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वैष्णव खण्ड · अध्याय 136

गोपीचन्दन तथा शंख-चक्र आदि आयुधों की मुद्रा धारण करने की विधि का कथन

अध्याय 135अध्याय-सूचीअध्याय 137

श्लोक 1 (skanda.2.136.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। पुंड्रं कतिविधं कार्यं प्रब्रूहि मम केशव ।। पुंड्राणां श्रवणेऽतीव कौतुकं मम जायते

brahmovāca puṁḍraṁ katividhaṁ kāryaṁ prabrūhi mama keśava puṁḍrāṇāṁ śravaṇe'tīva kautukaṁ mama jāyate

ब्रह्मा जी ने कहा — हे केशव! पुण्ड्र कितने प्रकार का बनाया जाना चाहिए, मुझे बताइए। पुण्ड्रों के विषय में सुनकर मुझे अत्यंत कौतूहल हो रहा है।

श्लोक 2 (skanda.2.136.2)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुंड्रं च त्रिविधं स्मृतम् ।। तुलसीमृत्स्नया सार्धं श्रीगोपीचंदनेन च

śrībhagavānuvāca śṛṇu putra pravakṣyāmi puṁḍraṁ ca trividhaṁ smṛtam tulasīmṛtsnayā sārdhaṁ śrīgopīcaṁdanena ca

श्रीभगवान ने कहा — हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ। पुण्ड्र तीन प्रकार का स्मरण किया गया है — तुलसी की मिट्टी से, श्री गोपीचन्दन से, तथा—

श्लोक 3 (skanda.2.136.3)

हरिचंदनतः कार्यं पुंड्रं तत्र विचक्षणैः ।। श्रीकृष्णतुलसीमूलमृदमादाय भक्तिमान् ।। धारयेदूर्ध्वपुंड्राणि हरिस्तत्र प्रसीदति

haricaṁdanataḥ kāryaṁ puṁḍraṁ tatra vicakṣaṇaiḥ śrīkṛṣṇatulasīmūlamṛdamādāya bhaktimān dhārayedūrdhvapuṁḍrāṇi haristatra prasīdati

—हरिचन्दन से भी विचक्षण पुरुषों द्वारा बनाया जाता है। भक्त पुरुष श्रीकृष्ण-तुलसी के मूल की मिट्टी लेकर ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करे — वहाँ हरि प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.136.4)

गोपीचंदन माहात्म्यं निबोध गदतो मम

gopīcaṁdana māhātmyaṁ nibodha gadato mama

अब मेरे द्वारा कहे जाने वाले गोपीचन्दन के माहात्म्य को जानो।

श्लोक 5 (skanda.2.136.5)

यो मृत्तिकां द्वारवतीसमुद्भवां करे समादाय ललाटपट्टके ।। करोति नित्यं नर ऊर्ध्वपुंड्रं क्रियाफलं कोटिगुणं तदा भवेत्

yo mṛttikāṁ dvāravatīsamudbhavāṁ kare samādāya lalāṭapaṭṭake karoti nityaṁ nara ūrdhvapuṁḍraṁ kriyāphalaṁ koṭiguṇaṁ tadā bhavet

जो मनुष्य द्वारवती में उत्पन्न मिट्टी हाथ में लेकर प्रतिदिन अपने ललाट-पट्ट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाता है, उसकी क्रिया का फल तब करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.2.136.6)

क्रियाविहीनं यदि मन्त्रहीनं श्रद्धाविहीनं यदि कालवर्जितम्।। कृत्वा ललाटे यदि गोपिचंदनं प्राप्नोति तत्कर्मफलं सदाऽव्ययम्

kriyāvihīnaṁ yadi mantrahīnaṁ śraddhāvihīnaṁ yadi kālavarjitam kṛtvā lalāṭe yadi gopicaṁdanaṁ prāpnoti tatkarmaphalaṁ sadā'vyayam

यदि क्रियारहित, मंत्ररहित, श्रद्धारहित और कालरहित होकर भी कोई ललाट पर गोपीचन्दन लगाता है, तो उसे उस कर्म का सदा अक्षय फल प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (skanda.2.136.7)

गोपीचंदनसंभवं सुरुचिरं पुंड्रं ललाटे द्विजो नित्यं धारयते यदि प्रतिदिनं रात्रौ दिवा सर्वदा।। यत्पुण्यं कुरुजांगले रविग्रहे माघ प्रयागे तथा तत्प्राप्नोति ततोऽधिकं मम गृहे संतिष्ठते देववत्

gopīcaṁdanasaṁbhavaṁ suruciraṁ puṁḍraṁ lalāṭe dvijo nityaṁ dhārayate yadi pratidinaṁ rātrau divā sarvadā yatpuṇyaṁ kurujāṁgale ravigrahe māgha prayāge tathā tatprāpnoti tato'dhikaṁ mama gṛhe saṁtiṣṭhate devavat

यदि कोई द्विज गोपीचन्दन से बना सुंदर पुण्ड्र प्रतिदिन रात-दिन सदा ललाट पर धारण करता है, तो कुरुजांगल में, सूर्यग्रहण में, माघ में और प्रयाग में जो पुण्य मिलता है, वह उसे प्राप्त होता है, और उससे भी अधिक वह देवता के समान मेरे घर में निवास करता है।

