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वैष्णव खण्ड · अध्याय 137

शंख-पूजा विधि का कथन

अध्याय 136अध्याय-सूचीअध्याय 138

श्लोक 1 (skanda.2.137.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। तप्तचकांकितं कृत्वा ह्यात्मानमथ दीक्षितम् ।। पद्माक्षतुलसीमालं किं फलं ब्रूहि केशव

brahmovāca taptacakāṁkitaṁ kṛtvā hyātmānamatha dīkṣitam padmākṣatulasīmālaṁ kiṁ phalaṁ brūhi keśava

ब्रह्मा जी ने कहा — तप्त-चक्र से अंकित होकर दीक्षित हुए मनुष्य के लिए पद्माक्ष अथवा तुलसी की माला धारण करने का क्या फल है, हे केशव, मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.137.2)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। तुलसीकाष्ठसंभूतां यो मालां वहते द्विजः ।। अप्यऽशौचोऽप्यनाचारो मामेवैति न संशयः

śrībhagavānuvāca tulasīkāṣṭhasaṁbhūtāṁ yo mālāṁ vahate dvijaḥ apya'śauco'pyanācāro māmevaiti na saṁśayaḥ

श्रीभगवान ने कहा — जो द्विज तुलसी काष्ठ से बनी माला धारण करता है, वह अशुद्ध अथवा दुराचारी होते हुए भी निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.2.137.3)

धात्रीफलकृता माला तुलसीकाष्ठसंभवा ।। दृश्यते यस्य देहे तु स वै भागवतो नरः

dhātrīphalakṛtā mālā tulasīkāṣṭhasaṁbhavā dṛśyate yasya dehe tu sa vai bhāgavato naraḥ

तुलसी काष्ठ से बनी धात्री-फल की माला जिसके शरीर पर दिखाई देती है, वह वास्तव में भागवत पुरुष है।

श्लोक 4 (skanda.2.137.4)

तुलसीदलजां मालां कण्ठस्थां वहते तु यः ।। ममोत्तीर्णां विशेषेण स नमस्यो दिवौकसाम्

tulasīdalajāṁ mālāṁ kaṇṭhasthāṁ vahate tu yaḥ mamottīrṇāṁ viśeṣeṇa sa namasyo divaukasām

जो कण्ठ में तुलसी-दल की माला धारण करता है, विशेषकर जो मुझसे अर्पित होकर लौटी हुई हो, वह स्वर्गवासियों के लिए भी नमस्करणीय है।

श्लोक 5 (skanda.2.137.5)

तुलसीदलजां मालां धात्रीफलकृतामपि ।। ददाति पापिनां मुक्तिं किं पुनर्मम सेविनाम्

tulasīdalajāṁ mālāṁ dhātrīphalakṛtāmapi dadāti pāpināṁ muktiṁ kiṁ punarmama sevinām

तुलसी-दल की माला, अथवा धात्री-फल से बनी माला भी, पापियों को मुक्ति प्रदान करती है — फिर मेरे सेवकों की तो बात ही क्या!

श्लोक 6 (skanda.2.137.6)

तुलसीदलजां मालां ममोत्तीर्णां वहेत्तु यः ।। पत्रेपत्रेऽश्वमेधानां दशानां लभते फलम्

tulasīdalajāṁ mālāṁ mamottīrṇāṁ vahettu yaḥ patrepatre'śvamedhānāṁ daśānāṁ labhate phalam

जो मुझसे अर्पित होकर लौटी हुई तुलसी-दल की माला धारण करता है, उसे प्रत्येक पत्ते पर दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 7 (skanda.2.137.7)

तुलसीकाष्ठसंभूतां यो मालां वहते नरः।। फलं यच्छाम्यहं वत्स प्रत्यहं द्वारकोद्भवम्

tulasīkāṣṭhasaṁbhūtāṁ yo mālāṁ vahate naraḥ phalaṁ yacchāmyahaṁ vatsa pratyahaṁ dvārakodbhavam

