वैष्णव खण्ड · अध्याय 135
त्रिपुण्ड्र धारण विधि का कथन
श्लोक 1 (skanda.2.135.1)
।। ब्रह्मोवाच ।। ।। त्वयोक्तो विधिसंयुक्तो मार्गशीर्षो मदापनः ।। को विधिस्तस्य देवेश सर्वं मे ब्रूहि केशव
brahmovāca tvayokto vidhisaṁyukto mārgaśīrṣo madāpanaḥ ko vidhistasya deveśa sarvaṁ me brūhi keśava
ब्रह्मा जी ने कहा — आपने कहा था कि विधि से युक्त मार्गशीर्ष व्रत आपकी प्राप्ति कराने वाला है। हे देवेश! उसकी विधि क्या है? हे केशव, वह सब मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.2.135.2)
।। ।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। रात्रावन्ते समुत्थाय उपस्पृश्य यथाविधि ।। नमस्कृत्या गुरुं स्वीयं संस्मरेन्मामतंद्रितः
śrībhagavānuvāca rātrāvante samutthāya upaspṛśya yathāvidhi namaskṛtyā guruṁ svīyaṁ saṁsmarenmāmataṁdritaḥ
श्रीभगवान ने कहा — रात्रि के अंत में उठकर, विधिपूर्वक जल का स्पर्श करके, अपने गुरु को नमस्कार करके, आलस्यरहित होकर मेरा स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.2.135.3)
सहस्रनामभिर्भक्त्या कीर्तयेद्वाग्यतः शुचिः ।। बहिर्ग्रामात्समुत्सृज्य मलमूत्रं यथाविधि
sahasranāmabhirbhaktyā kīrtayedvāgyataḥ śuciḥ bahirgrāmātsamutsṛjya malamūtraṁ yathāvidhi
वाणी को संयत रखकर, पवित्र होकर, भक्तिपूर्वक सहस्रनामों का कीर्तन करना चाहिए। फिर ग्राम से बाहर जाकर विधिपूर्वक मल-मूत्र का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.135.4)
शौचं कृत्वा यथान्यायमाचम्य प्रयतः शुचिः ।। दंतधावनपूर्वं च स्नानं कृत्वा यथाविधि
śaucaṁ kṛtvā yathānyāyamācamya prayataḥ śuciḥ daṁtadhāvanapūrvaṁ ca snānaṁ kṛtvā yathāvidhi
यथान्याय शौच करके, आचमन करके, संयमी और पवित्र होकर, पहले दंतधावन करके फिर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.2.135.5)
आदाय तुलसीमूलमृदं तत्पत्रसंयुताम् ।। मूलमंत्रेणाऽभिमंत्र्य गायत्र्या वा महामते
ādāya tulasīmūlamṛdaṁ tatpatrasaṁyutām mūlamaṁtreṇā'bhimaṁtrya gāyatryā vā mahāmate
तुलसी के मूल की मिट्टी उसके पत्तों सहित लेकर, हे महामते! उसे मूलमंत्र से अथवा गायत्री से अभिमंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.2.135.6)
मंत्रेणैवाऽनुलिप्तांगः स्नायादप्स्वघमर्षणम् ।। अनुद्धृतैरुद्धृतैर्वा जलैः स्नानं विधीयते
maṁtreṇaivā'nuliptāṁgaḥ snāyādapsvaghamarṣaṇam anuddhṛtairuddhṛtairvā jalaiḥ snānaṁ vidhīyate
उसी मंत्र से अंगों का लेपन करके अघमर्षण मंत्र के साथ जल में स्नान करना चाहिए। स्नान चाहे संचित जल से हो या प्रवाहित जल से, दोनों विहित हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.135.7)
तीर्थं प्रकल्पयेद्विद्वान्मन्त्रेणाऽनेन मन्त्रवित् ।। ॐनमो नारायणायेति मूलमन्त्र उदाहृतः
tīrthaṁ prakalpayedvidvānmantreṇā'nena mantravit oṁnamo nārāyaṇāyeti mūlamantra udāhṛtaḥ
मंत्रवेत्ता विद्वान को इस मंत्र से तीर्थ की कल्पना करनी चाहिए — 'ॐ नमो नारायणाय' यह मूलमंत्र कहा गया है।