श्लोक 8 (skanda.2.136.8)

यस्मिन्गृहे तिष्ठति गोपिचंदनं भक्त्या ललाटे मनुजो बिभर्ति चेत् ।। तस्मिन्गृहेऽहं निवसामि सर्वदा श्रियान्वितः कंसनिहा चतुर्मुख

yasmingṛhe tiṣṭhati gopicaṁdanaṁ bhaktyā lalāṭe manujo bibharti cet tasmingṛhe'haṁ nivasāmi sarvadā śriyānvitaḥ kaṁsanihā caturmukha

जिस घर में गोपीचन्दन रहता है, यदि उसमें कोई मनुष्य भक्तिपूर्वक ललाट पर उसे धारण करता है, हे चतुर्मुख! उस घर में कंस का वध करने वाला मैं, लक्ष्मी सहित, सदा निवास करता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.2.136.9)

यो धारयेद्द्द्वारवतीसमुद्भवां मृत्स्नां पवित्रां कलिकल्मषापहाम् ।। नित्यं ललाटे मम मन्त्रसंयुतां यमं न पश्येदपि पापसंयुतः

yo dhārayedddvāravatīsamudbhavāṁ mṛtsnāṁ pavitrāṁ kalikalmaṣāpahām nityaṁ lalāṭe mama mantrasaṁyutāṁ yamaṁ na paśyedapi pāpasaṁyutaḥ

जो प्रतिदिन ललाट पर मंत्र सहित द्वारवती में उत्पन्न पवित्र, कलियुग के पाप को हरने वाली मिट्टी धारण करता है, वह पापयुक्त होते हुए भी यम को नहीं देखता।

श्लोक 10 (skanda.2.136.10)

यस्यांऽतकाले सुत गोपिचंदनं बाह्वोर्ललाटे हृदि मस्तके च ।। प्रयाति लोके कमलापतेर्मम गोबालघाती यदि ब्रह्महा स्यात्

yasyāṁ'takāle suta gopicaṁdanaṁ bāhvorlalāṭe hṛdi mastake ca prayāti loke kamalāpatermama gobālaghātī yadi brahmahā syāt

हे पुत्र! जिसकी दोनों भुजाओं, ललाट, हृदय और मस्तक पर मृत्यु के समय गोपीचन्दन होता है, वह लक्ष्मीपति मेरे लोक को प्राप्त होता है — चाहे वह गोवध करने वाला या ब्रह्महत्यारा ही क्यों न हो।

श्लोक 11 (skanda.2.136.11)

ग्रहा न पीड्यंति न रक्षसां गणा यक्षाः पिशाचोरगभूतनायकाः ।। ललाटपट्टे सुत गोपिचंदनं संतिष्ठते यस्य मम प्रभावात्

grahā na pīḍyaṁti na rakṣasāṁ gaṇā yakṣāḥ piśācoragabhūtanāyakāḥ lalāṭapaṭṭe suta gopicaṁdanaṁ saṁtiṣṭhate yasya mama prabhāvāt

हे पुत्र! जिसके ललाट-पट्ट पर मेरे प्रभाव से गोपीचन्दन स्थित रहता है, उसे न ग्रह पीड़ा देते हैं, न राक्षसों के समूह, न यक्ष, पिशाच, सर्प और भूतों के अधिपति।

श्लोक 12 (skanda.2.136.12)

ऊर्ध्वपुंड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते ।। स चंडालोऽपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः

ūrdhvapuṁḍramṛjuṁ saumyaṁ lalāṭe yasya dṛśyate sa caṁḍālo'pi śuddhātmā pūjya eva na saṁśayaḥ

जिसके ललाट पर सीधा, सौम्य ऊर्ध्वपुण्ड्र दिखाई देता है, वह चाण्डाल भी शुद्धात्मा और निःसंदेह पूज्य ही है।

श्लोक 13 (skanda.2.136.13)

अस्नातो यः क्रियाः कुर्यादशुचिः पापसंयुतः ।। गोपीचंदनसंपर्कात्पूतो भवति तत्क्षणात्

asnāto yaḥ kriyāḥ kuryādaśuciḥ pāpasaṁyutaḥ gopīcaṁdanasaṁparkātpūto bhavati tatkṣaṇāt

जो स्नान न किया हुआ, अशुद्ध और पापयुक्त होकर भी कर्म करता है, वह गोपीचन्दन के संपर्क मात्र से उसी क्षण पवित्र हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.2.136.14)

अशुचिर्वाप्यनाचारो महापापं समाचरेत् ।। शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुंड्रांऽकितो नरः

aśucirvāpyanācāro mahāpāpaṁ samācaret śucireva bhavennityamūrdhvapuṁḍrāṁ'kito naraḥ

चाहे कोई अशुद्ध हो या दुराचारी, चाहे महापाप ही क्यों न करे — ऊर्ध्वपुण्ड्र से अंकित मनुष्य सदा शुद्ध ही रहता है।

श्लोक 15 (skanda.2.136.15)

मत्प्रियार्थं शुभार्थं वा रक्षार्थं चतुरानन ।। मत्पूजाहोमके चैव सायं प्रातः समाहितः।। मद्भक्तो धारयेन्नित्यमूर्ध्वपुंड्रं भवापहम्

matpriyārthaṁ śubhārthaṁ vā rakṣārthaṁ caturānana matpūjāhomake caiva sāyaṁ prātaḥ samāhitaḥ madbhakto dhārayennityamūrdhvapuṁḍraṁ bhavāpaham