हे वत्स! जो मनुष्य तुलसी काष्ठ से बनी माला धारण करता है, उसे मैं प्रतिदिन द्वारका में उत्पन्न फल प्रदान करता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.2.137.8)

निवेद्य भक्त्या मां मालां तुलसीकाष्ठसंभवाम् ।। वहते यो नरो भक्त्या तस्य वै नास्ति पातकम्

nivedya bhaktyā māṁ mālāṁ tulasīkāṣṭhasaṁbhavām vahate yo naro bhaktyā tasya vai nāsti pātakam

जो मनुष्य तुलसी काष्ठ से बनी माला भक्तिपूर्वक मुझे निवेदित करके धारण करता है, उसका कोई पाप शेष नहीं रहता।

श्लोक 9 (skanda.2.137.9)

सदा प्रीतमनास्तस्य अहं प्राणवरो हि सः ।। तुलसीकाष्ठसंभूतां यो मालां वहते नरः ।। प्रायश्चित्तं न तस्याऽस्ति नाऽशौचं तस्य विग्रहे

sadā prītamanāstasya ahaṁ prāṇavaro hi saḥ tulasīkāṣṭhasaṁbhūtāṁ yo mālāṁ vahate naraḥ prāyaścittaṁ na tasyā'sti nā'śaucaṁ tasya vigrahe

मेरा मन उससे सदा प्रसन्न रहता है, वह मुझे प्राण से भी बढ़कर प्रिय है। जो तुलसी काष्ठ की माला धारण करता है, उसके लिए न प्रायश्चित्त की आवश्यकता है, न उसके शरीर में कोई अशुद्धि होती है।

श्लोक 10 (skanda.2.137.10)

तुलसीकाष्ठसंभूतं शिरसः काष्ठभूषणम् ।। बाहौ करे च मर्त्यस्य देहे यस्य स मे प्रियः

tulasīkāṣṭhasaṁbhūtaṁ śirasaḥ kāṣṭhabhūṣaṇam bāhau kare ca martyasya dehe yasya sa me priyaḥ

जिस मनुष्य के शरीर पर सिर पर तुलसी काष्ठ का आभूषण, भुजा पर तथा हाथ में तुलसी काष्ठ हो, वह मुझे प्रिय है।

श्लोक 11 (skanda.2.137.11)

तुलसीकाष्ठमालाभिर्भूषितः पुण्यमाचरेत् ।। पितॄणां देवतानां च पुण्यं कोटिगुणं भवेत्

tulasīkāṣṭhamālābhirbhūṣitaḥ puṇyamācaret pitṝṇāṁ devatānāṁ ca puṇyaṁ koṭiguṇaṁ bhavet

तुलसी काष्ठ की मालाओं से सुशोभित होकर जो पुण्यकर्म करता है, उसका पितरों और देवताओं के लिए फल करोड़ गुना हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.2.137.12)

तुलसीकाष्ठमालां तु प्रेतराजस्य दूतकाः ।। दृष्ट्वा नश्यंति दूरेण वातोद्धूतं यथा दलम्

tulasīkāṣṭhamālāṁ tu pretarājasya dūtakāḥ dṛṣṭvā naśyaṁti dūreṇa vātoddhūtaṁ yathā dalam

तुलसी काष्ठ की माला को देखकर यमराज के दूत भी वैसे ही दूर भाग जाते हैं जैसे वायु से उड़ा हुआ पत्ता।

श्लोक 13 (skanda.2.137.13)

यद्गृहे तुलसीकाष्ठं पत्रं शुष्कमथाऽऽर्द्रकम् ।। भवंति तद्गृहे नैव पापं संक्रमते कलौ

yadgṛhe tulasīkāṣṭhaṁ patraṁ śuṣkamathā''rdrakam bhavaṁti tadgṛhe naiva pāpaṁ saṁkramate kalau

जिस घर में तुलसी की काष्ठ अथवा पत्ती, सूखी हो या गीली, होती है, उस घर में कलियुग में भी पाप का प्रवेश नहीं होता।

श्लोक 14 (skanda.2.137.14)