श्लोक 8 (skanda.2.135.8)
दर्भपाणिस्तु विधिना आचांतः पुरतः शुचिः ।। चतुर्हस्तसमायुक्तं चतुरस्रं समंततः ।। प्रकल्प्याऽऽवाहयेद्गंगामेभिर्मंत्रैर्विचक्षणः
darbhapāṇistu vidhinā ācāṁtaḥ purataḥ śuciḥ caturhastasamāyuktaṁ caturasraṁ samaṁtataḥ prakalpyā''vāhayedgaṁgāmebhirmaṁtrairvicakṣaṇaḥ
हाथ में दर्भ लेकर, विधिपूर्वक आचमन करके, आगे की ओर पवित्र होकर, विचक्षण पुरुष चारों ओर चार हाथ के बराबर एक चतुष्कोण स्थान बनाकर इन मंत्रों से गंगा का आवाहन करे।
श्लोक 9 (skanda.2.135.9)
विष्णुपादप्रसूताऽसि वैष्णवी विष्णुदेवता ।। त्राहि नस्त्वमघादस्मादाजन्ममरणांतिकात्
viṣṇupādaprasūtā'si vaiṣṇavī viṣṇudevatā trāhi nastvamaghādasmādājanmamaraṇāṁtikāt
'तुम विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, वैष्णवी हो, विष्णु ही तुम्हारी देवता हैं; जन्म से लेकर मृत्यु के अंत तक के इस पाप से हमारी रक्षा करो।'
श्लोक 10 (skanda.2.135.10)
तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थानां वायुरब्रवीत् ।। दिवि भुव्यंतरिक्षे च तानि ते संति जाह्नवि
tisraḥ koṭyo'rdhakoṭī ca tīrthānāṁ vāyurabravīt divi bhuvyaṁtarikṣe ca tāni te saṁti jāhnavi
वायु देव ने कहा है कि तीर्थ साढ़े तीन करोड़ हैं, हे जाह्नवी! वे सब स्वर्ग में, पृथ्वी पर और अंतरिक्ष में तुझमें ही विद्यमान हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.135.11)
नंदिनीत्येव ते नाम देवेषु नलिनीति च ।। दक्षपुत्री च विहगा विश्वगा योगिनां मता
naṁdinītyeva te nāma deveṣu nalinīti ca dakṣaputrī ca vihagā viśvagā yogināṁ matā
देवताओं में तेरा नाम नंदिनी है और नलिनी भी; तू दक्ष की पुत्री, आकाशगामिनी और विश्व में व्याप्त होने वाली, योगियों द्वारा 'विश्वगा' मानी गई है।
श्लोक 12 (skanda.2.135.12)
विद्याधरी सुप्रसन्ना तथा लोकप्रसादिनी ।। क्षेमा च जाह्नवी चैव शांता शांतिप्रदायिनी
vidyādharī suprasannā tathā lokaprasādinī kṣemā ca jāhnavī caiva śāṁtā śāṁtipradāyinī
तू विद्याधरी है, अत्यंत प्रसन्नमुखी और लोकों को प्रसन्न करने वाली है; तू क्षेमा है, जाह्नवी भी, शांता और शांति प्रदान करने वाली है।
श्लोक 13 (skanda.2.135.13)
एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले सदा पठेत् ।। सदा संनिहिता तत्र गंगा त्रिपथगामिनी
etāni puṇyanāmāni snānakāle sadā paṭhet sadā saṁnihitā tatra gaṁgā tripathagāminī
स्नान के समय इन पुण्य नामों का सदा पाठ करना चाहिए; त्रिलोकगामिनी गंगा वहाँ सदा उपस्थित रहती है।
श्लोक 14 (skanda.2.135.14)
सप्तवाराभिजप्तेन करसंपुटयोजितम् ।। मूर्ध्ना कृतांजलिर्भूयस्त्रिचतुः पंच सप्त वा ।। स्नानं कुर्यान्मृदा तद्वदामंत्र्याऽनुविधानतः
saptavārābhijaptena karasaṁpuṭayojitam mūrdhnā kṛtāṁjalirbhūyastricatuḥ paṁca sapta vā snānaṁ kuryānmṛdā tadvadāmaṁtryā'nuvidhānataḥ