हे चतुरानन! मेरी प्रीति के लिए, शुभ के लिए, रक्षा के लिए, तथा मेरी पूजा और होम में, सायं-प्रातः सावधान होकर, मेरा भक्त संसार को नष्ट करने वाला ऊर्ध्वपुण्ड्र सदा धारण करे।

श्लोक 16 (skanda.2.136.16)

ऊर्ध्वपुंड्रधरो मर्त्यो म्रियते यदि कुत्रचित् ।। श्वपाकोऽपि विमानस्थो मम लोके महीयते

ūrdhvapuṁḍradharo martyo mriyate yadi kutracit śvapāko'pi vimānastho mama loke mahīyate

यदि ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करने वाला मनुष्य कहीं भी मरता है, तो चाण्डाल भी विमान में बैठकर मेरे लोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 17 (skanda.2.136.17)

ऊर्ध्वपुंड्रधरो मर्त्यो यदा यस्यान्नमश्नुते ।। तदा विंशत्कुलं तस्य नरकादुद्धराम्यहम्

ūrdhvapuṁḍradharo martyo yadā yasyānnamaśnute tadā viṁśatkulaṁ tasya narakāduddharāmyaham

ऊर्ध्वपुण्ड्रधारी मनुष्य जब कभी किसी का अन्न खाता है, तब मैं उसके इक्कीस कुलों को नरक से उद्धार करता हूँ।

श्लोक 18 (skanda.2.136.18)

वीक्ष्याऽऽदर्शे जले वाऽपि यो विदध्यात्प्रयत्नतः ।। ऊर्ध्वपुण्ड्रं महाभाग स याति परमां गतिम्

vīkṣyā''darśe jale vā'pi yo vidadhyātprayatnataḥ ūrdhvapuṇḍraṁ mahābhāga sa yāti paramāṁ gatim

हे महाभाग! जो दर्पण में अथवा जल में देखकर सावधानीपूर्वक ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 19 (skanda.2.136.19)

अनामिका शांतिदोक्ता मध्यमाऽऽयुष्करी भवेत् ।। अंगुष्ठः पुष्टिदः प्रोक्तस्तर्जनी मोक्षदायिनी ।।

anāmikā śāṁtidoktā madhyamā''yuṣkarī bhavet aṁguṣṭhaḥ puṣṭidaḥ proktastarjanī mokṣadāyinī

अनामिका (अंगूठे के पास वाली अंगुली) शांति देने वाली कही गई है, मध्यमा आयु देने वाली है; अंगूठा पुष्टि देने वाला कहा गया है और तर्जनी मोक्ष देने वाली है।

श्लोक 20 (skanda.2.136.20)

गोपीचंदनखंडं तु यो ददाति च वैष्णवे ।। कुलमष्टोत्तरं तेन तारितं वै भवेच्छतम्

gopīcaṁdanakhaṁḍaṁ tu yo dadāti ca vaiṣṇave kulamaṣṭottaraṁ tena tāritaṁ vai bhavecchatam

जो किसी वैष्णव को गोपीचन्दन का टुकड़ा देता है, उसके द्वारा एक सौ आठ कुल तार दिए जाते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.136.21)

यज्ञो दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।। व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रविनाकृतम्

yajño dānaṁ tapo homaḥ svādhyāyaḥ pitṛtarpaṇam vyarthaṁ bhavati tatsarvamūrdhvapuṇḍravinākṛtam

यज्ञ, दान, तप, होम, स्वाध्याय और पितृतर्पण — यह सब ऊर्ध्वपुण्ड्र के बिना व्यर्थ हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.136.22)

यच्छरीरं मनुष्याणामूर्ध्वपुण्ड्रविनाकृतम् ।। तन्मुखं नैव पश्यामि श्मशानसदृशं हि तत्

yaccharīraṁ manuṣyāṇāmūrdhvapuṇḍravinākṛtam tanmukhaṁ naiva paśyāmi śmaśānasadṛśaṁ hi tat

मनुष्यों का जो शरीर ऊर्ध्वपुण्ड्र से रहित है, उसका मुख मैं कभी नहीं देखता — वह श्मशान के समान ही है।

श्लोक 23 (skanda.2.136.23)

ऊर्ध्वपुण्ड्रं प्रकुर्वीत मत्स्यकूर्मादिधारणम् ।। कुर्याद्विष्णुप्रसादार्थं महाविष्णोरतिप्रियम्

ūrdhvapuṇḍraṁ prakurvīta matsyakūrmādidhāraṇam kuryādviṣṇuprasādārthaṁ mahāviṣṇoratipriyam

ऊर्ध्वपुण्ड्र बनाना चाहिए तथा मत्स्य-कूर्म आदि के चिह्न भी धारण करने चाहिए — यह विष्णु की प्रसन्नता के लिए, महाविष्णु को अत्यंत प्रिय कर्म है।

श्लोक 24 (skanda.2.136.24)