तुलसी काष्ठमालाभिर्भूषितो र्भ्रमते भुवि ।। दुःस्वप्नं दुर्निमित्तं च न भयं शात्रवं क्वचित्

tulasī kāṣṭhamālābhirbhūṣito rbhramate bhuvi duḥsvapnaṁ durnimittaṁ ca na bhayaṁ śātravaṁ kvacit

तुलसी काष्ठ की मालाओं से सुशोभित होकर पृथ्वी पर विचरण करने वाले को कभी दुःस्वप्न, अपशकुन अथवा शत्रु का भय नहीं होता।

श्लोक 15 (skanda.2.137.15)

धारयंति न ये मालां हैतुकाः पापबुद्धयः ।। नरकान्न निवर्तंते दग्धाः कोपाग्निना मम

dhārayaṁti na ye mālāṁ haitukāḥ pāpabuddhayaḥ narakānna nivartaṁte dagdhāḥ kopāgninā mama

जो पापबुद्धि तार्किक (कुतर्की) माला धारण नहीं करते, वे मेरे क्रोध की अग्नि से जलकर नरक से कभी नहीं लौटते।

श्लोक 16 (skanda.2.137.16)

तस्माद्धार्या प्रयत्नेन माला तुलसिसंभवा ।। पद्माक्षनिर्मिता भक्त्या फलैर्धात्र्या सुपुण्यदा

tasmāddhāryā prayatnena mālā tulasisaṁbhavā padmākṣanirmitā bhaktyā phalairdhātryā supuṇyadā

इसलिए प्रयत्नपूर्वक तुलसी से उत्पन्न माला धारण करनी चाहिए, अथवा भक्तिपूर्वक पद्माक्ष अथवा धात्री-फलों से बनी अत्यंत पुण्यदायी माला।

श्लोक 17 (skanda.2.137.17)

तदूर्ध्वपुंड्रशंखाद्यैर्युक्तस्तुलसिमूलके ।। सन्ध्योपास्त्यादिकं कुर्यात्कुशपाणिर्हिं मां स्मरन्

tadūrdhvapuṁḍraśaṁkhādyairyuktastulasimūlake sandhyopāstyādikaṁ kuryātkuśapāṇirhiṁ māṁ smaran

ऊर्ध्वपुण्ड्र, शंख आदि से युक्त होकर तुलसी के मूल में हाथ में कुश लेकर मेरा स्मरण करते हुए संध्या-उपासना आदि करनी चाहिए।

श्लोक 18 (skanda.2.137.18)

कृतसन्ध्यादिको भक्तस्ततः संपूजयेच्च माम् ।। गुरुश्चेत्तत्र वर्तेत आदौ गत्वा नमेद्गुरुम्

kṛtasandhyādiko bhaktastataḥ saṁpūjayecca mām guruścettatra varteta ādau gatvā namedgurum

संध्या आदि कर चुकने पर भक्त को मेरी पूजा करनी चाहिए। यदि वहाँ गुरु उपस्थित हों, तो पहले जाकर गुरु को प्रणाम करे।

श्लोक 19 (skanda.2.137.19)

किंचिद्दत्त्वोपायनं च दण्डवत्प्रणमेन्मुदा ।। आचम्यैकाग्रमनसा पूजामण्डपमाविशेत्

kiṁciddattvopāyanaṁ ca daṇḍavatpraṇamenmudā ācamyaikāgramanasā pūjāmaṇḍapamāviśet

कुछ भेंट देकर हर्षपूर्वक दण्डवत प्रणाम करे; फिर एकाग्रचित्त होकर आचमन करके पूजा-मण्डप में प्रवेश करे।

श्लोक 20 (skanda.2.137.20)

उपविश्याऽऽसने रम्ये कृष्णाजिनकुशोत्तरे ।। सम्यक्पद्मासनासीनो भूतशुद्धिं समाचरेत्

upaviśyā''sane ramye kṛṣṇājinakuśottare samyakpadmāsanāsīno bhūtaśuddhiṁ samācaret

