṇvaṁti manujā'adhamāḥ || teṣāṁ puṇyaphalaṁ nā'asti duḥkhaṁ syājanmajanmani

जो अभक्त अधम मनुष्य इस पुण्य कथा को सुनते हैं, उन्हें कोई पुण्य-फल नहीं मिलता, और उन्हें जन्म-जन्म में दुःख होता है।

श्लोक 28 (skanda.2.133.28)

पौराणिकं च मासांते पूजयेद्भक्तितत्परः ॥ गन्धमाल्यैस्तथा वस्त्रैरलंकारैर्धनेन च

paurāṇikaṁ ca māsāṁte pūjayedbhaktitatparaḥ || gandhamālyaistathā vastrairalaṁkārairdhanena ca

महीने के अंत में भक्ति में तत्पर व्यक्ति को कथावाचक की गंध, माला, वस्त्र, आभूषण और धन से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.133.29)

शृण्वंति च कथां भक्त्या न दरिद्रा न पापिनः ॥ कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छंत्यन्यतो नराः

śṛṇvaṁti ca kathāṁ bhaktyā na daridrā na pāpinaḥ || kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ ye gacchaṁtyanyato narāḥ

भक्तिपूर्वक कथा सुनने वाले न दरिद्र होते हैं, न पापी। कथा के कहे जाते समय जो मनुष्य अन्यत्र चले जाते हैं -

श्लोक 30 (skanda.2.133.30)

भोगांतरे प्रणश्यंति तेषां दाराश्च संपदः ॥ उच्चासनसमारूढो न नरः प्रणतो भवेत्

bhogāṁtare praṇaśyaṁti teṣāṁ dārāśca saṁpadaḥ || uccāsanasamārūḍho na naraḥ praṇato bhavet

उनकी पत्नियाँ और संपत्तियाँ भोग के बीच में ही नष्ट हो जाती हैं। ऊँचे आसन पर बैठा हुआ मनुष्य कथावाचक के प्रति विनम्र नहीं होता -

श्लोक 31 (skanda.2.133.31)

विषवृक्षस्तथा स्वापे वने चाऽजगरो भवेत् ॥ कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वंति ये नराः

viṣavṛkṣastathā svāpe vane cā'ajagaro bhavet || kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ vighnaṁ kurvaṁti ye narāḥ

वह अगले जन्म में विषवृक्ष होता है, और सोते समय वन में अजगर बनता है। कथा कहे जाते समय जो मनुष्य विघ्न डालते हैं -

श्लोक 32 (skanda.2.133.32)

कोट्यब्दनरकान्भुक्त्वा भवंति ग्रामसूकराः ॥ ये श्रावयंति मनुजाः कथां पौराणिकीं शुभाम्

koṭyabdanarakānbhuktvā bhavaṁti grāmasūkarāḥ || ye śrāvayaṁti manujāḥ kathāṁ paurāṇikīṁ śubhām

वे करोड़ों वर्षों तक नरक भोगकर ग्राम-सूअर बनते हैं। जो मनुष्य इस शुभ पौराणिक कथा को सुनाते हैं -

श्लोक 33 (skanda.2.133.33)

कल्पकोटिशतं साग्रं तिष्ठंति ब्रह्मणः पदे ॥ आसनार्थे प्रयच्छति पुराणज्ञस्य ये नराः

kalpakoṭiśataṁ sāgraṁ tiṣṭhaṁti brahmaṇaḥ pade || āsanārthe prayacchati purāṇajñasya ye narāḥ

वे सौ करोड़ से भी अधिक कल्पों तक ब्रह्मा के पद में रहते हैं। जो मनुष्य पुराणज्ञ कथावाचक को आसन के लिए -

श्लोक 34 (skanda.2.133.34)

कम्बलाजिनवासांसि मंचं फलकमेव वा ॥ परिधानीयवस्त्राणि प्रयच्छंति च ये नराः

kambalājinavāsāṁsi maṁcaṁ phalakameva vā || paridhānīyavastrāṇi prayacchaṁti ca ye narāḥ

कंबल, मृगचर्म, वस्त्र, मंच या पीढ़ा देते हैं, और जो मनुष्य पहनने के वस्त्र देते हैं -

श्लोक 35 (skanda.2.133.35)

भूषणादि प्रयच्छंति वसेयुर्ब्रह्मसद्मनि ॥ वाचके परितुष्टे तु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः

bhūṣaṇādi prayacchaṁti vaseyurbrahmasadmani || vācake parituṣṭe tu tuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