यत्पुनः कलिकाले तु मत्पुरीसंभवां मृदम् ।। मत्स्यकूर्मांऽकितं चिह्नं गृहीत्वा कुरुते नरः

yatpunaḥ kalikāle tu matpurīsaṁbhavāṁ mṛdam matsyakūrmāṁ'kitaṁ cihnaṁ gṛhītvā kurute naraḥ

पुनः कलिकाल में जो मनुष्य मेरी पुरी में उत्पन्न मिट्टी लेकर उस पर मत्स्य और कूर्म का चिह्न अंकित करता है—

श्लोक 25 (skanda.2.136.25)

देहे तस्य प्रविष्टं मां जानीहि त्रिदशोत्तम ।। तस्य मे नांतरं किंचित्कर्तव्यं श्रेय इच्छता

dehe tasya praviṣṭaṁ māṁ jānīhi tridaśottama tasya me nāṁtaraṁ kiṁcitkartavyaṁ śreya icchatā

हे त्रिदशोत्तम! जानो कि मैं उसके शरीर में प्रविष्ट हो गया हूँ। कल्याण चाहने वाले के लिए मेरा उससे बढ़कर और कोई कर्तव्य नहीं है।

श्लोक 26 (skanda.2.136.26)

ममावतारचिह्नानि दृश्यंते यस्य विग्रहे ।। मर्त्यो मर्त्यो न विज्ञेयः स नूनं मामकी तनुः

mamāvatāracihnāni dṛśyaṁte yasya vigrahe martyo martyo na vijñeyaḥ sa nūnaṁ māmakī tanuḥ

जिसके शरीर पर मेरे अवतारों के चिह्न दिखाई देते हैं, उसे साधारण मनुष्य नहीं समझना चाहिए — वह निश्चय ही मेरी अपनी देह है।

श्लोक 27 (skanda.2.136.27)

पापं सुकृतरूपं तु जायते तस्य देहिनः ।। ममाऽऽयुधानि दृश्यंते लिखितानि कलौ युगे

pāpaṁ sukṛtarūpaṁ tu jāyate tasya dehinaḥ mamā''yudhāni dṛśyaṁte likhitāni kalau yuge

उस देहधारी का पाप भी पुण्य का रूप धारण कर लेता है; कलियुग में मेरे आयुध उस पर अंकित दिखाई देते हैं।

श्लोक 28 (skanda.2.136.28)

उभाभ्यामपि चिह्नाभ्यां योंऽकितो मत्स्यमुद्रया ।। कूर्मया मामकं तेजो विक्षिप्तं तस्य विग्रहे

ubhābhyāmapi cihnābhyāṁ yoṁ'kito matsyamudrayā kūrmayā māmakaṁ tejo vikṣiptaṁ tasya vigrahe

जो मत्स्य और कूर्म — दोनों मुद्राओं से अंकित है, उसके शरीर में मेरा ही तेज संचारित हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.2.136.29)

शंख च पद्मं च गदां रथांगं मत्स्यं च कूर्मं रचितं स्वदेहे ।। करोति नित्यं सुकृतस्य वृद्धिं पापक्षयं जन्मशतार्जितस्य

śaṁkha ca padmaṁ ca gadāṁ rathāṁgaṁ matsyaṁ ca kūrmaṁ racitaṁ svadehe karoti nityaṁ sukṛtasya vṛddhiṁ pāpakṣayaṁ janmaśatārjitasya

जो अपने शरीर पर शंख, पद्म, गदा, चक्र, मत्स्य और कूर्म का अंकन करता है, वह प्रतिदिन पुण्य की वृद्धि और सैकड़ों जन्मों के अर्जित पाप का क्षय करता है।

श्लोक 30 (skanda.2.136.30)

नारायणायुधैर्नित्यं चिह्नितो यस्य विग्रहः ।। पापकोटिप्रयुक्तस्य तस्य किं कुरुते यमः

nārāyaṇāyudhairnityaṁ cihnito yasya vigrahaḥ pāpakoṭiprayuktasya tasya kiṁ kurute yamaḥ

जिसका शरीर सदा नारायण के आयुधों से चिह्नित रहता है, उसे — चाहे वह करोड़ों पापों में लिप्त क्यों न हो — यम क्या कर सकता है?

श्लोक 31 (skanda.2.136.31)

शंखोद्धारे च यत्प्रोक्तं वसता कोटिजन्मभिः ।। तत्फलं लभते शंखे प्रत्यहं दक्षिणे भुजे

śaṁkhoddhāre ca yatproktaṁ vasatā koṭijanmabhiḥ tatphalaṁ labhate śaṁkhe pratyahaṁ dakṣiṇe bhuje

शंखोद्धार-तीर्थ में करोड़ों जन्मों तक निवास करने से जो फल कहा गया है, वही फल प्रतिदिन दाहिनी भुजा पर शंख धारण करने से प्राप्त होता है।

श्लोक 32 (skanda.2.136.32)

यत्फलं पुष्करे प्रोक्तं पुण्डरीकाक्षदर्शनात् ।। शंखोपरि कृते पद्मे तत्फलं कोटिसंमितम्

yatphalaṁ puṣkare proktaṁ puṇḍarīkākṣadarśanāt śaṁkhopari kṛte padme tatphalaṁ koṭisaṁmitam

पुष्कर में पुण्डरीकाक्ष के दर्शन से जो फल कहा गया है, शंख के ऊपर पद्म बनाने पर वह फल करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 33 (skanda.2.136.33)