कुशसहित कृष्णाजिन बिछे रमणीय आसन पर बैठकर, भलीभाँति पद्मासन में स्थित होकर भूत-शुद्धि करे।

श्लोक 21 (skanda.2.137.21)

प्राणायामत्रयं कृत्वा मन्त्रेण च जितेंद्रियः ।। उदङ्मुखस्ततः कृत्वा हृत्पंकजमनुत्तमम्।। विकासं तस्य कुर्वीत विज्ञानरविणा हृदि

prāṇāyāmatrayaṁ kṛtvā mantreṇa ca jiteṁdriyaḥ udaṅmukhastataḥ kṛtvā hṛtpaṁkajamanuttamam vikāsaṁ tasya kurvīta vijñānaraviṇā hṛdi

मंत्र सहित तीन प्राणायाम करके, इन्द्रियों को जीतकर, उत्तर दिशा की ओर मुख करके, फिर अपने उत्तम हृदय-कमल का ज्ञान रूपी सूर्य से हृदय में विकास करे।

श्लोक 22 (skanda.2.137.22)

कर्णिकायां न्यसेच्चार्कं शशिनं चाग्निमेव च ।। त्रयं त्रयात्मके तस्मिश्चिंतयेद्वैष्णवो नरः ।। नानारत्नमयं पीठं तेषामुपरि विन्यसेत्

karṇikāyāṁ nyaseccārkaṁ śaśinaṁ cāgnimeva ca trayaṁ trayātmake tasmiściṁtayedvaiṣṇavo naraḥ nānāratnamayaṁ pīṭhaṁ teṣāmupari vinyaset

उसकी कर्णिका में सूर्य, चन्द्र और अग्नि को स्थापित करे; वैष्णव पुरुष उस त्रयात्मक स्थान में इन तीनों का चिंतन करे, और उनके ऊपर नाना रत्नों से बना सिंहासन स्थापित करे।

श्लोक 23 (skanda.2.137.23)

तस्मिन्मृदुश्लक्ष्णतरं बालार्कसदृशद्युति ।। अष्टैश्वर्यदलं पद्मं मन्त्राक्षरमयं न्यसेत्

tasminmṛduślakṣṇataraṁ bālārkasadṛśadyuti aṣṭaiśvaryadalaṁ padmaṁ mantrākṣaramayaṁ nyaset

उस पर अत्यंत कोमल, चिकने, उदीयमान बाल-सूर्य के समान कांतिमान, आठ ऐश्वर्यों की पंखुड़ियों वाले, मंत्राक्षरमय पद्म की स्थापना करे।

श्लोक 24 (skanda.2.137.24)

तस्मिन्देवं समासीनं कोटिशीतांशुसन्निभम् ।। चतुर्भुजं महापद्मशंखचक्रगदाधरम्

tasmindevaṁ samāsīnaṁ koṭiśītāṁśusannibham caturbhujaṁ mahāpadmaśaṁkhacakragadādharam

उस पर करोड़ों चन्द्रमाओं के समान कांतिमान, चतुर्भुज, महापद्म, शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देव को विराजमान भावना करे।

श्लोक 25 (skanda.2.137.25)

पद्मपत्रविशालाक्षं सर्वलक्षणलक्षितम् ।। श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं पीतवस्त्रान्वितं च माम्

padmapatraviśālākṣaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam śrīvatsakaustubhoraskaṁ pītavastrānvitaṁ ca mām

कमल-पत्र के समान विशाल नेत्रों वाले, सभी शुभ लक्षणों से युक्त, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि से सुशोभित, पीत वस्त्र धारण किए हुए मुझे—

श्लोक 26 (skanda.2.137.26)

विचित्राभरणैर्युक्तं दिव्यमंडनमंडितम् ।। दिव्यचन्दनलिप्तांगं दिव्यपुष्पोपशोभितम्

vicitrābharaṇairyuktaṁ divyamaṁḍanamaṁḍitam divyacandanaliptāṁgaṁ divyapuṣpopaśobhitam