और आभूषण आदि देते हैं, वे ब्रह्म-लोक में निवास करते हैं। वाचक के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.133.36)

अतः संतोषयेद्भक्त्या भक्तिश्रद्धान्वितः पुमान् ॥ तस्य पुण्यफलं पूर्णं भवत्येव न संशयः

ataḥ saṁtoṣayedbhaktyā bhaktiśraddhānvitaḥ pumān || tasya puṇyaphalaṁ pūrṇaṁ bhavatyeva na saṁśayaḥ

इसलिए भक्ति और श्रद्धा से युक्त मनुष्य को भक्तिपूर्वक उसे संतुष्ट करना चाहिए। उसे निश्चय ही पूर्ण पुण्य-फल प्राप्त होता है।

श्लोक 37 (skanda.2.133.37)

यत्फलं सर्वयज्ञेषु सर्वदानेषु यत्फलम् ॥ सकृत्पुराणश्रवणात्तत्फलं विंदते नरः

yatphalaṁ sarvayajñeṣu sarvadāneṣu yatphalam || sakṛtpurāṇaśravaṇāttatphalaṁ viṁdate naraḥ

सभी यज्ञों में जो फल है, सभी दानों में जो फल है, वह फल मनुष्य एक बार पुराण-श्रवण से ही प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 38 (skanda.2.133.38)

कलौ युगे विशेषेण पुराणश्रवणादृते ॥ नास्ति धर्मः परः पुंसां नास्ति मुक्तिपथः परः ॥ पुराणश्रवणाद्विष्णोर्नास्ति संकीर्तनात्परम्

kalau yuge viśeṣeṇa purāṇaśravaṇādṛte || nāsti dharmaḥ paraḥ puṁsāṁ nāsti muktipathaḥ paraḥ || purāṇaśravaṇādviṣṇornāsti saṁkīrtanātparam

कलियुग में विशेष रूप से पुराण-श्रवण के अतिरिक्त मनुष्यों के लिए कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है, कोई श्रेष्ठ मुक्ति-मार्ग नहीं है; पुराण-श्रवण और विष्णु-संकीर्तन से बढ़कर कुछ भी नहीं है।

श्लोक 39 (skanda.2.133.39)

य एतदूर्जमाहात्म्यं शृणुयाच्छ्रावयेदपि ॥ स तीर्थराज बदरीगमनस्य फलं लभेत्

ya etadūrjamāhātmyaṁ śṛṇuyācchrāvayedapi || sa tīrtharāja badarīgamanasya phalaṁ labhet

जो इस कार्तिक-महात्म्य को सुनता है या सुनाता है, वह तीर्थराज (प्रयाग) और बदरी-यात्रा का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 40 (skanda.2.133.40)

सर्वरोगापहं सर्वपापनाशकरं शुभम् ॥ श्रुत्वा चैकपदे यो वै अगम्यागमने रतः

sarvarogāpahaṁ sarvapāpanāśakaraṁ śubham || śrutvā caikapade yo vai agamyāgamane rataḥ

यह सभी रोगों को दूर करने वाला, सभी पापों का नाश करने वाला और शुभ है। इसे सुनकर, जो व्यक्ति अगम्यागमन में रत रहा हो -

श्लोक 41 (skanda.2.133.41)

कन्यास्वस्रोर्विक्रयिणमुभयं तु विमोचयेत् ॥ माहात्म्यमेतदाकर्ण्य पूजयेद्यस्तु पाठकम्

kanyāsvasrorvikrayiṇamubhayaṁ tu vimocayet || māhātmyametadākarṇya pūjayedyastu pāṭhakam

या जो कन्या और बहन का विक्रय करता हो - इन दोनों को भी यह कथा मुक्त कर देती है। इस माहात्म्य को सुनकर जो व्यक्ति कथावाचक की पूजा करता है -

श्लोक 42 (skanda.2.133.42)

गोभूहिरण्यवस्त्रैश्च विष्णुतुल्यो यतो हि सः ॥ धर्मशास्त्रं पुराणं च वेदविद्यादिकं च यत्

gobhūhiraṇyavastraiśca viṣṇutulyo yato hi saḥ || dharmaśāstraṁ purāṇaṁ ca vedavidyādikaṁ ca yat

गाय, भूमि, स्वर्ण और वस्त्र से, क्योंकि वह विष्णु के समान है। धर्मशास्त्र, पुराण, तथा वेद-विद्या आदि जो कुछ भी है -

श्लोक 43 (skanda.2.133.43)

