वैष्णव खण्ड · अध्याय 134
गोपियों द्वारा किए गए मार्गशीर्ष-स्नान के फल का कथन
श्लोक 1 (skanda.2.134.1)
।। सूत उवाच ।। ।। देवकीनन्दनं कृष्णं जगदानन्दकारकम् ।। भु्क्तिमुक्तिप्रदं वन्दे माधवं भक्तवत्सलम्
sūta uvāca devakīnandanaṁ kṛṣṇaṁ jagadānandakārakam bhuktimuktipradaṁ vande mādhavaṁ bhaktavatsalam
श्रीगणेश को नमस्कार। यहाँ मार्गशीर्ष मास के माहात्म्य का आरम्भ होता है। सूत जी ने कहा — मैं देवकीनन्दन कृष्ण को प्रणाम करता हूँ, जो सम्पूर्ण जगत को आनन्द देने वाले हैं, भोग और मोक्ष दोनों के दाता हैं, भक्तों पर वात्सल्य रखने वाले उन माधव को मैं वन्दन करता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.2.134.2)
श्वेतद्वीपे सुखासीनं देवदेवं रमापतिम् ।। चतुर्वक्त्रो नमस्कृत्य पप्रच्छ पितरं तदा
śvetadvīpe sukhāsīnaṁ devadevaṁ ramāpatim caturvaktro namaskṛtya papraccha pitaraṁ tadā
श्वेतद्वीप में सुखपूर्वक विराजमान देवों के देव, लक्ष्मीपति भगवान को प्रणाम करके चतुर्मुख ब्रह्मा ने तब अपने पिता से यह प्रश्न पूछा।
श्लोक 3 (skanda.2.134.3)
।। ब्रह्मोवाच ।। ।। हृषीकेश जगद्धातः पुण्यश्रवणकीर्तन ।। पृष्टं यद्ब्रूहि देवेश सर्वज्ञ सकलेश्वर
brahmovāca hṛṣīkeśa jagaddhātaḥ puṇyaśravaṇakīrtana pṛṣṭaṁ yadbrūhi deveśa sarvajña sakaleśvara
ब्रह्मा जी ने कहा — हे हृषीकेश, हे जगत के धाता, हे पुण्यमय श्रवण-कीर्तन वाले प्रभु! हे देवेश, हे सर्वज्ञ, हे सकलेश्वर! मैंने जो पूछा है वह मुझे बताइए।
श्लोक 4 (skanda.2.134.4)
मासानां मार्गशीर्षोऽहमित्युक्तं भवता पुरा ।। तस्य मासस्य माहात्म्यं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः
māsānāṁ mārgaśīrṣo'hamityuktaṁ bhavatā purā tasya māsasya māhātmyaṁ jñātumicchāmi tattvataḥ
आपने पहले कहा था कि महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। उसी मास का माहात्म्य मैं यथार्थ रूप से जानना चाहता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.2.134.5)
को देवस्तस्य किं दानं कथं स्नानं विधिश्च कः ।। पुरुषैस्तत्र किं कार्यं भोक्तव्यं किं रमापते
ko devastasya kiṁ dānaṁ kathaṁ snānaṁ vidhiśca kaḥ puruṣaistatra kiṁ kāryaṁ bhoktavyaṁ kiṁ ramāpate
हे रमापते! उसका अधिष्ठाता देव कौन है, उसमें क्या दान करना चाहिए, स्नान कैसे और किस विधि से करना चाहिए, उसमें मनुष्यों को क्या करना चाहिए और क्या भोजन करना चाहिए?