वामे भुजे गदा यस्य लिखिता दृश्यते कलौ।। गदाधरो गयापुण्यं प्रत्यहं तस्य यच्छति

vāme bhuje gadā yasya likhitā dṛśyate kalau gadādharo gayāpuṇyaṁ pratyahaṁ tasya yacchati

जिसकी बाईं भुजा पर कलियुग में गदा अंकित दिखाई देती है, गदाधर उसे प्रतिदिन गया के पुण्य के समान फल प्रदान करते हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.136.34)

यच्चानंदपुरे प्रोक्तं चक्रस्वामिसमीपतः ।। गदाचक्रे च लिखिते तत्फलं लिंगदर्शने

yaccānaṁdapure proktaṁ cakrasvāmisamīpataḥ gadācakre ca likhite tatphalaṁ liṁgadarśane

आनन्दपुर में चक्रस्वामी के समीप जो फल कहा गया है, गदा और चक्र अंकित करने पर वही फल लिंग-दर्शन का प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (skanda.2.136.35)

ममायुधांऽकितं देहं गोपीचन्दनमृत्स्नया ।। प्रयागादिषु तीर्थेषु स गत्वा किं करिष्यति

mamāyudhāṁ'kitaṁ dehaṁ gopīcandanamṛtsnayā prayāgādiṣu tīrtheṣu sa gatvā kiṁ kariṣyati

गोपीचन्दन की मिट्टी से मेरे आयुधों से अंकित शरीर वाला जो व्यक्ति है, वह प्रयाग आदि तीर्थों में जाकर और क्या करेगा?

श्लोक 36 (skanda.2.136.36)

यदायदा प्रपश्येत देहं शंखादिचिह्नितम् ।। तदातदा प्रसन्नोहं पापं तस्य दहामि वै

yadāyadā prapaśyeta dehaṁ śaṁkhādicihnitam tadātadā prasannohaṁ pāpaṁ tasya dahāmi vai

जब-जब मैं शंख आदि से चिह्नित शरीर देखता हूँ, तब-तब प्रसन्न होकर मैं उसके पाप को जला देता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.2.136.37)

तिष्ठते यस्य देहे तु अहोरात्रं दिने दिने ।। शंखचक्रगदापद्मलिखितं स मदात्मकः

tiṣṭhate yasya dehe tu ahorātraṁ dine dine śaṁkhacakragadāpadmalikhitaṁ sa madātmakaḥ

जिसके शरीर पर दिन-रात, प्रतिदिन, शंख, चक्र, गदा और पद्म अंकित रहते हैं, वह मेरे ही स्वरूप का है।

श्लोक 38 (skanda.2.136.38)

नारायणायुधैर्युक्तं कृत्वात्मानं कलौ युगे ।। यत्पुण्यं कर्म कुरुते मेरुतुल्यं न संशयः

nārāyaṇāyudhairyuktaṁ kṛtvātmānaṁ kalau yuge yatpuṇyaṁ karma kurute merutulyaṁ na saṁśayaḥ

कलियुग में नारायण के आयुधों से युक्त होकर जो पुण्यकर्म करता है, वह निःसंदेह मेरु के समान हो जाता है।

श्लोक 39 (skanda.2.136.39)

शंखायुधांऽकितो भक्त्या यः श्राद्धं कुरुते सुत ।। विधिहीनं तु संपूर्णं पितॄणां दत्तमक्षयम्

śaṁkhāyudhāṁ'kito bhaktyā yaḥ śrāddhaṁ kurute suta vidhihīnaṁ tu saṁpūrṇaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam

हे पुत्र! जो शंख के चिह्न से अंकित होकर भक्तिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह विधिरहित होते हुए भी पितरों को संपूर्ण और अक्षय रूप में दिया गया माना जाता है।

श्लोक 40 (skanda.2.136.40)

यथाऽग्निर्दहते काष्ठं वायुना प्रेषितो भृशम् ।। तथा दह्यंति पापानि दृष्ट्वा म आयुधानि वै

yathā'gnirdahate kāṣṭhaṁ vāyunā preṣito bhṛśam tathā dahyaṁti pāpāni dṛṣṭvā ma āyudhāni vai

जैसे वायु से प्रेरित अग्नि काष्ठ को तीव्रता से जला देती है, वैसे ही मेरे आयुधों को देखकर पाप जल जाते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.136.41)

मम नामांकितां मुद्रामष्टाक्षरसमन्विताम् ।। शंखादिस्वायुधैर्युक्तां स्वर्णरौप्यमयीमपि

mama nāmāṁkitāṁ mudrāmaṣṭākṣarasamanvitām śaṁkhādisvāyudhairyuktāṁ svarṇaraupyamayīmapi

जो मेरे नाम से अंकित, अष्टाक्षर मंत्र से युक्त, शंख आदि मेरे ही आयुधों से युक्त मुद्रा — चाहे वह सोने या चाँदी की भी क्यों न हो—

श्लोक 42 (skanda.2.136.42)

धत्ते भगवतो यस्तु कलिकाले विशेषतः ।। प्रह्रादस्य समो ज्ञेयो नान्यथा मम वल्लभः

dhatte bhagavato yastu kalikāle viśeṣataḥ prahrādasya samo jñeyo nānyathā mama vallabhaḥ