पुस्तकं वाचकायैव दातव्यं धर्ममिच्छता ॥ पुराणविद्यादातारो ह्यनंतफलभोगिनः

pustakaṁ vācakāyaiva dātavyaṁ dharmamicchatā || purāṇavidyādātāro hyanaṁtaphalabhoginaḥ

उसकी पुस्तक धर्म चाहने वाले को कथावाचक को ही देनी चाहिए। पुराण-विद्या के दाता अनंत फल भोगने वाले होते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.133.44)

इदं यः पठते भक्त्या श्रुत्वा चैवाऽवधारयेत् ॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति

idaṁ yaḥ paṭhate bhaktyā śrutvā caivā'avadhārayet || mucyate sarvapāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है, या सुनकर धारण करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु-लोक को जाता है।

श्लोक 45 (skanda.2.133.45)

न कस्याऽपीदमाख्येयं श्रद्धाहीनाय दुर्मतेः ॥ अपूजयित्वा गुरुमग्रबुद्ध्या धर्मप्रवक्तारमनन्यबुद्धिः

na kasyā'apīdamākhyeyaṁ śraddhāhīnāya durmateḥ || apūjayitvā gurumagrabuddhyā dharmapravaktāramananyabuddhiḥ

यह किसी भी श्रद्धाहीन दुर्बुद्धि व्यक्ति को नहीं सुनाना चाहिए। जो प्रधान बुद्धि से धर्म-प्रवक्ता गुरु की पूजा किए बिना, अनन्य-बुद्धि से -

श्लोक 46 (skanda.2.133.46)

भुक्त्वा तु भोगान्नरकेषु चैव ततो हि जन्मान्तर दुःखभोगी ॥ तस्मात्संपूजयेद्भक्त्या गुरुं तत्त्वावबोधकम्

bhuktvā tu bhogānnarakeṣu caiva tato hi janmāntara duḥkhabhogī || tasmātsaṁpūjayedbhaktyā guruṁ tattvāvabodhakam

भोग भोगकर, नरकों में भी गिरता है, और फिर जन्मांतर में दुःख भोगने वाला होता है। इसलिए तत्त्व का बोध कराने वाले गुरु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.2.133.47)

माहात्म्यस्य च लेशोऽयं तव चोक्तो मयाऽनघ ॥ न शक्यते हि संपूर्णं वक्तुं वर्षशतैरपि

māhātmyasya ca leśo'yaṁ tava coktaḥ mayā'anagha || na śakyate hi saṁpūrṇaṁ vaktuṁ varṣaśatairapi

हे निष्पाप! यह मैंने तुम्हें माहात्म्य का केवल अंश ही कहा है। इसे सैकड़ों वर्षों में भी संपूर्ण रूप से नहीं कहा जा सकता।

श्लोक 48 (skanda.2.133.48)

पुरा कैलासशिखरे पार्वत्यै प्रोक्तवाञ्च्छिवः ॥ कार्तिकस्य तु माहात्म्यं यावद्वर्षशतं वदन्

purā kailāsaśikhare pārvatyai proktavāñcchivaḥ || kārtikasya tu māhātmyaṁ yāvadvarṣaśataṁ vadan

पूर्वकाल में कैलास शिखर पर शिव ने पार्वती को कार्तिक की महिमा सुनाई, सौ वर्षों तक कहते हुए भी -

श्लोक 49 (skanda.2.133.49)

तथापि नांतमगमदशक्तो विरराम ह ॥ पुत्रार्थी च धनार्थी च राज्यार्थी स्वफलं लभेत्

tathāpi nāṁtamagamadaśakto virarāma ha || putrārthī ca dhanārthī ca rājyārthī svaphalaṁ labhet

फिर भी उसके अंत तक नहीं पहुँच सके, और असमर्थ होकर रुक गए। पुत्रार्थी, धनार्थी और राज्यार्थी - अपना-अपना फल पाते हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.133.50)

किमत्र बहुनोक्तेन मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥सूत उवाच॥ इत्युक्तो ब्रह्मणा चैव नारदः प्रेमनिर्भरः

kimatra bahunoktena mokṣārthī mokṣamāpnuyāt sūta uvāca ityukto brahmaṇā caiva nāradaḥ premanirbharaḥ

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ - मोक्षार्थी मोक्ष प्राप्त करता है। सूत ने कहा - ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, प्रेम से परिपूर्ण नारद -

श्लोक 51 (skanda.2.133.51)