जोड़ी हुई अंजलि में जल लेकर सात बार मंत्र जपते हुए, फिर सिर पर हाथ जोड़कर तीन, चार, पाँच अथवा सात बार, इसी प्रकार मिट्टी से भी विधिपूर्वक मंत्रोच्चारण करते हुए स्नान करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.2.135.15)
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुन्धरे ।। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम्
aśvakrāṁte rathakrāṁte viṣṇukrāṁte vasundhare mṛttike hara me pāpaṁ yanmayā duṣkṛtaṁ kṛtam
'हे अश्व से आक्रांत, रथ से आक्रांत, विष्णु के चरण से आक्रांत वसुंधरे! हे मिट्टी! मेरे उस पाप को हर लो जो मैंने दुष्कर्म किया है।'
श्लोक 16 (skanda.2.135.16)
उद्धृताऽसि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना ।। नमस्ते सर्वभूतानां प्रभवाऽरणि सुव्रते
uddhṛtā'si varāheṇa kṛṣṇena śatabāhunā namaste sarvabhūtānāṁ prabhavā'raṇi suvrate
'शतबाहु कृष्ण ने वराह रूप में तुझे ऊपर उठाया था; हे सुव्रते! सब भूतों की उत्पत्ति-स्थान तुझे नमस्कार है।'
श्लोक 17 (skanda.2.135.17)
एवं स्नात्वा ततः पश्चादाचम्य च विधानतः।। उत्थाय वाससी शुक्ले कूले वै परिधाय च
evaṁ snātvā tataḥ paścādācamya ca vidhānataḥ utthāya vāsasī śukle kūle vai paridhāya ca
इस प्रकार स्नान करके, फिर विधिपूर्वक आचमन करके, उठकर तट पर ही दो श्वेत वस्त्र धारण करे।
श्लोक 18 (skanda.2.135.18)
आचम्य तर्पयेद्देवान्पितॄंश्चैव ऋषींस्तथा ।। निष्पीड्य वस्त्रमाचम्य धौतवस्त्रेण वेष्टितः
ācamya tarpayeddevānpitṝṁścaiva ṛṣīṁstathā niṣpīḍya vastramācamya dhautavastreṇa veṣṭitaḥ
आचमन करके देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को तर्पण दे। फिर वस्त्र को निचोड़कर, पुनः आचमन करके धुले वस्त्र से लिपटकर—
श्लोक 19 (skanda.2.135.19)
विमलां मृत्तिकां रम्यामादाय द्विजसत्तम ।। मन्त्रेणैवाऽभिमंत्र्याऽथ ललाटादिषु वैष्णवः ।। धारयेदूर्ध्वपुण्ड्राणि यथासंख्यमतंद्रितः
vimalāṁ mṛttikāṁ ramyāmādāya dvijasattama mantreṇaivā'bhimaṁtryā'tha lalāṭādiṣu vaiṣṇavaḥ dhārayedūrdhvapuṇḍrāṇi yathāsaṁkhyamataṁdritaḥ
हे द्विजसत्तम! स्वच्छ और सुंदर मिट्टी लेकर, उसे मंत्र से अभिमंत्रित करके, वैष्णव पुरुष आलस्यरहित होकर ललाट आदि स्थानों पर यथासंख्य ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे।
श्लोक 20 (skanda.2.135.20)
ब्रह्मन्द्वादशपुण्ड्राणि ब्राह्मणः सततं वहेत् ।। चत्वारि भूभृतां पुत्र पुण्ड्राणि द्वे विशां स्मृते ।। एकं पुंड्रं च नारीणां शूद्राणां च विधीयते
brahmandvādaśapuṇḍrāṇi brāhmaṇaḥ satataṁ vahet catvāri bhūbhṛtāṁ putra puṇḍrāṇi dve viśāṁ smṛte ekaṁ puṁḍraṁ ca nārīṇāṁ śūdrāṇāṁ ca vidhīyate
हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण सदा बारह पुण्ड्र धारण करे; हे पुत्र! क्षत्रियों के लिए चार पुण्ड्र, वैश्यों के लिए दो पुण्ड्र स्मृत हैं, और स्त्रियों तथा शूद्रों के लिए एक पुण्ड्र विहित है।
श्लोक 21 (skanda.2.135.21)
ललाट उदरे चैव वक्षो वै कण्ठकूबरे ।। कुक्ष्योर्बाह्वोः कर्णयोश्च पृष्ठे त्रिके च वै शिरः ।। तिलका द्वादश प्रोक्ता ब्राह्मणस्य सदाऽनघ