श्लोक 6 (skanda.2.134.6)
वक्तव्यं किं तथा पूजाध्यानमंत्रादिकं च यत् ।। तत्र यत्क्रियते कर्म तत्सर्वं ब्रूहि मेऽच्युत
vaktavyaṁ kiṁ tathā pūjādhyānamaṁtrādikaṁ ca yat tatra yatkriyate karma tatsarvaṁ brūhi me'cyuta
इसी प्रकार उसमें क्या कहना चाहिए, तथा पूजा, ध्यान, मंत्र आदि जो कुछ भी है, उसमें जो कर्म किया जाता है — वह सब, हे अच्युत, आप मुझे बताइए।
श्लोक 7 (skanda.2.134.7)
।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारिणा ।। यस्मिन्कृते कृतं सर्वमिष्टापूर्तादिकं भवेत
śrībhagavānuvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā brahmansarvalokopakāriṇā yasminkṛte kṛtaṁ sarvamiṣṭāpūrtādikaṁ bhaveta
श्रीभगवान ने कहा — हे ब्रह्मन्! समस्त लोकों का उपकार करने वाले तुमने उत्तम प्रश्न पूछा है, जिसके करने मात्र से इष्ट-आपूर्त आदि सभी कर्म किए हुए के समान हो जाते हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.134.8)
सर्वयज्ञेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ।। तत्फलं समवाप्नोति मार्गशीर्षे कृते सुत
sarvayajñeṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu yatphalam tatphalaṁ samavāpnoti mārgaśīrṣe kṛte suta
हे सुत! समस्त यज्ञों में जो पुण्य है और समस्त तीर्थों में जो फल है, वही फल मार्गशीर्ष व्रत करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (skanda.2.134.9)
तुलापुरुषदानाद्यैर्यत्फलं लभते नरः ।। तत्फलं प्राप्यते पुत्र माहात्म्यश्रवणात्किल
tulāpuruṣadānādyairyatphalaṁ labhate naraḥ tatphalaṁ prāpyate putra māhātmyaśravaṇātkila
तुलापुरुष आदि दानों से मनुष्य जो फल पाता है, हे पुत्र! वही फल केवल इस माहात्म्य के श्रवण मात्र से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.2.134.10)
यज्ञाध्ययनदानाद्यैः सर्वतीर्थावगाहनैः ।। संन्यासेन च योगेन नाऽहं वश्योऽभवं नृणाम्
yajñādhyayanadānādyaiḥ sarvatīrthāvagāhanaiḥ saṁnyāsena ca yogena nā'haṁ vaśyo'bhavaṁ nṛṇām
यज्ञ, अध्ययन, दान आदि से, समस्त तीर्थों में स्नान करने से, संन्यास से और योग से भी मैं मनुष्यों के वश में नहीं हुआ।
श्लोक 11 (skanda.2.134.11)
स्नानेन दानेन च पूजनेन ध्यानेन मौनेन जपादिभिश्च ।। वश्यो यथा मार्गशिरे च मासि तथा न चान्येषु च गुह्यमुक्तम्
snānena dānena ca pūjanena dhyānena maunena japādibhiśca vaśyo yathā mārgaśire ca māsi tathā na cānyeṣu ca guhyamuktam
जिस प्रकार मार्गशीर्ष मास में स्नान, दान, पूजन, ध्यान, मौन तथा जप आदि से मैं वश में होता हूँ, वैसे अन्य किसी मास में नहीं — यह रहस्य मैंने बताया है।
श्लोक 12 (skanda.2.134.12)
अन्यैर्धर्मादिभिः कृत्वा गोपितं मार्गशीर्षकम् ।। मत्प्राप्तेः कारणं मत्वा देवैः स्वर्गनिवासिभिः
anyairdharmādibhiḥ kṛtvā gopitaṁ mārgaśīrṣakam matprāpteḥ kāraṇaṁ matvā devaiḥ svarganivāsibhiḥ
स्वर्ग में निवास करने वाले देवों ने भी मुझे पाने का कारण जानकर इस मार्गशीर्ष व्रत को अन्य धर्मों की अपेक्षा गुप्त रखा है।
श्लोक 13 (skanda.2.134.13)
ये केचित्पुण्यकर्माणो मम भक्तिपरायणाः ।। तेषामवश्यं कर्तव्यो मार्गशीर्षो मदापनः
ye kecitpuṇyakarmāṇo mama bhaktiparāyaṇāḥ teṣāmavaśyaṁ kartavyo mārgaśīrṣo madāpanaḥ
जो कोई भी पुण्यकर्मा और मेरी भक्ति में तत्पर हैं, उन्हें अवश्य ही मुझे प्राप्त कराने वाला यह मार्गशीर्ष व्रत करना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.134.14)
मार्गशीर्षं न कुर्वंति ये नरा भारताऽजिरे ।। पापरूपाश्च ते ज्ञेयाः कलिकालविमोहिताः