विचित्र आभूषणों से युक्त, दिव्य अलंकारों से सुसज्जित, दिव्य चन्दन से लिप्त अंगों वाले, दिव्य पुष्पों से सुशोभित—

श्लोक 27 (skanda.2.137.27)

तुलसीकोमलदलवनमालाविभूषितम् ।। कोटिबालार्कसदृशं कान्तं दिव्यश्रिया सह

tulasīkomaladalavanamālāvibhūṣitam koṭibālārkasadṛśaṁ kāntaṁ divyaśriyā saha

तुलसी के कोमल पत्तों की वनमाला से विभूषित, करोड़ों उदीयमान सूर्यों के समान कांतिमान, दिव्य श्री (लक्ष्मी) के साथ सुंदर—

श्लोक 28 (skanda.2.137.28)

सर्वलक्षणलक्षिण्या समाश्लिष्टतनुं शिवम् ।। एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रं समाहितमनाः शुचिः

sarvalakṣaṇalakṣiṇyā samāśliṣṭatanuṁ śivam evaṁ dhyātvā japenmaṁtraṁ samāhitamanāḥ śuciḥ

तथा सभी शुभ लक्षणों से युक्त उस देवी से आलिंगित मंगलमय शरीर वाले — इस प्रकार ध्यान करके, एकाग्रचित्त, पवित्र होकर मंत्र का जप करे।

श्लोक 29 (skanda.2.137.29)

सहस्रं शतवारं वा यथाशक्ति जपेन्मनुम् ।। मनसैवाऽर्चनं कृत्वा ततो विधिवदाचरेत्

sahasraṁ śatavāraṁ vā yathāśakti japenmanum manasaivā'rcanaṁ kṛtvā tato vidhivadācaret

अपनी शक्ति के अनुसार सहस्र बार अथवा सौ बार मंत्र का जप करे। इस प्रकार मानसिक पूजा करके फिर विधिपूर्वक बाह्य पूजा प्रारंभ करे।

श्लोक 30 (skanda.2.137.30)

संप्रदायाऽनुरोधेन शंखं स्थाप्य ममाग्रतः ।। दूर्वांकुरैश्च पुष्पैश्च गंधोदेन च पूरितम्

saṁpradāyā'nurodhena śaṁkhaṁ sthāpya mamāgrataḥ dūrvāṁkuraiśca puṣpaiśca gaṁdhodena ca pūritam

संप्रदाय के अनुसार दूर्वांकुर, पुष्प और सुगंधित जल से भरा शंख मेरे आगे स्थापित करे।

श्लोक 31 (skanda.2.137.31)

दक्षिणे गंधपुष्पाणां पात्रं स्थाप्य च देशिकैः ।। वामभागे न्यसेत्कुंभं वस्त्रपूतं सुवासितम्

dakṣiṇe gaṁdhapuṣpāṇāṁ pātraṁ sthāpya ca deśikaiḥ vāmabhāge nyasetkuṁbhaṁ vastrapūtaṁ suvāsitam

आचार्यगण दाहिनी ओर गंध और पुष्पों का पात्र स्थापित करें, तथा बाईं ओर वस्त्र से छाना हुआ, सुगंधित जल से भरा कलश रखें।

श्लोक 32 (skanda.2.137.32)

पुरतो मम घंटां च दिक्षु दीपान्नियोजयेत् ।। अन्यत्सर्वं साधनं च यथास्थानेषु विन्यसेत्

purato mama ghaṁṭāṁ ca dikṣu dīpānniyojayet anyatsarvaṁ sādhanaṁ ca yathāsthāneṣu vinyaset

मेरे आगे घण्टा रखे और दिशाओं में दीप स्थापित करे; अन्य सभी साधन-सामग्री यथास्थान रखे।

श्लोक 33 (skanda.2.137.33)

अर्घ्यपाद्याऽऽचमनीयमधुपर्कस्य कारणात् ।। विन्यसेत्पुरतो मह्यं चत्वार्यमत्रकाणि वै

arghyapādyā''camanīyamadhuparkasya kāraṇāt vinyasetpurato mahyaṁ catvāryamatrakāṇi vai

अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय और मधुपर्क के लिए मेरे आगे चार छोटे पात्र स्थापित करे।

श्लोक 34 (skanda.2.137.34)

सिद्धार्थाऽक्षतपुष्पाणि कुशाग्रं तिलचंदनम् ।। फलं यवाश्चतुर्वक्त्र अर्घ्यपात्रे विनिःक्षिपेत्

siddhārthā'kṣatapuṣpāṇi kuśāgraṁ tilacaṁdanam phalaṁ yavāścaturvaktra arghyapātre viniḥkṣipet

हे चतुर्मुख! सफेद सरसों, अक्षत, पुष्प, कुश की नोक, तिल, चन्दन, फल और जौ — ये सब अर्घ्य के पात्र में रखे जाएँ।

श्लोक 35 (skanda.2.137.35)

दूर्वा विष्णुपदी श्यामा पद्मं चैव चतुर्थकम् ।। पाद्यपात्रे न्यसेत्पुत्र देशिको मम तुष्टये

dūrvā viṣṇupadī śyāmā padmaṁ caiva caturthakam pādyapātre nyasetputra deśiko mama tuṣṭaye

हे पुत्र! दूर्वा, विष्णुपदी (एक पवित्र पुष्प), श्याम पुष्प और चौथा पद्म — आचार्य को इन्हें मेरी प्रसन्नता के लिए पाद्य-पात्र में रखना चाहिए।

श्लोक 36 (skanda.2.137.36)

कंकोलं च लवंगं च फलं मालतिसंभवम् ।। कुर्याद्वै श्रद्धया पुत्र पात्र आचमनीयके

kaṁkolaṁ ca lavaṁgaṁ ca phalaṁ mālatisaṁbhavam kuryādvai śraddhayā putra pātra ācamanīyake

हे पुत्र! कंकोल, लौंग और मालती से उत्पन्न फल — इन्हें श्रद्धापूर्वक आचमनीय के पात्र में रखे।

श्लोक 37 (skanda.2.137.37)

गव्यं पयो दधि मधु घृतं खंड समन्वितम् ।। मधुपर्कस्य पात्रे वै दद्याद्वै श्रद्धयाऽर्चकः

gavyaṁ payo dadhi madhu ghṛtaṁ khaṁḍa samanvitam madhuparkasya pātre vai dadyādvai śraddhayā'rcakaḥ

गाय का दूध, दही, मधु और घी, शक्कर सहित — श्रद्धालु पूजक इन्हें मधुपर्क के पात्र में अर्पित करे।

श्लोक 38 (skanda.2.137.38)

उक्तानां द्रव्यजातीनामलाभे पत्रपुष्पयोः ।। तत्तद्भावनया कुर्यात्सर्वदा विधिकोविदः

uktānāṁ dravyajātīnāmalābhe patrapuṣpayoḥ tattadbhāvanayā kuryātsarvadā vidhikovidaḥ

यदि कहे गए द्रव्यों अथवा पत्ते-पुष्पों की प्राप्ति न हो, तो विधि के जानकार को सदा उन-उनकी भावना मात्र से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 39 (skanda.2.137.39)

करन्यासं ततः कुर्यादंगन्यासं तथैव च ।। पंचांगं वा षडंगं वा विन्यसेत्संप्रदायतः

karanyāsaṁ tataḥ kuryādaṁganyāsaṁ tathaiva ca paṁcāṁgaṁ vā ṣaḍaṁgaṁ vā vinyasetsaṁpradāyataḥ

फिर करन्यास और उसी प्रकार अंगन्यास करे; संप्रदाय के अनुसार पंचांग अथवा षडंग न्यास करे।

श्लोक 40 (skanda.2.137.40)

ममाऽनुस्मरणं कार्यमात्मानं मत्समं स्मरेत् ।। पूजारंभे चतुर्वक्त्रं मंगलं तु पठेन्नरः

mamā'nusmaraṇaṁ kāryamātmānaṁ matsamaṁ smaret pūjāraṁbhe caturvaktraṁ maṁgalaṁ tu paṭhennaraḥ