lalāṭa udare caiva vakṣo vai kaṇṭhakūbare kukṣyorbāhvoḥ karṇayośca pṛṣṭhe trike ca vai śiraḥ tilakā dvādaśa proktā brāhmaṇasya sadā'nagha
ललाट पर, उदर पर, वक्षःस्थल पर, कंठ और कंधे पर, दोनों कुक्षियों पर, दोनों भुजाओं पर, दोनों कानों पर, पीठ पर, कटि के त्रिक-स्थान पर और सिर पर — हे निष्पाप! ब्राह्मण के लिए सदा बारह तिलक कहे गए हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.135.22)
ललाटे हृदि बाह्वोश्च क्षात्रः पुंड्राणि धारयेत्।। ललाटे हृदये वैश्यो भाले वै शूद्रयोषिताम्
lalāṭe hṛdi bāhvośca kṣātraḥ puṁḍrāṇi dhārayet lalāṭe hṛdaye vaiśyo bhāle vai śūdrayoṣitām
क्षत्रिय ललाट, हृदय और दोनों भुजाओं पर पुण्ड्र धारण करे; वैश्य ललाट और हृदय पर; तथा शूद्र और स्त्रियाँ केवल ललाट पर धारण करें।
श्लोक 23 (skanda.2.135.23)
ललाटे केशवं ध्यायेन्नारायणमथोदरे।। वक्षःस्थले माधवं च गोविंदं कण्ठकूबरे
lalāṭe keśavaṁ dhyāyennārāyaṇamathodare vakṣaḥsthale mādhavaṁ ca goviṁdaṁ kaṇṭhakūbare
ललाट पर केशव का, उदर पर नारायण का, वक्षःस्थल पर माधव का और कंठ-कंधे पर गोविंद का ध्यान करना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.2.135.24)
विष्णुं च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम् ।। त्रिविक्रमं कर्णमूले वामनं वामपार्श्वके
viṣṇuṁ ca dakṣiṇe kukṣau bāhau ca madhusūdanam trivikramaṁ karṇamūle vāmanaṁ vāmapārśvake
दाहिनी कुक्षि पर विष्णु का और भुजा पर मधुसूदन का, कान की जड़ पर त्रिविक्रम का और बाईं ओर वामन का ध्यान करे।
श्लोक 25 (skanda.2.135.25)
श्रीधरं वामबाहौ च हृषीकेशं च कर्णके ।। पृष्ठे तु पद्मनाभः स्यात्त्रिके दामोदरं न्यसेत्
śrīdharaṁ vāmabāhau ca hṛṣīkeśaṁ ca karṇake pṛṣṭhe tu padmanābhaḥ syāttrike dāmodaraṁ nyaset
बाईं भुजा पर श्रीधर का और दूसरे कान पर हृषीकेश का; पीठ पर पद्मनाभ का और कटि के त्रिक-स्थान पर दामोदर का न्यास करे।
श्लोक 26 (skanda.2.135.26)
तत्प्रक्षालनतोयेन वासुदेवं तु मूर्धनि।। एवं कार्यं ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्योपधारयेत्
tatprakṣālanatoyena vāsudevaṁ tu mūrdhani evaṁ kāryaṁ brāhmaṇasya kṣatriyasyopadhārayet
उस मिट्टी को धोने वाले जल से सिर पर वासुदेव को स्थापित करे। यह विधि ब्राह्मण के लिए बताई गई; अब क्षत्रिय के लिए विधि सुनो।
श्लोक 27 (skanda.2.135.27)
ललाटे केशवं ध्यायेद्धृदये माधवं तथा ।। बाह्वोश्च उभयोर्वत्स स्मरेद्वै मधुसूदनम्
lalāṭe keśavaṁ dhyāyeddhṛdaye mādhavaṁ tathā bāhvośca ubhayorvatsa smaredvai madhusūdanam
ललाट पर केशव का और हृदय पर माधव का ध्यान करे; हे वत्स! दोनों भुजाओं पर मधुसूदन का स्मरण करे।
श्लोक 28 (skanda.2.135.28)
क्षत्रियस्य विधिः प्रोक्तो वैश्यकृत्यं निशामय ।। ललाटे केशवं ध्यायेद्धृदये माधवं तथा
kṣatriyasya vidhiḥ prokto vaiśyakṛtyaṁ niśāmaya lalāṭe keśavaṁ dhyāyeddhṛdaye mādhavaṁ tathā