—विशेष रूप से कलिकाल में भगवान की वह मुद्रा धारण करता है, उसे प्रह्लाद के समान जानना चाहिए; अन्यथा वह मुझे प्रिय नहीं है।

श्लोक 43 (skanda.2.136.43)

यस्य नारायणी मुद्रा देहं शंखादिचिह्नितम् ।। धात्रीफलैः कृता माला तुलसीकाष्ठसंभवा

yasya nārāyaṇī mudrā dehaṁ śaṁkhādicihnitam dhātrīphalaiḥ kṛtā mālā tulasīkāṣṭhasaṁbhavā

जिसके शरीर पर नारायणी मुद्रा है, जो शंख आदि से चिह्नित है, जिसने धात्री (आँवले) के फलों की माला पहनी है, जो तुलसी काष्ठ से बनी है—

श्लोक 44 (skanda.2.136.44)

द्वादशाक्षरमंत्रस्तु नियुक्तानि कलेवरे ।। आयुधानि च विप्रस्य मत्समः स च वैष्णवः

dvādaśākṣaramaṁtrastu niyuktāni kalevare āyudhāni ca viprasya matsamaḥ sa ca vaiṣṇavaḥ

—जिसके अंगों पर द्वादशाक्षर मंत्र से युक्त आयुध लगाए गए हैं, वह ब्राह्मण मेरे समान वैष्णव है।

श्लोक 45 (skanda.2.136.45)

शंखांकिततनुर्विप्रो भुंक्ते वै यस्य वेश्मनि ।। तदन्नं स्वयमश्नामि पितृभिः सह पुत्रक

śaṁkhāṁkitatanurvipro bhuṁkte vai yasya veśmani tadannaṁ svayamaśnāmi pitṛbhiḥ saha putraka

हे पुत्र! जिसके घर में शंख से चिह्नित शरीर वाला ब्राह्मण भोजन करता है, उसका वह अन्न मैं स्वयं पितरों के साथ खाता हूँ।

श्लोक 46 (skanda.2.136.46)

कृष्णायुधांऽकितं दृष्ट्वा सन्मानं न करोति यः ।। द्वादशाब्दार्जितं पुण्यं बाष्कलेयाय गच्छति

kṛṣṇāyudhāṁ'kitaṁ dṛṣṭvā sanmānaṁ na karoti yaḥ dvādaśābdārjitaṁ puṇyaṁ bāṣkaleyāya gacchati

जो कृष्ण के आयुधों से चिह्नित पुरुष को देखकर सम्मान नहीं करता, उसका बारह वर्षों में अर्जित पुण्य कौवे को चला जाता है।

श्लोक 47 (skanda.2.136.47)

कृष्णायुधांऽकितो यस्तु श्मशाने म्रियते यदि ।। प्रयागे या गतिः प्रोक्ता सा गतिस्तस्य मानद

kṛṣṇāyudhāṁ'kito yastu śmaśāne mriyate yadi prayāge yā gatiḥ proktā sā gatistasya mānada

हे मानद! यदि कृष्ण के आयुधों से चिह्नित पुरुष श्मशान में भी मरता है, तो प्रयाग में मरने पर जो गति कही गई है, वही उसकी गति होती है।

श्लोक 48 (skanda.2.136.48)

ममाऽऽयुधैः कलौ नित्यं मंडितो यस्य विग्रहः ।। तत्राऽऽश्रमं प्रकुर्वंति विबुधा वासवादयः

mamā''yudhaiḥ kalau nityaṁ maṁḍito yasya vigrahaḥ tatrā''śramaṁ prakurvaṁti vibudhā vāsavādayaḥ

जिसका शरीर कलियुग में सदा मेरे आयुधों से सुशोभित रहता है, वहाँ इन्द्र आदि देवगण अपना आश्रम बना लेते हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.136.49)

यः करोति च मे पूजां मम शस्त्रांकितो नरः ।। अपराधसहस्राणि नित्यं तस्य हराम्यहम्

yaḥ karoti ca me pūjāṁ mama śastrāṁkito naraḥ aparādhasahasrāṇi nityaṁ tasya harāmyaham

जो मेरे शस्त्र से अंकित मनुष्य मेरी पूजा करता है, उसके सहस्रों अपराधों को मैं सदा हर लेता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.2.136.50)

कृत्वा काष्ठमयं बिंबं मम शस्त्रैः सुचिह्नितम् ।। यो वा अंकयते देहं तत्समो नास्ति वैष्णवः

kṛtvā kāṣṭhamayaṁ biṁbaṁ mama śastraiḥ sucihnitam yo vā aṁkayate dehaṁ tatsamo nāsti vaiṣṇavaḥ

जो मेरे शस्त्रों से सुचिह्नित काष्ठ की प्रतिमा बनाता है, अथवा अपने शरीर को उन्हीं से अंकित करता है, उसके समान कोई वैष्णव नहीं है।

श्लोक 51 (skanda.2.136.51)

अष्टाक्षरांऽकिता मुद्रा यस्य धातुमयी करे ।। शंखपद्मादिभिर्युक्ता पूज्यतेऽसौ सुरासुरैः

aṣṭākṣarāṁ'kitā mudrā yasya dhātumayī kare śaṁkhapadmādibhiryuktā pūjyate'sau surāsuraiḥ