मेरा अनुस्मरण करना चाहिए, तथा अपने आपको मेरे समान भावना करे। पूजा के आरम्भ में, हे चतुर्मुख! मनुष्य को मंगल-श्लोक पढ़ना चाहिए।

श्लोक 41 (skanda.2.137.41)

अथ संपूजयेच्छंखं पांचजन्यं मम प्रियम् ।। यस्य संपूजनाद्वत्स आनंदः परमो मम ।। शंखस्य पूजने वत्स मंत्रानेतानुदीरयेत्

atha saṁpūjayecchaṁkhaṁ pāṁcajanyaṁ mama priyam yasya saṁpūjanādvatsa ānaṁdaḥ paramo mama śaṁkhasya pūjane vatsa maṁtrānetānudīrayet

फिर मेरे प्रिय पांचजन्य शंख की पूजा करे — हे वत्स! जिसकी पूजा से मुझे परम आनन्द होता है। हे वत्स! शंख की पूजा में इन मंत्रों का उच्चारण करे—

श्लोक 42 (skanda.2.137.42)

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ।। निर्मितः सर्वदेवैश्च पांचजन्य नमोऽस्तु ते

tvaṁ purā sāgarotpanno viṣṇunā vidhṛtaḥ kare nirmitaḥ sarvadevaiśca pāṁcajanya namo'stu te

'तुम पूर्वकाल में समुद्र से उत्पन्न हुए, विष्णु द्वारा हाथ में धारण किए गए, समस्त देवों द्वारा निर्मित — हे पांचजन्य! तुम्हें नमस्कार हो।'

श्लोक 43 (skanda.2.137.43)

तव नादेन जीमूता वित्रसंति सुराऽसुराः ।। शशांकाऽयुतदीप्ताभ पांचजन्य नमोऽस्तु ते

tava nādena jīmūtā vitrasaṁti surā'surāḥ śaśāṁkā'yutadīptābha pāṁcajanya namo'stu te

'तुम्हारी ध्वनि से मेघ काँप उठते हैं, देवता और असुर दोनों भयभीत हो जाते हैं; दस हजार चन्द्रमाओं के समान तेजस्वी — हे पांचजन्य! तुम्हें नमस्कार हो।'

श्लोक 44 (skanda.2.137.44)

गर्भा देवारिनारीणां विलीयंते सहस्रधा ।। तव नादेन पाताले पांचजन्य नमोऽस्तु ते

garbhā devārinārīṇāṁ vilīyaṁte sahasradhā tava nādena pātāle pāṁcajanya namo'stu te

'देवताओं के शत्रुओं की स्त्रियों के गर्भ तुम्हारी ध्वनि से पाताल में भी सहस्रों टुकड़ों में विलीन हो जाते हैं — हे पांचजन्य! तुम्हें नमस्कार हो।'

श्लोक 45 (skanda.2.137.45)

दर्शनेनैव शंखस्य किं पुनः स्पर्शने कृते ।। विलयं यांति पापानि हिमवद्भास्करोदये

darśanenaiva śaṁkhasya kiṁ punaḥ sparśane kṛte vilayaṁ yāṁti pāpāni himavadbhāskarodaye

शंख के दर्शन मात्र से ही, स्पर्श करने पर तो और क्या कहा जाए — पाप उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होते ही हिम पिघल जाता है।

श्लोक 46 (skanda.2.137.46)

नत्वा शंखं करे धृत्वा मंत्रैरेभिस्तु वैष्णवः ।। यः स्नापयति मां भक्त्या तस्य पुण्यमनंतकम्

natvā śaṁkhaṁ kare dhṛtvā maṁtrairebhistu vaiṣṇavaḥ yaḥ snāpayati māṁ bhaktyā tasya puṇyamanaṁtakam

प्रणाम करके, हाथ में शंख लेकर, इन्हीं मंत्रों से जो वैष्णव भक्तिपूर्वक मुझे स्नान कराता है, उसका पुण्य अनंत होता है।