यह क्षत्रिय की विधि कही गई; अब वैश्य का कृत्य सुनो — ललाट पर केशव का और हृदय पर माधव का ध्यान करे।
श्लोक 29 (skanda.2.135.29)
योषिच्छूद्रौ स्मरेतां च केशवं भालदेशके ।। अनेन विधिना कुर्यात्पुंड्राणि मम तुष्टये
yoṣicchūdrau smaretāṁ ca keśavaṁ bhāladeśake anena vidhinā kuryātpuṁḍrāṇi mama tuṣṭaye
स्त्री और शूद्र केवल भाल-स्थान पर केशव का स्मरण करें। इस विधि से मेरी प्रसन्नता के लिए पुण्ड्र धारण करना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.2.135.30)
श्यामं शांतिकरं प्रोक्तं रक्तं वश्यकरं तथा ।। श्रीकरं पीतमित्याहुः श्वेतं मोक्षकरं शुभम्
śyāmaṁ śāṁtikaraṁ proktaṁ raktaṁ vaśyakaraṁ tathā śrīkaraṁ pītamityāhuḥ śvetaṁ mokṣakaraṁ śubham
श्याम मिट्टी शांति देने वाली कही गई है, लाल मिट्टी वशीकरण करने वाली; पीली मिट्टी श्री देने वाली और शुभ श्वेत मिट्टी मोक्ष देने वाली कही जाती है।
श्लोक 31 (skanda.2.135.31)
एकांतिनो महाभागाः सर्वलोकहिते रताः ।। सांऽतरालं प्रकुर्वंति पुण्ड्रं हरिपदाकृतिम्
ekāṁtino mahābhāgāḥ sarvalokahite ratāḥ sāṁ'tarālaṁ prakurvaṁti puṇḍraṁ haripadākṛtim
सम्पूर्ण लोकों के हित में रत, महाभाग्यशाली एकांतिक भक्त बीच में अंतराल सहित हरि के चरण-चिह्न के आकार का पुण्ड्र बनाते हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.135.32)
मध्ये छिद्रेण संयुक्तमेतद्धि हरिमंदिरम् ।। ऊर्ध्वं सौम्यमृजुं सूक्ष्मं सुपार्श्वं सुमनोहरम्
madhye chidreṇa saṁyuktametaddhi harimaṁdiram ūrdhvaṁ saumyamṛjuṁ sūkṣmaṁ supārśvaṁ sumanoharam
बीच में छिद्र से युक्त यह पुण्ड्र ही हरि का मंदिर है — ऊपर की ओर सौम्य, सीधा, सूक्ष्म, सुंदर पार्श्वों वाला और अत्यंत मनोहर।
श्लोक 33 (skanda.2.135.33)
निरंतरालं यः कुर्यादूर्ध्वपुंड्रं द्विजाऽधमः ।। स हि तत्र स्थितं लक्ष्म्या सह मां च व्यपोहति
niraṁtarālaṁ yaḥ kuryādūrdhvapuṁḍraṁ dvijā'dhamaḥ sa hi tatra sthitaṁ lakṣmyā saha māṁ ca vyapohati
जो अधम द्विज बिना अंतराल के ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाता है, वह वहाँ स्थित मुझे और लक्ष्मी दोनों को दूर हटा देता है।
श्लोक 34 (skanda.2.135.34)
अच्छिद्रमूर्ध्वपुंड्रं तु ये कुर्वंति द्विजाधमाः ।। तैर्ललाटे शुनः पादं निक्षिप्तं वै न संशयः
acchidramūrdhvapuṁḍraṁ tu ye kurvaṁti dvijādhamāḥ tairlalāṭe śunaḥ pādaṁ nikṣiptaṁ vai na saṁśayaḥ
जो अधम द्विज बिना छिद्र का ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाते हैं, उनके ललाट पर निश्चय ही कुत्ते के पैर का चिह्न रखा हुआ समझना चाहिए।
श्लोक 35 (skanda.2.135.35)
तस्माच्छिद्रान्वितं पुंड्रं महच्छिद्रं शुभान्वितम् ।। धारयेद्ब्राह्मणो नित्यं हरिसालोक्यसिद्धये
tasmācchidrānvitaṁ puṁḍraṁ mahacchidraṁ śubhānvitam dhārayedbrāhmaṇo nityaṁ harisālokyasiddhaye
इसलिए ब्राह्मण को सदा छिद्रयुक्त, बड़े छिद्र वाला, शुभ पुण्ड्र ही धारण करना चाहिए, जिससे हरि के सालोक्य की सिद्धि प्राप्त हो।