भूयोभूयो नमस्कृत्य ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥ कथितं शंकरेणाऽपि पुत्राय हितकाम्यया

bhūyobhūyo namaskṛtya yayau yādṛcchiko muniḥ || kathitaṁ śaṁkareṇā'api putrāya hitakāmyayā

बार-बार नमस्कार कर स्वच्छंद विचरण करने वाला वह मुनि चला गया। शंकर ने भी पुत्र (कार्तिकेय) के हित की कामना से यह कथा सुनाई थी।

श्लोक 52 (skanda.2.133.52)

पितुस्तद्वाक्यमाकर्ण्य षण्मुखो हर्षनिर्भरः ॥ कृष्णेन सत्यभामायै कार्तिकस्य च वैभवः

pitustadvākyamākarṇya ṣaṇmukho harṣanirbharaḥ || kṛṣṇena satyabhāmāyai kārtikasya ca vaibhavaḥ

पिता का वह वचन सुनकर षण्मुख हर्ष से भर गए। कृष्ण ने सत्यभामा को कार्तिक का यह वैभव सुनाया,

श्लोक 53 (skanda.2.133.53)

कथितस्तेन संतुष्टा सत्या व्रतमथाऽकरोत् ॥ ऋषयो वालखिल्येभ्यः श्रुत्वा माहात्म्यमुत्तमम्

kathitastena saṁtuṣṭā satyā vratamathā'akarot || ṛṣayo vālakhilyebhyaḥ śrutvā māhātmyamuttamam

उससे संतुष्ट होकर सत्या (सत्यभामा) ने फिर यह व्रत किया। ऋषियों ने वालखिल्यों से यह उत्तम माहात्म्य सुनकर -

श्लोक 54 (skanda.2.133.54)

ऊर्जव्रतपरा जातास्तस्मादूर्जोऽतिवल्लभः ॥ अधीत्य सर्वशास्त्राणि पयःसारमिवोद्धृतम्

ūrjavrataparā jātāstasmādūrjo'tivallabhaḥ || adhītya sarvaśāstrāṇi payaḥsāramivoddhṛtam

कार्तिक-व्रत में तत्पर हो गए; इसलिए कार्तिक अत्यंत प्रिय है। समस्त शास्त्रों का अध्ययन कर, दूध के सार के समान निकाला गया -

श्लोक 55 (skanda.2.133.55)

नाऽनेन सदृशं शास्त्रं विष्णुप्रीतिकरं शुभम् ॥व्यास उवाच॥ इत्युक्त्वा तानृषीन्सर्वान्सूतो वै धर्मवित्तमः

nā'anena sadṛśaṁ śāstraṁ viṣṇuprītikaraṁ śubham vyāsa uvāca ityuktvā tānṛṣīnsarvānsūto vai dharmavittamaḥ

इस शास्त्र के समान विष्णु को प्रसन्न करने वाला कोई शुभ शास्त्र नहीं है। व्यास ने कहा - इस प्रकार धर्म को जानने वालों में श्रेष्ठ सूत ने उन सभी ऋषियों से कहकर -

श्लोक 56 (skanda.2.133.56)

विरराम ततस्ते तु पूजां चक्रुस्तदास्य च ॥ ते पुनः स्वाश्रमं गत्वा हृष्टास्ते परमर्षयः

virarāma tataste tu pūjāṁ cakrustadāsya ca || te punaḥ svāśramaṁ gatvā hṛṣṭāste paramarṣayaḥ

विराम लिया; तब उन्होंने उनकी पूजा की। वे परम ऋषिगण फिर अपने-अपने आश्रम को हर्षित होकर गए।

श्लोक 57 (skanda.2.133.57)

यथा सूतेनोपदिष्टं तथा चक्रुर्व्रतं शुभम् ॥ अनेन विधिना ये वै कुर्वंति कार्तिकव्रतम्

yathā sūtenopadiṣṭaṁ tathā cakrurvrataṁ śubham || anena vidhinā ye vai kurvaṁti kārtikavratam

जैसा सूत ने उपदेश दिया था, वैसे ही उन्होंने यह शुभ व्रत किया। जो लोग इस विधि से कार्तिक-व्रत करते हैं -

श्लोक 58 (skanda.2.133.58)

ते सर्वपापनिर्मुक्ता गच्छंति विष्णुमंदिरम्

te sarvapāpanirmuktā gacchaṁti viṣṇumaṁdiram

वे सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु-लोक को जाते हैं।

अध्याय 132अध्याय-सूचीअध्याय 134