श्लोक 47 (skanda.2.137.47)

सुवासितेन तैलेन कुर्यादभ्यंजनं ततः ।। कस्तूर्या चंदनेनैव कुर्यादुद्वर्तनादिकम्

suvāsitena tailena kuryādabhyaṁjanaṁ tataḥ kastūryā caṁdanenaiva kuryādudvartanādikam

फिर सुगंधित तेल से अभ्यंजन करे, तथा कस्तूरी और चन्दन से उद्वर्तन आदि करे।

श्लोक 48 (skanda.2.137.48)

सुगंधवासितैस्तोयैः स्नाप्य मंत्रयुतैः शुभैः ।। अर्घ्यं दत्त्वा ततो वत्स पाद्यमाचमनीयकम् ।। मधुपर्कं ततो दद्यादथ सर्वोपचारकान्

sugaṁdhavāsitaistoyaiḥ snāpya maṁtrayutaiḥ śubhaiḥ arghyaṁ dattvā tato vatsa pādyamācamanīyakam madhuparkaṁ tato dadyādatha sarvopacārakān

शुभ मंत्रों सहित सुगंधित जल से स्नान कराकर, हे वत्स! फिर अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय, तत्पश्चात् मधुपर्क तथा अन्य सभी उपचार अर्पित करे।

श्लोक 49 (skanda.2.137.49)

वस्त्रैराभरणैर्दिव्यैरलंकृत्य यथाविधि ।। पुष्पैः संपूजयेत्पीठं तत्र देवं निधाय च

vastrairābharaṇairdivyairalaṁkṛtya yathāvidhi puṣpaiḥ saṁpūjayetpīṭhaṁ tatra devaṁ nidhāya ca

विधिपूर्वक दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से अलंकृत करके, पुष्पों से सिंहासन की पूजा करे, और वहाँ देव को स्थापित करके—

श्लोक 50 (skanda.2.137.50)

वस्त्राऽलंकारगंधादीनर्पयेच्छ्रद्धया मम ।। नैवेद्यं विविधं दद्यात्पायसाऽपूपमिश्रितम् ।। सकर्पूरं च तांबूलं भक्त्या चैव निवेदयेत्

vastrā'laṁkāragaṁdhādīnarpayecchraddhayā mama naivedyaṁ vividhaṁ dadyātpāyasā'pūpamiśritam sakarpūraṁ ca tāṁbūlaṁ bhaktyā caiva nivedayet

—श्रद्धापूर्वक मुझे वस्त्र, आभूषण, गंध आदि अर्पित करे। पायस और पूए से मिश्रित विविध नैवेद्य अर्पित करे, तथा भक्तिपूर्वक कर्पूर सहित तांबूल निवेदित करे।

श्लोक 51 (skanda.2.137.51)

सुरभीणि च पुष्पाणि भक्त्या सम्यङ्निवेदयेत्।। धूपं दशांगमष्टांगं दीपं च सुमनोहरम्

surabhīṇi ca puṣpāṇi bhaktyā samyaṅnivedayet dhūpaṁ daśāṁgamaṣṭāṁgaṁ dīpaṁ ca sumanoharam

सुगंधित पुष्प भक्तिपूर्वक भलीभाँति निवेदित करे; दस अंगों वाला अथवा आठ अंगों वाला धूप और अत्यंत मनोहर दीप अर्पित करे।

श्लोक 52 (skanda.2.137.52)

परिणीय प्रणम्याथ स्तुत्वा स्तुतिभिरादरात् ।। शाययित्वा तु पर्यंके मगलार्घ्यं निवेदयेत्

pariṇīya praṇamyātha stutvā stutibhirādarāt śāyayitvā tu paryaṁke magalārghyaṁ nivedayet

परिक्रमा करके, प्रणाम करके, फिर आदरपूर्वक स्तोत्रों से स्तुति करके, शय्या पर शयन कराकर, अंत में मंगल-अर्घ्य निवेदित करे।

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