जिसके हाथ में अष्टाक्षर से अंकित धातु की मुद्रा है, जो शंख-पद्म आदि से युक्त है, वह देवताओं और असुरों दोनों द्वारा पूजित होता है।

श्लोक 52 (skanda.2.136.52)

धृता नारायणी मुद्रा प्रह्रादेन पुरा करे ।। विभीषणेन बलिना ध्रुवेण च शुकेन च ।। मांधात्रा ह्यंबरीषेण मार्कंडेयमुखैर्द्विजैः

dhṛtā nārāyaṇī mudrā prahrādena purā kare vibhīṣaṇena balinā dhruveṇa ca śukena ca māṁdhātrā hyaṁbarīṣeṇa mārkaṁḍeyamukhairdvijaiḥ

नारायणी मुद्रा पूर्वकाल में प्रह्लाद, विभीषण, बलि, ध्रुव, शुक, मान्धाता, अम्बरीष तथा मार्कण्डेय आदि द्विजों ने अपने हाथ में धारण की थी।

श्लोक 53 (skanda.2.136.53)

शंखादिचिह्नितैः शस्त्रैर्देहं कृत्वा च मानद ।। एवमाराध्य मां प्राप्तं समीहितफलं महत्

śaṁkhādicihnitaiḥ śastrairdehaṁ kṛtvā ca mānada evamārādhya māṁ prāptaṁ samīhitaphalaṁ mahat

हे मानद! शंख आदि चिह्नों वाले शस्त्रों से शरीर को अंकित करके, इस प्रकार मेरी आराधना करके उन्होंने वांछित महान फल प्राप्त किया।

श्लोक 54 (skanda.2.136.54)

गोपीचंदनमृत्स्नया लिखितो यस्य विग्रहः ।। शंखचक्रादिपद्मांऽको देहे तस्य वसाम्यहम्

gopīcaṁdanamṛtsnayā likhito yasya vigrahaḥ śaṁkhacakrādipadmāṁ'ko dehe tasya vasāmyaham

गोपीचन्दन की मिट्टी से जिसका शरीर अंकित है, जो शंख-चक्र आदि तथा पद्म से चिह्नित है, उसके शरीर में मैं स्वयं निवास करता हूँ।

श्लोक 55 (skanda.2.136.55)

सौवर्णं राजतं ताम्रं कांस्यमायसमेव च ।। चक्रं कृत्वा तु मेधावी धारयीत विचक्षणः ।। द्वादशारं तु षट्कोणं वलित्रयविभूषितम्

sauvarṇaṁ rājataṁ tāmraṁ kāṁsyamāyasameva ca cakraṁ kṛtvā tu medhāvī dhārayīta vicakṣaṇaḥ dvādaśāraṁ tu ṣaṭkoṇaṁ valitrayavibhūṣitam

बुद्धिमान और विचक्षण पुरुष को सोने, चाँदी, ताँबे, कांसे अथवा लोहे का चक्र बनाकर धारण करना चाहिए — बारह अरों वाला, षट्कोण, तीन घेरों से सुशोभित।

श्लोक 56 (skanda.2.136.56)

एवं सुदर्शनं चक्रं कारयीत विचक्षणः ।। उपवीतादिवद्धार्याः शंखचक्रगदाः सदा

evaṁ sudarśanaṁ cakraṁ kārayīta vicakṣaṇaḥ upavītādivaddhāryāḥ śaṁkhacakragadāḥ sadā

इस प्रकार विचक्षण पुरुष सुदर्शन चक्र बनवाए; उपवीत आदि की भाँति शंख, चक्र और गदा सदा धारण करने चाहिए।

श्लोक 57 (skanda.2.136.57)

ब्राह्मणैश्च विशेषेण वैष्णवैश्च विशेषतः ।। उपवीतं शिखा यद्वच्चक्रं लांछन संयुतम्

brāhmaṇaiśca viśeṣeṇa vaiṣṇavaiśca viśeṣataḥ upavītaṁ śikhā yadvaccakraṁ lāṁchana saṁyutam

विशेष रूप से ब्राह्मणों को, और उससे भी विशेष रूप से वैष्णवों को — जैसे उपवीत और शिखा हैं, वैसे ही चक्र का चिह्न भी अनिवार्य है।

श्लोक 58 (skanda.2.136.58)

चक्रलांछनहीनस्य विप्रस्य विफलं भवेत् ।। मम चक्रांऽकितो देहः पवित्र इति वै श्रुतिः

cakralāṁchanahīnasya viprasya viphalaṁ bhavet mama cakrāṁ'kito dehaḥ pavitra iti vai śrutiḥ

चक्र-चिह्न से रहित ब्राह्मण के सभी कर्म व्यर्थ हो जाते हैं — 'मेरे चक्र से अंकित शरीर पवित्र है' ऐसा श्रुति का वचन है।

श्लोक 59 (skanda.2.136.59)

चक्रांऽकिताय दातव्यं हव्यं कव्यं विचक्षणैः ।। मम चक्रांऽककवचमभेद्यं देवदानवैः ।। अजेयः सर्वभूतानां शत्रूणां रक्षसामपि

cakrāṁ'kitāya dātavyaṁ havyaṁ kavyaṁ vicakṣaṇaiḥ mama cakrāṁ'kakavacamabhedyaṁ devadānavaiḥ ajeyaḥ sarvabhūtānāṁ śatrūṇāṁ rakṣasāmapi