mārgaśīrṣaṁ na kurvaṁti ye narā bhāratā'jire pāparūpāśca te jñeyāḥ kalikālavimohitāḥ
भारतभूमि पर जो मनुष्य मार्गशीर्ष व्रत नहीं करते, वे पापरूप ही जानने चाहिए, जो कलिकाल से मोहित हैं।
श्लोक 15 (skanda.2.134.15)
अष्टस्वपि च मासेषु यत्फलं लभते नरः ।। तत्फलं प्राप्यते वत्स माघे मकरगे रवौ
aṣṭasvapi ca māseṣu yatphalaṁ labhate naraḥ tatphalaṁ prāpyate vatsa māghe makarage ravau
हे वत्स! अन्य आठों महीनों में मनुष्य जो फल पाता है, वही फल सूर्य के मकर राशि में होने पर माघ मास में प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (skanda.2.134.16)
माघाच्छतगुणं पुण्यं वैशाखे मासि लभ्यते ।। तस्मात्सहस्रगुणितं तुलासंस्थे दिवाकरे
māghācchataguṇaṁ puṇyaṁ vaiśākhe māsi labhyate tasmātsahasraguṇitaṁ tulāsaṁsthe divākare
माघ मास से सौ गुना पुण्य वैशाख मास में मिलता है, और उससे भी हजार गुना पुण्य सूर्य के तुला राशि में होने पर मिलता है।
श्लोक 17 (skanda.2.134.17)
तस्मात्कोटिगुणं पुण्यं वृश्चिकस्थे दिवाकरे ।। मार्गशीर्षोऽधिकस्तस्मात्सर्वदा च मम प्रियः
tasmātkoṭiguṇaṁ puṇyaṁ vṛścikasthe divākare mārgaśīrṣo'dhikastasmātsarvadā ca mama priyaḥ
उससे भी करोड़ गुना पुण्य सूर्य के वृश्चिक राशि में होने पर मिलता है, परन्तु मार्गशीर्ष उससे भी अधिक है और सदा मुझे प्रिय है।
श्लोक 18 (skanda.2.134.18)
उषस्युत्थाय यो मर्त्यः स्नानं विधिवदाचरेत् ।। तुष्टोऽहं तस्य यच्छामि स्वात्मानमपि पुत्रक
uṣasyutthāya yo martyaḥ snānaṁ vidhivadācaret tuṣṭo'haṁ tasya yacchāmi svātmānamapi putraka
हे पुत्र! जो मनुष्य उषाकाल में उठकर विधिपूर्वक स्नान करता है, उससे प्रसन्न होकर मैं उसे अपना स्वयं का स्वरूप भी दे देता हूँ।
श्लोक 19 (skanda.2.134.19)
अत्राप्युदाहरन्तीदं शृणु पुत्र कथानकम् ।। नन्दगोपो महात्मा वै ख्यातो यो भूतलेऽभवत्
atrāpyudāharantīdaṁ śṛṇu putra kathānakam nandagopo mahātmā vai khyāto yo bhūtale'bhavat
इस विषय में एक कथा कही जाती है, हे पुत्र! सुनो — नन्दगोप नामक महात्मा भूतल पर विख्यात हुए थे।
श्लोक 20 (skanda.2.134.20)
तस्य वै गोकुले रम्ये गोपकन्याः सहस्रशः ।। तासां चित्तं च मद्रूपे लग्नमासीत्पुराऽनघ
tasya vai gokule ramye gopakanyāḥ sahasraśaḥ tāsāṁ cittaṁ ca madrūpe lagnamāsītpurā'nagha
हे निष्पाप! उनके रमणीय गोकुल में सहस्रों गोपकन्याएँ थीं, और पहले उन सबका चित्त मेरे ही स्वरूप में आसक्त था।
श्लोक 21 (skanda.2.134.21)
तासां बुद्धिर्मया दत्ता मागशीर्षाऽवगाहने ।। ततस्ताभिः कृतं स्नानं प्रातःकाले यथाविधि
tāsāṁ buddhirmayā dattā māgaśīrṣā'vagāhane tatastābhiḥ kṛtaṁ snānaṁ prātaḥkāle yathāvidhi
मैंने ही उन्हें मार्गशीर्ष मास में स्नान करने की बुद्धि प्रदान की। तत्पश्चात उन्होंने प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 22 (skanda.2.134.22)
पूजा कृता हविष्यान्नं भुक्तं ताभिः कृता नतिः ।। एवं कृतेन विधिना प्रसन्नोऽहं ततोऽनघ
pūjā kṛtā haviṣyānnaṁ bhuktaṁ tābhiḥ kṛtā natiḥ evaṁ kṛtena vidhinā prasanno'haṁ tato'nagha
उन्होंने पूजा की, हविष्यान्न का भोजन किया और नमन किया। हे निष्पाप! इस प्रकार किए गए विधि-विधान से मैं उनसे प्रसन्न हुआ।
श्लोक 23 (skanda.2.134.23)
वरो दत्तो मयाऽऽत्मा हि तासां तुष्टेन वै किल ।। तस्मान्नरैस्तु कर्तव्यो मार्गशीर्षो यथाविधि
varo datto mayā''tmā hi tāsāṁ tuṣṭena vai kila tasmānnaraistu kartavyo mārgaśīrṣo yathāvidhi
प्रसन्न होकर मैंने उन्हें वरदान में अपना ही स्वरूप प्रदान किया। इसलिए मनुष्यों को विधिपूर्वक मार्गशीर्ष व्रत अवश्य करना चाहिए।