चक्र से चिह्नित व्यक्ति को विचक्षण पुरुषों द्वारा हव्य और कव्य दोनों दिए जाने चाहिए; मेरे चक्र-चिह्न का कवच देवताओं और दानवों द्वारा भी अभेद्य है।

श्लोक 60 (skanda.2.136.60)

मम चक्रांऽककवचं शरीरे यस्य तिष्ठति ।। नाऽशुभं विद्यते तस्य गृहपुत्रादिकस्य हि

mama cakrāṁ'kakavacaṁ śarīre yasya tiṣṭhati nā'śubhaṁ vidyate tasya gṛhaputrādikasya hi

—वह सब प्राणियों, शत्रुओं और राक्षसों द्वारा अजेय है। जिसके शरीर में मेरे चक्र-चिह्न का कवच स्थित रहता है, उसके घर, पुत्र आदि का कभी अशुभ नहीं होता।

श्लोक 61 (skanda.2.136.61)

दक्षिणे च भुजे विप्रो बिभृयाद्वै सुदर्शनम् ।। सव्ये च शंखं बिभृयादिति वेदविदो विदुः

dakṣiṇe ca bhuje vipro bibhṛyādvai sudarśanam savye ca śaṁkhaṁ bibhṛyāditi vedavido viduḥ

वेद के जानकार यह जानते हैं कि ब्राह्मण को दाहिनी भुजा पर सुदर्शन और बाईं भुजा पर शंख धारण करना चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.2.136.62)

तत्तन्मंत्रेण मंत्रज्ञः प्रतिष्ठाप्य पृथक्पृथक्

tattanmaṁtreṇa maṁtrajñaḥ pratiṣṭhāpya pṛthakpṛthak

मंत्र के जानकार पुरुष को उन-उन मंत्रों से प्रत्येक की अलग-अलग प्रतिष्ठा करनी चाहिए।

श्लोक 63 (skanda.2.136.63)

ललाटे च गदा धार्या मूर्ध्नि चापं शरस्तथा ।। नंदकं चैव हृन्मध्ये शंखचक्रे भुजद्वये

lalāṭe ca gadā dhāryā mūrdhni cāpaṁ śarastathā naṁdakaṁ caiva hṛnmadhye śaṁkhacakre bhujadvaye

ललाट पर गदा धारण करनी चाहिए, मस्तक पर धनुष-बाण, हृदय के मध्य में नन्दक (खड्ग), और दोनों भुजाओं पर शंख-चक्र।

श्लोक 64 (skanda.2.136.64)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चक्रादीन्धारयेत्सदा ।। धारणानन्तरं ब्रूयात्तत्र चैवं द्विजोत्तमः

tasmātsarvaprayatnena cakrādīndhārayetsadā dhāraṇānantaraṁ brūyāttatra caivaṁ dvijottamaḥ

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से सदा चक्र आदि धारण करने चाहिए। धारण करने के पश्चात् द्विजोत्तम को वहाँ इस प्रकार कहना चाहिए—

श्लोक 65 (skanda.2.136.65)

पुत्रमित्रकलत्रादिर्यः कश्चिन्मत्परिग्रहः ।। सह देहेन सर्वोऽसौ विष्णुप्रीत्यै मयाऽर्पितः

putramitrakalatrādiryaḥ kaścinmatparigrahaḥ saha dehena sarvo'sau viṣṇuprītyai mayā'rpitaḥ

"पुत्र, मित्र, पत्नी आदि जो कुछ भी मेरा परिग्रह है, वह सब इस शरीर के साथ ही विष्णु की प्रीति के लिए मेरे द्वारा अर्पित है।"

श्लोक 66 (skanda.2.136.66)

पश्चात्स्वधर्ममास्थाय तिष्ठेदाजीवनं मम ।। भक्त्या चाव्यभिचारिण्या सर्वदाऽऽप्तमनोरथः

paścātsvadharmamāsthāya tiṣṭhedājīvanaṁ mama bhaktyā cāvyabhicāriṇyā sarvadā''ptamanorathaḥ

इसके पश्चात् अपने धर्म में स्थित रहकर, अव्यभिचारिणी भक्ति से युक्त होकर, जीवनभर मेरे प्रति समर्पित रहे, और सदा अपना मनोरथ प्राप्त करता रहे।

श्लोक 67 (skanda.2.136.67)

शंखचक्रांकितं दृष्ट्वा ये निंदंति नराधमाः ।। अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत् ।। श्रीकृष्णनाम चोच्चार्य शुद्धो भवति नान्यथा

śaṁkhacakrāṁkitaṁ dṛṣṭvā ye niṁdaṁti narādhamāḥ avalokya mukhaṁ teṣāmādityamavalokayet śrīkṛṣṇanāma coccārya śuddho bhavati nānyathā

जो अधम मनुष्य शंख-चक्र से अंकित पुरुष की निंदा करते हैं, उनका मुख देखकर सूर्य की ओर देखना चाहिए, और श्रीकृष्ण के नाम का उच्चारण करना चाहिए — इसी से, अन्यथा नहीं, मनुष्य शुद्ध होता है।

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